कर्ण पर्व · अध्याय 60
धृष्टद्युम्न पर गजसेना का आक्रमण
दुर्योधन की प्रेरणा से पूर्व और दक्षिण के देशों की हाथी-सवार टुकड़ियाँ धृष्टद्युम्न पर टूट पड़ती हैं। धृष्टद्युम्न, पाण्डव, सात्यकि, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पुत्र और शिखण्डी उन्हें काट गिराते हैं; सात्यकि, सहदेव और नकुल हाथियों तथा उनके अङ्ग और पुण्ड्र देश के सवारों को मारते हैं, और नकुल अङ्ग के राजा को मार डालता है। शत्रु के हाथी नष्ट हो जाने पर पाण्डव योद्धा सेना को मथकर फिर कर्ण की ओर दौड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.60.1)
हस्तिभिस्तु महामात्रास्तव पुत्रेण चोदिताः । धृष्टद्युम्नं घ्नतेत्याशु क्रुद्धाः पार्षतमभ्ययुः ॥
hastibhistu mahāmātrāstava putreṇa coditāḥ | dhṛṣṭadyumnaṃ ghnatetyāśu kruddhāḥ pārṣatamabhyayuḥ
आपके पुत्र की प्रेरणा से क्रुद्ध महावत हाथियों पर चढ़कर 'धृष्टद्युम्न को मार डालो' कहते हुए तेजी से पार्षत धृष्टद्युम्न पर टूट पड़े।
श्लोक 2 (8.60.2)
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रवरा गजयोधिनः । अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च मागधास्ताम्रलिप्तकाः ॥
prācyāśca dākṣiṇātyāśca pravarā gajayodhinaḥ | aṅgā vaṅgāśca puṇḍrāśca māgadhāstāmraliptakāḥ
वे पूर्व और दक्षिण के श्रेष्ठ गजयोद्धा थे: अङ्ग, वङ्ग, पुण्ड्र, मागध और ताम्रलिप्तक,
श्लोक 3 (8.60.3)
मेकलाः कोशला मद्रा दशार्णा निषधास्तथा । गजयुद्धेषु कुशलाः कलिङ्गैः सह भारत ॥
mekalāḥ kośalā madrā daśārṇā niṣadhāstathā | gajayuddheṣu kuśalāḥ kaliṅgaiḥ saha bhārata
मेकल, कोसल, मद्र, दशार्ण और निषध, तथा कलिङ्गों के साथ, हे भारत, ये सब हाथियों से युद्ध करने में कुशल थे।
श्लोक 4 (8.60.4)
शरतोमरनाराचैर्वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः । सिषिचुस्ते ततः सर्वे पाञ्चालबलमाहवे ॥
śaratomaranārācairvṛṣṭimanta ivāmbudāḥ | siṣicuste tataḥ sarve pāñcālabalamāhave
वर्षा से भरे बादलों की तरह उन सबने उस युद्ध में बाणों, तोमरों और नाराचों की झड़ी लगाकर पाञ्चालों की सेना को सींच दिया।
श्लोक 5 (8.60.5)
तानभिद्रवतो नागान्मदवेगसमुद्धतान् । विपाठक्षुरनाराचैर्धृष्टद्युम्नो ह्यवीवृषत् ॥
tānabhidravato nāgānmadavegasamuddhatān | vipāṭhakṣuranārācairdhṛṣṭadyumno hyavīvṛṣat
मद के वेग से उन्मत्त वे हाथी जब दौड़े आ रहे थे, तब धृष्टद्युम्न ने विपाठ, क्षुर और नाराच बाणों से उन पर वर्षा कर दी।
श्लोक 6 (8.60.6)
एकैकं दशभिः षड्भिरष्टाभिरपि पार्षतः । द्विरदानभिविव्याध क्षिप्रं गिरिनिभाञ्शरैः ॥
ekaikaṃ daśabhiḥ ṣaḍbhiraṣṭābhirapi pārṣataḥ | dviradānabhivivyādha kṣipraṃ girinibhāñśaraiḥ
पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न ने पर्वत जैसे उन हाथियों में से एक-एक को दस, छह या आठ बाणों से शीघ्र बींध डाला।
श्लोक 7 (8.60.7)
प्रच्छाद्यमानं द्विरदैर्मेघैरिव दिवाकरम् । पर्ययुः पाण्डुपाञ्चाला नदन्तो ह्यात्तकार्मुकाः ॥
pracchādyamānaṃ dviradairmeghairiva divākaram | paryayuḥ pāṇḍupāñcālā nadanto hyāttakārmukāḥ
जब हाथी धृष्टद्युम्न को उसी तरह ढक रहे थे जैसे बादल सूर्य को, तब पाण्डव और पाञ्चाल धनुष उठाए गर्जते हुए उसके चारों ओर आ पहुँचे।
श्लोक 8 (8.60.8)
तान्नागानभिवर्षन्तो ज्यातलत्रविनादिनः । वीरनृत्यं प्रनृत्यन्तः शूरतालप्रचोदितैः । नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥
tānnāgānabhivarṣanto jyātalatravinādinaḥ | vīranṛtyaṃ pranṛtyantaḥ śūratālapracoditaiḥ | nakulaḥ sahadevaśca draupadeyāḥ prabhadrakāḥ
उन हाथियों पर बाणों की वर्षा करते, हथेली के चर्मपट्ट पर प्रत्यञ्चा की टङ्कार करते, वीरों की ताली से प्रेरित होकर वीरनृत्य करते हुए नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पुत्र और प्रभद्रक आ पहुँचे,
श्लोक 9 (8.60.9)
सात्यकिश्च शिखण्डी च चेकितानश्च वीर्यवान् । समन्तात्सिषिचुर्वीरा मेघास्तोयैरिवाचलान् ॥
sātyakiśca śikhaṇḍī ca cekitānaśca vīryavān | samantātsiṣicurvīrā meghāstoyairivācalān
तथा सात्यकि, शिखण्डी और पराक्रमी चेकितान भी। उन वीरों ने चारों ओर से उन्हें वैसे ही सींच दिया जैसे बादल पर्वतों को जल से सींचते हैं।
श्लोक 10 (8.60.10)
ते म्लेच्छैः प्रेषिता नागा नरानश्वान्रथानपि । हस्तैराक्षिप्य ममृदुः पद्भिश्चाप्यतिमन्यवः ॥
te mlecchaiḥ preṣitā nāgā narānaśvānrathānapi | hastairākṣipya mamṛduḥ padbhiścāpyatimanyavaḥ
म्लेच्छों से हाँके गए वे अत्यन्त क्रोधित हाथी मनुष्यों, घोड़ों और रथों को सूँड़ों से उठाकर पटकते और पैरों से कुचलते थे।
श्लोक 11 (8.60.11)
बिभिदुश्च विषाणाग्रैः समाक्षिप्य च चिक्षिपुः । विषाणलग्नाश्चाप्यन्ये परिपेतुर्विभीषणाः ॥
bibhiduśca viṣāṇāgraiḥ samākṣipya ca cikṣipuḥ | viṣāṇalagnāścāpyanye paripeturvibhīṣaṇāḥ
वे दाँतों की नोकों से चीर डालते थे, या ऊपर उठाकर फेंक देते थे; और दाँतों में अटके हुए दूसरे लोग भयानक दृश्य बनकर नीचे गिरते थे।
श्लोक 12 (8.60.12)
प्रमुखे वर्तमानं तु द्विपमङ्गस्य सात्यकिः । नाराचेनोग्रवेगेन भित्त्वा मर्माण्यताडयत् ॥
pramukhe vartamānaṃ tu dvipamaṅgasya sātyakiḥ | nārācenogravegena bhittvā marmāṇyatāḍayat
अङ्ग राजा का हाथी सेना के आगे बढ़ा आ रहा था; सात्यकि ने तेज वेग वाले नाराच से उसके मर्मस्थान भेदकर उसे मारा।
श्लोक 13 (8.60.13)
तस्यावर्जितकायस्य द्विरदादुत्पतिष्यतः । नाराचेनाहनद्वक्षः सात्यकिः सोऽपतद्भुवि ॥
tasyāvarjitakāyasya dviradādutpatiṣyataḥ | nārācenāhanadvakṣaḥ sātyakiḥ so'patadbhuvi
जब उसका सवार शरीर को एक ओर झुकाकर हाथी से कूदने ही वाला था, तब सात्यकि ने नाराच से उसकी छाती पर प्रहार किया और वह भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 14 (8.60.14)
पुण्ड्रस्यापततो नागं चलन्तमिव पर्वतम् । सहदेवः प्रसन्नाग्रैर्नाराचैरहनत्त्रिभिः ॥
puṇḍrasyāpatato nāgaṃ calantamiva parvatam | sahadevaḥ prasannāgrairnārācairahanattribhiḥ
पुण्ड्र का हाथी चलते हुए पर्वत की तरह टूट पड़ा, तब सहदेव ने स्वच्छ नोक वाले तीन नाराचों से उसे मार गिराया।
श्लोक 15 (8.60.15)
विपताकं वियन्तारं विवर्मध्वजजीवितम् । तं कृत्वा द्विरदं भूयः सहदेवोऽङ्गमभ्ययात् ॥
vipatākaṃ viyantāraṃ vivarmadhvajajīvitam | taṃ kṛtvā dviradaṃ bhūyaḥ sahadevo'ṅgamabhyayāt
उस हाथी को पताका, महावत, कवच, ध्वज और प्राण से रहित करके सहदेव फिर अङ्ग राजा की ओर बढ़ा।
श्लोक 16 (8.60.16)
सहदेवं तु नकुलो वारयित्वाङ्गमार्दयत् । नाराचैर्यमदण्डाभैस्त्रिभिर्नागं शतेन तम् ॥
sahadevaṃ tu nakulo vārayitvāṅgamārdayat | nārācairyamadaṇḍābhaistribhirnāgaṃ śatena tam
परन्तु नकुल ने सहदेव को रोककर स्वयं अङ्ग राजा को पीड़ित किया; यमदण्ड जैसे तीन नाराचों से उसके हाथी को और सौ से उस राजा को बींधा।
श्लोक 17 (8.60.17)
दिवाकरकरप्रख्यानङ्गश्चिक्षेप तोमरान् । नकुलाय शतान्यष्टौ त्रिधैकैकं तु सोऽच्छिनत् ॥
divākarakaraprakhyānaṅgaścikṣepa tomarān | nakulāya śatānyaṣṭau tridhaikaikaṃ tu so'cchinat
अङ्ग राजा ने नकुल पर सूर्य की किरणों जैसे चमकने वाले आठ सौ तोमर फेंके, और नकुल ने उनमें से हर एक को तीन-तीन टुकड़े कर दिया।
श्लोक 18 (8.60.18)
तथाऽर्धचन्द्रेण शिरस्तस्य चिच्छेद पाण्डवः । स पपात हतो म्लेच्छस्तेनैव सह दन्तिना ॥
tathā'rdhacandreṇa śirastasya ciccheda pāṇḍavaḥ | sa papāta hato mlecchastenaiva saha dantinā
तब पाण्डव नकुल ने अर्धचन्द्र बाण से उसका सिर काट डाला, और वह म्लेच्छ अपने हाथी सहित मरकर गिर पड़ा।
श्लोक 19 (8.60.19)
अथाङ्गपुत्रे निहते हस्तिशिक्षाविशारदे । अङ्गाः क्रुद्धा महामात्रा नागैर्नकुलमभ्ययुः ॥
athāṅgaputre nihate hastiśikṣāviśārade | aṅgāḥ kruddhā mahāmātrā nāgairnakulamabhyayuḥ
हाथियों की शिक्षा में निपुण अङ्ग राजा के पुत्र के मारे जाने पर क्रुद्ध अङ्ग महावत अपने हाथियों के साथ नकुल पर चढ़ आए,
श्लोक 20 (8.60.20)
चलत्पताकैः सुमुखैर्हेमकक्ष्यातनुच्छदैः । मिमर्दिषन्तस्त्वरिताः प्रदीप्तैरिव पर्वतैः ॥
calatpatākaiḥ sumukhairhemakakṣyātanucchadaiḥ | mimardiṣantastvaritāḥ pradīptairiva parvataiḥ
फहराती पताकाओं वाले, सुन्दर मुखों वाले, सोने की कक्ष्याओं और कवचों से ढके हाथियों पर, जलते हुए पर्वतों की तरह उसे कुचलने को आतुर होकर वे शीघ्रता से आ रहे थे।
श्लोक 21 (8.60.21)
मेकलोत्कलकालिङ्गा निषधास्ताम्रलिप्तकाः । शरतोमरवर्षाणि विमुञ्चन्तो जिघांसवः ॥
mekalotkalakāliṅgā niṣadhāstāmraliptakāḥ | śaratomaravarṣāṇi vimuñcanto jighāṃsavaḥ
मेकल, उत्कल, कलिङ्ग, निषध और ताम्रलिप्तक मारने की इच्छा से बाणों और तोमरों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 22 (8.60.22)
तैश्छाद्यमानं नकुलं निशाकरमिवाम्बुदैः । परिपेतुः सुसंरब्धाः पाण्डुपाञ्चालसात्यकाः ॥
taiśchādyamānaṃ nakulaṃ niśākaramivāmbudaiḥ | paripetuḥ susaṃrabdhāḥ pāṇḍupāñcālasātyakāḥ
जब वे नकुल को बादलों से चन्द्रमा की तरह ढक रहे थे, तब पाण्डव, पाञ्चाल और सात्यक अत्यन्त क्रोध से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 23 (8.60.23)
ततस्तदभवद्युद्धं रथिनां हस्तिभिः सह । सृजतां शरवर्षाणि तोमरांश्च सहस्रशः ॥
tatastadabhavadyuddhaṃ rathināṃ hastibhiḥ saha | sṛjatāṃ śaravarṣāṇi tomarāṃśca sahasraśaḥ
तब हजारों बाणों और तोमरों की वर्षा करते हुए रथियों और हाथियों के बीच युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 24 (8.60.24)
नागानां प्रास्फुटन्कुम्भा मर्माणि च नखानि च । दन्ताश्चैवातिविद्धानां नाराचैर्हेमभूषणैः ॥
nāgānāṃ prāsphuṭankumbhā marmāṇi ca nakhāni ca | dantāścaivātividdhānāṃ nārācairhemabhūṣaṇaiḥ
सोने से सजे नाराचों से बुरी तरह बिंधे हुए हाथियों के कुम्भ फट गए, उनके मर्मस्थान और नाखून तथा दाँत भी टूट गए।
श्लोक 25 (8.60.25)
तेषामष्टौ महानागांश्चतुःषष्ट्या सुतेजनैः । नाराचैः सहदेवस्तान्पातयामास सादिभिः ॥
teṣāmaṣṭau mahānāgāṃścatuḥṣaṣṭyā sutejanaiḥ | nārācaiḥ sahadevastānpātayāmāsa sādibhiḥ
इनमें से सहदेव ने चौंसठ तीखे नाराचों से आठ बड़े हाथियों को उनके सवारों सहित गिरा दिया।
श्लोक 26 (8.60.26)
अञ्जोगतिभिरायम्य प्रयत्नाद्धनुरुत्तमम् । नाराचैरहनन्नागान्नकुलः कुलनन्दनः ॥
añjogatibhirāyamya prayatnāddhanuruttamam | nārācairahanannāgānnakulaḥ kulanandanaḥ
सीधी चाल वाले बाणों के लिए सावधानी से उत्तम धनुष खींचकर कुलनन्दन नकुल ने नाराचों से हाथियों को मार गिराया।
श्लोक 27 (8.60.27)
ततः पाञ्चालशैनेयौ द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः । शिखण्डी च महानागान्सिषिचुः शरवृष्टिभिः ॥
tataḥ pāñcālaśaineyau draupadeyāḥ prabhadrakāḥ | śikhaṇḍī ca mahānāgānsiṣicuḥ śaravṛṣṭibhiḥ
तब पाञ्चाल और शैनेय, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक और शिखण्डी ने बाणों की वर्षा से उन बड़े हाथियों को सींच दिया।
श्लोक 28 (8.60.28)
ते पाण्डुयोधाम्बुधरैः शत्रुद्विरदपर्वताः । बाणवर्षैर्हताः पेतुर्वज्रवर्षैरिवाचलाः ॥
te pāṇḍuyodhāmbudharaiḥ śatrudviradaparvatāḥ | bāṇavarṣairhatāḥ peturvajravarṣairivācalāḥ
बादलों जैसे पाण्डव योद्धाओं की बाणवर्षा से मारे गए शत्रु के पर्वत जैसे हाथी वैसे ही गिरे जैसे वज्रों की वर्षा से पर्वत गिरते हैं।
श्लोक 29 (8.60.29)
एवं हत्वा तव गजांस्ते पाण्डुरथकुञ्जराः । द्रुतं सेनां च वर्षन्तो भिन्नकूलामिवापगाम् ॥
evaṃ hatvā tava gajāṃste pāṇḍurathakuñjarāḥ | drutaṃ senāṃ ca varṣanto bhinnakūlāmivāpagām
इस प्रकार आपके हाथियों को मारकर, हाथियों जैसे उन पाण्डव रथियों ने टूटे हुए तटों वाली नदी जैसी आपकी सेना पर भी तेजी से बाणों की वर्षा की।
श्लोक 30 (8.60.30)
तां ते सेनां समालोड्य पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः । विक्षोभयित्वा च पुनः कर्णं समभिदुद्रुवुः ॥
tāṃ te senāṃ samāloḍya pāṇḍuputrasya sainikāḥ | vikṣobhayitvā ca punaḥ karṇaṃ samabhidudruvuḥ
उस सेना को मथकर और तितर-बितर करके पाण्डवों के सैनिक फिर कर्ण पर टूट पड़े।