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कर्ण पर्व · अध्याय 61

कृष्ण द्वारा संकट में पड़े युधिष्ठिर को दिखाना

युद्ध की धूल बैठ जाने पर कृष्ण अर्जुन को दिखाते हैं कि दुर्योधन की सेना युधिष्ठिर का पीछा कर रही है और पाञ्चाल, चेदि और मत्स्य उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। वे दुर्योधन, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कर्ण का बल बताते हैं, कहते हैं कि उपवास से दुर्बल राजा ब्राह्मण-बल में स्थित हैं, क्षात्र-बल में नहीं, और प्राणसंकट में हैं; भीम कौरवों की गर्जनाएँ सह रहे हैं और कर्ण उन्हें राजा को मारने के लिए उकसा रहा है, इसलिए कृष्ण को आशङ्का है कि युधिष्ठिर जीवित नहीं हैं।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.61.1)

तेषां प्रवृत्ते सङ्ग्रामे विपुले शोणितोदके । रराज लोहितेनोर्वी संसिक्ता बहुधा भृशम् ॥

teṣāṃ pravṛtte saṅgrāme vipule śoṇitodake | rarāja lohitenorvī saṃsiktā bahudhā bhṛśam

उनका वह विशाल युद्ध चलता रहा, जिसमें रक्त ही जल था; चारों ओर रक्त से सींची हुई पृथ्वी लाल होकर चमक उठी।

श्लोक 2 (8.61.2)

ततो रजसि संशान्ते प्रकाशः सर्वतोऽभवत् । एतस्मिन्नन्तरे पार्थं कृष्णो वचनमब्रवीत् । दर्शयन्निव कौन्तेयं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

tato rajasi saṃśānte prakāśaḥ sarvato'bhavat | etasminnantare pārthaṃ kṛṣṇo vacanamabravīt | darśayanniva kaunteyaṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

तब धूल बैठ जाने पर सब ओर उजाला हो गया। उसी समय कृष्ण ने पार्थ से कहा, मानो कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को दिखा रहे हों।

वासुदेव उवाच

श्लोक 3 (8.61.3)

एष पाण्डव ते भ्राता धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः । जिघांसुभिर्महेष्वासैः शीघ्रं पार्थोऽनुसार्यते ॥

eṣa pāṇḍava te bhrātā dhārtarāṣṭrairmahābalaiḥ | jighāṃsubhirmaheṣvāsaiḥ śīghraṃ pārtho'nusāryate

देखो पाण्डव, वह तुम्हारा भाई है! उसे मारने की इच्छा वाले धृतराष्ट्र के बलवान् महाधनुर्धर पुत्र शीघ्रता से पार्थ का पीछा कर रहे हैं।

श्लोक 4 (8.61.4)

तमन्वगेव पाञ्चालाश्चेदिमात्स्याश्च भारत । अनुयान्ति महात्मानं परीप्सन्तो महाजवाः ॥

tamanvageva pāñcālāścedimātsyāśca bhārata | anuyānti mahātmānaṃ parīpsanto mahājavāḥ

हे भारत! पाञ्चाल, चेदि और मत्स्य उन महात्मा के ठीक पीछे-पीछे उन्हें बचाने की इच्छा से बड़े वेग से चल रहे हैं।

श्लोक 5 (8.61.5)

एष दुर्योधनः पार्थ गजानीकेन दंशितः । राजा सर्वस्य लोकस्य राजानमनुधावति ॥

eṣa duryodhanaḥ pārtha gajānīkena daṃśitaḥ | rājā sarvasya lokasya rājānamanudhāvati

हे पार्थ! वह दुर्योधन, कवच पहने और हाथियों की सेना के साथ, सारे संसार का राजा होकर राजा युधिष्ठिर के पीछे दौड़ रहा है।

श्लोक 6 (8.61.6)

जिघांसुः पुरुषव्याघ्रं भ्रातृभिः सहितो बली । आशीविषसमस्पर्शैः सर्वायुधविशारदैः ॥

jighāṃsuḥ puruṣavyāghraṃ bhrātṛbhiḥ sahito balī | āśīviṣasamasparśaiḥ sarvāyudhaviśāradaiḥ

वह बलवान् अपने भाइयों के साथ उस पुरुषसिंह को मारना चाहता है, और उसके साथ ऐसे योद्धा हैं जिनका स्पर्श विषैले साँपों जैसा है और जो सब शस्त्रों में निपुण हैं,

श्लोक 7 (8.61.7)

नदद्भिः सिंहनादांश्च धमद्भिश्चापि वारिजान् । बलवद्भिर्महेष्वासैर्विधून्वानैर्धनूंषि च ॥

nadadbhiḥ siṃhanādāṃśca dhamadbhiścāpi vārijān | balavadbhirmaheṣvāsairvidhūnvānairdhanūṃṣi ca

जो सिंहनाद करते, शङ्ख बजाते और धनुषों को हिलाते हैं, ऐसे बलवान् महाधनुर्धरों के साथ।

श्लोक 8 (8.61.8)

एते जिघृक्षवो यान्ति द्विपाश्वरथपत्तयः । युधिष्ठिरं धार्तराष्ट्रो रत्नोत्तममिवार्थिनः ॥

ete jighṛkṣavo yānti dvipāśvarathapattayaḥ | yudhiṣṭhiraṃ dhārtarāṣṭro ratnottamamivārthinaḥ

युधिष्ठिर को पकड़ने की इच्छा से धृतराष्ट्र के पुत्र के हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे कोई श्रेष्ठ रत्न के चाहने वाले।

श्लोक 9 (8.61.9)

पश्य सात्वतभीमाभ्यां निरुद्धा विष्ठिताः पुनः । जिहीर्षवोऽमृतं दैत्याः शक्राग्निभ्यामिवाहवे ॥

paśya sātvatabhīmābhyāṃ niruddhā viṣṭhitāḥ punaḥ | jihīrṣavo'mṛtaṃ daityāḥ śakrāgnibhyāmivāhave

देखो, सात्यकि और भीम से रोके जाने पर वे फिर व्यूह बाँधकर खड़े हो गए हैं, जैसे अमृत को छीन ले जाना चाहने वाले दैत्य युद्ध में इन्द्र और अग्नि से रोके गए थे।

श्लोक 10 (8.61.10)

एते बहुत्वात्त्वरिताः पुनर्गच्छन्ति पाण्डवम् । समुद्रमिव वार्योघाः प्रावृट्काले महारथाः ॥

ete bahutvāttvaritāḥ punargacchanti pāṇḍavam | samudramiva vāryoghāḥ prāvṛṭkāle mahārathāḥ

संख्या में बहुत होने से जल्दी करते हुए ये महारथी फिर पाण्डव की ओर जा रहे हैं, जैसे वर्षाकाल में जल की धाराएँ समुद्र की ओर जाती हैं।

श्लोक 11 (8.61.11)

मृत्योर्मुखगतं मन्ये कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । हुतमग्नौ च कौन्तेयं दुर्योधनवशं गतम् ॥

mṛtyormukhagataṃ manye kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | hutamagnau ca kaunteyaṃ duryodhanavaśaṃ gatam

मुझे लगता है कि कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर मृत्यु के मुख में चले गए हैं; अग्नि में डाली हुई आहुति की तरह वे कुन्तीपुत्र दुर्योधन के वश में पड़ गए हैं।

श्लोक 12 (8.61.12)

यथायुक्तमनीकं हि धार्तराष्ट्रस्य पाण्डव । नास्य शक्रोऽपि मुच्येत सम्प्राप्तो बाणगोचरम् ॥

yathāyuktamanīkaṃ hi dhārtarāṣṭrasya pāṇḍava | nāsya śakro'pi mucyeta samprāpto bāṇagocaram

हे पाण्डव! धृतराष्ट्र के पुत्र की सेना ऐसी अच्छी तरह व्यूहित है कि बाणों की पहुँच में आ जाने पर इन्द्र भी इससे नहीं बच सकता।

श्लोक 13 (8.61.13)

दुर्योधनस्य वीरस्य शरौघाञ्शीघ्रमस्यतः । सङ्क्रुद्धस्यान्तकस्येव को वेगं संसहेद्रणे ॥

duryodhanasya vīrasya śaraughāñśīghramasyataḥ | saṅkruddhasyāntakasyeva ko vegaṃ saṃsahedraṇe

बाणों की धाराएँ शीघ्रता से छोड़ते हुए क्रुद्ध यमराज जैसे वीर दुर्योधन का वेग युद्ध में कौन सह सकता है?

श्लोक 14 (8.61.14)

रसतस्तस्य वीरस्य द्रौणेः शारद्वतस्य च । कर्णस्य चेषुवेगो वै पर्वतानपि शातयेत् ॥

rasatastasya vīrasya drauṇeḥ śāradvatasya ca | karṇasya ceṣuvego vai parvatānapi śātayet

गर्जते हुए उस वीर, द्रोणपुत्र, शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य और कर्ण के बाणों का वेग पर्वतों को भी तोड़ सकता है।

श्लोक 15 (8.61.15)

कर्णेन च कृतो राजा विमुखोऽद्य तु दृश्यते ॥

karṇena ca kṛto rājā vimukho'dya tu dṛśyate

और आज राजा कर्ण के कारण विमुख हुए दिखाई दे रहे हैं।

श्लोक 16 (8.61.16)

बलवाँल्लुघुहस्तश्च कृती युद्धविशारदः । राधेयः पाण्डवश्रेष्ठं शक्तः पीडयितुं रणे । सहितो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः शूरैर्महाबलैः ॥

balavām̐llughuhastaśca kṛtī yuddhaviśāradaḥ | rādheyaḥ pāṇḍavaśreṣṭhaṃ śaktaḥ pīḍayituṃ raṇe | sahito dhṛtarāṣṭrasya putraiḥ śūrairmahābalaiḥ

राधापुत्र कर्ण बलवान्, फुर्तीले हाथों वाला, कुशल और युद्ध में निपुण है; धृतराष्ट्र के बलवान् शूर पुत्रों के साथ वह रणभूमि में पाण्डवश्रेष्ठ को पीड़ित कर सकता है।

श्लोक 17 (8.61.17)

तस्यैभिर्युध्यमानस्य सङ्ग्रामे शंसितात्मनः । अन्यैरपि च पार्थस्य कृतं कर्म महारथैः ॥

tasyaibhiryudhyamānasya saṅgrāme śaṃsitātmanaḥ | anyairapi ca pārthasya kṛtaṃ karma mahārathaiḥ

जब वे प्रशंसित स्वभाव वाले इन सबके साथ युद्ध में लड़ रहे थे, तब दूसरे महारथियों ने भी पार्थ के विरुद्ध अपना कार्य कर दिखाया।

श्लोक 18 (8.61.18)

उपवासकृशो राजा भृशं भरतसत्तमः । ब्राह्मो बले स्थितो ह्येष न क्षात्रे हि बले विभुः ॥

upavāsakṛśo rājā bhṛśaṃ bharatasattamaḥ | brāhmo bale sthito hyeṣa na kṣātre hi bale vibhuḥ

हे भरतश्रेष्ठ! राजा उपवास से बहुत दुर्बल हो गए हैं; वे ब्राह्मण-बल में स्थित हैं, क्षत्रिय-बल में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 19 (8.61.19)

कर्णेन चाभियुक्तोऽयं भूपतिः शत्रुतापनः । संशयं समनुप्राप्तः पाण्डवो वै युधिष्ठिरः ॥

karṇena cābhiyukto'yaṃ bhūpatiḥ śatrutāpanaḥ | saṃśayaṃ samanuprāptaḥ pāṇḍavo vai yudhiṣṭhiraḥ

और शत्रुओं को तपाने वाले ये राजा पाण्डव युधिष्ठिर कर्ण के आक्रमण से संकट में पड़ गए हैं।

श्लोक 20 (8.61.20)

न जीवति महाराजो मन्ये पार्थ युधिष्ठिरः । यद्भीमसेनः सहते सिंहनादममर्षणः ॥

na jīvati mahārājo manye pārtha yudhiṣṭhiraḥ | yadbhīmasenaḥ sahate siṃhanādamamarṣaṇaḥ

हे पार्थ! मुझे लगता है महाराज युधिष्ठिर जीवित नहीं हैं, क्योंकि अधीर स्वभाव के भीमसेन सिंहनाद सह रहे हैं

श्लोक 21 (8.61.21)

नर्दतां धार्तराष्ट्राणां पुनःपुनररिन्दमः । धमतां च महाशङ्खान्सङ्ग्रामे जितकाशिनाम् ॥

nardatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ punaḥpunararindamaḥ | dhamatāṃ ca mahāśaṅkhānsaṅgrāme jitakāśinām

उन धृतराष्ट्रपुत्रों के, हे शत्रुदमन! जो बार-बार गरजते और युद्ध में विजय के उल्लास से बड़े-बड़े शङ्ख बजाते हैं।

श्लोक 22 (8.61.22)

युधिष्ठिरं पाण्डवेयं हतेति भरतर्षभ । सञ्चोदयत्यसौ कर्णो धार्तराष्ट्रान्महाबलान् ॥

yudhiṣṭhiraṃ pāṇḍaveyaṃ hateti bharatarṣabha | sañcodayatyasau karṇo dhārtarāṣṭrānmahābalān

हे भरतश्रेष्ठ! 'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को मार डालो' कहकर यह कर्ण बलवान् धृतराष्ट्रपुत्रों को उकसा रहा है।

श्लोक 23 (8.61.23)

स्थूणाकर्णास्त्रजालेन पार्थ पाशुपतेन च । प्रच्छादयन्ति राजानमनुयान्ति महारथाः ॥

sthūṇākarṇāstrajālena pārtha pāśupatena ca | pracchādayanti rājānamanuyānti mahārathāḥ

हे पार्थ! स्थूणाकर्ण और पाशुपत अस्त्रों के जाल से राजा को ढकते हुए ये महारथी उनका पीछा कर रहे हैं।

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