कर्ण पर्व · अध्याय 62
कृष्ण का अर्जुन को कर्ण से भिड़ने के लिए प्रेरित करना
कृष्ण अर्जुन को युद्ध का दृश्य दिखाते रहते हैं: कर्ण पाण्डव सेना और पाञ्चालों को तितर-बितर कर रहा है, दुर्योधन कर्ण की रक्षा के लिए लौट रहा है, और रथों, हाथियों, घोड़ों तथा पैदल सैनिकों का विशाल समूह बढ़ा आ रहा है। वे अर्जुन से कर्ण के साथ युद्ध करने का आग्रह करते हैं, बताते हैं कि युधिष्ठिर सुरक्षित हैं, और भीम तथा पाञ्चालों द्वारा कौरवों और उनके हाथियों के खदेड़े जाने का वर्णन करते हैं। यह सुनकर अर्जुन बचे हुए संशप्तकों और नारायण गोपालों का संहार करने लगता है।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (8.62.1)
आतुरो मे मतो राजा अविषह्यश्च भारत । यथैनमनुवर्तन्ते पञ्चालाः सह पाण्डवैः ॥
āturo me mato rājā aviṣahyaśca bhārata | yathainamanuvartante pañcālāḥ saha pāṇḍavaiḥ
हे भारत! मेरी दृष्टि में राजा आतुर हैं और उनकी दशा असह्य है, जैसे पाञ्चाल पाण्डवों के साथ उनके पीछे-पीछे चल रहे हैं,
श्लोक 2 (8.62.2)
त्वरमाणास्त्वराकाले सर्वशस्त्रभृतां वराः । मज्जन्तमिव पाताले बलिनो ह्युज्जिहीर्षवः ॥
tvaramāṇāstvarākāle sarvaśastrabhṛtāṃ varāḥ | majjantamiva pātāle balino hyujjihīrṣavaḥ
शीघ्रता के इस समय जल्दी करते हुए, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वे बलवान् वीर उन्हें ऐसे उठा लेना चाहते हैं मानो वे पाताल में डूब रहे हों।
श्लोक 3 (8.62.3)
न केतुर्दृश्यते राज्ञः कर्णस्य पिहितः शरैः । पश्यतोर्यमयोः पार्थ सात्यकेश्च शिखण्डिनः ॥
na keturdṛśyate rājñaḥ karṇasya pihitaḥ śaraiḥ | paśyatoryamayoḥ pārtha sātyakeśca śikhaṇḍinaḥ
हे पार्थ! राजा का ध्वज दिखाई नहीं देता; वह कर्ण के बाणों से ढक गया है, और माद्री के दोनों पुत्र, सात्यकि और शिखण्डी देखते ही रह जाते हैं,
श्लोक 4 (8.62.4)
धृष्टद्युम्नस्य भीमस्य शतानीकस्य वा विभो । पाञ्चालानां च सर्वेषां चेदीनां चैव भारत ॥
dhṛṣṭadyumnasya bhīmasya śatānīkasya vā vibho | pāñcālānāṃ ca sarveṣāṃ cedīnāṃ caiva bhārata
और धृष्टद्युम्न, भीम, शतानीक, तथा सब पाञ्चाल और चेदि भी देखते रहते हैं, हे विभो, हे भारत।
श्लोक 5 (8.62.5)
एष कर्णो रणे पार्थ पाण्डवानामनीकिनीम् । शरैर्विध्वंसयामास नलिनीमिव कुञ्जरः ॥
eṣa karṇo raṇe pārtha pāṇḍavānāmanīkinīm | śarairvidhvaṃsayāmāsa nalinīmiva kuñjaraḥ
हे पार्थ! वह कर्ण पाण्डवों की सेना को रणभूमि में बाणों से वैसे ही तहस-नहस कर रहा है जैसे हाथी कमलिनी के सरोवर को।
श्लोक 6 (8.62.6)
एते द्रवन्ति रथिनस्त्वदीयाः पाण्डुनन्दन । पश्य पश्य यथा पार्थ गच्छन्त्येते महारथाः ॥
ete dravanti rathinastvadīyāḥ pāṇḍunandana | paśya paśya yathā pārtha gacchantyete mahārathāḥ
हे पाण्डुनन्दन! तुम्हारे ये रथी भाग रहे हैं। देखो, देखो पार्थ, ये महारथी कैसे भागे जा रहे हैं!
श्लोक 7 (8.62.7)
एते भारत मातङ्गाः कर्णेनाभिहताः शरैः । आर्तनादान्विकुर्वाणा विद्रवन्ति दिशो दश ॥
ete bhārata mātaṅgāḥ karṇenābhihatāḥ śaraiḥ | ārtanādānvikurvāṇā vidravanti diśo daśa
हे भारत! और ये हाथी कर्ण के बाणों से घायल होकर आर्तनाद करते हुए दसों दिशाओं में भाग रहे हैं।
श्लोक 8 (8.62.8)
रथानां द्रवते वृन्दमेतच्चैव समन्ततः । द्राव्यमाणं रणे पार्थ कर्णेनामिततेजसा ॥
rathānāṃ dravate vṛndametaccaiva samantataḥ | drāvyamāṇaṃ raṇe pārtha karṇenāmitatejasā
हे पार्थ! अपार तेज वाले कर्ण से रणभूमि में खदेड़ा जाता हुआ रथों का समूह चारों ओर भाग रहा है।
श्लोक 9 (8.62.9)
हस्तिकक्ष्यां रणे पश्य चरन्तीं तत्रतत्र ह । रथस्थं सूतपुत्रस्य केतुं केतुमतां वर ॥
hastikakṣyāṃ raṇe paśya carantīṃ tatratatra ha | rathasthaṃ sūtaputrasya ketuṃ ketumatāṃ vara
हे ध्वजधारियों में श्रेष्ठ! देखो, रणभूमि में सूतपुत्र के रथ पर जो हाथी की रस्सी इधर-उधर घूम रही है, वही उसका ध्वज है।
श्लोक 10 (8.62.10)
असौ धावति राधेयो भीमसेनरथं प्रति । किरञ्शरशतान्येव विनिघ्नंस्तव वाहिनीम् ॥
asau dhāvati rādheyo bhīmasenarathaṃ prati | kirañśaraśatānyeva vinighnaṃstava vāhinīm
वह राधापुत्र सैकड़ों बाण बरसाता और तुम्हारी सेना को मारता हुआ भीमसेन के रथ की ओर दौड़ रहा है।
श्लोक 11 (8.62.11)
एते नश्यन्ति पाञ्चाला द्राव्यमाणा महात्मना । शक्रेणेव यथा दैत्या द्राव्यमाणा महात्मना ॥
ete naśyanti pāñcālā drāvyamāṇā mahātmanā | śakreṇeva yathā daityā drāvyamāṇā mahātmanā
वे पाञ्चाल उन महात्मा से खदेड़े जाकर भाग रहे हैं, जैसे इन्द्र से खदेड़े गए दैत्य भागे थे।
श्लोक 12 (8.62.12)
एष कर्णो रणे जित्वा पाञ्चालान्पाण्डुसृञ्जयान् । दिशो विप्रेक्षते सर्वास्त्वदर्थमिति मे मतिः ॥
eṣa karṇo raṇe jitvā pāñcālānpāṇḍusṛñjayān | diśo viprekṣate sarvāstvadarthamiti me matiḥ
पाञ्चालों, पाण्डवों और सृञ्जयों को रण में जीतकर यह कर्ण सब दिशाओं में देख रहा है; मेरा विचार है कि वह तुम्हें ही खोज रहा है।
श्लोक 13 (8.62.13)
एष कर्णो धनुःश्रेष्ठं विधून्वन्बहुशोभते । शत्रुं जित्वा यथा शक्रो देवसङ्खैः समावृतः ॥
eṣa karṇo dhanuḥśreṣṭhaṃ vidhūnvanbahuśobhate | śatruṃ jitvā yathā śakro devasaṅkhaiḥ samāvṛtaḥ
वह कर्ण अपने उत्तम धनुष को हिलाता हुआ बड़ी शोभा पा रहा है, जैसे शत्रु को जीतकर देवताओं के समूहों से घिरे इन्द्र शोभित होते हैं।
श्लोक 14 (8.62.14)
एते नर्दन्ति कौरव्या दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् । त्रासयन्तो रणे पाण्डून्सृंजयांश्च समन्ततः ॥
ete nardanti kauravyā dṛṣṭvā karṇasya vikramam | trāsayanto raṇe pāṇḍūnsṛṃjayāṃśca samantataḥ
कर्ण का पराक्रम देखकर वे कौरव गरज रहे हैं और रणभूमि में पाण्डवों और सृञ्जयों को चारों ओर से डरा रहे हैं।
श्लोक 15 (8.62.15)
एष सर्वात्मना पाण्डूंस्त्रासयित्वा महारणे । अभिभाषति राधेयः सर्वसैन्यानि मानद ॥
eṣa sarvātmanā pāṇḍūṃstrāsayitvā mahāraṇe | abhibhāṣati rādheyaḥ sarvasainyāni mānada
हे मान देने वाले! महायुद्ध में पाण्डवों को हर प्रकार से डराकर यह राधापुत्र अब सारी सेनाओं को सम्बोधित कर रहा है।
श्लोक 16 (8.62.16)
अभिद्रवत भद्रं वो द्रुतं द्रवत कौरवाः । यथा न जीववान्कश्चिन्मुच्येत युधि सृञ्जयः ॥
abhidravata bhadraṃ vo drutaṃ dravata kauravāḥ | yathā na jīvavānkaścinmucyeta yudhi sṛñjayaḥ
'टूट पड़ो! तुम्हारा कल्याण हो! हे कौरवो, शीघ्र दौड़ो, जिससे कोई भी सृञ्जय इस युद्ध में जीवित न बचे।
श्लोक 17 (8.62.17)
तथा कुरुत संयत्ता वयं यास्याम पृष्ठतः । एवमुक्त्वा गतो ह्येष पृष्ठतो विकिरञ्छरान् ॥
tathā kuruta saṃyattā vayaṃ yāsyāma pṛṣṭhataḥ | evamuktvā gato hyeṣa pṛṣṭhato vikirañcharān
सावधान होकर वैसा ही करो; हम तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे।' ऐसा कहकर वह पीछे से बाण बिखेरता हुआ चला गया है।
श्लोक 18 (8.62.18)
पश्य कर्णं रणे पार्थ श्वेतच्छत्रविराजितम् । उदयं पर्वतं यद्वच्छशाङ्केनाभिशोभितम् ॥
paśya karṇaṃ raṇe pārtha śvetacchatravirājitam | udayaṃ parvataṃ yadvacchaśāṅkenābhiśobhitam
हे पार्थ! रणभूमि में सफेद छत्र से शोभित कर्ण को देखो, जैसे चन्द्रमा से सुशोभित उदयगिरि।
श्लोक 19 (8.62.19)
पूर्णचन्द्रनिकाशेन मूर्ध्नि च्छत्रेण भारत । ध्रियमाणेन समरे श्रीमच्छतशलाकिना ॥
pūrṇacandranikāśena mūrdhni cchatreṇa bhārata | dhriyamāṇena samare śrīmacchataśalākinā
हे भारत! युद्ध में उसके सिर पर पूर्ण चन्द्रमा जैसा, सौ तीलियों वाला सुन्दर छत्र तना हुआ है।
श्लोक 20 (8.62.20)
एष त्वां प्रेक्षते कर्णः सकटाक्षं धनञ्जय । उत्तमं यत्नमास्थाय ध्रुवमेष्यति संयुगे ॥
eṣa tvāṃ prekṣate karṇaḥ sakaṭākṣaṃ dhanañjaya | uttamaṃ yatnamāsthāya dhruvameṣyati saṃyuge
हे धनञ्जय! कर्ण तुम्हें तिरछी नजर से देख रहा है; पूरा प्रयत्न करके वह युद्ध में निश्चय ही तुम्हारी ओर आएगा।
श्लोक 21 (8.62.21)
पश्य ह्येनं महाबाहो विधुन्वानं महद्धनुः । शरांश्चाशीविषाकारान्विसृजन्तं महारणे ॥
paśya hyenaṃ mahābāho vidhunvānaṃ mahaddhanuḥ | śarāṃścāśīviṣākārānvisṛjantaṃ mahāraṇe
हे महाबाहो! उसे देखो, वह अपना विशाल धनुष हिलाता हुआ महायुद्ध में विषैले साँपों जैसे बाण छोड़ रहा है।
श्लोक 22 (8.62.22)
असौ निवृत्तो राधेयो दृष्ट्वा ते वानरध्वजम् । प्रार्थयन्समरं पार्थ त्वया सह परन्तप । वधाय ह्यात्मनोऽभ्येति पावकं शलभो यथा ॥
asau nivṛtto rādheyo dṛṣṭvā te vānaradhvajam | prārthayansamaraṃ pārtha tvayā saha parantapa | vadhāya hyātmano'bhyeti pāvakaṃ śalabho yathā
वह राधापुत्र तुम्हारा कपिध्वज देखकर लौट आया है; हे परन्तप पार्थ! तुम्हारे साथ युद्ध की इच्छा से वह पतङ्गे की तरह आग की ओर अपने ही वध के लिए आ रहा है।
श्लोक 23 (8.62.23)
कर्णमेकाकिनं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रो रणाजिरे । त्वां च पार्थाभिसंरब्धं कर्णं प्रति महारथम् ॥
karṇamekākinaṃ dṛṣṭvā dhārtarāṣṭro raṇājire | tvāṃ ca pārthābhisaṃrabdhaṃ karṇaṃ prati mahāratham
रणभूमि में कर्ण को अकेला देखकर, और तुम्हें, हे पार्थ, महारथी कर्ण पर क्रोध से भरा देखकर,
श्लोक 24 (8.62.24)
कृतागसं च राधेयं धर्मात्मनि युधिष्ठिरे । आत्मानं च कृतार्थं च समीक्ष्य भरतर्षभ ॥
kṛtāgasaṃ ca rādheyaṃ dharmātmani yudhiṣṭhire | ātmānaṃ ca kṛtārthaṃ ca samīkṣya bharatarṣabha
और राधापुत्र को धर्मात्मा युधिष्ठिर के प्रति अपराध करने वाला तथा अपने को कृतकार्य समझते हुए, हे भरतश्रेष्ठ,
श्लोक 25 (8.62.25)
असौ दुर्योधनः क्रुद्धो रथानीकेन भारत । रिरक्षिषुः सुसंवृत्तो धार्तराष्ट्रो निवर्तते ॥
asau duryodhanaḥ kruddho rathānīkena bhārata | rirakṣiṣuḥ susaṃvṛtto dhārtarāṣṭro nivartate
हे भारत! वह क्रुद्ध दुर्योधन उसकी रक्षा करना चाहता हुआ, भली-भाँति सजी रथसेना के साथ लौट रहा है।
श्लोक 26 (8.62.26)
सर्वैः सहैभिर्दुष्टात्मा बध्यतां च प्रयत्नतः । त्वया यशश्च राज्यं च सुखं चोत्तममिच्छता ॥
sarvaiḥ sahaibhirduṣṭātmā badhyatāṃ ca prayatnataḥ | tvayā yaśaśca rājyaṃ ca sukhaṃ cottamamicchatā
यश, राज्य और परम सुख चाहने वाले तुम इस दुष्टात्मा को इन सबके साथ पूरे प्रयत्न से मार डालो।
श्लोक 27 (8.62.27)
अदीनयोर्विश्रुतयोर्युवयोर्योत्स्यमानयोः । देवासुरे पार्थ मृधे देवदानवयोरिव । पश्यन्तु कौरवाः सर्वे तव पार्थ पराक्रमम् ॥
adīnayorviśrutayoryuvayoryotsyamānayoḥ | devāsure pārtha mṛdhe devadānavayoriva | paśyantu kauravāḥ sarve tava pārtha parākramam
देवासुर संग्राम में देवता और दानव की तरह जब तुम दोनों, दीन न होने वाले और प्रसिद्ध वीर, लड़ोगे, तब सब कौरव, हे पार्थ, तुम्हारा पराक्रम देखें।
श्लोक 28 (8.62.28)
त्वां च दृष्ट्वातिसंरब्धं कर्णं च भरतर्षभ । असौ दुर्योधनः क्रुद्धो नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥
tvāṃ ca dṛṣṭvātisaṃrabdhaṃ karṇaṃ ca bharatarṣabha | asau duryodhanaḥ kruddho nottaraṃ pratipadyate
हे भरतश्रेष्ठ! तुम्हें और कर्ण को अत्यन्त क्रोध में देखकर वह क्रुद्ध दुर्योधन कोई उत्तर नहीं दे पाता।
श्लोक 29 (8.62.29)
आत्मानं च कृतात्मानं समीक्ष्य भरतर्षभ । कृतागसं च राधेयं धर्मात्मनि युधिष्ठिरे ॥
ātmānaṃ ca kṛtātmānaṃ samīkṣya bharatarṣabha | kṛtāgasaṃ ca rādheyaṃ dharmātmani yudhiṣṭhire
हे भरतश्रेष्ठ! अपने को कृतकार्य मानकर देखो, और धर्मात्मा युधिष्ठिर के प्रति अपराध करने वाले राधापुत्र को देखो।
श्लोक 30 (8.62.30)
प्रतिपद्यस्व कौन्तेय प्राप्तकालमनन्तरम् । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा प्रत्येहि रथयूथपम् ॥
pratipadyasva kaunteya prāptakālamanantaram | āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā pratyehi rathayūthapam
हे कुन्तीपुत्र! अब समय के अनुसार जो करना है उसे अपनाओ; युद्ध में श्रेष्ठ मार्ग पर मन लगाकर रथ-समूह के नायक का सामना करो।
श्लोक 31 (8.62.31)
पञ्च ह्येतानि मुख्यानि रथानां रथसत्तम । शतान्यायान्ति वेगेन बलिनां भीमतेजसाम् ॥
pañca hyetāni mukhyāni rathānāṃ rathasattama | śatānyāyānti vegena balināṃ bhīmatejasām
हे रथियों में श्रेष्ठ! देखो, रथों के ये पाँच मुख्य दल हैं, और भयंकर तेज वाले बलवान् योद्धाओं के सैकड़ों वेग से चले आ रहे हैं।
श्लोक 32 (8.62.32)
पञ्च नागसहस्राणि द्विगुणा वाजिनस्तथा । अभिसंहत्य कौन्तेय पदाताः प्रयुतानि च ॥
pañca nāgasahasrāṇi dviguṇā vājinastathā | abhisaṃhatya kaunteya padātāḥ prayutāni ca
पाँच हजार हाथी, उनसे दुगुने घोड़े, और उनके साथ मिले हुए, हे कुन्तीपुत्र, लाखों पैदल सैनिक।
श्लोक 33 (8.62.33)
अन्योन्यरक्षितं वीर बलं त्वामभिवर्तते । द्रोणपुत्रं पुरस्कृत्य तच्छीघ्रं सन्निषूदय ॥
anyonyarakṣitaṃ vīra balaṃ tvāmabhivartate | droṇaputraṃ puraskṛtya tacchīghraṃ sanniṣūdaya
हे वीर! एक-दूसरे की रक्षा करती हुई यह सेना तुम्हारी ओर बढ़ रही है। द्रोणपुत्र को आगे करके उसे शीघ्र नष्ट कर दो।
श्लोक 34 (8.62.34)
निकृत्त्यैतद्रथानीकं बलिनं लोकविश्रुतम् । सूतपुत्रे महेष्वासे दर्शयात्मानमात्मना ॥
nikṛttyaitadrathānīkaṃ balinaṃ lokaviśrutam | sūtaputre maheṣvāse darśayātmānamātmanā
लोक में विख्यात इस बलवान् रथसेना को काटकर महाधनुर्धर सूतपुत्र को स्वयं अपना पराक्रम दिखाओ।
श्लोक 35 (8.62.35)
उत्तमं यत्नमास्थाय प्रत्येहि भरतर्षभ । असौ कर्णः सुसंरब्धः पाञ्चालानभिघावति ॥
uttamaṃ yatnamāsthāya pratyehi bharatarṣabha | asau karṇaḥ susaṃrabdhaḥ pāñcālānabhighāvati
हे भरतश्रेष्ठ! पूरा प्रयत्न करके उसका सामना करो। वह कर्ण अत्यन्त क्रोध से भरकर पाञ्चालों पर टूट रहा है।
श्लोक 36 (8.62.36)
केतुमस्य हि पश्यामि धृष्टद्युम्नरथं प्रति । समुच्छेत्स्यति पाञ्चालानिति मन्ये परन्तप ॥
ketumasya hi paśyāmi dhṛṣṭadyumnarathaṃ prati | samucchetsyati pāñcālāniti manye parantapa
हे परन्तप! मैं उसकी ध्वजा को धृष्टद्युम्न के रथ की ओर जाते देख रहा हूँ; मुझे लगता है वह पाञ्चालों का संहार कर डालेगा।
श्लोक 37 (8.62.37)
आचचक्षे प्रियं पार्थ तवेदं भरतर्षभ । राजासौ कुशली श्रीमान्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
ācacakṣe priyaṃ pārtha tavedaṃ bharatarṣabha | rājāsau kuśalī śrīmāndharmaputro yudhiṣṭhiraḥ
हे पार्थ, हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें एक प्रिय बात बताता हूँ: धर्म के पुत्र श्रीमान् राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं।
श्लोक 38 (8.62.38)
असौ भीमो महाबाहुः सन्निवृत्तश्चमूयुखे । वृतः सृञ्जयसैन्येन शैनेयेन च भारत ॥
asau bhīmo mahābāhuḥ sannivṛttaścamūyukhe | vṛtaḥ sṛñjayasainyena śaineyena ca bhārata
और वह महाबाहु भीम सेना के मुहाने पर लौट आया है, सृञ्जयों की सेना और शैनेय से घिरा हुआ, हे भारत।
श्लोक 39 (8.62.39)
वध्यन्त एते समरे कौरवा निशितैः शरैः । भीमसेनेन कौन्तेय पाञ्चालैश्च महात्मभिः ॥
vadhyanta ete samare kauravā niśitaiḥ śaraiḥ | bhīmasenena kaunteya pāñcālaiśca mahātmabhiḥ
हे कुन्तीपुत्र! भीमसेन और महात्मा पाञ्चालों के तीखे बाणों से रणभूमि में वे कौरव मारे जा रहे हैं।
श्लोक 40 (8.62.40)
सेना हि धार्तराष्ट्रस्य विमुखा व्यद्रवद्रणात् । वेगेन भीमसेनस्य विहता विविधैः शरैः ॥
senā hi dhārtarāṣṭrasya vimukhā vyadravadraṇāt | vegena bhīmasenasya vihatā vividhaiḥ śaraiḥ
भीमसेन के वेग और उनके नाना प्रकार के बाणों से मारी जाकर धृतराष्ट्र की सेना युद्ध से मुँह मोड़कर भाग खड़ी हुई है।
श्लोक 41 (8.62.41)
विपन्नसस्येव मही रुधिरेण समुक्षिता । भारती भरतश्रेष्ठ सेना कृपणदर्शना ॥
vipannasasyeva mahī rudhireṇa samukṣitā | bhāratī bharataśreṣṭha senā kṛpaṇadarśanā
हे भरतश्रेष्ठ! रक्त से भीगी हुई भरतों की सेना उस भूमि की तरह देखने में दयनीय है जिसकी फसल नष्ट हो गई हो।
श्लोक 42 (8.62.42)
निवृत्तं पश्य कौन्तेय भीमसेनं युधाम्पतिम् । आशीविषमिव क्रुद्धं तस्माद्द्रवति भारती ॥
nivṛttaṃ paśya kaunteya bhīmasenaṃ yudhāmpatim | āśīviṣamiva kruddhaṃ tasmāddravati bhāratī
हे कुन्तीपुत्र! देखो, योद्धाओं के स्वामी भीमसेन क्रुद्ध विषधर की तरह लौट आए हैं; इसीलिए भरतों की सेना भाग रही है।
श्लोक 43 (8.62.43)
पीतरक्तासितसितास्ताराचन्द्रार्कमण्डिताः । पताका विप्रकीर्यन्ते छत्राण्येतानि चार्जुन ॥
pītaraktāsitasitāstārācandrārkamaṇḍitāḥ | patākā viprakīryante chatrāṇyetāni cārjuna
हे अर्जुन! पीली, लाल, काली और सफेद पताकाएँ, जिन पर तारे, चन्द्रमा और सूर्य बने हैं, और ये छत्र भी बिखरे पड़े हैं।
श्लोक 44 (8.62.44)
सौवर्णा राजताश्चैव तैजसाश्च पृथग्विधाः । केतवोऽभिनिपात्यन्ते हस्त्यश्वं च प्रकीर्यते ॥
sauvarṇā rājatāścaiva taijasāśca pṛthagvidhāḥ | ketavo'bhinipātyante hastyaśvaṃ ca prakīryate
सोने, चाँदी और चमकती धातु के अनेक प्रकार के ध्वज गिराए जा रहे हैं, और हाथी-घोड़े बिखर रहे हैं।
श्लोक 45 (8.62.45)
रथेभ्यः प्रपतन्त्येते रथिनो विगतासवः । नानावर्णैर्हता बाणैः पाञ्चालैरपलायिभिः ॥
rathebhyaḥ prapatantyete rathino vigatāsavaḥ | nānāvarṇairhatā bāṇaiḥ pāñcālairapalāyibhiḥ
भागने वाले न होकर लड़ते रहे पाञ्चालों के नाना प्रकार के बाणों से मारे गए ये रथी प्राणहीन होकर रथों से गिर रहे हैं।
श्लोक 46 (8.62.46)
निर्मनुष्यान्गजानश्वान्रथांश्चैव धनञ्जय । समाद्रवन्ति पाञ्चाला धार्तराष्ट्रांस्तरस्विनः ॥
nirmanuṣyāngajānaśvānrathāṃścaiva dhanañjaya | samādravanti pāñcālā dhārtarāṣṭrāṃstarasvinaḥ
हे धनञ्जय! मनुष्यों से खाली हो गए हाथियों, घोड़ों और रथों के बीच से पाञ्चाल बलशाली धृतराष्ट्रपुत्रों पर टूट रहे हैं।
श्लोक 47 (8.62.47)
विमृद्नन्ति नरव्याघ्रा भीमसेनबलाश्रयात् । बलं परेषां दुर्धर्षं त्यक्त्वा प्राणानरिन्दम् ॥
vimṛdnanti naravyāghrā bhīmasenabalāśrayāt | balaṃ pareṣāṃ durdharṣaṃ tyaktvā prāṇānarindam
हे शत्रुदमन! प्राणों की परवाह छोड़कर और भीमसेन के बल का आश्रय लेकर वे नरव्याघ्र शत्रुओं की दुर्जेय सेना को कुचल रहे हैं।
श्लोक 48 (8.62.48)
एते नर्दन्ति पाञ्चाला ध्मापयन्ति च वारिजान् । अभिद्रवन्ति च रणे मृद्नन्तः सायकैः परान् ॥
ete nardanti pāñcālā dhmāpayanti ca vārijān | abhidravanti ca raṇe mṛdnantaḥ sāyakaiḥ parān
वे पाञ्चाल गरज रहे हैं, शङ्ख बजा रहे हैं और रणभूमि में बाणों से शत्रुओं को कुचलते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
श्लोक 49 (8.62.49)
पश्य स्वर्गस्य माहात्म्यं पाञ्चाला हि पराक्रमात् । धार्तराष्ट्रान्विनिघ्नन्तो विशन्त्येते रथोत्तमान् ॥
paśya svargasya māhātmyaṃ pāñcālā hi parākramāt | dhārtarāṣṭrānvinighnanto viśantyete rathottamān
देखो स्वर्ग की महिमा: पाञ्चाल अपने पराक्रम से धृतराष्ट्रपुत्रों को मारते हुए उनके श्रेष्ठ रथियों में घुस रहे हैं।
श्लोक 50 (8.62.50)
शस्त्रमाच्छिद्य शत्रूणां सायुधानां निरायुधाः । तेनैवैतानमोघास्त्रा निघ्नन्ति च नदन्ति च ॥
śastramācchidya śatrūṇāṃ sāyudhānāṃ nirāyudhāḥ | tenaivaitānamoghāstrā nighnanti ca nadanti ca
निहत्थे होकर भी वे शस्त्रधारी शत्रुओं के हथियार छीन लेते हैं और उन्हीं अचूक हथियारों से उन्हें मारते और गरजते हैं।
श्लोक 51 (8.62.51)
शिरांस्येतानि पात्यन्ते शत्रूणां बाहवोऽपि च । रथनागहया वीरा यशस्याः सर्व एव च ॥
śirāṃsyetāni pātyante śatrūṇāṃ bāhavo'pi ca | rathanāgahayā vīrā yaśasyāḥ sarva eva ca
शत्रुओं के ये सिर काटे जा रहे हैं, उनकी भुजाएँ भी, और रथ, हाथी तथा घोड़ों के वे सब यशस्वी वीर कटकर गिर रहे हैं।
श्लोक 52 (8.62.52)
सर्वतश्चाभिपन्नैषा धार्तराष्ट्री महाचमूः । त्यक्त्वा प्राणान्महेष्वासैः पाञ्चालैः परिपात्यते ॥
sarvataścābhipannaiṣā dhārtarāṣṭrī mahācamūḥ | tyaktvā prāṇānmaheṣvāsaiḥ pāñcālaiḥ paripātyate
धृतराष्ट्र के पुत्रों की यह सारी विशाल सेना चारों ओर से घिर गई है; प्राणों की परवाह छोड़ चुके पाञ्चाल महाधनुर्धर इसे गिरा रहे हैं।
श्लोक 53 (8.62.53)
सुहृदश्च पराक्रान्ताः कृपकर्णादयो विभो । निवारणे महेष्वासाः पाञ्चालानां परन्तप ॥
suhṛdaśca parākrāntāḥ kṛpakarṇādayo vibho | nivāraṇe maheṣvāsāḥ pāñcālānāṃ parantapa
हे विभो! और उनके पराक्रमी मित्र कृप, कर्ण आदि महाधनुर्धर पाञ्चालों को रोकने में लगे हैं, हे परन्तप।
श्लोक 54 (8.62.54)
अनिवृत्तांश्च भीतांस्तान्धार्तराष्ट्रान्परन्तप । धृष्टद्युम्नमुखा वीरा घ्नन्ति शत्रून्सहस्रशः ॥
anivṛttāṃśca bhītāṃstāndhārtarāṣṭrānparantapa | dhṛṣṭadyumnamukhā vīrā ghnanti śatrūnsahasraśaḥ
हे परन्तप! धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में वीर उन भयभीत और न लौटने वाले धृतराष्ट्रपुत्रों को हजारों की संख्या में मार रहे हैं।
श्लोक 55 (8.62.55)
रथाश्च विविधाः सर्वे निवृत्ते भरतर्षभे । विवर्णमुखभूयिष्ठा धार्तराष्ट्री महाचमूः ॥
rathāśca vividhāḥ sarve nivṛtte bharatarṣabhe | vivarṇamukhabhūyiṣṭhā dhārtarāṣṭrī mahācamūḥ
भरतश्रेष्ठ भीम के लौट आने पर नाना प्रकार के सब रथ और धृतराष्ट्र की विशाल सेना अधिकतर पीले पड़े मुखों वाली हो गई है।
श्लोक 56 (8.62.56)
पश्य भीमेन नाराचैर्भिन्ना नागाः पतन्त्यमी । वज्रिवज्रहतानीव शिखराणि धराभृताम् ॥
paśya bhīmena nārācairbhinnā nāgāḥ patantyamī | vajrivajrahatānīva śikharāṇi dharābhṛtām
देखो, भीम के नाराचों से कटे ये हाथी वैसे ही गिर रहे हैं जैसे वज्रधारी इन्द्र के वज्र से मारे गए पर्वतों के शिखर।
श्लोक 57 (8.62.57)
भीमसेनस्य निर्विद्धा बाणैः सन्नतपर्वभिः । स्वान्यनीकानि मृद्नन्तो द्रवन्त्येते महागजाः ॥
bhīmasenasya nirviddhā bāṇaiḥ sannataparvabhiḥ | svānyanīkāni mṛdnanto dravantyete mahāgajāḥ
भीमसेन के सीधी गाँठों वाले बाणों से बिंधे ये बड़े हाथी अपनी ही पंक्तियों को कुचलते हुए भाग रहे हैं।
श्लोक 58 (8.62.58)
एते द्रवन्ति कुरवो भीमसेनभयार्दिताः । त्यक्त्वा रथान्गजांश्चैव हयांश्चैव सहस्रशः ॥
ete dravanti kuravo bhīmasenabhayārditāḥ | tyaktvā rathāngajāṃścaiva hayāṃścaiva sahasraśaḥ
वे कौरव भीमसेन के भय से पीड़ित होकर हजारों रथों, हाथियों और घोड़ों को छोड़कर भाग रहे हैं।
श्लोक 59 (8.62.59)
हस्त्यश्वरथपत्तीनां द्रवतां निःस्वनं शृणु । भीमसेनस्य निनदं द्रावयानस्य कौरवान् ॥
hastyaśvarathapattīnāṃ dravatāṃ niḥsvanaṃ śṛṇu | bhīmasenasya ninadaṃ drāvayānasya kauravān
भागते हुए हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों का कोलाहल सुनो, और कौरवों को खदेड़ते भीमसेन की गर्जना भी।
श्लोक 60 (8.62.60)
अभिजानामि भीमस्य सिंहनादं पुनःपुनः । नदतः पाण्डवेयस्य सङ्ग्रामे जितकाशिनः ॥
abhijānāmi bhīmasya siṃhanādaṃ punaḥpunaḥ | nadataḥ pāṇḍaveyasya saṅgrāme jitakāśinaḥ
मैं बार-बार पहचानता हूँ भीम का वह सिंहनाद, जब वह पाण्डुपुत्र विजय के उल्लास में युद्ध में गरजता है।
श्लोक 61 (8.62.61)
एष नैषादिरभ्येति द्विपमुख्येन पाण्डवम् । विसृजंस्तोमरान्क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥
eṣa naiṣādirabhyeti dvipamukhyena pāṇḍavam | visṛjaṃstomarānkruddho daṇḍapāṇirivāntakaḥ
यह देखो, निषाद का पुत्र प्रधान हाथी पर चढ़कर पाण्डव की ओर आ रहा है; दण्ड हाथ में लिए यमराज की तरह क्रोध से तोमर फेंकता हुआ।
श्लोक 62 (8.62.62)
तस्य चैव भुजौ छिन्नौ भीमसेनेन गर्जतः । नागश्च क्रकरप्रख्यैर्नाराचैर्दशभिर्हतः ॥
tasya caiva bhujau chinnau bhīmasenena garjataḥ | nāgaśca krakaraprakhyairnārācairdaśabhirhataḥ
गरजते हुए उसकी दोनों भुजाएँ भीमसेन ने काट डालीं, और उसका हाथी आरी जैसे तीखे दस नाराचों से मारा गया।
श्लोक 63 (8.62.63)
हन्तैते पुनरायान्ति नागा ह्यन्ये प्रहारिणः । नीलाञ्जनचयप्रख्या महामात्रैरधिष्ठिताः ॥
hantaite punarāyānti nāgā hyanye prahāriṇaḥ | nīlāñjanacayaprakhyā mahāmātrairadhiṣṭhitāḥ
देखो, फिर दूसरे प्रहार करने वाले हाथी आ रहे हैं, काजल के ढेर जैसे काले, जिन पर महावत बैठे हैं।
श्लोक 64 (8.62.64)
शक्तितोमरसङ्घातैर्विनिघ्नन्तो वृकोदरम् । सप्तसप्त च नागस्था वैजयन्त्यश्च सध्वजाः । नवत्या निशितैर्बाणैश्छिन्नाः पार्थाग्रजेन ते ॥
śaktitomarasaṅghātairvinighnanto vṛkodaram | saptasapta ca nāgasthā vaijayantyaśca sadhvajāḥ | navatyā niśitairbāṇaiśchinnāḥ pārthāgrajena te
भाले और तोमरों के ढेर से वृकोदर पर प्रहार करते हुए सात-सात हाथी-सवार, अपने ध्वजों और पताकाओं सहित, पार्थ के बड़े भाई भीम के नब्बे तीखे बाणों से कट गए।
श्लोक 65 (8.62.65)
दशभिर्दशभिश्चैको नाराचैर्निहतो गजः ॥
daśabhirdaśabhiścaiko nārācairnihato gajaḥ
दस-दस नाराचों से एक-एक हाथी मारा गया।
श्लोक 66 (8.62.66)
न चासौ धार्तराष्ट्राणां श्रूयते निनदस्तथा । पुरन्दरसमे क्रुद्धे निवृत्ते भरतर्षभे ॥
na cāsau dhārtarāṣṭrāṇāṃ śrūyate ninadastathā | purandarasame kruddhe nivṛtte bharatarṣabhe
हे भरतश्रेष्ठ! इन्द्र के समान भीम के क्रोध में लौट आने पर धृतराष्ट्र के पुत्रों की वह गर्जना अब सुनाई नहीं देती।
श्लोक 67 (8.62.67)
अक्षौहिण्यस्तथा तिस्रो धार्तराष्ट्रस्य सङ्गताः । क्रुद्धेन भीमसेनेन नरसिंहेन वारिताः ॥
akṣauhiṇyastathā tisro dhārtarāṣṭrasya saṅgatāḥ | kruddhena bhīmasenena narasiṃhena vāritāḥ
धृतराष्ट्र के पुत्र की इकट्ठी हुई तीन अक्षौहिणी सेनाओं को नरसिंह भीमसेन ने क्रोध में आकर रोक दिया।
श्लोक 68 (8.62.68)
न शक्नुवन्ति वै पार्थं पार्थिवाः समुदीक्षितुम् । मध्यन्दिनगतं सूर्यं यथा दुर्बलचक्षुषः ॥
na śaknuvanti vai pārthaṃ pārthivāḥ samudīkṣitum | madhyandinagataṃ sūryaṃ yathā durbalacakṣuṣaḥ
जैसे दुर्बल आँखों वाले मनुष्य दोपहर के सूर्य को नहीं देख सकते, वैसे ही राजा पार्थ की ओर आँख उठाकर नहीं देख पाते।
श्लोक 69 (8.62.69)
एते भीमस्य सन्त्रस्ताः सिंहस्येवेतरे मृगाः । शरैः सन्त्रासिताः सङ्ख्ये न लभन्ते सुखं क्वचित् ॥
ete bhīmasya santrastāḥ siṃhasyevetare mṛgāḥ | śaraiḥ santrāsitāḥ saṅkhye na labhante sukhaṃ kvacit
सिंह के सामने दूसरे पशुओं की तरह भीम से डरे हुए ये लोग उसके बाणों से त्रस्त होकर युद्ध में कहीं भी सुख नहीं पाते।
श्लोक 70 (8.62.70)
राधेयो बहुभिः सार्धमसौ गच्छति वेगितः । वर्धयित्वा तु भीरुं तं पार्श्वतो ह्यानयद्धनुः । तं पालयन्महाराजं धार्तराष्ट्रं बलान्वितः ॥
rādheyo bahubhiḥ sārdhamasau gacchati vegitaḥ | vardhayitvā tu bhīruṃ taṃ pārśvato hyānayaddhanuḥ | taṃ pālayanmahārājaṃ dhārtarāṣṭraṃ balānvitaḥ
राधापुत्र बहुतों के साथ वेग से जा रहा है; उस डरपोक को ढाढ़स बँधाकर उसने अपना धनुष उसके बगल में खींच लिया है और बल से भरकर धृतराष्ट्र के पुत्र उस महाराज की रक्षा कर रहा है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 71 (8.62.71)
एतच्छ्रुत्वा महाबाहुर्वासुदेवाद्धनञ्जयः । भीमसेनेन तत्कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् । अर्जुनो व्यधमच्छिष्टान्संशप्तकगणान्बहून् ॥
etacchrutvā mahābāhurvāsudevāddhanañjayaḥ | bhīmasenena tatkarma kṛtaṃ dṛṣṭvā suduṣkaram | arjuno vyadhamacchiṣṭānsaṃśaptakagaṇānbahūn
वासुदेव से यह सुनकर और भीमसेन का वह अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर महाबाहु अर्जुन ने बचे हुए बहुत-से संशप्तकों का संहार कर डाला।
श्लोक 72 (8.62.72)
ते वध्यमानाः पार्थेन संशप्तकगणाः प्रभो । शक्रस्यातिथितां गत्वा विशोका ह्यभवंस्तदा ॥
te vadhyamānāḥ pārthena saṃśaptakagaṇāḥ prabho | śakrasyātithitāṃ gatvā viśokā hyabhavaṃstadā
हे प्रभो! पार्थ के हाथों मारे जाते हुए वे संशप्तकों के समूह इन्द्र के अतिथि बनकर शोकमुक्त हो गए।
श्लोक 73 (8.62.73)
नारायणांस्तु गोपालान्व्यधमत्पाण्डुनन्दनः । उत्तमं वेगमास्थाय चण्डवायुर्घनानिव ॥
nārāyaṇāṃstu gopālānvyadhamatpāṇḍunandanaḥ | uttamaṃ vegamāsthāya caṇḍavāyurghanāniva
पाण्डुनन्दन ने उत्तम वेग धारण करके नारायण गोपालों का संहार कर डाला, जैसे प्रचण्ड वायु बादलों को बिखेर देती है।
श्लोक 74 (8.62.74)
अन्वकीर्यन्त भीतास्ते तत्रतत्रैव भारत । लुलितांश्च ततः शूरानहनत्पुरुषोत्तमः ॥
anvakīryanta bhītāste tatratatraiva bhārata | lulitāṃśca tataḥ śūrānahanatpuruṣottamaḥ
हे भारत! भयभीत होकर वे जहाँ-जहाँ थे वहीं बिखर गए; और उन अस्त-व्यस्त शूरों को उस पुरुषोत्तम ने मार डाला।
श्लोक 75 (8.62.75)
पुनश्च पुरुषव्याघ्रः शरैः सन्नतपर्वभिः । जघान धार्तराष्ट्रस्य चतुर्विधबलां चमूम् ॥
punaśca puruṣavyāghraḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | jaghāna dhārtarāṣṭrasya caturvidhabalāṃ camūm
और उस पुरुषव्याघ्र ने फिर सीधी गाँठों वाले बाणों से धृतराष्ट्र के पुत्र की चतुरङ्गिणी सेना का संहार कर दिया।