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कर्ण पर्व · अध्याय 65

कर्ण द्वारा युधिष्ठिर की पराजय

अर्जुन अपने रथ पर खड़े होकर कौरव-सेना को विक्षुब्ध कर देते हैं, और उन्हें असावधान देखकर दुर्योधन अपनी आधी सेना के साथ युधिष्ठिर पर टूट पड़ता है। नकुल, सहदेव, धृष्टद्युम्न और भीम अपने राजा की ओर दौड़ते हैं, पर कर्ण बाणों की वर्षा से उन सबको रोक देता है; सहदेव के दुर्योधन को घायल करने पर कर्ण पाण्डव-सेना को भगा देता है। कर्ण की चोट से छाती में बिंधे युधिष्ठिर रथ में बैठ जाते हैं और सारथि को रथ हटाने को कहते हैं; कौरव उन्हें पकड़ने को चिल्लाते हैं, केकय और पाञ्चाल उन्हें रोकते हैं, और दुर्योधन तथा भीम आमने-सामने आ जाते हैं।

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.65.1)

ततः श्वेताश्वसंयुक्ते नारायणसमाहिते । तिष्ठन्रथवरे श्रीमानर्जुनः समपद्यत ॥

tataḥ śvetāśvasaṃyukte nārāyaṇasamāhite | tiṣṭhanrathavare śrīmānarjunaḥ samapadyata

तब श्वेत घोड़ों से जुते, नारायण कृष्ण द्वारा सधे हुए श्रेष्ठ रथ पर खड़े होकर श्रीमान् अर्जुन सामने आए।

श्लोक 2 (8.65.2)

तद्बलं नृपतिश्रेष्ठ तावकं विजयो रणे । व्यक्षोभयदुदीर्णाश्वं महोदधिमिवानिलः ॥

tadbalaṃ nṛpatiśreṣṭha tāvakaṃ vijayo raṇe | vyakṣobhayadudīrṇāśvaṃ mahodadhimivānilaḥ

हे नृपश्रेष्ठ, विजय अर्जुन ने रण में आपकी उस सेना को, जिसके घोड़े उत्तेजित हो उठे थे, वैसे ही विक्षुब्ध कर दिया जैसे वायु महासागर को।

श्लोक 3 (8.65.3)

दुर्योधनस्तव सुतः प्रमत्ते श्वेतवाहने । अभ्येत्य सहसा क्रुद्धः सैन्यार्धेनाभिसंवृतः ॥

duryodhanastava sutaḥ pramatte śvetavāhane | abhyetya sahasā kruddhaḥ sainyārdhenābhisaṃvṛtaḥ

जब श्वेतवाहन अर्जुन असावधान था, तब आपका पुत्र दुर्योधन अपनी आधी सेना से घिरा हुआ सहसा क्रोधित होकर वहाँ आ पहुँचा,

श्लोक 4 (8.65.4)

पर्यवारयदायान्तं युधिष्ठिरममर्षणम् । क्षुरप्राणां त्रिसप्तत्या ततोऽविध्यत पाण्डवम् ॥

paryavārayadāyāntaṃ yudhiṣṭhiramamarṣaṇam | kṣuraprāṇāṃ trisaptatyā tato'vidhyata pāṇḍavam

और आते हुए असहनशील युधिष्ठिर को घेर लिया; फिर उसने पाण्डव को तिहत्तर क्षुरप्र बाणों से बींध दिया।

श्लोक 5 (8.65.5)

अक्रुध्यत भृशं तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । स भल्लांस्त्रिंशतस्तूर्णं तव पुत्रे न्यवेशयत् ॥

akrudhyata bhṛśaṃ tatra kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | sa bhallāṃstriṃśatastūrṇaṃ tava putre nyaveśayat

तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने शीघ्र ही तीस भल्ल आपके पुत्र में गड़ा दिए।

श्लोक 6 (8.65.6)

ततोऽधावन्त कौरव्या जिघृक्षन्तो युधिष्ठिरम् ॥

tato'dhāvanta kauravyā jighṛkṣanto yudhiṣṭhiram

तब कौरव युधिष्ठिर को पकड़ने की इच्छा से दौड़ पड़े।

श्लोक 7 (8.65.7)

दुष्टभावान्पराञ्ज्ञात्वा समवेता महारथाः । आजग्मुस्तं परीप्सन्तः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

duṣṭabhāvānparāñjñātvā samavetā mahārathāḥ | ājagmustaṃ parīpsantaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

शत्रुओं का दुष्ट अभिप्राय जानकर महारथी इकट्ठे होकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की रक्षा की इच्छा से वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 8 (8.65.8)

युधिष्ठिरश्चित्रसेनं शरवर्षैरवाकिरत् । चित्रसेनस्तु कौन्तेयं सङ्क्रुद्धः समवारयत् ॥

yudhiṣṭhiraścitrasenaṃ śaravarṣairavākirat | citrasenastu kaunteyaṃ saṅkruddhaḥ samavārayat

युधिष्ठिर ने चित्रसेन पर बाणों की वर्षा की; क्रुद्ध चित्रसेन ने कुन्तीपुत्र को रोक लिया।

श्लोक 9 (8.65.9)

मुहूर्ताद्विमुखीकृत्य चित्रसेनं स धर्मराट् । तावकं सैन्यमभ्यघ्नत्समन्तान्निशितैः शरैः ॥

muhūrtādvimukhīkṛtya citrasenaṃ sa dharmarāṭ | tāvakaṃ sainyamabhyaghnatsamantānniśitaiḥ śaraiḥ

क्षण भर में चित्रसेन को विमुख करके धर्मराज ने चारों ओर से तीखे बाणों द्वारा आपकी सेना को मारा।

श्लोक 10 (8.65.10)

तावका हि महाबाहो दुर्योधनपुरोगमाः । युधिष्ठिरं जिघृक्षन्तः सर्वसैन्यं समाक्षिपन् ॥

tāvakā hi mahābāho duryodhanapurogamāḥ | yudhiṣṭhiraṃ jighṛkṣantaḥ sarvasainyaṃ samākṣipan

हे महाबाहो, दुर्योधन को आगे किए आपके योद्धा युधिष्ठिर को पकड़ने की इच्छा से अपनी पूरी सेना को उस पर झोंकने लगे।

श्लोक 11 (8.65.11)

दृष्टप्रभावांस्तान्मत्वा समवेतान्महारथान् । आजग्मुः सम्परीप्सन्तः पाण्डवेयं युधिष्ठिरम् ॥

dṛṣṭaprabhāvāṃstānmatvā samavetānmahārathān | ājagmuḥ samparīpsantaḥ pāṇḍaveyaṃ yudhiṣṭhiram

उन एकत्र हुए महारथियों के प्रभाव को देखा हुआ मानकर वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर की रक्षा के लिए आ पहुँचे।

श्लोक 12 (8.65.12)

नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । अक्षौहिण्या परिवृतास्तेऽभ्यधावन्युधिष्ठिरम् ॥

nakulaḥ sahadevaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | akṣauhiṇyā parivṛtāste'bhyadhāvanyudhiṣṭhiram

नकुल, सहदेव और पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न एक अक्षौहिणी से घिरे हुए युधिष्ठिर की ओर दौड़े।

श्लोक 13 (8.65.13)

भीमसेनश्च नाराचैर्मृद्नंस्तव महारथान् । अभ्यधावदभिप्रेप्सू राजानं शत्रुभिर्वृतम् ॥

bhīmasenaśca nārācairmṛdnaṃstava mahārathān | abhyadhāvadabhiprepsū rājānaṃ śatrubhirvṛtam

और भीमसेन आपके महारथियों को नाराच बाणों से कुचलते हुए, शत्रुओं से घिरे राजा तक पहुँचने की इच्छा से उस ओर दौड़ा।

श्लोक 14 (8.65.14)

तांस्तु सर्वान्महेष्वासान्कर्णो वैकर्तनो वृषा । शरवर्षेण महता प्रत्यवारयदागतान् ॥

tāṃstu sarvānmaheṣvāsānkarṇo vaikartano vṛṣā | śaravarṣeṇa mahatā pratyavārayadāgatān

परन्तु उन सब आते हुए महाधनुर्धरों को वैकर्तन कर्ण ने, जो वृष भी कहलाता है, बाणों की बड़ी वर्षा से रोक दिया।

श्लोक 15 (8.65.15)

शरौघान्विसृजन्तस्ते प्रेरयन्तश्च कुञ्जरान् । न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि राधेयं प्रतिवीक्षितुम् ॥

śaraughānvisṛjantaste prerayantaśca kuñjarān | na śekuryatnavanto'pi rādheyaṃ prativīkṣitum

वे बाणों की धाराएँ छोड़ते और हाथियों को आगे बढ़ाते हुए भी, यत्न करने पर भी, राधापुत्र की ओर देख तक न सके।

श्लोक 16 (8.65.16)

तांश्च सर्वान्महेष्वासान्सर्वशस्त्रविशारदान् । महता शरवर्षेण राधेयः प्रत्यवारयत् ॥

tāṃśca sarvānmaheṣvāsānsarvaśastraviśāradān | mahatā śaravarṣeṇa rādheyaḥ pratyavārayat

और राधापुत्र ने सब शस्त्रों में निपुण उन सब महाधनुर्धरों को बाणों की बड़ी वर्षा से रोक दिया।

श्लोक 17 (8.65.17)

दुर्योधनं च विंशत्या नाराचानां कृती बली । अविध्यत्तूर्णमभ्येत्य सहदेवो महीपतिम् ॥

duryodhanaṃ ca viṃśatyā nārācānāṃ kṛtī balī | avidhyattūrṇamabhyetya sahadevo mahīpatim

तब कुशल और बलवान् सहदेव ने शीघ्र पास आकर राजा दुर्योधन को बीस नाराचों से बींध दिया।

श्लोक 18 (8.65.18)

स विद्धः सहदेवेन रराज बलसन्निधौ । प्रभिन्न इव मातङ्गो रुधिरेण परिप्लुतः ॥

sa viddhaḥ sahadevena rarāja balasannidhau | prabhinna iva mātaṅgo rudhireṇa pariplutaḥ

सहदेव से बिंधा हुआ वह अपनी सेना के बीच रक्त से लथपथ मदमत्त हाथी के समान शोभित हुआ।

श्लोक 19 (8.65.19)

दृष्ट्वा तव सुतं तत्र गाढविद्धं सुतेजनैः । अभ्यधावद्दृढं क्रुद्धो राधेयो रथिनां वरः ॥

dṛṣṭvā tava sutaṃ tatra gāḍhaviddhaṃ sutejanaiḥ | abhyadhāvaddṛḍhaṃ kruddho rādheyo rathināṃ varaḥ

अपने पुत्र को वहाँ तीखे बाणों से गहरा बिंधा देखकर रथियों में श्रेष्ठ राधापुत्र कर्ण क्रुद्ध होकर वेग से दौड़ा।

श्लोक 20 (8.65.20)

दुर्योधनं तथा दृष्ट्वा शीघ्रमस्त्रमुदीर्य सः । अवधीत्पाण्डवानीकं पाञ्चालांश्चैव मारिष ॥

duryodhanaṃ tathā dṛṣṭvā śīghramastramudīrya saḥ | avadhītpāṇḍavānīkaṃ pāñcālāṃścaiva māriṣa

दुर्योधन को वैसा देखकर उसने शीघ्र अस्त्र चलाकर, हे मान्यवर, पाण्डवों की सेना और पाञ्चालों को मार डाला।

श्लोक 21 (8.65.21)

ततो यौधिष्ठिरं सैन्यं वध्यमानं महात्मना । सहसा प्राद्रवद्राजन्सूतपुत्रशरार्दितम् ॥

tato yaudhiṣṭhiraṃ sainyaṃ vadhyamānaṃ mahātmanā | sahasā prādravadrājansūtaputraśarārditam

तब महात्मा कर्ण से मारी जाती हुई युधिष्ठिर की सेना, सूतपुत्र के बाणों से पीड़ित होकर, हे राजन्, सहसा भाग खड़ी हुई।

श्लोक 22 (8.65.22)

विविधा विशिखास्तत्र सम्पतन्ति परस्परम् । भल्लाः पुङ्खसमाश्लिष्टाः सूतपुत्रधनुश्च्युताः ॥

vividhā viśikhāstatra sampatanti parasparam | bhallāḥ puṅkhasamāśliṣṭāḥ sūtaputradhanuścyutāḥ

वहाँ तरह-तरह के बाण एक-दूसरे पर गिर रहे थे, और सूतपुत्र के धनुष से छूटे पंखदार भल्ल भी।

श्लोक 23 (8.65.23)

अन्तरिक्षे शरौघाणां पततां च परस्परम् । सङ्घर्षेण महाराज पावकः समजायत ॥

antarikṣe śaraughāṇāṃ patatāṃ ca parasparam | saṅgharṣeṇa mahārāja pāvakaḥ samajāyata

हे महाराज, आकाश में एक-दूसरे से टकराकर गिरते बाणों की रगड़ से आग उत्पन्न हो गई।

श्लोक 24 (8.65.24)

ततो दशदिशः कर्णः शलभैरिव यायिभिः । अभ्यघ्नंस्तरसा राजञ्शरैः परशरीरगैः ॥

tato daśadiśaḥ karṇaḥ śalabhairiva yāyibhiḥ | abhyaghnaṃstarasā rājañśaraiḥ paraśarīragaiḥ

तब हे राजन्, कर्ण ने उड़ती टिड्डियों-जैसे शत्रुओं के शरीर चीरने वाले बाणों से दसों दिशाओं पर वेग से प्रहार किया।

श्लोक 25 (8.65.25)

रक्तचन्दनसन्दिग्धौ मणिहेमविभूषितौ । बाहू व्यत्यक्षिपत्कर्णः परमास्त्रं विदर्शयन् ॥

raktacandanasandigdhau maṇihemavibhūṣitau | bāhū vyatyakṣipatkarṇaḥ paramāstraṃ vidarśayan

लाल चन्दन से लिपी, मणि और सोने से सजी अपनी भुजाओं को कर्ण अपनी परम अस्त्र-विद्या दिखाते हुए घुमाने लगा।

श्लोक 26 (8.65.26)

ततः सर्वा दिशो राजन्सायकैर्विप्रमोहयन् । अपीडयद्भृशं कर्णो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

tataḥ sarvā diśo rājansāyakairvipramohayan | apīḍayadbhṛśaṃ karṇo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

फिर हे राजन्, बाणों से सब दिशाओं को मोहित करते हुए कर्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अत्यन्त पीड़ित किया।

श्लोक 27 (8.65.27)

ततः क्रुद्धो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । निशितैरिषुभिः कर्णं पञ्चाशद्भिः समार्पयत् ॥

tataḥ kruddho mahārāja dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | niśitairiṣubhiḥ karṇaṃ pañcāśadbhiḥ samārpayat

तब हे महाराज, धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने क्रुद्ध होकर पचास तीखे बाणों से कर्ण को बींध दिया।

श्लोक 28 (8.65.28)

बाणान्धकारमभवत्तद्युद्धं घोरदर्शनम् । हाहाकारो महानासीत्तावकानां विशाम्पते ॥

bāṇāndhakāramabhavattadyuddhaṃ ghoradarśanam | hāhākāro mahānāsīttāvakānāṃ viśāmpate

बाणों का अन्धकार छा गया, और वह युद्ध देखने में भयंकर हो उठा; हे प्रजापालक, आपके योद्धाओं में बड़ा हाहाकार मच गया।

श्लोक 29 (8.65.29)

वध्यमाने तदा सैन्ये धर्मपुत्रेण मारिष । सायकैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः । भल्लैरनेकैर्विविधैः शक्त्यृष्टिमुसलैरपि ॥

vadhyamāne tadā sainye dharmaputreṇa māriṣa | sāyakairvividhaistīkṣṇaiḥ kaṅkapatraiḥ śilāśitaiḥ | bhallairanekairvividhaiḥ śaktyṛṣṭimusalairapi

हे मान्यवर, जब धर्मपुत्र के द्वारा तरह-तरह के तीखे, कंक-पंख वाले, शिला पर पैने किए बाणों से, अनेक प्रकार के भल्लों से तथा शक्ति, ऋष्टि और मूसलों से भी आपकी सेना मारी जा रही थी,

श्लोक 30 (8.65.30)

यत्र यत्र स धर्मात्मा दुष्टां दृष्टिं व्यसर्जयत् । तत्र तत्र व्यशीर्यन्त तावका भरतर्षभ ॥

yatra yatra sa dharmātmā duṣṭāṃ dṛṣṭiṃ vyasarjayat | tatra tatra vyaśīryanta tāvakā bharatarṣabha

तब वह धर्मात्मा जहाँ-जहाँ क्रोध-भरी दृष्टि डालता, हे भरतश्रेष्ठ, वहीं-वहीं आपके योद्धा बिखर जाते थे।

श्लोक 31 (8.65.31)

कर्णोऽपि भृशसङ्क्रुद्धो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । नाराचैरर्धचन्द्रैश्च वत्सदन्तैश्च संयुगे ॥

karṇo'pi bhṛśasaṅkruddho dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | nārācairardhacandraiśca vatsadantaiśca saṃyuge

कर्ण भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर धर्मराज युधिष्ठिर पर रण में नाराचों, अर्धचन्द्र बाणों और वत्सदन्त बाणों से—

श्लोक 32 (8.65.32)

अमर्षी क्रोधनश्चैव रोषप्रस्फुरिताननः । सायकैरप्रमेयात्मा युधिष्ठिरमभिद्रवत् ॥

amarṣī krodhanaścaiva roṣaprasphuritānanaḥ | sāyakairaprameyātmā yudhiṣṭhiramabhidravat

वह असहनशील, क्रोधी, रोष से फड़कते मुख वाला, अप्रमेय आत्मा कर्ण बाणों से युधिष्ठिर पर टूट पड़ा।

श्लोक 33 (8.65.33)

युधिष्ठिरश्चापि स तं स्वर्णपुङ्खैः शितैः शरैः ॥

yudhiṣṭhiraścāpi sa taṃ svarṇapuṅkhaiḥ śitaiḥ śaraiḥ

और युधिष्ठिर ने भी सोने के पंखों वाले तीखे बाणों से उसका सामना किया।

श्लोक 34 (8.65.34)

प्रहसन्निव तं कर्णः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः । उरस्यविध्यद्राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

prahasanniva taṃ karṇaḥ kaṅkapatraiḥ śilāśitaiḥ | urasyavidhyadrājānaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

तब मानो हँसते हुए कर्ण ने शिला पर पैने किए कंक-पंख वाले बाणों से राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की छाती बींध दी।

श्लोक 35 (8.65.35)

स पीडितो भृशं तेन धर्मराजो युधिष्ठिरः । उपविश्य रथोपस्थे सूतं याहीत्यनोदयत् ॥

sa pīḍito bhṛśaṃ tena dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | upaviśya rathopasthe sūtaṃ yāhītyanodayat

उससे अत्यन्त पीड़ित होकर धर्मराज युधिष्ठिर रथ के पिछले भाग में बैठ गए और सारथि को "चलो" कहकर हाँका।

श्लोक 36 (8.65.36)

अक्रोशन्त ततः सर्वे धार्तराष्ट्राः सराजकाः । गृह्णीध्वमिति राजानमभ्यधावन्त सर्वशः ॥

akrośanta tataḥ sarve dhārtarāṣṭrāḥ sarājakāḥ | gṛhṇīdhvamiti rājānamabhyadhāvanta sarvaśaḥ

तब राजाओं सहित सब धृतराष्ट्र-पुत्र चिल्ला उठे, "पकड़ लो!" और चारों ओर से राजा पर दौड़ पड़े।

श्लोक 37 (8.65.37)

ततः शताः सप्तदश केकयानां प्रहारिणाम् । पञ्चालैः सहिता राजन्धार्तराष्ट्रान्न्यवारयन् ॥

tataḥ śatāḥ saptadaśa kekayānāṃ prahāriṇām | pañcālaiḥ sahitā rājandhārtarāṣṭrānnyavārayan

तब हे राजन्, केकय देश के सत्रह सौ योद्धाओं ने पाञ्चालों के साथ मिलकर धृतराष्ट्र के पुत्रों को रोक दिया।

श्लोक 38 (8.65.38)

तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने जनक्षये । दुर्योधनश्च भीमश्च समेयातां महाबलौ ॥

tasminsutumule yuddhe vartamāne janakṣaye | duryodhanaśca bhīmaśca sameyātāṃ mahābalau

जनसंहार करते उस घोर युद्ध के चलते समय दुर्योधन और भीम, दोनों महाबली, आमने-सामने आ गए।

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