कर्ण पर्व · अध्याय 66
कर्ण के बाणों से पीड़ित युधिष्ठिर का शिविर-गमन
कर्ण केकयों के महारथियों को बिखेर देता है और युधिष्ठिर पर टूट पड़ता है; वह उनके घोड़े मार डालता है, उनका शिरस्त्राण गिरा देता है और नकुल को भी रथहीन कर देता है, जिससे दोनों भाई एक ही रथ पर चढ़ जाते हैं। शल्य कर्ण को याद दिलाता है कि उसका असली लक्ष्य अर्जुन है और भीम की पकड़ में फँसे दुर्योधन को बचाने को कहता है, तब कर्ण पाण्डवराज को छोड़ देता है। बुरी तरह घायल युधिष्ठिर अपने शिविर को लौट जाते हैं और माद्रीपुत्रों को भीमसेन की सहायता के लिए भेजते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.66.1)
कर्णोऽपि शरजालेन केकयानां महारथान् । व्यधमत्परमेष्वासानग्रानीके व्यवस्थितान् ॥
karṇo'pi śarajālena kekayānāṃ mahārathān | vyadhamatparameṣvāsānagrānīke vyavasthitān
कर्ण ने भी बाणों के जाल से केकयों के उन महारथियों को गिरा दिया, जो श्रेष्ठ धनुर्धर थे और सेना के अग्रभाग में डटे हुए थे।
श्लोक 2 (8.66.2)
तेषां प्रयतमानानां राधेयस्य निवारणे । रथान्पञ्चशतान्कर्णः प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
teṣāṃ prayatamānānāṃ rādheyasya nivāraṇe | rathānpañcaśatānkarṇaḥ prāhiṇodyamasādanam
राधापुत्र को रोकने का प्रयत्न करते हुए उनके पाँच सौ रथों को कर्ण ने यमलोक भेज दिया।
श्लोक 3 (8.66.3)
अविषह्यतमं दृष्ट्वा राधेयं युधि योधिनः । भीमसेनमुपागच्छन्कर्णबाणप्रपीडिताः ॥
aviṣahyatamaṃ dṛṣṭvā rādheyaṃ yudhi yodhinaḥ | bhīmasenamupāgacchankarṇabāṇaprapīḍitāḥ
युद्ध में राधापुत्र को असह्य देखकर, कर्ण के बाणों से अत्यन्त पीड़ित योद्धा भीमसेन के पास चले गए।
श्लोक 4 (8.66.4)
रथानीकं विदार्यैव शरै राजन्ननेकधा । कर्ण एकरथेनैव युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥
rathānīkaṃ vidāryaiva śarai rājannanekadhā | karṇa ekarathenaiva yudhiṣṭhiramupādravat
हे राजन्, बाणों से रथों की सेना को अनेक प्रकार से चीरकर कर्ण अकेले अपने एक ही रथ से युधिष्ठिर पर टूट पड़ा।
श्लोक 5 (8.66.5)
सेनानिवेशं गच्छन्तं मार्गणैर्भृशपीडितम् । यमयोर्मध्यगं वीरं शनैर्यान्तं विचेतसम् ॥
senāniveśaṃ gacchantaṃ mārgaṇairbhṛśapīḍitam | yamayormadhyagaṃ vīraṃ śanairyāntaṃ vicetasam
वह वीर राजा बाणों से बहुत पीड़ित होकर शिविर की ओर जा रहा था; दोनों जुड़वाँ भाइयों के बीच वह अचेत-सा धीरे-धीरे चल रहा था।
श्लोक 6 (8.66.6)
स समासाद्य राजानं दुर्योधनहितेप्सया । सूतपुत्रस्त्रिभिस्तीक्ष्णैर्विव्याध परमेषुभिः ॥
sa samāsādya rājānaṃ duryodhanahitepsayā | sūtaputrastribhistīkṣṇairvivyādha parameṣubhiḥ
दुर्योधन का हित चाहने वाले सूतपुत्र ने राजा के निकट पहुँचकर तीन तीखे उत्तम बाणों से उन्हें बींध दिया।
श्लोक 7 (8.66.7)
तथैव राजा राधेयं प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । शरैस्त्रिभिश्च यन्तारं चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥
tathaiva rājā rādheyaṃ pratyavidhyatstanāntare | śaraistribhiśca yantāraṃ caturbhiścaturo hayān
राजा ने भी उत्तर में राधापुत्र की छाती पर प्रहार किया, और तीन बाणों से उसके सारथि को तथा चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को बींध दिया।
श्लोक 8 (8.66.8)
चक्ररक्षौ नृपसुतौ माद्रीपुत्रौ परन्तपौ । तावप्यधावतां कर्णं राजानं मा वधीदिति ॥
cakrarakṣau nṛpasutau mādrīputrau parantapau | tāvapyadhāvatāṃ karṇaṃ rājānaṃ mā vadhīditi
चक्ररक्षक, शत्रुओं को तपाने वाले दोनों माद्रीपुत्र राजकुमार भी "राजा को मत मारो" कहते हुए कर्ण पर दौड़ पड़े।
श्लोक 9 (8.66.9)
तौ पृथक्शरवर्षाभ्यां राधेयं समवर्षताम् । नकुलः सहदेवश्च परमं यत्नमास्थितौ ॥
tau pṛthakśaravarṣābhyāṃ rādheyaṃ samavarṣatām | nakulaḥ sahadevaśca paramaṃ yatnamāsthitau
नकुल और सहदेव ने पूरा प्रयत्न लगाकर अलग-अलग बाणों की वर्षा से राधापुत्र को ढक दिया।
श्लोक 10 (8.66.10)
तथैव तौ प्रत्यविध्यत्सूतपुत्रः प्रतापवान् । भल्लाभ्यां शितधाराभ्यां महात्मानावरिन्दमौ ॥
tathaiva tau pratyavidhyatsūtaputraḥ pratāpavān | bhallābhyāṃ śitadhārābhyāṃ mahātmānāvarindamau
उसी प्रकार प्रतापी सूतपुत्र ने उन दोनों महात्मा शत्रुदमनों को तेज धार वाले दो भल्ल बाणों से बींध दिया।
श्लोक 11 (8.66.11)
दन्तवर्णांस्तु राधेयो निजघान मनोजवान् । युधिष्ठिरस्य सङ्ग्रामे कालवालान्हयोत्तमान् ॥
dantavarṇāṃstu rādheyo nijaghāna manojavān | yudhiṣṭhirasya saṅgrāme kālavālānhayottamān
राधापुत्र ने उस युद्ध में युधिष्ठिर के दाँत जैसे श्वेत वर्ण वाले, मन के समान वेगवान्, काली पूँछ वाले उत्तम घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 12 (8.66.12)
ततोऽपरेण भल्लेन शिरस्त्राणमपातयत् । कौन्तेयस्य महेष्वासः प्रहसन्निव सूतजः ॥
tato'pareṇa bhallena śirastrāṇamapātayat | kaunteyasya maheṣvāsaḥ prahasanniva sūtajaḥ
फिर महान् धनुर्धर सूतपुत्र ने मानो हँसते हुए एक और भल्ल से कुन्तीपुत्र का शिरस्त्राण गिरा दिया।
श्लोक 13 (8.66.13)
तथैव नकुलस्यापि हयान्हत्वा महारथः । ततोऽपरेण भल्लेन भृशं तीक्ष्णेन भारत । धनुश्चिच्छेद वीरस्य माद्रीपुत्रस्य धीमतः ॥
tathaiva nakulasyāpi hayānhatvā mahārathaḥ | tato'pareṇa bhallena bhṛśaṃ tīkṣṇena bhārata | dhanuściccheda vīrasya mādrīputrasya dhīmataḥ
उस महारथी ने नकुल के भी घोड़े मारकर, हे भारत, फिर एक और अत्यन्त तीखे भल्ल से बुद्धिमान् वीर माद्रीपुत्र का धनुष काट डाला।
श्लोक 14 (8.66.14)
तौ हताश्वौ हतरथौ पाण्डवौ भृशविक्षतौ । भ्रातरावारुरुहतुः सहदेवरथं तदा ॥
tau hatāśvau hatarathau pāṇḍavau bhṛśavikṣatau | bhrātarāvāruruhatuḥ sahadevarathaṃ tadā
घोड़े और रथ खो चुके तथा बुरी तरह घायल वे दोनों पाण्डव भाई तब सहदेव के रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 15 (8.66.15)
तौ दृष्ट्वा मातुलस्तत्र विरथौ परवीरहा । अभ्यभाषत राधेयं मद्रराजोऽनुकम्पया ॥
tau dṛṣṭvā mātulastatra virathau paravīrahā | abhyabhāṣata rādheyaṃ madrarājo'nukampayā
उन दोनों को रथहीन देखकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले उनके मामा मद्रराज ने दया से राधापुत्र से कहा।
शल्य उवाच
श्लोक 16 (8.66.16)
मार्गितव्यस्त्वया कर्ण कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अतस्त्वं धर्मराजेन किमर्थमिह युध्यसे ॥
mārgitavyastvayā karṇa kuntīputro dhanañjayaḥ | atastvaṃ dharmarājena kimarthamiha yudhyase
कर्ण, तुम्हें तो कुन्तीपुत्र धनंजय को खोजना चाहिए। फिर यहाँ धर्मराज से किसलिए लड़ रहे हो?
श्लोक 17 (8.66.17)
क्षीणशस्त्रास्त्रकवचः क्षीणबाणो विबाणधिः । श्रान्तसारथिवाहश्च च्छन्नोऽस्त्रैररिभिस्तथा । पार्थमासाद्य राधेय उपहास्यो भविष्यसि ॥
kṣīṇaśastrāstrakavacaḥ kṣīṇabāṇo vibāṇadhiḥ | śrāntasārathivāhaśca cchanno'strairaribhistathā | pārthamāsādya rādheya upahāsyo bhaviṣyasi
शस्त्र, अस्त्र और कवच के चुक जाने पर, बाण समाप्त हो जाने पर और तरकस खाली हो जाने पर, सारथि और घोड़ों के थक जाने पर तथा शत्रुओं के अस्त्रों से ढक जाने पर, हे राधापुत्र, तुम पार्थ के सामने जाकर हँसी के पात्र बनोगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 18 (8.66.18)
तथापि कर्णः संरब्धो युधिष्ठिरमपीडयत् । शरैस्तीक्ष्णैर्महावीर्यैर्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥
tathāpi karṇaḥ saṃrabdho yudhiṣṭhiramapīḍayat | śaraistīkṣṇairmahāvīryairmādrīputrau ca pāṇḍavau
तो भी क्रोध से भरा कर्ण तीखे और महाबलशाली बाणों से युधिष्ठिर को तथा माद्री के दोनों पाण्डव पुत्रों को पीड़ित करता रहा।
श्लोक 19 (8.66.19)
ततः शल्यः प्रहस्येदं कर्णं पुनरुवाच ह । रथस्थमतिसंरब्धं युधिष्ठिरवधे स्थितम् ॥
tataḥ śalyaḥ prahasyedaṃ karṇaṃ punaruvāca ha | rathasthamatisaṃrabdhaṃ yudhiṣṭhiravadhe sthitam
तब शल्य ने हँसकर रथ में खड़े, अत्यन्त क्रुद्ध और युधिष्ठिर के वध में लगे हुए कर्ण से फिर यह कहा।
शल्य उवाच
श्लोक 20 (8.66.20)
यदर्थं धार्तराष्ट्रेण सततं मानितो भवान् । तं पार्थ जहि राधेय किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् । हते यस्मिन्ध्रुवं पार्थः सर्वाञ्जेष्यति नो रथान् ॥
yadarthaṃ dhārtarāṣṭreṇa satataṃ mānito bhavān | taṃ pārtha jahi rādheya kiṃ te hatvā yudhiṣṭhiram | hate yasmindhruvaṃ pārthaḥ sarvāñjeṣyati no rathān
जिस (अर्जुन) के लिए धृतराष्ट्र के पुत्र ने सदा तुम्हारा मान किया है, राधापुत्र, उस पार्थ को मारो। युधिष्ठिर को मारने से तुम्हें क्या मिलेगा? यदि राजा मारे गए, तो पार्थ हमारे सब रथियों को निश्चय ही जीत लेगा।
श्लोक 21 (8.66.21)
तस्मिन्हि धार्तराष्ट्रस्य निहते तु ध्रुवो जयः । ध्वजोऽसौ दृश्यते तस्य रोचमानोऽंशुमानिव । सारो ह्येष महाबाहो किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् ॥
tasminhi dhārtarāṣṭrasya nihate tu dhruvo jayaḥ | dhvajo'sau dṛśyate tasya rocamāno'ṃśumāniva | sāro hyeṣa mahābāho kiṃ te hatvā yudhiṣṭhiram
परन्तु उस अर्जुन के मारे जाने पर धृतराष्ट्र के पुत्र की विजय निश्चित है। वह देखो उसकी ध्वजा, सूर्य के समान दमक रही है। हे महाबाहो, वही उनका सार है; युधिष्ठिर को मारने से तुम्हें क्या मिलेगा?
श्लोक 22 (8.66.22)
शङ्खयोर्ध्मातयोः शब्दः सुमहानेष कृष्णयोः । श्रूयते चापघोषश्च प्रावृषीवाम्बुदस्य ह ॥
śaṅkhayordhmātayoḥ śabdaḥ sumahāneṣa kṛṣṇayoḥ | śrūyate cāpaghoṣaśca prāvṛṣīvāmbudasya ha
दोनों कृष्णों द्वारा बजाए गए शंखों का भारी नाद सुनाई दे रहा है, और वर्षा ऋतु के बादल की गर्जना जैसी धनुष की टंकार भी।
श्लोक 23 (8.66.23)
असौ निघ्नन्रथोदारानर्जुनः शरवृष्टिभिः । सर्वां ग्रसति नः सेनां कर्ण पश्यैनमाहवे ॥
asau nighnanrathodārānarjunaḥ śaravṛṣṭibhiḥ | sarvāṃ grasati naḥ senāṃ karṇa paśyainamāhave
वह अर्जुन बाणों की वर्षा से श्रेष्ठ रथियों को मारता हुआ हमारी पूरी सेना को निगल रहा है; कर्ण, उसे युद्ध में देखो।
श्लोक 24 (8.66.24)
पृष्ठरक्षौ च शूरस्य युधामन्यूत्तमौजसौ ॥
pṛṣṭharakṣau ca śūrasya yudhāmanyūttamaujasau
और उस शूर के पीछे की रक्षा करने वाले दोनों योद्धा युधामन्यु और उत्तमौजा हैं।
श्लोक 25 (8.66.25)
उत्तरं चास्य वै शूरश्चक्रं रक्षति सांत्यकिः । धृष्टद्युम्नस्तथा चास्य चक्रं रक्षति दक्षिणम् ॥
uttaraṃ cāsya vai śūraścakraṃ rakṣati sāṃtyakiḥ | dhṛṣṭadyumnastathā cāsya cakraṃ rakṣati dakṣiṇam
उसके बाएँ चक्र की रक्षा शूर सात्यकि कर रहा है और दाहिने चक्र की रक्षा धृष्टद्युम्न।
श्लोक 26 (8.66.26)
भीमसेनश्च वै राज्ञा धार्तराष्ट्रेण युध्यते । यथा न हन्यात्तं भीमः सर्वेषां नोऽद्य पश्यताम् । कुरु राधेय वै राजा यथा मुच्येत तत्तथा ॥
bhīmasenaśca vai rājñā dhārtarāṣṭreṇa yudhyate | yathā na hanyāttaṃ bhīmaḥ sarveṣāṃ no'dya paśyatām | kuru rādheya vai rājā yathā mucyeta tattathā
भीमसेन राजा धृतराष्ट्रपुत्र से लड़ रहा है। राधापुत्र, ऐसा करो कि हम सबके देखते-देखते भीम उसे मार न डाले और राजा जिस प्रकार भी हो छूट जाए।
श्लोक 27 (8.66.27)
पश्यैनं भीमसेनेन ग्रस्तमाहवशोभिना । यदि नामाद्य मुच्येत विस्मयः सुमहान्भवेत् ॥
paśyainaṃ bhīmasenena grastamāhavaśobhinā | yadi nāmādya mucyeta vismayaḥ sumahānbhavet
देखो, युद्ध की शोभा बढ़ाने वाले भीमसेन ने उसे पकड़ रखा है! यदि वह आज किसी तरह छूट जाए, तो बड़ा आश्चर्य होगा।
श्लोक 28 (8.66.28)
परित्राह्येनमभ्येत्य संशयं परमं गतम् । किं नु माद्रीसुतौ हत्वा राजानं वा युधिष्ठिरम् ॥
paritrāhyenamabhyetya saṃśayaṃ paramaṃ gatam | kiṃ nu mādrīsutau hatvā rājānaṃ vā yudhiṣṭhiram
जाकर उसे बचाओ; वह भारी संकट में पड़ गया है। माद्री के दोनों पुत्रों को या राजा युधिष्ठिर को मारने से क्या लाभ?
सञ्जय उवाच
श्लोक 29 (8.66.29)
इति शल्यवचः श्रुत्वा राधेयः पृथिवीपते । दृष्ट्वा दुर्योधनं चैव भीमग्रस्तं महाहवे ॥
iti śalyavacaḥ śrutvā rādheyaḥ pṛthivīpate | dṛṣṭvā duryodhanaṃ caiva bhīmagrastaṃ mahāhave
हे पृथ्वीपते, शल्य के ये वचन सुनकर और उस महायुद्ध में दुर्योधन को भीम की पकड़ में देखकर,
श्लोक 30 (8.66.30)
राजगृध्नुर्भृशं चैव शल्यवाक्यप्रचोदितः । अजातशत्रुमुत्सृज्य माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥
rājagṛdhnurbhṛśaṃ caiva śalyavākyapracoditaḥ | ajātaśatrumutsṛjya mādrīputrau ca pāṇḍavau
राजा के पक्ष में लगा हुआ और शल्य के वचनों से प्रेरित राधापुत्र अजातशत्रु और माद्री के दोनों पाण्डव पुत्रों को छोड़कर
श्लोक 31 (8.66.31)
तव पुत्रं परित्रातुमभ्यधावत वीर्यवान् । मद्रराजप्रणुदितैरश्वैराकाशगैरिव ॥
tava putraṃ paritrātumabhyadhāvata vīryavān | madrarājapraṇuditairaśvairākāśagairiva
तुम्हारे पुत्र की रक्षा के लिए दौड़ पड़ा; मद्रराज से हाँके गए उसके घोड़े मानो आकाश में उड़ रहे थे।
श्लोक 32 (8.66.32)
गते कर्णे तु कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः । अपायाज्जवनैरश्वैः सहदेवस्य मारिष ॥
gate karṇe tu kaunteyaḥ pāṇḍuputro yudhiṣṭhiraḥ | apāyājjavanairaśvaiḥ sahadevasya māriṣa
कर्ण के चले जाने पर पाण्डु के पुत्र कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर सहदेव के तेज घोड़ों पर सवार होकर हट गए।
श्लोक 33 (8.66.33)
ताभ्यां स सहितस्तूर्णं व्रीडन्निव नरेश्वरः । प्राप्य सेनानिवेशं स्वं मार्गणैर्भृशविक्षतः ॥
tābhyāṃ sa sahitastūrṇaṃ vrīḍanniva nareśvaraḥ | prāpya senāniveśaṃ svaṃ mārgaṇairbhṛśavikṣataḥ
उन दोनों के साथ वे नरेश्वर मानो लज्जित-से शीघ्र ही अपने शिविर में पहुँचे; बाणों से वे बहुत घायल थे।
श्लोक 34 (8.66.34)
अवतीर्य रथात्तूर्णमाविशच्छयनं शुभम् । अपेतशल्यो राजा तु हृच्छल्येनाभिपीडितः ॥
avatīrya rathāttūrṇamāviśacchayanaṃ śubham | apetaśalyo rājā tu hṛcchalyenābhipīḍitaḥ
वे शीघ्र रथ से उतरकर सुन्दर शय्या पर लेट गए; शरीर से बाण निकल चुके थे, फिर भी राजा हृदय की चुभन से पीड़ित थे।
श्लोक 35 (8.66.35)
सोऽब्रवीद्भ्रातरौ राजा माद्रीपुत्रौ महारथौ । गच्छन्त त्वरितौ वीरौ यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥
so'bravīdbhrātarau rājā mādrīputrau mahārathau | gacchanta tvaritau vīrau yatra bhīmo vyavasthitaḥ
उस राजा ने अपने दोनों भाइयों, माद्री के पुत्र महारथियों से कहा, "वीरो, शीघ्र वहाँ जाओ जहाँ भीम डटा हुआ है।"
श्लोक 36 (8.66.36)
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे समाभाष्य परस्परम् । अनीकं भीमसेनस्य पाण्डवावभ्यगच्छताम् । जीमूत इव नर्दंस्तु युध्यते स वृकोदरः ॥
tataste pāṇḍavāḥ sarve samābhāṣya parasparam | anīkaṃ bhīmasenasya pāṇḍavāvabhyagacchatām | jīmūta iva nardaṃstu yudhyate sa vṛkodaraḥ
तब सब पाण्डवों ने आपस में बातचीत की और दोनों पाण्डव (नकुल-सहदेव) भीमसेन की सेना के पास गए। इधर वह वृकोदर मेघ की भाँति गरजता हुआ लड़ रहा था।
श्लोक 37 (8.66.37)
ततोऽन्यं रथमास्थाय नकुलो रथपुङ्गवः । सहदेवश्च तेजस्वी भ्रातरौ शत्रुकर्शनौ ॥
tato'nyaṃ rathamāsthāya nakulo rathapuṅgavaḥ | sahadevaśca tejasvī bhrātarau śatrukarśanau
तब दूसरे रथ पर चढ़कर रथियों में श्रेष्ठ नकुल और तेजस्वी सहदेव, ये दोनों शत्रुनाशक भाई,
श्लोक 38 (8.66.38)
तुरगैरग्र्यरंहोभिर्यत्र भीमस्तरस्विनौ । अनीकैः सहितौ तत्र भ्रातरौ समवस्थितौ ॥
turagairagryaraṃhobhiryatra bhīmastarasvinau | anīkaiḥ sahitau tatra bhrātarau samavasthitau
सबसे तेज घोड़ों के साथ वहाँ पहुँचे जहाँ भीम था; वे दोनों बलशाली भाई अपनी सेनाओं के साथ वहीं डट गए।