कर्ण पर्व · अध्याय 67
अर्जुन से अश्वत्थामा की पराजय और कर्ण का भार्गवास्त्र
अश्वत्थामा अर्जुन और कृष्ण पर टूट पड़ता है और दोनों दिव्यास्त्रों से लड़ते हैं, यहाँ तक कि अर्जुन उसका धनुष काट देते हैं, उसकी गदा और इन्द्रजाल को नष्ट कर देते हैं, उसके मर्मस्थानों को बींधते हैं और उसकी लगामें काट डालते हैं, जिससे उसके घोड़े भाग खड़े होते हैं। कौरव सेना के टूटने पर दुर्योधन कर्ण से गुहार करता है, और कर्ण भार्गवास्त्र का प्रयोग करके पाञ्चालों और सृञ्जयों को हज़ारों की संख्या में काट डालता है। उस अस्त्र का प्रभाव देखकर अर्जुन कृष्ण से रथ लौटाने को कहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.67.1)
द्रौणिस्तु रथवंशेन महता परिवारितः । अपतत्सहसा राजन्यत्र पार्थो व्यवस्थितः ॥
drauṇistu rathavaṃśena mahatā parivāritaḥ | apatatsahasā rājanyatra pārtho vyavasthitaḥ
द्रोणपुत्र रथों के विशाल समूह से घिरा हुआ, हे राजन्, सहसा वहाँ आ पड़ा जहाँ पार्थ खड़े थे।
श्लोक 2 (8.67.2)
तमापतन्तं सहसा शूरः शौरिसहायवान् । दधार समरे पार्थो वेलेव मकरालयम् ॥
tamāpatantaṃ sahasā śūraḥ śaurisahāyavān | dadhāra samare pārtho veleva makarālayam
उस पर टूट पड़ते हुए को शौरि की सहायता वाले शूर पार्थ ने युद्ध में उसी प्रकार रोक लिया, जैसे तट समुद्र को रोक लेता है।
श्लोक 3 (8.67.3)
ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । अर्जुनं वासुदेवं च च्छादयामास सायकैः ॥
tataḥ kruddho mahārāja droṇaputraḥ pratāpavān | arjunaṃ vāsudevaṃ ca cchādayāmāsa sāyakaiḥ
तब हे महाराज, क्रोधित प्रतापी द्रोणपुत्र ने अर्जुन और वासुदेव को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 4 (8.67.4)
अवच्छन्नौ ततः कृष्णौ दृष्ट्वा तत्र महारथाः । विस्मयं परमं गत्वा प्रैक्षन्त कुरवस्तदा ॥
avacchannau tataḥ kṛṣṇau dṛṣṭvā tatra mahārathāḥ | vismayaṃ paramaṃ gatvā praikṣanta kuravastadā
दोनों कृष्णों को बाणों से ढका हुआ देखकर वहाँ के कुरु महारथी अत्यन्त विस्मित होकर देखते रहे।
श्लोक 5 (8.67.5)
अर्जुनस्तु ततो दिव्यमस्त्रं चक्रे हसन्निव । तदस्त्रं वारयामास ब्राह्मणो युधि भारत ॥
arjunastu tato divyamastraṃ cakre hasanniva | tadastraṃ vārayāmāsa brāhmaṇo yudhi bhārata
तब अर्जुन ने मानो हँसते हुए दिव्यास्त्र चलाया; किन्तु हे भारत, उस ब्राह्मण ने युद्ध में उस अस्त्र को रोक दिया।
श्लोक 6 (8.67.6)
यद्यद्धि व्याक्षिपद्युद्धे फल्गुनोऽस्त्रं जिघांसया । तत्तदस्त्रैर्महेष्वासो द्रोणपुत्रो जघान ह ॥
yadyaddhi vyākṣipadyuddhe phalguno'straṃ jighāṃsayā | tattadastrairmaheṣvāso droṇaputro jaghāna ha
फल्गुन ने उसे मारने की इच्छा से युद्ध में जो-जो अस्त्र छोड़ा, महान् धनुर्धर द्रोणपुत्र ने उसे अपने अस्त्रों से काट गिराया।
श्लोक 7 (8.67.7)
अस्त्रयुद्धे महाराज वर्तमाने महाभये । अपश्याम रणे द्रौणिं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥
astrayuddhe mahārāja vartamāne mahābhaye | apaśyāma raṇe drauṇiṃ vyāttānanamivāntakam
हे महाराज, जब वह भयंकर अस्त्र-युद्ध चल रहा था, तब हमने रण में द्रोणपुत्र को मुँह फैलाए हुए यमराज के समान देखा।
श्लोक 8 (8.67.8)
स दिशः प्रदिशश्चैव च्छादयित्वा ह्यजिह्मगैः । वासुदेवं त्रिभिर्बाणैरविध्यद्दक्षिणे भुजे ॥
sa diśaḥ pradiśaścaiva cchādayitvā hyajihmagaiḥ | vāsudevaṃ tribhirbāṇairavidhyaddakṣiṇe bhuje
सीधे जाने वाले बाणों से दिशाओं और उपदिशाओं को ढककर उसने वासुदेव की दाहिनी भुजा में तीन बाण मारे।
श्लोक 9 (8.67.9)
ततोऽर्जुनो रथान्सर्वान्हत्वा तस्य पदानुगान् । चकार समरे भूमिं शोणितौघपरिप्लुताम् । सर्वलोकवहां रौद्रां परलोकवहां नदीम् ॥
tato'rjuno rathānsarvānhatvā tasya padānugān | cakāra samare bhūmiṃ śoṇitaughapariplutām | sarvalokavahāṃ raudrāṃ paralokavahāṃ nadīm
तब अर्जुन ने उसके सब रथों और अनुचरों को मारकर रणभूमि को रक्त की बाढ़ से भरी हुई बना दिया, एक भयंकर नदी, जो सब लोकों में और परलोक में ले जाने वाली थी।
श्लोक 10 (8.67.10)
सरथा रथिनः पेतुः पार्थचापच्युतैः शरैः ॥
sarathā rathinaḥ petuḥ pārthacāpacyutaiḥ śaraiḥ
रथों सहित रथी पार्थ के धनुष से छूटे बाणों से मारे जाकर गिरने लगे।
श्लोक 11 (8.67.11)
द्रौणेरपहतान्सङ्ख्ये ददृशु स च तां तथा । प्रावर्तयन्महाघोरां नदीं परवहां तदा ॥
drauṇerapahatānsaṅkhye dadṛśu sa ca tāṃ tathā | prāvartayanmahāghorāṃ nadīṃ paravahāṃ tadā
उन्होंने युद्ध में द्रोणपुत्र के हाथों मारे गए लोगों को देखा, और उसने भी उस नदी को देखा; और उन्होंने अत्यन्त भयंकर परलोक को ले जाने वाली नदी बहा दी।
श्लोक 12 (8.67.12)
तयोस्तु व्याकुले युद्धे द्रौणेः पार्थस्य दारुणे । अमर्यादं योधयन्तः पर्यधावन्त पृष्ठतः ॥
tayostu vyākule yuddhe drauṇeḥ pārthasya dāruṇe | amaryādaṃ yodhayantaḥ paryadhāvanta pṛṣṭhataḥ
द्रोणपुत्र और पार्थ के उस भयंकर, उथल-पुथल भरे युद्ध में योद्धा मर्यादा छोड़कर लड़ते हुए उनके पीछे इधर-उधर दौड़ रहे थे।
श्लोक 13 (8.67.13)
रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः । द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ॥
rathairhatāśvasūtaiśca hatārohaiśca vājibhiḥ | dviradaiśca hatārohairmahāmātrairhatadvipaiḥ
वहाँ घोड़ों और सारथियों के मारे जाने से सूने रथ थे, सवारों के मारे जाने से सूने घोड़े और हाथी थे, और हाथियों के मारे जाने से हाथीवान महामात्र थे।
श्लोक 14 (8.67.14)
पार्थेन समरे राजन्कृतो घोरो जनक्षयः । निहता रथिनः पेतुः पार्थचापच्युतैः शरैः ॥
pārthena samare rājankṛto ghoro janakṣayaḥ | nihatā rathinaḥ petuḥ pārthacāpacyutaiḥ śaraiḥ
हे राजन्, पार्थ ने युद्ध में भयंकर जनसंहार कर दिया; मारे गए रथी पार्थ के धनुष से छूटे बाणों से बिंधकर गिरते गए।
श्लोक 15 (8.67.15)
हयाश्च पर्यधावन्त मुक्तयोक्त्रास्ततस्ततः । तद्दृष्ट्वा कर्म पार्थस्य द्रौणिराहवशोभिनः ॥
hayāśca paryadhāvanta muktayoktrāstatastataḥ | taddṛṣṭvā karma pārthasya drauṇirāhavaśobhinaḥ
लगाम छूटे हुए घोड़े इधर-उधर दौड़ रहे थे। पार्थ का वह कर्म देखकर रण की शोभा द्रोणपुत्र ने
श्लोक 16 (8.67.16)
अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितोऽभ्येत्य वीर्यवान् । विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ॥
arjunaṃ jayatāṃ śreṣṭhaṃ tvarito'bhyetya vīryavān | vidhunvāno mahaccāpaṃ kārtasvaravibhūṣitam
विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन के निकट शीघ्र आकर, उस पराक्रमी ने सोने से सजे अपने विशाल धनुष को हिलाते हुए
श्लोक 17 (8.67.17)
अवाकिरत्ततो द्रौणिः समन्तान्निशितैः शरैः । भूयोऽर्जुनं महाराज द्रौणिरायम्य पत्रिणा ॥
avākirattato drauṇiḥ samantānniśitaiḥ śaraiḥ | bhūyo'rjunaṃ mahārāja drauṇirāyamya patriṇā
फिर चारों ओर से तीखे बाणों की वर्षा करके ढक दिया। हे महाराज, द्रोणपुत्र ने फिर धनुष खींचकर एक पंखदार बाण से
श्लोक 18 (8.67.18)
वक्षोदेशे भृशं पार्थं ताडयामास निर्दयम् । सोऽतिविद्धो रणे तेन द्रोणपुत्रेण भारत ॥
vakṣodeśe bhṛśaṃ pārthaṃ tāḍayāmāsa nirdayam | so'tividdho raṇe tena droṇaputreṇa bhārata
पार्थ की छाती पर निर्दयता से कठोर प्रहार किया। हे भारत, द्रोणपुत्र के उस प्रहार से अत्यन्त बिंधे हुए
श्लोक 19 (8.67.19)
गाण्डीवधन्वा प्रसभं शरवर्षैरुदारधीः । सञ्छाद्य समरे द्रौणिं चिच्छेदास्य च कार्मुकम् ॥
gāṇḍīvadhanvā prasabhaṃ śaravarṣairudāradhīḥ | sañchādya samare drauṇiṃ cicchedāsya ca kārmukam
उदार मन वाले गाण्डीवधारी ने बलपूर्वक बाणों की वर्षा से द्रोणपुत्र को युद्ध में ढककर उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 20 (8.67.20)
स च्छिन्नधन्वा परिघं वज्रस्पर्शसमं युधि । आदाय चिक्षेप तदा द्रोणपुत्रः किरीटिने ॥
sa cchinnadhanvā parighaṃ vajrasparśasamaṃ yudhi | ādāya cikṣepa tadā droṇaputraḥ kirīṭine
धनुष कट जाने पर द्रोणपुत्र ने वज्र के स्पर्श जैसा कठोर परिघ उठाकर किरीटधारी पर फेंका।
श्लोक 21 (8.67.21)
तमापतन्तं परिघं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । चिच्छेद सहसा राजन्प्रहसन्निव पाण्डवः ॥
tamāpatantaṃ parighaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam | ciccheda sahasā rājanprahasanniva pāṇḍavaḥ
सोने से सजे उस आते हुए परिघ को हे राजन्, पाण्डव ने मानो हँसते हुए तुरन्त काट डाला।
श्लोक 22 (8.67.22)
स पपात तदा भूमौ निकृत्तः पार्थसायकैः । विकीर्णः पर्वतो राजन्यथा वज्रेण ताडितः ॥
sa papāta tadā bhūmau nikṛttaḥ pārthasāyakaiḥ | vikīrṇaḥ parvato rājanyathā vajreṇa tāḍitaḥ
पार्थ के बाणों से कटकर वह पृथ्वी पर बिखर गया, जैसे वज्र से मारा हुआ पर्वत टुकड़े-टुकड़े होकर गिरता है।
श्लोक 23 (8.67.23)
ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रो महारथः । ऐन्द्रेण चास्त्रवेगेन बीभत्सुं समवाकिरत् ॥
tataḥ kruddho mahārāja droṇaputro mahārathaḥ | aindreṇa cāstravegena bībhatsuṃ samavākirat
तब महारथी द्रोणपुत्र ने क्रोधित होकर, हे महाराज, ऐन्द्र अस्त्र के वेग से बीभत्सु को ढक दिया।
श्लोक 24 (8.67.24)
तस्येन्द्रजालावततं समीक्ष्य । पार्थो राजन्गाण्डिवमाददे सः । ऐन्द्रं जालं प्रत्यहरत्तरस्वी । वरास्त्रमादाय महेन्द्रसृष्टम् ॥
tasyendrajālāvatataṃ samīkṣya | pārtho rājangāṇḍivamādade saḥ | aindraṃ jālaṃ pratyaharattarasvī | varāstramādāya mahendrasṛṣṭam
इन्द्रजाल को फैला देखकर पार्थ ने, हे राजन्, गाण्डीव उठाया और उस वेगवान् ने महेन्द्र के रचे उत्तम अस्त्र को लेकर ऐन्द्र जाल को नष्ट कर दिया।
श्लोक 25 (8.67.25)
विदार्य तज्जालमथेन्द्रमुक्तं । पार्थस्ततो द्रौणिरथं क्षणेन । प्रच्छादयामास ततोऽभ्युपेत्य । द्रौणिस्तदा पार्थशराभिभूतः ॥
vidārya tajjālamathendramuktaṃ | pārthastato drauṇirathaṃ kṣaṇena | pracchādayāmāsa tato'bhyupetya | drauṇistadā pārthaśarābhibhūtaḥ
इन्द्र के छोड़े उस जाल को चीरकर पार्थ ने क्षण भर में द्रोणपुत्र के रथ के पास पहुँचकर उसे बाणों से ढक दिया; तब पार्थ के बाणों से अभिभूत द्रोणपुत्र ने
श्लोक 26 (8.67.26)
विगाह्य तां पाण्डवबाणवृष्टिं । शरैः परं नाम ततः प्रकाश्य । शतेन कृष्णं सहसाभ्यविध्यत् । त्रिभिः शतैरर्जुनं क्षुद्रकाणाम् ॥
vigāhya tāṃ pāṇḍavabāṇavṛṣṭiṃ | śaraiḥ paraṃ nāma tataḥ prakāśya | śatena kṛṣṇaṃ sahasābhyavidhyat | tribhiḥ śatairarjunaṃ kṣudrakāṇām
पाण्डव के बाणों की उस वर्षा में घुसकर, अपने बाणों से अपना महान् नाम प्रकट करते हुए, सहसा कृष्ण को सौ बाणों से और अर्जुन को तीन सौ क्षुद्रक बाणों से बींध दिया।
श्लोक 27 (8.67.27)
ततोऽर्जुनः सायकानां शतेन । गुरोः सुतं मर्मसु निर्बिभेद । अश्वांश्च सूतं च तथा धनुर्ज्याम् । अवाकिरत्पश्यतां तावकानाम् ॥
tato'rjunaḥ sāyakānāṃ śatena | guroḥ sutaṃ marmasu nirbibheda | aśvāṃśca sūtaṃ ca tathā dhanurjyām | avākiratpaśyatāṃ tāvakānām
तब अर्जुन ने सौ बाणों से गुरुपुत्र के मर्मस्थानों को बींध दिया और तुम्हारे लोगों के देखते-देखते उसके घोड़ों, सारथि और धनुष की डोरी को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 28 (8.67.28)
स विद्ध्वा मर्मसु द्रौणिं पाण्डवः परवीरहा । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥
sa viddhvā marmasu drauṇiṃ pāṇḍavaḥ paravīrahā | sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat
मर्मस्थानों में द्रोणपुत्र को बींधकर शत्रुवीरों के संहारक पाण्डव ने एक भल्ल से उसके सारथि को रथ के आसन से गिरा दिया।
श्लोक 29 (8.67.29)
स सङ्गृह्य स्वयं वाहान्कृष्णौ प्राच्छदयच्छरैः । तत्राद्भुतमपश्याम द्रौणेराशु पराक्रमम् ॥
sa saṅgṛhya svayaṃ vāhānkṛṣṇau prācchadayaccharaiḥ | tatrādbhutamapaśyāma drauṇerāśu parākramam
स्वयं घोड़ों की रास सँभालकर उसने दोनों कृष्णों को बाणों से ढक दिया। वहाँ हमने द्रोणपुत्र का वह अद्भुत और शीघ्र पराक्रम देखा।
श्लोक 30 (8.67.30)
संयच्छंस्तुरगान्यच्च फल्गुनं चाप्ययोधयत् । तदस्य समरे राजन्सर्वभूतान्यपूजयन् ॥
saṃyacchaṃsturagānyacca phalgunaṃ cāpyayodhayat | tadasya samare rājansarvabhūtānyapūjayan
घोड़ों को सँभालते हुए उसने फल्गुन से भी युद्ध जारी रखा; हे राजन्, इस पर सब प्राणियों ने रण में उसका सम्मान किया।
श्लोक 31 (8.67.31)
तेनास्य समरे योधास्तुष्टुवुः सर्व एव ते । यदा निजगृहे पार्थो द्रोणपुत्रेण धन्विना ॥
tenāsya samare yodhāstuṣṭuvuḥ sarva eva te | yadā nijagṛhe pārtho droṇaputreṇa dhanvinā
इस पर वहाँ के सब योद्धाओं ने उसकी प्रशंसा की, जब धनुर्धर द्रोणपुत्र ने पार्थ को रोक लिया था।
श्लोक 32 (8.67.32)
तदा प्रहस्य बीभत्सुर्द्रोणपुत्रस्य संयुगे । क्षिप्रं रश्मीनथाश्वानां क्षुरप्रैश्चिच्छिदे जयः ॥
tadā prahasya bībhatsurdroṇaputrasya saṃyuge | kṣipraṃ raśmīnathāśvānāṃ kṣurapraiścicchide jayaḥ
तब विजयी बीभत्सु ने हँसकर युद्ध में द्रोणपुत्र के घोड़ों की रासें क्षुरप्र बाणों से तुरन्त काट डालीं।
श्लोक 33 (8.67.33)
प्राद्रवंस्तुरगास्तस्य शरवेगप्रपीडिताः । ततोऽभून्निनदो घोरस्तव सैन्यस्य भारत ॥
prādravaṃsturagāstasya śaravegaprapīḍitāḥ | tato'bhūnninado ghorastava sainyasya bhārata
बाणों के वेग से पीड़ित उसके घोड़े भाग चले; और तब, हे भारत, तुम्हारी सेना में भयंकर कोलाहल मच गया।
श्लोक 34 (8.67.34)
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा तव सैन्यं समाद्रवन् । समन्तान्निशितान्बाणान्विमुञ्चन्तो जयैषिणः ॥
pāṇḍavāstu jayaṃ labdhvā tava sainyaṃ samādravan | samantānniśitānbāṇānvimuñcanto jayaiṣiṇaḥ
विजय पाकर पाण्डव विजय की कामना से चारों ओर तीखे बाण छोड़ते हुए तुम्हारी सेना पर टूट पड़े।
श्लोक 35 (8.67.35)
तावकी चतुरङ्गैषा पाण्डवैस्तु महाचमूः । पुनःपुनरथो वीरैः प्रभग्ना जितकाशिभिः ॥
tāvakī caturaṅgaiṣā pāṇḍavaistu mahācamūḥ | punaḥpunaratho vīraiḥ prabhagnā jitakāśibhiḥ
तुम्हारी यह चतुरंगिणी विशाल सेना विजय के मद में चूर पाण्डव वीरों के द्वारा बार-बार तोड़ी गई।
श्लोक 36 (8.67.36)
पश्यतां ते महाराज पुत्राणां चित्रयोधिनाम् । शकुनेः सौबलेयस्य कर्णस्य च विशाम्पते ॥
paśyatāṃ te mahārāja putrāṇāṃ citrayodhinām | śakuneḥ saubaleyasya karṇasya ca viśāmpate
हे महाराज, हे विशाम्पते, तुम्हारे विचित्र युद्ध करने वाले पुत्रों, सुबलपुत्र शकुनि और कर्ण के देखते-देखते,
श्लोक 37 (8.67.37)
वार्यमाणा महासेना पुत्रैस्तव जनेश्वर । न चातिष्ठत सङ्ग्रामे पीड्यमाना समन्ततः ॥
vāryamāṇā mahāsenā putraistava janeśvara | na cātiṣṭhata saṅgrāme pīḍyamānā samantataḥ
हे जनेश्वर, तुम्हारे पुत्रों के रोकने पर भी वह विशाल सेना चारों ओर से पीटी जाने के कारण युद्ध में नहीं ठहरी।
श्लोक 38 (8.67.38)
ततो योधैर्महाराज पलायद्भिः समन्ततः । अभवद्व्याकुलं भीतं पुत्राणां ते महद्बलम् ॥
tato yodhairmahārāja palāyadbhiḥ samantataḥ | abhavadvyākulaṃ bhītaṃ putrāṇāṃ te mahadbalam
तब हे महाराज, योद्धाओं के चारों ओर भागने से तुम्हारे पुत्रों की वह विशाल सेना भयभीत और व्याकुल हो उठी।
श्लोक 39 (8.67.39)
तिष्ठतिष्ठेति सततं सूतपुत्रस्य जल्पतः । नावतिष्ठति सा सेना वध्यमाना महात्मभिः ॥
tiṣṭhatiṣṭheti satataṃ sūtaputrasya jalpataḥ | nāvatiṣṭhati sā senā vadhyamānā mahātmabhiḥ
सूतपुत्र "ठहरो, ठहरो" कहता ही रहा, फिर भी महात्माओं द्वारा मारी जाती वह सेना नहीं ठहरी।
श्लोक 40 (8.67.40)
अथोत्क्रुष्टं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभिः । धार्तराष्ट्रबलं दृष्ट्वा विद्रुतं वै समन्ततः ॥
athotkruṣṭaṃ mahārāja pāṇḍavairjitakāśibhiḥ | dhārtarāṣṭrabalaṃ dṛṣṭvā vidrutaṃ vai samantataḥ
तब हे महाराज, धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेना को चारों ओर भागते देखकर विजय से उन्मत्त पाण्डवों ने जयघोष किया।
श्लोक 41 (8.67.41)
ततो दुर्योधनः कर्णमब्रवीत्प्रणयादिव । पश्य कर्ण महासेनां पाण्डवैरर्दितां भृशम् ॥
tato duryodhanaḥ karṇamabravītpraṇayādiva | paśya karṇa mahāsenāṃ pāṇḍavairarditāṃ bhṛśam
तब दुर्योधन ने मानो प्रेमवश कर्ण से कहा, "कर्ण, देखो, पाण्डवों ने इस विशाल सेना को कितना सताया है।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 42 (8.67.42)
त्वयि तिष्ठति सन्त्रासात्समन्तात्प्रपलायते । एतज्ज्ञात्वा महाबाहो कुरु प्राप्तमरिन्दम ॥
tvayi tiṣṭhati santrāsātsamantātprapalāyate | etajjñātvā mahābāho kuru prāptamarindama
"तुम्हारे रहते हुए भी यह भय से चारों ओर भाग रही है। हे महाबाहो, हे शत्रुदमन, यह जानकर जो उचित हो वह करो।
श्लोक 43 (8.67.43)
सहस्राणि च योधानां त्वामेव पुरुषोत्तम । क्रोशन्ते समरे वीर द्राव्यमाणानि पाण्डवैः ॥
sahasrāṇi ca yodhānāṃ tvāmeva puruṣottama | krośante samare vīra drāvyamāṇāni pāṇḍavaiḥ
हे पुरुषोत्तम, हे वीर, पाण्डवों से खदेड़े जाते हुए हज़ारों योद्धा युद्ध में केवल तुम्हीं को पुकार रहे हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (8.67.44)
एतच्छ्रुत्वा तु राधेयो दुर्योधनवचो महत् । मद्रराजमिदं वाक्यमब्रवीत्प्रहसन्निव ॥
etacchrutvā tu rādheyo duryodhanavaco mahat | madrarājamidaṃ vākyamabravītprahasanniva
दुर्योधन के ये महान् वचन सुनकर राधापुत्र ने मानो मुस्कराते हुए मद्रराज से यह कहा।
कर्ण उवाच
श्लोक 45 (8.67.45)
पश्य मे भुजयोर्वीर्यमस्त्राणां च जनेश्वर । अद्य हन्मि रणे सर्वान्पाञ्चालान्पाण्डुभिः सह ॥
paśya me bhujayorvīryamastrāṇāṃ ca janeśvara | adya hanmi raṇe sarvānpāñcālānpāṇḍubhiḥ saha
"हे जनेश्वर, मेरी भुजाओं और अस्त्रों का बल देखो! आज मैं रण में पाञ्चालों को पाण्डवों सहित मार डालूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 46 (8.67.46)
वाहयाश्वान्नरव्याघ्र मद्राधिप न संशयः । एवमुक्त्वा महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् ॥
vāhayāśvānnaravyāghra madrādhipa na saṃśayaḥ | evamuktvā mahārāja sūtaputraḥ pratāpavān
हे नरव्याघ्र, हे मद्रराज, घोड़े हाँको, इसमें संदेह नहीं।" ऐसा कहकर, हे महाराज, प्रतापी सूतपुत्र ने
श्लोक 47 (8.67.47)
प्रगृह्य विजयं वीरो धनुःश्रेष्ठं पुरातनम् । सज्यं कृत्वा महाराज सम्मृज्य च पुनः पुनः ॥
pragṛhya vijayaṃ vīro dhanuḥśreṣṭhaṃ purātanam | sajyaṃ kṛtvā mahārāja sammṛjya ca punaḥ punaḥ
उस वीर ने, हे महाराज, अपना पुराना श्रेष्ठ धनुष विजय उठाकर, उस पर डोरी चढ़ाकर और बार-बार पोंछकर
श्लोक 48 (8.67.48)
सन्निवार्य च तान्योधान्सत्येन शपथेन च । प्रायोजयदमेयात्मा भार्गवास्त्रं महाबलः ॥
sannivārya ca tānyodhānsatyena śapathena ca | prāyojayadameyātmā bhārgavāstraṃ mahābalaḥ
और अपने योद्धाओं को प्रतिज्ञा तथा सत्य की शपथ से रोककर उस अमेयात्मा महाबली ने भार्गवास्त्र का प्रयोग किया।
श्लोक 49 (8.67.49)
तस्माद्राजन्सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोटिशश्च शरास्तीक्ष्णा निरगच्छन्महामृधे ॥
tasmādrājansahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | koṭiśaśca śarāstīkṣṇā niragacchanmahāmṛdhe
हे राजन्, उससे उस महायुद्ध में हज़ारों, लाखों, करोड़ों और अरबों तीखे बाण निकल पड़े।
श्लोक 50 (8.67.50)
ज्वलितैस्तैः शरैर्घोरैः कङ्कबर्हिणवाजितैः । सञ्छन्ना पाण्डवी सेना न प्राज्ञायत किञ्चन ॥
jvalitaistaiḥ śarairghoraiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ | sañchannā pāṇḍavī senā na prājñāyata kiñcana
बगुले और मोर के पंखों वाले उन जलते हुए भयंकर बाणों से ढकी हुई पाण्डवों की सेना को कुछ भी नहीं सूझता था।
श्लोक 51 (8.67.51)
हाहाकारो महानासीत्पाण्डवानां विशाम्पते । पीडितानां बलवता भार्गवास्त्रेण संयुगे ॥
hāhākāro mahānāsītpāṇḍavānāṃ viśāmpate | pīḍitānāṃ balavatā bhārgavāstreṇa saṃyuge
हे विशाम्पते, भार्गवास्त्र से युद्ध में पीड़ित पाण्डवों में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 52 (8.67.52)
निपतद्भिर्गजै राजन्नश्वैश्चापि सहस्रशः । रथैश्चापि नरव्याघ्र नरैश्चैव समन्ततः ॥
nipatadbhirgajai rājannaśvaiścāpi sahasraśaḥ | rathaiścāpi naravyāghra naraiścaiva samantataḥ
हे राजन्, हाथी हज़ारों की संख्या में गिर रहे थे, घोड़े भी, हे नरव्याघ्र रथ भी, और चारों ओर मनुष्य भी।
श्लोक 53 (8.67.53)
प्राकम्पत मही राजन्निहतैस्तैः समन्ततः । व्याकुलं सर्वमभवत्पाण्डवानां महद्बलम् ॥
prākampata mahī rājannihataistaiḥ samantataḥ | vyākulaṃ sarvamabhavatpāṇḍavānāṃ mahadbalam
हे राजन्, चारों ओर मारे गए लोगों से पृथ्वी काँप उठी और पाण्डवों की पूरी विशाल सेना व्याकुल हो गई।
श्लोक 54 (8.67.54)
कर्णस्त्वेको युधां श्रेष्ठो विधूम इव पावकः । दहञ्शत्रून्नरव्याघ्रः शुशुभे स परन्तपः ॥
karṇastveko yudhāṃ śreṣṭho vidhūma iva pāvakaḥ | dahañśatrūnnaravyāghraḥ śuśubhe sa parantapaḥ
योद्धाओं में श्रेष्ठ कर्ण अकेला ही धुआँरहित अग्नि की भाँति शत्रुओं को जलाता हुआ शोभित हो रहा था, वह नरव्याघ्र शत्रुतापन।
श्लोक 55 (8.67.55)
ते वध्यमानाः कर्णेन पाञ्चालाश्चेदिभिः सह । तत्र तत्र व्यमुह्यन्त वनदाहे यथा द्विपाः ॥
te vadhyamānāḥ karṇena pāñcālāścedibhiḥ saha | tatra tatra vyamuhyanta vanadāhe yathā dvipāḥ
कर्ण के हाथों मारे जाते हुए पाञ्चाल और चेदि दावानल में फँसे हाथियों की भाँति जहाँ-तहाँ घबरा उठे।
श्लोक 56 (8.67.56)
चुक्रुशुश्च नरव्याघ्र यथाप्राणं नरोत्तमाः । तेषां तु क्रोशतां दीनं भीतानां रणमूर्धनि ॥
cukruśuśca naravyāghra yathāprāṇaṃ narottamāḥ | teṣāṃ tu krośatāṃ dīnaṃ bhītānāṃ raṇamūrdhani
हे नरव्याघ्र, वे श्रेष्ठ पुरुष पूरे प्राणबल से चिल्ला उठे; और रण के अग्रभाग में भयभीत होकर वे दीन स्वर में चीख रहे थे,
श्लोक 57 (8.67.57)
धावतां च ततो राजंस्त्रस्तानां च समन्ततः । आर्तनादो महांस्तत्र प्रेतानामिव सम्प्लवे ॥
dhāvatāṃ ca tato rājaṃstrastānāṃ ca samantataḥ | ārtanādo mahāṃstatra pretānāmiva samplave
और हे राजन्, भयभीत होकर चारों ओर भागते हुए उनका वहाँ बड़ा आर्तनाद उठा, जैसे प्रलय-जल में प्रेतों का होता है।
श्लोक 58 (8.67.58)
वध्यमानांस्तु तान्दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । वित्रेसुः सर्वभूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥
vadhyamānāṃstu tāndṛṣṭvā sūtaputreṇa māriṣa | vitresuḥ sarvabhūtāni tiryagyonigatānyapi
हे मान्यवर, सूतपुत्र के हाथों उन्हें मरते देखकर सब प्राणी, यहाँ तक कि पशु-पक्षी की योनि में पैदा हुए भी, काँप उठे।
श्लोक 59 (8.67.59)
ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः । अर्जुनं वासुदेवं च क्रोशन्ति च मुहुर्मुहुः । प्रेतराजपुरे यद्वत्प्रेतराजं विचेतसः ॥
te vadhyamānāḥ samare sūtaputreṇa sṛñjayāḥ | arjunaṃ vāsudevaṃ ca krośanti ca muhurmuhuḥ | pretarājapure yadvatpretarājaṃ vicetasaḥ
रण में सूतपुत्र के हाथों मारे जाते हुए सृञ्जय अचेत होकर बार-बार अर्जुन और वासुदेव को पुकारने लगे, जैसे प्रेतराज के नगर में प्रेत अचेत होकर प्रेतराज को पुकारते हैं।
श्लोक 60 (8.67.60)
श्रुत्वा तु निनदं तेषां वध्यतां कर्णसायकैः । अथाब्रवीद्वासुदेवं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । भार्गवास्त्रं महाघोरं दृष्ट्वा तत्र समीरितम् ॥
śrutvā tu ninadaṃ teṣāṃ vadhyatāṃ karṇasāyakaiḥ | athābravīdvāsudevaṃ kuntīputro dhanañjayaḥ | bhārgavāstraṃ mahāghoraṃ dṛṣṭvā tatra samīritam
कर्ण के बाणों से मारे जाते हुए उन लोगों की चीख सुनकर और वहाँ चलाए गए भयंकर भार्गवास्त्र को देखकर कुन्तीपुत्र धनंजय ने वासुदेव से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 61 (8.67.61)
पश्य कृष्ण महाबाहो भार्गवास्त्रस्य विक्रमम् । नैतदस्त्रं हि समरे शक्यं हन्तुं कथञ्चन ॥
paśya kṛṣṇa mahābāho bhārgavāstrasya vikramam | naitadastraṃ hi samare śakyaṃ hantuṃ kathañcana
"हे महाबाहो कृष्ण, भार्गवास्त्र का पराक्रम देखो! इस अस्त्र को युद्ध में किसी भी उपाय से नष्ट नहीं किया जा सकता।
श्लोक 62 (8.67.62)
सूतपुत्रं च संरब्धं पश्य कृष्ण महारणे । अन्तकप्रतिमं वीर्ये कुर्वाणं कर्म दारुणम् ॥
sūtaputraṃ ca saṃrabdhaṃ paśya kṛṣṇa mahāraṇe | antakapratimaṃ vīrye kurvāṇaṃ karma dāruṇam
और कृष्ण, महायुद्ध में उस क्रुद्ध सूतपुत्र को भी देखो, जो पराक्रम में यम के समान है और भयंकर कर्म कर रहा है।
श्लोक 63 (8.67.63)
अभीक्ष्णं चोदयन्नश्वान्प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः । नच शक्ष्यामि कर्णस्य संयुगेऽहं पलायितुम् ॥
abhīkṣṇaṃ codayannaśvānprekṣate māṃ muhurmuhuḥ | naca śakṣyāmi karṇasya saṃyuge'haṃ palāyitum
वह घोड़ों को बराबर हाँकता हुआ बार-बार मेरी ओर देख रहा है। और मैं रण में कर्ण के सामने से भाग नहीं सकूँगा।
श्लोक 64 (8.67.64)
जीवन्प्राप्नोति पुरुषः सङ्ख्ये जयपराजयौ । मृतस्य तु हृषीकेश भङ्ग एव कुतो जयः ॥
jīvanprāpnoti puruṣaḥ saṅkhye jayaparājayau | mṛtasya tu hṛṣīkeśa bhaṅga eva kuto jayaḥ
जीवित रहने पर पुरुष युद्ध में जय या पराजय पाता है; पर हे हृषीकेश, मरे हुए की तो हार ही होती है, उसे विजय कहाँ से?
श्लोक 65 (8.67.65)
एष कर्णो रणे भाति मध्याह्न इव भास्करः । निवर्तय रथं कृष्ण जीवन्भद्राणि पश्यति ॥
eṣa karṇo raṇe bhāti madhyāhna iva bhāskaraḥ | nivartaya rathaṃ kṛṣṇa jīvanbhadrāṇi paśyati
वह कर्ण रण में मध्याह्न के सूर्य के समान चमक रहा है। कृष्ण, रथ लौटा लो; जो जीवित रहता है वही कल्याण देखता है।"