कर्ण पर्व · अध्याय 69
कर्ण के विषय में युधिष्ठिर के अर्जुन से प्रश्न
कृष्ण और अर्जुन रक्त से सने हुए युद्ध से लौटते हैं, और कर्ण को मरा समझकर युधिष्ठिर उनका स्वागत करते हुए कर्ण के पराक्रम का वर्णन करते हैं। फिर वे बताते हैं कि आज कर्ण ने उन्हें कैसे हराया और अपमानित किया, तेरह वर्षों से कर्ण के भय ने कैसे उनकी नींद छीन रखी है, और अर्जुन से पूछते हैं कि कर्ण कैसे मारा गया। इसके बाद वे कर्ण की एक-एक डींग और एक-एक अपमान-भरी बात का नाम लेकर पूछते चलते हैं कि क्या अब वह सब शान्त कर दिया गया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.69.1)
अथोपयातौ पृथुलोहिताक्षौ । शराचिताङ्गौ रुधिरप्रदिग्धौ । समीक्ष्य सेनाग्रनरप्रवीरौ । युधिष्ठिरो वाक्यमिदं बभाषे ॥
athopayātau pṛthulohitākṣau | śarācitāṅgau rudhirapradigdhau | samīkṣya senāgranarapravīrau | yudhiṣṭhiro vākyamidaṃ babhāṣe
सेना के आगे चलने वाले उन दोनों श्रेष्ठ वीरों को लौटा हुआ देखकर, जिनकी आँखें विशाल और लाल थीं और जिनके अंग बाणों से बिंधे तथा रक्त से लथपथ थे, युधिष्ठिर ने यह बात कही।
श्लोक 2 (8.69.2)
ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ । हतमाधिरथिं मेने सङ्ख्ये गाण्डीवधन्वना ॥
tato yudhiṣṭhiro dṛṣṭvā sahitau keśavārjunau | hatamādhirathiṃ mene saṅkhye gāṇḍīvadhanvanā
तब केशव और अर्जुन को साथ आया देखकर युधिष्ठिर ने समझ लिया कि गाण्डीवधारी अर्जुन ने रण में अधिरथ-पुत्र कर्ण को मार डाला है।
श्लोक 3 (8.69.3)
तावभ्यनन्दत्कौन्तेयः साम्ना परमवल्गुना । स्मितपूर्वममित्रघ्न पूजयन्भरतर्षभ ॥
tāvabhyanandatkaunteyaḥ sāmnā paramavalgunā | smitapūrvamamitraghna pūjayanbharatarṣabha
कुन्तीपुत्र ने मुस्कराते हुए अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी में उन दोनों का सत्कार करके उनका स्वागत किया, हे शत्रुओं का नाश करने वाले भरतश्रेष्ठ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (8.69.4)
स्वागतं देवकीपुत्र स्वागतं ते धनञ्जय । प्रियं मे दर्शनं वाढं युवयोर्नरसिंहयोः ॥
svāgataṃ devakīputra svāgataṃ te dhanañjaya | priyaṃ me darśanaṃ vāḍhaṃ yuvayornarasiṃhayoḥ
हे देवकीपुत्र, तुम्हारा स्वागत है; हे धनञ्जय, तुम्हारा भी स्वागत है। नरों में सिंह-रूप तुम दोनों का दर्शन मुझे सचमुच प्रिय है।
श्लोक 5 (8.69.5)
अरिष्टयोरक्षतयोः कर्णं हत्वा महारथम् । आशीविषसमं युद्धे सर्वशस्त्रविशारदम् ॥
ariṣṭayorakṣatayoḥ karṇaṃ hatvā mahāratham | āśīviṣasamaṃ yuddhe sarvaśastraviśāradam
तुम दोनों सकुशल और अक्षत लौटे हो, उस महारथी कर्ण को मारकर, जो युद्ध में विषैले सर्प के समान था और सब शस्त्रों में निपुण था;
श्लोक 6 (8.69.6)
अग्रगं धार्तराष्ट्राणां सर्वेषां शर्म वर्म च । रक्षितं वृषसेनेन सुषेणेन च धन्विना ॥
agragaṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ sarveṣāṃ śarma varma ca | rakṣitaṃ vṛṣasenena suṣeṇena ca dhanvinā
जो सब धृतराष्ट्र-पुत्रों का अग्रगामी तथा उनका कवच और रक्षक था, और जिसकी रक्षा वृषसेन और धनुर्धर सुषेण करते थे;
श्लोक 7 (8.69.7)
अनुज्ञातं महावीर्यं रामेणास्त्रे सुदुर्जयम् । अग्र्यं सर्वस्य लोकस्य रथिनं लोकविश्रुतम् ॥
anujñātaṃ mahāvīryaṃ rāmeṇāstre sudurjayam | agryaṃ sarvasya lokasya rathinaṃ lokaviśrutam
जिसे अस्त्र-विद्या में राम की अनुमति मिली थी और जो उसमें अत्यन्त दुर्जय था, महाबली, सारे संसार में अग्रगण्य और लोक-विख्यात रथी था;
श्लोक 8 (8.69.8)
त्रातारं धार्तराष्ट्राणां गन्तारं वाहिनीमुखे । हन्तारं परसैन्यानाममित्रगणमर्दनम् ॥
trātāraṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ gantāraṃ vāhinīmukhe | hantāraṃ parasainyānāmamitragaṇamardanam
जो धृतराष्ट्र-पुत्रों का रक्षक था, सेना के अग्रभाग में चलता था, शत्रु-सेनाओं का संहारक और शत्रुओं के दलों को कुचलने वाला था;
श्लोक 9 (8.69.9)
दुर्योधनहिते युक्तमस्मद्दुःखाय चोद्यतम् । अप्रधृष्यं महायुद्धे देवैरपि सवासवैः ॥
duryodhanahite yuktamasmadduḥkhāya codyatam | apradhṛṣyaṃ mahāyuddhe devairapi savāsavaiḥ
जो दुर्योधन के हित में लगा रहता और हमें दुःख देने को सदा उद्यत रहता था, तथा इन्द्र-सहित देवताओं से भी महायुद्ध में जिसे दबाया नहीं जा सकता था;
श्लोक 10 (8.69.10)
अनलानिलयोस्तुल्यं तेजसा च बलेन च । पातालमिव गम्भीरं सुहृदां नन्दिवर्धनम् ॥
analānilayostulyaṃ tejasā ca balena ca | pātālamiva gambhīraṃ suhṛdāṃ nandivardhanam
जो तेज और बल में अग्नि और वायु के समान था, पाताल की तरह गहरा था और मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाला था —
श्लोक 11 (8.69.11)
अन्तकं मम मित्राणां हत्वा कर्णं महामृधे । दिष्ट्या युवामनुप्राप्तौ हत्वाऽसुरमिवामरौ ॥
antakaṃ mama mitrāṇāṃ hatvā karṇaṃ mahāmṛdhe | diṣṭyā yuvāmanuprāptau hatvā'suramivāmarau
मेरे मित्रों के लिए यमरूप उस कर्ण को महायुद्ध में मारकर, सौभाग्य से तुम दोनों लौट आए हो, जैसे असुर को मारकर दो देवता लौटते हैं।
श्लोक 12 (8.69.12)
तेन युद्धमभीतेन मयाऽद्याप्यच्युतार्जुनौ । कृतं घोरं महाबाहू धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः । अन्तकेनेव क्रुद्धेन प्रजाः सर्वा जिघांसता ॥
tena yuddhamabhītena mayā'dyāpyacyutārjunau | kṛtaṃ ghoraṃ mahābāhū dhṛṣṭadyumnasya paśyataḥ | antakeneva kruddhena prajāḥ sarvā jighāṃsatā
हे अच्युत और अर्जुन, हे महाबाहुओ! आज मैंने धृष्टद्युम्न के देखते-देखते उस निर्भय वीर के साथ भयंकर युद्ध किया, जो क्रुद्ध यमराज की भाँति सब प्राणियों का संहार करना चाहता था।
श्लोक 13 (8.69.13)
तेन केतुश्च मे च्छिन्नो हतौ च पार्ष्णिसारथी । हतवाहः कृतश्चास्मि युयुधानस्य पश्यतः ॥
tena ketuśca me cchinno hatau ca pārṣṇisārathī | hatavāhaḥ kṛtaścāsmi yuyudhānasya paśyataḥ
उसने मेरी ध्वजा काट डाली, मेरे पार्ष्णि-रक्षक और सारथी को मार गिराया, और सात्यकि के देखते-देखते मुझे घोड़ों से हीन कर दिया —
श्लोक 14 (8.69.14)
धृष्टद्युम्नस्य यमयोर्वीरस्य च शिखण्डिनः । पश्यतां द्रौपदेयानां शतद्रोश्च महात्मनः ॥
dhṛṣṭadyumnasya yamayorvīrasya ca śikhaṇḍinaḥ | paśyatāṃ draupadeyānāṃ śatadrośca mahātmanaḥ
और धृष्टद्युम्न, दोनों जुड़वाँ भाइयों, वीर शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्रों और महात्मा शतद्रु के देखते-देखते।
श्लोक 15 (8.69.15)
एताञ्जित्वा महावीर्यः कर्णः शत्रुगणान्बहून् । जितवान्मां महाबाहो यतमानो महारणे ॥
etāñjitvā mahāvīryaḥ karṇaḥ śatrugaṇānbahūn | jitavānmāṃ mahābāho yatamāno mahāraṇe
इन सबको और शत्रुओं के बहुत-से दलों को जीतकर महापराक्रमी कर्ण ने, हे महाबाहो, उस महासमर में यत्न करते हुए मुझे भी जीत लिया।
श्लोक 16 (8.69.16)
अनुसृत्य च मां युद्धे परुषाण्युक्तवान्बहु । तत्र तत्र युधां श्रेष्ठ परिभूय न संशयः ॥
anusṛtya ca māṃ yuddhe paruṣāṇyuktavānbahu | tatra tatra yudhāṃ śreṣṭha paribhūya na saṃśayaḥ
और युद्ध में मेरा पीछा करके उसने बार-बार मुझे बहुत-से कठोर वचन कहे; हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, उसने जगह-जगह मेरा अपमान किया, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 17 (8.69.17)
भीमसेनप्रभावात्तु यज्जीवामि धनञ्जय । बहुनात्र किमुक्तेन हते सोढुं समुत्सहे ॥
bhīmasenaprabhāvāttu yajjīvāmi dhanañjaya | bahunātra kimuktena hate soḍhuṃ samutsahe
हे धनञ्जय! भीमसेन के प्रताप से ही मैं जीवित हूँ। अधिक कहने से क्या—जब वह मारा जाएगा, तभी मैं इसे सह सकूँगा।
श्लोक 18 (8.69.18)
त्रयोदशाहं वर्षाणि यस्माद्भीतो धनञ्जय । न स्म निद्रां लभे रात्रौ न चाहनि सुखं क्वचित् ॥
trayodaśāhaṃ varṣāṇi yasmādbhīto dhanañjaya | na sma nidrāṃ labhe rātrau na cāhani sukhaṃ kvacit
हे धनञ्जय! जिससे डरकर मैं तेरह वर्षों से न रात को नींद पाता हूँ और न दिन में कभी सुख पाता हूँ,—
श्लोक 19 (8.69.19)
तस्य द्वेषेण संयुक्तः परिदह्ये धनञ्जय । आत्मनो मरणं जानन्वाध्रीणस इव द्विजः ॥
tasya dveṣeṇa saṃyuktaḥ paridahye dhanañjaya | ātmano maraṇaṃ jānanvādhrīṇasa iva dvijaḥ
उसी के प्रति द्वेष से भरा हुआ मैं जलता रहता हूँ, हे धनञ्जय, अपनी मृत्यु को जानते हुए वाध्रीणस पक्षी की तरह।
श्लोक 20 (8.69.20)
तस्यायमगमत्कालश्चिन्तयानस्य मे चिरम् । कथं कर्णो मया शक्यो युद्धे क्षपयितुं भवेत् ॥
tasyāyamagamatkālaścintayānasya me ciram | kathaṃ karṇo mayā śakyo yuddhe kṣapayituṃ bhavet
यह लम्बा समय मेरा यही सोचते-सोचते बीत गया कि युद्ध में मैं कर्ण का नाश कैसे कर सकूँगा।
श्लोक 21 (8.69.21)
जाग्रत्स्वपंश्च कौन्तेय कर्णमेव स्मराम्यहम् । पश्यामि तत्रतत्रैव कर्णभूतमिदं जगत् ॥
jāgratsvapaṃśca kaunteya karṇameva smarāmyaham | paśyāmi tatratatraiva karṇabhūtamidaṃ jagat
हे कौन्तेय! जागते और सोते मैं कर्ण का ही स्मरण करता हूँ; जहाँ-तहाँ मुझे यह सारा जगत् कर्णमय ही दिखाई देता है।
श्लोक 22 (8.69.22)
यत्र यत्र हि गच्छामि कर्णाद्भीतो धनञ्जय । तत्र तत्र हि पश्यामि कर्णमेवाग्रतः स्थितम् ॥
yatra yatra hi gacchāmi karṇādbhīto dhanañjaya | tatra tatra hi paśyāmi karṇamevāgrataḥ sthitam
हे धनञ्जय! कर्ण से डरा हुआ मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ कर्ण को ही अपने सामने खड़ा देखता हूँ।
श्लोक 23 (8.69.23)
सोऽहं तेनैव वीरेण समरेष्वपलायिना । सहयः सरथः पार्थ जित्वा जीवन्विसर्जितः ॥
so'haṃ tenaiva vīreṇa samareṣvapalāyinā | sahayaḥ sarathaḥ pārtha jitvā jīvanvisarjitaḥ
हे पार्थ! रण से कभी न भागने वाले उसी वीर ने घोड़ों और रथ-सहित मुझे जीतकर जीवित छोड़ दिया।
श्लोक 24 (8.69.24)
को नु मे जीवितेनार्थो राज्येनार्थो भवेत्पुनः । ममैवं विक्षतस्याद्य कर्णेनाहवशोभिना ॥
ko nu me jīvitenārtho rājyenārtho bhavetpunaḥ | mamaivaṃ vikṣatasyādya karṇenāhavaśobhinā
रणभूमि की शोभा उस कर्ण से आज इस तरह घायल किए गए मुझे जीवन से क्या प्रयोजन, और फिर राज्य से भी क्या प्रयोजन?
श्लोक 25 (8.69.25)
न प्राप्तपूर्वं यद्भीष्मात्कृपाद्द्रोणाच्च संयुगे । तत्प्राप्तमद्य मे युद्धे सूतपुत्रान्महारथात् ॥
na prāptapūrvaṃ yadbhīṣmātkṛpāddroṇācca saṃyuge | tatprāptamadya me yuddhe sūtaputrānmahārathāt
जो अपमान मुझे पहले कभी युद्ध में भीष्म, कृप या द्रोण से नहीं मिला था, वही आज मुझे महारथी सूतपुत्र से मिला है।
श्लोक 26 (8.69.26)
स त्वां पृच्छामि कौन्तेय यथा न कुशलस्तथा । तन्ममाचक्ष्व कार्त्स्न्येन यथा कर्णो हतस्त्वया ॥
sa tvāṃ pṛcchāmi kaunteya yathā na kuśalastathā | tanmamācakṣva kārtsnyena yathā karṇo hatastvayā
इसलिए हे कौन्तेय, मैं तुमसे पूछता हूँ—मेरा मन ठीक नहीं है—मुझे पूरा-पूरा बताओ कि तुमने कर्ण को कैसे मारा।
श्लोक 27 (8.69.27)
शक्रतुल्यबलो युद्धे यमतुल्यः पराक्रमे । रामतुल्यस्तथास्त्रेषु स कथं ते निषूदितः ॥
śakratulyabalo yuddhe yamatulyaḥ parākrame | rāmatulyastathāstreṣu sa kathaṃ te niṣūditaḥ
जो युद्ध में बल में इन्द्र के समान, पराक्रम में यम के समान और अस्त्र-विद्या में राम के समान था, उसे तुमने कैसे मार गिराया?
श्लोक 28 (8.69.28)
महारथसमाख्यातः सर्वयुद्धविशारदः । धनुर्धराणां प्रवरः सर्वेषां वै सदार्जुन ॥
mahārathasamākhyātaḥ sarvayuddhaviśāradaḥ | dhanurdharāṇāṃ pravaraḥ sarveṣāṃ vai sadārjuna
जो महारथी कहा जाता था, सब युद्धों में निपुण था और हे अर्जुन, सदा सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ था —
श्लोक 29 (8.69.29)
पूजितो धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण विशाम्पते । त्वदर्थमेव राधेयः स कथं निहतस्त्वया ॥
pūjito dhṛtarāṣṭreṇa saputreṇa viśāmpate | tvadarthameva rādheyaḥ sa kathaṃ nihatastvayā
हे राजन्, जिसका धृतराष्ट्र ने पुत्रों-सहित सम्मान किया था, और जो राधापुत्र केवल तुम्हारे ही लिए तैयार था—वह तुम्हारे हाथों कैसे मारा गया?
श्लोक 30 (8.69.30)
धार्तराष्ट्रस्य योद्धारः सर्व एव सदार्जुन । तव मृत्युं रणे कर्णं मन्यन्ते पुरुषर्षभ ॥
dhārtarāṣṭrasya yoddhāraḥ sarva eva sadārjuna | tava mṛtyuṃ raṇe karṇaṃ manyante puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! धृतराष्ट्र-पुत्र के सभी योद्धा सदा यही मानते थे कि रण में कर्ण ही तुम्हारी मृत्यु है।
श्लोक 31 (8.69.31)
स त्वया पुरुषव्याघ्र कथं युद्धे निषूदितः । तन्ममाचक्ष्व कौन्तेय यथा कर्णो हतस्त्वया ॥
sa tvayā puruṣavyāghra kathaṃ yuddhe niṣūditaḥ | tanmamācakṣva kaunteya yathā karṇo hatastvayā
हे पुरुषव्याघ्र! वह तुम्हारे हाथों युद्ध में कैसे मारा गया? हे कौन्तेय, मुझे वैसा ही बताओ जैसे तुमने कर्ण को मारा।
श्लोक 32 (8.69.32)
सोत्सेधमस्य च शिरः पश्यतां सुहृदां हृतम् । त्वया पुरुषशार्दूल सिंहेनेव यथा रुरोः ॥
sotsedhamasya ca śiraḥ paśyatāṃ suhṛdāṃ hṛtam | tvayā puruṣaśārdūla siṃheneva yathā ruroḥ
हे पुरुषशार्दूल! उसका ऊँचा उठा हुआ मस्तक तुमने मित्रों के देखते-देखते वैसे ही काट गिराया, जैसे सिंह रुरु मृग का सिर काट डालता है।
श्लोक 33 (8.69.33)
सर्वा दिशः पर्यपतत्त्वदर्थं । त्वां सूतपुत्रः समरे परीप्सन् । दित्सन्नृणां शकटं रत्नपूर्णं । कथं त्वयासौ निहतोऽद्य कर्णः ॥
sarvā diśaḥ paryapatattvadarthaṃ | tvāṃ sūtaputraḥ samare parīpsan | ditsannṛṇāṃ śakaṭaṃ ratnapūrṇaṃ | kathaṃ tvayāsau nihato'dya karṇaḥ
तुम्हारे कारण सब दिशाओं में दौड़ता हुआ, रण में तुम्हें पा लेने की इच्छा रखने वाला वह सूतपुत्र लोगों को रत्नों से भरी गाड़ी देना चाहता था—फिर आज वह कर्ण तुम्हारे हाथों कैसे मारा गया?
श्लोक 34 (8.69.34)
त्वया रणे निहतः सूतपुत्रः । कच्चिच्छेते भूमितले दुरात्मा । कच्चित्कृतं मे परमं त्वयाद्य । प्रियं रणे सूतपुत्रं निहत्य ॥
tvayā raṇe nihataḥ sūtaputraḥ | kaccicchete bhūmitale durātmā | kaccitkṛtaṃ me paramaṃ tvayādya | priyaṃ raṇe sūtaputraṃ nihatya
क्या रण में सूतपुत्र तुम्हारे हाथों मारा गया? क्या वह दुरात्मा धरती पर पड़ा है? क्या रण में सूतपुत्र को मारकर तुमने आज मेरा सबसे बड़ा प्रिय कार्य कर दिया?
श्लोक 35 (8.69.35)
सर्वा दिशः पर्यपतत्त्वदर्थं । मुदान्वितो गर्वितः सूतपुत्रः । स शूरमानी समरे समेत्य । कच्चित्त्वया निहतः सूतपुत्रः ॥
sarvā diśaḥ paryapatattvadarthaṃ | mudānvito garvitaḥ sūtaputraḥ | sa śūramānī samare sametya | kaccittvayā nihataḥ sūtaputraḥ
जो सूतपुत्र तुम्हारे कारण हर ओर दौड़ता फिरता था, हर्ष और गर्व से भरा, अपने को शूर माननेवाला—क्या वह रण में तुमसे भिड़कर तुम्हारे हाथों मारा गया?
श्लोक 36 (8.69.36)
राज्यं परं हस्तिगवाश्वयुक्तं । रथं दित्सुर्यः परेभ्यस्त्वदर्थे । त्वया रणे स्पर्धते यः स पापः । कच्चित्त्वया निहतः पापबुद्धिः ॥
rājyaṃ paraṃ hastigavāśvayuktaṃ | rathaṃ ditsuryaḥ parebhyastvadarthe | tvayā raṇe spardhate yaḥ sa pāpaḥ | kaccittvayā nihataḥ pāpabuddhiḥ
जो तुम्हारे कारण दूसरों को हाथी, गायें और घोड़ों से भरा श्रेष्ठ राज्य और रथ देने को तैयार था, जो रण में तुमसे होड़ करता है, वह पापी, पापबुद्धि क्या तुम्हारे हाथों मारा गया?
श्लोक 37 (8.69.37)
योऽसौ नित्यं शौर्यमदेन मत्तो । विकत्थते संसदि कौरवाणाम् । प्रीत्यर्थं वै तात सुयोधनस्य । कच्चित्स पापो निहतस्त्वयाद्य ॥
yo'sau nityaṃ śauryamadena matto | vikatthate saṃsadi kauravāṇām | prītyarthaṃ vai tāta suyodhanasya | kaccitsa pāpo nihatastvayādya
जो शौर्य के मद में चूर होकर सदा कौरवों की सभा में डींग हाँकता है—हे तात, सुयोधन को प्रसन्न करने के लिए—क्या वह पापी आज तुम्हारे हाथों मारा गया?
श्लोक 38 (8.69.38)
कच्चित्समागम्य धनुःप्रमुक्तैः । त्वत्प्रेषितैर्लोहमयैर्विहंगैः । शेते भिन्नः पांसुषु सूतपुत्रः । कच्चिद्भग्नौ धार्तराष्ट्रस्य बाहू ॥
kaccitsamāgamya dhanuḥpramuktaiḥ | tvatpreṣitairlohamayairvihaṃgaiḥ | śete bhinnaḥ pāṃsuṣu sūtaputraḥ | kaccidbhagnau dhārtarāṣṭrasya bāhū
क्या तुम्हारे धनुष से छूटे, तुम्हारे भेजे हुए लोहे के पक्षी-रूप बाणों से मिलकर वह सूतपुत्र बिंधा हुआ धूल में पड़ा है? क्या धृतराष्ट्र-पुत्र की दोनों भुजाएँ टूट गई हैं?
श्लोक 39 (8.69.39)
योऽसौ सदा श्लाघते राजमध्ये । दुर्योधनं हर्षयन्दर्पयुक्तः । हन्ताऽस्मि सर्वानिति पाण्डुपुत्रान् । अहं हन्ता फल्गुनस्येति मोहात् ॥
yo'sau sadā ślāghate rājamadhye | duryodhanaṃ harṣayandarpayuktaḥ | hantā'smi sarvāniti pāṇḍuputrān | ahaṃ hantā phalgunasyeti mohāt
जो अहंकार से भरा हुआ राजाओं के बीच दुर्योधन को हर्षित करता हुआ सदा डींग मारता है—'मैं सब पाण्डवों को मारूँगा, मैं फल्गुन का वध करने वाला हूँ'—मोहवश ऐसा कहता हुआ:
श्लोक 40 (8.69.40)
कच्चिद्वचोऽस्य वितथं त्वया कृतं । यत्तत्प्रियामवदत्तात कर्णः । सभामध्ये रूक्षमनेकरूपं । धिक्पाण्डवानपतिस्त्वं हि कृष्णे ॥
kaccidvaco'sya vitathaṃ tvayā kṛtaṃ | yattatpriyāmavadattāta karṇaḥ | sabhāmadhye rūkṣamanekarūpaṃ | dhikpāṇḍavānapatistvaṃ hi kṛṣṇe
हे तात, क्या तुमने उसके वे वचन झूठे कर दिए, जो कर्ण ने प्रिय द्रौपदी से सभा के बीच कठोर और नाना प्रकार के कहे थे—'पाण्डवों को धिक्कार है! कृष्णे, तू तो पतिहीन है'?
श्लोक 41 (8.69.41)
कच्चिद्ध्रुवं शत्रुरयं महात्मा । ह्यधारयद्द्वादश यः समास्तु । कर्णो व्रतं घोरममित्रसाहो । दुर्योधनस्यार्थनिविष्टबुद्धिः ॥
kacciddhruvaṃ śatrurayaṃ mahātmā | hyadhārayaddvādaśa yaḥ samāstu | karṇo vrataṃ ghoramamitrasāho | duryodhanasyārthaniviṣṭabuddhiḥ
क्या यह निश्चित है कि यह महान् शत्रु कर्ण, जिसने बारह वर्षों तक घोर व्रत धारण किया, जो शत्रुओं का सामना सह लेता था और दुर्योधन के प्रयोजन में मन लगाए रहता था —
श्लोक 42 (8.69.42)
पादौ न धावे यावदहं न हन्मि । धनञ्जयं समरेषूग्रवेगम् । कच्चिद्रणे फल्गुन तं निहत्य । कच्चिद्व्रतं तस्य भग्नं त्वयाऽद्य ॥
pādau na dhāve yāvadahaṃ na hanmi | dhanañjayaṃ samareṣūgravegam | kaccidraṇe phalguna taṃ nihatya | kaccidvrataṃ tasya bhagnaṃ tvayā'dya
'जब तक मैं रणों में उग्र वेग वाले धनञ्जय को न मार लूँ, तब तक पैर नहीं धोऊँगा'—हे फल्गुन, क्या आज तुमने रण में उसे मारकर उसका वह व्रत भंग कर दिया?
श्लोक 43 (8.69.43)
योऽसौ कृष्णामब्रवीद्दुष्टबुद्धिः । कर्णः सभायां कुरुवीरमध्ये । किं पाण्डवांस्त्वं न जहासि कृष्णे । सुदुर्बलान्पतितान्हीनसत्वान् ॥
yo'sau kṛṣṇāmabravīdduṣṭabuddhiḥ | karṇaḥ sabhāyāṃ kuruvīramadhye | kiṃ pāṇḍavāṃstvaṃ na jahāsi kṛṣṇe | sudurbalānpatitānhīnasatvān
जिस दुष्टबुद्धि कर्ण ने कुरुवीरों के बीच सभा में कृष्णा से कहा था—'कृष्णे, तू इन अत्यन्त दुर्बल, गिरे हुए, बलहीन पाण्डवों को क्यों नहीं छोड़ देती?'—
श्लोक 44 (8.69.44)
योऽसौ कर्णः प्रत्यजानात्त्वदर्थे । नाहं हत्वा सह कृष्णेन पार्थम् । इहोपयातेति स पापबुद्धिः । कच्चिच्छेते शरसम्भिन्नगात्रः ॥
yo'sau karṇaḥ pratyajānāttvadarthe | nāhaṃ hatvā saha kṛṣṇena pārtham | ihopayāteti sa pāpabuddhiḥ | kaccicchete śarasambhinnagātraḥ
और जिस कर्ण ने तुम्हारे विषय में प्रतिज्ञा की थी—'मैं कृष्ण-सहित पार्थ को मारे बिना यहाँ नहीं लौटूँगा'—क्या वह पापबुद्धि बाणों से बिंधे शरीर वाला होकर पड़ा है?
श्लोक 45 (8.69.45)
कच्चित्सङ्ग्रामो विदितो वै तवायं । समागमे सृञ्जय कौरवाणाम् । येनावस्थामीदृशीं प्रापितोऽहं । कच्चित्त्वया सोऽद्य हतो दुरात्मा ॥
kaccitsaṅgrāmo vidito vai tavāyaṃ | samāgame sṛñjaya kauravāṇām | yenāvasthāmīdṛśīṃ prāpito'haṃ | kaccittvayā so'dya hato durātmā
क्या यह संग्राम तुम्हारे जाने हुए है—सृञ्जयों और कौरवों की यह भिड़न्त, जिसके कारण मैं ऐसी दशा को पहुँचा हूँ? क्या आज तुमने उस दुरात्मा को मार डाला?
श्लोक 46 (8.69.46)
कच्चित्त्वया तस्य सुमन्दबुद्धेः । गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैर्ज्वलद्भिः । सकुण्डलं भानुमदुत्तमाङ्गं । कायात्प्रकृत्तं युधि सव्यसाचिन् ॥
kaccittvayā tasya sumandabuddheḥ | gāṇḍīvamuktairviśikhairjvaladbhiḥ | sakuṇḍalaṃ bhānumaduttamāṅgaṃ | kāyātprakṛttaṃ yudhi savyasācin
क्या तुमने गाण्डीव से छूटे जलते बाणों से उस अत्यन्त मन्दबुद्धि का कुण्डल-सहित, सूर्य के समान दमकता मस्तक, हे सव्यसाची, युद्ध में उसके धड़ से काट गिराया?
श्लोक 47 (8.69.47)
यत्तन्मया बाणसमर्पितेन । ध्यातोऽसि कर्णस्य वधाय वीर । तन्मे त्वया कच्चिदमोघमद्य । ध्यानं कृतं कर्णनिपातनेन ॥
yattanmayā bāṇasamarpitena | dhyāto'si karṇasya vadhāya vīra | tanme tvayā kaccidamoghamadya | dhyānaṃ kṛtaṃ karṇanipātanena
हे वीर! जब मैं बाणों से बिंधा पड़ा था, तब कर्ण के वध के लिए मैंने तुम्हारा ध्यान किया था। क्या कर्ण को गिराकर तुमने आज मेरा वह ध्यान सफल कर दिया?
श्लोक 48 (8.69.48)
यद्दर्पपूर्णः स सुयोधनोऽस्मान् । दिधक्षते कर्णसमाश्रयेण । कच्चित्त्वया सोऽद्य समाश्रयोऽस्य । भग्नः पराक्रम्य सुयोधनस्य ॥
yaddarpapūrṇaḥ sa suyodhano'smān | didhakṣate karṇasamāśrayeṇa | kaccittvayā so'dya samāśrayo'sya | bhagnaḥ parākramya suyodhanasya
दर्प से भरा वह सुयोधन कर्ण के आश्रय के भरोसे हमें जला डालना चाहता है; क्या आज तुमने पराक्रम करके सुयोधन के उस आश्रय को तोड़ डाला?
श्लोक 49 (8.69.49)
यो नः पुरा षण्ढतिलानवोचत् । सभामध्ये कौरवाणां समक्षम् । स दुर्मतिः कच्चिदुपेत्य सङ्ख्ये । त्वया हतः सूतपुत्रोऽत्यमर्षी ॥
yo naḥ purā ṣaṇḍhatilānavocat | sabhāmadhye kauravāṇāṃ samakṣam | sa durmatiḥ kaccidupetya saṅkhye | tvayā hataḥ sūtaputro'tyamarṣī
जिस अत्यन्त अधीर दुर्मति सूतपुत्र ने पहले कौरवों के सामने सभा के बीच हमें 'खोखले तिल' कहा था, क्या वह रण में आमने-सामने आकर तुम्हारे हाथों मारा गया?
श्लोक 50 (8.69.50)
यः प्राहिणोत्सूतपुत्रो दुरात्मा । कृष्णां जितां सौबलेहानयेति । स मन्दबुद्धिर्निहतः प्रसह्य । वैकर्तनस्त्वद्य कच्चिन्महात्मन् ॥
yaḥ prāhiṇotsūtaputro durātmā | kṛṣṇāṃ jitāṃ saubalehānayeti | sa mandabuddhirnihataḥ prasahya | vaikartanastvadya kaccinmahātman
जिस दुरात्मा सूतपुत्र ने 'कृष्णा सौबल से जीती जा चुकी है, उसे यहाँ ले आओ'—ऐसा कहला भेजा था, हे महात्मन्, क्या वह मन्दबुद्धि वैकर्तन आज बलपूर्वक मार डाला गया?
श्लोक 51 (8.69.51)
यः शस्त्रभृच्छ्रेष्ठतमं पृथिव्यां । पितामहं व्याक्षिपदल्पचेताः । सङ्ख्यायमानोऽर्धरथः स कच्चित् । त्वया हतोऽद्याधिरथिर्महात्मन् ॥
yaḥ śastrabhṛcchreṣṭhatamaṃ pṛthivyāṃ | pitāmahaṃ vyākṣipadalpacetāḥ | saṅkhyāyamāno'rdharathaḥ sa kaccit | tvayā hato'dyādhirathirmahātman
जिस अल्पबुद्धि ने पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ शस्त्रधारी पितामह का तिरस्कार किया था, और जिसकी गिनती 'अर्धरथ' में की जाती थी, हे महात्मन्, क्या वह अधिरथ-पुत्र आज तुम्हारे हाथों मारा गया?
श्लोक 52 (8.69.52)
अमर्षजं निकृतिसमीरणेरितं । हृदि स्थितं ज्वलनमिमं सदा मम । हतो मया सोऽद्य समेत्य कर्ण । इति ब्रुवन्प्रशमयसेऽद्य फल्गुन ॥
amarṣajaṃ nikṛtisamīraṇeritaṃ | hṛdi sthitaṃ jvalanamimaṃ sadā mama | hato mayā so'dya sametya karṇa | iti bruvanpraśamayase'dya phalguna
मेरे हृदय में सदा स्थित, अमर्ष से जन्मी और छल-कपट की हवा से भड़की इस आग को, 'आज मैंने कर्ण से भिड़कर उसे मार डाला'—ऐसा कहकर, हे फल्गुन, तुम शान्त कर दो।