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कर्ण पर्व · अध्याय 70

कर्ण को मारने की अर्जुन की प्रतिज्ञा

युधिष्ठिर के क्रोध का उत्तर देते हुए अर्जुन बताते हैं कि कौरव-सेना के अग्रभाग में चलने वाले अश्वत्थामा ने कैसे अद्भुत बाण-वर्षा से उन पर आक्रमण किया, और उसे पीछे हटाने के बाद कर्ण पचास रथियों के साथ कैसे उन पर टूट पड़ा। कर्ण को छोड़कर वे राजा को देखने आए हैं, किन्तु प्रभद्रकों को कर्ण निगल रहा है, इसलिए उन्हें उनकी रक्षा के लिए लौटना है। वे आज ही कर्ण को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं, अन्यथा प्रतिज्ञा तोड़ने वालों की गति पाने की शपथ लेते हैं, और राजा से अपनी विजय की कामना करने को कहते हैं।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.70.1)

तद्धर्मशीलस्य वचो निशम्य । राज्ञः क्रुद्धस्यातिरथो महात्मा । उवाच दुर्मर्षमदीनसत्वो । युधिष्ठिरं जिष्णुरनन्तवीर्यः ॥

taddharmaśīlasya vaco niśamya | rājñaḥ kruddhasyātiratho mahātmā | uvāca durmarṣamadīnasatvo | yudhiṣṭhiraṃ jiṣṇuranantavīryaḥ

धर्मशील राजा के क्रोध-भरे उन वचनों को सुनकर, निर्भय और अनन्त पराक्रम वाले महारथी अर्जुन ने क्रुद्ध युधिष्ठिर से कहा—

अर्जुन उवाच

श्लोक 2 (8.70.2)

द्रोणं हतं पार्थ कर्णो विदित्वा । भिन्नां नावमिवात्यगाधे कुरूणाम् । सम्मुह्यमानान्धार्तराष्ट्रान्विदित्वा । निरुत्साहांश्च विजये परेषाम् ॥

droṇaṃ hataṃ pārtha karṇo viditvā | bhinnāṃ nāvamivātyagādhe kurūṇām | sammuhyamānāndhārtarāṣṭrānviditvā | nirutsāhāṃśca vijaye pareṣām

हे पार्थ! द्रोण को मारा गया जानकर कर्ण—और यह देखकर कि धृतराष्ट्र-पुत्र फूटी नाव की तरह अथाह (संकट) में पड़े मोहित हो रहे हैं और शत्रुओं पर विजय से निराश हो गए हैं—

श्लोक 3 (8.70.3)

सोदर्यवत्त्वरितोऽमितौजा । उत्तारयिष्यन्धृतराष्ट्रस्य पुत्रान् । रणे रथेनाधिरथिर्महात्मा । ततो हि मां त्वरितः सोऽभ्यधावत् ॥

sodaryavattvarito'mitaujā | uttārayiṣyandhṛtarāṣṭrasya putrān | raṇe rathenādhirathirmahātmā | tato hi māṃ tvaritaḥ so'bhyadhāvat

भाई की तरह उतावला होकर, अपार बल वाला वह महात्मा अधिरथ-पुत्र, धृतराष्ट्र के पुत्रों को पार उतारने की इच्छा से रथ पर चढ़कर रण में तब बड़ी तेजी से मेरी ओर दौड़ा।

श्लोक 4 (8.70.4)

संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेऽद्य । सेनाग्रयायी कुरुसैन्यस्य राजन् । आशीविषाभान्विकिरञ्शरौघान् । द्रौणिः पुरस्तात्सहसाध्यतिष्ठत् ॥

saṃśaptakairyudhyamānasya me'dya | senāgrayāyī kurusainyasya rājan | āśīviṣābhānvikirañśaraughān | drauṇiḥ purastātsahasādhyatiṣṭhat

हे राजन्! आज मैं संशप्तकों से लड़ रहा था, तभी कौरव-सेना के अग्रभाग में चलने वाला द्रोणपुत्र विषैले सर्पों जैसे बाणों की बौछार करता हुआ अचानक मेरे सामने आ डटा।

श्लोक 5 (8.70.5)

स मे दृष्ट्वा शूरतमो ध्वजाग्रं । समादिशद्रथसङ्घाननेकान् । तेषामहं पञ्चशतं निहत्य । आसादयं द्रोणपुत्रं नदन्तम् ॥

sa me dṛṣṭvā śūratamo dhvajāgraṃ | samādiśadrathasaṅghānanekān | teṣāmahaṃ pañcaśataṃ nihatya | āsādayaṃ droṇaputraṃ nadantam

मेरी ध्वजा का अग्रभाग देखकर उस परम शूर ने मुझ पर रथों के अनेक दल भेजे; उनमें से पाँच सौ को मारकर मैं गरजते हुए द्रोणपुत्र के पास जा पहुँचा।

श्लोक 6 (8.70.6)

स द्रोणपुत्रः सदृशं महात्मा । मामप्यरौत्सीत्तदनीकमध्ये । किरञ्शरौघान्बहुरूपान्विचित्रान् । स्वातीगतः शुक्र इवातिवर्षन् ॥

sa droṇaputraḥ sadṛśaṃ mahātmā | māmapyarautsīttadanīkamadhye | kirañśaraughānbahurūpānvicitrān | svātīgataḥ śukra ivātivarṣan

उस महात्मा द्रोणपुत्र ने भी अपनी सेना के बीच मुझसे अपने योग्य युद्ध किया; वह स्वाती में स्थित शुक्र की तरह नाना रूपों और विचित्र प्रकारों के बाणों की झड़ी लगा रहा था।

श्लोक 7 (8.70.7)

स मे शरान्सर्वतः कङ्कपत्रान् । अवासृजद्वै पृथिवीप्रकाशान् । निवार्य तूर्णं परमाजिमध्ये । ततोऽपि मां बाणगणैः समार्पयत् ॥

sa me śarānsarvataḥ kaṅkapatrān | avāsṛjadvai pṛthivīprakāśān | nivārya tūrṇaṃ paramājimadhye | tato'pi māṃ bāṇagaṇaiḥ samārpayat

उसने पृथ्वी को प्रकाशित करने वाले कङ्कपत्र-युक्त बाण चारों ओर से मुझ पर छोड़े, और उस महासमर में तुरन्त मुझे रोककर फिर बाणों के झुंडों से मुझे बींध भी दिया।

श्लोक 8 (8.70.8)

आकर्षणं वापि विकृष्य मुक्तं । न दृश्यते तस्य महारथस्य । न सन्दधानः कुत आददानो । न व्याक्षिपन्न विकर्षन्विमुञ्चन् ॥

ākarṣaṇaṃ vāpi vikṛṣya muktaṃ | na dṛśyate tasya mahārathasya | na sandadhānaḥ kuta ādadāno | na vyākṣipanna vikarṣanvimuñcan

उस महारथी का धनुष खींचना, या खींचकर बाण छोड़ना दिखाई ही नहीं देता था; न वह बाण जोड़ता दिखता था, लेने की तो बात ही क्या; न फेंकता, न खींचता, न छोड़ता दिखाई देता था—

श्लोक 9 (8.70.9)

सव्येन वा यदि वा दक्षिणेन । न ज्ञायते कतरेणास्यतीति । आचार्यवत्समरे पर्यवर्तन् । महच्चित्रं दर्शयन्सर्वतः स्म ॥

savyena vā yadi vā dakṣiṇena | na jñāyate katareṇāsyatīti | ācāryavatsamare paryavartan | mahaccitraṃ darśayansarvataḥ sma

वह बाएँ से चलाता है या दाएँ से, यह जाना नहीं जा सकता था। वह आचार्य की तरह रण में घूमता हुआ चारों ओर बड़ा विचित्र कौशल दिखा रहा था।

श्लोक 10 (8.70.10)

दृष्टिर्विषं चासुहरं परेषां । सर्वा दिशः पूरयानं शरौधैः । अलातचक्रप्रतिमं महात्मनः । सदा नतं कार्मुकं ब्रह्मबन्धोः ॥

dṛṣṭirviṣaṃ cāsuharaṃ pareṣāṃ | sarvā diśaḥ pūrayānaṃ śaraudhaiḥ | alātacakrapratimaṃ mahātmanaḥ | sadā nataṃ kārmukaṃ brahmabandhoḥ

उसकी दृष्टि विष थी जो शत्रुओं के प्राण हर लेती थी; वह बाणों की धाराओं से सब दिशाएँ भर रहा था; और जन्म से ब्राह्मण उस महात्मा का धनुष सदा झुका हुआ, घूमते अलातचक्र के समान दिखाई देता था।

श्लोक 11 (8.70.11)

ततोऽपरान्बाणगणाननेकान् । आकर्णपूर्णायतविप्रमुक्तान् । ससर्ज शीघ्रास्त्रबलेन वीरः । तोयं यथा प्रावृषि कालमेघः ॥

tato'parānbāṇagaṇānanekān | ākarṇapūrṇāyatavipramuktān | sasarja śīghrāstrabalena vīraḥ | toyaṃ yathā prāvṛṣi kālameghaḥ

फिर उस वीर ने शीघ्र अस्त्र चलाने के बल से कान तक पूरी खिंची प्रत्यंचा से छूटे हुए और भी अनेक बाण-समूह ऐसे बरसाए, जैसे वर्षा-ऋतु में काला बादल जल बरसाता है।

श्लोक 12 (8.70.12)

आविध्यन्मां पञ्चभिर्द्रोणपुत्रः । शितैः शरैः पञ्चभिर्वासुदेवम् । अभ्यघ्नं बाणैस्तमहं सुधारैः । निमेषमात्रेण सुवर्णपुङ्खैः ॥

āvidhyanmāṃ pañcabhirdroṇaputraḥ | śitaiḥ śaraiḥ pañcabhirvāsudevam | abhyaghnaṃ bāṇaistamahaṃ sudhāraiḥ | nimeṣamātreṇa suvarṇapuṅkhaiḥ

द्रोणपुत्र ने पाँच तीखे बाणों से मुझे और पाँच से वासुदेव को बींध दिया; और मैंने पलक झपकने भर में तेज धार वाले, सुनहरे पंखों वाले बाणों से उसे मारा।

श्लोक 13 (8.70.13)

स निर्विद्धो विरथो द्रोणपुत्रो । रथानीकं चाधिरथेर्विवेश । मयाभिभूतान्स्वरथप्रबर्हान् । अस्त्रं च पश्यन्रुधिरप्रदिग्धम् ॥

sa nirviddho viratho droṇaputro | rathānīkaṃ cādhiratherviveśa | mayābhibhūtānsvarathaprabarhān | astraṃ ca paśyanrudhirapradigdham

बिंध जाने पर रथ-हीन हुआ द्रोणपुत्र अधिरथ-पुत्र की रथ-सेना में घुस गया; उसने देखा कि उसके श्रेष्ठ रथी मुझसे हार गए हैं और उसके शस्त्र रक्त से सने हैं।

श्लोक 14 (8.70.14)

ततोऽभिभूतं युधि वीक्ष्य सैन्यं । विध्वस्तयोधं द्रुतनागयूथम् । पञ्चाशता रथमुख्यैः समेतः । कर्णस्त्वरन्नभ्यपतत्प्रमाथी ॥

tato'bhibhūtaṃ yudhi vīkṣya sainyaṃ | vidhvastayodhaṃ drutanāgayūtham | pañcāśatā rathamukhyaiḥ sametaḥ | karṇastvarannabhyapatatpramāthī

तब सेना को युद्ध में परास्त, योद्धाओं को बिखरा हुआ और भागते हाथियों के झुंड की तरह देखकर वह संहारक कर्ण पचास प्रमुख रथियों के साथ उतावली से मुझ पर टूट पड़ा।

श्लोक 15 (8.70.15)

तान्सूदयित्वाऽहमपास्य कर्णं । द्रष्टुं भवन्तं त्वरयोपयातः । सर्वे पाञ्चाला ह्युद्विजन्ते स्म कर्णं । दृष्ट्वा गावः केसरिणं यथैव ॥

tānsūdayitvā'hamapāsya karṇaṃ | draṣṭuṃ bhavantaṃ tvarayopayātaḥ | sarve pāñcālā hyudvijante sma karṇaṃ | dṛṣṭvā gāvaḥ kesariṇaṃ yathaiva

उन्हें मारकर और कर्ण को छोड़कर मैं तुम्हें देखने के लिए शीघ्र आ गया हूँ। कर्ण को देखकर सब पाञ्चाल वैसे ही घबरा उठते हैं, जैसे सिंह को देखकर गायें।

श्लोक 16 (8.70.16)

मृत्योरास्यं व्यात्तमिवाभिपद्य । प्रभद्रकाः कर्णमासाद्य सर्वे । यास्यामि तांस्तारयिष्यन्बलौघात् । दिष्ट्या भवान्स्वस्तिमान्पार्थ दृष्टः ॥

mṛtyorāsyaṃ vyāttamivābhipadya | prabhadrakāḥ karṇamāsādya sarve | yāsyāmi tāṃstārayiṣyanbalaughāt | diṣṭyā bhavānsvastimānpārtha dṛṣṭaḥ

प्रभद्रक सब-के-सब कर्ण के पास पहुँचकर मानो मृत्यु के खुले मुख में जा पड़े हैं। मैं उन्हें उस सेना-प्रवाह से बचाने जाऊँगा। हे पार्थ, सौभाग्य से आप सकुशल दिखाई दे गए।

श्लोक 17 (8.70.17)

हनिष्येऽहं भारत सूतपुत्रम् । अस्मिन्सङ्ग्रामे यदि दृश्यतेऽद्य । आयाहि पश्याद्य युयुत्समानौ । मां सूतपुत्रं च धृतौ रणाय ॥

haniṣye'haṃ bhārata sūtaputram | asminsaṅgrāme yadi dṛśyate'dya | āyāhi paśyādya yuyutsamānau | māṃ sūtaputraṃ ca dhṛtau raṇāya

हे भारत! यदि आज वह इस संग्राम में दिखाई दिया तो मैं सूतपुत्र को मार डालूँगा। आइए, युद्ध के लिए तत्पर और रण के लिए दृढ़ संकल्प मुझे और सूतपुत्र को आज लड़ते देखिए।

श्लोक 18 (8.70.18)

महाझषस्येव मुखं प्रपन्नाः । प्रभद्रकाः कर्णमुखं प्रपन्नाः । षट्साहस्रा भारत राजपुत्राः । स्वर्गाय लोकाय रणे निमग्नाः ॥

mahājhaṣasyeva mukhaṃ prapannāḥ | prabhadrakāḥ karṇamukhaṃ prapannāḥ | ṣaṭsāhasrā bhārata rājaputrāḥ | svargāya lokāya raṇe nimagnāḥ

जैसे मछलियाँ किसी बड़े मगर के मुख में चली जाती हैं, वैसे ही प्रभद्रक कर्ण के मुख में पहुँच गए हैं; हे भारत, छः हज़ार राजकुमार स्वर्गलोक के लिए रण में डूब गए हैं।

श्लोक 19 (8.70.19)

तानद्य यास्यामि रणाद्विमोक्तुं । सर्वात्मना सूतपुत्रं च हन्तुम् ॥

tānadya yāsyāmi raṇādvimoktuṃ | sarvātmanā sūtaputraṃ ca hantum

आज मैं उन्हें रण से छुड़ाने और पूरे मन से सूतपुत्र को मारने जाऊँगा।

श्लोक 20 (8.70.20)

अथ प्रवीरेण महानुभाव । द्विषत्सैन्यं निर्दहन्विस्तरेण । समेत्याहं सूतपुत्रेण सङ्ख्ये । वज्रीव वृत्रेण नरेन्द्रमुख्य ॥

atha pravīreṇa mahānubhāva | dviṣatsainyaṃ nirdahanvistareṇa | sametyāhaṃ sūtaputreṇa saṅkhye | vajrīva vṛtreṇa narendramukhya

हे महानुभाव! तब मैं महावीर बनकर शत्रु की सेना को दूर-दूर तक भस्म करता हुआ युद्ध में सूतपुत्र से वैसे ही भिड़ूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्र वृत्र से भिड़े थे, हे नरेन्द्रश्रेष्ठ।

श्लोक 21 (8.70.21)

एवं गते किञ्च मयाऽद्य शक्यं । कार्यं कर्तुं निग्रहे सूतजस्य । तथैव राज्ञश्च सुयोधनस्य । ये चापि मां योद्धुकामाः समेताः ॥

evaṃ gate kiñca mayā'dya śakyaṃ | kāryaṃ kartuṃ nigrahe sūtajasya | tathaiva rājñaśca suyodhanasya | ye cāpi māṃ yoddhukāmāḥ sametāḥ

ऐसी स्थिति में आज मैं सूतपुत्र का, राजा सुयोधन का और मुझसे लड़ने की इच्छा से एकत्र हुए अन्य सबका दमन करने के लिए और क्या कर सकता हूँ?

श्लोक 22 (8.70.22)

कर्णं न चेदद्य निहन्मि राजन् । सबान्धवं युध्यमानं प्रसह्य । प्रतिश्रुत्याऽकुर्वतां या गतिर्वै । कष्टां यायां तामहं राजसिंह ॥

karṇaṃ na cedadya nihanmi rājan | sabāndhavaṃ yudhyamānaṃ prasahya | pratiśrutyā'kurvatāṃ yā gatirvai | kaṣṭāṃ yāyāṃ tāmahaṃ rājasiṃha

हे राजन्! यदि आज मैं युद्ध करते हुए कर्ण को उसके बन्धुओं-सहित बलपूर्वक न मार डालूँ, तो प्रतिज्ञा करके उसे न निभाने वालों की जो दुर्गति होती है, वही कष्टदायक गति मैं पाऊँ, हे राजसिंह।

श्लोक 23 (8.70.23)

आमन्त्रये त्वां ब्रूहि रणे जयं मे । पुरा भीमं धार्तराष्ट्रा ग्रसन्ति । सौतिं हनिष्यामि नरेन्द्रसिंह । सैन्यं तथा शत्रुगणांश्च सर्वान् ॥

āmantraye tvāṃ brūhi raṇe jayaṃ me | purā bhīmaṃ dhārtarāṣṭrā grasanti | sautiṃ haniṣyāmi narendrasiṃha | sainyaṃ tathā śatrugaṇāṃśca sarvān

मैं आपसे विदा लेता हूँ; आप रण में मेरी विजय की बात कहिए। धृतराष्ट्र के पुत्र अभी भीम को निगले जा रहे हैं। हे नरेन्द्रसिंह! मैं सूतपुत्र को, उसकी सेना को और सब शत्रु-दलों को मार डालूँगा।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71