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कर्ण पर्व · अध्याय 71

युधिष्ठिर की अर्जुन को फटकार

कर्ण को सकुशल सुनकर कर्ण के बाणों से जलते हुए युधिष्ठिर अर्जुन से कहते हैं कि इससे तो अच्छा है कि वे फिर वन चले जाएँ या धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेवा करें। वे कर्ण को मारने की निष्फल प्रतिज्ञा के लिए अर्जुन को फटकारते हैं, जन्म के समय अर्जुन की महिमा बताने वाली आकाशवाणी याद दिलाते हैं, भीम को अपना एकमात्र रक्षक बताते हैं और घटोत्कच के लिए शोक करते हैं, तथा कहते हैं कि यदि अर्जुन कर्ण का सामना नहीं कर सकते तो गाण्डीव कृष्ण को दे दें। अन्त में वे कटु शब्दों में कहते हैं कि अर्जुन जन्म ही न लेते तो अच्छा होता।

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.71.1)

वैकर्तनं कुशलिनं निशम्य । क्रुद्धः पार्थः फल्गुनस्यामितौजाः । धनञ्जयं वाक्यमुवाच राजा । युधिष्ठिरः कर्णशराभितप्तः ॥

vaikartanaṃ kuśalinaṃ niśamya | kruddhaḥ pārthaḥ phalgunasyāmitaujāḥ | dhanañjayaṃ vākyamuvāca rājā | yudhiṣṭhiraḥ karṇaśarābhitaptaḥ

वैकर्तन कर्ण को सकुशल सुनकर, फल्गुन पर क्रुद्ध, कर्ण के बाणों से सन्तप्त और अपार तेजस्वी राजा युधिष्ठिर ने धनञ्जय से यह बात कही।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (8.71.2)

इमां च वसतिं हित्वा भयात्कर्णेन फल्गुन । अहं च भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

imāṃ ca vasatiṃ hitvā bhayātkarṇena phalguna | ahaṃ ca bhīmasenaśca mādrīputrau ca pāṇḍavau

हे फल्गुन! कर्ण के भय से इस शिविर को छोड़कर मैं, भीमसेन और माद्री के दोनों पाण्डव पुत्र —

श्लोक 3 (8.71.3)

वासुदेवेन सहिता वयं कर्णेन निर्जिताः । पुनरेव वनं गत्वा तपश्चर्यां च कुर्महे । अथवा धार्तराष्ट्राणां परिचर्यां चरामहे ॥

vāsudevena sahitā vayaṃ karṇena nirjitāḥ | punareva vanaṃ gatvā tapaścaryāṃ ca kurmahe | athavā dhārtarāṣṭrāṇāṃ paricaryāṃ carāmahe

वासुदेव-सहित हम सब कर्ण से हार गए हैं। अब हम फिर वन में जाकर तपस्या करें, अथवा धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेवा करें।

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (8.71.4)

इत्येवमुक्त्वा बीभत्सुं रोषात्संरक्तलोचनः । अब्रवीत्पुनरेवात्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

ityevamuktvā bībhatsuṃ roṣātsaṃraktalocanaḥ | abravītpunarevātra dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

बीभत्सु से यह कहकर रोष से लाल आँखों वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने यहाँ फिर कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (8.71.5)

इदं यदि द्वैतवने तु सूक्तं । कर्णं नियोद्धुं न सहे नृपेति । वयं ततः प्राप्तकालं यथावत् । कृत्वाऽभ्युपेक्षाम तथैव राज्यम् ॥

idaṃ yadi dvaitavane tu sūktaṃ | karṇaṃ niyoddhuṃ na sahe nṛpeti | vayaṃ tataḥ prāptakālaṃ yathāvat | kṛtvā'bhyupekṣāma tathaiva rājyam

यदि द्वैतवन में तुमने साफ कह दिया होता—'हे राजन्, मैं कर्ण से युद्ध करना सहन नहीं कर सकता'—तो हम समय के अनुरूप ठीक उपाय करके राज्य की भी उपेक्षा कर देते।

श्लोक 6 (8.71.6)

मयि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य । बलस्य चार्धस्य तथैव युद्धे । आनीय मां शत्रुमध्ये स कस्मात् । समुन्नाम्य स्थण्डिले प्रत्यपिंष्ठाः ॥

mayi pratiśrutya vadhaṃ hi tasya | balasya cārdhasya tathaiva yuddhe | ānīya māṃ śatrumadhye sa kasmāt | samunnāmya sthaṇḍile pratyapiṃṣṭhāḥ

उसके वध की और रण में उसकी आधी सेना के विनाश की प्रतिज्ञा मुझसे करके, मुझे शत्रुओं के बीच लाकर, ऊपर उठाकर तुमने फिर नंगी धरती पर क्यों पटक दिया?

श्लोक 7 (8.71.7)

अन्वास्य सत्येन यदात्थ पार्थ । सत्यं शपन्वासुदेवेन सार्धम् । तन्नः सत्यमफलं ह्यकार्षीः । फलस्य काले चाच्छिन्नः पुष्पवृक्षम् ॥

anvāsya satyena yadāttha pārtha | satyaṃ śapanvāsudevena sārdham | tannaḥ satyamaphalaṃ hyakārṣīḥ | phalasya kāle cācchinnaḥ puṣpavṛkṣam

हे पार्थ! वासुदेव के साथ सत्य की शपथ लेकर, सत्य का आश्रय लेकर तुमने जो कहा था, हमारे उसी सत्य को तुमने निष्फल कर दिया; फल लगने के समय तुमने फूलों से लदे वृक्ष को ही काट डाला।

श्लोक 8 (8.71.8)

प्रच्छादितस्त्वं बालिश दुर्यशोभिः । अनर्थवाक्योऽस्यर्जुन नैव साधुः । त्यक्त्वा भीमं सर्वभीमेषु भीमं । संयोजितस्त्वं सूतपुत्रं निहन्तुम् ॥

pracchāditastvaṃ bāliśa duryaśobhiḥ | anarthavākyo'syarjuna naiva sādhuḥ | tyaktvā bhīmaṃ sarvabhīmeṣu bhīmaṃ | saṃyojitastvaṃ sūtaputraṃ nihantum

हे मूर्ख! तुम अपयश से ढक गए हो; हे अर्जुन, तुम्हारी बातें निरर्थक निकलीं और तुम साधु नहीं हो। सब भयंकरों में भयंकर भीम को छोड़कर तुम सूतपुत्र को मारने में नियुक्त हुए थे।

श्लोक 9 (8.71.9)

यत्तद्वृथा वागुवाचान्तरिक्षे । सप्ताह्नि जाते त्वयि मन्दबुद्धौ । अपापीयान्वासवात्कुन्तिजातो । बहून्सङ्ग्रामानयमेव जेता ॥

yattadvṛthā vāguvācāntarikṣe | saptāhni jāte tvayi mandabuddhau | apāpīyānvāsavātkuntijāto | bahūnsaṅgrāmānayameva jetā

हे मन्दबुद्धि! जब तुम सात दिन के थे, तब आकाश में जो वाणी बोली थी, वह व्यर्थ गई—'कुन्ती का यह पुत्र इन्द्र से किसी बात में कम नहीं है; यही बहुत-से संग्रामों में विजयी होगा।'

श्लोक 10 (8.71.10)

अयं जेता पाण्डवो देवसङ्घान् । सर्वाणि भूतान्यपि चोत्तमौजाः । अयं जेता मद्रकलिङ्गजातान् । दैत्यांश्च रक्षांसि समागतानि ॥

ayaṃ jetā pāṇḍavo devasaṅghān | sarvāṇi bhūtānyapi cottamaujāḥ | ayaṃ jetā madrakaliṅgajātān | daityāṃśca rakṣāṃsi samāgatāni

'यह पाण्डव देवताओं के समूहों को और सब प्राणियों को जीतेगा, यह अपार तेजस्वी है; यह मद्रों और कलिंगों में उत्पन्न वीरों को तथा एकत्र हुए दैत्यों और राक्षसों को जीतेगा।'

श्लोक 11 (8.71.11)

भूमिं च सर्वां निखिलेन जेता । कुरूंश्च जेता स्वगणांश्च जेता । अस्मात्परो नो भविता धनुर्धरो । नैष्यन्न भूतः कश्चिदेनं विजेता ॥

bhūmiṃ ca sarvāṃ nikhilena jetā | kurūṃśca jetā svagaṇāṃśca jetā | asmātparo no bhavitā dhanurdharo | naiṣyanna bhūtaḥ kaścidenaṃ vijetā

'यह सारी पृथ्वी को पूरी तरह जीतेगा, कौरवों को जीतेगा और अपने गणों को भी जीतेगा। इससे बढ़कर कोई धनुर्धर न होगा; न कभी हुआ और न होगा कोई जो इसे जीत सके।'

श्लोक 12 (8.71.12)

इच्छन्नयं सर्वभूतानि कुर्यात् । वशी वशे सर्वसमाप्तविद्यः । कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वायोः । स्थैर्येण मेरोः क्षमया पृथिव्याः ॥

icchannayaṃ sarvabhūtāni kuryāt | vaśī vaśe sarvasamāptavidyaḥ | kāntyā śaśāṅkasya javena vāyoḥ | sthairyeṇa meroḥ kṣamayā pṛthivyāḥ

'यह जितेन्द्रिय और समस्त विद्याओं में पूर्ण वीर चाहे तो सब प्राणियों को अपने वश में कर ले; चन्द्रमा की कान्ति, वायु के वेग, मेरु की स्थिरता और पृथ्वी की क्षमा में,'

श्लोक 13 (8.71.13)

अग्नेश्च तापे धनदस्य लक्ष्म्या । शौर्येण शक्रस्य जयेन विष्णोः । तुल्यो महात्मा तव कुन्ति पुत्रो । जातोऽदितेर्विष्णुरिवामितौजाः ॥

agneśca tāpe dhanadasya lakṣmyā | śauryeṇa śakrasya jayena viṣṇoḥ | tulyo mahātmā tava kunti putro | jāto'diterviṣṇurivāmitaujāḥ

अग्नि के ताप, कुबेर की सम्पदा, इन्द्र की शूरता और विष्णु की विजय में—हे कुन्ती, तुम्हारा यह महात्मा पुत्र उनके समान है; यह अदिति से विष्णु की भाँति जन्मा है, अपार तेजस्वी।'

श्लोक 14 (8.71.14)

स्वेषां जयाय द्विषतां वधाय । जातो महात्मा तव नन्दिकर्ता । इत्यन्तरिक्षे शतशृङ्गमूर्ध्नि । तपस्विनां शृण्वतां वागुवाच ॥

sveṣāṃ jayāya dviṣatāṃ vadhāya | jāto mahātmā tava nandikartā | ityantarikṣe śataśṛṅgamūrdhni | tapasvināṃ śṛṇvatāṃ vāguvāca

'अपनों की विजय और शत्रुओं के वध के लिए जन्मा यह महात्मा तुम्हारा आनन्द बढ़ाने वाला होगा'—इस प्रकार शतशृंग के शिखर पर तपस्वियों के सुनते हुए आकाश में वाणी बोली थी।

श्लोक 15 (8.71.15)

एवंविधस्त्वं न च भूतस्तथाद्य । देवाश्च नूनमनृतं वदन्ति ॥

evaṃvidhastvaṃ na ca bhūtastathādya | devāśca nūnamanṛtaṃ vadanti

पर आज तुम वैसे सिद्ध नहीं हुए; निश्चय ही देवता झूठ बोलते हैं।

श्लोक 16 (8.71.16)

तथा परेषामृषिसत्तमानां । श्रुत्वा गिरः पूजयतां सदा त्वाम् । न सन्नतिं यामि सुयोधनस्य । न त्वां जानाम्याधिरथेर्भयार्तम् ॥

tathā pareṣāmṛṣisattamānāṃ | śrutvā giraḥ pūjayatāṃ sadā tvām | na sannatiṃ yāmi suyodhanasya | na tvāṃ jānāmyādhiratherbhayārtam

दूसरे श्रेष्ठ ऋषियों की भी, जो सदा तुम्हारी स्तुति करते थे, बातें सुनकर मैं सुयोधन के आगे नहीं झुका; और मैंने तुम्हें कभी अधिरथ-पुत्र से भयभीत नहीं जाना था।

श्लोक 17 (8.71.17)

त्वष्ट्रा कृतं वाहमकूजनाक्षं । शुभं समास्थाय कपिध्वजं तम् । खड्गं गृहीत्वा हेमचित्रावनद्धं । धनुर्वरं गाण्डिवं तालमात्रम् । त्वं वासुदेवेनोह्यमानः कथं नु । कर्णाद्भीतो व्यपयातोऽसि पार्थ ॥

tvaṣṭrā kṛtaṃ vāhamakūjanākṣaṃ | śubhaṃ samāsthāya kapidhvajaṃ tam | khaḍgaṃ gṛhītvā hemacitrāvanaddhaṃ | dhanurvaraṃ gāṇḍivaṃ tālamātram | tvaṃ vāsudevenohyamānaḥ kathaṃ nu | karṇādbhīto vyapayāto'si pārtha

त्वष्टा के बनाए हुए, जिसकी धुरी कभी चरमराती नहीं, उस सुन्दर कपिध्वज रथ पर सवार होकर, सोने की चित्रकारी से सजी तलवार और ताड़ के बराबर लम्बा श्रेष्ठ धनुष गाण्डीव लेकर, वासुदेव से रथ चलवाते हुए, हे पार्थ, तुम कर्ण से डरकर कैसे भाग आए?

श्लोक 18 (8.71.18)

पूर्वं यदुक्तं हि सुयोधनेन । न फल्गुनः प्रमुखे स्थास्यतीति । कर्णस्य युद्धे हि महाबलस्य । मौर्ख्यात्तु तन्नावबुद्धं मयाऽसीत् ॥

pūrvaṃ yaduktaṃ hi suyodhanena | na phalgunaḥ pramukhe sthāsyatīti | karṇasya yuddhe hi mahābalasya | maurkhyāttu tannāvabuddhaṃ mayā'sīt

सुयोधन ने पहले जो कहा था कि महाबली कर्ण के सामने युद्ध में फल्गुन टिक नहीं सकेगा, उसे मैंने अपनी मूर्खता से समझा नहीं।

श्लोक 19 (8.71.19)

तेनाद्य तप्स्ये भृशमप्रमेयं । यन्मित्रवर्गो नरकं प्रविष्टः । तदैव वाच्योऽस्मि ननु त्वयाऽहं । न योत्स्येऽहं सूतपुत्रं कथञ्चित् ॥

tenādya tapsye bhṛśamaprameyaṃ | yanmitravargo narakaṃ praviṣṭaḥ | tadaiva vācyo'smi nanu tvayā'haṃ | na yotsye'haṃ sūtaputraṃ kathañcit

इसी से आज मैं अपार दुःख भोगूँगा कि मेरे मित्रों का समूह नरक में जा पड़ा। तुम्हें उसी समय मुझसे कह देना चाहिए था—'मैं सूतपुत्र से किसी प्रकार नहीं लड़ूँगा।'

श्लोक 20 (8.71.20)

ततो नाहं सृञ्जयान्केकयांश्च । समानयेयं सुहृदो रणाय ॥

tato nāhaṃ sṛñjayānkekayāṃśca | samānayeyaṃ suhṛdo raṇāya

तब मैं सृञ्जयों और कैकेयों जैसे मित्रों को युद्ध के लिए इकट्ठा ही न करता।

श्लोक 21 (8.71.21)

एवं गते किं च मयाऽद्य शक्यं । कार्यं कर्तुं निग्रहे सूतजस्य । तथैव राज्ञश्च सुयोधनस्य । ये वापि मां योद्धुकामाः समेताः ॥

evaṃ gate kiṃ ca mayā'dya śakyaṃ | kāryaṃ kartuṃ nigrahe sūtajasya | tathaiva rājñaśca suyodhanasya | ye vāpi māṃ yoddhukāmāḥ sametāḥ

ऐसी स्थिति में आज मैं सूतपुत्र का, राजा सुयोधन का और मुझसे लड़ने की इच्छा से आए अन्य सब लोगों का दमन करने के लिए और क्या कर सकता हूँ?

श्लोक 22 (8.71.22)

धिगस्तु मज्जीवितमद्य कृष्ण । योऽहं वशं सूतपुत्रस्य यातः । मध्ये कुरूणां ससुयोधनानां । ये चाप्यन्ये योद्धुकामाः समेताः ॥

dhigastu majjīvitamadya kṛṣṇa | yo'haṃ vaśaṃ sūtaputrasya yātaḥ | madhye kurūṇāṃ sasuyodhanānāṃ | ye cāpyanye yoddhukāmāḥ sametāḥ

हे कृष्ण! मेरे इस जीवन को आज धिक्कार है, जो मैं कुरुओं के बीच, सुयोधन-सहित और लड़ने की इच्छा से आए अन्य सब योद्धाओं के बीच, सूतपुत्र के वश में पड़ गया!

श्लोक 23 (8.71.23)

एकः स मे भीमसेनोऽद्य नाथो । येनाभिपन्नोऽस्मि रणे महाभये । विमोच्य मां चापि रुषान्वितस्ततः । शरेण तीक्ष्णेन बिभेद कर्णम् ॥

ekaḥ sa me bhīmaseno'dya nātho | yenābhipanno'smi raṇe mahābhaye | vimocya māṃ cāpi ruṣānvitastataḥ | śareṇa tīkṣṇena bibheda karṇam

आज मेरे एकमात्र रक्षक भीमसेन हैं, जो इस महान् भय के युद्ध में मेरे पास पहुँचे; मुझे छुड़ाकर क्रोध से भरे हुए उन्होंने तीखे बाण से कर्ण को बींध डाला।

श्लोक 24 (8.71.24)

त्यक्त्वा प्राणान्समरे भीमसेनः । चक्रे युद्धं कुरुमुख्यैः समेतैः । गदाग्रहस्तो रुधिरोक्षिताङ्गः । चरन्रणे काल इवान्तकाले ॥

tyaktvā prāṇānsamare bhīmasenaḥ | cakre yuddhaṃ kurumukhyaiḥ sametaiḥ | gadāgrahasto rudhirokṣitāṅgaḥ | caranraṇe kāla ivāntakāle

भीमसेन ने प्राणों का मोह छोड़कर, गदा हाथ में लिए, रक्त से भीगे अंगों वाले होकर, प्रलयकाल के यम की तरह रणभूमि में विचरते हुए, एकत्र हुए कुरुप्रमुखों से युद्ध किया।

श्लोक 25 (8.71.25)

असौ हि भीमस्य महानिनादो । मुहुर्मुहुः श्रूयते धार्तराष्ट्रैः । यदि स्म जीवेत्समरे निहन्ता । महारथानां प्रवरो नरोत्तमः ॥

asau hi bhīmasya mahāninādo | muhurmuhuḥ śrūyate dhārtarāṣṭraiḥ | yadi sma jīvetsamare nihantā | mahārathānāṃ pravaro narottamaḥ

भीम की वह महान् गर्जना धृतराष्ट्र-पुत्रों को बार-बार सुनाई दे रही है—यदि वह रण में संहार करने वाला, महारथियों में श्रेष्ठ, नरोत्तम जीवित हो।

श्लोक 26 (8.71.26)

तवाभिमन्युस्तनयोऽद्य पार्थ । न चास्मि गन्ता समरे पराभवम् । अथापि जीवेत्समरे घटोत्कचः । तथाऽपि नाहं समरे पराङ्मुखः ॥

tavābhimanyustanayo'dya pārtha | na cāsmi gantā samare parābhavam | athāpi jīvetsamare ghaṭotkacaḥ | tathā'pi nāhaṃ samare parāṅmukhaḥ

हे पार्थ! यदि आज तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु होता तो मुझे युद्ध में पराजय की ओर न जाना पड़ता; और यदि घटोत्कच रण में जीवित होता, तब भी मैं युद्ध से मुँह न मोड़ता।

श्लोक 27 (8.71.27)

भीमस्य पुत्रः समराग्रयायी । महास्त्रविच्चापि तवानुरूपः । यत्नं समासाद्य रिपोर्बलं नो । निमीलिताक्षं भयविप्लुतं भवेत् ॥

bhīmasya putraḥ samarāgrayāyī | mahāstraviccāpi tavānurūpaḥ | yatnaṃ samāsādya riporbalaṃ no | nimīlitākṣaṃ bhayaviplutaṃ bhavet

भीम का पुत्र रण में सबसे आगे चलने वाला, महान् अस्त्रों का ज्ञाता और तुम्हारे योग्य था; उसके प्रयत्न से शत्रु की सेना हमारे सामने आँखें मूँदे, भय से व्याकुल हो जाती —

श्लोक 28 (8.71.28)

चकार योऽसौ निशि युद्धमेकः । त्यक्त्वा रणं यस्य भयाद्रवन्ते ॥

cakāra yo'sau niśi yuddhamekaḥ | tyaktvā raṇaṃ yasya bhayādravante

जिसने अकेले रात में युद्ध किया और जिसके भय से सब रण छोड़कर भाग खड़े होते हैं —

श्लोक 29 (8.71.29)

स चेत्समासाद्य महानुभावः । कर्णं रणे बाणगणैः प्रमोह्य । धैर्ये स्थितेनापि च सूतजेन । शक्त्या हतो वासवदत्तया तया ॥

sa cetsamāsādya mahānubhāvaḥ | karṇaṃ raṇe bāṇagaṇaiḥ pramohya | dhairye sthitenāpi ca sūtajena | śaktyā hato vāsavadattayā tayā

वह महानुभाव कर्ण से भिड़कर बाणों की झड़ी से उसे मोहित कर चुका था, फिर भी धैर्य में स्थित सूतपुत्र ने वासव की दी हुई उस शक्ति से उसे मार डाला।

श्लोक 30 (8.71.30)

ममैव भाग्यानि पुरा कृतानि । पापानि नूनं फलवन्ति युद्धे । तृणं च कृत्वा समरे भवन्तं । ततोऽहमेवं निकृतो दुरात्मना । वैकर्तनेनैव तथा कृतोऽहं । यथा ह्यशक्तः क्रियते त्वबान्धवः ॥

mamaiva bhāgyāni purā kṛtāni | pāpāni nūnaṃ phalavanti yuddhe | tṛṇaṃ ca kṛtvā samare bhavantaṃ | tato'hamevaṃ nikṛto durātmanā | vaikartanenaiva tathā kṛto'haṃ | yathā hyaśaktaḥ kriyate tvabāndhavaḥ

निश्चय ही मेरे ही पूर्वकृत पाप-कर्म इस युद्ध में फल दे रहे हैं। तुम्हें तिनके के समान मानकर उस दुरात्मा वैकर्तन ने मेरा ऐसा अपमान किया और मुझे ऐसी दशा में कर दिया, जैसे किसी असमर्थ और बन्धुहीन की की जाती है।

श्लोक 31 (8.71.31)

आपद्गतं यश्च नरो विमोक्षयेत् । स बान्धवः स्नेहयुतः सुहृच्च । एवं पुराणा ऋषयो वदन्ति । धर्मः सदा सद्भिरनुष्ठितश्च ॥

āpadgataṃ yaśca naro vimokṣayet | sa bāndhavaḥ snehayutaḥ suhṛcca | evaṃ purāṇā ṛṣayo vadanti | dharmaḥ sadā sadbhiranuṣṭhitaśca

जो मनुष्य संकट में पड़े हुए को उबार ले, वही उसका बन्धु, स्नेही मित्र है—ऐसा प्राचीन ऋषि कहते हैं, और यह धर्म सदा सज्जनों द्वारा पालित होता आया है।

श्लोक 32 (8.71.32)

खड्गं विभ्रज्जातरूपत्सरुं च । धनुर्वरं गाण्डिवं तालमात्रम् । स केशवेनोह्यमानः कथं नु । कर्णात्पार्थस्त्वमपैतुं समैषीः ॥

khaḍgaṃ vibhrajjātarūpatsaruṃ ca | dhanurvaraṃ gāṇḍivaṃ tālamātram | sa keśavenohyamānaḥ kathaṃ nu | karṇātpārthastvamapaituṃ samaiṣīḥ

सोने की मूठ वाली तलवार और ताड़ के बराबर लम्बा श्रेष्ठ धनुष गाण्डीव धारण किए हुए, केशव से रथ चलवाते हुए, हे पार्थ, तुमने कर्ण से हटकर चल देने का निश्चय कैसे किया?

श्लोक 33 (8.71.33)

स गाण्डीवं केशवाय प्रदाय । यन्ता भवेस्त्वं यदि केशवस्य । ततस्तरेत्केशवः कर्णमुग्रं । मरुत्सखो वृत्रमिवात्तवज्रः ॥

sa gāṇḍīvaṃ keśavāya pradāya | yantā bhavestvaṃ yadi keśavasya | tatastaretkeśavaḥ karṇamugraṃ | marutsakho vṛtramivāttavajraḥ

यदि तुम गाण्डीव केशव को देकर स्वयं केशव के सारथी बन जाते, तो केशव उग्र कर्ण को वैसे ही परास्त कर देते, जैसे मरुद्गणों के सखा वज्रधारी इन्द्र ने वृत्र को किया।

श्लोक 34 (8.71.34)

मासेऽपतिष्यो यदि पञ्चमे त्वं । न वा गर्भो यद्यभवः पृथायाः । मत्तः श्रेयान्राजपुत्रोऽभविष्यन् । न ते यशः फल्गुन इत्यपेयात् ॥

māse'patiṣyo yadi pañcame tvaṃ | na vā garbho yadyabhavaḥ pṛthāyāḥ | mattaḥ śreyānrājaputro'bhaviṣyan | na te yaśaḥ phalguna ityapeyāt

यदि तुम पाँचवें महीने में ही गिर गए होते, या पृथा के गर्भ में आए ही न होते, तो मुझसे श्रेष्ठ कोई राजकुमार होता, और हे फल्गुन, तुम्हारा यश नष्ट न होता।

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72