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कर्ण पर्व · अध्याय 72

कृष्ण का अर्जुन को सत्य की सूक्ष्मता का उपदेश

अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिए युधिष्ठिर को मारने को तलवार उठाए अर्जुन को कृष्ण रोकते हैं और कहते हैं कि वे धर्म की सूक्ष्मताओं को जाने बिना कर्म कर रहे हैं। कृष्ण व्याध बलाक और ब्राह्मण कौशिक की कथाएँ सुनाते हैं और बताते हैं कि किन अवसरों पर झूठ सत्य से श्रेष्ठ है। अर्जुन पूछते हैं कि भाई का वध किए बिना प्रतिज्ञा कैसे निभे, तब कृष्ण उन्हें युधिष्ठिर को "तुम" कहकर अपमानित करने की सलाह देते हैं, क्योंकि बड़े का अपमान उसके वध के समान है।

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.72.1)

युधिष्ठिरेणैवमुक्तः कौन्तेयः श्वेतवाहनः । असिं जग्राह सङ्क्रुद्धो जिघांसुर्भरतर्षभम् ॥

yudhiṣṭhireṇaivamuktaḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | asiṃ jagrāha saṅkruddho jighāṃsurbharatarṣabham

युधिष्ठिर के इस प्रकार कहने पर श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र अर्जुन ने क्रोध में भरकर तलवार उठा ली; वे भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर को मार डालना चाहते थे।

श्लोक 2 (8.72.2)

तस्य कोपं समाज्ञाय चित्तज्ञः केशवस्तदा । उवाच किमिदं खङ्गं गृह्णास्यर्जुन शंस मे ॥

tasya kopaṃ samājñāya cittajñaḥ keśavastadā | uvāca kimidaṃ khaṅgaṃ gṛhṇāsyarjuna śaṃsa me

उनके क्रोध को जानकर मन की बात समझने वाले केशव ने उसी समय कहा — "अर्जुन, तुम यह तलवार क्यों उठा रहे हो? मुझे बताओ।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 3 (8.72.3)

नेह पश्यामि योद्धव्यं त्वया किञ्चिद्धनञ्जय । नेहागता धार्तराष्ट्राः सर्वे भीमेन वारिताः ॥

neha paśyāmi yoddhavyaṃ tvayā kiñciddhanañjaya | nehāgatā dhārtarāṣṭrāḥ sarve bhīmena vāritāḥ

"धनंजय, मुझे यहाँ ऐसा कुछ नहीं दिखता जिससे तुम्हें लड़ना हो। धृतराष्ट्र के पुत्र यहाँ आए ही नहीं; भीमसेन ने उन सबको रोक रखा है।

श्लोक 4 (8.72.4)

उपागतोऽसि कौन्तेय राजा द्रष्टव्य इत्यसौ । स राजा भवता दृष्टः कुशली च युधिष्ठिरः ॥

upāgato'si kaunteya rājā draṣṭavya ityasau | sa rājā bhavatā dṛṣṭaḥ kuśalī ca yudhiṣṭhiraḥ

कुन्तीपुत्र, तुम यह कहकर आए थे कि राजा के दर्शन करने हैं; वे राजा तुम्हें दिख गए, युधिष्ठिर कुशल से हैं।

श्लोक 5 (8.72.5)

तं दृष्ट्वा नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् । हर्षकाले च सम्प्राप्ते कस्मात्त्वां मन्युराविशत् ॥

taṃ dṛṣṭvā nṛpaśārdūlaṃ śārdūlasamavikramam | harṣakāle ca samprāpte kasmāttvāṃ manyurāviśat

बाघ के समान पराक्रमी उन नृपश्रेष्ठ को देखकर, जब हर्ष का समय आया है, तुम्हें क्रोध क्यों आ गया?

श्लोक 6 (8.72.6)

न तं पश्यामि कौन्तेय यस्ते वध्यो भवेदिह । प्रहर्तुमिच्छसे कस्मात्किं वा ते चित्तविभ्रमः ॥

na taṃ paśyāmi kaunteya yaste vadhyo bhavediha | prahartumicchase kasmātkiṃ vā te cittavibhramaḥ

कुन्तीपुत्र, मुझे यहाँ कोई ऐसा नहीं दिखता जिसका तुम्हें वध करना चाहिए। तुम किस पर प्रहार करना चाहते हो? या तुम्हारा चित्त भ्रमित हो गया है?

श्लोक 7 (8.72.7)

कस्माद्भवान्महाखङ्गं परिगृह्णात्यकारणात् ॥

kasmādbhavānmahākhaṅgaṃ parigṛhṇātyakāraṇāt

तुम बिना किसी कारण यह विशाल खड्ग क्यों उठा रहे हो?

श्लोक 8 (8.72.8)

तत्त्वां पृच्छामि कौन्तेय किमिदं ते चिकीर्षितम् । परामृशसि यत्क्रुद्धः खङ्गमद्भुतविक्रम ॥

tattvāṃ pṛcchāmi kaunteya kimidaṃ te cikīrṣitam | parāmṛśasi yatkruddhaḥ khaṅgamadbhutavikrama

इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, कुन्तीपुत्र — तुम क्या करना चाहते हो? हे अद्भुत पराक्रमी, क्रोध में तुम तलवार को क्यों छू रहे हो?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (8.72.9)

एवमुक्तः कटाक्षेण प्रेक्षमाणो युधिष्ठिरम् । अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ॥

evamuktaḥ kaṭākṣeṇa prekṣamāṇo yudhiṣṭhiram | arjunaḥ prāha govindaṃ kruddhaḥ sarpa iva śvasan

ऐसा कहे जाने पर अर्जुन ने तिरछी दृष्टि से युधिष्ठिर को देखा और क्रोध से साँप की तरह फुफकारते हुए गोविन्द से कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 10 (8.72.10)

अन्यस्मै देहि गाण्डीवमिति मां यः प्रचोदयेत् । भिन्द्यामहं तस्य शिर इत्युपांशु व्रतं मम । युधिष्ठिरेण तेनाहमुक्तश्चास्मि जनार्दन ॥

anyasmai dehi gāṇḍīvamiti māṃ yaḥ pracodayet | bhindyāmahaṃ tasya śira ityupāṃśu vrataṃ mama | yudhiṣṭhireṇa tenāhamuktaścāsmi janārdana

"जो भी मुझसे कहे कि अपना गाण्डीव किसी और को दे दो, उसका मैं सिर चीर दूँगा — यह मेरा गुप्त व्रत है। और जनार्दन, युधिष्ठिर ने ठीक यही बात मुझसे कही है।

श्लोक 11 (8.72.11)

यदुक्तोऽहमदीनार्थं राज्ञाऽनेन यशस्विना । समक्षं तव गोविन्द न तत्क्षन्तुमिहोत्सहे ॥

yadukto'hamadīnārthaṃ rājñā'nena yaśasvinā | samakṣaṃ tava govinda na tatkṣantumihotsahe

गोविन्द, यशस्वी राजा ने जो बात मुझसे खुलकर तुम्हारे सामने कही, उसे मैं सहन नहीं कर सकता।

श्लोक 12 (8.72.12)

तस्मादेनं वधिष्यामि राजानं धर्मचारिणाम् । प्रतिज्ञां पालयिष्यामि हत्वैनं नरसत्तमम् ॥

tasmādenaṃ vadhiṣyāmi rājānaṃ dharmacāriṇām | pratijñāṃ pālayiṣyāmi hatvainaṃ narasattamam

इसलिए मैं धर्मात्माओं के राजा का वध करूँगा; इन नरश्रेष्ठ को मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँगा।

श्लोक 13 (8.72.13)

एतदर्थं मया खड्गो गृहीतो यदुनन्दन । सोऽहं युधिष्ठिरं हत्वा सत्यस्यानृण्यतां गतः । विशोको विज्वरश्चापि भविष्यामि जनार्दन ॥

etadarthaṃ mayā khaḍgo gṛhīto yadunandana | so'haṃ yudhiṣṭhiraṃ hatvā satyasyānṛṇyatāṃ gataḥ | viśoko vijvaraścāpi bhaviṣyāmi janārdana

यदुनन्दन, इसी के लिए मैंने तलवार उठाई है। युधिष्ठिर को मारकर मैं सत्य के ऋण से मुक्त हो जाऊँगा, और जनार्दन, शोक और ताप से भी छूट जाऊँगा।

श्लोक 14 (8.72.14)

किं वा त्वं मन्यसे प्राप्तमस्मिन्कार्य उपस्थिते । त्वमस्य जगतस्तात वेत्थ सर्वं गतागतम् ॥

kiṃ vā tvaṃ manyase prāptamasminkārya upasthite | tvamasya jagatastāta vettha sarvaṃ gatāgatam

अथवा इस प्रसंग के आ जाने पर तुम क्या उचित समझते हो? प्रिय सखा, इस जगत् का सारा आना-जाना तुम जानते हो।

श्लोक 15 (8.72.15)

जातस्त्वत्तो हि धर्मश्चाधर्मश्चेति परा श्रुतिः । तत्तथा प्रकरिष्यामि यथा मां वक्ष्यते भवान् ॥

jātastvatto hi dharmaścādharmaśceti parā śrutiḥ | tattathā prakariṣyāmi yathā māṃ vakṣyate bhavān

"धर्म और अधर्म तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं" — ऐसी परम श्रुति है। तुम जैसा मुझसे कहोगे, मैं वैसा ही करूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (8.72.16)

धिग्धिगित्येव गोविन्दः पार्थमुक्त्वाब्रवीत्पुनः ॥

dhigdhigityeva govindaḥ pārthamuktvābravītpunaḥ

पार्थ से "धिक्कार है, धिक्कार है!" कहकर गोविन्द ने फिर कहा।

कृष्ण उवाच

श्लोक 17 (8.72.17)

इदानीं पार्थ जानामि न वृद्धाः सेवितास्त्वया । अकाले पुरुषव्याघ्र संरम्भं यद्भवानगात् ॥

idānīṃ pārtha jānāmi na vṛddhāḥ sevitāstvayā | akāle puruṣavyāghra saṃrambhaṃ yadbhavānagāt

"पार्थ, अब मैं जान गया कि तुमने वृद्धजनों की सेवा नहीं की है; हे पुरुषव्याघ्र, तुम असमय इस उतावलेपन में पड़ गए हो।

श्लोक 18 (8.72.18)

न हि धर्मविभागज्ञैरेवं कार्यं धनञ्जय । यथा त्वं पाण्डवाद्येह धर्मभीरुरपण्डितः ॥

na hi dharmavibhāgajñairevaṃ kāryaṃ dhanañjaya | yathā tvaṃ pāṇḍavādyeha dharmabhīrurapaṇḍitaḥ

धनंजय, धर्म के विभागों को जानने वाले ऐसा नहीं करते, जैसा आज तुम कर रहे हो, पाण्डव — धर्म से डरने वाले, फिर भी अज्ञानी।

श्लोक 19 (8.72.19)

योऽकार्याणां क्रियायाश्च संयोगं नावबुध्यते । कार्याणामक्रियायाश्च स पार्थ पुरुषाधमः ॥

yo'kāryāṇāṃ kriyāyāśca saṃyogaṃ nāvabudhyate | kāryāṇāmakriyāyāśca sa pārtha puruṣādhamaḥ

पार्थ, जो पुरुष न करने योग्य कर्मों और कर्म के, तथा करने योग्य कर्मों और अकर्म के पारस्परिक सम्बन्ध को नहीं समझता, वह मनुष्यों में अधम है।

श्लोक 20 (8.72.20)

अनुसृत्य तु ये धर्मं कवयः समुपस्थिताः । समासविस्तरविदां न तेषां वेत्सि निश्चयम् ॥

anusṛtya tu ye dharmaṃ kavayaḥ samupasthitāḥ | samāsavistaravidāṃ na teṣāṃ vetsi niścayam

जो ज्ञानी धर्म का अनुसरण करके उसमें स्थित हुए हैं और उसे संक्षेप तथा विस्तार दोनों में जानते हैं, उनके निश्चय को तुम नहीं जानते।

श्लोक 21 (8.72.21)

अनिश्चयज्ञो हि नरः कार्याकार्यविनिश्चये । एवं स मुह्यत्यवशो यथा त्वं पार्थ मुह्यसि ॥

aniścayajño hi naraḥ kāryākāryaviniścaye | evaṃ sa muhyatyavaśo yathā tvaṃ pārtha muhyasi

जो मनुष्य करने और न करने योग्य का निश्चय करना नहीं जानता, पार्थ, वह इस निश्चय में विवश होकर मोहित हो जाता है, जैसे तुम आज मोहित हो रहे हो।

श्लोक 22 (8.72.22)

न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथञ्चन । श्रुतेन ज्ञायते सर्वं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥

na hi kāryamakāryaṃ vā sukhaṃ jñātuṃ kathañcana | śrutena jñāyate sarvaṃ tacca tvaṃ nāvabudhyase

क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह किसी प्रकार सहज ही जाना नहीं जा सकता; सब कुछ शास्त्र के अध्ययन से जाना जाता है, और यह तुम नहीं समझते।

श्लोक 23 (8.72.23)

अविज्ञानादिह भवान्सत्यं रक्षति धर्मवित् । प्राणिनां त्वं वधं पार्थ धार्मिको नावबुध्यसे ॥

avijñānādiha bhavānsatyaṃ rakṣati dharmavit | prāṇināṃ tvaṃ vadhaṃ pārtha dhārmiko nāvabudhyase

समझ के अभाव से तुम, धर्म को जानते हुए भी, सत्य को पकड़े बैठे हो; और पार्थ, धार्मिक होकर भी तुम प्राणियों के वध का स्वरूप नहीं समझते।

श्लोक 24 (8.72.24)

प्राणिनां हि वधात्तात वृथा धर्मो मतो मम । अनृतं तु भवेद्वाच्यं न तु हिंसा कदाचन ॥

prāṇināṃ hi vadhāttāta vṛthā dharmo mato mama | anṛtaṃ tu bhavedvācyaṃ na tu hiṃsā kadācana

प्रिय अर्जुन, मेरे मत में प्राणियों के वध से मिलने वाला धर्म व्यर्थ है। झूठ बोलना पड़ सकता है, पर हिंसा कभी नहीं।

श्लोक 25 (8.72.25)

स कथं भ्रातरं ज्येष्ठं राजानं धर्मकोविदम् । हन्याद्भवान्नरश्रेष्ठ प्राकृतोऽन्यः पुमानिव ॥

sa kathaṃ bhrātaraṃ jyeṣṭhaṃ rājānaṃ dharmakovidam | hanyādbhavānnaraśreṣṭha prākṛto'nyaḥ pumāniva

तब हे नरश्रेष्ठ, तुम अपने ज्येष्ठ भाई को, जो राजा हैं और धर्म के ज्ञाता हैं, किसी साधारण मनुष्य की भाँति कैसे मार सकते हो?

श्लोक 26 (8.72.26)

अयुध्यमानस्य गुरोस्तथाऽशत्रोश्च मानद । पराङ्मुखस्य द्रवतः शरणं चापि गच्छतः ॥

ayudhyamānasya gurostathā'śatrośca mānada | parāṅmukhasya dravataḥ śaraṇaṃ cāpi gacchataḥ

हे मान देने वाले, जो युद्ध नहीं कर रहा, जो बड़ा है, जिसका कोई शत्रु नहीं, जो पीठ दिखा चुका है, भाग रहा है या शरण में आ रहा है —

श्लोक 27 (8.72.27)

कृताञ्जलेः प्रपन्नस्य प्रमत्तस्य तथैव च । न वधः पूज्यते सद्भिस्तच्च सर्वं गुरौ तव ॥

kṛtāñjaleḥ prapannasya pramattasya tathaiva ca | na vadhaḥ pūjyate sadbhistacca sarvaṃ gurau tava

जो हाथ जोड़े खड़ा है, जो शरणागत है, और जो असावधान है — इनके वध को सज्जन उचित नहीं मानते; और यह सब तुम्हारे बड़े भाई पर लागू होता है।

श्लोक 28 (8.72.28)

त्वया चैतद्व्रतं पार्थ बालेनेव कृतं पुरा । तस्मादधर्मसंयुक्तं मौर्ख्यादेव व्यवस्यसि ॥

tvayā caitadvrataṃ pārtha bāleneva kṛtaṃ purā | tasmādadharmasaṃyuktaṃ maurkhyādeva vyavasyasi

पार्थ, तुमने यह व्रत बहुत पहले बालक की तरह ले लिया था; इसीलिए मूर्खतावश तुम अधर्म से जुड़े कर्म का निश्चय कर रहे हो।

श्लोक 29 (8.72.29)

स्वगुरुं पार्थ कस्मात्त्वं हन्तुकामोऽभिधावसि । असम्प्रधार्य धर्माणां गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम् ॥

svaguruṃ pārtha kasmāttvaṃ hantukāmo'bhidhāvasi | asampradhārya dharmāṇāṃ gatiṃ sūkṣmāṃ duratyayām

पार्थ, धर्मों की सूक्ष्म और दुर्गम गति पर विचार किए बिना तुम अपने ही गुरुजन को मारने क्यों दौड़ रहे हो?

श्लोक 30 (8.72.30)

इदं धर्मरहस्यं च तव वक्ष्यामि पाण्डव । यद्ब्रूयात्तव भीष्मो वा राजा वापि युधिष्ठिरः ॥

idaṃ dharmarahasyaṃ ca tava vakṣyāmi pāṇḍava | yadbrūyāttava bhīṣmo vā rājā vāpi yudhiṣṭhiraḥ

और पाण्डव, मैं तुम्हें धर्म का वह रहस्य बताऊँगा, जैसा तुम्हें भीष्म बता सकते हैं, या राजा युधिष्ठिर,

श्लोक 31 (8.72.31)

विदुरो वा पुनः क्षत्ता गान्धारी वा यशस्विनी । कुन्ती वा भरतश्रेष्ठ द्रौपदी वा यशस्विनी । तत्ते वक्ष्यामि तत्त्वेन निबोधैतद्धनञ्जय ॥

viduro vā punaḥ kṣattā gāndhārī vā yaśasvinī | kuntī vā bharataśreṣṭha draupadī vā yaśasvinī | tatte vakṣyāmi tattvena nibodhaitaddhanañjaya

अथवा मन्त्री विदुर, यशस्विनी गान्धारी, कुन्ती, हे भरतश्रेष्ठ, या यशस्विनी द्रौपदी। मैं उसे यथार्थ रूप में तुम्हें बताऊँगा; धनंजय, सुनो।

श्लोक 32 (8.72.32)

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम् । सुदुर्विदं हि तत्त्वेन तत्सत्यमिति मे मतिः ॥

satyasya vacanaṃ sādhu na satyādvidyate param | sudurvidaṃ hi tattvena tatsatyamiti me matiḥ

सत्य बोलना अच्छा है; सत्य से बढ़कर कुछ नहीं। फिर भी उस सत्य को यथार्थ रूप में जानना बहुत कठिन है — ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 33 (8.72.33)

भवेत्सत्यमवक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् । यत्रानृतं भवेत्सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥

bhavetsatyamavaktavyaṃ vaktavyamanṛtaṃ bhavet | yatrānṛtaṃ bhavetsatyaṃ satyaṃ cāpyanṛtaṃ bhavet

ऐसे अवसर होते हैं जब सत्य नहीं कहना चाहिए और झूठ कहना चाहिए; जहाँ झूठ सत्य बन जाता है और सत्य भी झूठ बन जाता है।

श्लोक 34 (8.72.34)

विवाहकाले रतिसम्प्रयोगे । प्राणात्यये सर्वधनापहारे । विप्रस्य चार्थे ह्यनृतं वदेत । पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥

vivāhakāle ratisamprayoge | prāṇātyaye sarvadhanāpahāre | viprasya cārthe hyanṛtaṃ vadeta | pañcānṛtānyāhurapātakāni

विवाह के समय, रति-क्रिया में, प्राण पर संकट आने पर, सारा धन छीने जाने पर, और ब्राह्मण के हित के लिए झूठ बोला जा सकता है। ये पाँच असत्य पाप नहीं कहे जाते।

श्लोक 35 (8.72.35)

सर्वस्वस्यापहारे तु वक्तव्यमनृतं भवेत् । तत्रानृतं भवेत्सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥

sarvasvasyāpahāre tu vaktavyamanṛtaṃ bhavet | tatrānṛtaṃ bhavetsatyaṃ satyaṃ cāpyanṛtaṃ bhavet

जब सारी सम्पत्ति छीनी जा रही हो, तब झूठ बोलना चाहिए; वहाँ झूठ सत्य हो जाता है और सत्य भी झूठ हो जाता है।

श्लोक 36 (8.72.36)

तादृशो हन्यते बालो यस्य सत्यमनिश्चितम् । सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥

tādṛśo hanyate bālo yasya satyamaniścitam | satyānṛte viniścitya tato bhavati dharmavit

जिसका सत्य के विषय में निश्चय नहीं है, वह बालक की तरह नष्ट होता है; सत्य और असत्य का निर्णय करके ही मनुष्य धर्म का ज्ञाता बनता है।

श्लोक 37 (8.72.37)

किमाश्चर्यं कृतप्रज्ञः पुरुषोऽपि सुदारुणः । सुमहत्प्राप्नुयात्पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥

kimāścaryaṃ kṛtaprajñaḥ puruṣo'pi sudāruṇaḥ | sumahatprāpnuyātpuṇyaṃ balāko'ndhavadhādiva

क्या आश्चर्य कि दृढ़ बुद्धि वाला मनुष्य अत्यन्त क्रूर होकर भी महान् पुण्य पा ले, जैसे बलाक ने अन्धे जीव को मारकर पाया?

श्लोक 38 (8.72.38)

किमाश्चर्यं पुनर्मूढो धर्मकामो ह्यपण्डितः । सुमहत्प्राप्नुयात्पापमापगास्विव कौशिकः ॥

kimāścaryaṃ punarmūḍho dharmakāmo hyapaṇḍitaḥ | sumahatprāpnuyātpāpamāpagāsviva kauśikaḥ

और क्या आश्चर्य कि धर्म की इच्छा रखने वाला अज्ञानी मूर्ख महान् पाप कमा ले, जैसे कौशिक ने नदियों के प्रसंग में कमाया?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 39 (8.72.39)

आचक्ष्व भगवन्नेतद्यथा विन्दाम्यहं तथा । बलाकस्यानुसम्बद्धं नदीनां कौशिकस्य च ॥

ācakṣva bhagavannetadyathā vindāmyahaṃ tathā | balākasyānusambaddhaṃ nadīnāṃ kauśikasya ca

"भगवन्, यह मुझे बताइए जिससे मैं इसे समझ सकूँ — बलाक और अन्धे जीव की कथा, तथा नदियों और कौशिक की कथा।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 40 (8.72.40)

मृगव्याधोऽभवत्कश्चिद्बलाको नाम भारत । यात्रार्थं पुत्रदाराणां मृगान्हन्ति न कामतः ॥

mṛgavyādho'bhavatkaścidbalāko nāma bhārata | yātrārthaṃ putradārāṇāṃ mṛgānhanti na kāmataḥ

"भारत, बलाक नाम का एक व्याध था, जो पत्नी और पुत्रों के निर्वाह के लिए मृगों को मारता था, कामना से नहीं।

श्लोक 41 (8.72.41)

वृद्धौ च मातापितरौ बिभर्त्यन्यांश्च संश्रितान् । स्वधर्मनिरतो नित्यं संविभज्यानसूयकः ॥

vṛddhau ca mātāpitarau bibhartyanyāṃśca saṃśritān | svadharmanirato nityaṃ saṃvibhajyānasūyakaḥ

वह अपने वृद्ध माता-पिता तथा अन्य आश्रितों का भरण-पोषण करता था; सदा अपने धर्म में लगा रहकर वह सबको बाँटकर देता और किसी से द्वेष नहीं रखता था।

श्लोक 42 (8.72.42)

स कदाचिन्मृगप्रेप्सुर्नान्वविन्दन्मृगं क्वचित् । अथापश्यत्स पीवानं श्वापदं घ्राणचक्षुषम् ॥

sa kadācinmṛgaprepsurnānvavindanmṛgaṃ kvacit | athāpaśyatsa pīvānaṃ śvāpadaṃ ghrāṇacakṣuṣam

एक बार मृग की खोज में उसे कहीं कोई पशु नहीं मिला। तब उसने एक मोटा-ताज़ा जन्तु देखा, जो आँखों से नहीं, नाक से देखता था।

श्लोक 43 (8.72.43)

अदृष्टपूर्वमपि तत्सत्वं तेन हतं तदा । अन्धे हते ततो व्योम्नः पुष्पवर्षं पपात च ॥

adṛṣṭapūrvamapi tatsatvaṃ tena hataṃ tadā | andhe hate tato vyomnaḥ puṣpavarṣaṃ papāta ca

ऐसा जन्तु पहले कभी देखा नहीं गया था, फिर भी उसने उसे उसी समय मार डाला। उस अन्धे जीव के मरते ही आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई।

श्लोक 44 (8.72.44)

अप्सरोगीतवादित्रैर्नादितं च मनोरमम् । विमानमगमत्स्वर्गान्मृगव्याधनिनीषया ॥

apsarogītavāditrairnāditaṃ ca manoramam | vimānamagamatsvargānmṛgavyādhaninīṣayā

और अप्सराओं के गीत और वाद्यों से गूँजता एक मनोहर विमान स्वर्ग से उस व्याध को ले जाने के लिए आया।

श्लोक 45 (8.72.45)

तद्भूतं सर्वभूतानामभावाय किलार्जुन । तपस्तप्त्वा वरं प्राप्तं कृतमन्धं स्वयम्भुवा ॥

tadbhūtaṃ sarvabhūtānāmabhāvāya kilārjuna | tapastaptvā varaṃ prāptaṃ kṛtamandhaṃ svayambhuvā

अर्जुन, उस जीव ने सब प्राणियों के विनाश का निश्चय किया था; तप करके उसने वर पाया था, और स्वयम्भू ने उसे अन्धा बना दिया था।

श्लोक 46 (8.72.46)

तद्धत्वा सर्वभूतानामभावकृतनिश्चयम् । बलाकोऽगात्स्वर्गलोकमेवं धर्मः सुदुर्विदः ॥

taddhatvā sarvabhūtānāmabhāvakṛtaniścayam | balāko'gātsvargalokamevaṃ dharmaḥ sudurvidaḥ

सब प्राणियों के संहार का निश्चय किए हुए उस जीव को मारकर बलाक स्वर्गलोक को गया। धर्म ऐसा ही सूक्ष्म और जानने में कठिन है।

श्लोक 47 (8.72.47)

कौशिकोऽप्यभवद्विप्रस्तपस्वीनो बहुश्रुतः । नदीनां सङ्गमे ग्रामाददूरे स किलावसत् ॥

kauśiko'pyabhavadviprastapasvīno bahuśrutaḥ | nadīnāṃ saṅgame grāmādadūre sa kilāvasat

कौशिक नाम का एक ब्राह्मण भी था, जो तपस्वियों में श्रेष्ठ और बहुश्रुत था; वह एक गाँव से थोड़ी दूर नदियों के संगम पर रहता था।

श्लोक 48 (8.72.48)

सत्यं मया सदा वाच्यमिति तस्याभवद्व्रतम् । सत्यवादीति विख्यातः स तदासीद्धनञ्जय ॥

satyaṃ mayā sadā vācyamiti tasyābhavadvratam | satyavādīti vikhyātaḥ sa tadāsīddhanañjaya

"मुझे सदा सत्य बोलना चाहिए" — यह उसका व्रत था। धनंजय, उस समय वह सत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध था।

श्लोक 49 (8.72.49)

अथ दस्युभयात्केचित्तदा तद्वनमाविशन् । तत्रापि दस्यवः क्रुद्धास्तानमार्गन्त यत्नतः ॥

atha dasyubhayātkecittadā tadvanamāviśan | tatrāpi dasyavaḥ kruddhāstānamārganta yatnataḥ

तब कुछ लोग डाकुओं के भय से उस वन में घुस गए। क्रोध से भरे डाकू भी वहाँ आ पहुँचे और उन्हें यत्नपूर्वक ढूँढने लगे।

श्लोक 50 (8.72.50)

अथ कौशिकमभ्येत्य प्रोचुस्ते सत्यवादिनम् । कतरेण पथा याता भगवन्निति वै जनाः । सत्येन पृष्टः प्रब्रूहि यदि तद्वेत्थ शंस नः ॥

atha kauśikamabhyetya procuste satyavādinam | katareṇa pathā yātā bhagavanniti vai janāḥ | satyena pṛṣṭaḥ prabrūhi yadi tadvettha śaṃsa naḥ

तब वे सत्यवादी कौशिक के पास आकर बोले — "भगवन्, वे लोग किस मार्ग से गए हैं? सत्य के नाम पर पूछे जाने पर, यदि आप जानते हैं तो हमें बताइए।"

श्रीकृष्ण उवाच

श्लोक 51 (8.72.51)

सत्यस्य त्वविभागज्ञः सत्यं तेभ्यः शशंस ह । बहुवृक्षलतागुल्ममेतद्गहनमाश्रिताः । इति तान्ख्यापयामास तेभ्यस्तत्त्वं स कौशिकः ॥

satyasya tvavibhāgajñaḥ satyaṃ tebhyaḥ śaśaṃsa ha | bahuvṛkṣalatāgulmametadgahanamāśritāḥ | iti tānkhyāpayāmāsa tebhyastattvaṃ sa kauśikaḥ

सत्य के विभागों को न जानने वाले कौशिक ने उन्हें सीधा सत्य बता दिया — "वे बहुत वृक्षों, लताओं और झाड़ियों वाले इस घने स्थान में छिपे हैं।" इस प्रकार कौशिक ने उन्हें सच्ची बात बता दी।

श्लोक 52 (8.72.52)

ततस्ते तान्समासाद्य क्रूरा जघ्नुरिति श्रुतिः । ततोऽधर्मेण महता वाग्दुरुक्तेन कौशिकः ॥

tataste tānsamāsādya krūrā jaghnuriti śrutiḥ | tato'dharmeṇa mahatā vāgduruktena kauśikaḥ

तब उन क्रूर लोगों ने उन्हें पा लिया और मार डाला, ऐसा श्रुति में कहा गया है; और उस महान् अधर्म — एक अनुचित वचन — के कारण कौशिक

श्लोक 53 (8.72.53)

गतः सुकष्टं निरयं धर्मसूक्ष्मेष्वतत्त्ववित् । दृष्टपूर्वश्रुतो मूढो धर्माणामविशारदः ॥

gataḥ sukaṣṭaṃ nirayaṃ dharmasūkṣmeṣvatattvavit | dṛṣṭapūrvaśruto mūḍho dharmāṇāmaviśāradaḥ

धर्म की सूक्ष्मताओं के तत्त्व को न जानने के कारण अत्यन्त कष्टदायी नरक में गया; वह मूढ़ था, उसका ज्ञान देखे-सुने तक ही सीमित था, और वह धर्मों में अकुशल था।

श्लोक 54 (8.72.54)

वृद्धानपृच्छन्सन्देहानन्धः श्वभ्रमिवर्च्छति ॥

vṛddhānapṛcchansandehānandhaḥ śvabhramivarcchati

जो वृद्धजनों से अपने संशय नहीं पूछता, वह अन्धे की तरह गड्ढे में जा गिरता है।

श्लोक 55 (8.72.55)

तत्र ते लक्षणोद्देशः कश्चिदेव भविष्यति । दुष्करं प्रतिसंख्यानं कार्त्स्न्येनात्र व्यवस्थितिः ॥

tatra te lakṣaṇoddeśaḥ kaścideva bhaviṣyati | duṣkaraṃ pratisaṃkhyānaṃ kārtsnyenātra vyavasthitiḥ

इस विषय में तुम्हारे लिए कोई लक्षण बताया जाएगा, पर पूरा विश्लेषण कठिन है; यहाँ निर्णय समग्र दृष्टि से ही होता है।

श्लोक 56 (8.72.56)

सत्यं धर्म इति ह्येके वदन्ति बहवो जनाः । न च पार्थाभ्यसूयामि नैतत्सर्वत्र शिष्यते ॥

satyaṃ dharma iti hyeke vadanti bahavo janāḥ | na ca pārthābhyasūyāmi naitatsarvatra śiṣyate

बहुत से लोग कहते हैं कि सत्य ही धर्म है। पार्थ, मैं इसकी निन्दा नहीं करता, पर यह हर स्थान पर लागू नहीं होता।

श्लोक 57 (8.72.57)

श्रुतिस्तु धार्या इत्येके वदन्ति बहवो जनाः । न त्वेतत्प्रत्यसूयामि तत्र सर्वं विधीयते ॥

śrutistu dhāryā ityeke vadanti bahavo janāḥ | na tvetatpratyasūyāmi tatra sarvaṃ vidhīyate

बहुत से लोग कहते हैं कि श्रुति को धारण करना चाहिए। मैं इसका भी खण्डन नहीं करता; उसमें सब कुछ विहित है।

श्लोक 58 (8.72.58)

यत्स्यादहिंसासंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः । अहिंसार्थाय हिंस्राणां धर्मप्रवचनं कृतम् । धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः ॥

yatsyādahiṃsāsaṃyuktaṃ sa dharma iti niścayaḥ | ahiṃsārthāya hiṃsrāṇāṃ dharmapravacanaṃ kṛtam | dhāraṇāddharmamityāhurdharmo dhārayate prajāḥ

जो अहिंसा से युक्त है, वही धर्म है — यह निश्चय है। धर्म का उपदेश हिंसकों को अहिंसा की ओर ले जाने के लिए किया गया है। धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं; धर्म ही प्रजा को धारण करता है।

श्लोक 59 (8.72.59)

प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यस्मात्प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥

prabhavārthāya bhūtānāṃ dharmapravacanaṃ kṛtam | yasmātprabhavasaṃyuktaḥ sa dharma iti niścayaḥ

धर्म का उपदेश प्राणियों की उन्नति के लिए किया गया है। जो उनकी उन्नति से जुड़ा है, वही धर्म है — यह निश्चय है।

श्लोक 60 (8.72.60)

येऽन्यायेन जिगीषन्तो धर्मं पृच्छन्ति मानवाः । अकूजनेन चेन्मोक्षो नात्र कूजेत्कथञ्चन ॥

ye'nyāyena jigīṣanto dharmaṃ pṛcchanti mānavāḥ | akūjanena cenmokṣo nātra kūjetkathañcana

जो लोग अन्याय से जीतना चाहते हुए धर्म के विषय में पूछते हैं, वहाँ यदि चुप रहने से छुटकारा मिल सकता हो तो किसी भी प्रकार नहीं बोलना चाहिए।

श्लोक 61 (8.72.61)

अवश्यं कूजितव्ये ह शङ्केरन्वाप्यकूजनात् । येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धर्मं पृच्छन्ति कस्यचित् । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विनिश्चितम् ॥

avaśyaṃ kūjitavye ha śaṅkeranvāpyakūjanāt | ye'nyāyena jihīrṣanto dharmaṃ pṛcchanti kasyacit | śreyastatrānṛtaṃ vaktuṃ satyāditi viniścitam

किन्तु यदि बोलना अनिवार्य हो, या चुप रहने से शंका होती हो, तो जहाँ लोग अन्याय से किसी का कुछ छीनने की इच्छा से धर्म पूछते हैं, वहाँ सत्य से झूठ बोलना श्रेष्ठ है — ऐसा निश्चय किया गया है।

श्लोक 62 (8.72.62)

प्राणात्यये विवाहे वा सर्वजात्या महाभये । सर्वस्वस्य च लोपे वा वक्तव्यमनृतं भवेत् ॥

prāṇātyaye vivāhe vā sarvajātyā mahābhaye | sarvasvasya ca lope vā vaktavyamanṛtaṃ bhavet

प्राण पर संकट होने पर, विवाह में, सारे कुल पर बड़ा भय आने पर, या सारी सम्पत्ति के नष्ट होने पर झूठ बोलना चाहिए।

श्लोक 63 (8.72.63)

अधर्मं हि न पश्यन्ति मृषोद्यं तत्र पण्डिताः । सर्वथाऽभिवदेत्तत्तु नानृतं स्याद्विचक्षणः ॥

adharmaṃ hi na paśyanti mṛṣodyaṃ tatra paṇḍitāḥ | sarvathā'bhivadettattu nānṛtaṃ syādvicakṣaṇaḥ

वहाँ विद्वान् झूठ में कोई अधर्म नहीं देखते। विवेकी पुरुष हर प्रकार से बोले, वह असत्य नहीं होता।

श्लोक 64 (8.72.64)

यः स्तेनैः सह सम्बन्धो मुच्यते शपथादपि । भवेत्तत्रानृतं श्रेयः सत्यादिति विचारितम् ॥

yaḥ stenaiḥ saha sambandho mucyate śapathādapi | bhavettatrānṛtaṃ śreyaḥ satyāditi vicāritam

जब कोई चोरों के साथ फँस गया हो और शपथ से भी उनसे छूट सकता हो, तब वहाँ सत्य से झूठ श्रेष्ठ है — ऐसा विचार किया गया है।

श्लोक 65 (8.72.65)

न च तेभ्यो धनं देयं सत्यादिति कथञ्चन । पापेभ्योऽपि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् । तस्माद्धर्मार्थमनृतमुक्त्वा नानृतवाग्भवेत् ॥

na ca tebhyo dhanaṃ deyaṃ satyāditi kathañcana | pāpebhyo'pi dhanaṃ dattaṃ dātāramapi pīḍayet | tasmāddharmārthamanṛtamuktvā nānṛtavāgbhavet

सत्य के नाम पर उन्हें किसी प्रकार धन नहीं देना चाहिए; पापियों को दिया गया धन भी देने वाले को पीड़ा देता है। इसलिए धर्म के लिए झूठ बोलकर भी मनुष्य असत्यवादी नहीं होता।

श्लोक 66 (8.72.66)

एष ते लक्षणोद्देशो मयोद्दिष्टो यथाविधि । एतज्ज्ञात्वा ब्रूहि पार्थ यदि वध्यो युधिष्ठिरः ॥

eṣa te lakṣaṇoddeśo mayoddiṣṭo yathāvidhi | etajjñātvā brūhi pārtha yadi vadhyo yudhiṣṭhiraḥ

मैंने यह लक्षण तुम्हें विधिपूर्वक बता दिया है। इसे जानकर, पार्थ, कहो — क्या युधिष्ठिर वध के योग्य हैं?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 67 (8.72.67)

यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महायशाः ॥

yathā brūyānmahāprājño yathā brūyānmahāyaśāḥ

"जैसे महाबुद्धिमान बोलेगा, जैसे महायशस्वी बोलेगा —

श्लोक 68 (8.72.68)

सुहृद्ब्रूयाद्यथाऽस्माकं तथोक्तं वचनं त्वया । भवान्मातृसमोऽस्माकं भवान्पितृसमोऽपि च । गतिश्च परमा कृष्ण त्वमेव च परायणम् ॥

suhṛdbrūyādyathā'smākaṃ tathoktaṃ vacanaṃ tvayā | bhavānmātṛsamo'smākaṃ bhavānpitṛsamo'pi ca | gatiśca paramā kṛṣṇa tvameva ca parāyaṇam

जैसे हमारा मित्र बोलेगा, वैसा ही तुमने कहा है। तुम हमारे लिए माता के समान हो और पिता के समान भी; कृष्ण, तुम ही हमारी परम गति और परम आश्रय हो।

श्लोक 69 (8.72.69)

न हि ते त्रिषु लोकेषु विद्यतेऽविदितं क्वचित् । तस्माद्भवान्परं धर्मं वेद सर्वं यथातथम् ॥

na hi te triṣu lokeṣu vidyate'viditaṃ kvacit | tasmādbhavānparaṃ dharmaṃ veda sarvaṃ yathātatham

तीनों लोकों में कुछ भी ऐसा नहीं जो तुम्हें ज्ञात न हो; इसलिए तुम परम धर्म को, सब कुछ, यथार्थ रूप में जानते हो।

श्लोक 70 (8.72.70)

अवध्यं पाण्डवं मन्ये धर्मराजं युधिष्ठिरम् । अधर्मयुक्ते संयोगे ब्रूहि किञ्चिदनुग्रहम् ॥

avadhyaṃ pāṇḍavaṃ manye dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | adharmayukte saṃyoge brūhi kiñcidanugraham

मैं पाण्डव धर्मराज युधिष्ठिर को अवध्य मानता हूँ। इस अधर्म से जुड़े संकट में मुझे कोई राहत बताइए।

श्लोक 71 (8.72.71)

इदं चापरमत्रैव ब्रूहि तत्त्वं विवक्षितम् ॥

idaṃ cāparamatraiva brūhi tattvaṃ vivakṣitam

और इसी विषय में एक बात और बताइए — जो तत्त्व आप कहना चाहते हैं।

श्लोक 72 (8.72.72)

जानासि दाशार्ह मम व्रतं तु । यो मां ब्रूयात्कश्चन मानुषेषु । अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ । यो मत्तोऽस्त्रे वीर्यतो वा विशिष्टः ॥

jānāsi dāśārha mama vrataṃ tu | yo māṃ brūyātkaścana mānuṣeṣu | anyasmai tvaṃ gāṇḍivaṃ dehi pārtha | yo matto'stre vīryato vā viśiṣṭaḥ

दाशार्ह, तुम मेरा व्रत जानते हो — कि मनुष्यों में जो भी मुझसे कहे कि "पार्थ, अपना गाण्डीव किसी और को दे दो जो अस्त्रों में या पराक्रम में तुमसे बढ़कर हो,"

श्लोक 73 (8.72.73)

हन्यामहं केशव तं प्रसह्य । भीमो हन्यात्तूवरकेति चोक्तः । तन्मां राजा ह्युक्तवांस्ते समक्षं । धनुर्देहीत्यसकृद्वृष्णिवीरे ॥

hanyāmahaṃ keśava taṃ prasahya | bhīmo hanyāttūvaraketi coktaḥ | tanmāṃ rājā hyuktavāṃste samakṣaṃ | dhanurdehītyasakṛdvṛṣṇivīre

तो मैं उसे बलपूर्वक मार डालूँ, केशव; और भीम भी उसे मार डालेंगे जो उन्हें "तूवरक" (दाढ़ी-मूँछ रहित) कहे। वृष्णिवीर, राजा ने तुम्हारे सामने मुझसे यही बात बार-बार कही — "धनुष दे दो।"

श्लोक 74 (8.72.74)

तं हन्यां चेत्केशव जीवलोके । स्थाता नाहं कालमप्यल्पमात्रम् । ध्यात्वा नूनं ह्येनसा चापि मुक्तो । वधं राज्ञो भ्रष्टवीर्यो विचेताः ॥

taṃ hanyāṃ cetkeśava jīvaloke | sthātā nāhaṃ kālamapyalpamātram | dhyātvā nūnaṃ hyenasā cāpi mukto | vadhaṃ rājño bhraṣṭavīryo vicetāḥ

केशव, यदि मैं उन्हें मार दूँ तो इस जीवलोक में थोड़ी देर भी नहीं टिक सकूँगा; और पाप से मुक्त होकर भी, राजा के वध का चिन्तन करके मैं बल खो बैठूँगा और चेतना खो दूँगा।

श्लोक 75 (8.72.75)

यथा प्रतिज्ञा मम लोकबुद्धौ । भवेत्सत्या धर्मभृतां वरिष्ठ । यथा जीवत्पाण्डवोऽहं च कृष्ण । तथा बुद्धिं दातुमप्यर्हसि त्वम् ॥

yathā pratijñā mama lokabuddhau | bhavetsatyā dharmabhṛtāṃ variṣṭha | yathā jīvatpāṇḍavo'haṃ ca kṛṣṇa | tathā buddhiṃ dātumapyarhasi tvam

हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, जिससे लोक में प्रसिद्ध मेरी प्रतिज्ञा सत्य हो, और कृष्ण, पाण्डव युधिष्ठिर और मैं दोनों जीवित रहें — मुझे ऐसी ही सलाह देने की कृपा करो।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 76 (8.72.76)

राजा श्रान्तो विक्षतो दुःखितश्च । कर्णेन सङ्ख्ये निशितैर्बाणसङ्घैः । यश्चानिशं सूतपुत्रेण वीर । शरैर्भृशं ताडितो युध्यमानः ॥

rājā śrānto vikṣato duḥkhitaśca | karṇena saṅkhye niśitairbāṇasaṅghaiḥ | yaścāniśaṃ sūtaputreṇa vīra | śarairbhṛśaṃ tāḍito yudhyamānaḥ

"राजा थके हुए, घायल और पीड़ित हैं; युद्ध में कर्ण ने अपने तीखे बाणों की झड़ी से उन्हें घायल किया है; हे वीर, लड़ते हुए वे सूतपुत्र के बाणों से निरन्तर और बुरी तरह मारे गए हैं।

श्लोक 77 (8.72.77)

अतस्त्वमेतेन सरोषमुक्तो । दुःखान्वितेनेदमयुक्तरूपम् । अकोपितो ह्येष यदि स्म सङ्ख्ये । कर्णं न हन्यादिति चाब्रवीत्सः ॥

atastvametena saroṣamukto | duḥkhānvitenedamayuktarūpam | akopito hyeṣa yadi sma saṅkhye | karṇaṃ na hanyāditi cābravītsaḥ

इसीलिए दुःख से भरे हुए उन्होंने क्रोध में तुमसे यह अनुचित बात कही। और उन्होंने कहा था — "यदि वह क्रोधित नहीं किया गया, तो युद्ध में कर्ण को नहीं मारेगा।"

श्लोक 78 (8.72.78)

जानाति तं पाण्डव एष चापि । पापं लोके कर्णमसह्यमन्यैः । ततस्त्वमुक्तो भृशरोषितेन । राज्ञा समक्षं परुषाणि पार्थ ॥

jānāti taṃ pāṇḍava eṣa cāpi | pāpaṃ loke karṇamasahyamanyaiḥ | tatastvamukto bhṛśaroṣitena | rājñā samakṣaṃ paruṣāṇi pārtha

यह पाण्डव भी जानते हैं कि कर्ण पापी है और संसार में दूसरों के लिए असह्य है। इसीलिए, पार्थ, अत्यन्त क्षुब्ध राजा ने हम दोनों के सामने तुमसे कठोर बातें कहीं।

श्लोक 79 (8.72.79)

नित्योद्युक्ते सततं चाप्रसह्ये । कर्णे द्यूतं ह्यद्य रणे निबद्धम् । तस्मिन्हते कुरवो निर्जिताः स्युः । एवं बुद्धिः पार्थिवे धर्मपुत्रे ॥

nityodyukte satataṃ cāprasahye | karṇe dyūtaṃ hyadya raṇe nibaddham | tasminhate kuravo nirjitāḥ syuḥ | evaṃ buddhiḥ pārthive dharmaputre

आज इस युद्धरूपी द्यूत की बाज़ी सदा उद्यत और अजेय कर्ण पर लगाई गई है; धर्मपुत्र राजा का विचार है कि उसके मारे जाने पर कौरव जीत लिए जाएँगे।

श्लोक 80 (8.72.80)

ततो वधं नार्हति धर्मपुत्रः । त्वया प्रतिज्ञाऽर्जुन पालनीया । जीवन्नयं येन मृतो भवेद्धि । तन्मे निबोधेह तवानुरूपम् ॥

tato vadhaṃ nārhati dharmaputraḥ | tvayā pratijñā'rjuna pālanīyā | jīvannayaṃ yena mṛto bhaveddhi | tanme nibodheha tavānurūpam

इसलिए धर्मपुत्र वध के योग्य नहीं हैं, और अर्जुन, तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा निभानी है। सुनो, वे जीवित रहते हुए भी कैसे मृत जैसे हो सकते हैं — यह तुम्हारे अनुकूल है।

श्लोक 81 (8.72.81)

यदा मानं लभते माननार्हः । तदा स वै जीवति जीवलोके । यदाऽवमानं लभते महान्तं । तदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः ॥

yadā mānaṃ labhate mānanārhaḥ | tadā sa vai jīvati jīvaloke | yadā'vamānaṃ labhate mahāntaṃ | tadā jīvanmṛta ityucyate saḥ

जब सम्मान के योग्य पुरुष को सम्मान मिलता है, तभी वह जीवलोक में जीवित है; जब उसे भारी अपमान मिलता है, तब वह जीवित रहते हुए भी मृत कहा जाता है।

श्लोक 82 (8.72.82)

सम्मानितः पार्थिवोऽयं सदैव । त्वया च भीमेन तथा यमाभ्याम् । वृद्धैश्च लोके पुरुषैश्च शूरैः । तस्यापमानं कलया प्रयुङ्क्ष्व ॥

sammānitaḥ pārthivo'yaṃ sadaiva | tvayā ca bhīmena tathā yamābhyām | vṛddhaiśca loke puruṣaiśca śūraiḥ | tasyāpamānaṃ kalayā prayuṅkṣva

इन राजा का तुमने, भीम ने, दोनों जुड़वाँ भाइयों ने, तथा संसार के वृद्धों और वीर पुरुषों ने सदा सम्मान किया है। अब इनका थोड़ा-सा अपमान करो।

श्लोक 83 (8.72.83)

त्वमित्यत्रभवन्तं हि ब्रूहि पार्थ युधिष्ठिरम् । त्वमित्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत ॥

tvamityatrabhavantaṃ hi brūhi pārtha yudhiṣṭhiram | tvamityukto hi nihato gururbhavati bhārata

पार्थ, पूज्य राजा युधिष्ठिर को "तुम" कहकर पुकारो। भारत, बड़े को "तुम" कहने पर वह मारे हुए के समान हो जाता है।

श्लोक 84 (8.72.84)

एवमाचर कौन्तेय धर्मराजे युधिष्ठिरे । अधर्मयुक्तं संयोगं कुरुष्वैनं कुरूद्वह ॥

evamācara kaunteya dharmarāje yudhiṣṭhire | adharmayuktaṃ saṃyogaṃ kuruṣvainaṃ kurūdvaha

कुन्तीपुत्र, धर्मराज युधिष्ठिर के साथ ऐसा ही करो; हे कुरुश्रेष्ठ, उनके साथ यह अधर्म-युक्त व्यवहार कर डालो।

श्लोक 85 (8.72.85)

अथर्वाङ्गिरसी ह्येषा श्रुतीनामुत्तमा श्रुतिः । अविचार्यैव कार्यैषा श्रेयस्कामैर्नरैः सदा ॥

atharvāṅgirasī hyeṣā śrutīnāmuttamā śrutiḥ | avicāryaiva kāryaiṣā śreyaskāmairnaraiḥ sadā

यह अथर्वाङ्गिरसी श्रुति है, श्रुतियों में सर्वोत्तम; कल्याण चाहने वाले मनुष्यों को इसे बिना विचार किए सदा करना चाहिए।

श्लोक 86 (8.72.86)

अवधेन वधः प्रोक्तो यद्गुरुस्त्वमिति प्रभुः । तद्ब्रूहि त्वं यन्मयोक्तं धर्मराजस्य धर्मवित् ॥

avadhena vadhaḥ prokto yadgurustvamiti prabhuḥ | tadbrūhi tvaṃ yanmayoktaṃ dharmarājasya dharmavit

कहा गया है कि बिना वध के भी वध हो जाता है, जब किसी पूज्य स्वामी को "तुम" कहा जाए। जो मैंने कहा है, वही तुम धर्म को जानने वाले धर्मराज से कहो।

श्लोक 87 (8.72.87)

यदा ह्ययं पाण्डव धर्मराजः । स त्वत्तोऽयुक्तं लप्स्यते चैव साधु । ततोऽस्य पादावभिवाद्य पश्चात् । श्रेयो ब्रूयात्सान्त्वयुक्तं हितं च ॥

yadā hyayaṃ pāṇḍava dharmarājaḥ | sa tvatto'yuktaṃ lapsyate caiva sādhu | tato'sya pādāvabhivādya paścāt | śreyo brūyātsāntvayuktaṃ hitaṃ ca

पाण्डव, जब ये धर्मराज तुमसे कुछ अनुचित पाएँगे और कुछ अच्छा भी, तब उनके चरणों में प्रणाम करके फिर सान्त्वना से भरी हितकर बात कहना।

श्लोक 88 (8.72.88)

भ्राता प्राज्ञस्तव कोपं न जातु । कुर्याद्राजा धर्ममार्गानुसारी । मुक्तोऽनृताद्भ्रातृवधाच्च पापात् । हृष्टः कर्णं त्वं जहि पार्थ पश्चात् ॥

bhrātā prājñastava kopaṃ na jātu | kuryādrājā dharmamārgānusārī | mukto'nṛtādbhrātṛvadhācca pāpāt | hṛṣṭaḥ karṇaṃ tvaṃ jahi pārtha paścāt

तुम्हारे बुद्धिमान भाई, धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा, तुम पर कभी क्रोध नहीं करेंगे। असत्य और भ्रातृवध के पाप से मुक्त होकर, पार्थ, प्रसन्न मन से बाद में कर्ण को मारना।"

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