कर्ण पर्व · अध्याय 78
अर्जुन की कर्णवध की प्रतिज्ञा
कृष्ण के वचनों से प्रसन्न होकर अर्जुन प्रत्यञ्चा को पोंछता है, कर्ण के विनाश के लिए गाण्डीव धारण करता है और कहता है कि गोविन्द की कृपा से उसकी विजय निश्चित है। वह पाञ्चालों को भागते और कर्ण को भार्गवास्त्र चलाते देखता है, और उसी दिन कर्ण को मारने की प्रतिज्ञा करता है: धृतराष्ट्र और दुर्योधन की सारी आशा टूट जाएगी, द्रौपदी और पाण्डवों के अपमान का बदला चुकेगा और तेरह वर्षों का उसका दुःख समाप्त होगा। अन्त में वह धनुर्विद्या, क्षमा और क्रोध में अपनी अतुलनीयता का बखान करता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.78.1)
स केशवस्य बीभत्सुः श्रुत्वा भारत भाषितम् । विशोकः संप्रहृष्टश्च क्षणेन समपद्यत ॥
sa keśavasya bībhatsuḥ śrutvā bhārata bhāṣitam | viśokaḥ saṃprahṛṣṭaśca kṣaṇena samapadyata
हे भारत! केशव के वचन सुनकर बीभत्सु क्षण भर में शोकरहित और अत्यन्त हर्षित हो गया।
श्लोक 2 (8.78.2)
ततो ज्यामनुमृज्याशु व्याक्षिपद्गाण्डिवं धनुः । दध्रे कर्णविनाशाय केशवं चाभ्यभाषत ॥
tato jyāmanumṛjyāśu vyākṣipadgāṇḍivaṃ dhanuḥ | dadhre karṇavināśāya keśavaṃ cābhyabhāṣata
फिर उसने शीघ्र ही प्रत्यञ्चा को पोंछा, गाण्डीव धनुष को टङ्कारा, उसे कर्ण के विनाश के लिए धारण किया और केशव से बोला।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (8.78.3)
त्वया नाथेन गोविन्द ध्रुव एष जयो मम । प्रसन्नो यस्य मेऽद्य त्वं भूतभव्यभवत्प्रभुः ॥
tvayā nāthena govinda dhruva eṣa jayo mama | prasanno yasya me'dya tvaṃ bhūtabhavyabhavatprabhuḥ
"हे गोविन्द! आप जैसे नाथ के रहते मेरी यह विजय निश्चित है, क्योंकि भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी आप आज मुझ पर प्रसन्न हैं।
श्लोक 4 (8.78.4)
त्वत्सहायो ह्यहं कृष्ण त्रींल्लोकान्वै समागतान् । प्रापयेयं परं लोकं किमु कर्णं महारणे ॥
tvatsahāyo hyahaṃ kṛṣṇa trīṃllokānvai samāgatān | prāpayeyaṃ paraṃ lokaṃ kimu karṇaṃ mahāraṇe
हे कृष्ण! आपकी सहायता से तो मैं एकत्र हुए तीनों लोकों को भी परलोक पहुँचा दूँ; फिर इस महायुद्ध में कर्ण की तो बात ही क्या।
श्लोक 5 (8.78.5)
पश्यामि द्रवतीं सेनां पाञ्चालानां जनार्दन । पश्यामि कर्णं समरे विचरन्तमभीतवत् ॥
paśyāmi dravatīṃ senāṃ pāñcālānāṃ janārdana | paśyāmi karṇaṃ samare vicarantamabhītavat
हे जनार्दन! मैं पाञ्चालों की सेना को भागते देख रहा हूँ; मैं कर्ण को युद्ध में निर्भय होकर विचरते देख रहा हूँ।
श्लोक 6 (8.78.6)
भार्गवास्त्रं च पश्यामि विचरन्तं समन्ततः । सृष्टं कर्णेन वार्ष्णेय शक्रेणेव महाशनिम् ॥
bhārgavāstraṃ ca paśyāmi vicarantaṃ samantataḥ | sṛṣṭaṃ karṇena vārṣṇeya śakreṇeva mahāśanim
हे वार्ष्णेय! मैं कर्ण के छोड़े हुए भार्गवास्त्र को भी चारों ओर विचरते देख रहा हूँ, मानो शक्र (इन्द्र) का छोड़ा हुआ महान् वज्र हो।
श्लोक 7 (8.78.7)
अयं खलु स संग्रामो यत्र कृष्ण मया कृतम् । कथयिष्यन्ति भूतानि यावद्भूमिर्धरिष्यति ॥
ayaṃ khalu sa saṃgrāmo yatra kṛṣṇa mayā kṛtam | kathayiṣyanti bhūtāni yāvadbhūmirdhariṣyati
हे कृष्ण! यह वही संग्राम है जिसमें मेरे किए हुए कर्म को सब प्राणी तब तक कहते रहेंगे जब तक पृथ्वी टिकी रहेगी।
श्लोक 8 (8.78.8)
अद्य कृष्ण विकर्णा मे कर्णं नेष्यन्ति मृत्यवे । गाण्डीवमुक्ताः क्षिण्वन्तो मम हस्तप्रचोदिताः ॥
adya kṛṣṇa vikarṇā me karṇaṃ neṣyanti mṛtyave | gāṇḍīvamuktāḥ kṣiṇvanto mama hastapracoditāḥ
हे कृष्ण! आज गाण्डीव से छूटे और मेरे हाथ से प्रेरित मेरे विकर्ण बाण, सबका संहार करते हुए, कर्ण को मृत्यु के पास पहुँचा देंगे।
श्लोक 9 (8.78.9)
अद्य राजा धृतराष्ट्रः स्वां बुद्धिमवमंस्यते । दुर्योधनमराज्यार्हं यया राज्येऽभ्यषेचयत् ॥
adya rājā dhṛtarāṣṭraḥ svāṃ buddhimavamaṃsyate | duryodhanamarājyārhaṃ yayā rājye'bhyaṣecayat
आज राजा धृतराष्ट्र अपनी उस बुद्धि को धिक्कारेंगे, जिससे उन्होंने राज्य के अयोग्य दुर्योधन का राज्याभिषेक किया था।
श्लोक 10 (8.78.10)
अद्य राज्यात्सुखाच्चैव श्रियो राष्ट्रात्तथा पुरात् । पुत्रेभ्यश्च महाबाहो धृतराष्ट्रो वियोक्ष्यते ॥
adya rājyātsukhāccaiva śriyo rāṣṭrāttathā purāt | putrebhyaśca mahābāho dhṛtarāṣṭro viyokṣyate
हे महाबाहो! आज धृतराष्ट्र राज्य और सुख से, श्री से, राष्ट्र और नगर से तथा अपने पुत्रों से बिछुड़ जाएँगे।
श्लोक 11 (8.78.11)
अद्य दुर्योधनो राजा जीविताच्च निराशकः । भविष्यति हते कर्णे कृष्ण सत्यं ब्रवीमि ते ॥
adya duryodhano rājā jīvitācca nirāśakaḥ | bhaviṣyati hate karṇe kṛṣṇa satyaṃ bravīmi te
हे कृष्ण! आज कर्ण के मारे जाने पर राजा दुर्योधन को अपने जीवन की भी आशा नहीं रहेगी; मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 12 (8.78.12)
अद्य दृष्ट्वा मया कर्णं शरैर्विशकलीकृतम् । स्मरतां तव वाक्यानि शमं प्रति जनेश्वरः ॥
adya dṛṣṭvā mayā karṇaṃ śarairviśakalīkṛtam | smaratāṃ tava vākyāni śamaṃ prati janeśvaraḥ
आज कर्ण को मेरे बाणों से टुकड़े-टुकड़े हुआ देखकर वह नरेश शान्ति के विषय में आपके वचनों को स्मरण करे।
श्लोक 13 (8.78.13)
अद्यासौ सौबलः कृष्ण ग्लहं जानातु वै शरान् । दुरोदरं च गाण्डीवं मण्डलं च रथं मम ॥
adyāsau saubalaḥ kṛṣṇa glahaṃ jānātu vai śarān | durodaraṃ ca gāṇḍīvaṃ maṇḍalaṃ ca rathaṃ mama
हे कृष्ण! आज सुबलपुत्र शकुनि दाँव को जान ले: वह बाणों को दाँव, गाण्डीव को द्यूत और मेरे रथ को द्यूत-मण्डल समझे।
श्लोक 14 (8.78.14)
योऽसौ रणे नरं नान्यं पृथिव्यामभिमन्यते । तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पास्यति शोणितम् । गाण्डीवसृष्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ॥
yo'sau raṇe naraṃ nānyaṃ pṛthivyāmabhimanyate | tasyādya sūtaputrasya bhūmiḥ pāsyati śoṇitam | gāṇḍīvasṛṣṭā dāsyanti karṇasya paramāṃ gatim
जो युद्ध में पृथ्वी पर किसी दूसरे पुरुष को अपने बराबर नहीं मानता, उस सूतपुत्र का रक्त आज पृथ्वी पिएगी। गाण्डीव से छूटे मेरे बाण कर्ण को उसकी अन्तिम गति देंगे।
श्लोक 15 (8.78.15)
अद्य तप्स्यति राधेयः पाञ्चालीं यत्तदाब्रवीत् । सभामध्ये वचः क्रूरं कुत्सयन्पाण्डवान्प्रति ॥
adya tapsyati rādheyaḥ pāñcālīṃ yattadābravīt | sabhāmadhye vacaḥ krūraṃ kutsayanpāṇḍavānprati
आज राधापुत्र को उन क्रूर वचनों का पश्चात्ताप होगा जो उसने सभा के बीच पाण्डवों की निन्दा करते हुए पाञ्चाली से कहे थे।
श्लोक 16 (8.78.16)
ये वै षण्ढतिलास्तत्र भवितारोऽद्य ते तिलाः । हते वैकर्तने कर्णे सूतपुत्रे दुरात्मनि ॥
ye vai ṣaṇḍhatilāstatra bhavitāro'dya te tilāḥ | hate vaikartane karṇe sūtaputre durātmani
वहाँ जिन्हें निष्फल तिल कहा गया था, वे आज सच्चे तिल बन जाएँगे, जब दुष्टात्मा सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण मारा जाएगा।
श्लोक 17 (8.78.17)
अहं वः पाण्डुपुत्रेभ्यस्त्रास्यामीति यदब्रवीत् । अनृतं तत्करिष्यन्ति मामका निशिताः शराः ॥
ahaṃ vaḥ pāṇḍuputrebhyastrāsyāmīti yadabravīt | anṛtaṃ tatkariṣyanti māmakā niśitāḥ śarāḥ
जिसने कहा था, "मैं तुम्हें पाण्डुपुत्रों से बचाऊँगा," उसकी वह बात मेरे तीखे बाण झूठी कर देंगे।
श्लोक 18 (8.78.18)
हन्ताहं पाण्डवान्सर्वान्सपुत्रानिति योऽब्रवीत् । तमद्य कर्णं हन्तास्मि मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
hantāhaṃ pāṇḍavānsarvānsaputrāniti yo'bravīt | tamadya karṇaṃ hantāsmi miṣatāṃ sarvadhanvinām
जिसने कहा था, "मैं सब पाण्डवों को उनके पुत्रों सहित मारूँगा," उसी कर्ण को आज मैं सब धनुर्धारियों के देखते-देखते मारूँगा।
श्लोक 19 (8.78.19)
यस्य वीर्ये समाश्वस्य धार्तराष्ट्रो बृहन्मनाः । अवामन्यत दुर्बुद्धिर्नित्यमस्मान्दुरात्मवान् । तमद्य कर्णं राधेयं हन्तास्मि मधुसूदन ॥
yasya vīrye samāśvasya dhārtarāṣṭro bṛhanmanāḥ | avāmanyata durbuddhirnityamasmāndurātmavān | tamadya karṇaṃ rādheyaṃ hantāsmi madhusūdana
जिसके बल का भरोसा करके दुर्बुद्धि और दुष्टात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र अहंकार से भरकर सदा हमारा अपमान करता रहा, उसी राधापुत्र कर्ण को आज मैं मारूँगा, हे मधुसूदन।
श्लोक 20 (8.78.20)
अद्य कर्णे हते कृष्ण धार्तराष्ट्राः सराजकाः । विद्रवन्तु दिशो भीताः सिंहत्रस्ता मृगा इव ॥
adya karṇe hate kṛṣṇa dhārtarāṣṭrāḥ sarājakāḥ | vidravantu diśo bhītāḥ siṃhatrastā mṛgā iva
हे कृष्ण! आज कर्ण के मारे जाने पर धृतराष्ट्र के पुत्र अपने राजाओं सहित, सिंह से डरे हुए मृगों की भाँति, भयभीत होकर चारों दिशाओं में भाग खड़े हों।
श्लोक 21 (8.78.21)
अद्य दुर्योधनो राजा पृथिवीमन्ववेक्षताम् । हते कर्णे मया संख्ये सपुत्रे ससुहृज्जने ॥
adya duryodhano rājā pṛthivīmanvavekṣatām | hate karṇe mayā saṃkhye saputre sasuhṛjjane
आज युद्ध में मेरे हाथों पुत्र, मित्रों और सम्बन्धियों सहित कर्ण के मारे जाने पर राजा दुर्योधन पृथ्वी की ओर देखे।
श्लोक 22 (8.78.22)
अद्य कर्णं हतं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः । जानातु मां रणे कृष्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम् ॥
adya karṇaṃ hataṃ dṛṣṭvā dhārtarāṣṭro'tyamarṣaṇaḥ | jānātu māṃ raṇe kṛṣṇa pravaraṃ sarvadhanvinām
हे कृष्ण! आज कर्ण को मरा देखकर अत्यन्त क्रोधी धृतराष्ट्र-पुत्र मुझे युद्ध में सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ जान ले।
श्लोक 23 (8.78.23)
अद्याहमनृणः कृष्ण भविष्यामि धनुर्भृताम् । क्रोधस्य च कुरूणां च शराणां गाण्डिवस्य च ॥
adyāhamanṛṇaḥ kṛṣṇa bhaviṣyāmi dhanurbhṛtām | krodhasya ca kurūṇāṃ ca śarāṇāṃ gāṇḍivasya ca
हे कृष्ण! आज मैं धनुर्धारियों के, अपने क्रोध और कौरवों के तथा अपने बाणों और गाण्डीव के ऋण से उऋण हो जाऊँगा।
श्लोक 24 (8.78.24)
अद्य दुःखमहं मोक्ष्ये त्रयोदशसमार्जितम् । हत्वा कर्णं रणे कृष्ण शम्बरं मघवानिव ॥
adya duḥkhamahaṃ mokṣye trayodaśasamārjitam | hatvā karṇaṃ raṇe kṛṣṇa śambaraṃ maghavāniva
हे कृष्ण! आज रण में कर्ण को मारकर मैं तेरह वर्षों से सञ्चित दुःख से वैसे ही मुक्त हो जाऊँगा, जैसे मघवा (इन्द्र) शम्बर को मारकर हुए थे।
श्लोक 25 (8.78.25)
अद्य कर्णे हते युद्धे सोमकानां महारथाः । कृतं कार्यं च मन्यन्तां मित्रकार्येप्सवो युधि ॥
adya karṇe hate yuddhe somakānāṃ mahārathāḥ | kṛtaṃ kāryaṃ ca manyantāṃ mitrakāryepsavo yudhi
आज युद्ध में कर्ण के मारे जाने पर मित्र का कार्य सिद्ध करने की इच्छा रखने वाले सोमकों के महारथी अपना कार्य पूरा हुआ मानें।
श्लोक 26 (8.78.26)
न जाने च कथं प्रीतिः शैनेयस्याद्य माधव । भविष्यति हते कर्णे मयि चापि जयाधिके ॥
na jāne ca kathaṃ prītiḥ śaineyasyādya mādhava | bhaviṣyati hate karṇe mayi cāpi jayādhike
हे माधव! मैं नहीं जानता कि आज कर्ण के मारे जाने पर, जब मैं विजय में सबसे आगे रहूँगा, शैनेय को कितनी प्रसन्नता होगी।
श्लोक 27 (8.78.27)
अहं हत्वा रणे कर्णं पुत्रं चास्य महारथम् । प्रीतिं दास्यामि भीमस्य यमयोः सात्यकेरपि ॥
ahaṃ hatvā raṇe karṇaṃ putraṃ cāsya mahāratham | prītiṃ dāsyāmi bhīmasya yamayoḥ sātyakerapi
रण में कर्ण को और उसके महारथी पुत्र को भी मारकर मैं भीम, दोनों यमज भाइयों और सात्यकि को आनन्द दूँगा।
श्लोक 28 (8.78.28)
धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां पाञ्चालानां च माधव । अध्यानृण्यं गमिष्यामि हत्वा कर्णं महारणे ॥
dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍibhyāṃ pāñcālānāṃ ca mādhava | adhyānṛṇyaṃ gamiṣyāmi hatvā karṇaṃ mahāraṇe
हे माधव! महायुद्ध में कर्ण को मारकर मैं धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और पाञ्चालों के ऋण से उऋण हो जाऊँगा।
श्लोक 29 (8.78.29)
अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् । युध्यन्तं कौरवान्संख्ये पातयन्तं च सूतजम् । भवत्सकाशे वक्ष्ये च पुनरेवात्मसंस्तवम् ॥
adya paśyantu saṃgrāme dhanaṃjayamamarṣaṇam | yudhyantaṃ kauravānsaṃkhye pātayantaṃ ca sūtajam | bhavatsakāśe vakṣye ca punarevātmasaṃstavam
आज वे संग्राम में अमर्षी धनञ्जय को कौरवों से लड़ते और सूतपुत्र को गिराते हुए देखें। और आपके सामने मैं एक बार फिर अपनी ही प्रशंसा करूँगा।
श्लोक 30 (8.78.30)
धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके । पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्यः । को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमायां । तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति ॥
dhanurvede matsamo nāsti loke | parākrame vā mama ko'sti tulyaḥ | ko vāpyanyo matsamo'sti kṣamāyāṃ | tathā krodhe sadṛśo'nyo na me'sti
धनुर्वेद में संसार में मेरे समान कोई नहीं है; पराक्रम में मेरी बराबरी का कौन है? क्षमा में भी मेरे समान दूसरा कौन है? और क्रोध में भी मेरे जैसा कोई दूसरा नहीं है।
श्लोक 31 (8.78.31)
अहं धनुष्मानसुरान्सुरांश्च । सर्वाणि भूतानि च संगतानि । स्वबाहुवीर्याद्गमये पराभवं । मत्पौरुषं विद्धि परः परेभ्यः ॥
ahaṃ dhanuṣmānasurānsurāṃśca | sarvāṇi bhūtāni ca saṃgatāni | svabāhuvīryādgamaye parābhavaṃ | matpauruṣaṃ viddhi paraḥ parebhyaḥ
मैं धनुर्धर अपनी भुजाओं के बल से असुरों, देवताओं और एकत्र हुए सब प्राणियों को भी पराजित कर सकता हूँ; मेरे पौरुष को दूसरे श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ जानो।
श्लोक 32 (8.78.32)
शरार्चिषा गाण्डिवेनाहमेकः । सर्वान्कुरून्बाह्लिकांश्चाभिपत्य । हिमात्यये कक्षगतो यथाग्नि- । स्तथा दहेयं सगणान्प्रसह्य ॥
śarārciṣā gāṇḍivenāhamekaḥ | sarvānkurūnbāhlikāṃścābhipatya | himātyaye kakṣagato yathāgni- | stathā daheyaṃ sagaṇānprasahya
गाण्डीव से छूटी बाण-ज्वालाओं से मैं अकेला सब कौरवों और बाह्लिकों पर टूटकर उन्हें उनके दलों सहित बलपूर्वक वैसे ही जला डालूँगा, जैसे शीत ऋतु बीतने पर सूखी झाड़ियों में लगी आग उन्हें जला डालती है।
श्लोक 33 (8.78.33)
पाणौ पृषत्का लिखिता ममैते । धनुश्च सव्ये निहितं सबाणम् । पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च । न मादृशं युद्धगतं जयन्ति ॥
pāṇau pṛṣatkā likhitā mamaite | dhanuśca savye nihitaṃ sabāṇam | pādau ca me sarathau sadhvajau ca | na mādṛśaṃ yuddhagataṃ jayanti
मेरी हथेली पर ये बाण अङ्कित हैं, मेरे बाएँ हाथ में बाण सहित धनुष स्थित है, और मेरे चरणों में रथ और ध्वज के चिह्न हैं; मुझ जैसे पुरुष को युद्ध में गया हुआ पाकर कोई जीत नहीं पाता।"