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कर्ण पर्व · अध्याय 77

कृष्ण का अर्जुन को कर्णवध के लिए प्रेरित करना

केशव अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि अर्जुन के पाण्डवों की रक्षा करते रहने पर भीष्म और द्रोण सहित कौरवों की विशाल सेना और उसके महान् सेनानायक कैसे गिरे, और अब केवल पाँच महारथी शेष हैं। वे अर्जुन को कर्ण को मारने के लिए प्रेरित करते हैं, जो पाण्डवों के प्रति किए गए अन्यायों — माता और पुत्रों को रात में जलाने के प्रयत्न, द्यूत, द्रौपदी के अपमान और अभिमन्यु के वध — की जड़ है, और चेताते हैं कि कर्ण का अस्त्र पांचालों और भीम को काट रहा है।

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.77.1)

ततः पुनरमेयात्मा केशवोऽर्जुनमब्रवीत् । कृतसङ्कल्पमायान्तं वधे कर्णस्य भारत ॥

tataḥ punarameyātmā keśavo'rjunamabravīt | kṛtasaṅkalpamāyāntaṃ vadhe karṇasya bhārata

तब अपरिमित आत्मबल वाले केशव ने, कर्ण के वध का निश्चय किए हुए आते अर्जुन से फिर कहा, हे भारत।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (8.77.2)

अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य नित्यशः । विनाशस्यातिघोरस्य नरवारणवाजिनाम् ॥

adya saptadaśāhāni vartamānasya nityaśaḥ | vināśasyātighorasya naravāraṇavājinām

आज सत्रह दिन हो गए हैं; मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों का यह अत्यन्त भीषण संहार निरन्तर चल रहा है।

श्लोक 3 (8.77.3)

भूत्वा हि विपुला सेना तावकानां परैः सह । अन्योन्यं समरं प्राप्य किञ्चिच्छेषा विशाम्पते ॥

bhūtvā hi vipulā senā tāvakānāṃ paraiḥ saha | anyonyaṃ samaraṃ prāpya kiñciccheṣā viśāmpate

हे प्रजापालक, तुम्हारे पक्ष की जो सेना कभी विशाल थी, वह शत्रुओं से भिड़कर परस्पर युद्ध में घिसकर अब थोड़ी-सी ही बची है।

श्लोक 4 (8.77.4)

भूत्वा वै कौरवाः पार्थ प्रभूतगजवाजिनः । त्वां वै शत्रुं समासाद्य विनष्टा रणमूर्धनि ॥

bhūtvā vai kauravāḥ pārtha prabhūtagajavājinaḥ | tvāṃ vai śatruṃ samāsādya vinaṣṭā raṇamūrdhani

हे पार्थ, बहुत-से हाथी-घोड़ों वाले कौरव तुम्हें शत्रु रूप में पाकर रणभूमि के अग्रभाग में ही नष्ट हो गए।

श्लोक 5 (8.77.5)

एते ते पृथिवीपालाः सृञ्जयाश्च समागताः । त्वां समासाद्य दुर्धर्षं पाण्डवाश्च व्यवस्थिताः ॥

ete te pṛthivīpālāḥ sṛñjayāśca samāgatāḥ | tvāṃ samāsādya durdharṣaṃ pāṇḍavāśca vyavasthitāḥ

ये तुम्हारे पक्ष के राजा और एकत्र हुए सृंजय, तथा पाण्डव भी, तुम जैसे दुर्धर्ष वीर को साथ पाकर डटे हुए हैं।

श्लोक 6 (8.77.6)

पाञ्चालैः पाण्डवैर्मात्स्यैः कारूशैश्चेदिभिः सह । मगधैः पारिजातैश्च दाक्षिणात्यैः सकेरलैः । त्वया गुप्तैरमित्रघ्नैः कृतः शत्रुगणक्षयः ॥

pāñcālaiḥ pāṇḍavairmātsyaiḥ kārūśaiścedibhiḥ saha | magadhaiḥ pārijātaiśca dākṣiṇātyaiḥ sakeralaiḥ | tvayā guptairamitraghnaiḥ kṛtaḥ śatrugaṇakṣayaḥ

पांचालों, पाण्डवों, मत्स्यों, कारूशों और चेदियों के साथ, तथा मगधों, पारिजातों, दक्षिणवासियों और केरलों के साथ — हे शत्रुनाशक, तुमसे रक्षित होकर इन्होंने शत्रुसमूह का संहार कर दिया है।

श्लोक 7 (8.77.7)

को हि शक्तो रणे जेतुं कौरवांस्तात संयुगे । अन्यत्र पाण्डवाद्युद्धे श्वेताश्वाद्वानरध्वजात् ॥

ko hi śakto raṇe jetuṃ kauravāṃstāta saṃyuge | anyatra pāṇḍavādyuddhe śvetāśvādvānaradhvajāt

हे तात, श्वेत अश्वों और वानर-ध्वज वाले पाण्डुपुत्र अर्जुन को छोड़कर और कौन है जो युद्ध में कौरवों को जीत सके?

श्लोक 8 (8.77.8)

शक्तस्त्वं हि रणे जेतुं ससुरासुरमानुषान् । त्रींल्लोकान्समरे युक्तान्किं पुनः कौरवं बलम् ॥

śaktastvaṃ hi raṇe jetuṃ sasurāsuramānuṣān | trīṃllokānsamare yuktānkiṃ punaḥ kauravaṃ balam

तुम तो देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोकों को भी, यदि वे युद्ध के लिए एक हो जाएँ, रण में जीतने में समर्थ हो; फिर कौरवों की सेना की तो बात ही क्या?

श्लोक 9 (8.77.9)

भगदत्तं च राजानं कोऽन्यः शक्तस्त्वया विना । जेतुं पुरुषशार्दूल योऽपि स्याद्वासवोपमः ॥

bhagadattaṃ ca rājānaṃ ko'nyaḥ śaktastvayā vinā | jetuṃ puruṣaśārdūla yo'pi syādvāsavopamaḥ

हे पुरुषश्रेष्ठ, इन्द्र के समान वीर राजा भगदत्त को भी तुम्हारे बिना और कौन जीत सकता था?

श्लोक 10 (8.77.10)

तथेमां विपुलां सेनां गुप्तां पार्थ त्वयाऽनघ । न शेकुः पार्थिवाः सर्वे चक्षुर्भिरपि वीक्षितुम् ॥

tathemāṃ vipulāṃ senāṃ guptāṃ pārtha tvayā'nagha | na śekuḥ pārthivāḥ sarve cakṣurbhirapi vīkṣitum

हे निष्पाप पार्थ, तुमसे रक्षित इस विशाल सेना की ओर तो सब राजा आँख उठाकर देख भी नहीं सके।

श्लोक 11 (8.77.11)

तथैव सततं पार्थ रक्षिताभ्यां त्वया रणे । धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां द्रोणभीष्मौ निपातितौ ॥

tathaiva satataṃ pārtha rakṣitābhyāṃ tvayā raṇe | dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍibhyāṃ droṇabhīṣmau nipātitau

इसी प्रकार हे पार्थ, तुमसे सदा रण में सुरक्षित धृष्टद्युम्न और शिखण्डी के हाथों द्रोण और भीष्म मारे गए।

श्लोक 12 (8.77.12)

को हि शक्तो रणे पार्थ भारतानां महारथौ । भीष्मद्रोणौ युधा जेतुं शक्रतुल्यपराक्रमौ ॥

ko hi śakto raṇe pārtha bhāratānāṃ mahārathau | bhīṣmadroṇau yudhā jetuṃ śakratulyaparākramau

हे पार्थ, इन्द्र के समान पराक्रमी, भरतवंश के उन दो महारथियों, भीष्म और द्रोण को युद्ध में कौन जीत सकता था?

श्लोक 13 (8.77.13)

को हि शान्तनवं भीष्मं द्रोणं वैकर्तनं कृपम् । द्रौणिं च सौमदत्तिं च कृतवर्माणमेव च ॥

ko hi śāntanavaṃ bhīṣmaṃ droṇaṃ vaikartanaṃ kṛpam | drauṇiṃ ca saumadattiṃ ca kṛtavarmāṇameva ca

शान्तनु-पुत्र भीष्म, द्रोण, वैकर्तन कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, सोमदत्त के पुत्र और कृतवर्मा को भी कौन जीत सकता है —

श्लोक 14 (8.77.14)

सैन्धवं मद्रराजं च राजानं च सुयोधनम् । वीरान्कृतास्त्रान्समरे सर्वानेवानिवर्तिनः ॥

saindhavaṃ madrarājaṃ ca rājānaṃ ca suyodhanam | vīrānkṛtāstrānsamare sarvānevānivartinaḥ

सिन्धुराज, मद्रराज और राजा सुयोधन को भी — अस्त्रविद्या में निपुण, युद्ध से कभी न हटने वाले इन सब वीरों को —

श्लोक 15 (8.77.15)

अक्षौहिणीपतीनुग्रान्संहतान्युद्धदुर्मदान् । त्वामृते पुरुषव्याघ्र जेतुं शक्तः पुमानिह ॥

akṣauhiṇīpatīnugrānsaṃhatānyuddhadurmadān | tvāmṛte puruṣavyāghra jetuṃ śaktaḥ pumāniha

तथा अक्षौहिणियों के उन उग्र, संगठित और युद्ध-मद में उन्मत्त अधिपतियों को? हे पुरुषव्याघ्र, तुम्हारे सिवा इस लोक में कौन पुरुष इन्हें जीतने में समर्थ है?

श्लोक 16 (8.77.16)

श्रेण्यश्च बहुलाः क्षीणाः प्रदीर्णाश्वरथद्विपाः । नानाजनपदाश्चोग्राः क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥

śreṇyaśca bahulāḥ kṣīṇāḥ pradīrṇāśvarathadvipāḥ | nānājanapadāścogrāḥ kṣatriyāṇāmamarṣiṇām

अनेक सैन्य-पंक्तियाँ नष्ट हो गईं, घोड़े, रथ और हाथी बिखर गए, और रोष से भरे क्षत्रियों के अनेक जनपदों के उग्र योद्धा —

श्लोक 17 (8.77.17)

गणाश्च दासमीयानां वसातीनां च भारत । प्राच्यानां वाटधानानां भोजानां चाभिमानिनाम् ॥

gaṇāśca dāsamīyānāṃ vasātīnāṃ ca bhārata | prācyānāṃ vāṭadhānānāṃ bhojānāṃ cābhimāninām

हे भारत, दासमीय और वसाति लोगों के दल, तथा प्राच्य, वाटधान और अभिमानी भोज लोगों के दल —

श्लोक 18 (8.77.18)

उदीर्णाश्वगजा सेना सर्वक्षत्रस्य भारत । त्वां समासाद्य निधनं गता भीमं च भारत ॥

udīrṇāśvagajā senā sarvakṣatrasya bhārata | tvāṃ samāsādya nidhanaṃ gatā bhīmaṃ ca bhārata

उत्तेजित हाथी-घोड़ों वाली समस्त क्षत्रियों की वह सेना, हे भारत, तुम्हें और भीम को पाकर विनाश को प्राप्त हो गई।

श्लोक 19 (8.77.19)

उग्राश्च भीमकर्माणस्तुषारा यवनाः खशाः । दार्वाभिसारा दरदाः शका माठरतङ्कणाः ॥

ugrāśca bhīmakarmāṇastuṣārā yavanāḥ khaśāḥ | dārvābhisārā daradāḥ śakā māṭharataṅkaṇāḥ

उग्र और भयंकर कर्म करने वाले तुषार, यवन, खश, दार्वाभिसार, दरद, शक, माठर और तङ्कण,

श्लोक 20 (8.77.20)

आन्ध्रकाश्च पुलिन्दाश्च किराताश्चोग्रविक्रमाः । म्लेच्छाश्च पर्वतीयाश्च सागरानूपवासिनः । संरम्भिणो युद्धशौण्डा बलिनो दण्डपाणयः ॥

āndhrakāśca pulindāśca kirātāścogravikramāḥ | mlecchāśca parvatīyāśca sāgarānūpavāsinaḥ | saṃrambhiṇo yuddhaśauṇḍā balino daṇḍapāṇayaḥ

आन्ध्र, पुलिन्द और प्रचण्ड पराक्रमी किरात, म्लेच्छ, पर्वतवासी तथा समुद्र-तट और जलप्राय देशों के निवासी — ये सब क्रोध से भरे, युद्ध में निपुण, बलवान् और हाथ में दण्ड लिए हुए हैं।

श्लोक 21 (8.77.21)

एते सुयोधनस्यार्थे संरब्धाः कुरुभिः सह । न शक्या युधि निर्जेतुं त्वदन्येन परन्तप ॥

ete suyodhanasyārthe saṃrabdhāḥ kurubhiḥ saha | na śakyā yudhi nirjetuṃ tvadanyena parantapa

ये सब सुयोधन के लिए कुरुओं के साथ क्रुद्ध खड़े हैं; हे परंतप, तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इन्हें युद्ध में नहीं जीत सकता।

श्लोक 22 (8.77.22)

एते सुयोधनस्यार्थे संरब्धाः कुरुभिः सह । न शक्या युधि निर्जेतुं त्वदन्येन परन्तप ॥

ete suyodhanasyārthe saṃrabdhāḥ kurubhiḥ saha | na śakyā yudhi nirjetuṃ tvadanyena parantapa

हे शत्रुओं को तपाने वाले, ये सुयोधन के हेतु कुरुओं के साथ रोष से भरे हैं; तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी इन्हें युद्ध में परास्त नहीं कर सकता।

श्लोक 23 (8.77.23)

धार्तराष्ट्रमुदग्रं हि व्यूढं दृष्ट्वा महद्बलम् । यदि त्वं न भवेस्त्राता प्रतीयात्को नु मानवः ॥

dhārtarāṣṭramudagraṃ hi vyūḍhaṃ dṛṣṭvā mahadbalam | yadi tvaṃ na bhavestrātā pratīyātko nu mānavaḥ

धृतराष्ट्र-पुत्र की इस ऊँचे व्यूह में सजी विशाल सेना को देखकर, यदि तुम हमारे रक्षक न होते तो कौन मनुष्य इसके सामने ठहरता?

श्लोक 24 (8.77.24)

तत्सागरमिवोद्वूतं रजसा संवृतं बलम् । विदार्य पाण्डवैः क्रुद्धैस्त्वया गुप्तैर्हतं विभो ॥

tatsāgaramivodvūtaṃ rajasā saṃvṛtaṃ balam | vidārya pāṇḍavaiḥ kruddhaistvayā guptairhataṃ vibho

समुद्र की भाँति उमड़ती, धूल से ढकी उस सेना को क्रुद्ध पाण्डवों ने, हे प्रभु, तुम्हारी रक्षा में रहकर चीरकर मार डाला।

श्लोक 25 (8.77.25)

मागधानामधिपतिर्जयत्सेनो महाबलः । अद्य सप्तैव चाहानि हतः सङ्ख्येऽभिमन्युना ॥

māgadhānāmadhipatirjayatseno mahābalaḥ | adya saptaiva cāhāni hataḥ saṅkhye'bhimanyunā

मगधों का महाबली अधिपति जयत्सेन केवल सात दिन पहले रणभूमि में अभिमन्यु के हाथों मारा गया था।

श्लोक 26 (8.77.26)

ततो दशसहस्राणि गजानां भीमकर्मणाम् । जघान गदया भीमस्तस्य राज्ञः परिच्छदम् ॥

tato daśasahasrāṇi gajānāṃ bhīmakarmaṇām | jaghāna gadayā bhīmastasya rājñaḥ paricchadam

तब भीम ने गदा से उस राजा के परिवार-दल के भयंकर कर्म वाले दस हजार हाथियों को मार गिराया।

श्लोक 27 (8.77.27)

तथान्येऽभिहता नागा रथाश्च शतशो बलात् । तदेवं समरे पार्थ वर्तमाने महाभये ॥

tathānye'bhihatā nāgā rathāśca śataśo balāt | tadevaṃ samare pārtha vartamāne mahābhaye

अन्य हाथी और सैकड़ों रथ भी बलपूर्वक मारे गए। हे पार्थ, इस प्रकार जब वह महाभयंकर युद्ध चल रहा था,

श्लोक 28 (8.77.28)

भीमसेनं समासाद्य त्वां च पाण्डव कौरवाः । सवाजिरथमातङ्गा मृत्युलोकमितो गताः ॥

bhīmasenaṃ samāsādya tvāṃ ca pāṇḍava kauravāḥ | savājirathamātaṅgā mṛtyulokamito gatāḥ

तब भीमसेन और तुम, दोनों के सामने आकर, हे पाण्डव, कौरव घोड़ों, रथों और हाथियों सहित यहाँ से मृत्युलोक को चले गए।

श्लोक 29 (8.77.29)

तथा सेनामुखे तत्र निहते पार्थ पाण्डवैः । भीष्मः प्रासृजदुग्राणि शरतालानि मारिष ॥

tathā senāmukhe tatra nihate pārtha pāṇḍavaiḥ | bhīṣmaḥ prāsṛjadugrāṇi śaratālāni māriṣa

हे आर्य, उस समय जब सेना का अग्रभाग पाण्डवों द्वारा वहाँ मारा जा चुका था, तब भीष्म ने भयंकर बाणों की झड़ियाँ बरसाईं।

श्लोक 30 (8.77.30)

सचेदिकाशिपाञ्चालान्करूशान्मात्स्यकेकयान् । शरैः प्रच्छाद्य निधनमनयत्परमास्त्रवित् ॥

sacedikāśipāñcālānkarūśānmātsyakekayān | śaraiḥ pracchādya nidhanamanayatparamāstravit

परम अस्त्रों के ज्ञाता उन्होंने चेदियों, काशियों, पांचालों, करूशों, मत्स्यों और केकयों को बाणों से ढककर उनका अन्त कर दिया।

श्लोक 31 (8.77.31)

तस्य चापच्युतैर्बाणैः परदेहविदारणैः । पूर्णमाकाशमभवद्रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः ॥

tasya cāpacyutairbāṇaiḥ paradehavidāraṇaiḥ | pūrṇamākāśamabhavadrukmapuṅkhairajihmagaiḥ

उनके धनुष से छूटे, शत्रुओं के शरीर चीर देने वाले, सोने के पंखों वाले सीधे जाने वाले बाणों से आकाश भर गया था।

श्लोक 32 (8.77.32)

हन्याद्रथसहस्राणि एकैकेनैव मुष्टिना । लक्षं नरद्विपान्हत्वा समेतान्समहाबलान् ॥

hanyādrathasahasrāṇi ekaikenaiva muṣṭinā | lakṣaṃ naradvipānhatvā sametānsamahābalān

वे एक-एक मुट्ठी से ही हजारों रथों को मार गिरा सकते थे; और एकत्र हुए एक लाख बलशाली मनुष्यों तथा हाथियों को उन्होंने मार डाला।

श्लोक 33 (8.77.33)

गत्या दशम्या ते गत्वा जघ्नुर्वाजिरथद्विपान् । हित्वा नवगतीर्दुष्टाः स बाणानाहवेऽत्यजत् ॥

gatyā daśamyā te gatvā jaghnurvājirathadvipān | hitvā navagatīrduṣṭāḥ sa bāṇānāhave'tyajat

दसवीं गति से जाकर उन बाणों ने घोड़ों, रथों और हाथियों को मार गिराया; नौ दोषपूर्ण गतियों को छोड़कर उन्होंने युद्ध में बाण चलाए।

श्लोक 34 (8.77.34)

दिनानि दश भीष्मेण निघ्नता तावकं बलम् । शून्याः कृता रथोपस्था हताश्च गजवाजिनः ॥

dināni daśa bhīṣmeṇa nighnatā tāvakaṃ balam | śūnyāḥ kṛtā rathopasthā hatāśca gajavājinaḥ

तुम्हारी सेना को मारते हुए भीष्म ने दस दिन तक रथों के आसनों को खाली कर दिया और हाथी-घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 35 (8.77.35)

दशमेऽहनि सम्प्राप्ते कृत्वा घोरं पराक्रमम् । दर्शयित्वाऽऽत्मनो रूपं रुद्रोपेन्द्रसमं युधि ॥

daśame'hani samprāpte kṛtvā ghoraṃ parākramam | darśayitvā''tmano rūpaṃ rudropendrasamaṃ yudhi

दसवें दिन के आने पर घोर पराक्रम करके, युद्ध में रुद्र और उपेन्द्र के समान अपना रूप दिखाकर —

श्लोक 36 (8.77.36)

पाण्डवानामनीकानि प्रविगाह्य विशाम्पते । विनिघ्नन्पृथिवीपालांश्चेदिपाञ्चालकेकयान् ॥

pāṇḍavānāmanīkāni pravigāhya viśāmpate | vinighnanpṛthivīpālāṃścedipāñcālakekayān

हे प्रजापालक, पाण्डवों की सेनाओं में घुसकर और चेदि, पांचाल तथा केकय राजाओं को मारते हुए —

श्लोक 37 (8.77.37)

अहनत्पाण्डवीं सेनां रथाश्वगजसङ्कुलाम् । मज्जन्तमप्लुवे मन्दमुज्जिहीर्षुः सुयोधनम् ॥

ahanatpāṇḍavīṃ senāṃ rathāśvagajasaṅkulām | majjantamapluve mandamujjihīrṣuḥ suyodhanam

उन्होंने रथों, घोड़ों और हाथियों से भरी पाण्डव-सेना का संहार किया, यह चाहते हुए कि बिना नाव के जल में डूबते मूढ़ सुयोधन को उबार लें।

श्लोक 38 (8.77.38)

तथा चरन्तं समरे तपन्तमिव भास्करम् । पदातिकोटिसाहस्राः प्रवरायुधपाणयः ॥

tathā carantaṃ samare tapantamiva bhāskaram | padātikoṭisāhasrāḥ pravarāyudhapāṇayaḥ

इस प्रकार रणभूमि में तपते हुए सूर्य की भाँति विचरते उन्हें, श्रेष्ठ आयुध हाथ में लिए हजारों करोड़ पैदल सैनिक भी —

श्लोक 39 (8.77.39)

न शेकुः सृञ्जया द्रष्टुं तथैवान्ये महीक्षितः । विचरन्तं तथा तं तु सङ्ग्रामे जितकाशिनम् ॥

na śekuḥ sṛñjayā draṣṭuṃ tathaivānye mahīkṣitaḥ | vicarantaṃ tathā taṃ tu saṅgrāme jitakāśinam

न सृंजय देख सके, न दूसरे राजा। रण में विजय के गर्व से इस प्रकार विचरते उन पर —

श्लोक 40 (8.77.40)

सर्वोद्यमेन महता पाण्डवान्समभिद्रवत् । स तु विद्राव्य समरे पाण्डवान्सृञ्जयानपि । एक एव रणे भीष्म एकवीरत्वमागतः ॥

sarvodyamena mahatā pāṇḍavānsamabhidravat | sa tu vidrāvya samare pāṇḍavānsṛñjayānapi | eka eva raṇe bhīṣma ekavīratvamāgataḥ

पाण्डव पूरी शक्ति से एकाएक टूट पड़े। परन्तु पाण्डवों और सृंजयों को रण में भगाकर भीष्म अकेले ही एकमात्र वीर होकर डटे रहे।

श्लोक 41 (8.77.41)

तं शिखण्डी समासाद्य त्वया गुप्तो महाव्रतम् । जघान पुरुषव्याघ्रं शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

taṃ śikhaṇḍī samāsādya tvayā gupto mahāvratam | jaghāna puruṣavyāghraṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

तब तुमसे सुरक्षित शिखण्डी ने उन महाव्रती पुरुषसिंह के पास पहुँचकर झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उन्हें मार गिराया।

श्लोक 42 (8.77.42)

स एष पतितः शेते शरतल्पे पितामहः । त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्रं वृत्रः प्राप्येव वासवम् ॥

sa eṣa patitaḥ śete śaratalpe pitāmahaḥ | tvāṃ prāpya puruṣavyāghraṃ vṛtraḥ prāpyeva vāsavam

वे ही पितामह अब बाणशय्या पर पड़े हैं; हे पुरुषव्याघ्र, तुम्हें पाकर वे वैसे ही गिरे जैसे इन्द्र को पाकर वृत्र गिरा था।

श्लोक 43 (8.77.43)

द्रोणः पञ्चदिनान्युग्रो विधम्य रिपुवाहिनीम् । कृत्वा व्यूहमभेद्यं च पातयित्वा महारथान् ॥

droṇaḥ pañcadinānyugro vidhamya ripuvāhinīm | kṛtvā vyūhamabhedyaṃ ca pātayitvā mahārathān

उग्र द्रोण ने पाँच दिन शत्रु-सेना को तोड़ा, अभेद्य व्यूह रचा और महारथियों को गिराया;

श्लोक 44 (8.77.44)

जयद्रथस्य समरे कृत्वा रक्षां महारथः । अन्तकप्रतिमश्चोग्रो रात्रियुद्धेऽदहत्प्रजाः ॥

jayadrathasya samare kṛtvā rakṣāṃ mahārathaḥ | antakapratimaścogro rātriyuddhe'dahatprajāḥ

और जयद्रथ की रक्षा करके, यमराज-जैसे उग्र उस महारथी ने रात्रि-युद्ध में लोगों को जला डाला।

श्लोक 45 (8.77.45)

दग्ध्वा योधाञ्छरैर्वीरो भारद्वाजः प्रतापवान् । धृष्टद्युम्नं समासाद्य स गतः परमां गतिम् ॥

dagdhvā yodhāñcharairvīro bhāradvājaḥ pratāpavān | dhṛṣṭadyumnaṃ samāsādya sa gataḥ paramāṃ gatim

बाणों से योद्धाओं को भस्म करके पराक्रमी भारद्वाज धृष्टद्युम्न के सामने पहुँचे और परमगति को प्राप्त हुए।

श्लोक 46 (8.77.46)

यदि वाऽद्य भवान्युद्धे सूतपुत्रमुखान्रथान् । नावारयिष्यः सङ्ग्रामे न स्म द्रोणो व्यनङ्क्ष्यत ॥

yadi vā'dya bhavānyuddhe sūtaputramukhānrathān | nāvārayiṣyaḥ saṅgrāme na sma droṇo vyanaṅkṣyata

यदि तुम युद्ध में सूतपुत्र आदि प्रधान रथियों को न रोकते, तो द्रोण मारे न जाते।

श्लोक 47 (8.77.47)

भवता तु बलं सर्वं धार्तराष्ट्रस्य वारितम् । ततो द्रोणो हतो युद्धे पार्षतेन धनञ्जय ॥

bhavatā tu balaṃ sarvaṃ dhārtarāṣṭrasya vāritam | tato droṇo hato yuddhe pārṣatena dhanañjaya

तुमने धृतराष्ट्र-पुत्र की सारी सेना को रोक रखा था; इसी से, हे धनञ्जय, युद्ध में पृषत-पुत्र ने द्रोण को मारा।

श्लोक 48 (8.77.48)

कश्च शक्तो रणे कर्तुं त्वदन्यः पुरुषब्रुवः । यादृशं ते कृतं पार्थ जयद्रथवधं प्रति ॥

kaśca śakto raṇe kartuṃ tvadanyaḥ puruṣabruvaḥ | yādṛśaṃ te kṛtaṃ pārtha jayadrathavadhaṃ prati

हे पार्थ, जयद्रथ के वध के विषय में तुमने रण में जो कर दिखाया, वैसा करने में तुम्हारे सिवा पुरुष कहलाने वाला और कौन समर्थ है?

श्लोक 49 (8.77.49)

निवार्य सेनां महतीं हत्वा शूरांश्च पार्थिवान् । निहतः सैन्धवो राजा त्वयाऽस्त्रबलतेजसा ॥

nivārya senāṃ mahatīṃ hatvā śūrāṃśca pārthivān | nihataḥ saindhavo rājā tvayā'strabalatejasā

विशाल सेना को रोककर और शूर राजाओं को मारकर, राजा सैन्धव तुम्हारे अस्त्र-बल और तेज से मारा गया।

श्लोक 50 (8.77.50)

आश्चर्यं सिन्धुराजस्य वधं जानन्ति पार्थिवाः । अनाश्चर्यं हि तत्त्वत्तस्त्वं हि पार्थ महारथः ॥

āścaryaṃ sindhurājasya vadhaṃ jānanti pārthivāḥ | anāścaryaṃ hi tattvattastvaṃ hi pārtha mahārathaḥ

सिन्धुराज के वध को राजा लोग आश्चर्य मानते हैं; पर तुमसे वह कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि हे पार्थ, तुम महारथी हो।

श्लोक 51 (8.77.51)

त्वां हि प्राप्य रणे क्षत्रमेकाहादिति भारत । नश्यमानमहं युक्तं मन्येयमिति मे मतिः ॥

tvāṃ hi prāpya raṇe kṣatramekāhāditi bhārata | naśyamānamahaṃ yuktaṃ manyeyamiti me matiḥ

हे भारत, तुम्हें रण में पाकर क्षत्रिय-समूह का एक ही दिन में नष्ट हो जाना मुझे उचित ही लगता है — ऐसी मेरी धारणा है।

श्लोक 52 (8.77.52)

सेयं पार्थ चमूर्घोरा धार्तराष्ट्रस्य संयुगे । हतसर्वस्वभूयिष्ठा भीष्मद्रोणौ हतौ यथा ॥

seyaṃ pārtha camūrghorā dhārtarāṣṭrasya saṃyuge | hatasarvasvabhūyiṣṭhā bhīṣmadroṇau hatau yathā

हे पार्थ, धृतराष्ट्र-पुत्र की यह भयंकर सेना, भीष्म और द्रोण के मारे जाने के समय की भाँति, युद्ध में प्रायः सर्वस्व खो चुकी है।

श्लोक 53 (8.77.53)

शीर्णप्रवरयोधाढ्या हतवाजिरथद्विपा । हीना सूर्येन्दुनक्षत्रैर्द्यौरिवाभाति भारती ॥

śīrṇapravarayodhāḍhyā hatavājirathadvipā | hīnā sūryendunakṣatrairdyaurivābhāti bhāratī

श्रेष्ठ योद्धाओं वाली उसकी पंक्तियाँ टूट चुकी हैं, घोड़े, रथ और हाथी मारे गए हैं; यह भरतवंश की सेना सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों से रहित आकाश जैसी लग रही है।

श्लोक 54 (8.77.54)

विध्वस्ता हि रणे पार्थ सेनेयं भीमविक्रम । आसुरीव महासेना देवराजपराक्रमैः ॥

vidhvastā hi raṇe pārtha seneyaṃ bhīmavikrama | āsurīva mahāsenā devarājaparākramaiḥ

हे भीषण पराक्रमी पार्थ, देवराज के पराक्रम से असुरों की महासेना की भाँति यह सेना भी रण में ध्वस्त हो चुकी है।

श्लोक 55 (8.77.55)

तेषां हतावशिष्टास्तु सन्ति पञ्च महारथाः । द्रौणिश्च कृतवर्मा च कर्णो मद्राधिपः कृपः ॥

teṣāṃ hatāvaśiṣṭāstu santi pañca mahārathāḥ | drauṇiśca kṛtavarmā ca karṇo madrādhipaḥ kṛpaḥ

उनमें से मरने से बचे पाँच महारथी हैं: अश्वत्थामा, कृतवर्मा, कर्ण, मद्रराज शल्य और कृपाचार्य।

श्लोक 56 (8.77.56)

तांस्त्वमद्य नरव्याघ्र हत्वा पञ्च महारथान् । हतामित्रः प्रयच्छोर्वी राज्ञे सद्वीपपत्तनाम् ॥

tāṃstvamadya naravyāghra hatvā pañca mahārathān | hatāmitraḥ prayacchorvī rājñe sadvīpapattanām

हे पुरुषव्याघ्र, आज उन पाँचों महारथियों को मारकर, शत्रुओं का नाश करके, द्वीपों और नगरों सहित यह पृथ्वी राजा को दे दो।

श्लोक 57 (8.77.57)

साकाशजलपातालां सपर्वतमहावनाम् । प्रयच्छामितवीर्याय पार्थायाद्य वसुन्धराम् ॥

sākāśajalapātālāṃ saparvatamahāvanām | prayacchāmitavīryāya pārthāyādya vasundharām

आकाश, जल और पाताल सहित, पर्वतों और महावनों सहित यह पृथ्वी मैं आज असीम पराक्रमी पार्थ को देता हूँ।

श्लोक 58 (8.77.58)

एतां पुरा विष्णुरिव हत्वा दैतेयदानवान् । प्रयच्छ मेदिनीं राज्ञे शक्रायैव हरिर्यथा ॥

etāṃ purā viṣṇuriva hatvā daiteyadānavān | prayaccha medinīṃ rājñe śakrāyaiva hariryathā

जैसे पूर्वकाल में विष्णु ने दैत्यों और दानवों को मारकर यह पृथ्वी इन्द्र को दी थी, वैसे ही तुम भी इसे राजा को दे दो।

श्लोक 59 (8.77.59)

अद्य मोदन्तु पाञ्चाला निहतेष्वरिषु त्वया । विष्णुना निहतेष्वेव दानवेयेषु देवताः ॥

adya modantu pāñcālā nihateṣvariṣu tvayā | viṣṇunā nihateṣveva dānaveyeṣu devatāḥ

आज तुम्हारे द्वारा शत्रुओं के मारे जाने पर पांचाल हर्षित हों, जैसे विष्णु द्वारा दानवों के मारे जाने पर देवता हर्षित हुए थे।

श्लोक 60 (8.77.60)

यदि वा द्विपदां श्रेष्ठं द्रोणं मानयतो गुरुम् । अश्वत्थाम्नि कृपा तेऽस्ति कृपे वाचार्यगौरवात् ॥

yadi vā dvipadāṃ śreṣṭhaṃ droṇaṃ mānayato gurum | aśvatthāmni kṛpā te'sti kṛpe vācāryagauravāt

अथवा यदि मनुष्यों में श्रेष्ठ द्रोण को गुरु मानकर तुम्हें अश्वत्थामा पर दया आती है, या आचार्य के गौरव के कारण कृपाचार्य पर,

श्लोक 61 (8.77.61)

अत्यन्तापचितान्बन्धून्मानयन्मातृबान्धवान् । कृतवर्माणमासाद्य न नेष्यासि यमक्षयम् ॥

atyantāpacitānbandhūnmānayanmātṛbāndhavān | kṛtavarmāṇamāsādya na neṣyāsi yamakṣayam

या अपनी माता के पक्ष के अत्यन्त पूज्य बन्धुओं का मान रखते हुए तुम कृतवर्मा के सामने जाकर उसे यमलोक न भेजोगे,

श्लोक 62 (8.77.62)

भ्रातरं मातुरासाद्य शल्यं मद्रजनाधिपम् । यदि त्वमरविन्दाक्ष दयावान्न जिघाससि ॥

bhrātaraṃ māturāsādya śalyaṃ madrajanādhipam | yadi tvamaravindākṣa dayāvānna jighāsasi

या हे कमलनयन, दयालु होने के कारण अपनी माता के भाई, मद्रों के स्वामी शल्य के पास पहुँचकर उन्हें मारना नहीं चाहते —

श्लोक 63 (8.77.63)

एतत्ते सुकृतं कर्म नात्र किञ्चन विद्यते । वयमप्यनुजानीमो नात्र दोषोऽस्ति कश्चन ॥

etatte sukṛtaṃ karma nātra kiñcana vidyate | vayamapyanujānīmo nātra doṣo'sti kaścana

तो यह तुम्हारा सुकर्म ही है; इसमें कुछ भी अनुचित नहीं; हम भी इसकी अनुमति देते हैं; इसमें कोई दोष नहीं।

श्लोक 64 (8.77.64)

इमं पापमतिं क्षुद्रमत्यन्तं पाण्डवान्प्रति । कर्णमद्य नरश्रेष्ठ जहि पार्थ शितैः शरैः ॥

imaṃ pāpamatiṃ kṣudramatyantaṃ pāṇḍavānprati | karṇamadya naraśreṣṭha jahi pārtha śitaiḥ śaraiḥ

परन्तु पाण्डवों के प्रति अत्यन्त पापबुद्धि इस क्षुद्र कर्ण को, हे नरश्रेष्ठ पार्थ, आज तीखे बाणों से मार डालो।

श्लोक 65 (8.77.65)

दहने यत्सपुत्राया निशि मातुस्तवानघ । द्यूतार्थे यच्च युष्मासु प्रावर्तत सुयोधनः । तस्य सर्वस्य दुष्टात्मा कर्णो वै मूलमित्युत ॥

dahane yatsaputrāyā niśi mātustavānagha | dyūtārthe yacca yuṣmāsu prāvartata suyodhanaḥ | tasya sarvasya duṣṭātmā karṇo vai mūlamityuta

हे निष्पाप, तुम्हारी माता को पुत्रों सहित रात में जलाए जाने में, और जुए के विषय में सुयोधन ने तुम लोगों के साथ जो कुछ किया, उस सबकी जड़ दुष्टात्मा कर्ण ही है — ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 66 (8.77.66)

प्रोत्साहयति दुष्टात्मा धार्तराष्ट्रं सुदुर्मतिम् । समितौ गदते कर्णस्तमद्य जहि भारत ॥

protsāhayati duṣṭātmā dhārtarāṣṭraṃ sudurmatim | samitau gadate karṇastamadya jahi bhārata

वह दुष्टात्मा अत्यन्त दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र को उकसाता रहता है; सभा में कर्ण डींग मारता है — हे भारत, आज उसे मार डालो।

श्लोक 67 (8.77.67)

यश्च युष्मासु पापं वै धार्तराष्ट्रः प्रयुक्तवान् । तस्य सर्वस्य दुर्बुद्धिः कर्णो मूलमिहार्जुन ॥

yaśca yuṣmāsu pāpaṃ vai dhārtarāṣṭraḥ prayuktavān | tasya sarvasya durbuddhiḥ karṇo mūlamihārjuna

और धृतराष्ट्र-पुत्र ने तुम लोगों के प्रति जो-जो पाप किया है, हे अर्जुन, उस सबकी जड़ दुर्बुद्धि कर्ण ही है।

श्लोक 68 (8.77.68)

कर्णं हि मन्यते त्राणं नित्यमेव सुयोधनः । ततो मामपि संरब्धो निग्रहीतुं पराक्रमात् ॥

karṇaṃ hi manyate trāṇaṃ nityameva suyodhanaḥ | tato māmapi saṃrabdho nigrahītuṃ parākramāt

सुयोधन सदा कर्ण को ही अपना रक्षक मानता है; इसीलिए वह क्रुद्ध होकर बलपूर्वक मुझे भी पकड़ने चला था।

श्लोक 69 (8.77.69)

स्थिता बुद्धिर्नरेन्द्राणां धार्तराष्ट्रस्य चोभयोः । कर्णः पार्थान्रणे सर्वान्नाशयिष्यति सायकैः ॥

sthitā buddhirnarendrāṇāṃ dhārtarāṣṭrasya cobhayoḥ | karṇaḥ pārthānraṇe sarvānnāśayiṣyati sāyakaiḥ

राजाओं का और धृतराष्ट्र-पुत्र का, दोनों का यह निश्चय स्थिर है कि कर्ण रण में अपने बाणों से सब पार्थों का नाश कर देगा।

श्लोक 70 (8.77.70)

कर्णमाश्रित्य कौन्तेय धार्तराष्ट्रस्य विग्रहः । रुचितो भवता सार्धं जानतोऽपि बलं तव ॥

karṇamāśritya kaunteya dhārtarāṣṭrasya vigrahaḥ | rucito bhavatā sārdhaṃ jānato'pi balaṃ tava

हे कुन्तीपुत्र, कर्ण का सहारा लेकर ही धृतराष्ट्र-पुत्र ने तुम्हारे साथ युद्ध ठाना है, यद्यपि वह तुम्हारा बल जानता है।

श्लोक 71 (8.77.71)

कर्णो जल्पति वै नित्यमहं पार्थान्समागतान् । वासुदेवं च दाशार्हं विजेष्यामि महारणे । समितौ वल्गते कर्णस्तमद्य जहि फल्गुन ॥

karṇo jalpati vai nityamahaṃ pārthānsamāgatān | vāsudevaṃ ca dāśārhaṃ vijeṣyāmi mahāraṇe | samitau valgate karṇastamadya jahi phalguna

कर्ण सदा बकता रहता है, "मैं एकत्र हुए पार्थों को और दशार्हवंशी वासुदेव को भी महायुद्ध में जीत लूँगा।" वह सभा में डींग हाँकता है — हे फाल्गुन, आज उसे मार डालो।

श्लोक 72 (8.77.72)

यच्च युष्मासु पापं वै धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । सभायां कृतवान्नित्यं कर्णमाश्रित्य वै पुरा ॥

yacca yuṣmāsu pāpaṃ vai dhārtarāṣṭraḥ pratāpavān | sabhāyāṃ kṛtavānnityaṃ karṇamāśritya vai purā

और तेजस्वी धृतराष्ट्र-पुत्र ने पहले कर्ण का सहारा लेकर सभा में तुम लोगों के प्रति जो-जो पाप सदा किया,

श्लोक 73 (8.77.73)

यच्च तं धार्तराष्ट्राणां षड्भिः शूरैर्महारथैः । पश्यतां संवृतं शूरं सौभद्रमपराजितम् ॥

yacca taṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ ṣaḍbhiḥ śūrairmahārathaiḥ | paśyatāṃ saṃvṛtaṃ śūraṃ saubhadramaparājitam

और जब धृतराष्ट्र-पुत्रों के छह शूर महारथियों ने सबके देखते-देखते अपराजित वीर सुभद्रापुत्र को घेर लिया था —

श्लोक 74 (8.77.74)

द्रोणद्रौणिकृपान्वीरान्कम्पयानं महेषुभिः । विधमन्तमनीकानि प्रमथन्तं महारथान् ॥

droṇadrauṇikṛpānvīrānkampayānaṃ maheṣubhiḥ | vidhamantamanīkāni pramathantaṃ mahārathān

जो द्रोण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य जैसे वीरों को अपने बड़े बाणों से कँपा रहा था, सेनाओं को तितर-बितर कर रहा था, महारथियों को रौंद रहा था,

श्लोक 75 (8.77.75)

मनुष्यवाजिमातङ्गान्प्रेषयन्तं यमक्षयम् । शरैः सौभद्रमायान्तं दहन्तमरिवाहिनीम् ॥

manuṣyavājimātaṅgānpreṣayantaṃ yamakṣayam | śaraiḥ saubhadramāyāntaṃ dahantamarivāhinīm

मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को यमलोक भेज रहा था, और बाणों से शत्रु-सेना को जलाता हुआ सुभद्रापुत्र बढ़ा आ रहा था —

श्लोक 76 (8.77.76)

निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विरथाश्च महारथाः । प्रद्रवन्ति स्म समरे दिशो भीताऽभिमन्यवे ॥

nirmanuṣyāśca mātaṅgā virathāśca mahārathāḥ | pradravanti sma samare diśo bhītā'bhimanyave

तब मनुष्य-रहित हाथी और रथ-रहित महारथी अभिमन्यु के भय से रणभूमि में सब दिशाओं में भागने लगे —

श्लोक 77 (8.77.77)

विगतासूंश्च तुरगान्पत्तीन्व्यायुधजीवितान् । कुर्वन्तमृषभस्कन्धं कुरुवृष्णियशस्करम् । तन्मे दहति गात्राणि सखे सत्येन ते शपे ॥

vigatāsūṃśca turagānpattīnvyāyudhajīvitān | kurvantamṛṣabhaskandhaṃ kuruvṛṣṇiyaśaskaram | tanme dahati gātrāṇi sakhe satyena te śape

घोड़ों को प्राणहीन और पैदलों को शस्त्रहीन व निर्जीव करता हुआ, कुरुओं और वृष्णियों का यश बढ़ाने वाला वह बैल-जैसे कन्धों वाला वीर — उसकी याद मेरे अंगों को जलाती है; हे सखा, मैं तुमसे सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ।

श्लोक 78 (8.77.78)

यत्तदासीत्सुदुष्टात्मा कर्णो विनिहतः प्रभुः । न शक्तो ह्यभिमन्योस्तु कर्णः स्थातुं रणाग्रतः ॥

yattadāsītsuduṣṭātmā karṇo vinihataḥ prabhuḥ | na śakto hyabhimanyostu karṇaḥ sthātuṃ raṇāgrataḥ

उस समय अत्यन्त दुष्टात्मा कर्ण, समर्थ होते हुए भी, परास्त हुआ; वह अभिमन्यु के सामने रण में ठहर न सका।

श्लोक 79 (8.77.79)

सौभद्रशरनिर्भिन्नो विसंज्ञः शोणितोक्षितः । निश्वसन्क्रोधसन्दीप्तो विमुखः सायकार्दितः ॥

saubhadraśaranirbhinno visaṃjñaḥ śoṇitokṣitaḥ | niśvasankrodhasandīpto vimukhaḥ sāyakārditaḥ

सुभद्रापुत्र के बाणों से बिंधा हुआ, अचेत, खून से लथपथ, साँसें भरता, क्रोध से जलता, बाणों से पीड़ित होकर पीठ फेरे हुए —

श्लोक 80 (8.77.80)

तस्थौ स विह्वलः सङ्ख्ये प्रहारजनितच्छविः । अपयानकृतोत्साहो निरुत्साहश्च भारत ॥

tasthau sa vihvalaḥ saṅkhye prahārajanitacchaviḥ | apayānakṛtotsāho nirutsāhaśca bhārata

वह युद्ध में विह्वल खड़ा रहा; प्रहारों से उसकी कान्ति मलिन हो गई थी। हे भारत, भाग निकलने का मन बना चुकने पर भी वह उत्साहहीन था।

श्लोक 81 (8.77.81)

दुर्योधनं रणे दृष्ट्वा लज्जमानो मुहुर्मुहुः । नापयासीत्ततः पार्थ सोऽभिमन्योर्महारणे ॥

duryodhanaṃ raṇe dṛṣṭvā lajjamāno muhurmuhuḥ | nāpayāsīttataḥ pārtha so'bhimanyormahāraṇe

दुर्योधन को रण में देखकर वह बार-बार लज्जित होता रहा, और हे पार्थ, उस महायुद्ध में अभिमन्यु के सामने से हटा नहीं।

श्लोक 82 (8.77.82)

दृष्ट्वा द्रोणं वधोपायमभिमन्योश्च पृष्टवान् । श्रुत्वा द्रोणवचः क्रूरं ततश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥

dṛṣṭvā droṇaṃ vadhopāyamabhimanyośca pṛṣṭavān | śrutvā droṇavacaḥ krūraṃ tataściccheda kārmukam

उसने द्रोण की ओर देखकर अभिमन्यु के वध का उपाय पूछा; द्रोण का क्रूर वचन सुनकर फिर उसने उसका धनुष काट डाला।

श्लोक 83 (8.77.83)

ततश्छिन्नायुधं तेन दृष्ट्वा पञ्च महारथाः । स चैव निकृतिप्राज्ञः प्राहिणोच्छरवृष्टिभिः ॥

tataśchinnāyudhaṃ tena dṛṣṭvā pañca mahārathāḥ | sa caiva nikṛtiprājñaḥ prāhiṇoccharavṛṣṭibhiḥ

तब कर्ण द्वारा उसे धनुषहीन किया हुआ देखकर पाँच महारथियों ने, और छल में चतुर कर्ण ने भी, बाणों की वर्षा से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 84 (8.77.84)

प्रहसन्स तु दुष्टात्मा कर्णो राजा च कौरवः । यच्च कर्णोऽब्रवीत्कृष्णां सभायां परुषं वचः । प्रमुखे पाण्डवेयानां कुरूणां चैव पश्यताम् ॥

prahasansa tu duṣṭātmā karṇo rājā ca kauravaḥ | yacca karṇo'bravītkṛṣṇāṃ sabhāyāṃ paruṣaṃ vacaḥ | pramukhe pāṇḍaveyānāṃ kurūṇāṃ caiva paśyatām

दुष्टात्मा कर्ण हँस रहा था, और राजा दुर्योधन भी; और कर्ण ने पाण्डवों के सामने, कुरुओं के देखते-देखते, सभा में द्रौपदी से जो कठोर वचन कहे थे —

श्लोक 85 (8.77.85)

विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः । पतिमन्यं पृथुश्रोणि वृणीष्व मृदुभाषिणि ॥

vinaṣṭāḥ pāṇḍavāḥ kṛṣṇe śāśvataṃ narakaṃ gatāḥ | patimanyaṃ pṛthuśroṇi vṛṇīṣva mṛdubhāṣiṇi

"हे कृष्णा, पाण्डव नष्ट हो गए, वे सदा के लिए नरक में चले गए। हे विशाल नितम्बों वाली, मधुरभाषिणी, तू कोई दूसरा पति चुन ले।"

श्लोक 86 (8.77.86)

एषा त्वं धृतराष्ट्रस्य दासीभूता निवेशनम् । प्रविशारालपक्ष्माक्षि न सन्ति पतयस्तव ॥

eṣā tvaṃ dhṛtarāṣṭrasya dāsībhūtā niveśanam | praviśārālapakṣmākṣi na santi patayastava

"तू तो अब दासी बनकर धृतराष्ट्र के घर में चली जा; हे घुँघराली पलकों वाली, भीतर प्रवेश कर, तेरे पति हैं ही नहीं।"

श्लोक 87 (8.77.87)

न पाण्डवाः प्रभवन्ति तव कृष्णे कथञ्चन । दासभार्या च पाञ्चालि स्वयं दासी च शोभने ॥

na pāṇḍavāḥ prabhavanti tava kṛṣṇe kathañcana | dāsabhāryā ca pāñcāli svayaṃ dāsī ca śobhane

"हे कृष्णा, पाण्डव तुझ पर किसी प्रकार अधिकार नहीं रखते। हे पांचाली, तू दास की पत्नी है, और हे सुन्दरी, स्वयं भी दासी है।"

श्लोक 88 (8.77.88)

अद्य दुर्योधनो राजा पृथिव्यां नृपतिः स्मृतः । सर्वे चास्य महीपाला योगक्षेममुपासते ॥

adya duryodhano rājā pṛthivyāṃ nṛpatiḥ smṛtaḥ | sarve cāsya mahīpālā yogakṣemamupāsate

"आज राजा दुर्योधन पृथ्वी का स्वामी माना जाता है, और सब राजा उसके योग-क्षेम की सेवा करते हैं।"

श्लोक 89 (8.77.89)

पश्येदानीं यदा भद्रे निविष्टाः पाण्डवाः समम् । अन्योन्यं समुदीक्षन्ते धार्तराष्ट्रस्य तेजसा ॥

paśyedānīṃ yadā bhadre niviṣṭāḥ pāṇḍavāḥ samam | anyonyaṃ samudīkṣante dhārtarāṣṭrasya tejasā

"हे भद्रे, अब देख, एक साथ बैठे पाण्डव धृतराष्ट्र-पुत्र के तेज से अभिभूत होकर एक-दूसरे का मुँह ताक रहे हैं।"

श्लोक 90 (8.77.90)

व्यक्तं षण्डतिला ह्येते नरके च निमज्जिताः । प्रेष्यवच्चापि राजानमुपस्थास्यन्ति कौरवम् ॥

vyaktaṃ ṣaṇḍatilā hyete narake ca nimajjitāḥ | preṣyavaccāpi rājānamupasthāsyanti kauravam

"ये निश्चय ही निस्सार तिलों के समान नरक में डूबे हैं; ये सेवकों की भाँति कौरव राजा की सेवा करेंगे।"

श्लोक 91 (8.77.91)

उक्तवान्स च पापात्मा तथा परमदुर्मतिः । पापः पापवचः कर्णः पश्यतस्ते धनञ्जय ॥

uktavānsa ca pāpātmā tathā paramadurmatiḥ | pāpaḥ pāpavacaḥ karṇaḥ paśyataste dhanañjaya

ऐसा कहा उस पापात्मा, परम दुर्बुद्धि, पापी और पापभरी बातें करने वाले कर्ण ने, हे धनञ्जय, तुम्हारे देखते-देखते।

श्लोक 92 (8.77.92)

अस्य पापस्य तद्वाक्यं सुवर्णविकृताः शराः । शमयन्ति शिलाधौता नाशयन्तोऽस्य जीवितम् ॥

asya pāpasya tadvākyaṃ suvarṇavikṛtāḥ śarāḥ | śamayanti śilādhautā nāśayanto'sya jīvitam

सोने से मढ़े, शिला पर तेज किए हुए तुम्हारे बाण उस पापी के प्राणों का नाश करते हुए उसके उस वचन को शान्त कर देंगे।

श्लोक 93 (8.77.93)

अद्य कर्णं रणे ग्रस्तं पश्यन्तु कुरवस्त्वया । स्वर्गावतरणे यत्नं स्वर्गद्वारगतं यथा ॥

adya karṇaṃ raṇe grastaṃ paśyantu kuravastvayā | svargāvataraṇe yatnaṃ svargadvāragataṃ yathā

आज कुरुजन देखें कि कर्ण रण में तुम्हारे वश में आ गया है, मानो स्वर्ग के द्वार पर पहुँचकर वह स्वर्ग से उतरने का यत्न कर रहा हो।

श्लोक 94 (8.77.94)

अद्य ते समरे वीर्यं पश्यन्तु कुरुयोधिनः । सूतपुत्रे हते पार्थ जानन्तु त्वां महारथम् ॥

adya te samare vīryaṃ paśyantu kuruyodhinaḥ | sūtaputre hate pārtha jānantu tvāṃ mahāratham

आज कुरु-योद्धा रण में तुम्हारा पराक्रम देखें; हे पार्थ, सूतपुत्र के मरने पर वे तुम्हें महारथी जानें।

श्लोक 95 (8.77.95)

अद्य काकवला गृध्रा वायसा जम्बुकास्तथा । विप्रकर्षन्तु गात्राणि सूतपुत्रस्य मारिष ॥

adya kākavalā gṛdhrā vāyasā jambukāstathā | viprakarṣantu gātrāṇi sūtaputrasya māriṣa

हे आर्य, आज कौए, बगुले, गिद्ध, काग और सियार सूतपुत्र के अंगों को नोच-नोचकर खाएँ।

श्लोक 96 (8.77.96)

अद्याधिरथिराक्षिप्तो निहतश्च त्वया रणे । कुरूणां शोकमाधत्तां पाण्डवानां मुदं तदा ॥

adyādhirathirākṣipto nihataśca tvayā raṇe | kurūṇāṃ śokamādhattāṃ pāṇḍavānāṃ mudaṃ tadā

आज रण में तुम्हारे द्वारा गिराया और मारा गया अधिरथ-पुत्र कुरुओं को शोक और पाण्डवों को आनन्द दे।

श्लोक 97 (8.77.97)

अद्य त्वां प्रतिनन्दन्तु पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । यथा वृत्रवधे वृत्ते देवाः सर्वे शतक्रतुम् ॥

adya tvāṃ pratinandantu pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | yathā vṛtravadhe vṛtte devāḥ sarve śatakratum

आज पांचाल पाण्डवों के साथ तुम्हारा अभिनन्दन करें, जैसे वृत्र के मारे जाने पर सब देवताओं ने इन्द्र का किया था।

श्लोक 98 (8.77.98)

अद्य कर्णं रणे हत्वा प्राप्य चैवोत्तमं यशः । विशोको विज्वरः पार्थ भव बन्धुपुरस्कृतः ॥

adya karṇaṃ raṇe hatvā prāpya caivottamaṃ yaśaḥ | viśoko vijvaraḥ pārtha bhava bandhupuraskṛtaḥ

आज रण में कर्ण को मारकर और उत्तम यश पाकर, हे पार्थ, तुम बन्धुजनों से सम्मानित होकर शोक और सन्ताप से मुक्त हो जाओ।

श्लोक 99 (8.77.99)

नरसिंहवपुः कृत्वा यथा शस्तो महासुरः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो विष्णुना प्रभविष्णुना ॥

narasiṃhavapuḥ kṛtvā yathā śasto mahāsuraḥ | hiraṇyakaśipurdaityo viṣṇunā prabhaviṣṇunā

जैसे नृसिंह का रूप धरकर समर्थ विष्णु ने महान् असुर दैत्य हिरण्यकशिपु को मारा था,

श्लोक 100 (8.77.100)

तथा त्वमपि राधेयं घोरां कृत्वा महातनुम् । जहि युद्धे महाबाहो त्रायस्व च भयात्स्वकान् ॥

tathā tvamapi rādheyaṃ ghorāṃ kṛtvā mahātanum | jahi yuddhe mahābāho trāyasva ca bhayātsvakān

वैसे ही तुम भी विशाल भयंकर रूप धारण करके राधापुत्र को युद्ध में मार डालो, हे महाबाहु, और अपने जनों को भय से बचाओ।

श्लोक 101 (8.77.101)

कर्णं हाहाकृतं दीनं विषण्णं त्वच्छरार्दितम् । प्रपतन्तं महीं कर्णं पश्यन्तु वसुधाधिपाः ॥

karṇaṃ hāhākṛtaṃ dīnaṃ viṣaṇṇaṃ tvaccharārditam | prapatantaṃ mahīṃ karṇaṃ paśyantu vasudhādhipāḥ

हाहाकार करते, दीन, विषण्ण और तुम्हारे बाणों से पीड़ित कर्ण को पृथ्वी पर गिरते हुए राजा लोग देखें।

श्लोक 102 (8.77.102)

तं च स्वशोणिते मग्नं शयानं पतितं भुवि । अपविद्धायुधं कर्णमद्य पश्यन्तु बान्धवाः ॥

taṃ ca svaśoṇite magnaṃ śayānaṃ patitaṃ bhuvi | apaviddhāyudhaṃ karṇamadya paśyantu bāndhavāḥ

अपने ही रक्त में डूबे, भूमि पर गिरे पड़े, शस्त्र फेंके हुए कर्ण को आज उसके बन्धु देखें।

श्लोक 103 (8.77.103)

तच्चैवाद्य महद्वर्म गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । रथोपस्थे विशीर्येत ताराराज इवाम्बरात् ॥

taccaivādya mahadvarma gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥ | rathopasthe viśīryeta tārārāja ivāmbarāt

और गाण्डीव से छूटे बाणों से उसका वह विशाल कवच रथ के आसन पर टूटकर बिखर जाए, जैसे आकाश से चन्द्रमा टूटकर गिर पड़े।

श्लोक 104 (8.77.104)

आशु चाद्य शरास्तस्य सम्पतन्तो महाजवैः । त्वच्छरैः सन्निकृत्ताग्रा विशीर्यन्ते महीतले ॥

āśu cādya śarāstasya sampatanto mahājavaiḥ | tvaccharaiḥ sannikṛttāgrā viśīryante mahītale

और आज उसके वेग से गिरते बाण भी तुम्हारे बाणों से अग्रभाग कट जाने पर भूमि पर बिखर जाएँ।

श्लोक 105 (8.77.105)

त्वया चाद्य हते तस्य विक्रमे भरतर्षभ । विमुखाः सर्वराजानो भवन्तु गतजीविताः ॥

tvayā cādya hate tasya vikrame bharatarṣabha | vimukhāḥ sarvarājāno bhavantu gatajīvitāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, आज तुम्हारे द्वारा उसके पराक्रम के नष्ट होने पर सब राजा विमुख हो जाएँ, मानो उनके प्राण निकल गए हों।

श्लोक 106 (8.77.106)

तथा चाधिरथौ याते प्रयान्तु कुरवो दिशः । मन्वानास्तं रथश्रेष्ठं सर्वलोकेषु धन्विनाम् ॥

tathā cādhirathau yāte prayāntu kuravo diśaḥ | manvānāstaṃ rathaśreṣṭhaṃ sarvalokeṣu dhanvinām

और अधिरथ-पुत्र के चले जाने पर कुरुजन उसे संसार के सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ रथी मानते हुए चारों दिशाओं में भाग जाएँ।

श्लोक 107 (8.77.107)

स वै चाद्य भयात्त्यक्त्वा धार्तराष्ट्रो महाचमूम् । दुर्योधनो भयोद्विग्नो द्रवतु स्वं निवेशनम् ॥

sa vai cādya bhayāttyaktvā dhārtarāṣṭro mahācamūm | duryodhano bhayodvigno dravatu svaṃ niveśanam

और वह धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन भी भय से अपनी विशाल सेना को छोड़कर, डर से घबराया हुआ अपने घर की ओर भाग जाए।

श्लोक 108 (8.77.108)

तथा चाद्य हतं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । क्षणेन निपतेद्भूमौ विसंज्ञो वै महीपतिः ॥

tathā cādya hataṃ śrutvā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | kṣaṇena nipatedbhūmau visaṃjño vai mahīpatiḥ

और आज उसके मारे जाने की बात सुनकर राजा धृतराष्ट्र क्षण-भर में अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ें।

श्लोक 109 (8.77.109)

अद्य जानन्तु ते पार्थ विक्रमं सर्वयोधिनः । यदुवाच सभामध्ये परुषं भारत त्वयि ॥

adya jānantu te pārtha vikramaṃ sarvayodhinaḥ | yaduvāca sabhāmadhye paruṣaṃ bhārata tvayi

हे पार्थ, आज सब योद्धा तुम्हारा पराक्रम जानें — उन कठोर वचनों का उत्तर, जो उसने सभा के बीच तुमसे कहे थे, हे भारत।

श्लोक 110 (8.77.110)

यानि चान्यानि दुष्टात्मा पापानि कृतवांस्त्वयि । तान्यद्य भरतश्रेष्ठ नाशयन्तु शरास्तव ॥

yāni cānyāni duṣṭātmā pāpāni kṛtavāṃstvayi | tānyadya bharataśreṣṭha nāśayantu śarāstava

और उस दुष्टात्मा ने तुम्हारे प्रति जो और भी पाप किए हैं, हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे बाण आज उन्हें नष्ट कर दें।

श्लोक 111 (8.77.111)

शान्तिं कुरु परिक्लेशा कृष्णायाः शत्रुपातन । हत्वा शत्रुं रणेऽश्लाघ्यं गर्जन्तमतिपौरुषम् ॥

śāntiṃ kuru parikleśā kṛṣṇāyāḥ śatrupātana | hatvā śatruṃ raṇe'ślāghyaṃ garjantamatipauruṣam

हे शत्रुओं को गिराने वाले, गर्जते हुए, अत्यन्त अभिमानी, प्रशंसा के अयोग्य शत्रु को रण में मारकर कृष्णा के कष्टों को शान्त करो।

श्लोक 112 (8.77.112)

अद्य चाधिरथिर्विद्धस्तव बाणैः समन्ततः । मन्यतां त्वां नरव्याघ्र प्रवरं सर्वधन्विनाम् ॥

adya cādhirathirviddhastava bāṇaiḥ samantataḥ | manyatāṃ tvāṃ naravyāghra pravaraṃ sarvadhanvinām

और आज अधिरथ-पुत्र चारों ओर से तुम्हारे बाणों से बिंधकर, हे नरव्याघ्र, तुम्हें सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ माने।

श्लोक 113 (8.77.113)

गाण्डीवप्रसृतान्वाणानद्य गात्रस्पृशः शरान् । यातु कर्णो रणे पार्थ श्वाविच्छललितो यथा ॥

gāṇḍīvaprasṛtānvāṇānadya gātraspṛśaḥ śarān | yātu karṇo raṇe pārtha śvāvicchalalito yathā

गाण्डीव से छूटे हुए, अंगों को छूने वाले बाणों से बिंधा हुआ कर्ण आज रण में, हे पार्थ, साही के काँटों की तरह बाणों से भरा हुआ चला जाए।

श्लोक 114 (8.77.114)

तं कथं कर्णमासाद्य विद्रवेयुर्महारथाः । यस्त्वेकः सर्वपाञ्चालानहन्यहनि नाशयन् । कालवच्चरते वीर पाञ्चालानां रथव्रजे ॥

taṃ kathaṃ karṇamāsādya vidraveyurmahārathāḥ | yastvekaḥ sarvapāñcālānahanyahani nāśayan | kālavaccarate vīra pāñcālānāṃ rathavraje

वे महारथी उस कर्ण के सामने पहुँचकर कैसे भाग रहे हैं, जो अकेला प्रतिदिन समस्त पांचालों का संहार करता है और, हे वीर, पांचालों के रथ-समूह में काल की भाँति विचरता है?

श्लोक 115 (8.77.115)

तमप्यासाद्य समरे मित्रार्थे मित्रवत्सल । तथा ज्वलन्तमस्त्रैश्च शूरं सर्वधनुष्मताम् । निर्दहन्तं समारूढं दुर्धर्षं द्रोणमञ्जसा ॥

tamapyāsādya samare mitrārthe mitravatsala | tathā jvalantamastraiśca śūraṃ sarvadhanuṣmatām | nirdahantaṃ samārūḍhaṃ durdharṣaṃ droṇamañjasā

हे मित्रवत्सल, अपने मित्रों के प्रेम से वे मित्रों के लिए रण में द्रोण पर भी चढ़ गए थे, जो अस्त्रों से जल रहे थे, सब धनुर्धारियों में वीर और दुर्धर्ष थे, और चढ़ आने वालों को सहज ही भस्म कर रहे थे।

श्लोक 116 (8.77.116)

ते नित्यमुदिता जेतुं युधि शत्रुमरिन्दमाः । न चेदाधिरथेर्भीताः पाञ्चालाः स्युः पराङ्मुखाः ॥

te nityamuditā jetuṃ yudhi śatrumarindamāḥ | na cedādhiratherbhītāḥ pāñcālāḥ syuḥ parāṅmukhāḥ

शत्रुओं को जीतने के लिए सदा उत्साह से भरे वे शत्रुदमन पांचाल, यदि अधिरथ-पुत्र से भयभीत न होते तो पीठ न दिखाते।

श्लोक 117 (8.77.117)

तेषामापततां शूरः पाञ्चालानां तरस्विनाम् । आदत्तासूञ्शरैः कर्णः पतङ्गानामिवानलः ॥

teṣāmāpatatāṃ śūraḥ pāñcālānāṃ tarasvinām | ādattāsūñśaraiḥ karṇaḥ pataṅgānāmivānalaḥ

टूट पड़ते हुए उन वेगशाली पांचालों के प्राण वीर कर्ण बाणों से हर लेता है, जैसे आग पतंगों के हर लेती है।

श्लोक 118 (8.77.118)

एते द्रवन्ति पाञ्चाला द्राव्यन्ते योधिभिर्ध्रुवम् । कर्णेन भरतश्रेष्ठ पश्यपश्य तथाकृतान् ॥

ete dravanti pāñcālā drāvyante yodhibhirdhruvam | karṇena bharataśreṣṭha paśyapaśya tathākṛtān

हे भरतश्रेष्ठ, ये पांचाल भाग रहे हैं; योद्धा उन्हें निश्चय ही खदेड़ रहे हैं — कर्ण के द्वारा उनकी कैसी दशा हुई है, देखो, देखो!

श्लोक 119 (8.77.119)

तान्समारोहतः शूरान्मित्रार्थे त्यक्तजीवितान् । निस्तारय महाबाहो कर्णास्त्रात्पावकोपमात् ॥

tānsamārohataḥ śūrānmitrārthe tyaktajīvitān | nistāraya mahābāho karṇāstrātpāvakopamāt

मित्र के लिए प्राण त्यागने को तैयार, चढ़ आने वाले उन वीरों को, हे महाबाहु, अग्नि के समान कर्ण के अस्त्र से बचा लो।

श्लोक 120 (8.77.120)

अस्त्रं हि रामात्कर्णेन भार्गवादृषिसत्तमात् । यदवाप्तं तदा घोरं तस्य रूपमुदीर्यते ॥

astraṃ hi rāmātkarṇena bhārgavādṛṣisattamāt | yadavāptaṃ tadā ghoraṃ tasya rūpamudīryate

जो भयंकर अस्त्र कर्ण ने ऋषिश्रेष्ठ भार्गव परशुराम से पाया था, उसका वही रूप अब प्रकट हो रहा है।

श्लोक 121 (8.77.121)

तापनं सर्वसैन्यस्य घोररूपं भयानकम् । यमाश्रित्य महासेना ज्वलते स्वेन तेजसा ॥

tāpanaṃ sarvasainyasya ghorarūpaṃ bhayānakam | yamāśritya mahāsenā jvalate svena tejasā

सारी सेना को तपाने वाला, घोर रूप का, भयानक वह अस्त्र है; उसका सहारा पाकर कर्ण की महासेना अपने ही तेज से जल उठती है।

श्लोक 122 (8.77.122)

एते चरन्ति सङ्ग्रामे कर्णचापच्युताः शराः । प्रभया इह शत्रूणां घातयन्तो जनान्प्रभो ॥

ete caranti saṅgrāme karṇacāpacyutāḥ śarāḥ | prabhayā iha śatrūṇāṃ ghātayanto janānprabho

ये कर्ण के धनुष से छूटे बाण युद्ध में विचर रहे हैं; हे प्रभु, अपनी आभा से ये शत्रुओं के लोगों को मार रहे हैं।

श्लोक 123 (8.77.123)

एते भ्रमन्ति पाञ्चाला उत्क्रयन्ति च मारिष । कर्णास्त्रं समरे प्राप्य दुर्निवार्यं महात्मभिः ॥

ete bhramanti pāñcālā utkrayanti ca māriṣa | karṇāstraṃ samare prāpya durnivāryaṃ mahātmabhiḥ

ये पांचाल, हे आर्य, इधर-उधर भटक रहे और दौड़ रहे हैं; वे कर्ण के उस अस्त्र के सामने आ गए हैं जिसे महात्मा भी कठिनाई से रोक पाते हैं।

श्लोक 124 (8.77.124)

एष भीमो दृढक्रोधो वृतः पार्थ समन्ततः । सृञ्जयैर्योऽजयत्कर्णं पीड्यते निशितैः शरैः ॥

eṣa bhīmo dṛḍhakrodho vṛtaḥ pārtha samantataḥ | sṛñjayairyo'jayatkarṇaṃ pīḍyate niśitaiḥ śaraiḥ

यह दृढ़ क्रोध वाला भीम, हे पार्थ, चारों ओर से घिरा हुआ है; जिसने सृंजयों के साथ कर्ण को जीता था, वही अब उसके तीखे बाणों से पीड़ित हो रहा है।

श्लोक 125 (8.77.125)

पाञ्चालान्सृञ्जयांश्चैव पाण्डवांश्चैव भारत । उपेक्षितो दहेत्कर्णो रोगो देहमिवान्तकः ॥

pāñcālānsṛñjayāṃścaiva pāṇḍavāṃścaiva bhārata | upekṣito dahetkarṇo rogo dehamivāntakaḥ

हे भारत, उपेक्षा किया गया कर्ण पांचालों, सृंजयों और पाण्डवों को भी उसी प्रकार भस्म कर देगा जैसे रोग देह को, या काल प्राणियों को।

श्लोक 126 (8.77.126)

नान्यं त्वत्तो हि पश्यामि योधं यौधिष्ठिरे बले । यः समासाद्य राधेयं स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहान् ॥

nānyaṃ tvatto hi paśyāmi yodhaṃ yaudhiṣṭhire bale | yaḥ samāsādya rādheyaṃ svastimānāvrajedgṛhān

युधिष्ठिर की सेना में तुम्हारे सिवा मैं ऐसा कोई योद्धा नहीं देखता जो राधापुत्र का सामना करके कुशल घर लौट सके।

श्लोक 127 (8.77.127)

तमद्य निशितैर्बाणैर्निहत्य भरतर्षभ । यथा प्रतिज्ञां त्वं पार्थ तीर्त्वा कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

tamadya niśitairbāṇairnihatya bharatarṣabha | yathā pratijñāṃ tvaṃ pārtha tīrtvā kīrtimavāpsyasi

हे भरतश्रेष्ठ, उसे आज तीखे बाणों से मारकर, हे पार्थ, तुम अपनी प्रतिज्ञा पार करके कीर्ति पाओगे।

श्लोक 128 (8.77.128)

त्वं हि शक्तो रणे कर्णं विजेतुं सह पार्थिवैः । नान्यो युधि युधां श्रेष्ठ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

tvaṃ hi śakto raṇe karṇaṃ vijetuṃ saha pārthivaiḥ | nānyo yudhi yudhāṃ śreṣṭha satyametadbravīmi te

तुम्हीं राजाओं सहित कर्ण को रण में जीतने में समर्थ हो; हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, दूसरा कोई नहीं — मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 129 (8.77.129)

एतत्कृत्वा महत्कर्म हत्वा कर्णं महारथम् । कृतार्थः सफलः पार्थ सुखी भव नरोत्तम ॥

etatkṛtvā mahatkarma hatvā karṇaṃ mahāratham | kṛtārthaḥ saphalaḥ pārtha sukhī bhava narottama

यह महान् कार्य करके और महारथी कर्ण को मारकर, हे पार्थ, कृतार्थ, सफल और सुखी हो जाओ, हे नरोत्तम।

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