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कर्ण पर्व · अध्याय 76

अर्जुन का प्रस्थान और कृष्ण का प्रोत्साहन

युधिष्ठिर का आशीर्वाद पाकर अर्जुन रथ पर चढ़कर कर्ण की ओर चलते हैं और चारों ओर शुभ शकुन प्रकट होते हैं। चिन्ता से अर्जुन को पसीना आ जाता है तब कृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि संसार में कोई मनुष्य उनकी बराबरी नहीं कर सकता, फिर चेताते हैं कि कर्ण बलवान, अभिमानी और कुशल योद्धा है, जिसे पूरे प्रयत्न से मारना होगा। वे अर्जुन से युधिष्ठिर को प्रसन्न करने के लिए दुर्योधन के गर्व की जड़ को नष्ट करने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 75अध्याय-सूचीअध्याय 77

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.76.1)

प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहृष्टेनान्तरात्मना । सम्पूज्य देवताः सर्व ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च । सुमङ्गलं स्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ॥

prasādya dharmarājānaṃ prahṛṣṭenāntarātmanā | sampūjya devatāḥ sarva brāhmaṇānsvasti vācya ca | sumaṅgalaṃ svastyayanamāruroha rathottamam

धर्मराज को मनाकर, प्रसन्न मन से सब देवताओं का पूजन करके और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर अर्जुन उस उत्तम रथ पर चढ़े, जो मंगलकारी और कल्याणकारी था।

श्लोक 2 (8.76.2)

तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः । आशिषोऽयुङ्क्त परमाः युक्तं कर्णरथं प्रति ॥

tasya rājā mahāprājño dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | āśiṣo'yuṅkta paramāḥ yuktaṃ karṇarathaṃ prati

परम बुद्धिमान राजा धर्मराज युधिष्ठिर ने उनके लिए उत्तम आशीर्वाद कहे, जब वे कर्ण के सजे हुए रथ की ओर चले।

श्लोक 3 (8.76.3)

तमायान्तं महेष्वासं दृष्ट्वा भूतानि भारत । निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ॥

tamāyāntaṃ maheṣvāsaṃ dṛṣṭvā bhūtāni bhārata | nihataṃ menire karṇaṃ pāṇḍavena mahātmanā

हे भारत! उस महाधनुर्धर को आते देखकर प्राणियों ने मान लिया कि महात्मा पाण्डव के हाथों कर्ण मारा जा चुका।

श्लोक 4 (8.76.4)

बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशो राजन्समन्ततः । चाषाश्च शतपत्राश्च क्रौञ्चाश्चैव जनेश्वर । प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् ॥

babhūvurvimalāḥ sarvā diśo rājansamantataḥ | cāṣāśca śatapatrāśca krauñcāścaiva janeśvara | pradakṣiṇamakurvanta tadā vai pāṇḍunandanam

राजन्! चारों ओर सब दिशाएँ निर्मल हो गईं। हे जनेश्वर! नीलकण्ठ, कठफोड़वे और क्रौंच पक्षी पाण्डुपुत्र की दाहिनी ओर से उसकी परिक्रमा करने लगे।

श्लोक 5 (8.76.5)

बहवः पक्षिणो राजन्पुन्नामानः शुभाः शिवाः । त्वरयन्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे ॥

bahavaḥ pakṣiṇo rājanpunnāmānaḥ śubhāḥ śivāḥ | tvarayanto'rjunaṃ yuddhe hṛṣṭarūpā vavāśire

राजन्! पुल्लिंग नाम वाले बहुत-से शुभ और मंगलकारी पक्षी हर्ष से चहकते हुए अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करने लगे।

श्लोक 6 (8.76.6)

कङ्का गृध्रा बकाः श्येना वायसाश्च विशाम्पते । अग्रतस्तस्य गच्छन्ति भक्ष्यहेतोर्भयानकाः ॥

kaṅkā gṛdhrā bakāḥ śyenā vāyasāśca viśāmpate | agratastasya gacchanti bhakṣyahetorbhayānakāḥ

हे विशाम्पते! कंक, गिद्ध, बगुले, बाज और कौए भोजन की आशा से भयंकर रूप में उनके आगे-आगे चलने लगे।

श्लोक 7 (8.76.7)

निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे । विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं तथा ॥

nimittāni ca dhanyāni pāṇḍavasya śaśaṃsire | vināśamarisainyānāṃ karṇasya ca vadhaṃ tathā

ये शुभ शकुन पाण्डव द्वारा शत्रुओं की सेनाओं के विनाश और कर्ण के वध की सूचना दे रहे थे।

श्लोक 8 (8.76.8)

प्रयातस्याथ पार्थस्य महान्स्वेदो व्यजायत । चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेदं भविष्यति ॥

prayātasyātha pārthasya mahānsvedo vyajāyata | cintā ca vipulā jajñe kathaṃ cedaṃ bhaviṣyati

आगे बढ़ते हुए पार्थ को बहुत पसीना आ गया और बड़ी चिन्ता हुई — "यह कैसे होगा?"

श्लोक 9 (8.76.9)

विषण्णं तु ततो ज्ञात्वा सव्यसाचिनमच्युतः । सञ्चोदयति तेजस्वी मधुहा वानरध्वजम् ॥

viṣaṇṇaṃ tu tato jñātvā savyasācinamacyutaḥ | sañcodayati tejasvī madhuhā vānaradhvajam

तब सव्यसाची को उदास जानकर तेजस्वी मधुसूदन अच्युत ने वानरध्वज अर्जुन को प्रेरित किया।

श्लोक 10 (8.76.10)

ततो गाण्डीवधन्वानमब्रवीन्मधुसूदनः । दृष्ट्वा पार्थं तथायान्तं चिन्तापरिगतं तदा ॥

tato gāṇḍīvadhanvānamabravīnmadhusūdanaḥ | dṛṣṭvā pārthaṃ tathāyāntaṃ cintāparigataṃ tadā

तब मधुसूदन ने गाण्डीवधारी पार्थ को इस प्रकार चिन्ता से घिरे हुए आते देखकर उनसे कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 11 (8.76.11)

गाण्डीवधन्वन्सङ्ग्रामे ये त्वया धनुषा जिताः । न तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते ॥

gāṇḍīvadhanvansaṅgrāme ye tvayā dhanuṣā jitāḥ | na teṣāṃ mānuṣo jetā tvadanya iha vidyate

"गाण्डीवधारी! संग्राम में आपने अपने धनुष से जिन्हें जीता है, उन्हें जीतने वाला आपके सिवा इस संसार में कोई दूसरा मनुष्य नहीं है।

श्लोक 12 (8.76.12)

एते हि बहवः शूराः शक्रतुल्यपराक्रमाः । त्वां प्राप्य समरे शूरं प्रयाताः परमां गतिम् ॥

ete hi bahavaḥ śūrāḥ śakratulyaparākramāḥ | tvāṃ prāpya samare śūraṃ prayātāḥ paramāṃ gatim

इन्द्र के समान पराक्रमी ये बहुत-से शूर रण में आप जैसे वीर से भिड़कर परम गति को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 13 (8.76.13)

को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्भोजं च सुदक्षिणम् ॥

ko hi droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca bhagadattaṃ ca māriṣa | vindānuvindāvāvantyau kāmbhojaṃ ca sudakṣiṇam

भला कौन, मान्यवर, द्रोण, भीष्म, भगदत्त, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, तथा कम्बोजराज सुदक्षिण का सामना करके —

श्लोक 14 (8.76.14)

श्रुतायुं चाश्रुतायुं च शतायुं च महारथम् । प्रत्युद्गम्य भवेत्क्षेमी यो न स्यात्त्वद्विधः प्रभुः ॥

śrutāyuṃ cāśrutāyuṃ ca śatāyuṃ ca mahāratham | pratyudgamya bhavetkṣemī yo na syāttvadvidhaḥ prabhuḥ

और श्रुतायु, अश्रुतायु तथा महारथी शतायु का भी सामना करके सकुशल रह सकता है — जो आप जैसा समर्थ न हो?

श्लोक 15 (8.76.15)

तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि लाघवं बलमेव च । असम्मोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च सन्नतिः । वेधः पातश्च लक्षेषु योगश्चैव तथार्जुन ॥

tava hyastrāṇi divyāni lāghavaṃ balameva ca | asammohaśca yuddheṣu vijñānasya ca sannatiḥ | vedhaḥ pātaśca lakṣeṣu yogaścaiva tathārjuna

आपके पास दिव्य अस्त्र हैं, फुर्ती और बल है, युद्ध में अटल स्थिरता और विज्ञान की गहरी निपुणता है; निशाना बेधने और मारने की क्षमता है, और अर्जुन! योग भी है।

श्लोक 16 (8.76.16)

भवान्देवान्सगन्धर्वान्हन्यात्सर्वांश्च राक्षसान् । पृथिव्यां तु रणे पार्थ न योद्धा त्वत्समः पुमान् ॥

bhavāndevānsagandharvānhanyātsarvāṃśca rākṣasān | pṛthivyāṃ tu raṇe pārtha na yoddhā tvatsamaḥ pumān

आप गन्धर्वों सहित देवताओं को और सब राक्षसों को भी मार सकते हैं; किन्तु पृथ्वी पर रण में, पार्थ! आपके समान कोई योद्धा नहीं है।

श्लोक 17 (8.76.17)

धनुर्गृह्णन्ति ये केचित्क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः । आत्मनस्तु समं तेषां न पश्यामि शृणोमि च ॥

dhanurgṛhṇanti ye kecitkṣatriyā yuddhadurmadāḥ | ātmanastu samaṃ teṣāṃ na paśyāmi śṛṇomi ca

जो भी क्षत्रिय युद्ध में मदमत्त होकर धनुष धारण करते हैं, उनमें आपके समान किसी को न मैं देखता हूँ, न सुनता हूँ।

श्लोक 18 (8.76.18)

ब्रह्मणा हि प्रजाः सृष्टा गाण्डीवं च महद्धनुः । येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मान्नास्ति त्वया समः ॥

brahmaṇā hi prajāḥ sṛṣṭā gāṇḍīvaṃ ca mahaddhanuḥ | yena tvaṃ yudhyase pārtha tasmānnāsti tvayā samaḥ

ब्रह्मा ने प्रजा की सृष्टि की और उस महान् गाण्डीव धनुष की भी, जिससे आप युद्ध करते हैं, पार्थ! इसलिए आपके समान कोई नहीं है।

श्लोक 19 (8.76.19)

अवश्यं तु मया वाच्यं यत्पथ्यं तव पाण्डव । मावमंस्था महाबाहो कर्णमाहवशोभिनम् ॥

avaśyaṃ tu mayā vācyaṃ yatpathyaṃ tava pāṇḍava | māvamaṃsthā mahābāho karṇamāhavaśobhinam

फिर भी, पाण्डव! आपके हित की बात मुझे अवश्य कहनी है — महाबाहो! रणशोभी कर्ण को तुच्छ न समझिए।

श्लोक 20 (8.76.20)

कर्णो हि बलवान्दृप्तः कृतास्त्रश्च महारथः । कृती च चित्रयोधी च देशकालस्य कोविदः ॥

karṇo hi balavāndṛptaḥ kṛtāstraśca mahārathaḥ | kṛtī ca citrayodhī ca deśakālasya kovidaḥ

कर्ण बलवान और निडर है, अस्त्रविद्या में निपुण महारथी है, कुशल है, विचित्र युद्ध करने वाला है और देश-काल को जानने वाला है।

श्लोक 21 (8.76.21)

बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपाच्छृणु पाण्डव । त्वत्समं त्वद्विशिष्टं वा कर्णं मन्ये महारथम् । परमं यत्नमास्थाय त्वया वध्यो महाहवे ॥

bahunātra kimuktena saṃkṣepācchṛṇu pāṇḍava | tvatsamaṃ tvadviśiṣṭaṃ vā karṇaṃ manye mahāratham | paramaṃ yatnamāsthāya tvayā vadhyo mahāhave

अधिक कहने से क्या? पाण्डव! संक्षेप में सुनिए — मैं कर्ण को आपके बराबर, या आपसे भी बढ़कर महारथी मानता हूँ। महायुद्ध में अपना पूरा प्रयत्न लगाकर आपको उसे मारना होगा।

श्लोक 22 (8.76.22)

तेजसा वह्निसदृशो वायुवेगसमो जवे । अन्तकप्रतिमः क्रोधे सिंहसंहननो बली ॥

tejasā vahnisadṛśo vāyuvegasamo jave | antakapratimaḥ krodhe siṃhasaṃhanano balī

वह तेज में अग्नि के समान, वेग में वायु के समान, क्रोध में यमराज के समान, सिंह जैसे शरीर वाला और बलवान है।

श्लोक 23 (8.76.23)

अष्टरत्निर्महाबाहुर्व्यूढोरस्कः सुदुर्जयः । अभिमानी च शूरश्च प्रवीरः प्रियदर्शनः ॥

aṣṭaratnirmahābāhurvyūḍhoraskaḥ sudurjayaḥ | abhimānī ca śūraśca pravīraḥ priyadarśanaḥ

आठ रत्नि (हाथ) ऊँचा, महाबाहु, चौड़ी छाती वाला, अत्यन्त दुर्जय, अभिमानी, शूर, प्रवीर और देखने में सुन्दर।

श्लोक 24 (8.76.24)

सर्वयोधगुणैर्युक्तो मित्राणामभयङ्करः । सततं पाण्डवद्वेषी धार्तराष्ट्रहिते रतः ॥

sarvayodhaguṇairyukto mitrāṇāmabhayaṅkaraḥ | satataṃ pāṇḍavadveṣī dhārtarāṣṭrahite rataḥ

वह योद्धा के सब गुणों से युक्त है, अपने मित्रों को अभय देने वाला है, पाण्डवों से सदा द्वेष रखता है और धृतराष्ट्र के पुत्रों के हित में लगा रहता है।

श्लोक 25 (8.76.25)

सर्वैरवध्यो राधेयो देवैरपि सवासवैः । ऋते त्वामिति मे बुद्धिस्तदद्य जहि सूतजम् ॥

sarvairavadhyo rādheyo devairapi savāsavaiḥ | ṛte tvāmiti me buddhistadadya jahi sūtajam

राधापुत्र इन्द्र सहित सब देवताओं से भी अवध्य है — केवल आपको छोड़कर; यही मेरी समझ है। इसलिए आज आप उस सूतपुत्र को मार डालिए।

श्लोक 26 (8.76.26)

देवैरपि हि संयत्तैर्बिभ्रद्भिर्मांसशोणितम् । अशक्यः स रथो जेतुं सर्वैरपि युयुत्सुभिः ॥

devairapi hi saṃyattairbibhradbhirmāṃsaśoṇitam | aśakyaḥ sa ratho jetuṃ sarvairapi yuyutsubhiḥ

यदि सब देवता भी एकत्र होकर मांस और रक्त का शरीर धारण करके युद्ध की इच्छा से आ जाएँ, तो भी वह रथी उन सबसे जीता नहीं जा सकता।

श्लोक 27 (8.76.27)

दुरात्मानं पापवृत्तं नृशंसं । दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेयेषु नित्यम् । हीनस्वार्थं पाण्डवेयैर्विरोधे । हत्वा कर्णं निश्चितार्थो भवाद्य ॥

durātmānaṃ pāpavṛttaṃ nṛśaṃsaṃ | duṣṭaprajñaṃ pāṇḍaveyeṣu nityam | hīnasvārthaṃ pāṇḍaveyairvirodhe | hatvā karṇaṃ niścitārtho bhavādya

उस दुरात्मा, पापाचारी और क्रूर कर्ण को मारकर, जो पाण्डवों के प्रति सदा दुष्ट बुद्धि रखता है और पाण्डवों से विरोध करके अपना ही हित खो बैठा है, आज आप कृतार्थ हो जाइए।

श्लोक 28 (8.76.28)

तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं । निष्कालिकं कालवशं नयाद्य । तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं । हत्वा प्रीतिं धर्मराजे कुरुष्व ॥

taṃ sūtaputraṃ rathināṃ variṣṭhaṃ | niṣkālikaṃ kālavaśaṃ nayādya | taṃ sūtaputraṃ rathināṃ variṣṭhaṃ | hatvā prītiṃ dharmarāje kuruṣva

रथियों में श्रेष्ठ उस सूतपुत्र को, जिसका समय पूरा हो चुका है, आज काल के वश में पहुँचा दीजिए। रथियों में श्रेष्ठ उस सूतपुत्र को मारकर धर्मराज को प्रसन्न कीजिए।

श्लोक 29 (8.76.29)

जानामि ते पार्थं वीर्यं यथावद् । दुर्वारणीयं च सुरासुरैश्च । सदावजानाति हि पाण्डुपुत्रान् । असौ दर्पात्सूतपुत्रो दुरात्मा ॥

jānāmi te pārthaṃ vīryaṃ yathāvad | durvāraṇīyaṃ ca surāsuraiśca | sadāvajānāti hi pāṇḍuputrān | asau darpātsūtaputro durātmā

पार्थ! मैं आपके पराक्रम को ठीक-ठीक जानता हूँ, जिसे देवता और असुर भी नहीं रोक सकते। वह दुष्ट सूतपुत्र अपने घमण्ड में पाण्डुपुत्रों का सदा अपमान करता है।

श्लोक 30 (8.76.30)

आत्मानं मन्यते वीरं येन पापः सुयोधनः । तमद्य मूलं पापानां जहि सौतिं धनञ्जय ॥

ātmānaṃ manyate vīraṃ yena pāpaḥ suyodhanaḥ | tamadya mūlaṃ pāpānāṃ jahi sautiṃ dhanañjaya

जिसके बल पर पापी सुयोधन अपने को वीर मानता है, पापों की उस जड़ सूतपुत्र को आज मार डालिए, धनञ्जय!

श्लोक 31 (8.76.31)

खड्गजिह्वं धनुरास्यं शरदंष्ट्रं तरस्विनम् । दृप्तं पुरुषशार्दूलं जहि कर्णं धनञ्जय ॥

khaḍgajihvaṃ dhanurāsyaṃ śaradaṃṣṭraṃ tarasvinam | dṛptaṃ puruṣaśārdūlaṃ jahi karṇaṃ dhanañjaya

धनञ्जय! उस अभिमानी, वेगवान पुरुषसिंह कर्ण को मार डालिए, जिसकी जीभ तलवार है, मुख धनुष है और दाँत बाण हैं।

श्लोक 32 (8.76.32)

अहं त्वामनुजानामि वीर्येण च बलेन च । जहि कर्णं रणे शूरं मातङ्गमिव केसरी ॥

ahaṃ tvāmanujānāmi vīryeṇa ca balena ca | jahi karṇaṃ raṇe śūraṃ mātaṅgamiva kesarī

मैं अपने पराक्रम और बल के साथ आपको आज्ञा देता हूँ — जैसे सिंह हाथी को मारता है, वैसे ही रण में उस शूर कर्ण को मार डालिए।

श्लोक 33 (8.76.33)

यस्य वीर्येण वीर्यं ते धार्तराष्ट्रोऽवमन्यते । तमद्य पार्थ सङ्ग्रामे कर्णं वैकर्तनं जहि ॥

yasya vīryeṇa vīryaṃ te dhārtarāṣṭro'vamanyate | tamadya pārtha saṅgrāme karṇaṃ vaikartanaṃ jahi

जिसके बल के भरोसे धृतराष्ट्र का पुत्र आपके बल को तुच्छ समझता है, उस वैकर्तन कर्ण को आज संग्राम में मार डालिए, पार्थ!"

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