कर्ण पर्व · अध्याय 75
अर्जुन की क्षमा-याचना और कर्णवध की प्रतिज्ञा
कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि बड़े भाई का वध करने पर वे घोर नरक में जाते, और उनसे युधिष्ठिर को मनाने को कहते हैं। अर्जुन राजा के चरणों में गिर पड़ते हैं; दोनों भाई रोते और एक-दूसरे से गले मिलते हैं। युधिष्ठिर कर्ण के हाथों हुई अपनी दुर्दशा बताते हैं और अर्जुन सत्य की शपथ लेकर उसी दिन कर्ण को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं। कृष्ण रथ तैयार करवाते हैं और युधिष्ठिर से अर्जुन को आशीर्वाद देने को कहते हैं; राजा अनुमति और शुभकामनाएँ देते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.75.1)
इति स्म कृष्णवचनात्प्रत्युच्चार्य युधिष्ठिरम् । बभूव विमनाः पार्थः किञ्चित्कृत्वेव पातकम् ॥
iti sma kṛṣṇavacanātpratyuccārya yudhiṣṭhiram | babhūva vimanāḥ pārthaḥ kiñcitkṛtveva pātakam
कृष्ण के कहने से युधिष्ठिर को इस प्रकार उत्तर देकर पार्थ उदास हो गए, मानो उनसे कोई पाप हो गया हो।
श्लोक 2 (8.75.2)
ततोऽब्रवीद्वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् । कथं नाम भवेदेतद्यदि त्वं पार्थ धर्मजम् ॥
tato'bravīdvāsudevaḥ prahasanniva pāṇḍavam | kathaṃ nāma bhavedetadyadi tvaṃ pārtha dharmajam
तब वासुदेव ने मानो मुस्कराते हुए पाण्डव से कहा — "पार्थ! यह कैसे ठीक होता, यदि तुम धर्मपुत्र को मार डालते —
वासुदेव उवाच
श्लोक 3 (8.75.3)
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् । त्वमित्युक्त्वाथ राजानमेवं कश्मलमाविशः ॥
asinā tīkṣṇadhāreṇa hanyā dharme vyavasthitam | tvamityuktvātha rājānamevaṃ kaśmalamāviśaḥ
— जो धर्म में स्थिर हैं — तीखी धार वाली तलवार से, केवल इसलिए कि तुमने राजा को 'तू' कह दिया था? इस प्रकार तुम मोह में पड़ गए हो।
श्लोक 4 (8.75.4)
हत्वा तु नृपतिं पार्थ करिष्यसि किमुत्तरम् । एवं हि दुर्विदो धर्मो मन्दप्रज्ञैर्विशेषतः ॥
hatvā tu nṛpatiṃ pārtha kariṣyasi kimuttaram | evaṃ hi durvido dharmo mandaprajñairviśeṣataḥ
और पार्थ! राजा को मार डालने के बाद तुम क्या उत्तर देते? इस प्रकार धर्म को समझना कठिन होता है, विशेषतः मन्द बुद्धि वालों के लिए।
श्लोक 5 (8.75.5)
स भवान्धर्मभीरुत्वाद्ध्रुवं यायान्महत्तमः । नरकं घोररूपं च भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वै वधात् ॥
sa bhavāndharmabhīrutvāddhruvaṃ yāyānmahattamaḥ | narakaṃ ghorarūpaṃ ca bhrāturjyeṣṭhasya vai vadhāt
धर्म के भय से ही तुम, हे महान्! अपने ज्येष्ठ भाई का वध करके निश्चय ही घोर नरक में चले जाते।
श्लोक 6 (8.75.6)
स त्वं धर्मभृतां श्रेष्ठं राजानं धर्मसंहितम् । प्रसादय कुरुश्रेष्ठमेतदत्र मतं मम ॥
sa tvaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ rājānaṃ dharmasaṃhitam | prasādaya kuruśreṣṭhametadatra mataṃ mama
इसलिए धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ, धर्मनिष्ठ कुरुश्रेष्ठ राजा को मनाओ। यही मेरी सम्मति है।
श्लोक 7 (8.75.7)
प्रसाद्य भक्त्या राजानं प्रीते चैव युधिष्ठिरे । प्रयावस्त्वरितौ योद्धुं सूतपुत्ररथं प्रति ॥
prasādya bhaktyā rājānaṃ prīte caiva yudhiṣṭhire | prayāvastvaritau yoddhuṃ sūtaputrarathaṃ prati
भक्ति से राजा को मना लेने और युधिष्ठिर के प्रसन्न हो जाने पर हम दोनों शीघ्र ही सूतपुत्र के रथ से युद्ध करने चलेंगे।
श्लोक 8 (8.75.8)
हत्वा तु समरे कर्णं त्वमद्य निशितैः शरैः । विपुलां प्रीतिमाधत्स्व धर्मपुत्रस्य मानद ॥
hatvā tu samare karṇaṃ tvamadya niśitaiḥ śaraiḥ | vipulāṃ prītimādhatsva dharmaputrasya mānada
हे मान देने वाले! आज तीखे बाणों से रण में कर्ण को मारकर धर्मपुत्र को बड़ी प्रसन्नता दो।
श्लोक 9 (8.75.9)
एतदत्र महाबाहो प्राप्तकालं मतं मम । एवं कृते कृतं चैव तव कार्यं भविष्यति ॥
etadatra mahābāho prāptakālaṃ mataṃ mama | evaṃ kṛte kṛtaṃ caiva tava kāryaṃ bhaviṣyati
हे महाबाहो! यही मेरी सम्मति है, जो इस समय के योग्य है। ऐसा करने पर तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 10 (8.75.10)
ततोऽर्जुनो महाराज लज्जया वै समन्वितः । धर्मराजस्य चरणौ प्रपद्य शिरसा नतः ॥
tato'rjuno mahārāja lajjayā vai samanvitaḥ | dharmarājasya caraṇau prapadya śirasā nataḥ
हे महाराज! तब अर्जुन लज्जा से भरकर सिर झुकाए धर्मराज के चरणों में गिर पड़े।
श्लोक 11 (8.75.11)
उवाच भरतश्रेष्ठं प्रसीदेति पुनः पुनः । क्षमस्व राजन्यत्प्रोक्तस्त्वं मया धर्मभीरुणा ॥
uvāca bharataśreṣṭhaṃ prasīdeti punaḥ punaḥ | kṣamasva rājanyatproktastvaṃ mayā dharmabhīruṇā
उन्होंने बार-बार भरतश्रेष्ठ से कहा, "प्रसन्न हो जाइए। राजन्! मैं धर्म के भय से डरा हुआ था, इसलिए मैंने आपसे जो कहा, उसे क्षमा कीजिए।"
श्लोक 12 (8.75.12)
पादयोः पतितं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । धनञ्जयममित्रघ्नं रुदन्तं भरतर्षभम् ॥
pādayoḥ patitaṃ dṛṣṭvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | dhanañjayamamitraghnaṃ rudantaṃ bharatarṣabham
शत्रुओं का नाश करने वाले भरतश्रेष्ठ धनञ्जय को अपने चरणों में गिरकर रोते देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने —
श्लोक 13 (8.75.13)
उत्थाप्य भ्रातरं राजा धर्मराजो धनञ्जयम् । समाश्लिष्य च सस्नेहं प्ररुरोद महीपतिः ॥
utthāpya bhrātaraṃ rājā dharmarājo dhanañjayam | samāśliṣya ca sasnehaṃ praruroda mahīpatiḥ
— अपने भाई धनञ्जय को उठाया, स्नेह से गले लगाया और वे राजा रो पड़े।
श्लोक 14 (8.75.14)
रुदित्वा सुचिरं कालं भ्रातरौ सुमहाद्युती । कृतशौचौ महाराज प्रीतिमन्तौ बभूवतुः ॥
ruditvā suciraṃ kālaṃ bhrātarau sumahādyutī | kṛtaśaucau mahārāja prītimantau babhūvatuḥ
हे महाराज! बहुत देर तक रोने के बाद वे दोनों महातेजस्वी भाई शुद्ध-हृदय होकर प्रसन्न हो गए।
श्लोक 15 (8.75.15)
तत आश्लिष्य तं प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय पाण्डवः । प्रीत्या परमया युक्तो विस्मयंश्च पुनःपुनः । अब्रवीत्तं महेष्वासं धर्मराजो धनञ्जयम् ॥
tata āśliṣya taṃ premṇā mūrdhni cāghrāya pāṇḍavaḥ | prītyā paramayā yukto vismayaṃśca punaḥpunaḥ | abravīttaṃ maheṣvāsaṃ dharmarājo dhanañjayam
तब पाण्डुपुत्र धर्मराज ने प्रेम से उन्हें गले लगाकर उनका सिर सूँघा और परम प्रीति से भरकर, बार-बार विस्मित होते हुए, महाधनुर्धर धनञ्जय से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 16 (8.75.16)
कर्णेन मे महाबाहो सर्वसैन्यस्य पश्यतः । कवचं च ध्वजं चैव धनुः शक्तिर्हयाः शराः । शरैः कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संयुगे ॥
karṇena me mahābāho sarvasainyasya paśyataḥ | kavacaṃ ca dhvajaṃ caiva dhanuḥ śaktirhayāḥ śarāḥ | śaraiḥ kṛttā maheṣvāsa yatamānasya saṃyuge
"महाबाहो! पूरी सेना के देखते-देखते कर्ण ने मेरा कवच, ध्वज, धनुष, शक्ति, घोड़े और बाण अपने बाणों से काट डाले, हे महाधनुर्धर! जबकि मैं रण में डटा हुआ प्रयत्न कर रहा था।
श्लोक 17 (8.75.17)
सोऽहं दृष्ट्वा रणे तस्य कर्म कर्णस्य फल्गुन । व्यवसीदामि दुःखेन न तु मे जीवितं प्रियम् ॥
so'haṃ dṛṣṭvā raṇe tasya karma karṇasya phalguna | vyavasīdāmi duḥkhena na tu me jīvitaṃ priyam
फल्गुन! रण में कर्ण का वह पराक्रम देखकर मैं दुःख से डूबा जा रहा हूँ; अब मुझे अपना जीवन प्रिय नहीं है।
श्लोक 18 (8.75.18)
न चेदद्य हि तं वीरं निहनिष्यसि संयुगे । प्राणानेव परित्यक्ष्ये जीवितार्थो हि को मम ॥
na cedadya hi taṃ vīraṃ nihaniṣyasi saṃyuge | prāṇāneva parityakṣye jīvitārtho hi ko mama
यदि आज तुम रण में उस वीर को नहीं मारोगे, तो मैं प्राण ही त्याग दूँगा; मुझे जीवित रहने से क्या प्रयोजन?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (8.75.19)
एवमुक्तः प्रत्युवाच विजयो भरतर्षभ ॥
evamuktaḥ pratyuvāca vijayo bharatarṣabha
ऐसा कहे जाने पर भरतश्रेष्ठ विजय (अर्जुन) ने उत्तर दिया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 20 (8.75.20)
सत्येन ते शपे राजंस्त्वत्पादेन तथैव च । भीमेन च नरश्रेष्ठ यमाभ्यां च महीपते ॥
satyena te śape rājaṃstvatpādena tathaiva ca | bhīmena ca naraśreṣṭha yamābhyāṃ ca mahīpate
"राजन्! मैं सत्य की, आपके चरणों की, तथा हे नरश्रेष्ठ! भीम की और हे पृथ्वीपति! दोनों जुड़वाँ भाइयों की शपथ खाता हूँ —
श्लोक 21 (8.75.21)
अहमेनं नरश्रेष्ठ सामात्यं च महीपते । यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽपि वा । महीतले पतिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥
ahamenaṃ naraśreṣṭha sāmātyaṃ ca mahīpate | yathādya samare karṇaṃ haniṣyāmi hato'pi vā | mahītale patiṣyāmi satyenāyudhamālabhe
— उसे मैं मन्त्रियों सहित ही देख लूँगा, हे नरश्रेष्ठ! हे पृथ्वीपति! आज मैं रण में कर्ण को मारूँगा, अथवा स्वयं मारा जाकर धरती पर गिर पड़ूँगा। मैं सत्य की शपथ लेकर अपना शस्त्र छूता हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 22 (8.75.22)
एवमाभाष्य राजानमब्रवीन्माधवं वचः । अद्य कर्णं रणे कृष्ण सूदयिष्ये न संशयः । त्वमनुध्याहि भद्रं ते वधं तस्य दुरात्मनः ॥
evamābhāṣya rājānamabravīnmādhavaṃ vacaḥ | adya karṇaṃ raṇe kṛṣṇa sūdayiṣye na saṃśayaḥ | tvamanudhyāhi bhadraṃ te vadhaṃ tasya durātmanaḥ
राजा से यह कहकर उन्होंने माधव से कहा — "कृष्ण! आज मैं रण में निश्चय ही कर्ण को मार डालूँगा, इसमें संदेह नहीं। आप उस दुष्ट के वध का ही चिन्तन कीजिए; आपका कल्याण हो।"
श्लोक 23 (8.75.23)
एवमुक्तोऽब्रवीत्पार्थं केशवो राजसत्तम । शक्तोऽसि भरतश्रेष्ठ यत्नं कर्तुं यदात्थ माम् ॥
evamukto'bravītpārthaṃ keśavo rājasattama | śakto'si bharataśreṣṭha yatnaṃ kartuṃ yadāttha mām
ऐसा कहे जाने पर राजाओं में श्रेष्ठ केशव ने पार्थ से कहा — "भरतश्रेष्ठ! जिस प्रयत्न की बात तुम मुझसे कहते हो, उसे करने में तुम समर्थ हो।
वासुदेव उवाच
श्लोक 24 (8.75.24)
एष चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ । कथं भवान्रणे कर्णं निहन्यादिति सत्तम ॥
eṣa cāpi hi me kāmo nityameva mahāratha | kathaṃ bhavānraṇe karṇaṃ nihanyāditi sattama
हे महारथी! मेरी भी सदा यही इच्छा रही है कि तुम किस प्रकार रण में कर्ण को मारो, हे सत्तम!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (8.75.25)
एवमुक्तस्ततो राजन्पार्थो वचनमब्रवीत् । हन्यते द्वैरथे भूयो युज्यन्तां वै रथोत्तमे ॥
evamuktastato rājanpārtho vacanamabravīt | hanyate dvairathe bhūyo yujyantāṃ vai rathottame
ऐसा कहे जाने पर, हे राजन्! पार्थ ने कहा — "रथ-द्वन्द्व में उसका वध होता है; उत्तम रथ में घोड़े फिर से जोते जाएँ।
अर्जुन उवाच
श्लोक 26 (8.75.26)
उपावृत्ताश्च तुरगाः शिक्षिताश्चाश्वसादिभिः । रथोपकरणैः सर्वैः सत्वरं यातु मे रथः ॥
upāvṛttāśca turagāḥ śikṣitāścāśvasādibhiḥ | rathopakaraṇaiḥ sarvaiḥ satvaraṃ yātu me rathaḥ
घोड़े लौट आए हैं और घुड़सवारों द्वारा सधाए गए हैं; मेरा रथ सब सामग्री के साथ शीघ्र आए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 27 (8.75.27)
एवमुक्तो महाराज फल्गुनेन महात्मना । उवाच दारुकं कृष्णः कुरु सर्वं यदब्रवीत् । अर्जुनो भारतश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥
evamukto mahārāja phalgunena mahātmanā | uvāca dārukaṃ kṛṣṇaḥ kuru sarvaṃ yadabravīt | arjuno bhārataśreṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām
महात्मा फल्गुन के ऐसा कहने पर, हे महाराज! कृष्ण ने दारुक से कहा — "अर्जुन ने जो कहा है, वह सब करो; अर्जुन भरतश्रेष्ठ हैं और सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हैं।"
श्लोक 28 (8.75.28)
आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम । योजयामास च रथं वैयाघ्नं शत्रुतापनम् । सज्जं निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मनः ॥
ājñaptastvatha kṛṣṇena dāruko rājasattama | yojayāmāsa ca rathaṃ vaiyāghnaṃ śatrutāpanam | sajjaṃ nivedayāmāsa pāṇḍavasya mahātmanaḥ
कृष्ण की आज्ञा पाकर, हे राजश्रेष्ठ! दारुक ने शत्रुओं को तपाने वाला, बाघ की खाल से मढ़ा हुआ रथ जोता और उसे तैयार बताकर महात्मा पाण्डव को सूचित किया।
श्लोक 29 (8.75.29)
युक्तं तु रथमास्थाय दारुकेण महात्मना । उपस्थितं रथं दृष्ट्वा पद्मनाभो रणान्तकृत् । भूयश्चोवाच मतिमान्माधवो धर्मनन्दनम् ॥
yuktaṃ tu rathamāsthāya dārukeṇa mahātmanā | upasthitaṃ rathaṃ dṛṣṭvā padmanābho raṇāntakṛt | bhūyaścovāca matimānmādhavo dharmanandanam
महात्मा दारुक के जोते हुए रथ को उपस्थित देखकर कमलनाभ, रण का अन्त करने वाले बुद्धिमान माधव ने धर्मपुत्र से फिर कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 30 (8.75.30)
युधिष्ठिरेमं बीभत्सुं त्वं सान्त्वयितुमर्हसि । अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधायाद्य दुरात्मनः ॥
yudhiṣṭhiremaṃ bībhatsuṃ tvaṃ sāntvayitumarhasi | anujñātuṃ ca karṇasya vadhāyādya durātmanaḥ
"युधिष्ठिर! आप इस बीभत्सु को सान्त्वना दें और आज दुरात्मा कर्ण का वध करने के लिए इन्हें आज्ञा दें।
श्लोक 31 (8.75.31)
श्रुत्वा ह्यावां महासंख्ये त्वां कर्णशरपीडितम् । प्रवृत्तिं ज्ञातुमायाताविहावां पाण्डुनन्दन ॥
śrutvā hyāvāṃ mahāsaṃkhye tvāṃ karṇaśarapīḍitam | pravṛttiṃ jñātumāyātāvihāvāṃ pāṇḍunandana
हे पाण्डुनन्दन! महायुद्ध में आपको कर्ण के बाणों से पीड़ित सुनकर हम दोनों आपका समाचार जानने यहाँ आए हैं।
श्लोक 32 (8.75.32)
दिष्ट्यासि राजन्विरुजो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः । परिसान्त्वय बीभत्सुं जयमाशाधि चानघ ॥
diṣṭyāsi rājanvirujo diṣṭyā na grahaṇaṃ gataḥ | parisāntvaya bībhatsuṃ jayamāśādhi cānagha
राजन्! सौभाग्य से आप पीड़ा से मुक्त हैं; सौभाग्य से आप पकड़े नहीं गए। हे निष्पाप! बीभत्सु को सान्त्वना दीजिए और उन्हें विजय का आशीर्वाद दीजिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 33 (8.75.33)
एह्येहि पार्थ बीभत्सो मां परिष्वज पाण्डव । वक्तव्यमुक्तोऽस्म्यहितं त्वया क्षान्तं च तन्मया ॥
ehyehi pārtha bībhatso māṃ pariṣvaja pāṇḍava | vaktavyamukto'smyahitaṃ tvayā kṣāntaṃ ca tanmayā
"आओ, आओ पार्थ बीभत्सु, पाण्डव! मुझे गले लगाओ। तुमने मुझसे वह बात कही जो कहनी ही थी, भले ही वह अप्रिय थी; मैंने उसे क्षमा कर दिया।
श्लोक 34 (8.75.34)
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्णं धनञ्जय । मन्युं च मा कृथाः पार्थ यन्मयोक्तोऽसि दारुणं ॥
ahaṃ tvāmanujānāmi jahi karṇaṃ dhanañjaya | manyuṃ ca mā kṛthāḥ pārtha yanmayokto'si dāruṇaṃ
मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ — धनञ्जय! कर्ण को मार डालो। पार्थ! मैंने तुमसे जो कठोर बात कही थी, उसका मन में क्रोध न रखना।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (8.75.35)
ततो धनञ्जयो राजञ्शिरसा प्रणतस्तदा । पादौ जग्राह पाणिभ्यां भ्रातुर्ज्येष्ठस्य मारिष ॥
tato dhanañjayo rājañśirasā praṇatastadā | pādau jagrāha pāṇibhyāṃ bhrāturjyeṣṭhasya māriṣa
तब, हे राजन्! धनञ्जय ने सिर झुकाकर दोनों हाथों से अपने ज्येष्ठ भाई के चरण पकड़ लिए, हे मान्य!
श्लोक 36 (8.75.36)
तमुत्थाप्य ततो राजा परिष्वज्य च पीडितम् । मूर्ध्न्युपाघ्राय चैवैनमिदं पुनरुवाच ह ॥
tamutthāpya tato rājā pariṣvajya ca pīḍitam | mūrdhnyupāghrāya caivainamidaṃ punaruvāca ha
राजा ने उन्हें उठाकर, व्यथित अर्जुन को गले लगाया, उनका सिर सूँघा और फिर यह बात कही —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 37 (8.75.37)
धनञ्जय महाबाहो मानितोऽस्मि दृढं त्वया । माहात्म्यं विजयं चैवं भूयः प्राप्नुहि शाश्वतम् ॥
dhanañjaya mahābāho mānito'smi dṛḍhaṃ tvayā | māhātmyaṃ vijayaṃ caivaṃ bhūyaḥ prāpnuhi śāśvatam
"धनञ्जय! महाबाहो! तुमने मेरा बड़ा मान रखा है। तुम्हें महानता और विजय प्राप्त हो, और वह सदा बनी रहे।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 38 (8.75.38)
अद्य तं पापकर्माणं सानुबन्धं रणे शरैः । नयाम्यन्तं समासाद्य राधेयं बलगर्वितम् ॥
adya taṃ pāpakarmāṇaṃ sānubandhaṃ raṇe śaraiḥ | nayāmyantaṃ samāsādya rādheyaṃ balagarvitam
"आज मैं उस पापकर्मी बल-गर्वित राधापुत्र के पास पहुँचकर उसे उसके साथियों सहित रण में अपने बाणों से अन्त तक पहुँचा दूँगा।
श्लोक 39 (8.75.39)
येन त्वं पीडितो बाणैर्दृढमायम्य कार्मुकम् । तस्याद्य कर्मणः कर्णः फलमाप्स्यति दारुणम् ॥
yena tvaṃ pīḍito bāṇairdṛḍhamāyamya kārmukam | tasyādya karmaṇaḥ karṇaḥ phalamāpsyati dāruṇam
जिस कर्म से उसने धनुष को खूब खींचकर अपने बाणों से आपको पीड़ित किया, उसका भयंकर फल कर्ण आज पाएगा।
श्लोक 40 (8.75.40)
अद्य त्वामुपयास्यामि कर्णं हत्वा महीपते । सभाजये त्वामाक्रन्दादिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥
adya tvāmupayāsyāmi karṇaṃ hatvā mahīpate | sabhājaye tvāmākrandāditi satyaṃ bravīmi te
हे पृथ्वीपति! आज कर्ण को मारकर मैं युद्ध के कोलाहल से लौटकर आपके पास आऊँगा और आपका सत्कार करूँगा। मैं आपसे यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 41 (8.75.41)
नाहत्वा विनिवर्तिष्ये कर्णमद्य रणाजिरात् । इति सत्येन ते पादौ स्पृशामि जगतीपते ॥
nāhatvā vinivartiṣye karṇamadya raṇājirāt | iti satyena te pādau spṛśāmi jagatīpate
आज कर्ण को मारे बिना मैं रणभूमि से नहीं लौटूँगा। हे पृथ्वीपति! इसी सत्य की शपथ लेकर मैं आपके चरण छूता हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (8.75.42)
इति ब्रुवाणं सुमनाः किरीटिनं । युधिष्ठिरः प्राह वचो बृहत्तरम् । यशोऽक्षयं जीवितमीप्सितं ते । जयं सदा वीर्यमरिक्षयं तदा ॥
iti bruvāṇaṃ sumanāḥ kirīṭinaṃ | yudhiṣṭhiraḥ prāha vaco bṛhattaram | yaśo'kṣayaṃ jīvitamīpsitaṃ te | jayaṃ sadā vīryamarikṣayaṃ tadā
ऐसा कहते हुए किरीटी से प्रसन्न मन युधिष्ठिर ने ये गम्भीर वचन कहे — "तुम्हारा यश अक्षय हो, तुम्हारी इच्छा के अनुसार जीवन हो; विजय, पराक्रम और शत्रुओं का नाश सदा तुम्हारे साथ रहे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 43 (8.75.43)
प्रयाहि वृद्धिं च दिशन्तु देवता । यथाहमिच्छामि तवास्तु तत्तथा । प्रयाहि शीघ्रं जहि कर्णमाहवे । पुरन्दरो वृत्रमिवात्मवृद्धये ॥
prayāhi vṛddhiṃ ca diśantu devatā | yathāhamicchāmi tavāstu tattathā | prayāhi śīghraṃ jahi karṇamāhave | purandaro vṛtramivātmavṛddhaye
समृद्धि की ओर प्रस्थान करो, देवता तुम्हें वह प्रदान करें; जैसा मैं चाहता हूँ, वैसा ही तुम्हारे लिए हो। शीघ्र जाओ और रण में कर्ण को मार डालो, जैसे पुरन्दर (इन्द्र) ने अपनी वृद्धि के लिए वृत्र को मारा था।"