कर्ण पर्व · अध्याय 74
कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को शान्त करना
अर्जुन की कठोर बातों से आहत युधिष्ठिर शय्या से उठकर स्वयं को दोष देते हैं, अर्जुन से अपना सिर काट डालने को कहते हैं और भीम को राज्य सौंपकर वन जाने का निश्चय करते हैं। कृष्ण प्रणाम करके समझाते हैं कि अर्जुन ने गाण्डीव-सम्बन्धी अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही अपमान किया था, दोनों के लिए क्षमा माँगते हैं और वचन देते हैं कि आज कर्ण मारा जाएगा। युधिष्ठिर कृष्ण को उठाकर उन्हें धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने भाइयों को इस भूल से उबार लिया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.74.1)
एतच्छ्रुत्वा पाण्डवो धर्मराजो । भ्रातुर्वाक्यं परुषं फल्गुनस्य । उत्थाय तस्माच्छयनादुवाच । पार्थं ततो दुःखपरीतचेताः ॥
etacchrutvā pāṇḍavo dharmarājo | bhrāturvākyaṃ paruṣaṃ phalgunasya | utthāya tasmācchayanāduvāca | pārthaṃ tato duḥkhaparītacetāḥ
भाई फल्गुन (अर्जुन) की यह कठोर बात सुनकर पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर दुःख से व्याकुल मन से उस शय्या से उठे और पार्थ से बोले।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (8.74.2)
कृतं मया पार्थ न साधुकर्म । येन प्राप्तं व्यसनं वः सुघोरम् । तस्माच्छिरश्छिन्धि ममैतदद्य । कुलान्तकस्याधमपूरुषस्य ॥
kṛtaṃ mayā pārtha na sādhukarma | yena prāptaṃ vyasanaṃ vaḥ sughoram | tasmācchiraśchindhi mamaitadadya | kulāntakasyādhamapūruṣasya
"पार्थ! मैंने अच्छा काम नहीं किया, जिसके कारण तुम सब पर यह अत्यन्त भयंकर विपत्ति आ पड़ी। इसलिए आज मेरा यह सिर काट डालो — मैं कुल का नाश करने वाला नीच पुरुष हूँ।
श्लोक 3 (8.74.3)
पापस्य पाप्मोपहतस्य वीर । विमूढबुद्धेरलसस्य भीरोः । वृद्धावमन्तुः परुषस्य चैव । किं ते चिरं मामनुसृज्य रूक्षम् ॥
pāpasya pāpmopahatasya vīra | vimūḍhabuddheralasasya bhīroḥ | vṛddhāvamantuḥ paruṣasya caiva | kiṃ te ciraṃ māmanusṛjya rūkṣam
हे वीर! मैं पापी हूँ, पाप से ग्रस्त, मूढ़बुद्धि, आलसी और डरपोक हूँ; बड़ों का अपमान करने वाला और कठोर हूँ। मुझ जैसे रूखे मनुष्य के पीछे तुम इतने समय तक क्यों चलते रहे?
श्लोक 4 (8.74.4)
गच्छाम्यहं वनमद्यैव पापः । सुखं भवान्वर्ततां मद्विहीनः । योग्यो राजा भीमसेनो महात्मा । क्लीबस्य किं वा मम राज्यकृत्यम् ॥
gacchāmyahaṃ vanamadyaiva pāpaḥ | sukhaṃ bhavānvartatāṃ madvihīnaḥ | yogyo rājā bhīmaseno mahātmā | klībasya kiṃ vā mama rājyakṛtyam
मैं पापी आज ही वन चला जाता हूँ। तुम मेरे बिना सुख से रहो। महात्मा भीमसेन राजा होने योग्य हैं; मुझ जैसे निर्बल को राज्य के कामों से क्या प्रयोजन?
श्लोक 5 (8.74.5)
न चापि शक्तः परुषाणि सोढुं । पुनस्तवेमानि रुषान्वितस्य । भीमोऽस्तु राजा मम जीवितेन । न कार्यमद्यावमतस्य वीर ॥
na cāpi śaktaḥ paruṣāṇi soḍhuṃ | punastavemāni ruṣānvitasya | bhīmo'stu rājā mama jīvitena | na kāryamadyāvamatasya vīra
क्रोध में भरे हुए तुम्हारे ये कठोर वचन मैं फिर नहीं सह सकता। भीम ही राजा हो; हे वीर! इस प्रकार अपमानित हुए मुझे अब जीवन से क्या काम?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (8.74.6)
इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात । रुषान्वितस्तच्छयनं विहाय । इयेष निर्गन्तुमथो वनाय । तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ॥
ityevamuktvā sahasotpapāta | ruṣānvitastacchayanaṃ vihāya | iyeṣa nirgantumatho vanāya | taṃ vāsudevaḥ praṇato'bhyuvāca
यह कहकर वे क्रोध से भरे हुए सहसा उस शय्या को छोड़कर उठ खड़े हुए और वन की ओर जाना चाहा। तब वासुदेव ने झुककर उनसे कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 7 (8.74.7)
न राजन्विदितं तत्ते यथा गाण्डीवधन्वनः । प्रतिज्ञा सत्यसन्धस्य गाण्डीवं प्रति विश्रुता ॥
na rājanviditaṃ tatte yathā gāṇḍīvadhanvanaḥ | pratijñā satyasandhasya gāṇḍīvaṃ prati viśrutā
"राजन्! आपने सत्य पर अटल गाण्डीवधारी अर्जुन की गाण्डीव के विषय में वह प्रसिद्ध प्रतिज्ञा नहीं समझी।
श्लोक 8 (8.74.8)
ब्रूयाद्य एनं गाण्डीवं देह्यन्यस्मै त्वमित्युत । वध्योऽस्य स पुमाँल्लोके त्वया चोक्तोऽयमीदृशम् ॥
brūyādya enaṃ gāṇḍīvaṃ dehyanyasmai tvamityuta | vadhyo'sya sa pumām̐lloke tvayā cokto'yamīdṛśam
जो कोई इनसे कहे कि 'तुम अपना गाण्डीव किसी दूसरे को दे दो', वह संसार में इनके हाथ से वध्य है; और आपने इनसे ठीक ऐसा ही कह दिया था।
श्लोक 9 (8.74.9)
ततः सत्यां प्रतिज्ञां तां पार्थेन प्रतिरक्षता । मच्छन्दादवमानोऽयं कृतस्तव महीपते ॥
tataḥ satyāṃ pratijñāṃ tāṃ pārthena pratirakṣatā | macchandādavamāno'yaṃ kṛtastava mahīpate
हे पृथ्वीपति! इसलिए उस सत्य प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए पार्थ ने मेरी इच्छा से आपका यह अपमान किया है।
श्लोक 10 (8.74.10)
गुरूणामवमानो हि वध इत्यभिधीयते । तस्मात्क्षम महाबाहो मम पार्थस्य चोभयोः ॥
gurūṇāmavamāno hi vadha ityabhidhīyate | tasmātkṣama mahābāho mama pārthasya cobhayoḥ
गुरुजनों का अपमान ही उनका वध कहा जाता है। इसलिए हे महाबाहो! मुझे और पार्थ, दोनों को क्षमा कीजिए।
श्लोक 11 (8.74.11)
व्यतिक्रममिमं राजन्सत्यसंरक्षणं प्रति । शरणं त्वां महाराज प्रतिपन्नावुभावपि ॥
vyatikramamimaṃ rājansatyasaṃrakṣaṇaṃ prati | śaraṇaṃ tvāṃ mahārāja pratipannāvubhāvapi
राजन्! सत्य की रक्षा के लिए हुए इस अपराध के विषय में हम दोनों ही, हे महाराज! आपकी शरण में आए हैं।
श्लोक 12 (8.74.12)
क्षन्तुमर्हसि मे राजन्प्रणतस्याभियाचतः । राधेयस्याद्य पापस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥
kṣantumarhasi me rājanpraṇatasyābhiyācataḥ | rādheyasyādya pāpasya bhūmiḥ pāsyati śoṇitam
राजन्! मैं आपके सामने झुककर प्रार्थना करता हूँ; मुझे क्षमा कर दीजिए। आज पापी राधापुत्र का रक्त पृथ्वी पिएगी।
श्लोक 13 (8.74.13)
सत्यं ते प्रतिजानामि हतं विद्ध्यद्य सूतजम् । यस्येच्छसि वधं तस्य गतमेवाद्य जीवितम् ॥
satyaṃ te pratijānāmi hataṃ viddhyadya sūtajam | yasyecchasi vadhaṃ tasya gatamevādya jīvitam
मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ — सूतपुत्र को आज मरा हुआ ही जानिए। आप जिसका वध चाहते हैं, उसके प्राण आज ही चले गए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 14 (8.74.14)
इति कृष्णवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । ससम्भ्रमं हृषीकेशमुत्थाप्य प्रणतं तदा । कृताञ्जलिमुवाचेदं वाक्यं यत्समनन्तरम् ॥
iti kṛṣṇavacaḥ śrutvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | sasambhramaṃ hṛṣīkeśamutthāpya praṇataṃ tadā | kṛtāñjalimuvācedaṃ vākyaṃ yatsamanantaram
कृष्ण की यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने घबराहट में झुके हुए हृषीकेश को उठाया और हाथ जोड़कर आगे ये वचन कहे —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 15 (8.74.15)
एवमेव यथात्थ त्वमस्त्येषोऽतिक्रमो मम । अनुनीतोऽस्मि गोविन्द तारितश्चास्मि माधव ॥
evameva yathāttha tvamastyeṣo'tikramo mama | anunīto'smi govinda tāritaścāsmi mādhava
"गोविन्द! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही है; यह मेरा अपराध है। माधव! आपने मुझे मना लिया और मेरा उद्धार कर दिया।
श्लोक 16 (8.74.16)
मोचिता व्यसनाद्घोराद्वयमद्य त्वयाच्युत । भवन्तं नावमासाद्य ह्यावां व्यसनसागरात् । घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ ॥
mocitā vyasanādghorādvayamadya tvayācyuta | bhavantaṃ nāvamāsādya hyāvāṃ vyasanasāgarāt | ghorādadya samuttīrṇāvubhāvajñānamohitau
अच्युत! आपने आज हमें भयंकर विपत्ति से छुड़ा लिया। आपको नाव के रूप में पाकर अज्ञान से मोहित हम दोनों भाई आज विपत्ति के उस भयंकर सागर से पार हो गए।
श्लोक 17 (8.74.17)
त्वद्बुद्धिप्लवमासाद्य दुःखशोकार्णवाद्वयम् । समुत्तीर्णाः सहामात्याः सनाथाः स्म त्वयाच्युत ॥
tvadbuddhiplavamāsādya duḥkhaśokārṇavādvayam | samuttīrṇāḥ sahāmātyāḥ sanāthāḥ sma tvayācyuta
आपकी बुद्धिरूपी बेड़े का सहारा पाकर हम अपने मन्त्रियों सहित दुःख और शोक के सागर से पार हो गए हैं। अच्युत! आपके कारण हम सनाथ हो गए हैं।"