कर्ण पर्व · अध्याय 84
अर्जुन द्वारा धृतराष्ट्र के दस पुत्रों का वध
भीम को बचाने की इच्छा से अर्जुन बाणों से कौरव-सेना को बिखेर देते हैं; हाथी, घोड़े और रथों से पटी रणभूमि वैतरणी जैसी हो जाती है। कुरु भीम को छोड़कर भाग जाते हैं; अर्जुन उनसे बात करके बताते हैं कि युधिष्ठिर कुशल हैं और आगे बढ़ते हैं। तब धृतराष्ट्र के दस छोटे पुत्र उन्हें घेर लेते हैं, और वे उनके ध्वज और धनुष काटकर उनके सिर उड़ा देते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.84.1)
राजन्कुरूणां प्रबरैर्बलैर्भीममभिद्रुतम् । मज्जन्तमिव कौन्तेयमुज्जिहीर्षुर्धनञ्जयः ॥
rājankurūṇāṃ prabarairbalairbhīmamabhidrutam | majjantamiva kaunteyamujjihīrṣurdhanañjayaḥ
राजन्, कुरुओं की श्रेष्ठ सेनाएँ जब भीम पर टूट पड़ीं, तब धनञ्जय डूबते हुए-से कुन्तीपुत्र को निकालने की इच्छा से,
श्लोक 2 (8.84.2)
विमृद्य सूतपुत्रस्य सेनां भारत सायकैः । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय परवीरान्धनञ्जयः ॥
vimṛdya sūtaputrasya senāṃ bhārata sāyakaiḥ | prāhiṇonmṛtyulokāya paravīrāndhanañjayaḥ
हे भारत, सूतपुत्र की सेना को बाणों से कुचलकर शत्रु-वीरों को मृत्युलोक भेजने लगा।
श्लोक 3 (8.84.3)
ततोऽस्याम्बरमावृत्य शरजालानि भागशः । अदृश्यन्त तथान्ये च निजघ्नुस्तव वाहिनीम् ॥
tato'syāmbaramāvṛtya śarajālāni bhāgaśaḥ | adṛśyanta tathānye ca nijaghnustava vāhinīm
तब आकाश को ढककर उसके बाणों के जाल टुकड़ों-टुकड़ों में दिखाई दिए, और दूसरे बाण भी दिखाई दिए जिन्होंने आपकी सेना को मार गिराया।
श्लोक 4 (8.84.4)
स पक्षिसङ्घाचरितमाकाशं पूरयञ्शरैः । धनञ्जयो महाबाहुः कुरूणामन्तकोऽभवत् ॥
sa pakṣisaṅghācaritamākāśaṃ pūrayañśaraiḥ | dhanañjayo mahābāhuḥ kurūṇāmantako'bhavat
पक्षियों के झुंडों से विचरित आकाश को बाणों से भरता हुआ महाबाहु धनञ्जय, हे महाराज, कुरुओं का अन्त करने वाला बन गया।
श्लोक 5 (8.84.5)
ततो भल्लैः क्षुरप्रैश्च नाराचैर्विमलैरपि । गात्राणि प्राच्छिनत्पार्थः शिरांसि च चकर्त ह ॥
tato bhallaiḥ kṣurapraiśca nārācairvimalairapi | gātrāṇi prācchinatpārthaḥ śirāṃsi ca cakarta ha
तब पार्थ ने भल्लों, क्षुरप्रों और चमकीले नाराचों से अङ्गों को काट डाला और सिर भी उड़ा दिए।
श्लोक 6 (8.84.6)
छिन्नगात्रैर्विकवचैर्विशिरस्कैः समन्ततः । पातितैश्च पतद्भिश्च योधैरासीत्समावृता ॥
chinnagātrairvikavacairviśiraskaiḥ samantataḥ | pātitaiśca patadbhiśca yodhairāsītsamāvṛtā
रणभूमि कटे अङ्गों वाले, कवचहीन और सिरहीन योद्धाओं से, जो चारों ओर गिरे हुए थे और गिर रहे थे, ढक गई।
श्लोक 7 (8.84.7)
धनञ्जयशराभ्यस्तैः स्यन्दनाश्वरथद्विपैः । सञ्छिन्नभिन्नविध्वस्तैर्व्यङ्गाङ्गावयवैः स्तृता । गतसत्वैः ससत्वैश्च संवृताऽऽसीद्वसुन्धरा ॥
dhanañjayaśarābhyastaiḥ syandanāśvarathadvipaiḥ | sañchinnabhinnavidhvastairvyaṅgāṅgāvayavaiḥ stṛtā | gatasatvaiḥ sasatvaiśca saṃvṛtā''sīdvasundharā
धनञ्जय के बाणों से मारे गए रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों से, जो कटे, टूटे और बिखरे थे, जिनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग विकृत थे, तथा मृतों और जीवितों से ढकी हुई पृथ्वी पटी पड़ी थी,
श्लोक 8 (8.84.8)
सुदुर्गमा सुविषमा घोराऽत्यर्थं सुदुर्दृशा । रणभूमिरभूद्राजन्महावैतरणी यथा ॥
sudurgamā suviṣamā ghorā'tyarthaṃ sudurdṛśā | raṇabhūmirabhūdrājanmahāvaitaraṇī yathā
अत्यन्त दुर्गम, ऊबड़-खाबड़, भयानक और देखने में बहुत कठिन; राजन्, वह रणभूमि महावैतरणी जैसी हो गई।
श्लोक 9 (8.84.9)
ईषाचक्राक्षभल्लैश्च व्यश्वैः साश्वैश्च युध्यताम् । ससूतैर्हतसूतैश्च रथैः स्तीर्णाऽभवन्मही ॥
īṣācakrākṣabhallaiśca vyaśvaiḥ sāśvaiśca yudhyatām | sasūtairhatasūtaiśca rathaiḥ stīrṇā'bhavanmahī
लड़ते हुए योद्धाओं के रथों से, जिनके ईषा-दण्ड, चक्र, धुरी और बाण बिखरे थे, कुछ घोड़ों रहित, कुछ घोड़ों सहित, कुछ सारथि सहित और कुछ सारथि के मारे जाने से, भूमि पट गई।
श्लोक 10 (8.84.10)
सुवर्णवर्मसन्नाहैर्योधैः कनकमालिभिः । आस्थिताः क्लृप्तवर्माणो भद्रा नित्यमदा द्विपाः ॥
suvarṇavarmasannāhairyodhaiḥ kanakamālibhiḥ | āsthitāḥ klṛptavarmāṇo bhadrā nityamadā dvipāḥ
सोने के कवच और जिरहबख़्तर पहने, सोने की मालाओं वाले योद्धाओं से आरूढ़, कवचित, सदा मदमत्त उत्तम हाथी,
श्लोक 11 (8.84.11)
क्रुद्धाः क्रूरैर्महामात्रैः प्रेषितार्जुनमभ्ययुः । चतुः शता रथवरा हताः पेतुः किरीटिना ॥
kruddhāḥ krūrairmahāmātraiḥ preṣitārjunamabhyayuḥ | catuḥ śatā rathavarā hatāḥ petuḥ kirīṭinā
क्रुद्ध होकर, क्रूर महावतों द्वारा अर्जुन की ओर भेजे जाने पर उस पर टूट पड़े; किरीटी के हाथों चार सौ श्रेष्ठ रथ मारे जाकर गिर पड़े।
श्लोक 12 (8.84.12)
पर्यस्तानीव शृङ्गाणि ससत्वानि महागिरेः । धनञ्जयशराभ्यस्तैः स्तीर्णा भूर्वरवारणैः ॥
paryastānīva śṛṅgāṇi sasatvāni mahāgireḥ | dhanañjayaśarābhyastaiḥ stīrṇā bhūrvaravāraṇaiḥ
वे उलटे पड़े हुए, प्राणियों सहित किसी महापर्वत के शिखरों जैसे थे; धनञ्जय के बाणों से मारे गए श्रेष्ठ हाथियों से पृथ्वी पटी थी।
श्लोक 13 (8.84.13)
समन्ताज्जलदप्रख्यान्वारणान्मदवर्षिणः । अभिपेदेऽर्जुनरथो घनान्भिन्दन्निवांशुमान् ॥
samantājjaladaprakhyānvāraṇānmadavarṣiṇaḥ | abhipede'rjunaratho ghanānbhindannivāṃśumān
बादलों के समान और मद बरसाने वाले उन हाथियों पर अर्जुन का रथ चारों ओर टूट पड़ा, जैसे सूर्य मेघों को भेद देता है।
श्लोक 14 (8.84.14)
हतैर्गजमनुष्याश्वैर्भिन्नैश्च बहुधा रथैः । विशस्त्रयन्त्रकवचैर्युद्धशौण्डैर्गतासुभिः । उपविद्धायुधैर्मार्गः स्तीर्णोऽभूत्फल्गुनेन वै ॥
hatairgajamanuṣyāśvairbhinnaiśca bahudhā rathaiḥ | viśastrayantrakavacairyuddhaśauṇḍairgatāsubhiḥ | upaviddhāyudhairmārgaḥ stīrṇo'bhūtphalgunena vai
मारे गए हाथियों, मनुष्यों और घोड़ों से, अनेक प्रकार से टूटे रथों से, शस्त्र, यन्त्र और कवच से रहित मरे हुए रणशूरों से और फेंके गए शस्त्रों से फल्गुन ने मार्ग को पाट दिया।
श्लोक 15 (8.84.15)
विस्फारितं च गाण्डीवमत्यासीद्भैरवस्वनम् । सुघोषं वज्रनिष्पेषं स्तनयन्निव तोयदः ॥
visphāritaṃ ca gāṇḍīvamatyāsīdbhairavasvanam | sughoṣaṃ vajraniṣpeṣaṃ stanayanniva toyadaḥ
और तनी हुई गाण्डीव प्रत्यञ्चा का भयंकर शब्द हुआ, सुन्दर घोष और वज्र के निर्घात जैसा, गरजते मेघ के समान।
श्लोक 16 (8.84.16)
ततः प्रादीर्यत चमूर्धनञ्जयशराहता । महावातसमाविद्धा महानौरिव सागरे ॥
tataḥ prādīryata camūrdhanañjayaśarāhatā | mahāvātasamāviddhā mahānauriva sāgare
तब धनञ्जय के बाणों से आहत सेना वैसे ही बिखर गई जैसे समुद्र में बड़ी आँधी से झकझोरी गई विशाल नौका।
श्लोक 17 (8.84.17)
नानारूपाः प्राणहराः शरा गाण्डीवचोदिताः । अलातोल्काशनिप्रख्यास्तव सैन्यं विनिर्दहन् ॥
nānārūpāḥ prāṇaharāḥ śarā gāṇḍīvacoditāḥ | alātolkāśaniprakhyāstava sainyaṃ vinirdahan
गाण्डीव से प्रेरित, अनेक रूपों वाले, प्राण हरने वाले बाण, जलती लकड़ियों, उल्काओं और वज्र जैसे, आपकी सेना को भस्म करने लगे।
श्लोक 18 (8.84.18)
महागिरौ वेणुवनं निशि प्रज्वलितं यथा । तथा तव महासैन्यं प्रास्फुरच्छरपीडितम् ॥
mahāgirau veṇuvanaṃ niśi prajvalitaṃ yathā | tathā tava mahāsainyaṃ prāsphuraccharapīḍitam
जैसे रात में किसी महापर्वत पर बाँस का वन धधक उठता है, वैसे ही बाणों से पीड़ित आपकी विशाल सेना भभक उठी।
श्लोक 19 (8.84.19)
तद्विनष्टं सुविध्वस्तं तव सैन्यं किरीटिना । हतप्रविहतं बाणैः सर्वतः प्रद्रुतं दिशः ॥
tadvinaṣṭaṃ suvidhvastaṃ tava sainyaṃ kirīṭinā | hatapravihataṃ bāṇaiḥ sarvataḥ pradrutaṃ diśaḥ
किरीटी के हाथों नष्ट और चूर-चूर हुई, बाणों से मारी-पीटी आपकी सेना सब ओर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 20 (8.84.20)
सश्वापदा मृगगणा दावाग्नित्रासिता यथा । कुरवः पर्यवर्तन्त निर्दग्धाः सव्यसाचिना ॥
saśvāpadā mṛgagaṇā dāvāgnitrāsitā yathā | kuravaḥ paryavartanta nirdagdhāḥ savyasācinā
जैसे दावानल से डरे हुए जंगली पशुओं के झुंड, वैसे ही सव्यसाची से जले हुए कौरव इधर-उधर घूमने लगे।
श्लोक 21 (8.84.21)
उत्सृज्य च महाबाहुं भीमसेनं तथा रणे । बलं कुरूणामुद्विग्नं सर्वमासीत्पराङ्मुखम् ॥
utsṛjya ca mahābāhuṃ bhīmasenaṃ tathā raṇe | balaṃ kurūṇāmudvignaṃ sarvamāsītparāṅmukham
रण में महाबाहु भीमसेन को छोड़कर कुरुओं की समस्त सेना घबराकर पीठ फेरकर भाग गई।
श्लोक 22 (8.84.22)
ततः कुरुषु भग्नेषु बीभत्सुरपराजितः । भीमसेनं समासाद्य मुहूर्तं सोऽभ्यवर्तत ॥
tataḥ kuruṣu bhagneṣu bībhatsuraparājitaḥ | bhīmasenaṃ samāsādya muhūrtaṃ so'bhyavartata
तब कुरुओं के टूट जाने पर अपराजित बीभत्सु भीमसेन के पास पहुँचकर क्षण भर उसके साथ रहा।
श्लोक 23 (8.84.23)
समागम्य च भीमेन मन्त्रयित्वा च फल्गुनः । विशल्यमरुजं चास्मै कथयित्वा युधिष्ठिरम् ॥
samāgamya ca bhīmena mantrayitvā ca phalgunaḥ | viśalyamarujaṃ cāsmai kathayitvā yudhiṣṭhiram
भीम से मिलकर और उससे मन्त्रणा करके फल्गुन ने उसे बताया कि युधिष्ठिर के शरीर से बाण निकल चुका है और वे पीड़ामुक्त हैं।
श्लोक 24 (8.84.24)
भीमसेनाभ्यनुज्ञातस्ततः प्रायाद्धनञ्जयः । नादयन्रथघोषेण पृथिवीं द्यां च भारत ॥
bhīmasenābhyanujñātastataḥ prāyāddhanañjayaḥ | nādayanrathaghoṣeṇa pṛthivīṃ dyāṃ ca bhārata
भीमसेन की अनुमति पाकर धनञ्जय आगे बढ़ा, हे भारत, रथ की घर्घराहट से पृथ्वी और आकाश को गुँजाता हुआ।
श्लोक 25 (8.84.25)
ततः परिवृतो वीरैर्दशभिः शत्रुतापनः । दुःशासनादवरजैस्तव पुत्रैर्धनञ्जयः ॥
tataḥ parivṛto vīrairdaśabhiḥ śatrutāpanaḥ | duḥśāsanādavarajaistava putrairdhanañjayaḥ
तब शत्रुओं को तपाने वाला धनञ्जय दस वीरों से घिर गया, जो दुःशासन के छोटे भाई, आपके पुत्र थे।
श्लोक 26 (8.84.26)
ते तमभ्यर्दयन्बाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् । आततेष्वसना वीरा नृत्यन्त इव भारत ॥
te tamabhyardayanbāṇairulkābhiriva kuñjaram | ātateṣvasanā vīrā nṛtyanta iva bhārata
जैसे लुकाठियों से हाथी को सताया जाता है, वैसे ही उन्होंने उसे बाणों से पीड़ित किया; धनुष ताने हुए वे वीर नाचते-से दीखते थे, हे भारत।
श्लोक 27 (8.84.27)
अपसव्यांस्तु तांश्चक्रे रथेन मधुसूदनः । नियुक्तान्हि स तान्मेने यमायाशु किरीटिना ॥
apasavyāṃstu tāṃścakre rathena madhusūdanaḥ | niyuktānhi sa tānmene yamāyāśu kirīṭinā
मधुसूदन ने रथ को इस प्रकार चलाया कि वे बाईं ओर पड़ गए; क्योंकि वे उन्हें किरीटी द्वारा यम को सौंपे हुए ही मान रहे थे।
श्लोक 28 (8.84.28)
तथान्ये प्राणदन्मूढाः पराङ्मुखमिवार्जुनम् ॥
tathānye prāṇadanmūḍhāḥ parāṅmukhamivārjunam
दूसरे मूढ़ योद्धा ऐसे गरजे मानो अर्जुन ने पीठ फेर ली हो।
श्लोक 29 (8.84.29)
तेषां नानदतां केतूनश्वांश्चापानि सारथीन् । नाराचैरर्धचन्द्रैश्च क्षिप्रं पार्थो न्यकृन्तत ॥
teṣāṃ nānadatāṃ ketūnaśvāṃścāpāni sārathīn | nārācairardhacandraiśca kṣipraṃ pārtho nyakṛntata
गरजते हुए उन योद्धाओं की ध्वजाएँ, घोड़े, धनुष और सारथि पार्थ ने नाराचों और अर्धचन्द्र बाणों से शीघ्र काट डाले।
श्लोक 30 (8.84.30)
अथान्यैर्दशभिर्भल्लैः शिरांस्येषामपातयत् । रोषसंरक्तनेत्राणि सन्दष्टौष्ठानि भूतले ॥
athānyairdaśabhirbhallaiḥ śirāṃsyeṣāmapātayat | roṣasaṃraktanetrāṇi sandaṣṭauṣṭhāni bhūtale
फिर दस और भल्लों से उसने उनके सिर काटकर भूमि पर गिरा दिए, जिनकी आँखें क्रोध से लाल थीं और होंठ दाँतों से दबे हुए थे।
श्लोक 31 (8.84.31)
तेषां वक्राणि विबभुर्व्योम्नि तारागणा इव ॥
teṣāṃ vakrāṇi vibabhurvyomni tārāgaṇā iva
उनके मुख आकाश में तारों के समूह की तरह चमके।
श्लोक 32 (8.84.32)
तांस्तु भल्लैर्महावेगैर्दशभिर्दश कौरवान् । रुक्माङ्गदान्रुक्मपुङ्खैर्हत्वा प्रायादमित्रहा ॥
tāṃstu bhallairmahāvegairdaśabhirdaśa kauravān | rukmāṅgadānrukmapuṅkhairhatvā prāyādamitrahā
शत्रुहन्ता अर्जुन ने सोने के पंखों वाले दस तीव्र भल्लों से सुनहरे बाजूबन्द पहने दसों कौरवों को मारकर आगे प्रस्थान किया।