कर्ण पर्व · अध्याय 85
अर्जुन और भीम द्वारा कौरव सेना का संहार
अर्जुन कर्ण के रथ की ओर बढ़ते हैं और पहले नब्बे संशप्तक रथियों से, फिर म्लेच्छ हाथियों की सेना सहित कुरु-सेना से घिर जाते हैं; वे संशप्तकों को मार डालते हैं और अपने बाणों से हाथियों की उस सेना को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। भीम आकर अपनी गदा से बचे हुए घोड़ों और गजसेना का संहार करते हैं। पराजित कौरव भागकर कर्ण की शरण लेते हैं, और कर्ण उन्हें ढाढ़स देकर पांचालों पर टूट पड़ता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.85.1)
तमायान्तं महावेगैरश्वैः कपिवरध्वजम् । युद्धायाभ्यद्रवन्वीराः कुरूणां नवतीं रथाः ॥
tamāyāntaṃ mahāvegairaśvaiḥ kapivaradhvajam | yuddhāyābhyadravanvīrāḥ kurūṇāṃ navatīṃ rathāḥ
वानरश्रेष्ठ के चिह्न वाली ध्वजा से युक्त अर्जुन को अपने अत्यन्त वेगवान् घोड़ों के साथ आते देखकर कुरुओं के नब्बे वीर रथी युद्ध के लिए उन पर टूट पड़े।
श्लोक 2 (8.85.2)
कृत्वा संशप्तका घोरं शपथं पारलौकिकम् । परिवव्रुर्नरव्याघ्रा नरव्याघ्रं रणेऽर्जुनम् ॥
kṛtvā saṃśaptakā ghoraṃ śapathaṃ pāralaukikam | parivavrurnaravyāghrā naravyāghraṃ raṇe'rjunam
परलोक तक बाँधने वाली भयंकर शपथ लेकर पुरुषव्याघ्र संशप्तकों ने रणभूमि में पुरुषव्याघ्र अर्जुन को घेर लिया।
श्लोक 3 (8.85.3)
कृष्णः श्वेतान्महावेगानश्वान्काञ्चनभूषणान् । मुक्ताजालप्रतिच्छन्नान्प्रैषीत्कर्णरथं प्रति ॥
kṛṣṇaḥ śvetānmahāvegānaśvānkāñcanabhūṣaṇān | muktājālapraticchannānpraiṣītkarṇarathaṃ prati
कृष्ण ने सोने के आभूषणों से सजे, मोतियों की जालियों से ढके अपने वेगवान् श्वेत घोड़ों को कर्ण के रथ की ओर बढ़ाया।
श्लोक 4 (8.85.4)
प्रेक्ष्य कर्णरथं यान्तमरिघ्नं तं धनञ्जयम् । बाणवर्षैरभिघ्नन्तः संशप्तकगणा ययुः ॥
prekṣya karṇarathaṃ yāntamarighnaṃ taṃ dhanañjayam | bāṇavarṣairabhighnantaḥ saṃśaptakagaṇā yayuḥ
शत्रुओं का संहार करने वाले धनंजय को कर्ण के रथ की ओर जाते देखकर संशप्तकों के दल बाणों की वर्षा करते हुए उन पर चढ़ आए।
श्लोक 5 (8.85.5)
त्वरमाणांस्तु तान्सर्वान्ससूतेष्वसनध्वजान् । जघान नवतिं वीरानर्जुनो निशितैः शरैः ॥
tvaramāṇāṃstu tānsarvānsasūteṣvasanadhvajān | jaghāna navatiṃ vīrānarjuno niśitaiḥ śaraiḥ
उन सबको झपटकर आते देख अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से उन नब्बे वीरों को उनके सारथियों, धनुषों और ध्वजाओं सहित मार डाला।
श्लोक 6 (8.85.6)
तेऽपतन्त हता बाणैर्नानारूपैः किरीटिना । विमानेभ्यः सुकृतिनः स्वर्गात्पुण्यक्षये यथा ॥
te'patanta hatā bāṇairnānārūpaiḥ kirīṭinā | vimānebhyaḥ sukṛtinaḥ svargātpuṇyakṣaye yathā
किरीटधारी अर्जुन के नाना आकार के बाणों से मारे जाकर वे अपने रथों से वैसे ही गिर पड़े, जैसे पुण्य क्षीण होने पर पुण्यात्मा लोग विमानों से स्वर्ग से गिरते हैं।
श्लोक 7 (8.85.7)
ततः सरथनागाश्वाः कुरवः कुरुसत्तमम् । निर्भया भरतश्रेष्ठमभ्यवर्तन्त फल्गुनम् ॥
tataḥ sarathanāgāśvāḥ kuravaḥ kurusattamam | nirbhayā bharataśreṣṭhamabhyavartanta phalgunam
तब रथों, हाथियों और घोड़ों सहित कुरु निर्भय होकर कुरुश्रेष्ठ, भरतश्रेष्ठ फल्गुन पर चढ़ आए।
श्लोक 8 (8.85.8)
तदायस्तमनुष्याश्वमुदीर्णवरवारणम् । पुत्राणां ते महासैन्यं समरौत्सीद्धनञ्जयम् ॥
tadāyastamanuṣyāśvamudīrṇavaravāraṇam | putrāṇāṃ te mahāsainyaṃ samarautsīddhanañjayam
तब आपके पुत्रों की उस विशाल सेना ने, जिसके मनुष्य और घोड़े थक चुके थे पर जिसके उत्तम हाथी उत्तेजित थे, धनंजय को घेर लिया।
श्लोक 9 (8.85.9)
शक्त्यृष्टितोमरप्रासैर्गदानिस्त्रिंशसायकैः । प्राच्छादयन्महेष्वासाः कुरवः कुरुनन्दनम् ॥
śaktyṛṣṭitomaraprāsairgadānistriṃśasāyakaiḥ | prācchādayanmaheṣvāsāḥ kuravaḥ kurunandanam
शक्ति, ऋष्टि, तोमर, प्रास, गदा, तलवार और बाणों से महान् धनुर्धर कुरुओं ने कुरुनन्दन अर्जुन को ढक दिया।
श्लोक 10 (8.85.10)
तामन्तरिक्षे विततां शस्त्रवृष्टिं समन्ततः । व्यधमत्पाण्डवो बाणैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥
tāmantarikṣe vitatāṃ śastravṛṣṭiṃ samantataḥ | vyadhamatpāṇḍavo bāṇaistamaḥ sūrya ivāṃśubhiḥ
आकाश में चारों ओर फैली हुई उस शस्त्रवर्षा को पाण्डुपुत्र ने अपने बाणों से वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणों से अन्धकार को हटा देता है।
श्लोक 11 (8.85.11)
ततो म्लेच्छाः स्थिता मत्तैस्त्रयोदशशतैर्गजैः । पार्श्वतो व्यहनन्पार्थं तव पुत्रस्य शासनात् ॥
tato mlecchāḥ sthitā mattaistrayodaśaśatairgajaiḥ | pārśvato vyahananpārthaṃ tava putrasya śāsanāt
तब आपके पुत्र की आज्ञा से तेरह सौ मदमत्त हाथियों पर बैठे म्लेच्छों ने पार्श्व से पार्थ पर प्रहार किया।
श्लोक 12 (8.85.12)
कर्णिनालीकनाराचैस्तोमरप्रासशक्तिभिः । कर्पणैर्भिण्डिपालैश्च रथस्थं पार्थमार्दयन् ॥
karṇinālīkanārācaistomaraprāsaśaktibhiḥ | karpaṇairbhiṇḍipālaiśca rathasthaṃ pārthamārdayan
कर्णी, नालीक और नाराच बाणों से, तोमर, प्रास और शक्ति से, कर्पण और भिन्दिपालों से उन्होंने रथ पर स्थित पार्थ को पीड़ित किया।
श्लोक 13 (8.85.13)
तां शस्त्रवृष्टिमतुलां द्विपस्थैः प्रेषितां प्रभुः । चिच्छेद निशितैर्भल्लैरर्धचन्द्रैश्च फल्गुनः ॥
tāṃ śastravṛṣṭimatulāṃ dvipasthaiḥ preṣitāṃ prabhuḥ | ciccheda niśitairbhallairardhacandraiśca phalgunaḥ
हाथियों पर बैठे योद्धाओं की चलाई उस अनुपम शस्त्रवर्षा को प्रभु फल्गुन ने तीखे भल्लों और अर्धचन्द्र बाणों से काट डाला।
श्लोक 14 (8.85.14)
अथ तान्द्विरदान्सर्वान्नानालिङ्गैः शरोत्तमैः । सपताकध्वजारोहान्गिरीन्वज्रैरिवाभिनत् ॥
atha tāndviradānsarvānnānāliṅgaiḥ śarottamaiḥ | sapatākadhvajārohāngirīnvajrairivābhinat
फिर नाना चिह्नों वाले अपने उत्तम बाणों से उसने पताकाओं, ध्वजाओं और सवारों सहित उन सब हाथियों को वैसे ही विदीर्ण कर दिया, जैसे वज्र पर्वतों को फोड़ देते हैं।
श्लोक 15 (8.85.15)
ते हेमपुङ्खैरिषुभिरर्दिता हेममालिनः । हताः पेतुर्महानागाः साग्निज्वाला इवाद्रयः ॥
te hemapuṅkhairiṣubhirarditā hemamālinaḥ | hatāḥ peturmahānāgāḥ sāgnijvālā ivādrayaḥ
सोने के पंखों वाले बाणों से पीड़ित वे सुवर्णमालाधारी विशाल हाथी आग की लपटों वाले पर्वतों के समान मरकर गिर पड़े।
श्लोक 16 (8.85.16)
ततो गाण्डीवनिर्घोषो महानासीद्विशाम्पते । स्तनतां कूजतां चैव मनुष्यगजवाजिनाम् ॥
tato gāṇḍīvanirghoṣo mahānāsīdviśāmpate | stanatāṃ kūjatāṃ caiva manuṣyagajavājinām
हे प्रजापालक! तब गाण्डीव की महान् टंकार उठी, और उसके साथ मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों का गर्जन और चीत्कार भी गूँज उठा।
श्लोक 17 (8.85.17)
कुञ्जराश्च हता राजन्दद्रुवुस्ते समन्ततः । अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥
kuñjarāśca hatā rājandadruvuste samantataḥ | aśvāśca paryadhāvanta hatārohā diśo daśa
हे राजन्! मारे गए हाथी चारों ओर भाग निकले, और सवारों के मर जाने से घोड़े दसों दिशाओं में दौड़ने लगे।
श्लोक 18 (8.85.18)
रथा हीना महाराज रथिभिर्वाजिभिस्तथा । गन्धर्वनगराकारा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः ॥
rathā hīnā mahārāja rathibhirvājibhistathā | gandharvanagarākārā dṛśyante sma sahasraśaḥ
हे महाराज! योद्धाओं और घोड़ों से रहित हजारों रथ गन्धर्वनगर के समान दिखाई देते थे।
श्लोक 19 (8.85.19)
अश्वारोहा महाराज धावमाना इतस्ततः । तत्रतत्रैव दृश्यन्ते निहताः पार्थसायकैः ॥
aśvārohā mahārāja dhāvamānā itastataḥ | tatratatraiva dṛśyante nihatāḥ pārthasāyakaiḥ
हे महाराज! इधर-उधर दौड़ते घुड़सवार जहाँ-तहाँ पार्थ के बाणों से मरे पड़े दिखाई देते थे।
श्लोक 20 (8.85.20)
तस्मिन्क्षणे पाण्डवस्य बाह्वोर्बलमदृश्यत । यत्सादिनो वारणांश्च रथांश्चैकोऽजयद्युधि ॥
tasminkṣaṇe pāṇḍavasya bāhvorbalamadṛśyata | yatsādino vāraṇāṃśca rathāṃścaiko'jayadyudhi
उस क्षण पाण्डुपुत्र की भुजाओं का बल दिखाई दिया, क्योंकि अकेले ही उसने युद्ध में घुड़सवारों, हाथियों और रथों को जीत लिया।
श्लोक 21 (8.85.21)
असंयुक्ताश्च ते राजन्परिवृत्ता रणं प्रति । नरा नागा रथाश्चैव नदन्तोऽर्जुनमभ्ययुः ॥
asaṃyuktāśca te rājanparivṛttā raṇaṃ prati | narā nāgā rathāścaiva nadanto'rjunamabhyayuḥ
हे राजन्! बिखरी हुई दशा में भी वे फिर युद्ध की ओर लौटे, और मनुष्य, हाथी तथा रथ गरजते हुए अर्जुन पर टूट पड़े।
श्लोक 22 (8.85.22)
ततस्त्र्येङ्गेण महता बलेन भरतर्षभ । दृष्ट्वा परिवृतं राजन्भीमसेनः किरीटिनम् ॥
tatastryeṅgeṇa mahatā balena bharatarṣabha | dṛṣṭvā parivṛtaṃ rājanbhīmasenaḥ kirīṭinam
हे भरतश्रेष्ठ! हे राजन्! तब तीन अंगों वाली विशाल सेना से किरीटधारी अर्जुन को घिरा देखकर भीमसेन ने,
श्लोक 23 (8.85.23)
हतावशेषानुत्सृज्य त्वदीयान्कतिचिद्रथान् । जवेनाभ्यद्रवद्भीमो धनञ्जयरथं प्रति ॥
hatāvaśeṣānutsṛjya tvadīyānkaticidrathān | javenābhyadravadbhīmo dhanañjayarathaṃ prati
आपके बचे-खुचे कुछ रथियों को छोड़कर, वेग से धनंजय के रथ की ओर धावा बोल दिया।
श्लोक 24 (8.85.24)
ततस्तत्प्राद्रवत्सैन्यं हतभूयिष्ठमातुरम् । दृष्ट्वाऽर्जुनं तदा भीममागतं भ्रातरं प्रति ॥
tatastatprādravatsainyaṃ hatabhūyiṣṭhamāturam | dṛṣṭvā'rjunaṃ tadā bhīmamāgataṃ bhrātaraṃ prati
तब जिसके अधिकांश योद्धा मारे जा चुके थे, वह व्याकुल सेना अर्जुन को और अपने भाई के पास आए भीम को देखकर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 25 (8.85.25)
हतावशिष्टांस्तुरगानर्जुनेन महाबलः । भीमो व्यधमदश्रान्तो गदापाणिर्महाहवे ॥
hatāvaśiṣṭāṃsturagānarjunena mahābalaḥ | bhīmo vyadhamadaśrānto gadāpāṇirmahāhave
अर्जुन के मारने से जो घोड़े बच गए थे, उन्हें महाबली भीम ने गदा हाथ में लेकर उस महायुद्ध में बिना थके मार डाला।
श्लोक 26 (8.85.26)
गदापाणिं तदा दृष्ट्वा भीमं भारत भारताः । मेनिरे तमनुप्राप्तं दण्डपाणिमिवान्तकम् ॥
gadāpāṇiṃ tadā dṛṣṭvā bhīmaṃ bhārata bhāratāḥ | menire tamanuprāptaṃ daṇḍapāṇimivāntakam
हे भारत! गदा हाथ में लिए भीम को तब देखकर भरतवंशी सैनिकों ने समझा कि दण्ड हाथ में लिए अन्तक (यमराज) ही उन पर आ पहुँचा है।
श्लोक 27 (8.85.27)
कालरात्रिमिवात्युग्रां नरनागाश्वभोजनाम् । प्राकाराट्टपुरद्वारदारणीमतिदारुणाम् ॥
kālarātrimivātyugrāṃ naranāgāśvabhojanām | prākārāṭṭapuradvāradāraṇīmatidāruṇām
कालरात्रि के समान अत्यन्त उग्र, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों को खा जाने वाली, परकोटों, अटारियों और नगरद्वारों को तोड़ डालने वाली, अत्यन्त भयंकर—
श्लोक 28 (8.85.28)
गदां तुरगनाशाय त्वरन्भीमो व्यवासृजत् । सा जघान बहूनश्वानश्वारोहांश्च मारिष ॥
gadāṃ turaganāśāya tvaranbhīmo vyavāsṛjat | sā jaghāna bahūnaśvānaśvārohāṃśca māriṣa
ऐसी गदा को भीम ने घोड़ों का नाश करने के लिए शीघ्रता से चलाया। हे माननीय! उसने बहुत-से घोड़ों और घुड़सवारों को मार डाला।
श्लोक 29 (8.85.29)
कांस्यायसतनुत्रांश्च नरानश्वांश्च पाण्डवः । पोथयामास गदया सशब्दं तेऽपतन्हताः ॥
kāṃsyāyasatanutrāṃśca narānaśvāṃśca pāṇḍavaḥ | pothayāmāsa gadayā saśabdaṃ te'patanhatāḥ
काँसे और लोहे के कवच पहने मनुष्यों और घोड़ों को पाण्डुपुत्र ने गदा से कुचल डाला; वे भयंकर शब्द के साथ मरकर गिर पड़े।
श्लोक 30 (8.85.30)
दन्तैर्दशन्तो वसुधां शेरते क्षतजोक्षिताः । भग्नमूर्धास्थिचरणाः क्रव्यादगणभोजनाः ॥
dantairdaśanto vasudhāṃ śerate kṣatajokṣitāḥ | bhagnamūrdhāsthicaraṇāḥ kravyādagaṇabhojanāḥ
रक्त से लथपथ वे दाँतों से धरती को काटते हुए पड़े थे; उनके सिर, हड्डियाँ और पैर चूर-चूर हो गए थे, और वे मांसभक्षी जीवों के झुण्डों का भोजन बन रहे थे।
श्लोक 31 (8.85.31)
असृङ्मांसवसाभिश्च तृप्तिमभ्यागता गदा । अस्थीन्यप्यश्नती तस्थौ कालरात्रीव दुर्दृशा ॥
asṛṅmāṃsavasābhiśca tṛptimabhyāgatā gadā | asthīnyapyaśnatī tasthau kālarātrīva durdṛśā
रक्त, मांस और चर्बी से तृप्त हुई वह गदा हड्डियों को भी चबाती हुई कालरात्रि की भाँति भयानक रूप में खड़ी थी।
श्लोक 32 (8.85.32)
सहस्राणि दशाश्वानां हत्वा पत्तींश्च भूयसः । भीमोऽभ्यधावत्सङ्क्रुद्धो गदापाणिरितस्ततः ॥
sahasrāṇi daśāśvānāṃ hatvā pattīṃśca bhūyasaḥ | bhīmo'bhyadhāvatsaṅkruddho gadāpāṇiritastataḥ
दस हजार घोड़ों और बहुत-से पैदल सैनिकों को मारकर क्रोध से भरे भीम गदा हाथ में लिए इधर-उधर दौड़ते रहे।
श्लोक 33 (8.85.33)
गदापाणिं ततो भीमं दृष्ट्वा भारत तावकाः । मेनिरे समनुप्राप्तं कालदण्डोद्यतं यमम् ॥
gadāpāṇiṃ tato bhīmaṃ dṛṣṭvā bhārata tāvakāḥ | menire samanuprāptaṃ kāladaṇḍodyataṃ yamam
हे भारत! तब गदा हाथ में लिए भीम को देखकर आपके सैनिकों ने समझा कि कालदण्ड उठाए यम ही उन पर आ पहुँचे हैं।
श्लोक 34 (8.85.34)
स मत्त इव मातङ्गः सङ्क्रुद्धः पाण्डुनन्दनः । प्रविवेश गजानीकं मकरः सागरं यथा ॥
sa matta iva mātaṅgaḥ saṅkruddhaḥ pāṇḍunandanaḥ | praviveśa gajānīkaṃ makaraḥ sāgaraṃ yathā
मदमत्त हाथी के समान क्रुद्ध पाण्डुपुत्र ने हाथियों की सेना में वैसे ही प्रवेश किया, जैसे मगर सागर में घुसता है।
श्लोक 35 (8.85.35)
विगाह्य च गजानीकं प्रगृह्य महतीं गदाम् । क्षणेन भीमः सङ्क्रुद्धस्तन्निन्ये यमसादनम् ॥
vigāhya ca gajānīkaṃ pragṛhya mahatīṃ gadām | kṣaṇena bhīmaḥ saṅkruddhastanninye yamasādanam
हाथियों की सेना में घुसकर और अपनी विशाल गदा को पकड़कर क्रोधित भीम ने क्षणभर में उसे यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 36 (8.85.36)
गजान्सकङ्कटान्मत्तान्सारोहान्सपताकिनः । पततः समपश्याम सपक्षान्पर्वतानिव ॥
gajānsakaṅkaṭānmattānsārohānsapatākinaḥ | patataḥ samapaśyāma sapakṣānparvatāniva
कवचधारी, मदमत्त हाथियों को सवारों और पताकाओं सहित हमने पंखधारी पर्वतों की भाँति गिरते देखा।
श्लोक 37 (8.85.37)
हत्वा तु तद्गजानीकं भीमसेनो महाबलः । पुनः स्वरथमास्थाय पृष्ठतोऽर्जुनमभ्ययात् ॥
hatvā tu tadgajānīkaṃ bhīmaseno mahābalaḥ | punaḥ svarathamāsthāya pṛṣṭhato'rjunamabhyayāt
उस गजसेना को मारकर महाबली भीमसेन फिर अपने रथ पर चढ़े और पीछे से अर्जुन के पास चले गए।
श्लोक 38 (8.85.38)
ततः पराङ्मुखीभूतं निरुत्साहं बलं तव । तदानीं तु महाराज प्रायशः शस्त्रवेष्टितम् ॥
tataḥ parāṅmukhībhūtaṃ nirutsāhaṃ balaṃ tava | tadānīṃ tu mahārāja prāyaśaḥ śastraveṣṭitam
तब आपकी सेना पराङ्मुख और उत्साहहीन हो गई; हे महाराज! उस समय वह प्रायः शस्त्रों से घिरी हुई थी।
श्लोक 39 (8.85.39)
विलम्बमानं तत्सैन्यमप्रगल्भमवस्थितम् । दृष्ट्वा प्राच्छादयद्बाणैरर्जुनः शस्त्रवृष्टिभिः ॥
vilambamānaṃ tatsainyamapragalbhamavasthitam | dṛṣṭvā prācchādayadbāṇairarjunaḥ śastravṛṣṭibhiḥ
उस सेना को देर करते, साहसहीन होकर खड़ी देखकर अर्जुन ने उसे बाणों से, शस्त्रों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 40 (8.85.40)
नराश्वरथमातङ्गा युधि गाण्डीवधन्वना । शरव्रातैश्चिता रेजुः कदम्बा इव केसरैः ॥
narāśvarathamātaṅgā yudhi gāṇḍīvadhanvanā | śaravrātaiścitā rejuḥ kadambā iva kesaraiḥ
गाण्डीवधारी के बाण-समूहों से बिंधे और ढके हुए मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी केसरों से भरे कदम्ब के पुष्पों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 41 (8.85.41)
ततः कुरुणामभवदार्तनादो महान्नृप । नराश्वनागासुहनान्दृष्ट्वा बाणान्किरीटिनः ॥
tataḥ kuruṇāmabhavadārtanādo mahānnṛpa | narāśvanāgāsuhanāndṛṣṭvā bāṇānkirīṭinaḥ
हे राजन्! तब कुरुओं में भारी चीत्कार उठा, जब उन्होंने किरीटधारी के उन बाणों को देखा जो मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के प्राण हर रहे थे।
श्लोक 42 (8.85.42)
हाहाकृतं भृशं त्रस्तं लीयमानं परस्परम् । अलातचक्रवत्सैन्यं तदा बभ्राम तावकम् ॥
hāhākṛtaṃ bhṛśaṃ trastaṃ līyamānaṃ parasparam | alātacakravatsainyaṃ tadā babhrāma tāvakam
हाहाकार करती, अत्यन्त भयभीत और एक-दूसरे में छिपती हुई आपकी वह सेना उस समय घुमाई जाती जलती लकड़ी के चक्र के समान चक्कर काटने लगी।
श्लोक 43 (8.85.43)
ततोऽर्जुनशरध्वस्तं कुरूणां सुमहद्बलम् । न ह्यत्रासीदनिर्भिन्नो रथः सादी हयो गजः ॥
tato'rjunaśaradhvastaṃ kurūṇāṃ sumahadbalam | na hyatrāsīdanirbhinno rathaḥ sādī hayo gajaḥ
तब अर्जुन के बाणों से ध्वस्त हुई कुरुओं की उस विशाल सेना में कोई रथ, सवार, घोड़ा या हाथी ऐसा न था जो बिंधा न हो।
श्लोक 44 (8.85.44)
आदीप्तमिव तत्सैन्यं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् । आसीत्स्वशोणितक्लिन्नं रौद्रं नष्टं विशाम्पते ॥
ādīptamiva tatsainyaṃ śaraiśchinnatanucchadam | āsītsvaśoṇitaklinnaṃ raudraṃ naṣṭaṃ viśāmpate
कवच कट जाने से आपकी वह सेना मानो जल उठी थी; अपने ही रक्त से भीगी हुई वह भयानक और विनष्ट-सी दिखाई देती थी, हे राजन्!
श्लोक 45 (8.85.45)
तत्सैन्यं हतभूयिष्ठमाहतं निशितैः शरैः । न जहौ समरं प्राप्य फल्गुनं शत्रुतापनम् ॥
tatsainyaṃ hatabhūyiṣṭhamāhataṃ niśitaiḥ śaraiḥ | na jahau samaraṃ prāpya phalgunaṃ śatrutāpanam
जिसके अधिकांश योद्धा मारे जा चुके थे और जो तीखे बाणों से घायल थी, उस सेना ने शत्रुओं को तपाने वाले फल्गुन के सामने आकर भी युद्ध नहीं छोड़ा।
श्लोक 46 (8.85.46)
तत्राद्भुतमपश्याम कौरवाणां पराक्रमम् । वध्यमानोऽपि यत्पार्थं न जहौ भरतर्षभ ॥
tatrādbhutamapaśyāma kauravāṇāṃ parākramam | vadhyamāno'pi yatpārthaṃ na jahau bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! वहाँ हमने कौरवों का अद्भुत पराक्रम देखा कि मारे जाते हुए भी उन्होंने पार्थ को नहीं छोड़ा।
श्लोक 47 (8.85.47)
तं दृष्ट्वा विक्रमं तस्य कुरवः सव्यसाचिनः । निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ॥
taṃ dṛṣṭvā vikramaṃ tasya kuravaḥ savyasācinaḥ | nirāśāḥ samapadyanta sarve karṇasya jīvite
सव्यसाची के उस पराक्रम को देखकर सब कुरु कर्ण के जीवन की ओर से निराश हो गए।
श्लोक 48 (8.85.48)
अविषह्यं तु पार्थस्य शरसंस्पर्शमाहवे । मत्वा न्यवर्तन्कुरवो जिता गाण्डीवधन्वना ॥
aviṣahyaṃ tu pārthasya śarasaṃsparśamāhave | matvā nyavartankuravo jitā gāṇḍīvadhanvanā
युद्ध में पार्थ के बाणों का स्पर्श असह्य मानकर गाण्डीवधारी से पराजित कुरु पीछे हट गए।
श्लोक 49 (8.85.49)
ते हित्वा समरे पार्थं वध्यमानाश्च सायकैः । प्रदुद्रुवुर्दिशो भीताश्चुक्रुशुश्चापि सूतजम् ॥
te hitvā samare pārthaṃ vadhyamānāśca sāyakaiḥ | pradudruvurdiśo bhītāścukruśuścāpi sūtajam
युद्ध में पार्थ को छोड़कर और उनके बाणों से मारे जाते हुए वे भयभीत होकर दिशाओं में भाग गए और सूतपुत्र को पुकारने लगे।
श्लोक 50 (8.85.50)
तान्विद्रावयते पार्थः किरञ्शरशतान्बहून् । हर्षयन्पाण्डवीं सेनां राजानं च युधिष्ठिरम् ॥
tānvidrāvayate pārthaḥ kirañśaraśatānbahūn | harṣayanpāṇḍavīṃ senāṃ rājānaṃ ca yudhiṣṭhiram
सैकड़ों-सैकड़ों बाण बरसाते हुए पार्थ ने उन्हें खदेड़ा, और पाण्डव सेना तथा राजा युधिष्ठिर को हर्षित किया।
श्लोक 51 (8.85.51)
पुत्रास्तव महाराज जग्मुः कर्णरथं प्रति । अगाधे मज्जतां तेषां द्वीपः कर्णोऽभवत्तदा ॥
putrāstava mahārāja jagmuḥ karṇarathaṃ prati | agādhe majjatāṃ teṣāṃ dvīpaḥ karṇo'bhavattadā
हे महाराज! आपके पुत्र कर्ण के रथ की ओर गए; अथाह जल में डूबते हुए उनके लिए उस समय कर्ण ही द्वीप बन गया।
श्लोक 52 (8.85.52)
कुरवो हि महाराज निर्विषाः पन्नगा इव । कर्णमेवोपलीयन्त भयाद्गाण्डीवधन्वनः ॥
kuravo hi mahārāja nirviṣāḥ pannagā iva | karṇamevopalīyanta bhayādgāṇḍīvadhanvanaḥ
हे महाराज! गाण्डीवधारी के भय से कौरव विषहीन सर्पों की तरह कर्ण की ही शरण में चले गए।
श्लोक 53 (8.85.53)
यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि मारिष । उपलीयन्ति सन्त्रासाद्धर्मं लोकपरायणम् ॥
yathā sarvāṇi bhūtāni mṛtyorbhītāni māriṣa | upalīyanti santrāsāddharmaṃ lokaparāyaṇam
हे माननीय! जैसे मृत्यु से डरे हुए सब प्राणी भय के मारे लोकों के आश्रय धर्म की शरण लेते हैं,
श्लोक 54 (8.85.54)
तथा कर्णं महेष्वासं पुत्रास्तव नराधिप । उपालीयन्त सन्त्रासात्पाण्डवस्य महात्मनः ॥
tathā karṇaṃ maheṣvāsaṃ putrāstava narādhipa | upālīyanta santrāsātpāṇḍavasya mahātmanaḥ
वैसे ही हे नरेश्वर! महात्मा पाण्डुपुत्र के भय से आपके पुत्रों ने महाधनुर्धर कर्ण की शरण ली।
श्लोक 55 (8.85.55)
ताञ्शोणितपरिक्लिन्नान्विषमस्थाञ्शरातुरान् । मा भैष्टेत्यब्रवीत्कर्णो भीतानाविष्टचेतसः ॥
tāñśoṇitapariklinnānviṣamasthāñśarāturān | mā bhaiṣṭetyabravītkarṇo bhītānāviṣṭacetasaḥ
रक्त से लथपथ, संकट में पड़े, बाणों से पीड़ित और भय से व्याकुल चित्त वाले उन लोगों से कर्ण ने कहा, “डरो मत।”
श्लोक 56 (8.85.56)
सम्भग्नं हि बलं दृष्ट्वा बलात्पार्थेन तावकम् । धनुर्विस्फारयन्कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसया ॥
sambhagnaṃ hi balaṃ dṛṣṭvā balātpārthena tāvakam | dhanurvisphārayankarṇastasthau śatrujighāṃsayā
पार्थ द्वारा बलपूर्वक आपकी सेना को टूटी हुई देखकर कर्ण शत्रु को मार डालने की इच्छा से धनुष को टंकारता हुआ खड़ा हो गया।
श्लोक 57 (8.85.57)
तान्प्रद्रुतान्कुरून्दृष्ट्वा कर्णः शस्त्रभृतां वरः । सञ्चिन्तयित्वा पार्थस्य वधे दध्रे मनः श्वसन् ॥
tānpradrutānkurūndṛṣṭvā karṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | sañcintayitvā pārthasya vadhe dadhre manaḥ śvasan
शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ कर्ण ने कुरुओं को भागते देखा; पार्थ के वध का विचार कर उसने गहरी साँस लेते हुए अपना मन उसी पर टिका लिया।
श्लोक 58 (8.85.58)
विस्फार्य सुमहच्चापं ततश्चाधिरथिर्वृषः । पाञ्चालान्पुनराधावत्पश्यतः सव्यसाचिनः ॥
visphārya sumahaccāpaṃ tataścādhirathirvṛṣaḥ | pāñcālānpunarādhāvatpaśyataḥ savyasācinaḥ
तब अधिरथ के पुत्र वृष (कर्ण) ने अपना विशाल धनुष तानकर सव्यसाची के देखते-देखते फिर पांचालों पर धावा बोल दिया।
श्लोक 59 (8.85.59)
ततः क्षणेन क्षितिपाः क्षतजप्रतिमेक्षणाः । शरौघैश्छादयामासुर्महामेघा इवाचलम् ॥
tataḥ kṣaṇena kṣitipāḥ kṣatajapratimekṣaṇāḥ | śaraughaiśchādayāmāsurmahāmeghā ivācalam
तब क्षणभर में रक्त के समान लाल आँखों वाले उन राजाओं ने कर्ण को बाणों की बाढ़ से वैसे ही ढक दिया, जैसे बड़े बादल पर्वत को ढक लेते हैं।
श्लोक 60 (8.85.60)
ततः शरसहस्राणि कर्णमुक्तानि मारिष । पाञ्चालानां हरत्प्राणांस्तमांसीव तमोनुदः ॥
tataḥ śarasahasrāṇi karṇamuktāni māriṣa | pāñcālānāṃ haratprāṇāṃstamāṃsīva tamonudaḥ
हे माननीय! तब कर्ण के छोड़े हजारों बाण पांचालों के प्राण वैसे ही हरने लगे, जैसे अन्धकार को दूर करने वाला सूर्य अन्धकारों को हर लेता है।
श्लोक 61 (8.85.61)
महदासीत्तदा युद्धं पाञ्चालानां महामते । वध्यतां सूतपुत्रेण मित्रार्थे मित्रगृद्धिना ॥
mahadāsīttadā yuddhaṃ pāñcālānāṃ mahāmate | vadhyatāṃ sūtaputreṇa mitrārthe mitragṛddhinā
हे महामते! तब मित्र के लिए उत्साही सूतपुत्र के द्वारा मित्र के हित में पांचालों के मारे जाने पर भारी युद्ध हुआ।