कर्ण पर्व · अध्याय 86
कर्ण का पांचालों से युद्ध; भीम और दुःशासन का आमना-सामना
कुरुओं के भाग जाने पर कर्ण पांचाल वीरों और उनके सहयोगियों को काट डालता है, और कृष्ण अर्जुन को उसे मारने के लिए प्रेरित करते हैं। भीम पीछे से रक्षा करते हुए अर्जुन के साथ कर्ण की ओर बढ़ते हैं; पांचालों के पाँच रथी कर्ण को रथ से डिगा नहीं पाते, और सात्यकि तथा द्रौपदी के पुत्र उनकी सहायता को आते हैं। भीम और दुःशासन का युद्ध में सामना होता है; भीम द्रौपदी के अपमान का पुराना ऋण चुकाने को कहते हैं, दुःशासन पाण्डवों के पुराने अपराध गिनाकर उत्तर देता है, और भीम उसका धनुष और ध्वजा काट डालते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.86.1)
ततः कर्णः कुरुषु प्रद्रुतेषु । वरूथिना श्वेतहयेन राजन् । पाञ्चालपुत्रान्व्यधमत्सूतपुत्रो । महेषुभिर्वात इवाभ्रसङ्घान् ॥
tataḥ karṇaḥ kuruṣu pradruteṣu | varūthinā śvetahayena rājan | pāñcālaputrānvyadhamatsūtaputro | maheṣubhirvāta ivābhrasaṅghān
तब कुरुओं के भाग जाने पर सूतपुत्र कर्ण ने कवचयुक्त श्वेत घोड़ों वाले रथ से, हे राजन्, बड़े-बड़े बाणों द्वारा पांचाल-पुत्रों को वैसे ही बिखेर दिया, जैसे वायु बादलों के समूहों को बिखेर देती है।
श्लोक 2 (8.86.2)
सूतं रथादञ्जलिकैर्निपात्य । जघान चाश्वाञ्जनमेजयस्य । शतानीकं सुतसोमं च भल्लै- । रवाकिरद्धनुषी चाप्यकृन्तत् ॥
sūtaṃ rathādañjalikairnipātya | jaghāna cāśvāñjanamejayasya | śatānīkaṃ sutasomaṃ ca bhallai- | ravākiraddhanuṣī cāpyakṛntat
अञ्जलिक बाणों से सारथि को रथ से गिराकर उसने जनमेजय के घोड़ों को मार डाला; भल्ल बाणों से शतानीक और सुतसोम को ढक दिया और उन दोनों के धनुष भी काट डाले।
श्लोक 3 (8.86.3)
धृष्टद्युम्नं निर्बिभेदाथ षड्भि- । र्जघानाश्वान्दक्षिणांस्तस्य सङ्ख्ये । हत्वा चाश्वान्सात्यकेः सूतपुत्रः । कैकेयपुत्रं न्यवधीद्विशोकम् ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ nirbibhedātha ṣaḍbhi- | rjaghānāśvāndakṣiṇāṃstasya saṅkhye | hatvā cāśvānsātyakeḥ sūtaputraḥ | kaikeyaputraṃ nyavadhīdviśokam
उसने छह बाणों से धृष्टद्युम्न को बींधा और युद्ध में उसके दाहिनी ओर के घोड़ों को मार डाला; फिर सात्यकि के घोड़ों को मारकर सूतपुत्र ने कैकेय-पुत्र विशोक को भी मार गिराया।
श्लोक 4 (8.86.4)
तमभ्यधावन्निहते कुमारे । सेनापतिः कैकयो मित्रवर्मा । शरैर्विधुन्वन्भृशमुग्रवेगैः । कर्णात्मजं चाप्यहनत्सुदेवम् ॥
tamabhyadhāvannihate kumāre | senāpatiḥ kaikayo mitravarmā | śarairvidhunvanbhṛśamugravegaiḥ | karṇātmajaṃ cāpyahanatsudevam
उस राजकुमार के मारे जाने पर कैकेय सेनापति मित्रवर्मा उस पर दौड़ा; उसने भयानक वेग वाले बाणों से उसे बहुत झकझोरा और कर्ण के पुत्र सुदेव को भी मार डाला।
श्लोक 5 (8.86.5)
तस्यार्धचन्द्रैस्त्रिभिरुच्चकर्त । प्रहस्य बाहू च शिरश्च कर्णः । स स्यन्दनाद्गामगमद्गतासुः । परश्वथैः साल इवावरुग्णः ॥
tasyārdhacandraistribhiruccakarta | prahasya bāhū ca śiraśca karṇaḥ | sa syandanādgāmagamadgatāsuḥ | paraśvathaiḥ sāla ivāvarugṇaḥ
कर्ण ने हँसकर तीन अर्धचन्द्र बाणों से उसकी दोनों भुजाएँ और सिर काट डाले; वह निष्प्राण होकर रथ से धरती पर गिर पड़ा, जैसे कुल्हाड़ियों से कटा हुआ साल वृक्ष गिरता है।
श्लोक 6 (8.86.6)
हताश्वमञ्जोगतिभिः सुषेणः । शिनिप्रवीरं निशितैः पृषत्कैः । प्रच्छाद्य नृत्यन्निव कर्णपुत्रः । शैनेयबाणाभिहतः पपात ॥
hatāśvamañjogatibhiḥ suṣeṇaḥ | śinipravīraṃ niśitaiḥ pṛṣatkaiḥ | pracchādya nṛtyanniva karṇaputraḥ | śaineyabāṇābhihataḥ papāta
कर्ण-पुत्र सुषेण ने शिनि-वंश के उस प्रमुख वीर को, जिसके घोड़े मारे जा चुके थे, तीखे, सीधे चलने वाले बाणों से नाचते हुए-से ढक दिया, पर शैनेय (सात्यकि) के बाणों से मारा जाकर वह गिर पड़ा।
श्लोक 7 (8.86.7)
पुत्रे हते क्रोधपरीतचेताः । कर्णः शिनीनां प्रवरं जिघांसुः । हतोऽसि हे सात्यक इत्युदीर्य । व्यवासृजद्बाणममित्रसाहम् ॥
putre hate krodhaparītacetāḥ | karṇaḥ śinīnāṃ pravaraṃ jighāṃsuḥ | hato'si he sātyaka ityudīrya | vyavāsṛjadbāṇamamitrasāham
पुत्र के मारे जाने पर क्रोध से भरे चित्त वाले कर्ण ने शिनियों में श्रेष्ठ सात्यकि को मार डालने की इच्छा से “सात्यकि! तू मर गया” कहकर शत्रुओं को दबा देने वाला बाण चलाया।
श्लोक 8 (8.86.8)
तमस्य चिच्छेद शरं शिखण्डी । त्रिभिस्त्रिभिश्च प्रतुतोद कर्णम् । शिखण्डिनः कार्मुकं च ध्वजं च । च्छित्त्वा क्षुराभ्यां न्यहनत्सुजातम् ॥
tamasya ciccheda śaraṃ śikhaṇḍī | tribhistribhiśca pratutoda karṇam | śikhaṇḍinaḥ kārmukaṃ ca dhvajaṃ ca | cchittvā kṣurābhyāṃ nyahanatsujātam
शिखण्डी ने उसके उस बाण को काट दिया और तीन-तीन बाणों से कर्ण को बार-बार बींधा; पर कर्ण ने दो क्षुर बाणों से शिखण्डी का धनुष और ध्वजा काटकर सुजात को मार गिराया।
श्लोक 9 (8.86.9)
शिखण्डिनं षड्भिरविध्यदुग्रो । धार्ष्टद्युम्नेः स शिरश्चोच्चकर्त । ततोऽभिनत्सुतसोमं क्षुरेण । सुसंशितेनाधिरथिर्महात्मा ॥
śikhaṇḍinaṃ ṣaḍbhiravidhyadugro | dhārṣṭadyumneḥ sa śiraścoccakarta | tato'bhinatsutasomaṃ kṣureṇa | susaṃśitenādhirathirmahātmā
उग्र कर्ण ने छह बाणों से शिखण्डी को बींधा और धृष्टद्युम्न-पुत्र का सिर काट डाला; फिर अधिरथ के महात्मा पुत्र ने एक भली-भाँति तीक्ष्ण किए क्षुर बाण से सुतसोम को बींध दिया।
श्लोक 10 (8.86.10)
अथाक्रन्दे तुमुले वर्तमाने । धार्ष्टद्युम्ने निहते तत्र कृष्णः । अपाञ्चाल्यं क्रियते याहि पार्थ । कर्णं जहीत्यब्रवीद्राजसिंह ॥
athākrande tumule vartamāne | dhārṣṭadyumne nihate tatra kṛṣṇaḥ | apāñcālyaṃ kriyate yāhi pārtha | karṇaṃ jahītyabravīdrājasiṃha
तब वहाँ धृष्टद्युम्न-पुत्र के मारे जाने पर जब भारी कोलाहल और चीत्कार हो रहा था, कृष्ण ने कहा, “पांचालों का नाश हो रहा है; जाओ पार्थ, कर्ण को मारो,” हे राजसिंह।
श्लोक 11 (8.86.11)
ततः प्रहस्याशु नरप्रवीरो । रथं रथेनाधिरथेर्जगाम । भये तेषां त्राणमिच्छन्सुबाहु- । रभ्याहतानां रथयूथपेन ॥
tataḥ prahasyāśu narapravīro | rathaṃ rathenādhiratherjagāma | bhaye teṣāṃ trāṇamicchansubāhu- | rabhyāhatānāṃ rathayūthapena
तब नरवीर, सुन्दर भुजाओं वाले अर्जुन ने हँसकर शीघ्र ही अपना रथ अधिरथ-पुत्र के रथ की ओर बढ़ाया; वे रथयूथपति कर्ण से पीड़ित हुए उन लोगों को भय में रक्षा देना चाहते थे।
श्लोक 12 (8.86.12)
ततोऽपरे भारत दुष्प्रकम्प्याः । पाञ्चालानां रथसङ्घाः समेताः । प्रतिश्रिता ह्यन्तरिक्षे ग्रहाभा । धनुःप्रवीरास्तु रथप्रवीराः ॥
tato'pare bhārata duṣprakampyāḥ | pāñcālānāṃ rathasaṅghāḥ sametāḥ | pratiśritā hyantarikṣe grahābhā | dhanuḥpravīrāstu rathapravīrāḥ
हे भारत! तब पांचालों के दूसरे दुर्धर्ष रथ-समूह एकत्र हो गए; ग्रहों के समान दीप्त वे श्रेष्ठ धनुर्धर और श्रेष्ठ रथी खुले आकाशीय अवकाश में डट गए।
श्लोक 13 (8.86.13)
विस्फार्य गाण्डीवमथोग्रघोषं । ज्यया समाहत्य तले भृशं च । बाणान्धकारं सहसैव कृत्वा । जघान नागाश्वरथध्वजांश्च ॥
visphārya gāṇḍīvamathograghoṣaṃ | jyayā samāhatya tale bhṛśaṃ ca | bāṇāndhakāraṃ sahasaiva kṛtvā | jaghāna nāgāśvarathadhvajāṃśca
भयंकर घोष वाले गाण्डीव को तानकर और हथेली से डोरी पर बार-बार आघात करके, सहसा बाणों का अन्धकार फैलाकर उसने हाथियों, घोड़ों, रथों और ध्वजाओं को मार डाला।
श्लोक 14 (8.86.14)
प्रतिश्रुतः प्राचरदन्तरिक्षे । गुहा गिरीणामपतन्वयांसि । यन्मण्डलज्येन विजृम्भमाणो । रौद्रे मुहूर्तेऽभ्यपतत्किरीटी ॥
pratiśrutaḥ prācaradantarikṣe | guhā girīṇāmapatanvayāṃsi | yanmaṇḍalajyena vijṛmbhamāṇo | raudre muhūrte'bhyapatatkirīṭī
आकाश में प्रतिध्वनि गूँज उठी और पक्षी पर्वतों की गुफाओं में जा गिरे, जब उस भयंकर क्षण में मण्डलाकार डोरी वाले धनुष को तानते हुए किरीटी उन पर टूट पड़ा।
श्लोक 15 (8.86.15)
तं भीमसेनोऽनुययौ रथेन । पृष्ठे रक्षन्पाण्डवमेकवीरः । तौ राजपुत्रौ त्वरितौ रथाभ्यां । कर्णाय यातावरिभिर्विषक्तौ ॥
taṃ bhīmaseno'nuyayau rathena | pṛṣṭhe rakṣanpāṇḍavamekavīraḥ | tau rājaputrau tvaritau rathābhyāṃ | karṇāya yātāvaribhirviṣaktau
अकेले वीर भीमसेन रथ से पाण्डव (अर्जुन) की पीठ की रक्षा करते हुए उनके पीछे चले; वे दोनों राजकुमार शत्रुओं से घिरे हुए अपने रथों पर शीघ्रता से कर्ण की ओर बढ़े।
श्लोक 16 (8.86.16)
तत्रान्तरे सुमहान्सूतपुत्र- । श्चक्रे युद्धं सोमकान्सम्प्रमथ्य । रथाश्वमातङ्गगणाञ्जघान । प्रच्छादयामास शरैर्दिशश्च ॥
tatrāntare sumahānsūtaputra- | ścakre yuddhaṃ somakānsampramathya | rathāśvamātaṅgagaṇāñjaghāna | pracchādayāmāsa śarairdiśaśca
इसी बीच महान् सूतपुत्र ने सोमकों को कुचलते हुए घोर युद्ध किया; उसने रथों, घोड़ों और हाथियों के समूहों को मारा और बाणों से दिशाओं को ढक दिया।
श्लोक 17 (8.86.17)
तमुत्तमौजा जनमेजयश्च । क्रुद्धौ युधामन्युशिखण्डिनौ च । कर्णं बिभेदुः सहिताः पृषत्कैः । सन्नर्दमानाः सह पार्षतेन ॥
tamuttamaujā janamejayaśca | kruddhau yudhāmanyuśikhaṇḍinau ca | karṇaṃ bibheduḥ sahitāḥ pṛṣatkaiḥ | sannardamānāḥ saha pārṣatena
उत्तमौजा, जनमेजय, क्रुद्ध युधामन्यु और शिखण्डी ने पार्षत के साथ मिलकर गर्जते हुए बाणों से कर्ण को बींध दिया।
श्लोक 18 (8.86.18)
ते पञ्च पाञ्चालरथाः समेता । वैकर्तनं कर्णमभिद्रवन्तः । तस्माद्रथाच्च्यावयितुं न शेकु- । र्धैर्यात्कृतात्मानमिवेन्द्रियार्थाः ॥
te pañca pāñcālarathāḥ sametā | vaikartanaṃ karṇamabhidravantaḥ | tasmādrathāccyāvayituṃ na śeku- | rdhairyātkṛtātmānamivendriyārthāḥ
वे पांचालों के पाँच रथी एकत्र होकर वैकर्तन कर्ण पर टूट पड़े, पर उसे रथ से गिरा न सके, जैसे इन्द्रियों के विषय आत्मसंयमी पुरुष को उसके धैर्य से डिगा नहीं पाते।
श्लोक 19 (8.86.19)
तेषां धनूंषि ध्वजवाजिसूतां- । स्तूर्णं पताकाश्च निकृत्य बाणैः । तान्पाञ्चालानभ्यहनत्पृषत्कैः । कर्णस्ततः सिंह इवोन्ननाद ॥
teṣāṃ dhanūṃṣi dhvajavājisūtāṃ- | stūrṇaṃ patākāśca nikṛtya bāṇaiḥ | tānpāñcālānabhyahanatpṛṣatkaiḥ | karṇastataḥ siṃha ivonnanāda
शीघ्र ही बाणों से उनके धनुष, ध्वजा, घोड़े, सारथि और पताकाएँ काटकर कर्ण ने उन पांचालों को बाणों से मारा और फिर सिंह की तरह गरज उठा।
श्लोक 20 (8.86.20)
तस्यास्यतस्तानभिनिघ्नतश्च । ज्याबाणहस्तस्य धनुःस्वनेन । साद्रिद्रुमा स्यात्पृथिवी विशीर्णे- । त्यतीव मत्वा जनता व्यषीदत् ॥
tasyāsyatastānabhinighnataśca | jyābāṇahastasya dhanuḥsvanena | sādridrumā syātpṛthivī viśīrṇe- | tyatīva matvā janatā vyaṣīdat
बाण छोड़ते और उन्हें मारते हुए, हाथ में डोरी और बाण लिए उस कर्ण के धनुष की टंकार से लोग यह सोचकर अत्यन्त विषाद में पड़ गए कि पर्वतों और वृक्षों सहित पृथ्वी फट जाएगी।
श्लोक 21 (8.86.21)
स शक्रचापप्रतिमेन धन्वना । भृशायतेनाधिरथिः शरान्सृजन् । बभौ रणे दीप्तमरीचिमण्डलो । यथांशुमाली परिवेषवांस्तथा ॥
sa śakracāpapratimena dhanvanā | bhṛśāyatenādhirathiḥ śarānsṛjan | babhau raṇe dīptamarīcimaṇḍalo | yathāṃśumālī pariveṣavāṃstathā
इन्द्रधनुष के समान, पूरी तरह तने हुए धनुष से बाण छोड़ता हुआ अधिरथ-पुत्र युद्ध में दीप्त किरणों के मण्डल से घिरा हुआ, परिवेषयुक्त सूर्य की भाँति शोभित हुआ।
श्लोक 22 (8.86.22)
शिखण्डिनं द्वादशभिः पराभिन- । च्छितैः शरैः षड्भिरथोत्तमौजसम् । त्रिभिर्युधामन्युमविध्यदाशुगै- । स्त्रिभिस्त्रिभिः सोमकपार्षतात्मजौ ॥
śikhaṇḍinaṃ dvādaśabhiḥ parābhina- | cchitaiḥ śaraiḥ ṣaḍbhirathottamaujasam | tribhiryudhāmanyumavidhyadāśugai- | stribhistribhiḥ somakapārṣatātmajau
उसने बारह तीखे बाणों से शिखण्डी को, छह से उत्तमौजा को, तीन शीघ्रगामी बाणों से युधामन्यु को, और तीन-तीन बाणों से सोमक तथा पार्षत के पुत्र को बींध दिया।
श्लोक 23 (8.86.23)
पराजिताः पञ्च महारथास्तु ते । महाहवे सूतसुतेन मारिष । निरुद्यमास्तस्थुरमित्रनन्दना । यथेन्द्रियार्थात्मवता पराजिताः ॥
parājitāḥ pañca mahārathāstu te | mahāhave sūtasutena māriṣa | nirudyamāstasthuramitranandanā | yathendriyārthātmavatā parājitāḥ
हे माननीय! वे पाँचों महारथी महायुद्ध में सूतपुत्र से पराजित होकर शत्रुओं को आनन्द देते हुए निरुद्यम खड़े रह गए, जैसे आत्मसंयमी पुरुष से इन्द्रियों के विषय हार जाते हैं।
श्लोक 24 (8.86.24)
निमज्जतस्तानथ कर्णसागरे । विपन्ननावो वणिजो यथार्णवे । उद्दध्रिरे नौभिरिवार्णवाद्रथैः । सुकल्पितैर्द्रौपदिजाः स्वमातुलान् ॥
nimajjatastānatha karṇasāgare | vipannanāvo vaṇijo yathārṇave | uddadhrire naubhirivārṇavādrathaiḥ | sukalpitairdraupadijāḥ svamātulān
कर्णरूपी सागर में डूबते हुए उन लोगों को, समुद्र में नाव टूट जाने पर डूबते व्यापारियों की भाँति, द्रौपदी के पुत्रों ने अपने मामाओं को सुसज्जित रथों के सहारे, नावों की तरह, उबार लिया।
श्लोक 25 (8.86.25)
ततः शिनीनामृषभः शितैः शरै- । र्निकृत्य कर्णप्रहितानिषून्बहून् । विदार्य कर्णं निशितैरयस्मयै- । स्तवात्मजं ज्येष्ठमविध्यदष्टभिः ॥
tataḥ śinīnāmṛṣabhaḥ śitaiḥ śarai- | rnikṛtya karṇaprahitāniṣūnbahūn | vidārya karṇaṃ niśitairayasmayai- | stavātmajaṃ jyeṣṭhamavidhyadaṣṭabhiḥ
तब शिनियों के श्रेष्ठ वीर ने तीखे बाणों से कर्ण के चलाए बहुत-से बाणों को काटकर और लोहे के तीखे बाणों से कर्ण को बींधकर आपके ज्येष्ठ पुत्र को आठ बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 26 (8.86.26)
कृपोऽथ भोजश्च तवात्मजस्तथा । स्वयं च कर्णो निशितैरताडयत् । स तैश्चतुर्भिर्युयुधे यदूत्तमो । दिगीश्वरैर्दैत्यपतिर्यथा तथा ॥
kṛpo'tha bhojaśca tavātmajastathā | svayaṃ ca karṇo niśitairatāḍayat | sa taiścaturbhiryuyudhe yadūttamo | digīśvarairdaityapatiryathā tathā
कृप, भोज (कृतवर्मा), आपके पुत्र और स्वयं कर्ण ने भी उसे तीखे बाणों से मारा; पर यदुश्रेष्ठ ने उन चारों से वैसे ही युद्ध किया जैसे दैत्यराज दिक्पालों से लड़ा था।
श्लोक 27 (8.86.27)
समाततेनेष्वसनेन कूजता । महास्वनेनाशनिपातदीधितिः । बभूव दुर्धर्षतरः स सात्यकिः । शरन्नभोमध्यगतो यथा रविः ॥
samātateneṣvasanena kūjatā | mahāsvanenāśanipātadīdhitiḥ | babhūva durdharṣataraḥ sa sātyakiḥ | śarannabhomadhyagato yathā raviḥ
पूरी तरह तने हुए, महाध्वनि से टंकारते धनुष से वज्रपात की-सी चमक वाला सात्यकि शरद् ऋतु के मध्य आकाश में स्थित सूर्य की भाँति अत्यन्त दुर्धर्ष हो गया।
श्लोक 28 (8.86.28)
पुनः समास्थाय रथान्सुदंशिताः । शिनिप्रवीरं जुगुपुः परन्तपाः । समेत्य पाञ्चालमहारथा रणे । मरुद्रणाः शक्रमिवारिनिग्रहे ॥
punaḥ samāsthāya rathānsudaṃśitāḥ | śinipravīraṃ jugupuḥ parantapāḥ | sametya pāñcālamahārathā raṇe | marudraṇāḥ śakramivārinigrahe
फिर रथों पर चढ़कर, कवच धारण किए, शत्रुओं को तपाने वाले पांचाल महारथियों ने रणभूमि में एकत्र होकर शिनिवंशी वीर की रक्षा की, जैसे शत्रुओं के दमन में मरुद्गण इन्द्र की रक्षा करते हैं।
श्लोक 29 (8.86.29)
ततोऽभवद्युद्धमतीव दारुणं । तवाहितानां तव सैनिकैः सह । रथाश्वमातङ्गविनाशनं तथा । यथा सुराणामसुरैः पुराऽभवत् ॥
tato'bhavadyuddhamatīva dāruṇaṃ | tavāhitānāṃ tava sainikaiḥ saha | rathāśvamātaṅgavināśanaṃ tathā | yathā surāṇāmasuraiḥ purā'bhavat
तब आपके शत्रुओं और आपके सैनिकों के बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ा, जिसमें रथों, घोड़ों और हाथियों का वैसा ही विनाश हुआ जैसा पूर्वकाल में देवताओं और असुरों के युद्ध में हुआ था।
श्लोक 30 (8.86.30)
रथा द्विपा वाजिपदातयस्तथा । भ्रमन्ति नानाविधशस्त्रवेष्टिताः । परस्परेणाभिहताश्च चस्खलु- । र्विनेदुरार्ता व्यसवोऽपतंस्तथा ॥
rathā dvipā vājipadātayastathā | bhramanti nānāvidhaśastraveṣṭitāḥ | paraspareṇābhihatāśca caskhalu- | rvinedurārtā vyasavo'pataṃstathā
तरह-तरह के शस्त्रों से घिरे रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक चारों ओर घूमते थे; एक-दूसरे के प्रहार से घायल होकर वे लड़खड़ाते, पीड़ा से चीखते और निष्प्राण होकर गिर पड़ते थे।
श्लोक 31 (8.86.31)
तथागतं भीममभीस्तवात्मजः । ससार राजावरजः किरञ्शरैः । तमभ्यधावत्त्वरितो वृकोदरो । महारुरुं सिंह इवाभिपेदिवान् ॥
tathāgataṃ bhīmamabhīstavātmajaḥ | sasāra rājāvarajaḥ kirañśaraiḥ | tamabhyadhāvattvarito vṛkodaro | mahāruruṃ siṃha ivābhipedivān
तब आपका निर्भय पुत्र, राजा का छोटा भाई, इस प्रकार आए भीम पर बाण बरसाता हुआ बढ़ा; और वृकोदर शीघ्रता से उस पर वैसे ही दौड़ा जैसे सिंह बड़े रुरु मृग पर टूट पड़ता है।
श्लोक 32 (8.86.32)
ततस्तयोर्युद्धमतीव दारुणं । प्रदीव्यतोः प्राणदुरोदरं द्वयोः । परस्परेणाभिनिविष्टरोषयो- । रुदग्रयोः शम्बरशक्रयोर्यथा ॥
tatastayoryuddhamatīva dāruṇaṃ | pradīvyatoḥ prāṇadurodaraṃ dvayoḥ | paraspareṇābhiniviṣṭaroṣayo- | rudagrayoḥ śambaraśakrayoryathā
तब उन दोनों के बीच, जो प्राणों का जुआ खेल रहे थे, परस्पर रोष से भरे थे और शम्बर तथा इन्द्र के समान उग्र थे, अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 33 (8.86.33)
शरैः शरीरार्तिकरैः सुतेजनै- । र्निजघ्नतुस्तावितरेतरं भृशम् । सकृत्प्रभिन्नाविव वासितान्तरे । महागजौ दोर्भिरदीनघातिनौ ॥
śaraiḥ śarīrārtikaraiḥ sutejanai- | rnijaghnatustāvitaretaraṃ bhṛśam | sakṛtprabhinnāviva vāsitāntare | mahāgajau dorbhiradīnaghātinau
शरीर को पीड़ा देने वाले तेजस्वी बाणों से वे दोनों बार-बार एक-दूसरे को मारते रहे, जैसे हथिनी के सामने पहली बार मद में आए दो महागज अपनी भुजाओं के बल से निर्भय होकर एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं।
श्लोक 34 (8.86.34)
आलोक्य तौ चैव परस्परं ततः । समं च शूरौ च ससारथी तदा । भीमोऽब्रवीद्याहि दुःशासनाय । दुःशासनो याहि वृकोदराय ॥
ālokya tau caiva parasparaṃ tataḥ | samaṃ ca śūrau ca sasārathī tadā | bhīmo'bravīdyāhi duḥśāsanāya | duḥśāsano yāhi vṛkodarāya
तब एक-दूसरे को देखकर वे दोनों शूरवीर और उनके सारथि एक ही समय बोल उठे; भीम ने कहा, “दुःशासन की ओर चलो,” और दुःशासन ने कहा, “वृकोदर की ओर चलो।”
श्लोक 35 (8.86.35)
तयो रथौ सारथिसम्प्रचोदितौ । समं रथौ तौ महसा समीयतुः । नानायुधच्छत्रपताकिकाध्वजौ । दिवीव पूर्वं बलशक्रयो रणे ॥
tayo rathau sārathisampracoditau | samaṃ rathau tau mahasā samīyatuḥ | nānāyudhacchatrapatākikādhvajau | divīva pūrvaṃ balaśakrayo raṇe
सारथियों से हाँके गए उनके दोनों रथ, अनेक आयुधों, छत्रों, पताकाओं और ध्वजाओं से सजे, तेज के साथ एक साथ आ भिड़े, जैसे पूर्वकाल में स्वर्ग में बल और इन्द्र का युद्ध हुआ था।
भीम उवाच
श्लोक 36 (8.86.36)
दिष्ट्याऽसि दुःशासन अद्य दृष्टः । ऋणं प्रतीच्छेः सहवृद्धिमूलम् । चिरोदितं यन्मया ते सभायां । कृष्णाभिमर्शेन गृहाण मत्तः ॥
diṣṭyā'si duḥśāsana adya dṛṣṭaḥ | ṛṇaṃ pratīccheḥ sahavṛddhimūlam | ciroditaṃ yanmayā te sabhāyāṃ | kṛṣṇābhimarśena gṛhāṇa mattaḥ
“दुःशासन! सौभाग्य से आज तू मुझे दिखाई दिया। सभा में कृष्णा के अपमान के समय जो बात मैंने तुझसे बहुत पहले कही थी, उस ऋण को मूलधन और ब्याज सहित मुझसे वसूल कर ले।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (8.86.37)
स एवमुक्तस्तु ततो महात्मा । दुःशासनो वाक्यमुवाच वीरः । सर्वं स्मरे नैव च विस्मरामि । उदीर्यमाणं शृणु भीमसेन ॥
sa evamuktastu tato mahātmā | duḥśāsano vākyamuvāca vīraḥ | sarvaṃ smare naiva ca vismarāmi | udīryamāṇaṃ śṛṇu bhīmasena
इस प्रकार कहे जाने पर महात्मा, वीर दुःशासन ने यह वचन कहा—“मैं सब कुछ स्मरण रखता हूँ, कुछ भी नहीं भूलता। भीमसेन! जो मैं कह रहा हूँ उसे सुनो।”
दुःशासन उवाच
श्लोक 38 (8.86.38)
स्मरामि चात्मप्रभवं चिराय । यज्जातुषे वेश्मनि रात्र्यहानि । विश्वासहीना मृगयां चरन्तो । वसन्ति सर्वत्र निराकृतास्तु ॥
smarāmi cātmaprabhavaṃ cirāya | yajjātuṣe veśmani rātryahāni | viśvāsahīnā mṛgayāṃ caranto | vasanti sarvatra nirākṛtāstu
“और मुझे वह बात भी याद है जो बहुत पहले हमसे आरम्भ हुई थी—कि लाक्षागृह में तुम दिन-रात विश्वासहीन होकर आखेट करते-से घूमते हुए, सर्वत्र ठुकराए हुए रहे,
श्लोक 39 (8.86.39)
महाभयं रात्र्यहानि स्मरन्त- । स्तथोपभोगाच्च सुखाच्च हीनाः । वनेष्वटन्तो गिरिगह्वराणि । पाञ्चालराजस्य पुरं प्रविष्टाः ॥
mahābhayaṃ rātryahāni smaranta- | stathopabhogācca sukhācca hīnāḥ | vaneṣvaṭanto girigahvarāṇi | pāñcālarājasya puraṃ praviṣṭāḥ
दिन-रात महान् भय को याद करते हुए, सुख और भोगों से रहित होकर, वनों और पर्वत-गुफाओं में भटकते हुए तुम पांचालराज के नगर में जा पहुँचे।
श्लोक 40 (8.86.40)
मायां यूयं कामपि सम्प्रविष्टा । यतो वृतः कृष्णया फल्गुनो वः । संभूय पापैस्तदनार्यवृत्तं । कृतं तदा मातृकृतानुरूपम् ॥
māyāṃ yūyaṃ kāmapi sampraviṣṭā | yato vṛtaḥ kṛṣṇayā phalguno vaḥ | saṃbhūya pāpaistadanāryavṛttaṃ | kṛtaṃ tadā mātṛkṛtānurūpam
तुम लोगों ने किसी माया का आश्रय लिया, जिससे कृष्णा ने तुम्हारे बीच अर्जुन को वरा; तुम पापियों ने मिलकर उस समय वह अनार्य आचरण किया, जो तुम्हारी माता के किए के अनुरूप था।
श्लोक 41 (8.86.41)
एका वृता पञ्चभिः साभिपन्ना । ह्यलज्जमानैश्च परस्परस्य । स्मरे सभायां सुबलात्मजेन । दासीकृता यत्सह कृष्णया च ॥
ekā vṛtā pañcabhiḥ sābhipannā | hyalajjamānaiśca parasparasya | smare sabhāyāṃ subalātmajena | dāsīkṛtā yatsaha kṛṣṇayā ca
एक ही स्त्री को पाँचों ने वरा और अपनाया, एक-दूसरे के सामने लज्जा त्यागकर; और मुझे स्मरण है कि सभा में सुबलपुत्र ने तुम्हें कृष्णा के साथ दास बना दिया था।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (8.86.42)
इत्येवमुक्तस्तु तवात्मजेन । पाण्डोः सुतः कोपवशं भृशं । धनुः क्षुराभ्यां ध्वजमेव चाच्छिनत् । ललाटमप्यस्य बिभेद पत्रिणा । शिरश्च कायात्प्रजहार सारथेः ॥
ityevamuktastu tavātmajena | pāṇḍoḥ sutaḥ kopavaśaṃ bhṛśaṃ | dhanuḥ kṣurābhyāṃ dhvajameva cācchinat | lalāṭamapyasya bibheda patriṇā | śiraśca kāyātprajahāra sāratheḥ
आपके पुत्र के इस प्रकार कहने पर पाण्डुपुत्र भीम अत्यन्त क्रोध के वश में हो गए; उन्होंने दो क्षुर बाणों से उसके धनुष और ध्वजा को काट डाला, एक बाण से उसका ललाट भी बींध दिया, और उसके सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 43 (8.86.43)
स राजपुत्रोऽन्यदवाप्य कार्मुकं । वृकोदरं द्वादशभिः पराभिनत् । स्वयं नियच्छंस्तुरगानजिह्मगैः । शरैश्च भीमं पुनरप्यवीवृषत् ॥
sa rājaputro'nyadavāpya kārmukaṃ | vṛkodaraṃ dvādaśabhiḥ parābhinat | svayaṃ niyacchaṃsturagānajihmagaiḥ | śaraiśca bhīmaṃ punarapyavīvṛṣat
उस राजपुत्र ने दूसरा धनुष लेकर बारह बाणों से वृकोदर को बींध दिया, और स्वयं घोड़ों को सँभालते हुए सीधे जाने वाले बाणों से भीम पर फिर बाणों की वर्षा की।