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कर्ण पर्व · अध्याय 87

भीम द्वारा दुःशासन का वध और रक्तपान

भीम और दुःशासन का युद्ध होता है; दुःशासन भीम का धनुष और घोड़े काट देता है, भीम रथ से उतरकर गदा से दुःशासन के घोड़े मारते हैं और गदा उस पर चलाते हैं। द्रौपदी के अपमान को याद करके भीम दुःशासन को पटक देते हैं, पूछते हैं कि उसके केश किस हाथ से खींचे गए थे, और वही भुजा उखाड़ लेते हैं। फिर वे दुःशासन की छाती चीरकर उसका रक्त पीते हैं और कहते हैं कि यह दूध, मधु और ईख के रस से भी अधिक मधुर है; यह देखकर कौरव योद्धा भय से भाग खड़े होते हैं।

अध्याय 86अध्याय-सूचीअध्याय 88

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.87.1)

स राजपुत्रेण समार्च्छदुग्र- । दुःशासनेन निकृतो निकृत्या ॥

sa rājaputreṇa samārcchadugra- | duḥśāsanena nikṛto nikṛtyā

छल से सताए गए भीम का सामना उस राजकुमार, उग्र दुःशासन से हुआ।

श्लोक 2 (8.87.2)

तत्राकरोद्दुष्करं राजपुत्रो । दुःशासनः कुरुवीरो महात्मा । यद्भीमसेनं प्रतियोधयद्रणे । जम्भो यथा शक्रमुदारवीर्यम् ॥

tatrākarodduṣkaraṃ rājaputro | duḥśāsanaḥ kuruvīro mahātmā | yadbhīmasenaṃ pratiyodhayadraṇe | jambho yathā śakramudāravīryam

वहाँ कुरुओं के उस महात्मा वीर राजकुमार दुःशासन ने एक दुष्कर कार्य किया; उसने युद्ध में भीमसेन से वैसे ही लोहा लिया जैसे जम्भ ने महापराक्रमी इन्द्र से लिया था।

श्लोक 3 (8.87.3)

धनुच्छित्त्वा भीमसेनस्य सङ्ख्ये । षड्भिः शरैः सारथिमभ्यविध्यत् । ततोऽविध्यत्त्रिंशता भीमसेनं । वरेषुभिर्वन्यमिव द्विपेन्द्रम् ॥

dhanucchittvā bhīmasenasya saṅkhye | ṣaḍbhiḥ śaraiḥ sārathimabhyavidhyat | tato'vidhyattriṃśatā bhīmasenaṃ | vareṣubhirvanyamiva dvipendram

युद्ध में भीमसेन के धनुष को काटकर उसने छह बाणों से उनके सारथि को बींधा, और फिर तीस उत्तम बाणों से भीमसेन को वैसे ही बींध दिया जैसे जंगली गजराज को बींधा जाता है।

श्लोक 4 (8.87.4)

स कार्मुकं गृह्य तु भारसाधनं । भीमस्तदा राजपुत्रं ह्यविध्यत् । पञ्चाशतैर्बाणगणैः स्तनानन्तरे । तोत्रैर्यथा तीव्रवेगं द्विपेन्द्रम् ॥

sa kārmukaṃ gṛhya tu bhārasādhanaṃ | bhīmastadā rājaputraṃ hyavidhyat | pañcāśatairbāṇagaṇaiḥ stanānantare | totrairyathā tīvravegaṃ dvipendram

तब भीम ने दृढ़ धनुष लेकर पचास बाण-समूहों से राजकुमार की छाती को बींध दिया, जैसे अंकुशों से तीव्र वेग वाले गजराज को बींधा जाता है।

श्लोक 5 (8.87.5)

ततस्तु राजन्विरथं महात्मा । दुःशासनो भीमसेनं चकार । निहत्य सङ्ख्ये चतुरोऽस्य वाहा- । ञ्छित्त्वा रथेषां पुनरेव चाक्षिपत् ॥

tatastu rājanvirathaṃ mahātmā | duḥśāsano bhīmasenaṃ cakāra | nihatya saṅkhye caturo'sya vāhā- | ñchittvā ratheṣāṃ punareva cākṣipat

हे राजन्! तब महात्मा दुःशासन ने भीमसेन को रथहीन कर दिया; उसने युद्ध में उनके चारों घोड़े मार डाले, रथ की ईषा काट डाली और उसे फेंक दिया।

श्लोक 6 (8.87.6)

ततः क्षितिस्थो ह्यवरुह्य याना- । द्वृकोदरो गदया तस्य वाहान् । यमक्षयं प्रेषयित्वा महात्मा । रथं समाकर्षत राजसूनोः ॥

tataḥ kṣitistho hyavaruhya yānā- | dvṛkodaro gadayā tasya vāhān | yamakṣayaṃ preṣayitvā mahātmā | rathaṃ samākarṣata rājasūnoḥ

तब महात्मा वृकोदर रथ से उतरकर भूमि पर खड़े हुए, गदा से उसके घोड़ों को यमलोक भेज दिया, और राजकुमार के रथ को खींच ले गए।

श्लोक 7 (8.87.7)

तस्मादवप्लुत्य रथात्ससर्ज । दुःशासनस्तोमरमुग्रवेगम् । स तेन विद्धो ह्युरसि ह्यप्रमेयो । गदां तस्मै विससर्जाप्रमेयाम् ॥

tasmādavaplutya rathātsasarja | duḥśāsanastomaramugravegam | sa tena viddho hyurasi hyaprameyo | gadāṃ tasmai visasarjāprameyām

दुःशासन ने रथ से कूदकर भयंकर वेग वाला तोमर फेंका; उससे छाती में बिंधे अपरिमित बल वाले भीम ने अपनी अपरिमेय गदा उस पर चला दी।

श्लोक 8 (8.87.8)

ततः क्रोधाद्भीमसेनः कृतानि । सर्वाणि दुःखान्यनुसंस्मरन्वै । संस्मृत्य संस्मृत्य तथा प्रतिज्ञा- । मुग्रामसौ राजपुत्रो व्यषीदत् ॥

tataḥ krodhādbhīmasenaḥ kṛtāni | sarvāṇi duḥkhānyanusaṃsmaranvai | saṃsmṛtya saṃsmṛtya tathā pratijñā- | mugrāmasau rājaputro vyaṣīdat

तब भीमसेन क्रोध से अपने प्रति किए गए सब दुःखों को और उस उग्र प्रतिज्ञा को बार-बार याद करते हुए, राजकुमार (भीम) व्यथा से भर उठे।

श्लोक 9 (8.87.9)

सञ्चिन्तितं रोषमतीव वेगा- । त्त्रयोदशाब्दं पुरुषप्रवीरः । प्रगृह्य वज्राशनितुल्यवेगां । गदां करेणाथ वृकोदरो रुषा ॥

sañcintitaṃ roṣamatīva vegā- | ttrayodaśābdaṃ puruṣapravīraḥ | pragṛhya vajrāśanitulyavegāṃ | gadāṃ kareṇātha vṛkodaro ruṣā

तेरह वर्षों से मन में सँजोए उस रोष को बड़े वेग से प्रकट करते हुए पुरुषों में श्रेष्ठ वृकोदर ने क्रोध में वज्र और बिजली के समान वेग वाली गदा हाथ में उठा ली।

श्लोक 10 (8.87.10)

निपातयित्वा पृथिवीतले भृशं । स ताडयामास वृकोदरो बली । अतीव सन्ताडितभिन्नगात्रो । दुःशासनो वै निपपात भूमौ ॥

nipātayitvā pṛthivītale bhṛśaṃ | sa tāḍayāmāsa vṛkodaro balī | atīva santāḍitabhinnagātro | duḥśāsano vai nipapāta bhūmau

उसे भूमि पर जोर से पटककर बली वृकोदर ने फिर उस पर प्रहार किया; शरीर चूर-चूर हो जाने पर दुःशासन भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 11 (8.87.11)

आक्रम्य कण्ठे युधि राजपुत्रं । संरक्तनेत्रो ह्यब्रवीद्धार्तराष्ट्रम् । तद्ब्रूहि किं त्वं परिमार्गमाणो । ह्यस्मान्पराभूय इहागतः पुनः ॥

ākramya kaṇṭhe yudhi rājaputraṃ | saṃraktanetro hyabravīddhārtarāṣṭram | tadbrūhi kiṃ tvaṃ parimārgamāṇo | hyasmānparābhūya ihāgataḥ punaḥ

युद्ध में राजकुमार का गला दबाकर, क्रोध से लाल आँखों वाले भीम ने धृतराष्ट्र-पुत्र से कहा—“बता, तू क्या ढूँढ़ता हुआ हमें अपमानित करके फिर यहाँ आया है?”

श्लोक 12 (8.87.12)

दिदीपयंस्तद्भृशदीपितं मे । चिरार्जितं रोषमतिप्रदीप्तम् । मधु प्रपास्ये तव कोष्टभाजना- । दित्यब्रवीद्भीमसेनस्तरस्वी ॥

didīpayaṃstadbhṛśadīpitaṃ me | cirārjitaṃ roṣamatipradīptam | madhu prapāsye tava koṣṭabhājanā- | dityabravīdbhīmasenastarasvī

“अपने भड़कते हुए, चिरकाल से संचित, अत्यन्त प्रज्वलित रोष को और प्रज्वलित करता हुआ मैं तेरे पेट के पात्र से मधु पिऊँगा,” वेगवान् भीमसेन ने कहा।

श्लोक 13 (8.87.13)

दुःशासनं कण्ठदेशे प्रमृद्नं- । स्ततः क्रूरं भीमसेनश्चकार । तं व्यंसयित्वा सहसा ससार । बलादसौ धार्तराष्ट्रस्तरस्वी ॥

duḥśāsanaṃ kaṇṭhadeśe pramṛdnaṃ- | stataḥ krūraṃ bhīmasenaścakāra | taṃ vyaṃsayitvā sahasā sasāra | balādasau dhārtarāṣṭrastarasvī

दुःशासन की गर्दन कुचलते हुए भीमसेन ने तब क्रूरता का काम किया; पर बलवान् धृतराष्ट्र-पुत्र उसे झटककर बलपूर्वक सहसा निकल भागा।

श्लोक 14 (8.87.14)

भीमोऽभिदुद्राव सुतं त्वदीयं । सपत्नताम् दर्शयन्धार्तराष्ट्रे । मृगं मुहुः सिंहशिशुर्यथा वने । तथाश्वभिद्रुत्य महाबलं बली ॥

bhīmo'bhidudrāva sutaṃ tvadīyaṃ | sapatnatām darśayandhārtarāṣṭre | mṛgaṃ muhuḥ siṃhaśiśuryathā vane | tathāśvabhidrutya mahābalaṃ balī

भीम धृतराष्ट्र-पुत्र के प्रति अपनी शत्रुता दिखाते हुए आपके पुत्र पर टूट पड़े; जैसे वन में सिंह-शावक बार-बार मृग पर झपटता है, वैसे ही उस बली ने उस महाबली पर शीघ्र झपटकर उसे पकड़ लिया।

श्लोक 15 (8.87.15)

निगृह्य चैनं परमेण कर्मणा । उत्क्षिप्य चोत्क्षिप्य च तूर्णमेनम् । भूमौ तदा निष्पिपेषाथ वीर । असिं विकोशं विमलं चकार ॥

nigṛhya cainaṃ parameṇa karmaṇā | utkṣipya cotkṣipya ca tūrṇamenam | bhūmau tadā niṣpipeṣātha vīra | asiṃ vikośaṃ vimalaṃ cakāra

उसे अद्भुत पराक्रम से पकड़कर, बार-बार ऊपर उछालकर उन्होंने शीघ्र भूमि पर पटककर पीस डाला, हे वीर! और अपनी निर्मल तलवार को म्यान से बाहर खींच लिया।

श्लोक 16 (8.87.16)

तं पातयित्वा तु वृकोदरोऽथ । जगर्ज हर्षेण विनादयन्दिशः । नादेन तेनाखिलपार्श्ववर्तिनो । मूर्च्छाकुलाः पतितास्त्वाजमीढ ॥

taṃ pātayitvā tu vṛkodaro'tha | jagarja harṣeṇa vinādayandiśaḥ | nādena tenākhilapārśvavartino | mūrcchākulāḥ patitāstvājamīḍha

उसे गिराकर वृकोदर हर्ष से गरजे और दिशाओं को गुँजा दिया; हे आजमीढवंशी! उस गर्जन से आसपास के सब लोग मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

श्लोक 17 (8.87.17)

दुःशासनं तत्र समीक्ष्य राज- । न्भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा । स्मृत्वा च केशग्रहणं च देव्या । वस्त्रापहारं च रजस्वलायाः ॥

duḥśāsanaṃ tatra samīkṣya rāja- | nbhīmo mahābāhuracintyakarmā | smṛtvā ca keśagrahaṇaṃ ca devyā | vastrāpahāraṃ ca rajasvalāyāḥ

हे राजन्! वहाँ दुःशासन को देखकर अचिन्त्य कर्म करने वाले महाबाहु भीम ने देवी (द्रौपदी) के केश खींचे जाने और रजस्वला अवस्था में उनके वस्त्र उतारे जाने को याद किया,

श्लोक 18 (8.87.18)

अनागसो भर्तृपराङ्मुखाया । दुःखानि दत्तान्यपि विप्रचिन्त्य । जज्वाल कोपादथ भीमसेन । आज्यप्रसिक्तो हि यथा हुताशः ॥

anāgaso bhartṛparāṅmukhāyā | duḥkhāni dattānyapi vipracintya | jajvāla kopādatha bhīmasena | ājyaprasikto hi yathā hutāśaḥ

और अपने पतियों के मुँह फेर लेने पर उस निर्दोष स्त्री को दिए गए दुःखों को सोचकर भीमसेन क्रोध से घी से सींची अग्नि की भाँति जल उठे।

श्लोक 19 (8.87.19)

तत्राह कर्णं च सुयोधनं च । कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव । निहन्मि दुःशासनमद्य पापं । संरक्ष्यतामद्य समस्तयोधाः ॥

tatrāha karṇaṃ ca suyodhanaṃ ca | kṛpaṃ drauṇiṃ kṛtavarmāṇameva | nihanmi duḥśāsanamadya pāpaṃ | saṃrakṣyatāmadya samastayodhāḥ

वहाँ उन्होंने कर्ण, सुयोधन, कृप, द्रोण-पुत्र और कृतवर्मा से कहा—“आज मैं इस पापी दुःशासन को मारता हूँ; सब योद्धा आज इसकी रक्षा करें।”

श्लोक 20 (8.87.20)

इत्येवमुक्त्वा सहसाभ्यधावन् । निहन्तुकामोऽतिबलस्तरस्वी । तथा तु विक्रम्य रणे वृकोदरो । महागजं केसरिणो यथैव । निगृह्य दुःशासनमेकवीरः । सुयोधनस्याधिरथेः समक्षम् ॥

ityevamuktvā sahasābhyadhāvan | nihantukāmo'tibalastarasvī | tathā tu vikramya raṇe vṛkodaro | mahāgajaṃ kesariṇo yathaiva | nigṛhya duḥśāsanamekavīraḥ | suyodhanasyādhiratheḥ samakṣam

यह कहकर वह अति बलशाली और वेगवान्, मारने को आतुर, सहसा झपट पड़ा। इस प्रकार रणभूमि में पराक्रम करके, सिंह जैसे बड़े हाथी को पकड़ता है वैसे ही, अकेले वीर वृकोदर ने सुयोधन और अधिरथ-पुत्र के देखते-देखते दुःशासन को पकड़ लिया।

श्लोक 21 (8.87.21)

असिं समुद्यम्य सितं सुधारं । कण्ठे पदाक्रम्य च वेपमानम् । उवाच तद्गौरिति यद्ब्रुवाणो । हृष्टोऽवदः कर्णसुयोधनाभ्याम् ॥

asiṃ samudyamya sitaṃ sudhāraṃ | kaṇṭhe padākramya ca vepamānam | uvāca tadgauriti yadbruvāṇo | hṛṣṭo'vadaḥ karṇasuyodhanābhyām

तीखी धार वाली चमकती तलवार उठाकर और काँपते हुए दुःशासन की गर्दन पर पैर रखकर उन्होंने कहा—“तूने कर्ण और सुयोधन के साथ हर्षित होकर जो कहा था, ‘गौ! गौ!’—”

भीम उवाच

श्लोक 22 (8.87.22)

ये राजसूयावभृथे पवित्रा । जाताः कचा याज्ञसेन्या दुरात्मन् । ते पाणिना कतरेणावकृष्टा- । स्तद्ब्रूहि त्वां पृच्छति भीमसेनः ॥

ye rājasūyāvabhṛthe pavitrā | jātāḥ kacā yājñasenyā durātman | te pāṇinā katareṇāvakṛṣṭā- | stadbrūhi tvāṃ pṛcchati bhīmasenaḥ

“हे दुरात्मन्! राजसूय के अवभृथ-स्नान में पवित्र हुए याज्ञसेनी के जो केश थे, वे किस हाथ से खींचे गए थे? यह बता; भीमसेन तुझसे पूछ रहा है।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (8.87.23)

उक्तस्तथाजौ स तदा सरोषं । जगाद भीमं परिवृत्तनेत्रः ॥

uktastathājau sa tadā saroṣaṃ | jagāda bhīmaṃ parivṛttanetraḥ

युद्ध में इस प्रकार कहे जाने पर उसने तब क्रोध से आँखें घुमाते हुए भीम से कहा—

दुःशासन उवाच

श्लोक 24 (8.87.24)

अयं करिकराकारः पीनस्तनविमर्दनः । गोसहस्रप्रदाता च क्षत्रियान्तकरः करः ॥

ayaṃ karikarākāraḥ pīnastanavimardanaḥ | gosahasrapradātā ca kṣatriyāntakaraḥ karaḥ

“यह हाथी की सूँड़-सा हाथ है, जो भरे स्तनों को मसलने वाला, हजार गौएँ दान करने वाला और क्षत्रियों का अन्त करने वाला है।”

श्लोक 25 (8.87.25)

अनेन याज्ञसेन्या मे भीम केशा विकर्षिताः । पश्यतां कुरुमुख्यानां युष्माकं च सभासदाम् ॥

anena yājñasenyā me bhīma keśā vikarṣitāḥ | paśyatāṃ kurumukhyānāṃ yuṣmākaṃ ca sabhāsadām

“हे भीम! इसी हाथ से कुरुओं के प्रधानों, तुम सब और सभासदों के देखते-देखते मैंने याज्ञसेनी के केश खींचे थे।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (8.87.26)

एवं त्वसौ राजसुतं निशम्य । ब्रुवन्तमाजौ विनिपीड्य वक्षः । भीमो बलात्तं प्रतिगृह्य दोर्भ्या- । मुच्चैर्ननादाथ समस्तयोधान् ॥

evaṃ tvasau rājasutaṃ niśamya | bruvantamājau vinipīḍya vakṣaḥ | bhīmo balāttaṃ pratigṛhya dorbhyā- | muccairnanādātha samastayodhān

राजकुमार को युद्ध में इस प्रकार बोलते सुनकर भीम ने उसकी छाती दबाई, उसे बलपूर्वक दोनों भुजाओं से पकड़ लिया और सब योद्धाओं को सुनाते हुए ऊँचे स्वर में गर्जना की।

श्लोक 27 (8.87.27)

उवाच यस्यास्ति बलं स रक्ष- । त्वसौ भवेदद्य निरस्तबाहुः । दुःशासनं जीवितं प्रोत्सृजन्त- । माक्षिप्य योधांस्तरसा महाबलः ॥

uvāca yasyāsti balaṃ sa rakṣa- | tvasau bhavedadya nirastabāhuḥ | duḥśāsanaṃ jīvitaṃ protsṛjanta- | mākṣipya yodhāṃstarasā mahābalaḥ

सब योद्धाओं को बलपूर्वक चुनौती देते हुए महाबली भीम ने कहा—“जिसमें बल है वह इसकी रक्षा करे! आज यह दुःशासन, जो प्राण छोड़ रहा है, भुजाहीन हो जाएगा!”

श्लोक 28 (8.87.28)

एवं क्रुद्धो भीमसेनः करेण । उत्पाटयामास भुजं महात्मा । दुःशासनं तेन स वीरमध्ये । जघान वज्राशनिसन्निभेन ॥

evaṃ kruddho bhīmasenaḥ kareṇa | utpāṭayāmāsa bhujaṃ mahātmā | duḥśāsanaṃ tena sa vīramadhye | jaghāna vajrāśanisannibhena

इस प्रकार क्रुद्ध महात्मा भीमसेन ने अपने हाथ से उसकी भुजा उखाड़ ली और वीरों के बीच उसी से वज्र के समान प्रहार करके दुःशासन को मार गिराया।

श्लोक 29 (8.87.29)

कण्ठे समाक्रम्य च वेपमानं । कृत्वा तु रूपं परमं सुघोरम् । कालान्तकाभ्यां सदृशं तदानीं । विदार्य वक्षश्च महारथस्य ॥

kaṇṭhe samākramya ca vepamānaṃ | kṛtvā tu rūpaṃ paramaṃ sughoram | kālāntakābhyāṃ sadṛśaṃ tadānīṃ | vidārya vakṣaśca mahārathasya

काँपते हुए उसकी गर्दन पर चढ़कर, काल और अन्तक के समान अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके उन्होंने तब उस महारथी की छाती चीर डाली,

श्लोक 30 (8.87.30)

दुःशासनस्य रिपुशासनस्य । उद्धृत्य वक्षः पतितस्य भूमौ । ततोऽपिबच्छोणितमस्य कोष्ण- । मास्वाद्य चास्वाद्य च वीक्षमाणः ॥

duḥśāsanasya ripuśāsanasya | uddhṛtya vakṣaḥ patitasya bhūmau | tato'pibacchoṇitamasya koṣṇa- | māsvādya cāsvādya ca vīkṣamāṇaḥ

और रिपुओं का शासन करने वाले उस दुःशासन की, जो भूमि पर पड़ा था, छाती उखाड़कर वे उसका गरम रक्त पीने लगे, बार-बार उसका स्वाद लेते हुए चारों ओर देखते रहे।

श्लोक 31 (8.87.31)

क्रुद्धः प्रहृष्टो निजगाद वाक्यं । स्तन्यस्य मातुः पयसोऽमृतस्य । माध्वीकजस्येव रसस्य तस्य । मधोश्च पानाद्यवकस्य पानात् ॥

kruddhaḥ prahṛṣṭo nijagāda vākyaṃ | stanyasya mātuḥ payaso'mṛtasya | mādhvīkajasyeva rasasya tasya | madhośca pānādyavakasya pānāt

क्रुद्ध और हर्षित होकर उन्होंने ये वचन कहे—“माता के दूध, अमृत-से मधुर दूध, मधु से बने रस, शहद या जौ के पेय के पीने से भी—

भीम उवाच

श्लोक 32 (8.87.32)

पयोदधिभ्यां मथिताच्च मुख्या- । त्तथेक्षुसारस्य मनोहरस्य । सर्वेभ्य एवाभ्यधिको रसोऽस्य । मतो ममाद्याहितलोहितस्य ॥

payodadhibhyāṃ mathitācca mukhyā- | ttathekṣusārasya manoharasya | sarvebhya evābhyadhiko raso'sya | mato mamādyāhitalohitasya

या मथे हुए दूध-दही के सर्वोत्तम सार से भी, या ईख के मनोहर रस से भी—मेरे विचार से आज मेरे इस शत्रु के रक्त का रस उन सबसे अधिक मधुर है।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 33 (8.87.33)

एवं ब्रुवाणं पुनरुत्थितं त- । मास्फोट्य वल्गन्तमतिप्रहृष्टम् । ये भीमसेनं ददृशुस्तदानीं । प्रायेण तेऽपि व्यथिता निपेतुः ॥

evaṃ bruvāṇaṃ punarutthitaṃ ta- | māsphoṭya valgantamatiprahṛṣṭam | ye bhīmasenaṃ dadṛśustadānīṃ | prāyeṇa te'pi vyathitā nipetuḥ

ऐसा कहते हुए, फिर उठकर ताल ठोंकते और अत्यन्त हर्ष से उछलते भीमसेन को जिन्होंने उस समय देखा, उनमें से प्रायः सभी भय से व्यथित होकर गिर पड़े।

श्लोक 34 (8.87.34)

ये चापि नासन्पतिता मनुष्या- । स्तेषां करेभ्यः पतितं तु शस्त्रम् । भयाच्च सञ्चुक्रुशुरस्वरैस्तदा । निमीलिताक्षा मुमुहुश्च तत्र ॥

ye cāpi nāsanpatitā manuṣyā- | steṣāṃ karebhyaḥ patitaṃ tu śastram | bhayācca sañcukruśurasvaraistadā | nimīlitākṣā mumuhuśca tatra

और जो मनुष्य गिरे नहीं थे, उनके हाथों से शस्त्र गिर पड़े; वे भय से डगमगाती आवाज़ में चीखने लगे, आँखें बन्द कर लीं और वहीं मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 35 (8.87.35)

ये तत्र भीमं रुधिरं पिबन्तं । दुःशासनस्य ददृशुः प्रपन्नाः । नायं मनुष्यस्त्विति भाषमाणाः । सर्वेऽपलायन्त भयाभिपन्नाः ॥

ye tatra bhīmaṃ rudhiraṃ pibantaṃ | duḥśāsanasya dadṛśuḥ prapannāḥ | nāyaṃ manuṣyastviti bhāṣamāṇāḥ | sarve'palāyanta bhayābhipannāḥ

वहाँ जिन्होंने भीम को दुःशासन का रक्त पीते देखा, वे सब भय से ग्रस्त होकर “यह मनुष्य नहीं है” कहते हुए भाग खड़े हुए।

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