कर्ण पर्व · अध्याय 88
भीम का उल्लास और नकुल-वृषसेन युद्ध
दुःशासन का रक्त पीने के बाद भीम मृत राजकुमार को ललकारता है, पाण्डवों पर बीती विपत्तियाँ याद करता है और अपने को घेरने वाले दुःशासन के नौ छोटे भाइयों को मार डालता है। कर्ण भय से ग्रस्त हो जाता है और शल्य उसे अर्जुन का सामना करने तथा दुर्योधन द्वारा सौंपा भार उठाने को कहते हैं। उधर कर्ण का पुत्र वृषसेन नकुल से भिड़ जाता है, उसके घोड़े मार देता है और उसकी तलवार काट डालता है; फिर पाण्डव-वीर और कौरव-रथी एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.88.1)
स पीत्वा रुधिरं तस्य चरणौ गृह्य भारत । इत्युच्चैर्वचनं प्राह प्रतिनृत्यन्वृकोदरः ॥
sa pītvā rudhiraṃ tasya caraṇau gṛhya bhārata | ityuccairvacanaṃ prāha pratinṛtyanvṛkodaraḥ
हे भारत! उसका रक्त पीकर और उसके चरण पकड़कर वृकोदर उसके सामने नाचते हुए ऊँचे स्वर में बोला —
भीमसेन उवाच
श्लोक 2 (8.88.2)
एष ते रुधिरं तीव्रं पिबामि पुरुषादवत् । वदेदानीं सुसंरब्धः पुनर्गौरिति गौरिति ॥
eṣa te rudhiraṃ tīvraṃ pibāmi puruṣādavat | vadedānīṃ susaṃrabdhaḥ punargauriti gauriti
"मैं नरभक्षी राक्षस की तरह तेरा भयंकर रक्त पी रहा हूँ। अब क्रोध में भरकर फिर कह — 'बैल-गाय! बैल-गाय!'
श्लोक 3 (8.88.3)
ये चास्मान्प्रतिनृत्यन्ति तदा गौरिति गौरिति । तान्वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ॥
ye cāsmānpratinṛtyanti tadā gauriti gauriti | tānvayaṃ pratinṛtyāmaḥ punargauriti gauriti
जो उस समय 'गौ! गौ!' कहकर हमारे सामने नाचे थे, उनके सामने हम भी बदले में नाचेंगे और फिर कहेंगे — 'गौ! गौ!'
श्लोक 4 (8.88.4)
प्रमाणकोट्यां शयने कालकूटकभोजनम् । दंशनं चाहिभिस्तीक्ष्णैर्दाहं जतुगृहे च यत् ॥
pramāṇakoṭyāṃ śayane kālakūṭakabhojanam | daṃśanaṃ cāhibhistīkṣṇairdāhaṃ jatugṛhe ca yat
प्रमाणकोटि में शय्या पर सोना, कालकूट विष का भोजन, तीखे दाँतों वाले सर्पों के डंक और लाक्षागृह में जलाया जाना —
श्लोक 5 (8.88.5)
द्यूते च दोषभूयस्त्वमरण्ये वसतिश्च या । इष्वस्त्राणि च सङ्ग्रामे अनिलानिलवेश्मसु ॥
dyūte ca doṣabhūyastvamaraṇye vasatiśca yā | iṣvastrāṇi ca saṅgrāme anilānilaveśmasu
जुए में हुए अनेक अन्याय, वन में हमारा निवास, युद्ध में बाणों और अस्त्रों की मार, और घरों में भी सहे गए कष्ट —
श्लोक 6 (8.88.6)
दुःखान्येवाभिजानीमो न सुखानि कदाचन । धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्यात्सपुत्रस्य वयं सदा ॥
duḥkhānyevābhijānīmo na sukhāni kadācana | dhṛtarāṣṭrasya daurātmyātsaputrasya vayaṃ sadā
पुत्रोंसहित धृतराष्ट्र की दुष्टता के कारण हमने सदा दुःख ही जाने हैं, सुख कभी नहीं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (8.88.7)
इत्युच्चैर्वचनं प्रोच्य जयं प्राप्य वृकोदरः । पुनरेव महाराज तव सैन्यमभिद्रवत् ॥
ityuccairvacanaṃ procya jayaṃ prāpya vṛkodaraḥ | punareva mahārāja tava sainyamabhidravat
हे महाराज! ये ऊँचे वचन कहकर और विजय पाकर वृकोदर फिर आपकी सेना पर टूट पड़ा।
श्लोक 8 (8.88.8)
रक्तार्द्रपाणिस्तु ततो महात्मा । गदापाणिः काल इवान्तकाले । विभीषयंस्तव पुत्रस्य सैन्यम् । इतस्ततो धावति वाहिनीं ते ॥
raktārdrapāṇistu tato mahātmā | gadāpāṇiḥ kāla ivāntakāle | vibhīṣayaṃstava putrasya sainyam | itastato dhāvati vāhinīṃ te
रक्त से भीगे हाथों वाला वह महात्मा, गदा हाथ में लिए, प्रलयकाल के काल के समान आपके पुत्र की सेना को भयभीत करता हुआ आपकी सेना में इधर-उधर दौड़ने लगा।
श्लोक 9 (8.88.9)
ततः क्षणाद्भारत शून्यमासीत् । आयोधनं घोरतरं कुरूणाम् । यत्राजिमध्ये प्रापिबद्भीमसेनो । दुःशासनस्य रुधिरं क्रोधदीप्तः ॥
tataḥ kṣaṇādbhārata śūnyamāsīt | āyodhanaṃ ghorataraṃ kurūṇām | yatrājimadhye prāpibadbhīmaseno | duḥśāsanasya rudhiraṃ krodhadīptaḥ
हे भारत! क्षण भर में कुरुओं का वह भयंकर रणक्षेत्र सूना हो गया, जहाँ युद्ध के बीच क्रोध से दहकते भीमसेन ने दुःशासन का रक्त पिया था।
श्लोक 10 (8.88.10)
स हत्वा समरे राजन्राजपुत्रं महाबलम् । पूर्णकामो मदोदग्रः सिंहो रुरुमिवोत्कटः ॥
sa hatvā samare rājanrājaputraṃ mahābalam | pūrṇakāmo madodagraḥ siṃho rurumivotkaṭaḥ
हे राजन्! उस महाबली राजकुमार को युद्ध में मारकर वह पूर्णकाम और मद से उमड़ा हुआ भीम, रुरु मृग को मारने वाले उग्र सिंह के समान दिखाई देता था।
श्लोक 11 (8.88.11)
रुधिरार्द्रो महाराज व्यशोभत परन्तपः । सपुष्पः किंशुक इव रक्तरक्ततरो बभौ ॥
rudhirārdro mahārāja vyaśobhata parantapaḥ | sapuṣpaḥ kiṃśuka iva raktaraktataro babhau
हे महाराज! रक्त से भीगा हुआ वह शत्रुतापन भीम फूले हुए पलाश के वृक्ष की तरह लाल से भी अधिक लाल होकर शोभित हो रहा था।
श्लोक 12 (8.88.12)
रुधिराक्तो घोरवेषः क्रुद्धो राजन्वचोऽब्रवीत् । ब्रूहीदानीं पापमते नृशंस पतितो ह्यसि ॥
rudhirākto ghoraveṣaḥ kruddho rājanvaco'bravīt | brūhīdānīṃ pāpamate nṛśaṃsa patito hyasi
हे राजन्! रक्त से लथपथ, भयंकर रूप वाला और क्रोध से भरा हुआ भीम बोला — "अब बोल, दुष्टबुद्धि, निर्दयी! तू गिर पड़ा है।
भीमसेन उवाच
श्लोक 13 (8.88.13)
दुःशासने यादृशं संश्रुतं नः । तदवाप्तं पाण्डवैः सर्वमेव । अत्रैवमाप्स्याम्यपरं द्वितीयं । दुर्योधनं यज्ञपशुं विशस्य ॥
duḥśāsane yādṛśaṃ saṃśrutaṃ naḥ | tadavāptaṃ pāṇḍavaiḥ sarvameva | atraivamāpsyāmyaparaṃ dvitīyaṃ | duryodhanaṃ yajñapaśuṃ viśasya
दुःशासन के विषय में हमने जो प्रतिज्ञा की थी, पाण्डवों ने वह सब पा लिया। इसी प्रकार मैं दूसरे को भी, यानी दुर्योधन को, यज्ञ-पशु की तरह काटकर पाऊँगा।
श्लोक 14 (8.88.14)
शिरो मृदित्वाऽस्य पुनश्च शान्तिं । यास्याम्यहं कौरवाणां समक्षम् । या साऽपतिः सा सपतिर्हि जाता । यास्ताः सपत्योऽपतयस्तु जाताः ॥
śiro mṛditvā'sya punaśca śāntiṃ | yāsyāmyahaṃ kauravāṇāṃ samakṣam | yā sā'patiḥ sā sapatirhi jātā | yāstāḥ sapatyo'patayastu jātāḥ
उसका सिर कुचलकर मैं कौरवों के देखते-देखते फिर शान्ति पाऊँगा। जो पतिहीन थी, वह अब पतिवाली हो गई है; और जो पतिवाली थीं, वे पतिहीन हो गई हैं।
श्लोक 15 (8.88.15)
पश्यन्तु चित्रं विविधं हि लोके । ये वै तिलाः षण्डतिला बभूवुः । ते चेत्संसिद्धा निधनं गताः परे । किं चित्ररूपं बत जीवलोके ॥
paśyantu citraṃ vividhaṃ hi loke | ye vai tilāḥ ṣaṇḍatilā babhūvuḥ | te cetsaṃsiddhā nidhanaṃ gatāḥ pare | kiṃ citrarūpaṃ bata jīvaloke
संसार की विचित्र बातें देख लें — जो तिल बाँझ तिल हो गए थे, यदि वे सफल हो गए और दूसरे मृत्यु को प्राप्त हुए, तो हाय, इस जीव-लोक में और कौन-सी बात विचित्र है!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (8.88.16)
एतावदुक्त्वा वचनं प्रहृष्टः । प्राक्रोशदुच्चै रुधिरार्द्रवक्त्रः । ननर्त चैवातिबलो महात्मा । वृत्रं निहत्येव सहस्रनेत्रः ॥
etāvaduktvā vacanaṃ prahṛṣṭaḥ | prākrośaduccai rudhirārdravaktraḥ | nanarta caivātibalo mahātmā | vṛtraṃ nihatyeva sahasranetraḥ
यह कहकर हर्ष से भरा, रक्त से भीगे मुख वाला वह अत्यन्त बलवान् महात्मा ऊँचे स्वर में गरजा और वृत्र को मारकर सहस्रनेत्र इन्द्र की तरह नाचने लगा।
श्लोक 17 (8.88.17)
दृष्ट्वा तु नृत्यन्तमुदग्रवीर्यं । कालं यथा त्वन्तकाले प्रजानाम् । महद्भयं चाधिरथिं विवेश । जये निराशाश्च सुतास्त्वदीयाः ॥
dṛṣṭvā tu nṛtyantamudagravīryaṃ | kālaṃ yathā tvantakāle prajānām | mahadbhayaṃ cādhirathiṃ viveśa | jaye nirāśāśca sutāstvadīyāḥ
प्राणियों के संहार के समय के काल की तरह उस प्रचण्ड पराक्रमी को नाचते देखकर अधिरथ-पुत्र कर्ण के मन में भारी भय समा गया और आपके पुत्र विजय की आशा खो बैठे।
श्लोक 18 (8.88.18)
दुःशासने तु निहते पुत्रास्तव महारथाः । महत्क्रोधविषं वीरा धारयन्तो महाबलाः । ते तु राजन्महावीर्या भीमं प्राच्छादयञ्छरैः ॥
duḥśāsane tu nihate putrāstava mahārathāḥ | mahatkrodhaviṣaṃ vīrā dhārayanto mahābalāḥ | te tu rājanmahāvīryā bhīmaṃ prācchādayañcharaiḥ
दुःशासन के मारे जाने पर आपके महारथी पुत्र, जो महान् क्रोध का विष धारण किए हुए महाबली वीर थे, हे राजन्, उन महापराक्रमियों ने भीम को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 19 (8.88.19)
निषङ्गी कवची खड्गी दण्डधारो धनुर्धरः । अलम्बुर्जलसन्धश्च वातवेगसुवर्चसौ ॥
niṣaṅgī kavacī khaḍgī daṇḍadhāro dhanurdharaḥ | alamburjalasandhaśca vātavegasuvarcasau
निषङ्गी, कवची, खड्गी, दण्डधार, धनुर्धर, अलम्बु, जलसन्ध तथा वातवेग और सुवर्चा —
श्लोक 20 (8.88.20)
एते समेत्य सहिता भ्रातृव्यसनकर्शिताः । भीमसेनं महाबाहुं पीडयामासुरञ्जसा ॥
ete sametya sahitā bhrātṛvyasanakarśitāḥ | bhīmasenaṃ mahābāhuṃ pīḍayāmāsurañjasā
भाई की मृत्यु के शोक से पीड़ित ये सब एक साथ आकर महाबाहु भीमसेन को तुरन्त बाणों से पीड़ित करने लगे।
श्लोक 21 (8.88.21)
स वध्यमानो विशिखैः समन्तात्तैर्महारथैः । भीमः क्रोधाभिरक्ताक्षः क्रुद्धः काल इवाबभौ ॥
sa vadhyamāno viśikhaiḥ samantāttairmahārathaiḥ | bhīmaḥ krodhābhiraktākṣaḥ kruddhaḥ kāla ivābabhau
उन महारथियों के बाणों से चारों ओर घिरा हुआ भीम, क्रोध से लाल आँखों वाला होकर, क्रुद्ध काल के समान दिखाई देने लगा।
श्लोक 22 (8.88.22)
ततः परिवृतो राजन्नवभिः शत्रुतापनैः । दुःशासनादवरजैः पुत्रैस्तव वृकोदरः ॥
tataḥ parivṛto rājannavabhiḥ śatrutāpanaiḥ | duḥśāsanādavarajaiḥ putraistava vṛkodaraḥ
हे राजन्! तब वृकोदर को दुःशासन के छोटे भाई, शत्रुओं को तपाने वाले आपके नौ पुत्रों ने घेर लिया।
श्लोक 23 (8.88.23)
तांस्तु भल्लैर्महावेगैर्नवभिर्नव भारत । रुक्माङ्गदान्रुक्मपुङ्खैः पार्थो निन्ये यमक्षयम् ॥
tāṃstu bhallairmahāvegairnavabhirnava bhārata | rukmāṅgadānrukmapuṅkhaiḥ pārtho ninye yamakṣayam
हे भारत! किन्तु पृथा-पुत्र भीम ने सोने के पंखों वाले नौ वेगवान् भल्लों से उन नौ स्वर्ण-भुजबन्ध वालों को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 24 (8.88.24)
हतेषु तव पुत्रेषु बलं तद्विप्रदुद्रुवे । पश्यतः सूतपुत्रस्य पाण्डवस्य भयार्दितम् ॥
hateṣu tava putreṣu balaṃ tadvipradudruve | paśyataḥ sūtaputrasya pāṇḍavasya bhayārditam
आपके पुत्रों के मारे जाने पर भय से पीड़ित वह सेना सूतपुत्र और पाण्डव (भीम) के देखते-देखते तितर-बितर होकर भाग चली।
श्लोक 25 (8.88.25)
ततः कर्णं महाराज प्रविवेश महद्भयम् । दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तमन्तकस्य प्रजास्विव ॥
tataḥ karṇaṃ mahārāja praviveśa mahadbhayam | dṛṣṭvā bhīmasya vikrāntamantakasya prajāsviva
हे महाराज! प्राणियों में मृत्यु के समान भीम का पराक्रम देखकर तब कर्ण के भीतर भी बड़ा भय समा गया।
श्लोक 26 (8.88.26)
तस्य त्वाकारभावज्ञः शल्यः समितिशोभनः । उवाच वचनं कर्णं प्राप्तकालं हितं तदा ॥
tasya tvākārabhāvajñaḥ śalyaḥ samitiśobhanaḥ | uvāca vacanaṃ karṇaṃ prāptakālaṃ hitaṃ tadā
तब कर्ण के हाव-भाव और मन की बात समझने वाले, युद्ध में शोभा पाने वाले शल्य ने उससे समयोचित और हितकर वचन कहे।
शल्य उवाच
श्लोक 27 (8.88.27)
एते द्रवन्ति राजानो भीमसेनभयार्दिताः । दुर्योधनश्च सम्मूढो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥
ete dravanti rājāno bhīmasenabhayārditāḥ | duryodhanaśca sammūḍho bhrātṛvyasanakarśitaḥ
"भीमसेन के भय से पीड़ित ये राजा भाग रहे हैं, और भाई की विपत्ति से दुःखी दुर्योधन भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है।
श्लोक 28 (8.88.28)
दुःशासनस्य रुधिरे पीयमाने महात्मना । व्यापन्नचेताः सहसा शोकोपहतचेतनः ॥
duḥśāsanasya rudhire pīyamāne mahātmanā | vyāpannacetāḥ sahasā śokopahatacetanaḥ
उस महात्मा द्वारा दुःशासन का रक्त पिए जाते समय वह सहसा अचेत-सा हो गया, उसकी चेतना शोक से मारी गई।
श्लोक 29 (8.88.29)
उपासते त्वामेते हि परिवार्य महारथाः । कृपप्रभृतयः कर्ण हतशेषाः सहोदराः ॥
upāsate tvāmete hi parivārya mahārathāḥ | kṛpaprabhṛtayaḥ karṇa hataśeṣāḥ sahodarāḥ
हे कर्ण! कृप आदि ये महारथी और बचे हुए भाई तुम्हें चारों ओर से घेरकर तुम्हारी सेवा में खड़े हैं।
श्लोक 30 (8.88.30)
पाण्डवा लब्धलक्षाश्च धनञ्जयपुरोगमाः । त्वामेवाभिमुखाः शूरा युद्धाय समुपस्थिताः ॥
pāṇḍavā labdhalakṣāśca dhanañjayapurogamāḥ | tvāmevābhimukhāḥ śūrā yuddhāya samupasthitāḥ
और अर्जुन को आगे किए हुए, निशाना साधने में सफल पाण्डव शूरवीर युद्ध के लिए तुम्हारे ही सामने डटे हुए हैं।
श्लोक 31 (8.88.31)
स त्वं पुरुषशार्दूल पौरुषे महति स्थितः । क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य प्रत्युद्याहि धनञ्जयम् ॥
sa tvaṃ puruṣaśārdūla pauruṣe mahati sthitaḥ | kṣatradharmaṃ puraskṛtya pratyudyāhi dhanañjayam
इसलिए हे पुरुषसिंह! अपने महान् पौरुष में स्थिर रहकर और क्षत्रिय-धर्म को आगे रखकर अर्जुन का सामना करो।
श्लोक 32 (8.88.32)
भारो हि धार्तराष्ट्रेण त्वयि सर्वः समाहितः । तमुद्वह महाबाहो यथाशक्ति यथाबलम् ॥
bhāro hi dhārtarāṣṭreṇa tvayi sarvaḥ samāhitaḥ | tamudvaha mahābāho yathāśakti yathābalam
धृतराष्ट्र-पुत्र ने सारा भार तुम पर ही डाल रखा है। हे महाबाहो! अपनी शक्ति और बल के अनुसार उसे उठाओ।
श्लोक 33 (8.88.33)
जये स्याद्विपुला कीर्तिर्ध्रुवः स्वर्गः पराजये । वृषसेनश्च राधेय सङ्क्रुद्धस्तनयस्तव । त्वयि मोहं समापन्ने पाण्डवानभिधावति ॥
jaye syādvipulā kīrtirdhruvaḥ svargaḥ parājaye | vṛṣasenaśca rādheya saṅkruddhastanayastava | tvayi mohaṃ samāpanne pāṇḍavānabhidhāvati
जीतने पर विशाल कीर्ति होगी और हारने पर निश्चित स्वर्ग। हे राधेय! और तुम्हारा पुत्र वृषसेन क्रोध में भरकर, तुम्हारे मोह में पड़े रहते, पाण्डवों पर दौड़ा जा रहा है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 34 (8.88.34)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं शल्यस्यामिततोजसः । हृदि मानुष्यकं भावं कृत्वा युद्धाय सुस्थिरम् ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ śalyasyāmitatojasaḥ | hṛdi mānuṣyakaṃ bhāvaṃ kṛtvā yuddhāya susthiram
अपार तेज वाले शल्य के ये वचन सुनकर, और युद्ध के लिए अपने मन में मानवोचित भाव को दृढ़ करके —
श्लोक 35 (8.88.35)
ततः क्रुद्धो वृषसेनोऽभ्यधावत् । भीमं समायान्तममित्रसाहम् । बाणैः किरन्तं प्रतियाति चोग्रं । व्यात्ताननं कालमिवापतन्तम् ॥
tataḥ kruddho vṛṣaseno'bhyadhāvat | bhīmaṃ samāyāntamamitrasāham | bāṇaiḥ kirantaṃ pratiyāti cograṃ | vyāttānanaṃ kālamivāpatantam
तब क्रुद्ध वृषसेन अपने शत्रुओं को सहने वाले भीम पर झपटा, जो बाण बरसाता हुआ उग्र रूप में, मुँह फैलाए काल की तरह टूटता हुआ आ रहा था; और वह उसके सामने जा पहुँचा।
श्लोक 36 (8.88.36)
तमभ्यधावन्नकुलः प्रवीरम् । आरादमित्रं प्रतुदन्पृषत्कैः । कर्णस्य पुत्रं समरे प्रहृष्टं । जिष्णुर्जिघांसुर्मघवेव जम्भम् ॥
tamabhyadhāvannakulaḥ pravīram | ārādamitraṃ pratudanpṛṣatkaiḥ | karṇasya putraṃ samare prahṛṣṭaṃ | jiṣṇurjighāṃsurmaghaveva jambham
वीरवर नकुल पास ही खड़े शत्रु पर बाण बरसाता हुआ, युद्ध में हर्ष से भरे कर्ण के पुत्र पर दौड़ा — जैसे जम्भ को मारने की इच्छा वाला विजयी इन्द्र उस पर दौड़ा था।
श्लोक 37 (8.88.37)
ततो ध्वजं स्फाटिकहेमचित्रं । चिच्छेद धैर्यान्नकुलः क्षुरेण । कर्णात्मजस्येष्वसनं च चित्रं । भल्लेन जाम्बूनदचित्रनद्धम् ॥
tato dhvajaṃ sphāṭikahemacitraṃ | ciccheda dhairyānnakulaḥ kṣureṇa | karṇātmajasyeṣvasanaṃ ca citraṃ | bhallena jāmbūnadacitranaddham
तब नकुल ने धैर्यपूर्वक क्षुर-बाण से उसका स्फटिक और सोने से चित्रित ध्वज काट डाला, और एक भल्ल से कर्ण-पुत्र का जाम्बूनद सोने से जड़ा सुन्दर धनुष भी काट दिया।
श्लोक 38 (8.88.38)
अथान्यदादाय धनुः स शीघ्रं । कर्णात्मजः पाण्डवमभ्यविध्यत् । दिव्यैरस्त्रैरभ्यवर्षत्तदैनं । कर्णस्य पुत्रो नकुलं कृतास्त्रम् ॥
athānyadādāya dhanuḥ sa śīghraṃ | karṇātmajaḥ pāṇḍavamabhyavidhyat | divyairastrairabhyavarṣattadainaṃ | karṇasya putro nakulaṃ kṛtāstram
तब कर्ण-पुत्र ने शीघ्र ही दूसरा धनुष लेकर पाण्डव नकुल को बींध दिया, और अस्त्र-विद्या में निपुण नकुल पर दिव्य अस्त्रों की वर्षा कर दी।
श्लोक 39 (8.88.39)
ततः क्रुद्धो नकुलः कर्णपुत्रं । शरैर्महोल्काभिरिवाभ्यपीडयत् । स कर्णपुत्रो नकुलस्य राजन् । सर्वानस्त्रान्वारयदुत्तमास्त्रैः ॥
tataḥ kruddho nakulaḥ karṇaputraṃ | śarairmaholkābhirivābhyapīḍayat | sa karṇaputro nakulasya rājan | sarvānastrānvārayaduttamāstraiḥ
तब क्रुद्ध नकुल ने महान् उल्काओं जैसे बाणों से कर्ण-पुत्र को पीड़ित किया; और हे राजन्! कर्ण-पुत्र ने उत्तम अस्त्रों से नकुल के सब अस्त्रों को रोक दिया।
श्लोक 40 (8.88.40)
आसीत्सुघोरं भरतप्रवीर । युद्धं तदा कर्णजपाण्डवाभ्याम् ॥
āsītsughoraṃ bharatapravīra | yuddhaṃ tadā karṇajapāṇḍavābhyām
हे भरतवंश के श्रेष्ठ वीर! तब कर्ण-पुत्र और पाण्डव के बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 41 (8.88.41)
वनायुजान्सुकुमारान्सुशुभ्रान् । अलङ्कृताञ्जातरूपेण चित्रान् । जघान चाश्वान्नकुलस्य वीरो । रणाजिरे सूतपुत्रस्य पुत्रः ॥
vanāyujānsukumārānsuśubhrān | alaṅkṛtāñjātarūpeṇa citrān | jaghāna cāśvānnakulasya vīro | raṇājire sūtaputrasya putraḥ
रणभूमि में सूतपुत्र के उस वीर पुत्र ने नकुल के घोड़ों को मार डाला, जो वन्य नस्ल के, सुकुमार, उज्ज्वल श्वेत, सोने से सजे और सुन्दर थे।
श्लोक 42 (8.88.42)
ततो हताश्वादवरुह्य यानात् । चर्माऽऽददे रुचिरं बर्हिचित्रम् । आकाशसङ्काशमसिं प्रगृह्य । प्रकाशमानः खगवच्चचार ॥
tato hatāśvādavaruhya yānāt | carmā''dade ruciraṃ barhicitram | ākāśasaṅkāśamasiṃ pragṛhya | prakāśamānaḥ khagavaccacāra
तब घोड़ों के मारे जाने पर नकुल रथ से उतर पड़ा; उसने मोर-पंखों से चित्रित सुन्दर ढाल ली और आकाश के समान चमकती तलवार हाथ में लेकर पक्षी की तरह दमकता हुआ विचरने लगा।
श्लोक 43 (8.88.43)
ततोऽस्य पक्षाननयद्यमाय । द्विसाहस्रान्नकुलः क्षिप्रकारी । ते प्रापतन्नसिना वै विशस्ता । यथाऽश्वमेधे पशवः शमित्रा ॥
tato'sya pakṣānanayadyamāya | dvisāhasrānnakulaḥ kṣiprakārī | te prāpatannasinā vai viśastā | yathā'śvamedhe paśavaḥ śamitrā
तब शीघ्रकारी नकुल ने उसके पक्ष के दो हज़ार योद्धाओं को यमलोक भेज दिया; तलवार से कटकर वे अश्वमेध में शमित्रों द्वारा मारे गए पशुओं की तरह गिर पड़े।
श्लोक 44 (8.88.44)
ततस्ततो विजिता युद्धशौण्डा । नानादेश्याः सुहृदः सत्यसन्धाः । एकेन शीघ्रं नकुलेन नुन्नाः । सारेप्सुनेवोत्तमचन्दनस्य ॥
tatastato vijitā yuddhaśauṇḍā | nānādeśyāḥ suhṛdaḥ satyasandhāḥ | ekena śīghraṃ nakulena nunnāḥ | sārepsunevottamacandanasya
इस प्रकार वहाँ-वहाँ युद्ध में निपुण, अनेक देशों के, सत्य-प्रतिज्ञ मित्र योद्धा अकेले नकुल के हाथों शीघ्र ही हार गए और खदेड़ दिए गए, जैसे सार चाहने वाला पुरुष उत्तम चन्दन के वृक्ष को काटता है।
श्लोक 45 (8.88.45)
भूमौ चरन्तं नकुलं रथौघाः । समन्ततः सायकैः प्रत्यगृह्णन् । स तुद्यमानो नकुलो विहङ्गैः । चचार सङ्ख्ये द्विषतो विनिघ्नन् ॥
bhūmau carantaṃ nakulaṃ rathaughāḥ | samantataḥ sāyakaiḥ pratyagṛhṇan | sa tudyamāno nakulo vihaṅgaiḥ | cacāra saṅkhye dviṣato vinighnan
भूमि पर घूमते हुए नकुल को रथों के झुंडों ने चारों ओर से बाणों से रोका; उन बाण-रूपी पक्षियों से पीड़ित होता हुआ भी वह युद्ध में शत्रुओं को मारता हुआ विचरता रहा।
श्लोक 46 (8.88.46)
तं कर्णपुत्रोऽपि चरन्तमाजौ । नराश्वमातङ्गरथप्रवीरान् । निघ्नन्तमष्टादशभिः पृषत्कैः । विव्याध वीरः स चुकोप विद्धः ॥
taṃ karṇaputro'pi carantamājau | narāśvamātaṅgarathapravīrān | nighnantamaṣṭādaśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | vivyādha vīraḥ sa cukopa viddhaḥ
रणभूमि में घूमकर पैदल, घोड़े, हाथी और रथी वीरों को मारते हुए नकुल को कर्ण-पुत्र ने भी अठारह बाणों से बींध दिया; बींधे जाने पर वह वीर क्रोध से भर उठा।
श्लोक 47 (8.88.47)
ततोऽभ्यधावत्समरे जिघांसुः । कर्णात्मजं पाण्डुसुतो नृवीरम् । तस्येषुभिर्व्यधमत्सूतपुत्रो । महारणे वर्म सहस्रभारम् ॥
tato'bhyadhāvatsamare jighāṃsuḥ | karṇātmajaṃ pāṇḍusuto nṛvīram | tasyeṣubhirvyadhamatsūtaputro | mahāraṇe varma sahasrabhāram
तब पाण्डु-पुत्र नकुल उस वीर कर्ण-पुत्र को मारने की इच्छा से उस पर झपटा; किन्तु उस महायुद्ध में सूतपुत्र के पुत्र ने अपने बाणों से उसका हज़ार भार वाला कवच तोड़ डाला।
श्लोक 48 (8.88.48)
तस्याथ कांस्यं सुशितं सुपीतम् । असिप्रवीरं गुरुभारसाहम् । द्विषच्छरीरापहरं सुघोरम् । आधून्वतः सर्पमिवात्तकोशम् ॥
tasyātha kāṃsyaṃ suśitaṃ supītam | asipravīraṃ gurubhārasāham | dviṣaccharīrāpaharaṃ sughoram | ādhūnvataḥ sarpamivāttakośam
जब वह अपनी तलवार घुमा रहा था — काँसे जैसी चमकती, खूब सान चढ़ी, पीली आभा वाली, तलवारों में श्रेष्ठ, भारी बोझ सहने वाली, शत्रु-शरीरों को हर लेने वाली, अत्यन्त भयंकर, केंचुली उतारे सर्प की तरह —
श्लोक 49 (8.88.49)
क्षिप्रं शरैः षड्भिरमित्रसाहः । चकर्त खड्गं निशितैः सुधारैः । पुनश्च पार्थं निशितैः पृषत्कैः । स्तनान्तरे क्षिप्रमिवात्यविध्यत् ॥
kṣipraṃ śaraiḥ ṣaḍbhiramitrasāhaḥ | cakarta khaḍgaṃ niśitaiḥ sudhāraiḥ | punaśca pārthaṃ niśitaiḥ pṛṣatkaiḥ | stanāntare kṣipramivātyavidhyat
शत्रुओं को सहने वाले वृषसेन ने छह तीखे, अच्छी धार वाले बाणों से उस तलवार को शीघ्र काट डाला, और फिर तीखे बाणों से पाण्डव को मानो फुर्ती से छाती के बीच बींध दिया।
श्लोक 50 (8.88.50)
स भीमसेनस्य रथं च गत्वा । ववर्ष वै शरवर्षं सुघोरम् ॥
sa bhīmasenasya rathaṃ ca gatvā | vavarṣa vai śaravarṣaṃ sughoram
तब वृषसेन भीमसेन के रथ के पास जाकर अत्यन्त भयंकर बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 51 (8.88.51)
नकुलमथ विदित्वा छिन्नबाणासनासिं । विरथमरिभिरार्तं कर्णपुत्रास्त्रमग्नम् । पवनचलपताका ह्लादिनो वल्गिताश्वाः । परपुरुषनियुक्ताः स्वै रथैः शीघ्रमीयुः ॥
nakulamatha viditvā chinnabāṇāsanāsiṃ | virathamaribhirārtaṃ karṇaputrāstramagnam | pavanacalapatākā hlādino valgitāśvāḥ | parapuruṣaniyuktāḥ svai rathaiḥ śīghramīyuḥ
नकुल को धनुष-तलवार कट जाने से रथहीन, शत्रुओं से पीड़ित और कर्ण-पुत्र के अस्त्रों से अभिभूत जानकर, वायु से लहराती पताकाओं वाले, गर्जते और उछलते घोड़ों वाले, शत्रु-योद्धाओं पर नियुक्त किए गए रथ अपने-अपने रथों के साथ शीघ्र वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 52 (8.88.52)
द्रुपदसुतवरिष्ठाः पञ्च शैनेयषष्ठा । द्रुपददुहितृपुत्राः पञ्च चामित्रसाहाः । द्विरदरथनराश्वान्सूदयन्तस्त्वदीयान् । भगवत इव रुद्राः सङ्ख्यया हेतिमन्तः ॥
drupadasutavariṣṭhāḥ pañca śaineyaṣaṣṭhā | drupadaduhitṛputrāḥ pañca cāmitrasāhāḥ | dviradarathanarāśvānsūdayantastvadīyān | bhagavata iva rudrāḥ saṅkhyayā hetimantaḥ
द्रुपद के पाँच श्रेष्ठ पुत्र, जिनमें शैनेय (सात्यकि) छठा था, और द्रुपद-पुत्री द्रौपदी के पाँच पुत्र — शत्रुओं को सहने वाले ये ग्यारह वीर हथियार उठाए, भगवान् रुद्र के रुद्रगणों की तरह आपके हाथी, रथ, पैदल और घोड़ों को काट रहे थे।
श्लोक 53 (8.88.53)
अथ तव रथमुख्यास्तान्प्रतीयुस्त्वरन्तः । कृपहृदिकसुतौ च द्रौणिदुर्योधनौ च । शकुनिशुकवृकाश्च क्राथदेवावृधौ च । द्विरदजलदघौषैः स्यन्दनैः कार्मुकैश्च ॥
atha tava rathamukhyāstānpratīyustvarantaḥ | kṛpahṛdikasutau ca drauṇiduryodhanau ca | śakuniśukavṛkāśca krāthadevāvṛdhau ca | dviradajaladaghauṣaiḥ syandanaiḥ kārmukaiśca
तब आपके प्रमुख रथी उनका सामना करने को शीघ्रता से बढ़े — कृप और हृदिक-पुत्र (कृतवर्मा), द्रोण-पुत्र और दुर्योधन, शकुनि, शुक और वृक, तथा क्राथ और देवावृध — हाथियों और बादलों की तरह गरजने वाले रथों और धनुषों के साथ।
श्लोक 54 (8.88.54)
अथ तव रथवर्यास्तान्दशैकप्रवीरान् । इषुभिरशनिकल्पैस्ताडयन्तो न्यरुन्धन् । नवजलदसवर्णैर्हस्तिभिस्तान्स्म वव्रुः । गिरिशिखरनिकाशैर्भीमवेगैः कुणिन्दाः ॥
atha tava rathavaryāstāndaśaikapravīrān | iṣubhiraśanikalpaistāḍayanto nyarundhan | navajaladasavarṇairhastibhistānsma vavruḥ | giriśikharanikāśairbhīmavegaiḥ kuṇindāḥ
तब आपके श्रेष्ठ रथियों ने वज्र जैसे बाणों से उन ग्यारह वीरों को पीटकर रोक लिया; और कुणिन्दों ने नए बादलों जैसे काले, पर्वत-शिखरों जैसे ऊँचे और भयंकर वेग वाले हाथियों से उन्हें घेर लिया।