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कर्ण पर्व · अध्याय 9

भीम द्वारा क्षेमधूर्ति का वध

सञ्जय दोनों सेनाओं की टक्कर का वर्णन करते हैं, जिसमें कटे सिरों और भुजाओं के ढेर लग जाते हैं और सेना का हर अंग दूसरे का संहार करता है। पाण्डव और उनके साथी आगे बढ़ते हैं; हाथी पर सवार भीम कौरव सेना के बीच घुस जाते हैं, जहाँ करूषों का राजा क्षेमधूर्ति भी हाथी पर चढ़कर उनसे भिड़ता है। तोमरों और बाणों के लम्बे आदान-प्रदान के बाद भीम का हाथी गिर जाता है; भीम कूदकर शत्रु के हाथी को गदा से कुचल देते हैं और तलवार लेकर दौड़ते क्षेमधूर्ति को मार गिराते हैं, और कौरव सेना भाग खड़ी होती है।

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.9.1)

ते सेनेऽन्योन्यमासाद्य प्रहृष्टाश्वनरद्विपे । बृहत्यौ सम्प्रजहाते देवासुरचमूसमे ॥

te sene'nyonyamāsādya prahṛṣṭāśvanaradvipe | bṛhatyau samprajahāte devāsuracamūsame

हर्ष से भरे हाथी, घोड़ों और मनुष्यों वाली वे दोनों विशाल सेनाएँ आपस में भिड़कर देवताओं और असुरों की सेनाओं के समान एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

श्लोक 2 (8.9.2)

ततो नानारथाश्वेभाः पत्तयश्चोग्रविक्रमाः । सम्प्रहारान्भृशं चक्रुर्देहपाप्मविनाशनान् ॥

tato nānārathāśvebhāḥ pattayaścogravikramāḥ | samprahārānbhṛśaṃ cakrurdehapāpmavināśanān

तब नाना प्रकार के रथों, घोड़ों और हाथियों पर सवार योद्धा तथा उग्र पराक्रमी पैदल सैनिक ऐसे भीषण संग्राम करने लगे जो देह के पाप को धो डालने वाले थे।

श्लोक 3 (8.9.3)

पूर्णचन्द्रार्कपद्मानां कान्तित्विड्गन्धतः समैः । उत्तमाङ्गैर्नृसिंहानां नृसिंहास्तस्तरुर्महीम् ॥

pūrṇacandrārkapadmānāṃ kāntitviḍgandhataḥ samaiḥ | uttamāṅgairnṛsiṃhānāṃ nṛsiṃhāstastarurmahīm

नरसिंह योद्धाओं ने दूसरे नरसिंहों के उन सिरों से धरती को पाट दिया, जो शोभा, तेज और सुगन्ध में पूर्णचन्द्र, सूर्य और कमल के समान थे।

श्लोक 4 (8.9.4)

अर्धचन्द्रैस्तथा भल्लैः क्षुरप्रैरसिपट्टसैः । परश्वथैश्चापहृतान्युत्तमाङ्गानि युध्यताम् ॥

ardhacandraistathā bhallaiḥ kṣuraprairasipaṭṭasaiḥ | paraśvathaiścāpahṛtānyuttamāṅgāni yudhyatām

अर्धचन्द्र, भल्ल और क्षुरप्र बाणों, तलवारों, पट्टसों और फरसों से लड़ते हुए योद्धाओं के सिर काट डाले गए।

श्लोक 5 (8.9.5)

व्यायतायतबाहूनां व्यायतायतबाहुभिः । वाहवः पातिता रेजुर्धरण्यां सायुधाङ्गदैः ॥

vyāyatāyatabāhūnāṃ vyāyatāyatabāhubhiḥ | vāhavaḥ pātitā rejurdharaṇyāṃ sāyudhāṅgadaiḥ

लम्बी और पुष्ट भुजाओं वाले वीरों की भुजाएँ, वैसी ही लम्बी-पुष्ट भुजाओं वाले वीरों द्वारा काटी जाकर, शस्त्रों और बाजूबन्दों सहित भूमि पर पड़ी चमक रही थीं।

श्लोक 6 (8.9.6)

तैः स्फुरद्भिर्मही भाति रक्ताङ्गुलितलैस्तथा । गरुडप्रहितैरुग्रैः पञ्चास्यैरुरगैरिव ॥

taiḥ sphuradbhirmahī bhāti raktāṅgulitalaistathā | garuḍaprahitairugraiḥ pañcāsyairuragairiva

रक्त से लाल अँगुलियों और हथेलियों वाली, फड़कती हुई उन भुजाओं से धरती ऐसी लगती थी मानो गरुड़ के गिराए हुए उग्र पाँच फनों वाले सर्पों से पट गई हो।

श्लोक 7 (8.9.7)

द्विरदस्यन्दनाश्वेभ्यः पेतुर्वीरा द्विषद्धताः । विमानेभ्यो यथा क्षीणे पुण्ये स्वर्गसदस्तथा ॥

dviradasyandanāśvebhyaḥ peturvīrā dviṣaddhatāḥ | vimānebhyo yathā kṣīṇe puṇye svargasadastathā

शत्रुओं के हाथों मारे गए वीर हाथियों, रथों और घोड़ों से वैसे ही गिरते थे, जैसे पुण्य क्षीण होने पर स्वर्गवासी अपने विमानों से गिरते हैं।

श्लोक 8 (8.9.8)

गदाभिरन्ये गुर्वीभिः परिधैर्मुसलैरपि । पोथिताः शतशः पेतुर्वीरा वीरतरै रणे ॥

gadābhiranye gurvībhiḥ paridhairmusalairapi | pothitāḥ śataśaḥ peturvīrā vīratarai raṇe

दूसरे बहुत-से वीर रणभूमि में अपने से भी बलवान वीरों के भारी गदाओं, परिघों और मूसलों की मार से कुचले जाकर सैकड़ों की संख्या में गिर पड़े।

श्लोक 9 (8.9.9)

रथा रथैर्विमथिता मत्ता मत्तैर्द्विपा द्विपैः । सादिनः सादिभिश्चैव तस्मिन्परमसङ्कुले ॥

rathā rathairvimathitā mattā mattairdvipā dvipaiḥ | sādinaḥ sādibhiścaiva tasminparamasaṅkule

उस अत्यन्त भयंकर घमासान में रथ रथों से चूर हुए, मतवाले हाथी हाथियों से और घुड़सवार घुड़सवारों से कुचले गए।

श्लोक 10 (8.9.10)

रथैर्नरा रथा नागैरश्वारोहाश्च पत्तिभिः । अश्वारोहैः पदाताश्च निहता युधि शेरते ॥

rathairnarā rathā nāgairaśvārohāśca pattibhiḥ | aśvārohaiḥ padātāśca nihatā yudhi śerate

रथों से मारे गए मनुष्य, हाथियों से मारे गए रथ, पैदलों से मारे गए घुड़सवार और घुड़सवारों से मारे गए पैदल सैनिक युद्धभूमि में मरे पड़े थे।

श्लोक 11 (8.9.11)

रथाश्वपत्तयो नागै रथाश्वेभाश्च पत्तिभिः । रथपत्तिद्विपाश्चाश्वै रथैश्चापि नरद्विपाः ॥

rathāśvapattayo nāgai rathāśvebhāśca pattibhiḥ | rathapattidvipāścāśvai rathaiścāpi naradvipāḥ

रथ, घोड़े और पैदल हाथियों के हाथों गिरे; रथ, घोड़े और हाथी पैदलों के हाथों; रथ, पैदल और हाथी घोड़ों के हाथों; और मनुष्य तथा हाथी रथों के हाथों।

श्लोक 12 (8.9.12)

रथाश्वेभनराणां तु नराश्वेभरथैः कृतम् । पाणिपादैश्च शस्त्रैश्च रथैश्च कदनं महत् ॥

rathāśvebhanarāṇāṃ tu narāśvebharathaiḥ kṛtam | pāṇipādaiśca śastraiśca rathaiśca kadanaṃ mahat

रथों, घोड़ों, हाथियों और मनुष्यों का भारी संहार मनुष्यों, घोड़ों, हाथियों और रथों ने किया — हाथों और पैरों से, शस्त्रों से और रथों से।

श्लोक 13 (8.9.13)

तथा तस्मिन्बले शूरैर्वध्यमाने हतेऽपि च । अस्मानभ्याययुः पार्था वृकोदरपुरोगमाः ॥

tathā tasminbale śūrairvadhyamāne hate'pi ca | asmānabhyāyayuḥ pārthā vṛkodarapurogamāḥ

इस प्रकार हमारी सेना के शूरवीरों के मारे जाते रहने पर, और बहुतों के गिर चुकने पर भी, भीमसेन को आगे करके पाण्डव हम पर चढ़ आए।

श्लोक 14 (8.9.14)

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः । सात्यकिश्चेकितानश्च द्राविडैः सैनिकैः सह ॥

dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca draupadeyāḥ prabhadrakāḥ | sātyakiścekitānaśca drāviḍaiḥ sainikaiḥ saha

धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि और चेकितान, द्रविड़ सैनिकों के साथ,

श्लोक 15 (8.9.15)

वृता व्यूहेन महता पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः । व्यूढोरस्का दीर्घभुजाः प्रांशवः पृथुलोचनाः ॥

vṛtā vyūhena mahatā pāṇḍyāścolāḥ sakeralāḥ | vyūḍhoraskā dīrghabhujāḥ prāṃśavaḥ pṛthulocanāḥ

पाण्ड्य, चोल और केरल योद्धाओं की विशाल व्यूह-रचना से घिरे हुए आए — चौड़ी छातियों, लम्बी भुजाओं, ऊँचे डील और बड़ी आँखों वाले,

श्लोक 16 (8.9.16)

आपीडिनो रक्तदन्ता मत्तमातङ्गविक्रमाः । नानाविरागवसाना गन्धचूर्णावचूर्णिताः ॥

āpīḍino raktadantā mattamātaṅgavikramāḥ | nānāvirāgavasānā gandhacūrṇāvacūrṇitāḥ

सिर पर मालाएँ पहने, लाल दाँतों वाले, मतवाले हाथियों जैसे पराक्रमी, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण किए और सुगन्धित चूर्ण से लिपटे हुए,

श्लोक 17 (8.9.17)

बद्धासयः पाशहस्ता वारणप्रतिवारणाः । समानमृत्यवो राजन्नात्यजन्त परस्परम् ॥

baddhāsayaḥ pāśahastā vāraṇaprativāraṇāḥ | samānamṛtyavo rājannātyajanta parasparam

कमर में तलवारें बाँधे, हाथों में फंदे लिए, हाथियों को रोक लेने में समर्थ, एक-सा मरण साझा करने वाले वे, हे राजन्, एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे।

श्लोक 18 (8.9.18)

कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकेशाः प्रियंवदाः । पत्तयः सायकैर्विद्धा घोररूपपराक्रमाः ॥

kalāpinaścāpahastā dīrghakeśāḥ priyaṃvadāḥ | pattayaḥ sāyakairviddhā ghorarūpaparākramāḥ

तूणीर धारण किए, हाथों में धनुष लिए, लम्बे केशों वाले, मधुर बोलने वाले और भयंकर रूप तथा पराक्रम वाले वे पैदल सैनिक बाणों से बिंध गए।

श्लोक 19 (8.9.19)

अथापरे पुनः शूराश्चेदिपाञ्चालकेकयाः । कारूषाः कोसलाः काश्याः मागधाश्चापि दुद्रुवुः ॥

athāpare punaḥ śūrāścedipāñcālakekayāḥ | kārūṣāḥ kosalāḥ kāśyāḥ māgadhāścāpi dudruvuḥ

इसी बीच दूसरे शूरवीर भी — चेदि, पाञ्चाल और केकय, करूष, कोसल, काशी और मगध के योद्धा — आगे दौड़ पड़े।

श्लोक 20 (8.9.20)

तेषां रथाश्वनागाश्च प्रवराश्चोग्रपत्तयः । नानाबाणरवैर्हृष्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥

teṣāṃ rathāśvanāgāśca pravarāścograpattayaḥ | nānābāṇaravairhṛṣṭā nṛtyanti ca hasanti ca

उनके रथ, घोड़े और हाथी तथा उनके श्रेष्ठ और उग्र पैदल सैनिक नाना प्रकार के बाणों की सनसनाहट से उल्लसित होकर नाच रहे थे और हँस रहे थे।

श्लोक 21 (8.9.21)

तस्य सैन्यस्य महतो महामात्रवरैर्वृतः । मध्ये वृकोदरोऽभ्यायात्त्वदीयान्नागधूर्गतः ॥

tasya sainyasya mahato mahāmātravarairvṛtaḥ | madhye vṛkodaro'bhyāyāttvadīyānnāgadhūrgataḥ

हाथी की गर्दन पर सवार, श्रेष्ठ महावतों से घिरे हुए वृकोदर उस विशाल सेना के बीच तुम्हारे सैनिकों पर चढ़ आए।

श्लोक 22 (8.9.22)

स नागप्रवरोऽत्युग्रो विधिवत्कल्पितो बभौ । उदयाग्राद्रिभवनं यथाऽभ्युदितभास्करम् ॥

sa nāgapravaro'tyugro vidhivatkalpito babhau | udayāgrādribhavanaṃ yathā'bhyuditabhāskaram

विधिपूर्वक सजाया हुआ वह विशालकाय, अत्यन्त उग्र गजराज ऐसा शोभित हुआ जैसे उदयाचल पर अभी-अभी सूर्य उगा हो।

श्लोक 23 (8.9.23)

तस्यायसं वर्मवरं वररत्नविभूषितम् । ताराव्याप्तस्य नभसः शारदस्य समं त्विषा ॥

tasyāyasaṃ varmavaraṃ vararatnavibhūṣitam | tārāvyāptasya nabhasaḥ śāradasya samaṃ tviṣā

श्रेष्ठ रत्नों से सजा उसका लोहे का उत्तम कवच तारों से भरे शरद् ऋतु के आकाश की भाँति चमक रहा था।

श्लोक 24 (8.9.24)

स तोमरव्यग्रकरश्चारुमौलिः स्वलङ्कृतः । शरन्मध्यन्दिनार्काभस्तेजसा प्रादहद्रिपून् ॥

sa tomaravyagrakaraścārumauliḥ svalaṅkṛtaḥ | śaranmadhyandinārkābhastejasā prādahadripūn

चंचल हाथ में तोमर उठाए, सुन्दर मुकुट और उत्तम आभूषणों से सजे हुए वे शरद् ऋतु के मध्याह्न-सूर्य के समान दमक रहे थे और अपने तेज से शत्रुओं को जला रहे थे।

श्लोक 25 (8.9.25)

तं दृष्ट्वा द्विरदं दूरात्क्षेमधूर्तिर्द्विपस्थितः । आह्वयन्नभिदुद्राव प्रहसन्पृतनामुखे ॥

taṃ dṛṣṭvā dviradaṃ dūrātkṣemadhūrtirdvipasthitaḥ | āhvayannabhidudrāva prahasanpṛtanāmukhe

उस हाथी को दूर से देखकर, स्वयं भी हाथी पर बैठा हुआ क्षेमधूर्ति अपनी सेना के अग्रभाग में हँसता हुआ ललकारता हुआ उस पर झपटा।

श्लोक 26 (8.9.26)

तयोः समभवद्युद्धं द्विपयोरुग्ररूपयोः । यदृच्छया द्रुतवतोर्महापर्वतयोरिव ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ dvipayorugrarūpayoḥ | yadṛcchayā drutavatormahāparvatayoriva

उन दोनों उग्र हाथियों में ऐसा युद्ध छिड़ गया मानो दो विशाल पर्वत अपनी इच्छा से एक-दूसरे पर दौड़ पड़े हों।

श्लोक 27 (8.9.27)

संसक्तनागौ तौ वीरौ तोमरैरितरेतरम् । बलवत्सूर्यरश्म्याभैर्भित्त्वाऽन्योन्यं विनेदतुः ॥

saṃsaktanāgau tau vīrau tomarairitaretaram | balavatsūryaraśmyābhairbhittvā'nyonyaṃ vinedatuḥ

हाथियों के आपस में भिड़े रहने पर वे दोनों वीर सूर्य की किरणों जैसे दमकते तोमरों से एक-दूसरे को बेधकर गरजते थे।

श्लोक 28 (8.9.28)

व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः । प्रगृह्य चोभौ धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ॥

vyapasṛtya tu nāgābhyāṃ maṇḍalāni viceratuḥ | pragṛhya cobhau dhanuṣī jaghnaturvai parasparam

अपने हाथियों को हटाकर वे मण्डल बाँधकर घूमने लगे और दोनों ने धनुष उठाकर एक-दूसरे पर प्रहार किया।

श्लोक 29 (8.9.29)

क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्बाणशब्दैस्तु सर्वतः । तौ जनं हर्षयन्तौ च सिंहनादं प्रचक्रतुः ॥

kṣveḍitāsphoṭitaravairbāṇaśabdaistu sarvataḥ | tau janaṃ harṣayantau ca siṃhanādaṃ pracakratuḥ

ललकारों और भुजाएँ ठोंकने की ध्वनियों तथा चारों ओर बाणों की सनसनाहट के बीच, देखने वालों को हर्षित करते हुए उन दोनों ने सिंहनाद किया।

श्लोक 30 (8.9.30)

समुद्यतकराभ्यां तौ द्विपाभ्यां कृतिनावुभौ । वातोद्वूतपताकाभ्यां युयुधाते महाबलौ ॥

samudyatakarābhyāṃ tau dvipābhyāṃ kṛtināvubhau | vātodvūtapatākābhyāṃ yuyudhāte mahābalau

दोनों कुशल और महाबली वीर, सूँड़ें उठाए और वायु में फहराती पताकाओं वाले हाथियों पर बैठे, युद्ध करते रहे।

श्लोक 31 (8.9.31)

तावन्योन्यस्य धनुषी छित्त्वाऽन्योन्यं विनेदतुः । शक्तितोमरवर्षेण प्रावृण्मेघाविवाम्बुभिः ॥

tāvanyonyasya dhanuṣī chittvā'nyonyaṃ vinedatuḥ | śaktitomaravarṣeṇa prāvṛṇmeghāvivāmbubhiḥ

एक-दूसरे का धनुष काटकर दोनों गरजे और शक्तियों तथा तोमरों की वर्षा से एक-दूसरे को ऐसे नहला दिया जैसे वर्षा ऋतु के दो बादल जल बरसाते हैं।

श्लोक 32 (8.9.32)

क्षेमधूर्तिस्तदा भीमं तोमरेण स्तनान्तरे । निर्बिभेदातिवेगेन षड्भिश्चाप्यपरैर्नदन् ॥

kṣemadhūrtistadā bhīmaṃ tomareṇa stanāntare | nirbibhedātivegena ṣaḍbhiścāpyaparairnadan

तब क्षेमधूर्ति ने गरजते हुए बड़े वेग से भीम की छाती में एक तोमर मारा और छह तोमर और मारे।

श्लोक 33 (8.9.33)

स भीमसेनः शुशुभे तोमरैरङ्गमाश्रितैः । क्रोधदीप्तवपुर्मेधैः सप्तसप्तिरिवांशमान् ॥

sa bhīmasenaḥ śuśubhe tomarairaṅgamāśritaiḥ | krodhadīptavapurmedhaiḥ saptasaptirivāṃśamān

शरीर में धँसे हुए तोमरों से भीमसेन, जिनका शरीर क्रोध से दहक रहा था, बादलों के बीच सात घोड़ों वाले सूर्य की भाँति शोभित हुए।

श्लोक 34 (8.9.34)

ततो भास्करवर्णाभमञ्जोगतिमयस्मयम् । ससर्ज तोमरं भीमः प्रत्यमित्राय यत्नवान् ॥

tato bhāskaravarṇābhamañjogatimayasmayam | sasarja tomaraṃ bhīmaḥ pratyamitrāya yatnavān

तब भीम ने यत्न के साथ शत्रु पर लोहे का एक सीधा उड़ने वाला तोमर चलाया, जो सूर्य के समान दीप्त था।

श्लोक 35 (8.9.35)

ततः करूषाधिपतिश्चापमानम्य सायकैः । दशभिस्तोमरं भित्त्वा षष्ट्या विव्याध पाण्डवम् ॥

tataḥ karūṣādhipatiścāpamānamya sāyakaiḥ | daśabhistomaraṃ bhittvā ṣaṣṭyā vivyādha pāṇḍavam

तब करूषों के स्वामी ने धनुष झुकाकर दस बाणों से उस तोमर को काट डाला और साठ बाणों से पाण्डव को बेध दिया।

श्लोक 36 (8.9.36)

अथ कार्मुकमादाय भीमो जलदनिः स्वनम् । रिपोरभ्यर्दयन्नागमुन्नदन्पाण्डवः शरैः ॥

atha kārmukamādāya bhīmo jaladaniḥ svanam | riporabhyardayannāgamunnadanpāṇḍavaḥ śaraiḥ

तब भीम ने मेघ की गर्जना जैसी टंकार वाला धनुष उठाया और गरजते हुए बाणों से शत्रु के हाथी को पीड़ित किया।

श्लोक 37 (8.9.37)

स शरौघार्दितो नागो भीमसेनेन संयुगे । गृह्यमाणोऽपि नातिष्ठद्वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥

sa śaraughārdito nāgo bhīmasenena saṃyuge | gṛhyamāṇo'pi nātiṣṭhadvātoddhūta ivāmbudaḥ

युद्ध में भीमसेन की बाण-वर्षा से पीड़ित वह हाथी, रोके जाने पर भी, वायु से उड़ाए हुए बादल की तरह टिक न सका।

श्लोक 38 (8.9.38)

तमभ्यधावद्द्विरदं भीमो भीमस्य नागराट् । महावातेरितं मेघं वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥

tamabhyadhāvaddviradaṃ bhīmo bhīmasya nāgarāṭ | mahāvāteritaṃ meghaṃ vātoddhūta ivāmbudaḥ

तब भीम का भयंकर गजराज उस हाथी पर ऐसे दौड़ा जैसे वायु से उड़ता बादल प्रचण्ड आँधी से चलाए गए बादल पर दौड़ता है।

श्लोक 39 (8.9.39)

सन्निवार्यात्मनो नागं क्षेमधूर्तिः प्रतापवान् । विव्याधाभिद्रुतं बाणैर्भीमसेनस्य कुञ्जरम् ॥

sannivāryātmano nāgaṃ kṣemadhūrtiḥ pratāpavān | vivyādhābhidrutaṃ bāṇairbhīmasenasya kuñjaram

प्रतापी क्षेमधूर्ति ने अपने हाथी को मोड़ा और टूटकर आते हुए भीमसेन को उनके हाथी सहित बाणों से बेध दिया।

श्लोक 40 (8.9.40)

ततः साधुविसृष्टेन क्षुरेणानतपर्वणा । छित्त्वा शरासनं शत्रोर्नागं चापि प्रमार्दयत् ॥

tataḥ sādhuvisṛṣṭena kṣureṇānataparvaṇā | chittvā śarāsanaṃ śatrornāgaṃ cāpi pramārdayat

तब भली-भाँति चलाए गए, झुकी गाँठ वाले क्षुर बाण से उसने शत्रु का धनुष काट दिया और हाथी को भी रौंद डाला।

श्लोक 41 (8.9.41)

ततः क्रुद्धो रणे भीमं क्षेमधूर्तिः पराभिनत् । जघान चास्य द्विरदं नाराचैः सर्वमर्मसु ॥

tataḥ kruddho raṇe bhīmaṃ kṣemadhūrtiḥ parābhinat | jaghāna cāsya dviradaṃ nārācaiḥ sarvamarmasu

तब क्रोध में भरे क्षेमधूर्ति ने रण में भीम को घायल किया और नाराच बाणों से उनके हाथी के सारे मर्मस्थानों को बेध डाला।

श्लोक 42 (8.9.42)

स पपात महानागो भीमसेनस्य भारत । पुरा नागस्य पतनादवप्लुत्य स्थितो महीम् ॥

sa papāta mahānāgo bhīmasenasya bhārata | purā nāgasya patanādavaplutya sthito mahīm

भीमसेन का वह विशाल हाथी गिर पड़ा, हे भारत; पर हाथी के गिरने से पहले ही भीम कूदकर भूमि पर खड़े हो चुके थे।

श्लोक 43 (8.9.43)

भीमसेनोऽपि तन्नागं गदया समपोथयत् । तस्मात्प्रमथितान्नागात्क्षेमधूर्तिरवप्लुतः ॥

bhīmaseno'pi tannāgaṃ gadayā samapothayat | tasmātpramathitānnāgātkṣemadhūrtiravaplutaḥ

भीमसेन ने भी शत्रु के उस हाथी को गदा से मार-मारकर कुचल डाला; और कुचले जाते हाथी से क्षेमधूर्ति कूद पड़ा।

श्लोक 44 (8.9.44)

उद्धृत्य खड्गं निशितमभ्यधावत्स पाण्डवम् । उद्यतायुधमायान्तं गदयाऽहन्वृकोदरः ॥

uddhṛtya khaḍgaṃ niśitamabhyadhāvatsa pāṇḍavam | udyatāyudhamāyāntaṃ gadayā'hanvṛkodaraḥ

तीखी तलवार खींचकर वह पाण्डव पर दौड़ा; और हथियार उठाए आते हुए उस पर वृकोदर ने गदा से प्रहार किया।

श्लोक 45 (8.9.45)

स पपात हतः सासिर्व्यसुस्तमभितो द्विपम् । वज्रप्रभग्नमचलं सिंहो वज्रहतो यथा ॥

sa papāta hataḥ sāsirvyasustamabhito dvipam | vajraprabhagnamacalaṃ siṃho vajrahato yathā

मारा गया वह तलवार हाथ में लिए प्राणहीन होकर हाथी के पास गिर पड़ा, जैसे वज्र से टूटे हुए पर्वत के पास वज्र से मारा हुआ सिंह पड़ा हो।

श्लोक 46 (8.9.46)

तं हतं नृपतिं दृष्ट्वा करूषाणां यशस्करम् । प्राद्रावद्व्यथिता सेना त्वदीया भरतर्षभ ॥

taṃ hataṃ nṛpatiṃ dṛṣṭvā karūṣāṇāṃ yaśaskaram | prādrāvadvyathitā senā tvadīyā bharatarṣabha

करूषों के यश को बढ़ाने वाले राजा को मारा गया देखकर, हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारी सेना व्याकुल होकर भाग खड़ी हुई।

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