कर्ण पर्व · अध्याय 8
कर्ण का मकरव्यूह और युधिष्ठिर का अर्धचन्द्रव्यूह
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि सेनापति बनने पर कर्ण ने क्या किया। सञ्जय बताते हैं कि रात के अन्तिम पहर में सेना को सजने की पुकार हुई, कर्ण ने निकलकर कौरव-सेना को मकरव्यूह में खड़ा किया और प्रत्येक नायक को उसका स्थान दिया; और युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि अब कर्ण ही एकमात्र महान् योद्धा बचा है, इसलिए पाण्डव-सेना की व्यूह-रचना करो। अर्जुन ने अर्धचन्द्रव्यूह बनाया, वाद्यों के घोष के बीच दोनों सेनाएँ आमने-सामने आईं और मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों तथा रथों का युद्ध आरम्भ हो गया।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.8.1)
सैनापत्यं तु सम्प्राप्य कर्णो वैकर्तनस्तदा । तथोक्तश्च स्वयं राज्ञा स्निग्धं भ्रातृसमं वचः ॥
saināpatyaṃ tu samprāpya karṇo vaikartanastadā | tathoktaśca svayaṃ rājñā snigdhaṃ bhrātṛsamaṃ vacaḥ
सेनापति का पद पाकर वैकर्तन कर्ण को, जब राजा ने स्वयं भाई के समान स्नेहभरे वचन कहे,
श्लोक 2 (8.8.2)
हितश्च प्रियकामश्च मम पुत्रस्य नित्यशः । अकरोत्किं महाप्राज्ञस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
hitaśca priyakāmaśca mama putrasya nityaśaḥ | akarotkiṃ mahāprājñastanmamācakṣva sañjaya
जो मेरे पुत्र का सदा हितैषी और प्रिय करने वाला है, उस महाबुद्धिमान् ने क्या किया? हे सञ्जय! वह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (8.8.3)
कर्णस्य मतमाज्ञाय पुत्रास्ते भरतर्षभ । योगमाज्ञापयामासुर्नन्दितूर्यपुरःसरम् ॥
karṇasya matamājñāya putrāste bharatarṣabha | yogamājñāpayāmāsurnanditūryapuraḥsaram
कर्ण का मत जानकर आपके पुत्रों ने आनन्द-वाद्यों को आगे करके सेना को सजने का आदेश दिया।
श्लोक 4 (8.8.4)
महत्यपररात्रे च तव सैन्यस्य मारिष । योगो योग इति ह्याशु प्रादुरासीन्महास्वनः ॥
mahatyapararātre ca tava sainyasya māriṣa | yogo yoga iti hyāśu prādurāsīnmahāsvanaḥ
हे स्वामी! रात के अन्तिम पहर के बहुत बीतने पर आपकी सेना में अचानक "तैयार हो जाओ! तैयार हो जाओ!" की भारी पुकार उठी।
श्लोक 5 (8.8.5)
कल्पतां नागमुख्यानां रथानां च वरूथिनाम् । सन्नह्यतां नराणां च वाजिनां च विशाम्पते ॥
kalpatāṃ nāgamukhyānāṃ rathānāṃ ca varūthinām | sannahyatāṃ narāṇāṃ ca vājināṃ ca viśāmpate
हे प्रजापति! प्रधान हाथियों के सजाए जाने, कवचधारी रथों के तैयार होने और मनुष्यों तथा घोड़ों के कवच पहनने का,
श्लोक 6 (8.8.6)
क्रोशतां चैव योधानां त्वरितानां परस्परम् । बभूव तुमुलः शब्दो दिवस्पृक्सुमहांस्ततः ॥
krośatāṃ caiva yodhānāṃ tvaritānāṃ parasparam | babhūva tumulaḥ śabdo divaspṛksumahāṃstataḥ
और जल्दी में एक-दूसरे को पुकारते योद्धाओं का, आकाश को छूता हुआ भारी कोलाहल हुआ।
श्लोक 7 (8.8.7)
ततः श्वेतपताकेन बलाकावर्णवाजिना । हेमपृष्ठेन धनुषा नागकक्षेण केतुना ॥
tataḥ śvetapatākena balākāvarṇavājinā | hemapṛṣṭhena dhanuṣā nāgakakṣeṇa ketunā
तब सूतपुत्र एक ऐसे रथ पर दिखाई दिया जिसकी पताका श्वेत थी, घोड़े बगुलों जैसे श्वेत थे, धनुष की पीठ सोने की थी और ध्वज पर हाथी की रस्सी का चिह्न था,
श्लोक 8 (8.8.8)
तूणीरशतपूर्णेन सगदेन वरूथिना । शतघ्नीकिङ्किणीशक्तिशूलतोमरधारिणा ॥
tūṇīraśatapūrṇena sagadena varūthinā | śataghnīkiṅkiṇīśaktiśūlatomaradhāriṇā
जिसमें सैकड़ों तरकस भरे थे, गदा थी, कवच था, और जो शतघ्नी, छोटी घण्टियाँ, शक्ति, त्रिशूल और तोमर धारण किए था,
श्लोक 9 (8.8.9)
कार्मुकैरुपपन्नेन विमलादित्यवर्चसा । रथेनाभिपताकेन सूतपुत्रो ह्यदृश्यत ॥
kārmukairupapannena vimalādityavarcasā | rathenābhipatākena sūtaputro hyadṛśyata
जिसमें धनुष सजे थे, जो निर्मल सूर्य के समान दीप्त था, और जिसकी पताका आगे की ओर लहरा रही थी।
श्लोक 10 (8.8.10)
ध्मापयन्वारिजं राजन्हेमजालविभूषितम् । विध्रुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ॥
dhmāpayanvārijaṃ rājanhemajālavibhūṣitam | vidhrunvāno mahaccāpaṃ kārtasvaravibhūṣitam
हे राजन्! उसने सोने की जाली से सजा हुआ शंख बजाया और सोने से अलंकृत अपने विशाल धनुष को हिलाया,
श्लोक 11 (8.8.11)
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं रथस्थं रथिनां वरम् । भानुमन्तमिवोद्यन्तं तमो घ्नन्तं दुरासदम् ॥
dṛṣṭvā karṇaṃ maheṣvāsaṃ rathasthaṃ rathināṃ varam | bhānumantamivodyantaṃ tamo ghnantaṃ durāsadam
और कौरवों ने रथ पर खड़े महान् धनुर्धर, रथियों में श्रेष्ठ कर्ण को उदित होते, अन्धकार का नाश करते दुर्धर्ष सूर्य के समान देखा।
श्लोक 12 (8.8.12)
न भीष्मव्यसनं केचिन्नापि द्रोणस्य मारिष । नान्येषां पुरुषव्याघ्र मेनिरे तत्र कौरवाः ॥
na bhīṣmavyasanaṃ kecinnāpi droṇasya māriṣa | nānyeṣāṃ puruṣavyāghra menire tatra kauravāḥ
तब हे स्वामी! वहाँ कौरवों को न भीष्म के संकट का ध्यान रहा, न द्रोण का, और हे पुरुषसिंह! न दूसरों का ही।
श्लोक 13 (8.8.13)
ततस्तु त्वरयन्योधाञ्शङ्खशब्देन मारिष । कर्णो निष्कर्षयामास कौरवाणां महद्बलम् ॥
tatastu tvarayanyodhāñśaṅkhaśabdena māriṣa | karṇo niṣkarṣayāmāsa kauravāṇāṃ mahadbalam
तब हे स्वामी! शंखनाद से योद्धाओं को प्रेरित करते हुए कर्ण ने कौरवों की विशाल सेना को आगे बढ़ाया।
श्लोक 14 (8.8.14)
व्यूहं व्यूह्य महेष्वासो मकरं शत्रुतापनः । प्रत्युद्ययौ तथा कर्णः पाण्डवान्विजिगीषया ॥
vyūhaṃ vyūhya maheṣvāso makaraṃ śatrutāpanaḥ | pratyudyayau tathā karṇaḥ pāṇḍavānvijigīṣayā
शत्रुओं को तपाने वाला वह महान् धनुर्धर कर्ण मकरव्यूह की रचना करके विजय की इच्छा से पाण्डवों के सामने चढ़ आया।
श्लोक 15 (8.8.15)
मकरस्य तु तुण्डे वै कर्णो राजन्व्यवस्थितः । नेत्राभ्यां शकुनिः शूर उलूकश्च महारथः ॥
makarasya tu tuṇḍe vai karṇo rājanvyavasthitaḥ | netrābhyāṃ śakuniḥ śūra ulūkaśca mahārathaḥ
हे राजन्! मकर के मुख पर कर्ण खड़ा था, दोनों नेत्रों पर शूर शकुनि और महारथी उलूक थे;
श्लोक 16 (8.8.16)
द्रोणपुत्रस्तु शिरसि ग्रीवायां सर्वसोदराः । मध्ये दुर्योधनो राजा बलेन महता वृतः ॥
droṇaputrastu śirasi grīvāyāṃ sarvasodarāḥ | madhye duryodhano rājā balena mahatā vṛtaḥ
सिर पर द्रोणपुत्र थे और गर्दन पर सब सहोदर भाई; मध्य में विशाल सेना से घिरा राजा दुर्योधन था।
श्लोक 17 (8.8.17)
वामपादे तु राजेन्द्र कृतवर्मा व्यवस्थितः । नारायणबलैर्युक्तो गोपालैर्युद्धदुर्मदैः ॥
vāmapāde tu rājendra kṛtavarmā vyavasthitaḥ | nārāyaṇabalairyukto gopālairyuddhadurmadaiḥ
हे राजेन्द्र! बायें पाँव पर कृतवर्मा खड़ा था, जिसके साथ नारायणी सेना के युद्ध-मदमत्त ग्वाले योद्धा थे।
श्लोक 18 (8.8.18)
पादे तु दक्षिणे राजन्गौतमः सत्यविक्रमः । त्रिगर्तैः सुमहेष्वासैर्दाक्षिणात्यैश्च संवृतः ॥
pāde tu dakṣiṇe rājangautamaḥ satyavikramaḥ | trigartaiḥ sumaheṣvāsairdākṣiṇātyaiśca saṃvṛtaḥ
हे राजन्! दाहिने पाँव पर सत्य पराक्रमी गौतम (कृपाचार्य) थे, जिन्हें महान् धनुर्धर त्रिगर्त और दक्षिण देश के योद्धा घेरे हुए थे।
श्लोक 19 (8.8.19)
अनुपादे तु यो वामस्तत्र शल्यो व्यवस्थितः । महत्या सेनया सार्धं मद्रदेशसमुत्थया ॥
anupāde tu yo vāmastatra śalyo vyavasthitaḥ | mahatyā senayā sārdhaṃ madradeśasamutthayā
और बायें पाँव के पिछले भाग में शल्य खड़ा था, उसके साथ मद्र देश से उठी हुई विशाल सेना थी।
श्लोक 20 (8.8.20)
दक्षिणे तु महाराज सुषेणः सत्यसङ्गरः । वृतो रथसहस्रेण दन्तिनां च त्रिभिः शतैः ॥
dakṣiṇe tu mahārāja suṣeṇaḥ satyasaṅgaraḥ | vṛto rathasahasreṇa dantināṃ ca tribhiḥ śataiḥ
हे महाराज! दाहिने पिछले पाँव पर सत्य-प्रतिज्ञ सुषेण था, जिसे एक हजार रथ और तीन सौ हाथी घेरे हुए थे।
श्लोक 21 (8.8.21)
पुच्छे ह्यास्तां महावीर्यौ भ्रातरौ पार्थिवौ तदा । चित्रश्च चित्रसेनश्च महत्या सेनया वृतौ ॥
pucche hyāstāṃ mahāvīryau bhrātarau pārthivau tadā | citraśca citrasenaśca mahatyā senayā vṛtau
पूँछ पर दो महापराक्रमी भाई राजा चित्र और चित्रसेन खड़े थे, जो विशाल सेना से घिरे थे।
श्लोक 22 (8.8.22)
तथा प्रयाते राजेन्द्र कर्णे नरवरोत्तमे । धनञ्जयमभिप्रेक्ष्य धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥
tathā prayāte rājendra karṇe naravarottame | dhanañjayamabhiprekṣya dharmarājo'bravīdidam
हे राजेन्द्र! जब नरश्रेष्ठ कर्ण इस प्रकार आगे बढ़ा, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने धनञ्जय की ओर देखकर यह कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 23 (8.8.23)
पश्य पार्थ यथा सेना धार्तराष्ट्रीह संयुगे । कर्णेन विहिता वीर गुप्ता वीरैर्महारथैः ॥
paśya pārtha yathā senā dhārtarāṣṭrīha saṃyuge | karṇena vihitā vīra guptā vīrairmahārathaiḥ
"देखो पार्थ! धृतराष्ट्र की यह सेना यहाँ युद्ध में कर्ण द्वारा कैसी व्यूहबद्ध की गई है, हे वीर! और वीर महारथियों से कैसी सुरक्षित है।
श्लोक 24 (8.8.24)
हतवीरतमा ह्येषा धार्तराष्ट्री महाचमूः । फल्गुशेषा महाबाहो तृणैस्तुल्या मता मम ॥
hatavīratamā hyeṣā dhārtarāṣṭrī mahācamūḥ | phalguśeṣā mahābāho tṛṇaistulyā matā mama
धृतराष्ट्र-पुत्र की यह विशाल सेना अपने श्रेष्ठतम वीरों को खो चुकी है; हे महाबाहु फाल्गुन! अब इसमें केवल निर्बल अंश बचा है, और मैं इसे तिनकों के समान मानता हूँ।
श्लोक 25 (8.8.25)
एको ह्यत्र महेष्वासः सूतपुत्रो विराजते । सदेवासुरगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः । चराचरैस्त्रिभिर्लोकैरजेयो यो महारथः ॥
eko hyatra maheṣvāsaḥ sūtaputro virājate | sadevāsuragandharvaiḥ sakinnaramahoragaiḥ | carācaraistribhirlokairajeyo yo mahārathaḥ
यहाँ केवल एक महान् धनुर्धर सूतपुत्र शोभित है, जो महारथी देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागों सहित, चर और अचर सहित तीनों लोकों से भी अजेय है।
श्लोक 26 (8.8.26)
तं हत्वाऽद्य महाबाहो विजयस्तव फल्गुन । उद्धृतश्च भवेच्छल्यो मम द्वादशवार्षिकः ॥
taṃ hatvā'dya mahābāho vijayastava phalguna | uddhṛtaśca bhavecchalyo mama dvādaśavārṣikaḥ
हे महाबाहु फाल्गुन! यदि आज तुम उसे मार दो, तो तुम्हारी विजय होगी और मेरे हृदय में बारह वर्षों से गड़ा हुआ काँटा निकल जाएगा।
श्लोक 27 (8.8.27)
एवं ज्ञात्वा महाबाहो व्यूहं व्यूह यथेच्छसि ॥
evaṃ jñātvā mahābāho vyūhaṃ vyūha yathecchasi
हे महाबाहु! यह जानकर तुम जैसा ठीक समझो वैसा व्यूह बनाओ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (8.8.28)
भ्रातुरेतद्वचः श्रुत्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः । अर्धचन्द्रेण व्यूहेन प्रत्यव्यूहत तां चमूम् ॥
bhrāturetadvacaḥ śrutvā pāṇḍavaḥ śvetavāhanaḥ | ardhacandreṇa vyūhena pratyavyūhata tāṃ camūm
भाई की यह बात सुनकर श्वेत घोड़ों वाले पाण्डव अर्जुन ने उस सेना के सामने अपनी सेना को अर्धचन्द्र व्यूह में खड़ा किया।
श्लोक 29 (8.8.29)
वामपार्श्वे तु तस्याथ भीमसेनो व्यवस्थितः । दक्षिणे च महेष्वासो धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ॥
vāmapārśve tu tasyātha bhīmaseno vyavasthitaḥ | dakṣiṇe ca maheṣvāso dhṛṣṭadyumno vyavasthitaḥ
उस व्यूह के बायें पार्श्व में भीमसेन खड़े हुए और दायें में महान् धनुर्धर धृष्टद्युम्न।
श्लोक 30 (8.8.30)
मध्ये व्यूहस्य राजा तु पाण्डवश्च धनञ्जयः । नकुलः सहदेवश्च धर्मराजस्य पृष्ठतः ॥
madhye vyūhasya rājā tu pāṇḍavaśca dhanañjayaḥ | nakulaḥ sahadevaśca dharmarājasya pṛṣṭhataḥ
व्यूह के बीच में राजा युधिष्ठिर और पाण्डव धनञ्जय थे; नकुल और सहदेव धर्मराज के पीछे थे।
श्लोक 31 (8.8.31)
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ । पार्थं न जहतुर्युद्धे पाल्यमानौ किरीटिना ॥
cakrarakṣau tu pāñcālyau yudhāmanyūttamaujasau | pārthaṃ na jahaturyuddhe pālyamānau kirīṭinā
दोनों पाञ्चाल वीर युधामन्यु और उत्तमौजा रथ के चक्रों की रक्षा करते थे; वे किरीटी अर्जुन से रक्षित होते हुए युद्ध में पार्थ का साथ नहीं छोड़ते थे।
श्लोक 32 (8.8.32)
शेषा नृपतयो वीराः स्थिता व्यूहस्य दंशिताः । यथाभागं यथोत्साहं यथायत्नं च भारत ॥
śeṣā nṛpatayo vīrāḥ sthitā vyūhasya daṃśitāḥ | yathābhāgaṃ yathotsāhaṃ yathāyatnaṃ ca bhārata
हे भारत! शेष वीर राजा कवच पहने हुए अपने-अपने भाग, उत्साह और प्रयत्न के अनुसार व्यूह में खड़े हुए।
श्लोक 33 (8.8.33)
एवमेतन्महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः । तावकाश्च महेष्वासा युद्धायैव मनो दधुः ॥
evametanmahāvyūhaṃ vyūhya bhārata pāṇḍavāḥ | tāvakāśca maheṣvāsā yuddhāyaiva mano dadhuḥ
हे भारत! इस प्रकार इस महान् व्यूह की रचना करके पाण्डवों और आपके पक्ष के महान् धनुर्धरों ने युद्ध में ही मन लगा दिया।
श्लोक 34 (8.8.34)
दृष्ट्वा व्यूढां तव चमूं सूतपुत्रेण संयुगे । निहतान्पाण्डवान्मेने धार्तराष्ट्रः सबान्धवः ॥
dṛṣṭvā vyūḍhāṃ tava camūṃ sūtaputreṇa saṃyuge | nihatānpāṇḍavānmene dhārtarāṣṭraḥ sabāndhavaḥ
सूतपुत्र द्वारा युद्ध में अपनी सेना को व्यूहबद्ध देखकर धृतराष्ट्र का पुत्र बन्धुओं सहित पाण्डवों को मरा हुआ ही मानने लगा।
श्लोक 35 (8.8.35)
तथैव पाण्डवीं सेनां व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । धार्तराष्ट्रान्हतान्मेने सकर्णान्वै जनाधिपः ॥
tathaiva pāṇḍavīṃ senāṃ vyūḍhāṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraḥ | dhārtarāṣṭrānhatānmene sakarṇānvai janādhipaḥ
उसी प्रकार पाण्डवों की सेना को व्यूहबद्ध देखकर राजा युधिष्ठिर ने कर्ण सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों को मरा हुआ ही माना।
श्लोक 36 (8.8.36)
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । डिण्डिमाश्चाप्यहन्यन्त झर्झराश्च समन्ततः ॥
tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ | ḍiṇḍimāścāpyahanyanta jharjharāśca samantataḥ
तब चारों ओर शंख, भेरियाँ, पणव, आनक, गोमुख, डिण्डिम और झर्झर बजने लगे।
श्लोक 37 (8.8.37)
सेनयोरुभयो राजन्प्रावाद्यन्त महास्वनाः । सिंहनादश्च सञ्जज्ञे शूराणां जयगृद्धिनाम् ॥
senayorubhayo rājanprāvādyanta mahāsvanāḥ | siṃhanādaśca sañjajñe śūrāṇāṃ jayagṛddhinām
हे राजन्! दोनों सेनाओं में गम्भीर घोष वाले वाद्य बजे और विजय के लोभी शूरों का सिंहनाद उठा।
श्लोक 38 (8.8.38)
हयहेषितशब्दाश्च वारणानां च बृंहिताः । रथनेमिस्वनाश्चोग्राः सम्बभूवुर्जनाधिप ॥
hayaheṣitaśabdāśca vāraṇānāṃ ca bṛṃhitāḥ | rathanemisvanāścogrāḥ sambabhūvurjanādhipa
हे जनाधिप! घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़ और रथ के पहियों की भयंकर घरघराहट गूँज उठी।
श्लोक 39 (8.8.39)
न द्रोणव्यसनं कश्चिज्जानीते तत्र भारत । दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं मुखे व्यूहस्य दंशितम् ॥
na droṇavyasanaṃ kaścijjānīte tatra bhārata | dṛṣṭvā karṇaṃ maheṣvāsaṃ mukhe vyūhasya daṃśitam
हे भारत! व्यूह के अग्रभाग में कवचधारी महान् धनुर्धर कर्ण को देखकर वहाँ किसी को द्रोण की मृत्यु का दुःख याद नहीं रहा।
श्लोक 40 (8.8.40)
उभे सैन्ये महाराज प्रहृष्टनरसङ्कुले । योद्धुकामे स्थिते राजन्हन्तुमन्योन्यमोजसा ॥
ubhe sainye mahārāja prahṛṣṭanarasaṅkule | yoddhukāme sthite rājanhantumanyonyamojasā
हे महाराज! हर्षित मनुष्यों से भरी दोनों सेनाएँ युद्ध की इच्छा से खड़ी थीं और पूरे बल से एक-दूसरे को मारना चाहती थीं।
श्लोक 41 (8.8.41)
विजये जातसंरम्भे दृष्ट्वाऽन्योन्यं व्यवस्थिते । अनीकमध्ये राजेन्द्र चेरतुः कर्णपाण्डवौ ॥
vijaye jātasaṃrambhe dṛṣṭvā'nyonyaṃ vyavasthite | anīkamadhye rājendra ceratuḥ karṇapāṇḍavau
विजय के लिए उत्तेजित दोनों पक्ष एक-दूसरे को देखते हुए डटे थे; हे राजेन्द्र! सेना के बीच कर्ण और पाण्डव अर्जुन विचर रहे थे।
श्लोक 42 (8.8.42)
नृत्यन्त्याविव ते सेने समेयातां परस्परम् । तयोः पक्षप्रपक्षेभ्यो निर्ययुर्युद्धलिप्सवः ॥
nṛtyantyāviva te sene sameyātāṃ parasparam | tayoḥ pakṣaprapakṣebhyo niryayuryuddhalipsavaḥ
नाचती हुई-सी वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरे से जा भिड़ीं, और उनके पक्षों और उपपक्षों से युद्ध की इच्छा वाले योद्धा निकल पड़े।
श्लोक 43 (8.8.43)
ततः प्रववृते युद्धं नरवारणवाजिनाम् । रथानां च महाराज अन्योन्यमभिनिघ्नताम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ naravāraṇavājinām | rathānāṃ ca mahārāja anyonyamabhinighnatām
हे महाराज! तब मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों और रथों का युद्ध छिड़ गया, जिसमें वे एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे थे।