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कर्ण पर्व · अध्याय 7

कर्ण का सेनापति-पद पर अभिषेक

द्रोण के वध के बाद सन्ध्या के समय कौरव-सेना लौटा ली जाती है, और दुर्योधन सभा में अपने सेनानायकों से पूछता है कि अब क्या करना चाहिए। अश्वत्थामा कर्ण को सेनापति बनाने का प्रस्ताव रखता है; प्रसन्न होकर दुर्योधन कर्ण से वह भार उठाने की प्रार्थना करता है जिसे भीष्म और द्रोण ने उठाया था। कर्ण स्वीकार करता है, राजा लोग शास्त्रोक्त विधि से उसका अभिषेक करते हैं, और बन्दी तथा ब्राह्मण उसकी जय-जयकार करते हुए उससे पाण्डवों के संहार की प्रार्थना करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.7.1)

हते द्रोणे महेष्वासे तस्मिन्नहनि भारत । कृते च मोघसंकल्पे द्रोणपुत्रे महारथे ॥

hate droṇe maheṣvāse tasminnahani bhārata | kṛte ca moghasaṃkalpe droṇaputre mahārathe

हे भरतवंशी! उस दिन जब महान् धनुर्धर द्रोण मारे गए और महारथी द्रोणपुत्र का संकल्प निष्फल हो गया,

श्लोक 2 (8.7.2)

द्रवमाणे महाराज कौरवाणां बलार्णवे । व्यूह्य पार्थः स्वकं सैन्यमतिष्ठद्भ्रातृभिर्वृतः ॥

dravamāṇe mahārāja kauravāṇāṃ balārṇave | vyūhya pārthaḥ svakaṃ sainyamatiṣṭhadbhrātṛbhirvṛtaḥ

हे महाराज! जब कौरवों की सेना का वह समुद्र भाग रहा था, तब पार्थ अपनी सेना की व्यूह-रचना करके भाइयों से घिरा हुआ खड़ा रहा।

श्लोक 3 (8.7.3)

तमवस्थितमाज्ञाय पुत्रस्ते भरतर्षभ । विद्रुतं स्वबलं दृष्ट्वा पौरुषेण न्यवारयत् ॥

tamavasthitamājñāya putraste bharatarṣabha | vidrutaṃ svabalaṃ dṛṣṭvā pauruṣeṇa nyavārayat

हे भरतश्रेष्ठ! उसे डटा हुआ जानकर और अपनी सेना को भागती देखकर आपके पुत्र ने अपने पौरुष से उसे रोक लिया।

श्लोक 4 (8.7.4)

स्वमनीकमवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः । युद्ध्वा च सुचिरं कालं पाण्डवैः सह भारत ॥

svamanīkamavasthāpya bāhuvīryamupāśritaḥ | yuddhvā ca suciraṃ kālaṃ pāṇḍavaiḥ saha bhārata

हे भारत! अपनी सेना को व्यवस्थित करके और अपनी भुजाओं के बल का आश्रय लेकर उसने पाण्डवों के साथ बहुत देर तक युद्ध किया।

श्लोक 5 (8.7.5)

लब्धलक्षैः परैर्हृष्टैर्व्यायच्छद्भिश्चिरं तदा । सन्ध्याकालं समासाद्य प्रत्याहारमकारयत् ॥

labdhalakṣaiḥ parairhṛṣṭairvyāyacchadbhiściraṃ tadā | sandhyākālaṃ samāsādya pratyāhāramakārayat

शत्रु अपना लक्ष्य पूरा करके हर्षित थे और बहुत देर से जूझ रहे थे; इसलिए सन्ध्या का समय आने पर उसने सेना को लौटा लिया।

श्लोक 6 (8.7.6)

निवेश्य बलवद्घोरं क्षुत्पिपासाबलैर्युतम् । श्रमेण महता युक्तं तथा द्रोणवधेन च ॥

niveśya balavadghoraṃ kṣutpipāsābalairyutam | śrameṇa mahatā yuktaṃ tathā droṇavadhena ca

उसने उस प्रबल और भयंकर सेना को शिविर में ठहराया, जो भूख-प्यास के कष्ट से दबी थी और भारी थकान तथा द्रोण के वध से शिथिल थी,

श्लोक 7 (8.7.7)

दीनरूपा रणे कर्म कृत्वा घोरं च शर्वरीम् । विशं प्राप्य सा सेना विश्रम्य मुदिताऽभवत् ॥

dīnarūpā raṇe karma kṛtvā ghoraṃ ca śarvarīm | viśaṃ prāpya sā senā viśramya muditā'bhavat

और रणभूमि में भयंकर कर्म करके तथा रात बिताकर दीन-दशा में पहुँची वह सेना अपने ठिकाने पर पहुँची, विश्राम करके फिर प्रसन्न हो गई।

श्लोक 8 (8.7.8)

कृत्वाऽवहारं सैन्यानां प्रविश्य शिबिरं स्वकम् । कुरवः सहिता मन्त्रं मन्त्रयाञ्चक्रिरे मिथः ॥

kṛtvā'vahāraṃ sainyānāṃ praviśya śibiraṃ svakam | kuravaḥ sahitā mantraṃ mantrayāñcakrire mithaḥ

सेनाओं को लौटाकर और अपने शिविर में प्रवेश करके कौरव एक साथ बैठे और आपस में मन्त्रणा करने लगे।

श्लोक 9 (8.7.9)

पर्यङ्केषु परार्ध्येषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु च । वरासनेषूपविष्टाः सुखशय्यास्विवामराः ॥

paryaṅkeṣu parārdhyeṣu spardhyāstaraṇavatsu ca | varāsaneṣūpaviṣṭāḥ sukhaśayyāsvivāmarāḥ

वे बहुमूल्य पलंगों पर, जिन पर सुन्दर बिछौने बिछे थे, और श्रेष्ठ आसनों पर बैठे थे, मानो सुखद शय्याओं पर देवता विराजमान हों।

श्लोक 10 (8.7.10)

ततो दुर्योधनो राजा साम्ना परमवल्गुना । तानाभाष्य महेष्वासान्प्राप्तकालमभाषत ॥

tato duryodhano rājā sāmnā paramavalgunā | tānābhāṣya maheṣvāsānprāptakālamabhāṣata

तब राजा दुर्योधन ने उन महान् धनुर्धरों को अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी से सम्बोधित करके वह बात कही जो इस समय उचित थी।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 11 (8.7.11)

मतं मतिमतां श्रेष्ठाः सर्वे प्रब्रूत मा चिरम् । एवङ्गतेन यत्कार्यं भवेत्कार्यतरं नृपाः ॥

mataṃ matimatāṃ śreṣṭhāḥ sarve prabrūta mā ciram | evaṅgatena yatkāryaṃ bhavetkāryataraṃ nṛpāḥ

"हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! आप सब बिना देर किए अपना मत बताइए। हे राजाओ! ऐसी स्थिति आ जाने पर अब सबसे आवश्यक कार्य क्या है?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (8.7.12)

एवमुक्ते नरेन्द्रेण नरसिंहा युयुत्सवः । चक्रुर्नानाविधाश्चेष्टाः सिंहासनगतास्तदा ॥

evamukte narendreṇa narasiṃhā yuyutsavaḥ | cakrurnānāvidhāśceṣṭāḥ siṃhāsanagatāstadā

राजा के ऐसा कहने पर सिंहासनों पर बैठे हुए वे नरसिंह, युद्ध की इच्छा से भरे हुए, तरह-तरह की चेष्टाएँ करने लगे।

श्लोक 13 (8.7.13)

तेषां निशाम्येङ्गितानि युद्धे प्राणाञ्जुहूषताम् । समुद्वीक्ष्य मुखं राज्ञो बालार्कसमवर्चसम् । आचार्यपुत्रो मेधावी वाक्यज्ञो वाक्यमाददे ॥

teṣāṃ niśāmyeṅgitāni yuddhe prāṇāñjuhūṣatām | samudvīkṣya mukhaṃ rājño bālārkasamavarcasam | ācāryaputro medhāvī vākyajño vākyamādade

युद्ध में प्राणों की आहुति देने को तैयार उन वीरों की चेष्टाओं को देखकर और बाल-सूर्य के समान दीप्त राजा के मुख को निहारकर, वाक्य के मर्मज्ञ बुद्धिमान आचार्यपुत्र ने बोलना आरम्भ किया।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 14 (8.7.14)

रागो योगस्तथा दाक्ष्यं नयश्चेत्यर्थसाधकाः । उपायाः पण्डितैः प्रोक्तास्ते तु दैवमुपाश्रिताः ॥

rāgo yogastathā dākṣyaṃ nayaścetyarthasādhakāḥ | upāyāḥ paṇḍitaiḥ proktāste tu daivamupāśritāḥ

"निष्ठा, अनुकूल साधन, कुशलता और नीति, ये चार कार्य सिद्ध करने के उपाय विद्वानों ने बताए हैं; किन्तु ये सब भाग्य पर ही आश्रित हैं।

श्लोक 15 (8.7.15)

लोकप्रवीरा येऽस्माकं देवकल्पा महारथाः । नीतिमन्तस्तथा युक्ता दक्षा रक्ताश्च ते हताः ॥

lokapravīrā ye'smākaṃ devakalpā mahārathāḥ | nītimantastathā yuktā dakṣā raktāśca te hatāḥ

हमारे जो संसार-प्रसिद्ध वीर, देवताओं के समान महारथी थे, नीतिमान्, संयमी, कुशल और अनुरक्त थे, वे मारे जा चुके हैं।

श्लोक 16 (8.7.16)

न त्वेव कार्यं नैराश्यमस्माभिर्विजयं प्रति । सुनीतैरिह सर्वार्थैर्दैवमप्यनुलोम्यते ॥

na tveva kāryaṃ nairāśyamasmābhirvijayaṃ prati | sunītairiha sarvārthairdaivamapyanulomyate

फिर भी हमें विजय के विषय में निराश नहीं होना चाहिए; सब साधनों का भली-भाँति प्रयोग किया जाए तो भाग्य भी अनुकूल बना लिया जाता है।

श्लोक 17 (8.7.17)

ते वयं प्रवरं नॄणां सर्वैर्योधगुणैर्युतम् । कर्णमेवाभिषेक्ष्यामः सैनापत्येन भारत ॥

te vayaṃ pravaraṃ nṝṇāṃ sarvairyodhaguṇairyutam | karṇamevābhiṣekṣyāmaḥ saināpatyena bhārata

इसलिए हे भारत! हम पुरुषों में श्रेष्ठ और योद्धा के सब गुणों से युक्त कर्ण को ही सेनापति के पद पर अभिषिक्त करेंगे;

श्लोक 18 (8.7.18)

कर्णं सेनापतिं कृत्वा प्रमथिष्यामहे रिपून् ॥

karṇaṃ senāpatiṃ kṛtvā pramathiṣyāmahe ripūn

कर्ण को सेनापति बनाकर हम शत्रुओं को कुचल डालेंगे।

श्लोक 19 (8.7.19)

एष ह्यतिबलः शूरः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । वैवस्वत इवासह्यः शक्तो जेतुं रणे रिपून् ॥

eṣa hyatibalaḥ śūraḥ kṛtāstro yuddhadurmadaḥ | vaivasvata ivāsahyaḥ śakto jetuṃ raṇe ripūn

क्योंकि वह अत्यन्त बलवान्, शूर, अस्त्रविद्या में निपुण, युद्ध के मद में चूर और यमराज के समान दुर्धर्ष है; वह रणभूमि में शत्रुओं को जीत सकता है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (8.7.20)

एतदाचार्यतनयाच्छ्रुत्वा राजंस्तवात्मजः । दुर्योधनो महाराज भृशं प्रीतमनास्तदा ॥

etadācāryatanayācchrutvā rājaṃstavātmajaḥ | duryodhano mahārāja bhṛśaṃ prītamanāstadā

हे राजन्! आचार्यपुत्र से यह सुनकर आपके पुत्र दुर्योधन का मन, हे महाराज, अत्यन्त प्रसन्न हो गया,

श्लोक 21 (8.7.21)

आशां बहुमतीं चक्रे कर्णं प्रति स वै तदा । हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ॥

āśāṃ bahumatīṃ cakre karṇaṃ prati sa vai tadā | hate bhīṣme ca droṇe ca karṇo jeṣyati pāṇḍavān

और उसने कर्ण के विषय में बड़ी आशा बाँध ली, कि भीष्म और द्रोण के मारे जाने पर कर्ण पाण्डवों को जीत लेगा।

श्लोक 22 (8.7.22)

तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत । ततो दुर्योधनः प्रीतः प्रियं श्रुत्वाऽस्य तद्वचः । प्रीतिसत्कारसंयुक्तं तथ्यमात्महितं शुभम् ॥

tāmāśāṃ hṛdaye kṛtvā samāśvasya ca bhārata | tato duryodhanaḥ prītaḥ priyaṃ śrutvā'sya tadvacaḥ | prītisatkārasaṃyuktaṃ tathyamātmahitaṃ śubham

हे भारत! उस आशा को हृदय में रखकर और आश्वस्त होकर दुर्योधन उसकी वह बात सुनकर प्रसन्न हुआ, जो स्नेह और आदर से भरी, सच्ची, शुभ और अपने हित की थी,

श्लोक 23 (8.7.23)

स्वं मनः समवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः ॥

svaṃ manaḥ samavasthāpya bāhuvīryamupāśritaḥ

अपने मन को स्थिर करके और अपनी भुजाओं के बल का सहारा लेकर

श्लोक 24 (8.7.24)

प्रियसत्कारसंयुक्तं तथ्यमात्महिते रतम् । दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ॥

priyasatkārasaṃyuktaṃ tathyamātmahite ratam | duryodhano mahārāja rādheyamidamabravīt

हे महाराज! उसने राधापुत्र कर्ण से ये बातें कहीं, जो स्नेह और आदर से भरी, सत्य और अपने हित में लगी हुई थीं।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 25 (8.7.25)

कर्ण जानामि ते वीर्यं सौहृदं परमं मयि । तथाऽपि त्वां महाबाहो प्रवक्ष्यामि हितं वचः ॥

karṇa jānāmi te vīryaṃ sauhṛdaṃ paramaṃ mayi | tathā'pi tvāṃ mahābāho pravakṣyāmi hitaṃ vacaḥ

"कर्ण! मैं तुम्हारा पराक्रम जानता हूँ और मेरे प्रति तुम्हारा परम सौहार्द भी। फिर भी, हे महाबाहु! मैं तुम्हें एक हित की बात कहूँगा।

श्लोक 26 (8.7.26)

श्रुत्वा यथेष्टं च कुरु वीर यत्तव रोचते । भवान्प्राज्ञतमो नित्यं मम चैव परा गतिः ॥

śrutvā yatheṣṭaṃ ca kuru vīra yattava rocate | bhavānprājñatamo nityaṃ mama caiva parā gatiḥ

हे वीर! उसे सुनकर जैसा तुम्हें अच्छा लगे वैसा करना; तुम सदा सबसे अधिक बुद्धिमान हो और मेरे परम आश्रय भी।

श्लोक 27 (8.7.27)

भीष्मद्रोणावतिरथौ हतौ सेनापती मम । सेनापतिर्भवानस्तु ताभ्यां द्रविणवत्तरः ॥

bhīṣmadroṇāvatirathau hatau senāpatī mama | senāpatirbhavānastu tābhyāṃ draviṇavattaraḥ

मेरे सेनापति वे दोनों अतिरथी भीष्म और द्रोण मारे जा चुके हैं। अब तुम सेनापति बनो, क्योंकि तुम उन दोनों से अधिक बलवान् हो।

श्लोक 28 (8.7.28)

वृद्धौ च तौ महेष्वासौ सापेक्षौ च धनञ्जये । मानितौ च मया वीरौ राधेय वचनात्तव ॥

vṛddhau ca tau maheṣvāsau sāpekṣau ca dhanañjaye | mānitau ca mayā vīrau rādheya vacanāttava

वे दोनों महान् धनुर्धर वृद्ध थे और अर्जुन के प्रति उनका पक्षपात भी था; फिर भी हे राधेय! तुम्हारे कहने पर मैंने उन दोनों वीरों का मान किया।

श्लोक 29 (8.7.29)

पितामहत्वं सम्प्रेक्ष्य पाण्डुपुत्रा महारणे । रक्षितास्तात भीष्मेण दिवसानि दशैव तु ॥

pitāmahatvaṃ samprekṣya pāṇḍuputrā mahāraṇe | rakṣitāstāta bhīṣmeṇa divasāni daśaiva tu

हे तात! पितामह होने का विचार करके भीष्म ने उस महायुद्ध में पाण्डवों की केवल दस दिन तक रक्षा की।

श्लोक 30 (8.7.30)

न्यस्तशस्त्रे तु भवति हतो भीष्मः पितामहः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य फल्गुनेन महाहवे ॥

nyastaśastre tu bhavati hato bhīṣmaḥ pitāmahaḥ | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya phalgunena mahāhave

जब पितामह भीष्म ने शस्त्र रख दिए, तब शिखण्डी को आगे करके अर्जुन ने उस महायुद्ध में उन्हें मार गिराया।

श्लोक 31 (8.7.31)

हते तस्मिन्महेष्वासे शरतल्पगते तथा । त्वयोक्ते पुरुषव्याघ्र द्रोणो ह्यासीत्पुरःसरः ॥

hate tasminmaheṣvāse śaratalpagate tathā | tvayokte puruṣavyāghra droṇo hyāsītpuraḥsaraḥ

जब वे महाधनुर्धर शरशय्या पर लेट गए, तब हे पुरुषसिंह! तुम्हारे कहने पर द्रोण हमारे अग्रणी हुए।

श्लोक 32 (8.7.32)

तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिति मे मतिः । स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ॥

tenāpi rakṣitāḥ pārthāḥ śiṣyatvāditi me matiḥ | sa cāpi nihato vṛddho dhṛṣṭadyumnena satvaram

मेरा विचार है कि उन्होंने भी शिष्य होने के कारण पाण्डवों की रक्षा की; और उन वृद्ध आचार्य को धृष्टद्युम्न ने शीघ्र ही मार डाला।

श्लोक 33 (8.7.33)

निहताभ्यां प्रधानाभ्यां ताभ्यामतुलविक्रम । त्वत्समं समरे योधं नान्यं पश्यामि चिन्तयन् ॥

nihatābhyāṃ pradhānābhyāṃ tābhyāmatulavikrama | tvatsamaṃ samare yodhaṃ nānyaṃ paśyāmi cintayan

हे अतुल पराक्रमी! उन दोनों प्रधान सेनापतियों के मारे जाने पर मैं सोचकर भी युद्ध में तुम्हारे समान दूसरा कोई योद्धा नहीं देखता।

श्लोक 34 (8.7.34)

भवानेव तु नः शक्तो विजयाय न संशयः । पूर्वं मध्ये च पश्चाच्च तथैव विहितं हितम् ॥

bhavāneva tu naḥ śakto vijayāya na saṃśayaḥ | pūrvaṃ madhye ca paścācca tathaiva vihitaṃ hitam

निःसन्देह तुम्हीं हमें विजय दिलाने में समर्थ हो; आरम्भ में, मध्य में और अन्त में भी वैसे ही हितकर उपाय तुम्हारे द्वारा किया गया है।

श्लोक 35 (8.7.35)

स भवान्धुर्यवत्सङ्ख्ये धुरमुद्वोढुमर्हति । अभिषेचय सैनान्ये स्वयमात्मानमात्मना ॥

sa bhavāndhuryavatsaṅkhye dhuramudvoḍhumarhati | abhiṣecaya sainānye svayamātmānamātmanā

इसलिए जैसे धुरी को ढोने वाला बैल जुए का भार उठाता है, वैसे ही तुम युद्ध में यह भार उठाने योग्य हो। स्वयं अपने आपको सेनापति-पद पर अभिषिक्त कराओ।

श्लोक 36 (8.7.36)

देवतानां यथा स्कन्दः सेनानीः प्रभुरव्ययः । तथा भवानिमां सेनां धार्तराष्ट्रीं बिभर्तु वै ॥

devatānāṃ yathā skandaḥ senānīḥ prabhuravyayaḥ | tathā bhavānimāṃ senāṃ dhārtarāṣṭrīṃ bibhartu vai

जैसे देवताओं के अविनाशी प्रभु सेनानायक स्कन्द हैं, वैसे ही तुम धृतराष्ट्र के पुत्रों की इस सेना को सँभालो।

श्लोक 37 (8.7.37)

जहि शत्रुगणान्सर्वान्महेन्द्रो दानवानिव । अवस्थितं रणे दृष्ट्वा पाण्डवास्त्वां महारथाः । द्रविष्यन्ति च पाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः ॥

jahi śatrugaṇānsarvānmahendro dānavāniva | avasthitaṃ raṇe dṛṣṭvā pāṇḍavāstvāṃ mahārathāḥ | draviṣyanti ca pāñcālā viṣṇuṃ dṛṣṭveva dānavāḥ

जैसे महेन्द्र दानवों को मारता है, वैसे ही तुम शत्रुओं के सब दलों को मार डालो। तुम्हें रणभूमि में डटा देखकर महारथी पाण्डव और पाञ्चाल वैसे ही भाग खड़े होंगे जैसे विष्णु को देखकर दानव भागते हैं।

श्लोक 38 (8.7.38)

तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षैतां महाचमूम् ॥

tasmāttvaṃ puruṣavyāghra prakarṣaitāṃ mahācamūm

इसलिए हे पुरुषसिंह! इस विशाल सेना को आगे बढ़ाओ।

श्लोक 39 (8.7.39)

भवत्यवस्थिते यत्ते पाण्डवा मन्दचेतसः । द्रविष्यन्ति सहामात्याः पाञ्चालाः सृञ्जयाश्च ह ॥

bhavatyavasthite yatte pāṇḍavā mandacetasaḥ | draviṣyanti sahāmātyāḥ pāñcālāḥ sṛñjayāśca ha

तुम्हारे डटे रहने पर मन्दबुद्धि पाण्डव अपने मन्त्रियों, पाञ्चालों और सृञ्जयों सहित भाग खड़े होंगे।

श्लोक 40 (8.7.40)

यथा ह्यभ्युदितः सूर्यः प्रतपन्स्वेन तेजसा । व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून्प्रतापय ॥

yathā hyabhyuditaḥ sūryaḥ pratapansvena tejasā | vyapohati tamastīvraṃ tathā śatrūnpratāpaya

जैसे उदित सूर्य अपने तेज से तपता हुआ घने अन्धकार को दूर कर देता है, वैसे ही तुम शत्रुओं को तपाओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 41 (8.7.41)

एवमुक्तस्तु राधेयो राज्ञा दुर्योधनेन ह । राज्ञां मध्ये महाबाहुः प्रीतात्मा स महाबलः । हर्षयन्नब्रवीत्कर्णो दुर्योधनमिदं वचः ॥

evamuktastu rādheyo rājñā duryodhanena ha | rājñāṃ madhye mahābāhuḥ prītātmā sa mahābalaḥ | harṣayannabravītkarṇo duryodhanamidaṃ vacaḥ

राजा दुर्योधन के ऐसा कहने पर महाबाहु, महाबली राधापुत्र कर्ण ने प्रसन्न मन से राजाओं के बीच दुर्योधन को हर्षित करते हुए यह वचन कहा।

कर्ण उवाच

श्लोक 42 (8.7.42)

उक्तमेतन्मया पूर्वं गान्धारे तव सन्निधौ । जेष्यामि पाण्डवान्सर्वान्सपुत्रान्सजनार्दनान् ॥

uktametanmayā pūrvaṃ gāndhāre tava sannidhau | jeṣyāmi pāṇḍavānsarvānsaputrānsajanārdanān

"हे गान्धारीपुत्र! मैं पहले तुम्हारे सामने यह कह चुका हूँ कि मैं पुत्रों और जनार्दन सहित सब पाण्डवों को जीत लूँगा।

श्लोक 43 (8.7.43)

सेनापतिर्भविष्यामि तवाहं नात्र संशयः । स्थिरो भव महाराज जितान्विद्धि च पाण्डवान् ॥

senāpatirbhaviṣyāmi tavāhaṃ nātra saṃśayaḥ | sthiro bhava mahārāja jitānviddhi ca pāṇḍavān

मैं तुम्हारा सेनापति बनूँगा, इसमें सन्देह नहीं। हे महाराज! धीरज रखो और पाण्डवों को जीता हुआ ही समझो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 44 (8.7.44)

एवमुक्तो महाराज ततो दुर्योधनो नृपः । उत्तस्थौ राजभिः सार्धं देवैरिव शतक्रतुः ॥

evamukto mahārāja tato duryodhano nṛpaḥ | uttasthau rājabhiḥ sārdhaṃ devairiva śatakratuḥ

हे महाराज! ऐसा कहे जाने पर राजा दुर्योधन अन्य राजाओं के साथ उठ खड़ा हुआ, जैसे देवताओं के साथ इन्द्र उठता है,

श्लोक 45 (8.7.45)

सैनापत्येन सत्कर्तुं कर्णं स्कन्दमिवामराः । ततोऽभिषिषिचुः कर्णं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

saināpatyena satkartuṃ karṇaṃ skandamivāmarāḥ | tato'bhiṣiṣicuḥ karṇaṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā

कर्ण को सेनापतित्व से सम्मानित करने के लिए, जैसे देवताओं ने स्कन्द को किया था; तब उन्होंने शास्त्र में बताई विधि से कर्ण का अभिषेक किया।

श्लोक 46 (8.7.46)

दुर्योधनमुखा राजन्राजानो विजयैषिणः । शातकुम्भमयैः कुम्भैर्माहेयैश्चाभिमन्त्रितैः ॥

duryodhanamukhā rājanrājāno vijayaiṣiṇaḥ | śātakumbhamayaiḥ kumbhairmāheyaiścābhimantritaiḥ

हे राजन्! दुर्योधन को आगे करके विजय चाहने वाले राजाओं ने मन्त्रों से अभिमन्त्रित सोने के और मिट्टी के कलशों से,

श्लोक 47 (8.7.47)

तोयपूर्णैर्विषाणैश्च द्विपखड्गमहर्षभैः । मणिमुक्तायुतैश्चान्यैः पुण्यगन्धैस्तथौषधैः ॥

toyapūrṇairviṣāṇaiśca dvipakhaḍgamaharṣabhaiḥ | maṇimuktāyutaiścānyaiḥ puṇyagandhaistathauṣadhaiḥ

जल से भरे पात्रों से, हाथी-दाँत तथा गैंडे और महान् वृषभों के सींगों के बने पात्रों से, मणियों और मोतियों से जड़े अन्य पात्रों से और पवित्र सुगन्ध वाली ओषधियों से,

श्लोक 48 (8.7.48)

औदुम्बरे सुखासीनमासने क्षौमसंवृते । शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्भारैश्च सुसम्भृतैः ॥

audumbare sukhāsīnamāsane kṣaumasaṃvṛte | śāstradṛṣṭena vidhinā sambhāraiśca susambhṛtaiḥ

जब वह रेशमी वस्त्र से ढके गूलर की लकड़ी के आसन पर सुखपूर्वक बैठा था, तब शास्त्र में देखी गई विधि से, भली-भाँति जुटाई गई सामग्रियों के साथ।

श्लोक 49 (8.7.49)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च सम्मताः । तुष्टुवुस्तं महात्मानमभिषिक्तं वरासने ॥

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāstathā śūdrāśca sammatāḥ | tuṣṭuvustaṃ mahātmānamabhiṣiktaṃ varāsane

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सबने सहमत होकर श्रेष्ठ आसन पर अभिषिक्त बैठे उस महात्मा की स्तुति की।

श्लोक 50 (8.7.50)

ततोऽभिषिक्ते राजेन्द्र निष्कैर्गोभिर्धनेन च । वाचयामास विप्राग्र्यान्राधेयः परवीरहा ॥

tato'bhiṣikte rājendra niṣkairgobhirdhanena ca | vācayāmāsa viprāgryānrādheyaḥ paravīrahā

हे राजेन्द्र! अभिषेक के बाद शत्रुवीरों का संहार करने वाले राधापुत्र ने स्वर्ण-मुद्राएँ, गौएँ और धन देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया।

श्लोक 51 (8.7.51)

स व्यरोचत राधेयः सूतमागधबन्दिभिः । स्तूयमानो यथा भानुरुदये ब्रह्मवादिभिः ॥

sa vyarocata rādheyaḥ sūtamāgadhabandibhiḥ | stūyamāno yathā bhānurudaye brahmavādibhiḥ

सूतों, मागधों और बन्दियों से स्तुति पाता हुआ राधापुत्र वैसे ही शोभित हुआ, जैसे उदय होते समय ब्रह्मवादियों से स्तुत सूर्य शोभित होता है।

श्लोक 52 (8.7.52)

ततः पुण्याहघोषेण वादित्रनिनदेन च । जयशब्देन शूराणां तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥

tataḥ puṇyāhaghoṣeṇa vāditraninadena ca | jayaśabdena śūrāṇāṃ tumulaḥ sarvato'bhavat

तब पुण्याह के घोष, वाद्यों की ध्वनि और शूरों के जयनाद से चारों ओर भारी कोलाहल मच गया।

श्लोक 53 (8.7.53)

जयेत्यूचुर्नृपाः सर्वे राधेयं तत्र सङ्गताः ॥

jayetyūcurnṛpāḥ sarve rādheyaṃ tatra saṅgatāḥ

वहाँ एकत्र हुए सब राजाओं ने राधापुत्र के लिए "जय हो!" कहकर जयघोष किया।

श्लोक 54 (8.7.54)

जय पार्थान्सगोविन्दान्सानुगांस्तान्महामृधे । इति तं बन्दिनः प्राहुर्द्विजाश्च पुरुषर्षभम् ॥

jaya pārthānsagovindānsānugāṃstānmahāmṛdhe | iti taṃ bandinaḥ prāhurdvijāśca puruṣarṣabham

"महायुद्ध में गोविन्द और अनुयायियों सहित उन पार्थों को जीत लो!" इस प्रकार बन्दियों और ब्राह्मणों ने उन पुरुषश्रेष्ठ से कहा।

बन्दिनो द्विजाश्चोचुः

श्लोक 55 (8.7.55)

जहि पार्थान्सपाञ्चालान्राधेय विजयाय नः । उद्यन्निव सदा भानुस्तमांस्युग्रैर्गभस्तिभिः ॥

jahi pārthānsapāñcālānrādheya vijayāya naḥ | udyanniva sadā bhānustamāṃsyugrairgabhastibhiḥ

"हे राधेय! हमारी विजय के लिए पार्थों और पाञ्चालों को मार डालो, जैसे उदय होता सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणों से सदा अन्धकार को हटा देता है।

श्लोक 56 (8.7.56)

न ह्यलं त्वद्विसृष्टानां शराणां वै सकेशवाः । उलूकाः सूर्यरश्मीनां ज्वलतामिव दर्शने ॥

na hyalaṃ tvadvisṛṣṭānāṃ śarāṇāṃ vai sakeśavāḥ | ulūkāḥ sūryaraśmīnāṃ jvalatāmiva darśane

केशव के साथ वे लोग तुम्हारे छोड़े हुए बाणों को नहीं सह सकते, जैसे उल्लू सूर्य की जलती किरणों को देखना नहीं सह सकते।

श्लोक 57 (8.7.57)

न हि पार्थाः सपाञ्चालाः स्थातुं शक्तास्तवाग्रतः । आत्तवज्रस्य समरे महेन्द्रस्येव दानवाः ॥

na hi pārthāḥ sapāñcālāḥ sthātuṃ śaktāstavāgrataḥ | āttavajrasya samare mahendrasyeva dānavāḥ

पार्थ और पाञ्चाल रणभूमि में तुम्हारे सामने ठहर नहीं सकते, जैसे वज्र उठाए हुए महेन्द्र के सामने दानव नहीं ठहर सकते।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 58 (8.7.58)

स सत्कृतः स्तूयमानः सुहृद्गणवृतो वृषा । कर्णो दुर्योधनं वाक्यमब्रवीत्प्रहसन्प्रियम् ॥

sa satkṛtaḥ stūyamānaḥ suhṛdgaṇavṛto vṛṣā | karṇo duryodhanaṃ vākyamabravītprahasanpriyam

सम्मानित और स्तुत होकर, मित्रों के समूह से घिरे, वृषभ के समान बलशाली कर्ण ने हँसते हुए दुर्योधन से यह प्रिय वचन कहा:

कर्ण उवाच

श्लोक 59 (8.7.59)

दुर्योधनाद्य सगणं पाण्डूनां प्रवरैः सह । फल्गुनं सूदयिष्यामि त्वत्प्रियार्थं सबान्धवम् ॥

duryodhanādya sagaṇaṃ pāṇḍūnāṃ pravaraiḥ saha | phalgunaṃ sūdayiṣyāmi tvatpriyārthaṃ sabāndhavam

"दुर्योधन! आज मैं तुम्हारे प्रिय के लिए अर्जुन को उसकी सेना, पाण्डवों के प्रमुख वीरों और बन्धुओं सहित मार डालूँगा।

श्लोक 60 (8.7.60)

सपर्वतार्णवद्वीपां शाधि गां गतपाण्डवाम् । पुत्रपौत्रप्रपौत्रेषु प्रतिष्ठां गमयिष्यसि ॥

saparvatārṇavadvīpāṃ śādhi gāṃ gatapāṇḍavām | putrapautraprapautreṣu pratiṣṭhāṃ gamayiṣyasi

पर्वतों, समुद्रों और द्वीपों सहित, पाण्डवों से रहित इस पृथ्वी पर शासन करो; तुम इसे अपने पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रों में स्थिर कर दोगे।

श्लोक 61 (8.7.61)

नासह्यं विद्यते मह्यं त्वत्प्रियार्थमरिन्दम । सत्यधर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ॥

nāsahyaṃ vidyate mahyaṃ tvatpriyārthamarindama | satyadharmānuraktasya siddhirātmavato yathā

हे शत्रुदमन! तुम्हारे प्रिय के लिए मेरे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है, जैसे सत्य और धर्म में लगे जितेन्द्रिय पुरुष को सिद्धि मिलती है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 62 (8.7.62)

अभिषिक्तस्तु राधेयः प्रभया सोऽमितप्रभः । अत्यरिच्यत रूपेण दिवाकर इवापरः ॥

abhiṣiktastu rādheyaḥ prabhayā so'mitaprabhaḥ | atyaricyata rūpeṇa divākara ivāparaḥ

अभिषिक्त होने पर राधापुत्र अपनी प्रभा से अपरिमित तेजस्वी दिखाई दिया और रूप में दूसरे सूर्य के समान सबसे बढ़ गया।

श्लोक 63 (8.7.63)

सैनापत्ये तु राधेयमभिषिच्य सुतस्तव । अमन्यत तदात्मानं कृतार्थं कालचोदितः ॥

saināpatye tu rādheyamabhiṣicya sutastava | amanyata tadātmānaṃ kṛtārthaṃ kālacoditaḥ

राधापुत्र को सेनापति के पद पर अभिषिक्त करके आपके पुत्र ने, काल की प्रेरणा से, अपने को कृतार्थ मान लिया।

श्लोक 64 (8.7.64)

कर्णोऽपि राज्ञः संप्राप्य सैनापत्यमरिन्दमः । योगमाज्ञापयामास सूर्यस्योदयनं प्रति ॥

karṇo'pi rājñaḥ saṃprāpya saināpatyamarindamaḥ | yogamājñāpayāmāsa sūryasyodayanaṃ prati

शत्रुदमन कर्ण ने भी राजा से सेनापतित्व पाकर सूर्योदय के समय के लिए सेना को तैयार होने का आदेश दिया।

श्लोक 65 (8.7.65)

तव पुत्रैर्वृतः कर्णः शुशुभे तत्र भारत । देवैरिव यथा स्कन्दः सङ्ग्रामे तारकामये ॥

tava putrairvṛtaḥ karṇaḥ śuśubhe tatra bhārata | devairiva yathā skandaḥ saṅgrāme tārakāmaye

हे भारत! आपके पुत्रों से घिरा कर्ण वहाँ वैसे ही शोभित हुआ, जैसे तारकासुर के संग्राम में देवताओं से घिरे स्कन्द शोभित हुए थे।

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