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कर्ण पर्व · अध्याय 6

कर्ण की मृत्यु पर धृतराष्ट्र का विलाप

सञ्जय धृतराष्ट्र को सान्त्वना देना चाहते हैं, पर अन्धे राजा कर्ण के पतन पर विलाप करने लगते हैं; वे भीष्म की सन्धि की सलाह, भीष्म और द्रोण के वध तथा कर्ण के महान् कर्मों और प्रण को याद करते हैं। फिर वे पूछते हैं कि कर्ण कैसे मारा गया, दुर्योधन, शकुनि, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, कृप और शल्य ने क्या कहा, और युद्ध में कर्ण के पहियों की रक्षा किसने की। अन्त में वे द्रोण के पतन के बाद का सब वृत्तान्त सुनाने को कहते हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.6.1)

श्रिया कुलेन यशसा तपसा च श्रुतेन च । त्वामद्य सन्तो मन्यन्ते ययातिमिव नाहुषम् ॥

śriyā kulena yaśasā tapasā ca śrutena ca | tvāmadya santo manyante yayātimiva nāhuṣam

श्री, कुल, यश, तप और विद्या के कारण सज्जन आज आपको नहुषपुत्र ययाति के समान मानते हैं।

श्लोक 2 (8.6.2)

श्रुते महर्षिप्रतिमः कृतकृत्योऽसि पार्थिव । पर्यवस्थापयात्मानं मा विषादे मनः कृथाः ॥

śrute maharṣipratimaḥ kṛtakṛtyo'si pārthiva | paryavasthāpayātmānaṃ mā viṣāde manaḥ kṛthāḥ

हे राजन्, शास्त्रज्ञान में आप महर्षियों के समान हैं और आपके सब कर्तव्य पूरे हो चुके हैं। अपने को सँभालिए, मन को विषाद में मत डालिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 3 (8.6.3)

दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् । यत्र सालप्रतीकाशः कर्णोऽहन्यत संयुगे ॥

daivameva paraṃ manye dhikpauruṣamanarthakam | yatra sālapratīkāśaḥ karṇo'hanyata saṃyuge

मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ; पुरुषार्थ व्यर्थ है, उसे धिक्कार है, क्योंकि साल वृक्ष के समान ऊँचा कर्ण युद्ध में मारा गया।

श्लोक 4 (8.6.4)

हत्वा युधिष्ठिरानीकं पाञ्चालानां रथव्रजान् । प्रताप्य शरवर्षेण दिशः सर्वा महारथः ॥

hatvā yudhiṣṭhirānīkaṃ pāñcālānāṃ rathavrajān | pratāpya śaravarṣeṇa diśaḥ sarvā mahārathaḥ

युधिष्ठिर की सेना और पाञ्चालों के रथसमूहों को काटकर तथा बाणों की वर्षा से सब दिशाओं को तपाकर वह महारथी...

श्लोक 5 (8.6.5)

मोहयित्वा रणे पार्थान्वज्रहस्त इवासुरान् । स कथं निहतः शेते वायुरुग्ण इव द्रुमः ॥

mohayitvā raṇe pārthānvajrahasta ivāsurān | sa kathaṃ nihataḥ śete vāyurugṇa iva drumaḥ

...जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों को मोहित कर देते हैं, वैसे ही पार्थों को रण में मोहित करके वह आँधी से उखड़े वृक्ष की भाँति मारा हुआ कैसे पड़ा है?

श्लोक 6 (8.6.6)

शोकस्यान्तं न पश्यामि पारं जलनिधेरिव । चिन्ता मे वर्धतेऽतीव मुमूर्षा चापि जायते ॥

śokasyāntaṃ na paśyāmi pāraṃ jalanidheriva | cintā me vardhate'tīva mumūrṣā cāpi jāyate

मुझे अपने शोक का अन्त वैसे ही नहीं दीखता जैसे समुद्र का दूसरा किनारा नहीं दीखता। मेरी चिन्ता अत्यन्त बढ़ती जा रही है और मरने की इच्छा भी होती है।

श्लोक 7 (8.6.7)

कर्णस्य निधनं श्रुत्वा विजयं फल्गुनस्य च । अश्रद्धेयमहं मन्ये वधं कर्णस्य सञ्जय ॥

karṇasya nidhanaṃ śrutvā vijayaṃ phalgunasya ca | aśraddheyamahaṃ manye vadhaṃ karṇasya sañjaya

कर्ण के मारे जाने और अर्जुन की विजय का समाचार सुनकर भी, सञ्जय, मुझे कर्ण के वध पर विश्वास नहीं होता।

श्लोक 8 (8.6.8)

वज्रसारमिदं नूनं हृदयं दुर्भिदं मम । यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं कर्णं न दीर्यते ॥

vajrasāramidaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ durbhidaṃ mama | yacchrutvā puruṣavyāghraṃ hataṃ karṇaṃ na dīryate

निश्चय ही मेरा यह हृदय वज्र के सार का बना है, इसे भेदना कठिन है; तभी पुरुषों में व्याघ्र कर्ण के मारे जाने की बात सुनकर भी यह फटता नहीं।

श्लोक 9 (8.6.9)

आयुर्नूनं सुदीर्घं मे विहितं दैवतैः पुरा । यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा जीवामीह सुदुःखितः ॥

āyurnūnaṃ sudīrghaṃ me vihitaṃ daivataiḥ purā | yatra karṇaṃ hataṃ śrutvā jīvāmīha suduḥkhitaḥ

निश्चय ही देवताओं ने मेरे लिए बहुत लम्बी आयु पहले से ही रच दी थी, तभी कर्ण के मारे जाने की बात सुनकर भी मैं अत्यन्त दुःखी होकर यहाँ जी रहा हूँ।

श्लोक 10 (8.6.10)

धिग्जीवितमिदं चैव सुहृद्धीनस्य सञ्जय । अद्य चाहं दशामेतां गतः सञ्जय गर्हिताम् । कृपणं वर्तयिष्यामि शोच्यः सर्वस्य मन्दधीः ॥

dhigjīvitamidaṃ caiva suhṛddhīnasya sañjaya | adya cāhaṃ daśāmetāṃ gataḥ sañjaya garhitām | kṛpaṇaṃ vartayiṣyāmi śocyaḥ sarvasya mandadhīḥ

मुझ मित्रहीन का यह जीवन धिक्कार के योग्य है, सञ्जय। आज इस निन्दनीय दशा को पहुँचकर मैं दीनता से जीवन बिताऊँगा; मैं मन्दबुद्धि सबके लिए शोचनीय हो गया हूँ।

श्लोक 11 (8.6.11)

अहमेव पुरा भूत्वा सर्वलोकस्य सत्कृतः । परिभूतः कथं सूत परैः शक्ष्यामि जीवितुम् ॥

ahameva purā bhūtvā sarvalokasya satkṛtaḥ | paribhūtaḥ kathaṃ sūta paraiḥ śakṣyāmi jīvitum

जो मैं पहले सारे संसार में सम्मानित था, हे सूत, अब शत्रुओं से अपमानित होकर कैसे जी सकूँगा?

श्लोक 12 (8.6.12)

दुःखाद्दुःखतरं मन्ये प्राप्तवानस्मि सञ्जय । भीष्मद्रोणवधेनैव कर्णस्य च महात्मनः ॥

duḥkhādduḥkhataraṃ manye prāptavānasmi sañjaya | bhīṣmadroṇavadhenaiva karṇasya ca mahātmanaḥ

सञ्जय, मैं समझता हूँ कि भीष्म और द्रोण के वध से और अब महात्मा कर्ण के वध से मैं दुःख से भी बढ़कर दुःख को पहुँच गया हूँ।

श्लोक 13 (8.6.13)

नावशेषं प्रपश्यामि सूतपुत्रे हते युधि । स हि पारं महानासीत्पुत्राणां मम सञ्जय ॥

nāvaśeṣaṃ prapaśyāmi sūtaputre hate yudhi | sa hi pāraṃ mahānāsītputrāṇāṃ mama sañjaya

सूतपुत्र के युद्ध में मारे जाने पर मुझे कुछ भी शेष नहीं दीखता; सञ्जय, मेरे पुत्रों के लिए तो वही बड़ा किनारा, पार लगानेवाला था।

श्लोक 14 (8.6.14)

युद्धे हि निहतः शूरो विसृजन्सायकान्बहून् । को हि मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् ॥

yuddhe hi nihataḥ śūro visṛjansāyakānbahūn | ko hi me jīvitenārthastamṛte puruṣarṣabham

वह शूर अनेक बाण छोड़ते हुए युद्ध में मारा गया। उस पुरुषश्रेष्ठ के बिना मुझे जीवन से क्या प्रयोजन?

श्लोक 15 (8.6.15)

रथादाधिरथिर्नूनं न्यपतत्सायकार्दितः । पर्वतस्येव शिखरं वज्रपाताद्विदारितम् ॥

rathādādhirathirnūnaṃ nyapatatsāyakārditaḥ | parvatasyeva śikharaṃ vajrapātādvidāritam

बाणों से पीड़ित होकर अधिरथ का पुत्र अपने रथ से अवश्य गिर पड़ा होगा, जैसे वज्र के प्रहार से फटी हुई पर्वत की चोटी।

श्लोक 16 (8.6.16)

स शेते पृथिवीं नूनं शोभयन्रुधिरोक्षितः । मातङ्ग इव मत्तेन मातङ्गेन निपातितः ॥

sa śete pṛthivīṃ nūnaṃ śobhayanrudhirokṣitaḥ | mātaṅga iva mattena mātaṅgena nipātitaḥ

निश्चय ही वह रक्त से लथपथ होकर पृथ्वी को शोभित करता हुआ सोया पड़ा है, जैसे मतवाले हाथी द्वारा गिराया हुआ दूसरा हाथी।

श्लोक 17 (8.6.17)

यो बलं धार्तराष्ट्राणां पाण्डवानां यतो भयम् । सोऽर्जुनेन हतः कर्णः प्रतिमानं धनुष्मताम् ॥

yo balaṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ pāṇḍavānāṃ yato bhayam | so'rjunena hataḥ karṇaḥ pratimānaṃ dhanuṣmatām

जो धृतराष्ट्र के पुत्रों का बल था और जिससे पाण्डवों को भय था, धनुर्धारियों का वह आदर्श कर्ण अर्जुन के हाथों मारा गया।

श्लोक 18 (8.6.18)

स हि वीरो महेष्वासो मित्राणामभयङ्करः । शेते विनिहतो वीरः शक्रेणेव पुरा बलः ॥

sa hi vīro maheṣvāso mitrāṇāmabhayaṅkaraḥ | śete vinihato vīraḥ śakreṇeva purā balaḥ

मित्रों को अभय देनेवाला वह वीर महाधनुर्धर वैसे ही मारा पड़ा है जैसे पूर्वकाल में इन्द्र के हाथों बल मारा गया था।

श्लोक 19 (8.6.19)

पङ्गोरिवाध्वगमनं दरिद्रस्येव कामितम् । दुर्योधनस्य लोभश्च समान्येतानि सञ्जय ॥

paṅgorivādhvagamanaṃ daridrasyeva kāmitam | duryodhanasya lobhaśca samānyetāni sañjaya

लँगड़े की यात्रा, दरिद्र की कामना और दुर्योधन का लोभ — सञ्जय, ये तीनों एक समान हैं।

श्लोक 20 (8.6.20)

अन्यथा चिन्तितं कार्यमन्यथा तत्तु जायते । अहो नु बलवद्दैवं कालश्च दुरतिक्रमः ॥

anyathā cintitaṃ kāryamanyathā tattu jāyate | aho nu balavaddaivaṃ kālaśca duratikramaḥ

सोचा कुछ और जाता है और होता कुछ और है। अहो, दैव बड़ा बलवान् है और काल को लाँघना कठिन है।

श्लोक 21 (8.6.21)

पलायमानः कृपणो दीनात्मा दीनपौरुषः । कच्चिद्विनिहतः सूत पुत्रो दुःशासनो मम ॥

palāyamānaḥ kṛpaṇo dīnātmā dīnapauruṣaḥ | kaccidvinihataḥ sūta putro duḥśāsano mama

हे सूत, कहीं मेरा पुत्र दुःशासन दीन, दुर्बल मनवाला और पौरुषहीन होकर भागते हुए मारा तो नहीं गया?

श्लोक 22 (8.6.22)

कच्चिन्न दीनाचरितं कृतवांस्तात संयुगे । कच्चिन्न निहतः शूरो यथाऽन्ये क्षत्रियर्षभाः ॥

kaccinna dīnācaritaṃ kṛtavāṃstāta saṃyuge | kaccinna nihataḥ śūro yathā'nye kṣatriyarṣabhāḥ

हे तात, कहीं उसने युद्ध में कोई दीनता का आचरण तो नहीं किया? कहीं वह शूर दूसरे क्षत्रियश्रेष्ठों की भाँति मारा तो नहीं गया?

श्लोक 23 (8.6.23)

युधिष्ठिरस्य वचनं मा युद्धमिति सर्वदा । दुर्योधनो नाभ्यगृह्णान्मूढः पथ्यमिवौषधम् ॥

yudhiṣṭhirasya vacanaṃ mā yuddhamiti sarvadā | duryodhano nābhyagṛhṇānmūḍhaḥ pathyamivauṣadham

"युद्ध न हो" — युधिष्ठिर की यह बात दुर्योधन ने मूढ़ता के कारण कभी नहीं मानी, जैसे रोगी हितकारी औषधि को नहीं लेता।

श्लोक 24 (8.6.24)

शरतल्पे शयानेन भीष्मेण सुमहात्मना । पानीयं याचितः पार्थः सोऽविध्यन्मेदिनीतलम् ॥

śaratalpe śayānena bhīṣmeṇa sumahātmanā | pānīyaṃ yācitaḥ pārthaḥ so'vidhyanmedinītalam

महात्मा भीष्म ने शरशय्या पर लेटे हुए जब पार्थ से पानी माँगा, तब पार्थ ने पृथ्वी को बेध दिया।

श्लोक 25 (8.6.25)

जलस्य धारां जनितां दृष्ट्वा पाण्डुसुतेन च । अब्रवीत्स महाबाहुस्तात संशाम्य पाण्डवैः ॥

jalasya dhārāṃ janitāṃ dṛṣṭvā pāṇḍusutena ca | abravītsa mahābāhustāta saṃśāmya pāṇḍavaiḥ

पाण्डुपुत्र द्वारा प्रकट की गई जलधारा को देखकर उन महाबाहु ने कहा, "तात, पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो।"

श्लोक 26 (8.6.26)

प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु वः । भ्रातृभावेन पृथिवीं भुङ्क्ष्व पाण्डुसुतैः सह ॥

praśamāddhi bhavecchāntirmadantaṃ yuddhamastu vaḥ | bhrātṛbhāvena pṛthivīṃ bhuṅkṣva pāṇḍusutaiḥ saha

"मेल-मिलाप से शान्ति होती है; तुम्हारा युद्ध मेरे साथ ही समाप्त हो जाए। पाण्डुपुत्रों के साथ भाई की तरह पृथ्वी का भोग करो।"

श्लोक 27 (8.6.27)

अकुर्वन्वचनं तस्य नूनं शोचति पुत्रकः । तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दीर्घदर्शिनः ॥

akurvanvacanaṃ tasya nūnaṃ śocati putrakaḥ | tadidaṃ samanuprāptaṃ vacanaṃ dīrghadarśinaḥ

उनका वचन न मानने के कारण मेरा पुत्र निश्चय ही अब शोक कर रहा है। उस दूरदर्शी की बात आज सत्य होकर आ पहुँची है।

श्लोक 28 (8.6.28)

अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च सञ्जय । द्यूततः कृच्छ्रमापन्नो लूनपक्ष इव द्विजः ॥

ahaṃ tu nihatāmātyo hataputraśca sañjaya | dyūtataḥ kṛcchramāpanno lūnapakṣa iva dvijaḥ

सञ्जय, मैं तो मन्त्रियों और पुत्रों के मारे जाने पर, द्यूत के कारण संकट में पड़कर पंख कटे पक्षी के समान हो गया हूँ।

श्लोक 29 (8.6.29)

यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च सञ्जय । विसर्जयन्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ॥

yathā hi śakuniṃ gṛhya chittvā pakṣau ca sañjaya | visarjayanti saṃhṛṣṭāḥ krīḍamānāḥ kumārakāḥ

सञ्जय, जैसे खेलते हुए प्रसन्न बालक किसी पक्षी को पकड़कर उसके दोनों पंख काट देते हैं और फिर छोड़ देते हैं,

श्लोक 30 (8.6.30)

लूनपक्षतया तस्य गमनं नोपपद्यते । तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजः ॥

lūnapakṣatayā tasya gamanaṃ nopapadyate | tathāhamapi samprāpto lūnapakṣa iva dvijaḥ

और पंख कट जाने से वह उड़कर जा नहीं सकता, वैसे ही मैं भी पंख कटे पक्षी की दशा को पहुँच गया हूँ।

श्लोक 31 (8.6.31)

क्षीणः सर्वार्थहीनश्च निर्ज्ञातिर्बन्धुवर्जितः । कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीनः शत्रुवशं गतः ॥

kṣīṇaḥ sarvārthahīnaśca nirjñātirbandhuvarjitaḥ | kāṃ diśaṃ pratipatsyāmi dīnaḥ śatruvaśaṃ gataḥ

क्षीण, सब प्रयोजनों से रहित, जाति-बन्धुओं और स्वजनों से हीन, दीन और शत्रु के वश में पड़ा हुआ मैं किस ओर जाऊँ?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (8.6.32)

इत्येवं धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य बहुदुःखितः । प्रोवाच सञ्जयं भूयः शोकव्याकुलमानसः ॥

ityevaṃ dhṛtarāṣṭro'tha vilapya bahuduḥkhitaḥ | provāca sañjayaṃ bhūyaḥ śokavyākulamānasaḥ

इस प्रकार बहुत दुःखी होकर विलाप करने के बाद शोक से व्याकुल मनवाले धृतराष्ट्र ने सञ्जय से फिर कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 33 (8.6.33)

योऽजयत्सर्वकाम्भोजानम्बष्ठान्कैकयैः सह । गान्धारांश्च विदेहांश्च जित्वा कार्यार्थमाहवे ॥

yo'jayatsarvakāmbhojānambaṣṭhānkaikayaiḥ saha | gāndhārāṃśca videhāṃśca jitvā kāryārthamāhave

जिसने कार्यसिद्धि के लिए सब काम्भोजों, कैकयों सहित अम्बष्ठों, गान्धारों और विदेहों को युद्ध में जीता था,

श्लोक 34 (8.6.34)

दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं योऽजयत्पृथिवीं प्रभुः । स जितः पाण्डवैः शूरैः समरे बाहुशालिभिः ॥

duryodhanasya vṛddhyarthaṃ yo'jayatpṛthivīṃ prabhuḥ | sa jitaḥ pāṇḍavaiḥ śūraiḥ samare bāhuśālibhiḥ

जिस प्रभु ने दुर्योधन की उन्नति के लिए पृथ्वी को जीता था, वही शूर बाहुबली पाण्डवों के हाथों रण में पराजित हो गया।

श्लोक 35 (8.6.35)

तस्मिन्हते महेष्वासे कर्णे युधि किरीटिना । के वीराः पर्यतिष्ठन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

tasminhate maheṣvāse karṇe yudhi kirīṭinā | ke vīrāḥ paryatiṣṭhanta tanmamācakṣva sañjaya

किरीटी अर्जुन के हाथों महाधनुर्धर कर्ण के मारे जाने पर कौन-कौन वीर डटे रहे? सञ्जय, वह मुझे बताओ।

श्लोक 36 (8.6.36)

कच्चिन्नैकः परित्यक्तः पाण्डवैर्निहतो रणे । उक्तं त्वया पुरा तात यथा वीरो निपातितः ॥

kaccinnaikaḥ parityaktaḥ pāṇḍavairnihato raṇe | uktaṃ tvayā purā tāta yathā vīro nipātitaḥ

कहीं कोई अकेला छूट जाने पर पाण्डवों के द्वारा रण में मारा तो नहीं गया? तात, वीर कैसे गिराए गए, यह तुमने पहले मुझसे कहा है।

श्लोक 37 (8.6.37)

भीष्ममप्रतियुध्यन्तं शिखण्डी सायकोत्तमैः । पातयामास समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥

bhīṣmamapratiyudhyantaṃ śikhaṇḍī sāyakottamaiḥ | pātayāmāsa samare sarvaśastrabhṛtāṃ varam

शिखण्डी ने अपने उत्तम बाणों से, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म को रण में गिरा दिया, जबकि भीष्म उसके सामने युद्ध नहीं कर रहे थे।

श्लोक 38 (8.6.38)

तथा द्रौपदिना द्रोणो न्यस्तसर्वायुधो युधि । धर्मराजवचः श्रुत्वा अश्वत्थामा हतस्त्विति ॥

tathā draupadinā droṇo nyastasarvāyudho yudhi | dharmarājavacaḥ śrutvā aśvatthāmā hatastviti

और द्रोण, जिन्होंने धर्मराज की "अश्वत्थामा मारा गया" यह बात सुनकर रण में सब शस्त्र रख दिए थे, द्रुपदपुत्र के सामने आ गए।

श्लोक 39 (8.6.39)

युक्तयोगो महेष्वासः शरैर्बहुभिराचितः । निहतः खड्गमुद्यम्य धृष्टद्युम्नेन सञ्जय ॥

yuktayogo maheṣvāsaḥ śarairbahubhirācitaḥ | nihataḥ khaḍgamudyamya dhṛṣṭadyumnena sañjaya

योग में लीन, बहुत बाणों से बिंधे हुए उन महाधनुर्धर को धृष्टद्युम्न ने खड्ग उठाकर मार डाला, सञ्जय।

श्लोक 40 (8.6.40)

अन्तरेण हतावेतौ छलेन च विशेषतः । अश्रौषमहमेतद्वै भीष्मद्रोणौ निपातितौ ॥

antareṇa hatāvetau chalena ca viśeṣataḥ | aśrauṣamahametadvai bhīṣmadroṇau nipātitau

वे दोनों परोक्ष उपाय से और विशेषकर छल से मारे गए — भीष्म और द्रोण के गिराए जाने की बात मैंने ऐसे ही सुनी।

श्लोक 41 (8.6.41)

भीष्मद्रोणौ हि समरे न हन्याद्वज्रभृत्स्वयम् । न्यायेन युध्यन्समरे तद्वै सत्यं ब्रवीमि ते ॥

bhīṣmadroṇau hi samare na hanyādvajrabhṛtsvayam | nyāyena yudhyansamare tadvai satyaṃ bravīmi te

यदि भीष्म और द्रोण न्याय से लड़ते, तो स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी उन्हें रण में नहीं मार सकते थे। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

श्लोक 42 (8.6.42)

कर्णं त्वस्यन्तमस्त्राणि दिव्यानि च बहूनि च । कथमिन्द्रोपमं वीरं मृत्युर्युद्धे समस्पृशत् ॥

karṇaṃ tvasyantamastrāṇi divyāni ca bahūni ca | kathamindropamaṃ vīraṃ mṛtyuryuddhe samaspṛśat

अनेक दिव्य अस्त्र चलाते हुए इन्द्र के समान वीर कर्ण को युद्ध में मृत्यु ने कैसे छू लिया?

श्लोक 43 (8.6.43)

यस्य विद्युत्प्रभां शक्तिं दिव्यां कनकभूषणाम् । प्रायच्छद्द्विषतां हन्त्रीं कुण्डलाभ्यां पुरन्दरः ॥

yasya vidyutprabhāṃ śaktiṃ divyāṃ kanakabhūṣaṇām | prāyacchaddviṣatāṃ hantrīṃ kuṇḍalābhyāṃ purandaraḥ

जिसे इन्द्र ने कुण्डलों के बदले बिजली के समान चमकती, सोने से सजी हुई, शत्रुओं का नाश करनेवाली दिव्य शक्ति दी थी;

श्लोक 44 (8.6.44)

यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः काञ्चनभूषणः । अशेत निशितः पत्री समरेष्वरिसूदनः ॥

yasya sarpamukho divyaḥ śaraḥ kāñcanabhūṣaṇaḥ | aśeta niśitaḥ patrī samareṣvarisūdanaḥ

जिसका सर्पमुख, सोने से सजा, तीक्ष्ण, पंखदार दिव्य बाण, जो शत्रुओं का नाश करनेवाला था, सब युद्धों में उसके तरकश में पड़ा रहा;

श्लोक 45 (8.6.45)

भीष्मद्रोणमुखान्वीरान्योऽवमत्य महारथान् । जामदग्न्यान्महाघोरं ब्राह्ममस्त्रमशिक्षत ॥

bhīṣmadroṇamukhānvīrānyo'vamatya mahārathān | jāmadagnyānmahāghoraṃ brāhmamastramaśikṣata

जिसने भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख महारथी वीरों की अवहेलना करके जमदग्नि के पुत्र परशुराम से महाघोर ब्रह्मास्त्र सीखा था;

श्लोक 46 (8.6.46)

यश्च द्रोणमुखान्दृष्ट्वा विमुखानर्दिताञ्शरैः । सौभद्रस्य महाबाहुर्व्यधमत्कार्मुकं शितैः ॥

yaśca droṇamukhāndṛṣṭvā vimukhānarditāñśaraiḥ | saubhadrasya mahābāhurvyadhamatkārmukaṃ śitaiḥ

और जिस महाबाहु ने द्रोण के अग्रगामी वीरों को बाणों से पीड़ित होकर पीठ दिखाते देख, तीखे बाणों से सुभद्रापुत्र का धनुष काट डाला था;

श्लोक 47 (8.6.47)

यश्च नागायुतप्राणं वज्ररंहसमच्युतम् । विरथं सहसा कृत्वा भीमसेनमपाहसत् ॥

yaśca nāgāyutaprāṇaṃ vajraraṃhasamacyutam | virathaṃ sahasā kṛtvā bhīmasenamapāhasat

जिसने दस हज़ार हाथियों के बल वाले, वज्र के वेग से युक्त, अडिग भीमसेन को सहसा रथहीन करके उसका उपहास किया था;

श्लोक 48 (8.6.48)

सहदेवं च निर्जित्य शरैः सन्नतपर्वभिः । कृपया विरथं कृत्वा नाहनद्धर्मचिन्तया ॥

sahadevaṃ ca nirjitya śaraiḥ sannataparvabhiḥ | kṛpayā virathaṃ kṛtvā nāhanaddharmacintayā

जिसने झुकी हुई गाँठवाले बाणों से सहदेव को जीतकर और उसे रथहीन करके दया और धर्म के विचार से उसे नहीं मारा;

श्लोक 49 (8.6.49)

यश्च मायासहस्राणि विकुर्वाणं जयैषिणम् । घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं शक्रशक्त्या निजघ्निवान् ॥

yaśca māyāsahasrāṇi vikurvāṇaṃ jayaiṣiṇam | ghaṭotkacaṃ rākṣasendraṃ śakraśaktyā nijaghnivān

और जिसने सहस्रों मायाएँ रचते हुए विजय की इच्छा रखनेवाले राक्षसराज घटोत्कच को इन्द्र की शक्ति से मार डाला था;

श्लोक 50 (8.6.50)

एतांश्च दिवसान्यस्य युद्धे भीतो धनञ्जयः । नागमद्द्वैरथं वीरः स कथं निहतो रणे ॥

etāṃśca divasānyasya yuddhe bhīto dhanañjayaḥ | nāgamaddvairathaṃ vīraḥ sa kathaṃ nihato raṇe

इतने दिनों तक जिससे डरकर अर्जुन युद्ध में द्वैरथ के लिए सामने नहीं आया, वह वीर रण में कैसे मारा गया?

श्लोक 51 (8.6.51)

संशप्तकानां योधा ये आह्वयन्त सदाऽन्यतः । एतान्हत्वा हनिष्यामि पश्चाद्वैकर्तनं रणे ॥

saṃśaptakānāṃ yodhā ye āhvayanta sadā'nyataḥ | etānhatvā haniṣyāmi paścādvaikartanaṃ raṇe

"जो संशप्तक योद्धा मुझे सदा दूसरी ओर से ललकारते रहते हैं, पहले उन्हें मारूँगा और उसके बाद रण में वैकर्तन को।"

श्लोक 52 (8.6.52)

इति व्यपदिशन्पार्थो वर्जयन्सूतजं रणे । स कथं निहतो वीरः पार्थेन परवीरहा ॥

iti vyapadiśanpārtho varjayansūtajaṃ raṇe | sa kathaṃ nihato vīraḥ pārthena paravīrahā

इस प्रकार बहाना बनाकर पार्थ रण में सूतपुत्र से बचता रहा। फिर शत्रुवीरों को मारनेवाला वह वीर पार्थ के हाथों कैसे मारा गया?

श्लोक 53 (8.6.53)

रथभङ्गो न चेत्तस्य धनुर्वा न व्यशीर्यत । न चेदस्त्राणि नष्टानि स कथं निहतः परैः ॥

rathabhaṅgo na cettasya dhanurvā na vyaśīryata | na cedastrāṇi naṣṭāni sa kathaṃ nihataḥ paraiḥ

यदि उसका रथ न टूटता, धनुष न कटता और अस्त्र नष्ट न होते, तो वह शत्रुओं के हाथों कैसे मारा जाता?

श्लोक 54 (8.6.54)

को हि शक्तो रणे कर्णं विधुन्वानं महद्धनुः । विमुञ्चन्तं शरान्घोरान्दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे । जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगिनम् ॥

ko hi śakto raṇe karṇaṃ vidhunvānaṃ mahaddhanuḥ | vimuñcantaṃ śarānghorāndivyānyastrāṇi cāhave | jetuṃ puruṣaśārdūlaṃ śārdūlamiva veginam

अपना विशाल धनुष चलाते हुए, भयंकर बाण और दिव्य अस्त्र छोड़ते हुए, बाघ के समान वेगवान् उस पुरुषश्रेष्ठ कर्ण को रण में जीतने में कौन समर्थ है?

श्लोक 55 (8.6.55)

ध्रुवं तस्य धनुश्छिन्नं रथो वाऽपि महीं गतः । अस्त्राणि वा प्रनष्टानि यथा शंससि मे हतम् । न ह्यन्यदपि पश्यामि कारणं तस्य नाशने ॥

dhruvaṃ tasya dhanuśchinnaṃ ratho vā'pi mahīṃ gataḥ | astrāṇi vā pranaṣṭāni yathā śaṃsasi me hatam | na hyanyadapi paśyāmi kāraṇaṃ tasya nāśane

निश्चय ही उसका धनुष कट गया होगा, या रथ पृथ्वी में धँस गया होगा, या अस्त्र नष्ट हो गए होंगे, जैसा तुम उसका मारा जाना बताते हो; उसके नाश का दूसरा कोई कारण मुझे नहीं दीखता।

श्लोक 56 (8.6.56)

न हन्मि फल्गुनं यावत्तावत्पादौ न धावये । इति यस्य महाघोरं व्रतमासीन्महात्मनः ॥

na hanmi phalgunaṃ yāvattāvatpādau na dhāvaye | iti yasya mahāghoraṃ vratamāsīnmahātmanaḥ

"जब तक मैं अर्जुन को न मार लूँ, तब तक पैर नहीं धोऊँगा" — उस महात्मा का ऐसा अत्यन्त भयंकर व्रत था।

श्लोक 57 (8.6.57)

यस्य भीतो वने निद्रां धर्मराजो युधिष्ठिरः । त्रयोदशसमा नित्यं नाभजत्पुरुषर्षभः ॥

yasya bhīto vane nidrāṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | trayodaśasamā nityaṃ nābhajatpuruṣarṣabhaḥ

जिससे डरकर धर्मराज पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर को तेरह वर्ष तक वन में नींद नहीं आई;

श्लोक 58 (8.6.58)

यस्य वीर्यवतो वीर्यमुपाश्रित्य महात्मनः । मम पुत्रः सभां भार्यां पाण्डूनां नीतवान्बलात् ॥

yasya vīryavato vīryamupāśritya mahātmanaḥ | mama putraḥ sabhāṃ bhāryāṃ pāṇḍūnāṃ nītavānbalāt

उसी पराक्रमी महात्मा के बल का सहारा लेकर मेरा पुत्र पाण्डवों की पत्नी को बलपूर्वक सभा में ले आया था;

श्लोक 59 (8.6.59)

तत्रापि च सभामध्ये पाण्डवानां च पश्यताम् । दासभार्येति पाञ्चालीमब्रवीत्कुरुसन्निधौ ॥

tatrāpi ca sabhāmadhye pāṇḍavānāṃ ca paśyatām | dāsabhāryeti pāñcālīmabravītkurusannidhau

और वहाँ भी सभा के बीच, पाण्डवों के देखते हुए, कुरुओं के सामने उसने पाञ्चाली को "दासी की पत्नी" कहा था।

श्लोक 60 (8.6.60)

न सन्ति पतयः कृष्णे सर्वे षण्डतिलैः समाः । उपतिष्ठस्व भर्तारमन्यं वा वरवर्णिनि ॥

na santi patayaḥ kṛṣṇe sarve ṣaṇḍatilaiḥ samāḥ | upatiṣṭhasva bhartāramanyaṃ vā varavarṇini

"कृष्णे, तेरे पति हैं ही नहीं; वे सब निःसार तिलों के समान हैं। हे सुन्दरी, किसी और पति की सेवा में जा।"

श्लोक 61 (8.6.61)

इत्येवं यः पुरा वाचो रूक्षाः संश्रावयन्रुषा । सभायां सूतजः कृष्णां स कथं निहतः परैः ॥

ityevaṃ yaḥ purā vāco rūkṣāḥ saṃśrāvayanruṣā | sabhāyāṃ sūtajaḥ kṛṣṇāṃ sa kathaṃ nihataḥ paraiḥ

जिस सूतपुत्र ने पहले सभा में क्रोध से द्रौपदी को ऐसी कठोर बातें सुनाई थीं, वह शत्रुओं के हाथों कैसे मारा गया?

श्लोक 62 (8.6.62)

यदि भीष्मो रणश्लाघी द्रोणो वा युधि दुर्मदः । न हनिष्यति कौन्तेयान्पक्षपातात्सुयोधन । सर्वानेव हनिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

yadi bhīṣmo raṇaślāghī droṇo vā yudhi durmadaḥ | na haniṣyati kaunteyānpakṣapātātsuyodhana | sarvāneva haniṣyāmi vyetu te mānaso jvaraḥ

"सुयोधन, यदि रण में डींग हाँकनेवाले भीष्म या युद्ध में मदमत्त द्रोण पक्षपात के कारण कुन्ती के पुत्रों को नहीं मारेंगे, तो मैं उन सबको मार डालूँगा; तेरे मन का ज्वर दूर हो जाए।"

श्लोक 63 (8.6.63)

किं करिष्यति गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । स्निग्धचन्दनदिग्धस्य मच्छरस्याभिधावतः । स नूनमृषभस्कन्धो ह्यर्जुनेन कथं हतः ॥

kiṃ kariṣyati gāṇḍīvamakṣayyau ca maheṣudhī | snigdhacandanadigdhasya maccharasyābhidhāvataḥ | sa nūnamṛṣabhaskandho hyarjunena kathaṃ hataḥ

"जब चिकने चन्दन से लिपटा मेरा बाण उस पर दौड़ेगा, तब गाण्डीव और दोनों अक्षय तरकश क्या करेंगे?" फिर वह वृषभ के समान कन्धोंवाला अर्जुन के हाथों कैसे मारा गया?

श्लोक 64 (8.6.64)

यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तयन् । अपतिर्ह्यसि कृष्णेति ब्रुवन्पार्थानवैक्षत ॥

yaśca gāṇḍīvamuktānāṃ sparśamugramacintayan | apatirhyasi kṛṣṇeti bruvanpārthānavaikṣata

जिसने गाण्डीव से छूटे बाणों के उग्र स्पर्श की चिन्ता न करके पार्थों की ओर देखकर कहा था, "कृष्णे, तू पतिहीन है" —

श्लोक 65 (8.6.65)

यस्य नासीद्भयं पार्थात्सपुत्रात्सजनार्दनात् । स्वबाहुबलमाश्रित्य मुहूर्तमपि सञ्जय ॥

yasya nāsīdbhayaṃ pārthātsaputrātsajanārdanāt | svabāhubalamāśritya muhūrtamapi sañjaya

जो अपनी भुजाओं के बल का सहारा लेकर पुत्र और जनार्दन सहित पार्थ से क्षण भर के लिए भी नहीं डरा, सञ्जय —

श्लोक 66 (8.6.66)

तस्य नाऽहं वधं मन्ये देवैरपि सवासवैः । प्रतीपमभिघावद्भिः किं पुनस्तात पाण्डवैः ॥

tasya nā'haṃ vadhaṃ manye devairapi savāsavaiḥ | pratīpamabhighāvadbhiḥ kiṃ punastāta pāṇḍavaiḥ

इन्द्र सहित देवता भी सामने से दौड़कर आएँ तो भी मैं उसका वध सम्भव नहीं मानता; फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या, तात?

श्लोक 67 (8.6.67)

न हि ज्यां संसम्पृशानस्य तलत्रे वाऽपि गृह्णतः । पुमानाधिरथेः स्थातुं कश्चित्प्रमुखतोऽर्हति ॥

na hi jyāṃ saṃsampṛśānasya talatre vā'pi gṛhṇataḥ | pumānādhiratheḥ sthātuṃ kaścitpramukhato'rhati

जब वह प्रत्यञ्चा को छूता और हाथ का दस्ताना पहनता है, तब अधिरथपुत्र के सामने कोई भी पुरुष टिक नहीं सकता।

श्लोक 68 (8.6.68)

अपि स्यान्मेदिनी हीना सोमसूर्यप्रभांशुभिः । न वधः पुरुषेन्द्रस्य संयुगेष्वपलायिनः ॥

api syānmedinī hīnā somasūryaprabhāṃśubhiḥ | na vadhaḥ puruṣendrasya saṃyugeṣvapalāyinaḥ

चाहे पृथ्वी चन्द्रमा और सूर्य की किरणों से हीन हो जाए, पर रणों में कभी न भागनेवाले उस पुरुषेन्द्र का वध सम्भव नहीं था।

श्लोक 69 (8.6.69)

येन मन्दः सहायेन भ्रात्रा दुःशासनेन च । वासुदेवस्य दुर्बुद्धिः प्रत्याख्यानमरोचत ॥

yena mandaḥ sahāyena bhrātrā duḥśāsanena ca | vāsudevasya durbuddhiḥ pratyākhyānamarocata

जिसे सहायक बनाकर, भाई दुःशासन के साथ, उस मन्द और दुर्बुद्धि दुर्योधन ने वासुदेव के प्रस्ताव को ठुकराना अच्छा समझा;

श्लोक 70 (8.6.70)

स नूनं वृषभस्कन्धं कर्णं दृष्ट्वा निपातितम् । दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः ॥

sa nūnaṃ vṛṣabhaskandhaṃ karṇaṃ dṛṣṭvā nipātitam | duḥśāsanaṃ ca nihataṃ manye śocati putrakaḥ

वृषभ के समान कन्धोंवाले कर्ण को गिरा देखकर और दुःशासन को भी मरा जानकर मेरा पुत्र निश्चय ही शोक कर रहा होगा, ऐसा मैं समझता हूँ।

श्लोक 71 (8.6.71)

हतं वैकर्तनं दृष्ट्वा द्वैरथे सव्यसाचिना । जयतः पाण्डवान्दृष्ट्वा किंस्विद्दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

hataṃ vaikartanaṃ dṛṣṭvā dvairathe savyasācinā | jayataḥ pāṇḍavāndṛṣṭvā kiṃsvidduryodhano'bravīt

सव्यसाची के हाथों द्वैरथ युद्ध में वैकर्तन को मरा देखकर और पाण्डवों को विजयी देखकर दुर्योधन ने क्या कहा?

श्लोक 72 (8.6.72)

दुर्मर्षणं हतं दृष्ट्वा वृषसेनं च संयुगे । प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ॥

durmarṣaṇaṃ hataṃ dṛṣṭvā vṛṣasenaṃ ca saṃyuge | prabhagnaṃ ca balaṃ dṛṣṭvā vadhyamānaṃ mahārathaiḥ

दुर्मर्षण और वृषसेन को युद्ध में मरा देखकर, अपनी सेना को टूटी हुई और महारथियों द्वारा मारी जाती हुई देखकर,

श्लोक 73 (8.6.73)

पराङ्मुखांश्च राज्ञस्तु पलायनपरायणान् । विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा मन्ये शोचति पुत्रकः ॥

parāṅmukhāṃśca rājñastu palāyanaparāyaṇān | vidrutānrathino dṛṣṭvā manye śocati putrakaḥ

राजाओं को पीठ दिखाकर भागने में लगे और रथियों को तितर-बितर देखकर मेरा पुत्र शोक कर रहा होगा, ऐसा मैं मानता हूँ।

श्लोक 74 (8.6.74)

अनेयश्चाभिमानी च दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः । हतोत्साहं बलं दृष्ट्वा किंस्विदुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

aneyaścābhimānī ca durbuddhirajitendriyaḥ | hatotsāhaṃ balaṃ dṛṣṭvā kiṃsviduryodhano'bravīt

जिसे समझाया नहीं जा सकता, जो अभिमानी, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय है, उस दुर्योधन ने अपनी सेना को निरुत्साह देखकर क्या कहा?

श्लोक 75 (8.6.75)

स्वयं वैरं महत्कृत्वा वार्यमाणः सुहृद्गणैः । प्रधने हतभूयिष्ठैः किंस्विद्दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

svayaṃ vairaṃ mahatkṛtvā vāryamāṇaḥ suhṛdgaṇaiḥ | pradhane hatabhūyiṣṭhaiḥ kiṃsvidduryodhano'bravīt

स्वयं भारी वैर करके, हितैषियों के रोकने पर भी, जब युद्ध में उसके अधिकांश योद्धा मारे जा चुके, तब दुर्योधन ने क्या कहा?

श्लोक 76 (8.6.76)

भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे । रुधिरे पीयमाने च किंस्विद्दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥

bhrātaraṃ nihataṃ dṛṣṭvā bhīmasenena saṃyuge | rudhire pīyamāne ca kiṃsvidduryodhano'bravīt

भीमसेन के हाथों भाई को युद्ध में मरा देखकर और उसका रक्त पिया जाते देखकर दुर्योधन ने क्या कहा?

श्लोक 77 (8.6.77)

सह गान्धारराजेन सभायां यदभाषत । कर्णोऽर्जुनं रणे हन्ता हते तस्मिन्किमब्रवीत् ॥

saha gāndhārarājena sabhāyāṃ yadabhāṣata | karṇo'rjunaṃ raṇe hantā hate tasminkimabravīt

गान्धारराज के साथ सभा में जिसने कहा था कि "कर्ण रण में अर्जुन को मारेगा", उस कर्ण के मारे जाने पर उसने क्या कहा?

श्लोक 78 (8.6.78)

द्यूतं कृत्वा पुरा हृष्टो वञ्चयित्वा च पाण्डवान् । शकुनिः सौबलस्तात हते कर्णे किमब्रवीत् ॥

dyūtaṃ kṛtvā purā hṛṣṭo vañcayitvā ca pāṇḍavān | śakuniḥ saubalastāta hate karṇe kimabravīt

जो सुबलपुत्र शकुनि पहले द्यूत खेलकर और पाण्डवों को ठगकर प्रसन्न हुआ था, तात, कर्ण के मारे जाने पर उसने क्या कहा?

श्लोक 79 (8.6.79)

कृतवर्मा महेष्वासः सात्वतानां महारथः । हतं वैकर्तनं दृष्ट्वा हार्दिक्यः किमभाषत ॥

kṛtavarmā maheṣvāsaḥ sātvatānāṃ mahārathaḥ | hataṃ vaikartanaṃ dṛṣṭvā hārdikyaḥ kimabhāṣata

महाधनुर्धर कृतवर्मा, सात्वतों के महारथी हार्दिक्य ने वैकर्तन को मरा देखकर क्या कहा?

श्लोक 80 (8.6.80)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या यस्य शिक्षामुपासते । धनुर्वेदं चिकीर्षन्तो द्रोणपुत्रस्य धीमतः ॥

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā yasya śikṣāmupāsate | dhanurvedaṃ cikīrṣanto droṇaputrasya dhīmataḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धनुर्वेद सीखने की इच्छा से जिस बुद्धिमान् द्रोणपुत्र की शिक्षा का सेवन करते हैं —

श्लोक 81 (8.6.81)

युवा रूपेण सम्पन्नो दर्शनीयो महायशाः । अश्वत्थामा हते कर्णे किमभाषत सञ्जय ॥

yuvā rūpeṇa sampanno darśanīyo mahāyaśāḥ | aśvatthāmā hate karṇe kimabhāṣata sañjaya

वह तरुण, रूपवान्, दर्शनीय और महायशस्वी अश्वत्थामा कर्ण के मारे जाने पर क्या बोला, सञ्जय?

श्लोक 82 (8.6.82)

आचार्यो यो धनुर्वेदे गौतमो रथसत्तमः । कृपः शारद्वतस्तात हते कर्णे किमब्रवीत् ॥

ācāryo yo dhanurvede gautamo rathasattamaḥ | kṛpaḥ śāradvatastāta hate karṇe kimabravīt

धनुर्वेद के आचार्य, रथियों में श्रेष्ठ गौतम कृप शारद्वत ने, तात, कर्ण के मारे जाने पर क्या कहा?

श्लोक 83 (8.6.83)

मद्रराजो महेष्वासः शल्यः समितिशोभनः । दृष्ट्वा विनिहतं कर्णं सारथ्ये रथिनां वरः । किमभाषत सौवीरो मद्राणामधिपो बली ॥

madrarājo maheṣvāsaḥ śalyaḥ samitiśobhanaḥ | dṛṣṭvā vinihataṃ karṇaṃ sārathye rathināṃ varaḥ | kimabhāṣata sauvīro madrāṇāmadhipo balī

मद्रराज महाधनुर्धर शल्य, सभाओं की शोभा, रथियों में श्रेष्ठ, जो कर्ण के सारथि बने थे — कर्ण को मरा देखकर उस बलवान् सौवीर, मद्रों के अधिपति ने क्या कहा?

श्लोक 84 (8.6.84)

दृष्ट्वा विनिहतं सर्वे योधा वारणदुर्जयाः । ये च केचन राजानः पृथिव्यां योद्धुमागताः । वैकर्तनं हतं दृष्ट्वा कान्यभाषन्त सञ्जय ॥

dṛṣṭvā vinihataṃ sarve yodhā vāraṇadurjayāḥ | ye ca kecana rājānaḥ pṛthivyāṃ yoddhumāgatāḥ | vaikartanaṃ hataṃ dṛṣṭvā kānyabhāṣanta sañjaya

उसे मरा देखकर हाथियों को भी रोक देनेवाले सब योद्धा और पृथ्वी पर युद्ध करने आए जो भी राजा थे, वैकर्तन को मरा देखकर उन्होंने क्या कहा, सञ्जय?

श्लोक 85 (8.6.85)

द्रोणे तु निहते वीरे रथव्याघ्रे नरर्षभे । के वा मुखमनीकानामासन्सञ्जय भागशः ॥

droṇe tu nihate vīre rathavyāghre nararṣabhe | ke vā mukhamanīkānāmāsansañjaya bhāgaśaḥ

रथों में व्याघ्र और नरश्रेष्ठ वीर द्रोण के मारे जाने पर, सञ्जय, सेना की टुकड़ियों के अग्रभाग में अलग-अलग कौन थे?

श्लोक 86 (8.6.86)

मद्रराजः कथं शल्यो नियुक्तो रथिनां वरः । वैकर्तनस्य सारथ्ये तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

madrarājaḥ kathaṃ śalyo niyukto rathināṃ varaḥ | vaikartanasya sārathye tanmamācakṣva sañjaya

रथियों में श्रेष्ठ मद्रराज शल्य वैकर्तन के सारथि कैसे बनाए गए? सञ्जय, यह मुझे बताओ।

श्लोक 87 (8.6.87)

केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सूतपुत्रस्य युध्यतः । वामं चक्रं ररक्षुर्वा के वा वीरस्य पृष्ठतः ॥

ke'rakṣandakṣiṇaṃ cakraṃ sūtaputrasya yudhyataḥ | vāmaṃ cakraṃ rarakṣurvā ke vā vīrasya pṛṣṭhataḥ

युद्ध करते हुए सूतपुत्र के दाहिने पहिये की रक्षा किसने की? बाएँ पहिये की किसने की? और उस वीर के पीछे कौन थे?

श्लोक 88 (8.6.88)

के कर्णं न जहुः शूराः के क्षुद्राः प्राद्रवंस्ततः । कथं च वः समेतानां हतः कर्णो महारथः ॥

ke karṇaṃ na jahuḥ śūrāḥ ke kṣudrāḥ prādravaṃstataḥ | kathaṃ ca vaḥ sametānāṃ hataḥ karṇo mahārathaḥ

कौन शूर कर्ण को छोड़कर नहीं गए, और कौन तुच्छ लोग वहाँ से भाग गए? और तुम सबके साथ रहते हुए महारथी कर्ण कैसे मारा गया?

श्लोक 89 (8.6.89)

पाण्डवाश्च स्वयं शूराः प्रत्युदीयुर्महारथाः । सृजन्तः शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदाः ॥

pāṇḍavāśca svayaṃ śūrāḥ pratyudīyurmahārathāḥ | sṛjantaḥ śaravarṣāṇi vāridhārā ivāmbudāḥ

और स्वयं शूर महारथी पाण्डव, बादलों की जलधाराओं के समान बाणों की वर्षा करते हुए, उसके सामने कैसे आ पहुँचे?

श्लोक 90 (8.6.90)

स च सर्पमुखो दिव्यो महेषुप्रवरस्तदा । व्यर्थः कथं समभवत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

sa ca sarpamukho divyo maheṣupravarastadā | vyarthaḥ kathaṃ samabhavattanmamācakṣva sañjaya

और वह सर्पमुख दिव्य श्रेष्ठ महाबाण उस समय व्यर्थ कैसे हो गया? सञ्जय, यह मुझे बताओ।

श्लोक 91 (8.6.91)

मामकस्यास्य सैन्यस्य हतोत्सेधस्य सञ्जय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥

māmakasyāsya sainyasya hatotsedhasya sañjaya | avaśeṣaṃ na paśyāmi kakude mṛdite sati

सञ्जय, मेरी इस सेना का गौरव नष्ट हो गया और इसका ककुद् कुचल दिया गया; अब मुझे इसका कुछ भी शेष नहीं दीखता।

श्लोक 92 (8.6.92)

तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे त्यक्तजीवितौ । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा को न्वर्थो जीवितेन मे ॥

tau hi vīrau maheṣvāsau madarthe tyaktajīvitau | bhīṣmadroṇau hatau śrutvā ko nvartho jīvitena me

वे दोनों वीर महाधनुर्धर मेरे लिए प्राण त्याग चुके हैं; भीष्म और द्रोण को मारा गया सुनकर मुझे जीवन से क्या प्रयोजन?

श्लोक 93 (8.6.93)

पुनः पुनर्न मृष्यामि वधं कर्णस्य पाण्डवैः । यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥

punaḥ punarna mṛṣyāmi vadhaṃ karṇasya pāṇḍavaiḥ | yasya bāhvorbalaṃ tulyaṃ kuñjarāṇāṃ śataṃ śatam

पाण्डवों के हाथों कर्ण का वध मैं बार-बार सह नहीं पाता, जिसकी भुजाओं में सौ-सौ हाथियों के बराबर बल था।

श्लोक 94 (8.6.94)

द्रोणे हते च यद्वृत्तं कौरवाणां परैः सह । सङ्घामे नरवीराणां तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

droṇe hate ca yadvṛttaṃ kauravāṇāṃ paraiḥ saha | saṅghāme naravīrāṇāṃ tanmamācakṣva sañjaya

सञ्जय, द्रोण के मारे जाने पर संग्राम में कौरवों और उनके शत्रुओं, उन नरवीरों पर जो बीती, वह मुझे बताओ।

श्लोक 95 (8.6.95)

यथा कर्णश्च कौन्तेयैः सह युद्धमयोजयत् । तथा च द्विषतां हन्ता रणे शान्तस्तदुच्यताम् ॥

yathā karṇaśca kaunteyaiḥ saha yuddhamayojayat | tathā ca dviṣatāṃ hantā raṇe śāntastaducyatām

यह भी बताओ कि कर्ण ने कुन्ती के पुत्रों के साथ युद्ध कैसे छेड़ा और शत्रुओं का नाश करनेवाला वह रण में कैसे शान्त हुआ।

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