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कर्ण पर्व · अध्याय 5

कर्ण के वध पर धृतराष्ट्र का विलाप

जनमेजय पूछते हैं कि कर्ण की मृत्यु सुनकर धृतराष्ट्र ने क्या कहा। वैशम्पायन राजा के स्तब्ध अविश्वास और शोक का वर्णन करते हैं। धृतराष्ट्र कर्ण के बल, दुर्योधन के लिए जीते हुए अनेक जनपदों और कृष्ण तथा अर्जुन के विरुद्ध उसकी प्रतिज्ञा का स्मरण करके विलाप करते हैं। शोक के सागर में डूबे हुए वे कहते हैं कि उनका हृदय वज्र से भी कठोर होगा, और ऐसा दुःख सहने के बजाय वे विष, अग्नि या पर्वत से गिरना चुनेंगे।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (8.5.1)

श्रुत्वा कर्णं हतं युद्धे पुत्रांश्चैव पलायिनः । नरेन्द्रः किञ्चिदाश्वस्तो द्विजश्रेष्ठ किमब्रवीत् ॥

śrutvā karṇaṃ hataṃ yuddhe putrāṃścaiva palāyinaḥ | narendraḥ kiñcidāśvasto dvijaśreṣṭha kimabravīt

हे द्विजश्रेष्ठ! कर्ण के युद्ध में मारे जाने और अपने पुत्रों के भागने की बात सुनकर कुछ संभलने पर राजा धृतराष्ट्र ने क्या कहा?

श्लोक 2 (8.5.2)

प्राप्तवान्परमं दुःखं पुत्रव्यसनजं महत् । तस्मिन्यदुक्तवान्काले तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥

prāptavānparamaṃ duḥkhaṃ putravyasanajaṃ mahat | tasminyaduktavānkāle tanmamācakṣva pṛcchataḥ

पुत्रों पर आई विपत्ति से उन्हें अत्यन्त महान् दुःख प्राप्त हुआ था। मैं पूछता हूँ, उस समय उन्होंने जो कहा, वह मुझे बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (8.5.3)

श्रुत्वा कर्णस्य निधनमश्रद्धेयमिवाद्भुतम् । भूतसम्मोहनं भीमं मेरोः संसर्पणं यथा ॥

śrutvā karṇasya nidhanamaśraddheyamivādbhutam | bhūtasammohanaṃ bhīmaṃ meroḥ saṃsarpaṇaṃ yathā

कर्ण की मृत्यु का समाचार सुनकर, जो अद्भुत और मानो अविश्वसनीय था, सब प्राणियों को मोह में डालनेवाला और भयंकर था, मेरु पर्वत के अपने स्थान से खिसक जाने के समान,

श्लोक 4 (8.5.4)

चित्तमोहमिवायुक्तं भार्गवस्य महामतेः । पराजयमिवेन्द्रस्य द्विषद्भ्यो भीमकर्मणः ॥

cittamohamivāyuktaṃ bhārgavasya mahāmateḥ | parājayamivendrasya dviṣadbhyo bhīmakarmaṇaḥ

महाबुद्धिमान् भार्गव की बुद्धि के भ्रमित हो जाने के समान, भयंकर कर्म करनेवाले इन्द्र की शत्रुओं से पराजय के समान,

श्लोक 5 (8.5.5)

दिवः प्रपतनं भानोरुर्व्यामिव महाद्युतेः । संशोषणमिवाचिन्त्यं समुद्रस्याक्षयाम्भसः ॥

divaḥ prapatanaṃ bhānorurvyāmiva mahādyuteḥ | saṃśoṣaṇamivācintyaṃ samudrasyākṣayāmbhasaḥ

महातेजस्वी सूर्य के आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़ने के समान, अक्षय जलवाले समुद्र के अचिन्तनीय रूप से सूख जाने के समान,

श्लोक 6 (8.5.6)

महीवियद्दिगम्बूनां सर्वनाशमिवाद्भुतम् । कर्मणोरिव वैफल्यमुभयोः पुण्यपापयोः ॥

mahīviyaddigambūnāṃ sarvanāśamivādbhutam | karmaṇoriva vaiphalyamubhayoḥ puṇyapāpayoḥ

पृथ्वी, आकाश, दिशाओं और जल के सर्वनाश के समान अद्भुत, पुण्य और पाप, इन दोनों कर्मों के निष्फल हो जाने के समान,

श्लोक 7 (8.5.7)

सञ्चिन्त्य निपुणं बुद्ध्या धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । नेदमस्तीति सञ्चिन्त्य कर्णस्य समरे वधम् ॥

sañcintya nipuṇaṃ buddhyā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | nedamastīti sañcintya karṇasya samare vadham

जनेश्वर धृतराष्ट्र ने बुद्धि से भली-भाँति विचार करके, कर्ण के युद्ध में वध के विषय में "यह सम्भव नहीं है" ऐसा सोचकर,

श्लोक 8 (8.5.8)

प्राणिनामेवमात्मत्वात्स्यादपीति विचार्य च । शोकाग्निना दह्यमानो धम्यमान इवाशये ॥

prāṇināmevamātmatvātsyādapīti vicārya ca | śokāgninā dahyamāno dhamyamāna ivāśaye

फिर यह विचार करके कि प्राणियों का स्वभाव ही ऐसा है, अतः ऐसा हो भी सकता है, शोकाग्नि से जलते हुए मानो हृदय में धौंके जाते हुए,

श्लोक 9 (8.5.9)

विस्रस्ताङ्गः श्वसन्दीनो हाहेत्युक्त्वा सुदुःखितः । विललाप महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥

visrastāṅgaḥ śvasandīno hāhetyuktvā suduḥkhitaḥ | vilalāpa mahārāja dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ

शिथिल अंगोंवाले, आहें भरते, दीन और अत्यन्त दुःखी अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र "हाय! हाय!" कहकर, हे महाराज, विलाप करने लगे।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 10 (8.5.10)

सञ्जयाधिरथिर्वीरः सिंहद्विरदविक्रमः । वृषभप्रतिमस्कन्धो वृषभाक्षगतिस्वरः ॥

sañjayādhirathirvīraḥ siṃhadviradavikramaḥ | vṛṣabhapratimaskandho vṛṣabhākṣagatisvaraḥ

सञ्जय! अधिरथ का पुत्र वह वीर, जिसकी चाल सिंह और हाथी के समान थी, जिसके कंधे बैल के समान थे और जिसके नेत्र, चाल तथा स्वर भी बैल के समान थे,

श्लोक 11 (8.5.11)

वृषभो वृषभस्येव यो युद्धे न निवर्तते । शत्रोरपि महेन्द्रस्य वज्रसंहननो युवा ॥

vṛṣabho vṛṣabhasyeva yo yuddhe na nivartate | śatrorapi mahendrasya vajrasaṃhanano yuvā

जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटता था, जैसे बैल दूसरे बैल के सामने नहीं हटता, शत्रु बने महेन्द्र के सामने भी नहीं, वज्र के समान कठोर शरीरवाला वह युवा,

श्लोक 12 (8.5.12)

यस्य ज्यातलशब्देन शरवृष्टिरवेण च । रथाश्वनरमातङ्गा नावतिष्ठन्ति संयुगे ॥

yasya jyātalaśabdena śaravṛṣṭiraveṇa ca | rathāśvanaramātaṅgā nāvatiṣṭhanti saṃyuge

जिसकी प्रत्यञ्चा और हथेली की ध्वनि तथा बाण-वर्षा के गर्जन से युद्ध में रथ, घोड़े, मनुष्य और हाथी टिक नहीं पाते थे,

श्लोक 13 (8.5.13)

यमाश्रित्य महाबाहुं द्विषत्सङ्घघ्नमच्युतम् । दुर्योधनोऽकरोद्वैरं पाण्डुपुत्रैर्महारथैः ॥

yamāśritya mahābāhuṃ dviṣatsaṅghaghnamacyutam | duryodhano'karodvairaṃ pāṇḍuputrairmahārathaiḥ

जिस महाबाहु, शत्रु-समूहों के संहारक और अपराजित वीर का आश्रय लेकर दुर्योधन ने महारथी पाण्डवों से वैर किया,

श्लोक 14 (8.5.14)

स कथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णः पार्थेन संयुगे । निहतः पुरुषव्याघ्रः प्रसह्यासह्यविक्रमः ॥

sa kathaṃ rathināṃ śreṣṭhaḥ karṇaḥ pārthena saṃyuge | nihataḥ puruṣavyāghraḥ prasahyāsahyavikramaḥ

वह रथियों में श्रेष्ठ, पुरुषसिंह कर्ण, जिसका पराक्रम असह्य था और जो बलपूर्वक शत्रु को दबा देता था, युद्ध में अर्जुन के हाथों कैसे मारा गया?

श्लोक 15 (8.5.15)

यो नामन्यत वै नित्यमच्युतं च धनञ्जयम् । न वृष्णीन्सहितानन्यान्स्वबाहुबलदर्पितः ॥

yo nāmanyata vai nityamacyutaṃ ca dhanañjayam | na vṛṣṇīnsahitānanyānsvabāhubaladarpitaḥ

अपनी भुजाओं के बल पर गर्व करनेवाला वह कर्ण, जिसने अच्युत कृष्ण और धनञ्जय को, और एकत्र हुए वृष्णियों तथा अन्य किसी को भी कभी कुछ नहीं गिना,

श्लोक 16 (8.5.16)

शार्ङ्गगाण्डीवधन्वानौ सहितावपराजितौ । अहं दिव्याद्रथादेकः पातयिष्यामि संयुगे ॥

śārṅgagāṇḍīvadhanvānau sahitāvaparājitau | ahaṃ divyādrathādekaḥ pātayiṣyāmi saṃyuge

"शार्ङ्ग और गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले उन दोनों अपराजित वीरों को, जो साथ हों तब भी, मैं अकेला अपने दिव्य रथ से युद्ध में गिरा दूँगा,"

श्लोक 17 (8.5.17)

इति यः सततं मन्दमवोचल्लोभमोहितम् । दुर्योधनमवाचीनं राज्यकामुकमातुरम् ॥

iti yaḥ satataṃ mandamavocallobhamohitam | duryodhanamavācīnaṃ rājyakāmukamāturam

इस प्रकार वह सदा लोभ से मोहित, मन्दबुद्धि, चिन्ता से सिर झुकाए, राज्य के लोभी और आतुर दुर्योधन से कहा करता था;

श्लोक 18 (8.5.18)

योऽजयत्सर्वकाम्भोजानावन्त्यान्केकयैः सह । गान्धारान्मद्रकान्मात्स्यांस्त्रिगर्तांस्तङ्कणाञ्शकान् ॥

yo'jayatsarvakāmbhojānāvantyānkekayaiḥ saha | gāndhārānmadrakānmātsyāṃstrigartāṃstaṅkaṇāñśakān

जिसने सब काम्भोजों को, केकयों सहित अवन्तिवासियों को, तथा गान्धारों, मद्रकों, मत्स्यों, त्रिगर्तों, तङ्कणों और शकों को जीत लिया,

श्लोक 19 (8.5.19)

पाञ्चालांश्च विदेहांश्च कुलिन्दान्काशिकोसलान् । सुह्मानङ्गांश्च वङ्गांश्च निषादान्पुण्ड्रकीकटान् ॥

pāñcālāṃśca videhāṃśca kulindānkāśikosalān | suhmānaṅgāṃśca vaṅgāṃśca niṣādānpuṇḍrakīkaṭān

पाञ्चालों, विदेहों, कुलिन्दों, काशियों और कोसलों को, सुह्मों, अङ्गों और वङ्गों को, निषादों, पुण्ड्रों और कीकटों को,

श्लोक 20 (8.5.20)

वत्सान्कलिङ्गान्दरदानश्मकानृषिकानपि । शबरान्हारहूणांश्च प्रघूणान्सरलानपि ॥

vatsānkaliṅgāndaradānaśmakānṛṣikānapi | śabarānhārahūṇāṃśca praghūṇānsaralānapi

वत्सों, कलिङ्गों, दरदों, अश्मकों और ऋषिकों को, शबरों, हारहूणों, प्रघूणों और सरलों को,

श्लोक 21 (8.5.21)

म्लेच्छराष्ट्राधिपांश्चैव दुर्गानाटविकांस्तथा । जित्वैतान्समरे वीरः प्रदीप्तैः कङ्कपत्रिभिः ॥

mleccharāṣṭrādhipāṃścaiva durgānāṭavikāṃstathā | jitvaitānsamare vīraḥ pradīptaiḥ kaṅkapatribhiḥ

और म्लेच्छ राष्ट्रों के अधिपतियों को तथा दुर्गों और वनों में रहनेवालों को भी, इन सबको युद्ध में जीतकर उस वीर ने अपने प्रज्वलित कङ्कपत्र बाणों से,

श्लोक 22 (8.5.22)

करमाहारयामास जित्वा सर्वानरींस्तथा । दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं राधेयो रथिनां वरः । दिव्यास्त्रविन्महातेजाः कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥

karamāhārayāmāsa jitvā sarvānarīṃstathā | duryodhanasya vṛddhyarthaṃ rādheyo rathināṃ varaḥ | divyāstravinmahātejāḥ karṇo vaikartano vṛṣaḥ

उन सब शत्रुओं को जीतकर दुर्योधन की वृद्धि के लिए कर वसूल किया; वह रथियों में श्रेष्ठ राधापुत्र, दिव्य अस्त्रों का ज्ञाता, महातेजस्वी वैकर्तन कर्ण, वृष (बैल के समान श्रेष्ठ) था।

श्लोक 23 (8.5.23)

सेनागोपश्च स कथं शत्रुभिः परमास्त्रवित् । घातितः पाण्डवैः शूरैः समरे वीर्यशालिभिः ॥

senāgopaśca sa kathaṃ śatrubhiḥ paramāstravit | ghātitaḥ pāṇḍavaiḥ śūraiḥ samare vīryaśālibhiḥ

सेना की रक्षा करनेवाला और परम अस्त्रों का ज्ञाता वह कर्ण पराक्रमशाली शूर पाण्डवों के हाथों युद्ध में शत्रुओं द्वारा कैसे मार दिया गया?

श्लोक 24 (8.5.24)

वृषो महेन्द्रो देवेषु वृषः कर्णो नरेष्वपि । तृतीयमन्यं लोकेषु वृषं नैवानुशुश्रुम ॥

vṛṣo mahendro deveṣu vṛṣaḥ karṇo nareṣvapi | tṛtīyamanyaṃ lokeṣu vṛṣaṃ naivānuśuśruma

देवताओं में वृष (श्रेष्ठ) महेन्द्र हैं और मनुष्यों में कर्ण भी वृष है; तीनों लोकों में किसी तीसरे वृष के विषय में हमने कभी नहीं सुना।

श्लोक 25 (8.5.25)

उच्चैः श्रवा वरोऽश्वानां राज्ञां वैश्रवणो वरः । वरो महेन्द्रो देवानां कर्णः प्रहरतां वरः ॥

uccaiḥ śravā varo'śvānāṃ rājñāṃ vaiśravaṇo varaḥ | varo mahendro devānāṃ karṇaḥ praharatāṃ varaḥ

घोड़ों में उच्चैःश्रवा श्रेष्ठ है, राजाओं में वैश्रवण कुबेर श्रेष्ठ हैं, देवताओं में महेन्द्र श्रेष्ठ हैं और प्रहार करनेवालों में कर्ण श्रेष्ठ था।

श्लोक 26 (8.5.26)

योऽजितः पार्थिवैः शूरैः समर्थैर्वीर्यशालिभिः । दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं कृत्स्नामुर्वीमथाजयत् ॥

yo'jitaḥ pārthivaiḥ śūraiḥ samarthairvīryaśālibhiḥ | duryodhanasya vṛddhyarthaṃ kṛtsnāmurvīmathājayat

जिसे पराक्रमी, समर्थ और शूर राजा कभी जीत नहीं सके, उसी ने दुर्योधन की वृद्धि के लिए सारी पृथ्वी को जीत लिया;

श्लोक 27 (8.5.27)

यं लब्ध्वा मागधो राजा सांत्वमानोऽथ सौहृदैः । अरौत्सीत्पार्थिवं क्षत्रमृते यादवकौरवान् ॥

yaṃ labdhvā māgadho rājā sāṃtvamāno'tha sauhṛdaiḥ | arautsītpārthivaṃ kṣatramṛte yādavakauravān

जिसे मित्र के रूप में पाकर मगधराज, मैत्रीपूर्ण व्यवहार से सान्त्वना पाकर, यादवों और कौरवों को छोड़कर शेष सब क्षत्रिय राजाओं को रोके रहा।

श्लोक 28 (8.5.28)

तं श्रुत्वा निहतं कर्णं द्वैरथे सव्यसाचिना । शोकार्णवे निमग्नोऽहं भिन्ना नौरिव सागरे ॥

taṃ śrutvā nihataṃ karṇaṃ dvairathe savyasācinā | śokārṇave nimagno'haṃ bhinnā nauriva sāgare

कर्ण को सव्यसाची अर्जुन के हाथों रथ-द्वन्द्व में मारा गया सुनकर मैं शोक के सागर में डूब गया हूँ, जैसे समुद्र में टूटी हुई नाव डूब जाती है।

श्लोक 29 (8.5.29)

तं वृषं निहतं श्रुत्वा द्वैरथे रथिनां वरम् । शोकार्णवे निमग्नोऽहमप्लुवः सागरे यथा ॥

taṃ vṛṣaṃ nihataṃ śrutvā dvairathe rathināṃ varam | śokārṇave nimagno'hamapluvaḥ sāgare yathā

रथियों में श्रेष्ठ उस वृष कर्ण को रथ-द्वन्द्व में मारा गया सुनकर मैं शोक के सागर में डूब गया हूँ, जैसे समुद्र में नावहीन मनुष्य डूबता है।

श्लोक 30 (8.5.30)

ईदृशैर्यद्यहं दुःखैर्न विनश्यामि सञ्जय । वज्राद्दृढतरं मन्ये हृदयं मम दुर्भिदम् ॥

īdṛśairyadyahaṃ duḥkhairna vinaśyāmi sañjaya | vajrāddṛḍhataraṃ manye hṛdayaṃ mama durbhidam

सञ्जय! ऐसे दुःखों से भी यदि मैं नष्ट नहीं होता, तो मैं समझता हूँ कि मेरा हृदय वज्र से भी अधिक कठोर और कठिनाई से टूटनेवाला है।

श्लोक 31 (8.5.31)

ज्ञातिसंबन्धिमित्राणामिमं श्रुत्वा पराभवम् । को मदन्यः पुमाँल्लोके न जह्यात्सूत जीवितम् ॥

jñātisaṃbandhimitrāṇāmimaṃ śrutvā parābhavam | ko madanyaḥ pumām̐lloke na jahyātsūta jīvitam

अपने जाति-भाइयों, सम्बन्धियों और मित्रों की यह पराजय सुनकर मेरे सिवा संसार में कौन पुरुष है जो, हे सूत, अपने प्राण न छोड़ दे?

श्लोक 32 (8.5.32)

विषमग्निं प्रपातं च पर्वताग्रादहं वृणे । महाप्रस्थानगमनं जलं प्रायोपवेशनम् । न हि शक्ष्यामि दुःखानि सोढुं कष्टानि सञ्जय ॥

viṣamagniṃ prapātaṃ ca parvatāgrādahaṃ vṛṇe | mahāprasthānagamanaṃ jalaṃ prāyopaveśanam | na hi śakṣyāmi duḥkhāni soḍhuṃ kaṣṭāni sañjaya

मैं विष, अग्नि या पर्वत के शिखर से गिरना चुनता हूँ, महाप्रस्थान, जल में प्राण देना या आमरण उपवास; क्योंकि सञ्जय, मैं ये कठोर दुःख सहन नहीं कर सकूँगा।

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