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कर्ण पर्व · अध्याय 4

सञ्जय द्वारा शेष बचे वीरों के नामों का कथन

भीष्म, द्रोण और कर्ण के लिए शोक करते हुए धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि उनके पक्ष के कौन-कौन वीर अभी जीवित हैं। सञ्जय उन वीरों के नाम गिनाते हैं जो दुर्योधन के लिए युद्ध को तैयार खड़े हैं: अश्वत्थामा, कृतवर्मा, शल्य, कृपाचार्य, गान्धारराज, दुर्योधन के पुत्र और कर्ण के पुत्र; हाथियों के बीच दुर्योधन सुशोभित है। इस सूची से धृतराष्ट्र समझ लेते हैं कि अपना पक्ष हार चुका है और शोक से मूर्च्छित हो जाते हैं।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (8.4.1)

मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेकस्य सञ्जय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥

māmakasyāsya sainyasya hṛtotsekasya sañjaya | avaśeṣaṃ na paśyāmi kakude mṛdite sati

सञ्जय! मेरी इस सेना का अभिमान टूट चुका है; इसका ककुद (सबसे ऊँचा अंग) ही कुचल दिया गया है, अतः मुझे इसमें अब कुछ भी शेष नहीं दिखाई देता।

श्लोक 2 (8.4.2)

तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा कोन्वर्थो जीवितेन मे ॥

tau hi vīrau maheṣvāsau madarthe kurusattamau | bhīṣmadroṇau hatau śrutvā konvartho jīvitena me

मेरे लिए खड़े रहनेवाले उन दोनों महान् धनुर्धर कुरुश्रेष्ठ वीरों, भीष्म और द्रोण, के मारे जाने की बात सुनकर अब मुझे जीवन से क्या प्रयोजन है?

श्लोक 3 (8.4.3)

न च मृष्यामि राधेयं हतमाहवशोभिनम् । यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥

na ca mṛṣyāmi rādheyaṃ hatamāhavaśobhinam | yasya bāhvorbalaṃ tulyaṃ kuñjarāṇāṃ śataṃ śatam

रणभूमि की शोभा राधापुत्र कर्ण के मारे जाने को भी मैं सह नहीं पाता, जिसकी भुजाओं में सौ-सौ हाथियों के बराबर बल था।

श्लोक 4 (8.4.4)

हतप्रवरसैन्यं मे यथा शंससि सञ्जय । अहतानपि मे शंस येऽत्र जीवन्ति केचन ॥

hatapravarasainyaṃ me yathā śaṃsasi sañjaya | ahatānapi me śaṃsa ye'tra jīvanti kecana

सञ्जय! तुमने बताया कि मेरी सेना के प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं; अब यह भी बताओ कि यहाँ जो कोई अभी नहीं मारे गए और जीवित हैं, वे कौन हैं।

श्लोक 5 (8.4.5)

एतेषु हि मृतेष्वद्य ये त्वया परिकीर्तिताः । येऽपि जीवन्ति ते सर्वे मृता इति मतिर्मम ॥

eteṣu hi mṛteṣvadya ye tvayā parikīrtitāḥ | ye'pi jīvanti te sarve mṛtā iti matirmama

तुमने जिनके नाम गिनाए, वे सब आज मारे जा चुके; इसलिए जो अब भी जीवित हैं, वे सब भी मेरी समझ में मरे हुओं के समान ही हैं।

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (8.4.6)

यस्मिन्महास्त्राणि समर्पितानि । चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि । दिव्यानि राजन्विहितानि चैव । द्रोणेन वीरद्विजसत्तमेन ॥

yasminmahāstrāṇi samarpitāni | citrāṇi śubhrāṇi caturvidhāni | divyāni rājanvihitāni caiva | droṇena vīradvijasattamena

हे राजन्! वीर द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्य ने जिसके भीतर चार प्रकार के, अद्भुत, उज्ज्वल, दिव्य और विधिपूर्वक निर्धारित महान् अस्त्र स्थापित किए हैं,

श्लोक 7 (8.4.7)

महारथः कृतिमान्क्षिप्रहस्तो । दृढायुधो दृढमुष्टिर्दृढेषुः । स वीर्यवान्द्रोणपुत्रस्तरस्वी । व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

mahārathaḥ kṛtimānkṣiprahasto | dṛḍhāyudho dṛḍhamuṣṭirdṛḍheṣuḥ | sa vīryavāndroṇaputrastarasvī | vyavasthito yoddhukāmastvadarthe

वही महारथी, कुशल, शीघ्रहस्त, दृढ़ आयुधों, दृढ़ मुट्ठी और दृढ़ बाणोंवाला, पराक्रमी और वेगवान् द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आपके लिए युद्ध की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 8 (8.4.8)

आनर्तवासी हृदिकात्मजोऽसौ । महारथः सात्वतानां वरिष्ठः । स्वयं भोजः कृतवर्मा कृतास्त्रो । व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

ānartavāsī hṛdikātmajo'sau | mahārathaḥ sātvatānāṃ variṣṭhaḥ | svayaṃ bhojaḥ kṛtavarmā kṛtāstro | vyavasthito yoddhukāmastvadarthe

आनर्त देश में रहनेवाला, हृदिक का पुत्र, सात्वतों में श्रेष्ठ महारथी, अस्त्रविद्या में निपुण स्वयं भोजवंशी कृतवर्मा आपके लिए युद्ध की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 9 (8.4.9)

आर्तायनिः समरे दुष्प्रकम्प्यः । सेनाग्रणीः प्रथमस्तावकानाम् । यः स्वस्रीयान्पाण्डवेयान्विसृज्य । सत्यां वाचं स्वां चिकीर्षुस्तरस्वी ॥

ārtāyaniḥ samare duṣprakampyaḥ | senāgraṇīḥ prathamastāvakānām | yaḥ svasrīyānpāṇḍaveyānvisṛjya | satyāṃ vācaṃ svāṃ cikīrṣustarasvī

आर्तायनि शल्य, जो युद्ध में अविचल है, आपकी सेना का प्रथम सेनानायक है, और जो अपनी बहन के पुत्र पाण्डवों को छोड़कर अपनी बात को सत्य करना चाहता है, वह वेगवान् वीर,

श्लोक 10 (8.4.10)

तेजोवधं सूतपुत्रस्य सङ्ख्ये । प्रतिश्रुत्याजातशत्रोः पुरस्तात् । दुराधर्षः शक्रसमानवीर्यः । शल्यः स्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

tejovadhaṃ sūtaputrasya saṅkhye | pratiśrutyājātaśatroḥ purastāt | durādharṣaḥ śakrasamānavīryaḥ | śalyaḥ sthito yoddhukāmastvadarthe

अजातशत्रु युधिष्ठिर के सामने सूतपुत्र कर्ण का तेज युद्ध में नष्ट करने की प्रतिज्ञा करके इन्द्र के समान पराक्रमी, दुर्धर्ष शल्य आपके लिए युद्ध की इच्छा से खड़ा है।

श्लोक 11 (8.4.11)

शारद्वतो गौतमश्चापि राजन् । महाबाहुचित्रास्त्रयोधी । धनुश्चित्रं सुमहद्भारसाहं । व्यवस्थितो योद्धुकामः प्रगृह्य ॥

śāradvato gautamaścāpi rājan | mahābāhucitrāstrayodhī | dhanuścitraṃ sumahadbhārasāhaṃ | vyavasthito yoddhukāmaḥ pragṛhya

हे राजन्! शरद्वान् के पुत्र गौतम कृपाचार्य भी, जो महाबाहु और विचित्र अस्त्रों से लड़नेवाले हैं, अपना भारी भार सह लेनेवाला विचित्र और विशाल धनुष उठाकर युद्ध की इच्छा से डटे हुए हैं।

श्लोक 12 (8.4.12)

गान्धारराजः ससुतश्च राजन् । दुर्द्यूतदेवी कलहप्रियश्च । गान्धारमुख्यैर्यवनैश्च राजन् । व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

gāndhārarājaḥ sasutaśca rājan | durdyūtadevī kalahapriyaśca | gāndhāramukhyairyavanaiśca rājan | vyavasthito yoddhukāmastvadarthe

हे राजन्! अपने पुत्र के साथ गान्धारराज शकुनि, जो बुरे द्यूत का खिलाड़ी और कलह-प्रिय है, गान्धार देश के प्रमुख वीरों और यवनों के साथ आपके लिए युद्ध की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 13 (8.4.13)

महारथः केकयराजपुत्रः । सदश्वयुक्तं च पताकिनं च । रथं समारुह्य कुरुप्रवीर । व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

mahārathaḥ kekayarājaputraḥ | sadaśvayuktaṃ ca patākinaṃ ca | rathaṃ samāruhya kurupravīra | vyavasthito yoddhukāmastvadarthe

हे कुरुवीर! केकयराज का पुत्र महारथी, उत्तम घोड़ों से जुते और पताका से सजे रथ पर सवार होकर आपके लिए युद्ध की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 14 (8.4.14)

तथा सुतस्ते ज्वलनार्कवर्णं । रथं समास्थाय कुरुप्रवीरः । व्यवस्थितः पुरुमित्रो नरेन्द्र । व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा खे ॥

tathā sutaste jvalanārkavarṇaṃ | rathaṃ samāsthāya kurupravīraḥ | vyavasthitaḥ purumitro narendra | vyabhre sūryo bhrājamāno yathā khe

हे नरेन्द्र! और आपका पुत्र पुरुमित्र, कुरुकुल का वीर, अग्नि और सूर्य के समान दीप्त रथ पर आरूढ़ होकर मेघहीन आकाश में चमकते सूर्य की भाँति डटा हुआ है।

श्लोक 15 (8.4.15)

दुर्योधनो नागकुलस्य मध्ये । व्यवस्थितः सिंह इवाबभासे । रथेन जाम्बूनदभूषणेन । व्यवस्थितः समरे योत्स्यमानः ॥

duryodhano nāgakulasya madhye | vyavasthitaḥ siṃha ivābabhāse | rathena jāmbūnadabhūṣaṇena | vyavasthitaḥ samare yotsyamānaḥ

हाथियों के समूह के बीच खड़ा दुर्योधन सिंह की भाँति शोभित हुआ; सोने के आभूषणों से सजे रथ पर वह युद्ध करने को डटा हुआ है।

श्लोक 16 (8.4.16)

स राजमध्ये पुरुषप्रवीरो । रराज जाम्बूनदचित्रवर्मा । पद्मप्रभो वह्निरिवाल्पधूमो । मेघान्तरे सूर्य इव प्रकाशः ॥

sa rājamadhye puruṣapravīro | rarāja jāmbūnadacitravarmā | padmaprabho vahnirivālpadhūmo | meghāntare sūrya iva prakāśaḥ

राजाओं के बीच वह पुरुषश्रेष्ठ दुर्योधन अपने सोने के विचित्र कवच में कमल के समान कान्ति से, कम धुएँवाली अग्नि और बादलों के बीच चमकते सूर्य की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 17 (8.4.17)

तथा सुषेणोऽप्यसिचर्मपाणिः । तवात्मजः सत्यसेनश्च वीरः । व्यवस्थितौ चित्रसेनेन सार्धं । हृष्टात्मानौ समरे योद्धुकामौ ॥

tathā suṣeṇo'pyasicarmapāṇiḥ | tavātmajaḥ satyasenaśca vīraḥ | vyavasthitau citrasenena sārdhaṃ | hṛṣṭātmānau samare yoddhukāmau

इसी प्रकार हाथ में तलवार और ढाल लिए आपका पुत्र सुषेण और वीर सत्यसेन चित्रसेन के साथ प्रसन्नचित्त होकर युद्ध की इच्छा से डटे हुए हैं।

श्लोक 18 (8.4.18)

ह्रीनिषेवो भारतराजपुत्र । उग्रायुधः श्रुतवर्मा जयश्च । शलश्च सत्यव्रतदुःशलौ च । व्यवस्थिताः सहसैन्या नराग्र्याः ॥

hrīniṣevo bhāratarājaputra | ugrāyudhaḥ śrutavarmā jayaśca | śalaśca satyavrataduḥśalau ca | vyavasthitāḥ sahasainyā narāgryāḥ

ह्रीनिषेव, जो भरतवंश का राजकुमार है, उग्रायुध, श्रुतवर्मा और जय, शल तथा सत्यव्रत और दुःशल, ये नरश्रेष्ठ अपनी-अपनी सेनाओं के साथ डटे हुए हैं।

श्लोक 19 (8.4.19)

कैतव्यानामधिपः शूरमानी । रणेरणे शत्रुहा राजपुत्रः । रथी हयी नागपत्तिप्रयायी । व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥

kaitavyānāmadhipaḥ śūramānī | raṇeraṇe śatruhā rājaputraḥ | rathī hayī nāgapattiprayāyī | vyavasthito yoddhukāmastvadarthe

कैतव्यों का अधिपति, अपने शौर्य पर अभिमान करनेवाला, हर युद्ध में शत्रुओं को मारनेवाला वह राजकुमार रथ और घोड़ों के साथ तथा हाथियों और पैदल सेना के संग चलनेवाला होकर आपके लिए युद्ध की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 20 (8.4.20)

वीरः श्रुतायुश्च धृतायुधश्च । चित्राङ्गदश्चित्रसेनश्च वीरः । व्यवस्थिता योद्धुकामा नराग्र्याः । प्रहारिणो मानिनः सत्यसन्धाः ॥

vīraḥ śrutāyuśca dhṛtāyudhaśca | citrāṅgadaścitrasenaśca vīraḥ | vyavasthitā yoddhukāmā narāgryāḥ | prahāriṇo māninaḥ satyasandhāḥ

वीर श्रुतायु, धृतायुध, चित्राङ्गद और वीर चित्रसेन, ये नरश्रेष्ठ, प्रहार करनेवाले, स्वाभिमानी और सत्यप्रतिज्ञ योद्धा युद्ध की इच्छा से डटे हुए हैं।

श्लोक 21 (8.4.21)

कर्णात्मजः सत्यसन्धो महात्मा । व्यवस्थितः समरे योद्धुकामः ॥

karṇātmajaḥ satyasandho mahātmā | vyavasthitaḥ samare yoddhukāmaḥ

कर्ण का महात्मा और सत्यप्रतिज्ञ पुत्र युद्ध में लड़ने की इच्छा से डटा हुआ है।

श्लोक 22 (8.4.22)

अथापरौ कर्णसुतौ वरास्त्रौ । व्यवस्थितौ लघुहस्तौ नरेन्द्र । बले महत्युल्बणसत्ववीर्यौ । समास्थितौ योद्धुकामौ त्वदर्थे ॥

athāparau karṇasutau varāstrau | vyavasthitau laghuhastau narendra | bale mahatyulbaṇasatvavīryau | samāsthitau yoddhukāmau tvadarthe

हे नरेन्द्र! कर्ण के दो और पुत्र भी, जो श्रेष्ठ अस्त्रों के ज्ञाता और शीघ्रहस्त हैं, उस विशाल सेना में उग्र बल और पराक्रम के साथ आपके लिए युद्ध की इच्छा से स्थित हैं।

श्लोक 23 (8.4.23)

एतैश्च मुख्यैरपरैश्च राजन् । योधप्रवीरैरमितप्रभावैः । व्यवस्थितो नागकुलस्य मध्ये । यथा महेन्द्रः कुरुराजो जयाय ॥

etaiśca mukhyairaparaiśca rājan | yodhapravīrairamitaprabhāvaiḥ | vyavasthito nāgakulasya madhye | yathā mahendraḥ kururājo jayāya

हे राजन्! इन प्रमुख वीरों और अपरिमित प्रभाववाले दूसरे श्रेष्ठ योद्धाओं के साथ कुरुराज दुर्योधन विजय के लिए हाथियों के समूह के बीच महेन्द्र की भाँति डटा हुआ है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 24 (8.4.24)

आख्याता जीवमाना ये परे सैन्या यथायथम् । इतीदमवगच्छामि व्यक्तमर्थाभिपत्तितः ॥

ākhyātā jīvamānā ye pare sainyā yathāyatham | itīdamavagacchāmi vyaktamarthābhipattitaḥ

दूसरे पक्ष की सेनाओं के जो वीर जीवित हैं, उनके नाम क्रम से गिना दिए गए; इस कथन के तात्पर्य से मैं अब स्पष्ट समझ गया हूँ कि स्थिति क्या है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (8.4.25)

एवं ब्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । हतप्रवीरं भूयिष्ठं किञ्चिच्छेषं स्वकं बलम् । श्रुत्वा व्यामोहमागच्छच्छोकव्याकुलितेन्द्रियः ॥

evaṃ bruvanneva tadā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | hatapravīraṃ bhūyiṣṭhaṃ kiñciccheṣaṃ svakaṃ balam | śrutvā vyāmohamāgacchacchokavyākulitendriyaḥ

इस प्रकार बोलते-बोलते ही अम्बिका के पुत्र धृतराष्ट्र यह सुनकर कि उनकी सेना के अधिकांश वीर मारे जा चुके हैं और थोड़ा-सा ही बल शेष है, शोक से व्याकुल इन्द्रियों के साथ मूर्च्छित-से हो गए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 26 (8.4.26)

व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । मनो मुह्यति चाङ्गानि न च शक्नोमि धावितुम् ॥

vyākulaṃ me manastāta śrutvā sumahadapriyam | mano muhyati cāṅgāni na ca śaknomi dhāvitum

तात सञ्जय! यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया है; मेरा मन घूम रहा है, अंग शिथिल हो रहे हैं और मैं दौड़ भी नहीं सकता।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (8.4.27)

इत्येवमुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । भ्रान्तचित्तस्ततः सोऽथ बभूव जगतीपतिः ॥

ityevamuktvā vacanaṃ dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | bhrāntacittastataḥ so'tha babhūva jagatīpatiḥ

ये वचन कहकर अम्बिका के पुत्र पृथ्वीपति धृतराष्ट्र उसी समय भ्रान्तचित्त हो गए।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5