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कर्ण पर्व · अध्याय 90

अर्जुन द्वारा वृषसेन का वध

नकुल को रथहीन और कृष्ण को घायल देखकर अर्जुन वृषसेन पर चढ़ता है, जो अर्जुन और कृष्ण दोनों को बाणों से बींध देता है। क्रुद्ध अर्जुन कर्ण को चेताता है कि वह उसके सामने वृषसेन को और फिर कर्ण को भी मारेगा, और चार बाणों से वृषसेन का धनुष, भुजाएँ और सिर काट डालता है। कर्ण का रथ आने पर कृष्ण उसकी ध्वजा और सारथि दिखाकर अर्जुन को कर्ण का वध करने को प्रेरित करते हैं और स्मरण कराते हैं कि उसने युद्ध से शिव को प्रसन्न किया है। अर्जुन कर्ण को मारने या स्वयं मरने की प्रतिज्ञा करता है और कृष्ण घोड़ों को शीघ्र कर्ण के रथ तक पहुँचा देते हैं।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.90.1)

ततः किरीटी परवीरघाती । हताश्वमालोक्य नरप्रवीरम् । माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये । समीक्ष्य कृष्णं भृशविक्षतं च । तमभ्यधावद्वृषसेनमाहवे । स सूतजस्य प्रमुखे स्थितस्तदा ॥

tataḥ kirīṭī paravīraghātī | hatāśvamālokya narapravīram | mādrīsutaṃ nakulaṃ lokamadhye | samīkṣya kṛṣṇaṃ bhṛśavikṣataṃ ca | tamabhyadhāvadvṛṣasenamāhave | sa sūtajasya pramukhe sthitastadā

तब शत्रु-वीरों का संहार करने वाले किरीटी (अर्जुन) ने रणभूमि के बीच घोड़ों से हीन हुए वीर माद्री-पुत्र नकुल को देखा और कृष्ण को भी बहुत घायल देखा; तब वह युद्ध में वृषसेन पर झपटा और सूतपुत्र के सामने जा खड़ा हुआ।

श्लोक 2 (8.90.2)

तमापतन्तं नरवीरमुग्रं । महाहवे बाणसहस्रधारिणम् । अभ्यापतत्कर्णसुतो महारथं । यथा महेन्द्रं नमुचिः पुरा तथा ॥

tamāpatantaṃ naravīramugraṃ | mahāhave bāṇasahasradhāriṇam | abhyāpatatkarṇasuto mahārathaṃ | yathā mahendraṃ namuciḥ purā tathā

महायुद्ध में हज़ारों बाण धारण करने वाले उस उग्र नरवीर पर, आते समय, कर्ण-पुत्र उसी तरह टूट पड़ा जैसे पहले नमुचि इन्द्र पर टूटा था।

श्लोक 3 (8.90.3)

तौ तत्र शूरौ रथकुञ्जरौ रणे । परस्परस्याभिमुखौ महारथौ । ससर्जतुः शरसङ्घाननेकान् । सम्भ्रान्तरूपौ सुभृशं तदानीम् ॥

tau tatra śūrau rathakuñjarau raṇe | parasparasyābhimukhau mahārathau | sasarjatuḥ śarasaṅghānanekān | sambhrāntarūpau subhṛśaṃ tadānīm

वहाँ रथी-वीरों में गजराज के समान वे दोनों शूर महारथी युद्ध में आमने-सामने होकर उस समय अत्यन्त उत्तेजित हो अनेक बाण-समूह छोड़ने लगे।

श्लोक 4 (8.90.4)

ततो द्रुतं चैकशरेण पार्थं । शितेन विद्ध्वा युधि कर्णपुत्रः । ननाद नादं सुमहानुभावो । विद्ध्वेव शक्रं नमुचिः स वीरः ॥

tato drutaṃ caikaśareṇa pārthaṃ | śitena viddhvā yudhi karṇaputraḥ | nanāda nādaṃ sumahānubhāvo | viddhveva śakraṃ namuciḥ sa vīraḥ

तब कर्ण-पुत्र ने युद्ध में एक तीखे बाण से शीघ्र ही पार्थ को बींधकर बड़ी गर्जना की — वह महान् प्रभावशाली वीर इन्द्र को बींधकर गरजते नमुचि के समान था।

श्लोक 5 (8.90.5)

पुनः स पार्थं वृषसेन उग्रैः । बाणैरविद्ध्यद्भुजमूले तु सव्ये । तथैव कृष्णं नवभिः समार्दयत् । पुनश्च पार्थं दशभिर्जघान ॥

punaḥ sa pārthaṃ vṛṣasena ugraiḥ | bāṇairaviddhyadbhujamūle tu savye | tathaiva kṛṣṇaṃ navabhiḥ samārdayat | punaśca pārthaṃ daśabhirjaghāna

वृषसेन ने फिर उग्र बाणों से पार्थ को बायीं भुजा के मूल में बींधा, वैसे ही कृष्ण को नौ बाणों से पीड़ित किया, और फिर पार्थ को दस बाणों से घायल किया।

श्लोक 6 (8.90.6)

पूर्वं यथा वृषसेनप्रयुक्तैः । अभ्याहतः श्वेतहयः शरैस्तैः । संरम्भमीषद्गमितो वधाय । कर्णात्मजस्याथ मनः प्रदध्रे ॥

pūrvaṃ yathā vṛṣasenaprayuktaiḥ | abhyāhataḥ śvetahayaḥ śaraistaiḥ | saṃrambhamīṣadgamito vadhāya | karṇātmajasyātha manaḥ pradadhre

वृषसेन के चलाए उन बाणों से पहले की तरह घायल हुए श्वेतवाहन अर्जुन ने कुछ क्रोध में आकर कर्ण-पुत्र के वध का मन बना लिया।

श्लोक 7 (8.90.7)

ततः किरीटी रणमूर्ध्नि कोपात् । कृत्वा त्रिशाखां भ्रुकुटिं ललाटे । मुमोच तूर्णं विशिखान्महात्मा । वधे धृतः कर्णसुतस्य सङ्ख्ये । आरक्तनेत्रोऽन्तकशत्रुहन्ता । उवाच कर्णं भृशमुत्स्मयंस्तदा ॥

tataḥ kirīṭī raṇamūrdhni kopāt | kṛtvā triśākhāṃ bhrukuṭiṃ lalāṭe | mumoca tūrṇaṃ viśikhānmahātmā | vadhe dhṛtaḥ karṇasutasya saṅkhye | āraktanetro'ntakaśatruhantā | uvāca karṇaṃ bhṛśamutsmayaṃstadā

तब किरीटी ने रण के मुहाने पर क्रोध से माथे पर तीन रेखाओं वाली भौंहें तान लीं और कर्ण-पुत्र के वध पर अड़कर शीघ्र ही बाण छोड़े; लाल आँखों वाला, शत्रुओं के लिए काल-रूप वह महात्मा ज़ोर से हँसते हुए कर्ण से बोला —

अर्जुन उवाच

श्लोक 8 (8.90.8)

दुर्योधनं द्रौणिमुखांश्च सर्वान् । अहं रणे वृषसेनं तमुग्रम् । सम्पश्यतः कर्ण तवाद्य सङ्ख्ये । नयामि लोकं निशितैः पृषत्कैः ॥

duryodhanaṃ drauṇimukhāṃśca sarvān | ahaṃ raṇe vṛṣasenaṃ tamugram | sampaśyataḥ karṇa tavādya saṅkhye | nayāmi lokaṃ niśitaiḥ pṛṣatkaiḥ

"दुर्योधन और द्रोण-पुत्र आदि सबके देखते हुए, और हे कर्ण! तुम्हारे सामने ही, मैं आज युद्ध में अपने तीखे बाणों से उस उग्र वृषसेन को परलोक भेज दूँगा।

श्लोक 9 (8.90.9)

ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति । सर्वैर्भवद्भिर्मम सूनुर्हतोऽसौ । एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी । अहं हनिष्ये भवतां समक्षम् ॥

ūnaṃ ca tāvaddhi janā vadanti | sarvairbhavadbhirmama sūnurhato'sau | eko ratho madvihīnastarasvī | ahaṃ haniṣye bhavatāṃ samakṣam

लोग यह भी कमी बताते हैं कि तुम सबने मिलकर मेरे उस पुत्र को मारा, जो अकेला, वेगवान् रथी था और जिसके पास मैं नहीं था। मैं तुम सबके सामने उसे मारूँगा।

श्लोक 10 (8.90.10)

संरक्ष्यतां रथसंस्थाः सुतोऽयम् । अहं हनिष्ये वृषसेनमेनम् । पश्चाद्वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढम् । अहं हनिष्येऽर्जुन आजिमध्ये ॥

saṃrakṣyatāṃ rathasaṃsthāḥ suto'yam | ahaṃ haniṣye vṛṣasenamenam | paścādvadhiṣye tvāmapi sampramūḍham | ahaṃ haniṣye'rjuna ājimadhye

रथों में खड़े तुम सब लोग इस पुत्र की रक्षा कर लो। मैं वृषसेन को यहीं मारूँगा। उसके बाद मूढ़ बने हुए तुम्हें भी मैं, अर्जुन, युद्ध के बीच मारूँगा।

श्लोक 11 (8.90.11)

तमद्य मूलं कलहस्य सङ्ख्ये । दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम् । त्वामद्य हन्तास्मि रणे प्रसह्य । अस्यैव हन्ता युधि भीमसेनः । दुर्योधनस्याधमपूरुषस्य । यस्यानयादेष महान्क्षयोऽभवत् ॥

tamadya mūlaṃ kalahasya saṅkhye | duryodhanāpāśrayajātadarpam | tvāmadya hantāsmi raṇe prasahya | asyaiva hantā yudhi bhīmasenaḥ | duryodhanasyādhamapūruṣasya | yasyānayādeṣa mahānkṣayo'bhavat

आज इस युद्ध में मैं बलपूर्वक तुम्हें मारूँगा — तुम जो इस कलह की जड़ हो और दुर्योधन के सहारे जिसका घमण्ड बढ़ा है; और भीमसेन युद्ध में इसी नीच दुर्योधन को मारेगा, जिसके अन्याय से यह भारी संहार हुआ है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (8.90.12)

स एवमुक्त्वा विनिमृज्य चापं । लक्ष्यं हि कृत्वा वृषसेनमाजौ । ससर्ज बाणान्विशिखान्महात्मा । वधाय राजन्कर्णसुतस्य सङ्ख्ये ॥

sa evamuktvā vinimṛjya cāpaṃ | lakṣyaṃ hi kṛtvā vṛṣasenamājau | sasarja bāṇānviśikhānmahātmā | vadhāya rājankarṇasutasya saṅkhye

यह कहकर महात्मा अर्जुन ने धनुष को पोंछा, युद्ध में वृषसेन को निशाना बनाया और हे राजन्! कर्ण-पुत्र का वध करने के लिए बाण छोड़े।

श्लोक 13 (8.90.13)

विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कैः । मर्मस्वशङ्कं प्रहसन्किरीटी । चिच्छेद चास्येष्वसनं भुजौ च । क्षुरैश्चतुर्भिर्निशितैः शिरश्च ॥

vivyādha cainaṃ daśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | marmasvaśaṅkaṃ prahasankirīṭī | ciccheda cāsyeṣvasanaṃ bhujau ca | kṣuraiścaturbhirniśitaiḥ śiraśca

किरीटी ने हँसते हुए निडर होकर दस बाणों से उसके मर्मस्थानों को बींधा, और चार तीखे क्षुर-बाणों से उसका धनुष, दोनों भुजाएँ और सिर काट डाले।

श्लोक 14 (8.90.14)

स पार्थबाणाभिहतः पपात । रथाद्विबाहुर्विशिरा धरायाम् । सुपुष्पितो वज्रहतोऽतिमात्रो । भग्नो यथा साल इवावकृत्तः ॥

sa pārthabāṇābhihataḥ papāta | rathādvibāhurviśirā dharāyām | supuṣpito vajrahato'timātro | bhagno yathā sāla ivāvakṛttaḥ

पार्थ के बाणों से मारा गया वह भुजाओं और सिर से रहित होकर रथ से भूमि पर गिर पड़ा, जैसे पूरी तरह फूला हुआ, वज्र से मारा गया, टूटा और कटा हुआ साल का विशाल वृक्ष गिरता है।

श्लोक 15 (8.90.15)

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् । गर्जन्तं सुमहाकायं दुर्निवारं सुरैरपि । अर्जुनं प्राह दाशार्हः प्रहस्य पुरुषर्षभः ॥

tamāyāntamabhiprekṣya velodvṛttamivārṇavam | garjantaṃ sumahākāyaṃ durnivāraṃ surairapi | arjunaṃ prāha dāśārhaḥ prahasya puruṣarṣabhaḥ

उसे आते देखकर — तट को लाँघते समुद्र की तरह गरजता, विशाल शरीर वाला और देवताओं से भी न रोका जा सकने वाला — पुरुषश्रेष्ठ दाशार्ह (कृष्ण) ने हँसकर अर्जुन से कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 16 (8.90.16)

अयं स रथ आयाति श्वेताश्वः शल्यसारथिः । येन ते सह योद्धव्यं स्थिरो भव धनञ्जय ॥

ayaṃ sa ratha āyāti śvetāśvaḥ śalyasārathiḥ | yena te saha yoddhavyaṃ sthiro bhava dhanañjaya

"वह रथ आ रहा है — श्वेत घोड़ों वाला, जिसका सारथि शल्य है और जिसके स्वामी से तुम्हें लड़ना है। धनञ्जय! दृढ़ रहो।

श्लोक 17 (8.90.17)

पश्य चैनं समायुक्तं रथं कर्णस्य पाण्डव । श्वेतवाजिसमायुक्तं युक्तं राधासुतेन च ॥

paśya cainaṃ samāyuktaṃ rathaṃ karṇasya pāṇḍava | śvetavājisamāyuktaṃ yuktaṃ rādhāsutena ca

हे पाण्डव! कर्ण के इस रथ को देखो — भली-भाँति सजा हुआ, श्वेत घोड़ों से जुता और राधा-पुत्र से अधिष्ठित।

श्लोक 18 (8.90.18)

नानापताकाकलिलं किङ्किणीजालमालिनम् । उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ॥

nānāpatākākalilaṃ kiṅkiṇījālamālinam | uhyamānamivākāśe vimānaṃ pāṇḍurairhayaiḥ

अनेक पताकाओं से भरा, घुँघरुओं की जालमाला से सजा वह रथ अपने सफ़ेद घोड़ों द्वारा आकाश में चलते विमान की तरह ढोया जा रहा है।

श्लोक 19 (8.90.19)

ध्वजं च पश्य कर्णस्य नागकक्षं महात्मनः । आखण्डलधनुःप्रख्यमुल्लिखन्तमिवाम्बरम् ॥

dhvajaṃ ca paśya karṇasya nāgakakṣaṃ mahātmanaḥ | ākhaṇḍaladhanuḥprakhyamullikhantamivāmbaram

और महात्मा कर्ण की ध्वजा को देखो, जिस पर हाथी की रस्सी का चिह्न है, जो इन्द्रधनुष जैसी दमकती है और मानो आकाश को खुरच रही है।

श्लोक 20 (8.90.20)

पश्य कर्णं समायान्तं धार्तराष्ट्रप्रियैषिणम् । शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवाम्बुदम् ॥

paśya karṇaṃ samāyāntaṃ dhārtarāṣṭrapriyaiṣiṇam | śaradhārā vimuñcantaṃ dhārāsāramivāmbudam

धृतराष्ट्र के पुत्रों का प्रिय करने की इच्छा वाले कर्ण को आते देखो, जो बादल की मूसलाधार वर्षा की तरह बाणों की धाराएँ छोड़ रहा है।

श्लोक 21 (8.90.21)

एष मद्रेश्वरो राजा रथाग्रे पर्यवस्थितः । नियच्छति हयानस्य राधेयस्यामितौजसः ॥

eṣa madreśvaro rājā rathāgre paryavasthitaḥ | niyacchati hayānasya rādheyasyāmitaujasaḥ

यह मद्रराज रथ के अगले भाग में खड़ा है और अपार तेज वाले इस राधेय के घोड़ों को सँभाल रहा है।

श्लोक 22 (8.90.22)

शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दं च दारुणम् । सिंहनादांश्च विविधाञ्शृणु पाण्डव सर्वशः ॥

śṛṇu dundubhinirghoṣaṃ śaṅkhaśabdaṃ ca dāruṇam | siṃhanādāṃśca vividhāñśṛṇu pāṇḍava sarvaśaḥ

नगाड़ों की गड़गड़ाहट और शंखों की भयंकर ध्वनि सुनो; और हे पाण्डव! चारों ओर से उठती सिंहनादों की तरह-तरह की गर्जनाएँ सुनो।

श्लोक 23 (8.90.23)

अन्तर्धाय महाशब्दान्कर्णेनामिततेजसा । दोधूयमानस्य भृशं धनुषः शृणु निःस्वनम् ॥

antardhāya mahāśabdānkarṇenāmitatejasā | dodhūyamānasya bhṛśaṃ dhanuṣaḥ śṛṇu niḥsvanam

अपार तेज वाला कर्ण दूसरे बड़े शब्दों को दबाते हुए अपने धनुष को ज़ोर से हिला रहा है — उसकी टंकार सुनो।

श्लोक 24 (8.90.24)

एते दीर्यन्ति सगणाः पाञ्चालानां महारथाः । दृष्ट्वा केसरिणं क्रुद्धं मृगा इव महावने ॥

ete dīryanti sagaṇāḥ pāñcālānāṃ mahārathāḥ | dṛṣṭvā kesariṇaṃ kruddhaṃ mṛgā iva mahāvane

क्रुद्ध सिंह को देखकर बड़े वन के हिरनों की तरह ये पाञ्चालों के महारथी अपने दलों-सहित बिखरे जा रहे हैं।

श्लोक 25 (8.90.25)

सर्वयत्नेन कौन्तेय हन्तुमर्हसि सूतजम् । न हि कर्णशरानन्यः सोढुमुत्सहते नरः ॥

sarvayatnena kaunteya hantumarhasi sūtajam | na hi karṇaśarānanyaḥ soḍhumutsahate naraḥ

हे कुन्ती-पुत्र! पूरे प्रयत्न से तुम्हें सूतपुत्र को मारना चाहिए; क्योंकि कर्ण के बाणों को सहने का साहस दूसरा कोई मनुष्य नहीं करता।

श्लोक 26 (8.90.26)

सदेवासुरगन्धर्वांस्त्रीँल्लोकान्सचराचरान् । त्वं हि जेतुं रणे शक्तस्तथैव विदितं मम ॥

sadevāsuragandharvāṃstrīm̐llokānsacarācarān | tvaṃ hi jetuṃ raṇe śaktastathaiva viditaṃ mama

तुम देवता, असुर और गन्धर्वों सहित चर-अचर तीनों लोकों को युद्ध में जीतने में समर्थ हो — यह मैं जानता हूँ।

श्लोक 27 (8.90.27)

भीममुग्रं महात्मानं त्र्यक्षं शर्वं कपर्दिनम् । न शक्ता द्रष्टुमीशानं किं पुनर्योधितुं प्रभुम् ॥

bhīmamugraṃ mahātmānaṃ tryakṣaṃ śarvaṃ kapardinam | na śaktā draṣṭumīśānaṃ kiṃ punaryodhituṃ prabhum

उस भयंकर, उग्र, महात्मा, त्रिनेत्र, जटाधारी शर्व ईशान को दूसरे लोग देख भी नहीं सकते, उस प्रभु से लड़ना तो दूर की बात है।

श्लोक 28 (8.90.28)

त्वया साक्षान्महादेवः सर्वभूतशिवः शिवः । युद्धेनाराधितः स्थाणुर्देवाश्च वरदास्तव ॥

tvayā sākṣānmahādevaḥ sarvabhūtaśivaḥ śivaḥ | yuddhenārādhitaḥ sthāṇurdevāśca varadāstava

सब प्राणियों के लिए कल्याणकारी स्वयं महादेव शिव, स्थाणु को, तुमने युद्ध से प्रसन्न किया था, और देवता भी तुम्हें वर देने वाले हैं।

श्लोक 29 (8.90.29)

तस्य पार्थ प्रसादेन देवदेवस्य शूलिनः । जहि कर्णं महाबाहो नमुचिं वृत्रहा यथा ॥

tasya pārtha prasādena devadevasya śūlinaḥ | jahi karṇaṃ mahābāho namuciṃ vṛtrahā yathā

हे पार्थ! उन्हीं देवदेव त्रिशूलधारी की कृपा से, हे महाबाहो! कर्ण को मार डालो, जैसे वृत्रहन्ता इन्द्र ने नमुचि को मारा था।

श्लोक 30 (8.90.30)

श्रेयस्तेऽस्तु सदा पार्थ युद्धे जयमवाप्नुहि ॥

śreyaste'stu sadā pārtha yuddhe jayamavāpnuhi

हे पार्थ! तुम्हारा सदा कल्याण हो; युद्ध में विजय पाओ।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 31 (8.90.31)

ध्रुव एव जयः कृष्ण मम नास्त्यत्र संशयः । सर्वलोकगुरुर्यस्त्वं तुष्टोऽसि मधुसूदन ॥

dhruva eva jayaḥ kṛṣṇa mama nāstyatra saṃśayaḥ | sarvalokagururyastvaṃ tuṣṭo'si madhusūdana

"कृष्ण! विजय निश्चित है, इसमें मुझे संशय नहीं; क्योंकि हे मधुसूदन! समस्त लोकों के गुरु आप मुझ पर प्रसन्न हैं।

श्लोक 32 (8.90.32)

चोदयाश्वान्हृषीकेश रथं मम महारथ । नाहत्वा समरे कर्णं निवर्तिष्यति फल्गुनः ॥

codayāśvānhṛṣīkeśa rathaṃ mama mahāratha | nāhatvā samare karṇaṃ nivartiṣyati phalgunaḥ

हृषीकेश! घोड़ों को हाँकिए — हे महारथी, मेरे रथ को आगे बढ़ाइए। कर्ण को मारे बिना फाल्गुन युद्ध से नहीं लौटेगा।

श्लोक 33 (8.90.33)

अद्य कर्णं हतं पश्य मच्छरैः शकलीकृतम् । मां वा द्रक्ष्यसि गोविन्द कर्णेन निहतं शरैः ॥

adya karṇaṃ hataṃ paśya maccharaiḥ śakalīkṛtam | māṃ vā drakṣyasi govinda karṇena nihataṃ śaraiḥ

आज आप कर्ण को मेरे बाणों से टुकड़े-टुकड़े होकर मरा हुआ देखेंगे — या हे गोविन्द! मुझे कर्ण के बाणों से मरा हुआ देखेंगे।

श्लोक 34 (8.90.34)

उपस्थितमिदं घोरं युद्धं त्रैलोक्यमोहनम् । यज्जनाः कथयिष्यन्ति यावद्भूमिर्धरिष्यति ॥

upasthitamidaṃ ghoraṃ yuddhaṃ trailokyamohanam | yajjanāḥ kathayiṣyanti yāvadbhūmirdhariṣyati

तीनों लोकों को मोह में डालने वाला यह भयंकर युद्ध आ पहुँचा है; जब तक पृथ्वी टिकी रहेगी, लोग इसकी चर्चा करेंगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 35 (8.90.35)

एवं ब्रुवंस्तदा पार्थः कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रत्युद्ययौ रथेनाशु गजं प्रतिगजो यथा ॥

evaṃ bruvaṃstadā pārthaḥ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam | pratyudyayau rathenāśu gajaṃ pratigajo yathā

अनायास कर्म करने वाले कृष्ण से यह कहता हुआ पार्थ तब शीघ्र रथ पर चढ़कर शत्रु का सामना करने चला, जैसे हाथी के सामने हाथी जाता है।

श्लोक 36 (8.90.36)

पुनरप्याह तेजस्वी पार्थः कृष्णमरिन्दम । चोदयाश्वान्हृषीकेश कालोऽयमतिवर्तते ॥

punarapyāha tejasvī pārthaḥ kṛṣṇamarindama | codayāśvānhṛṣīkeśa kālo'yamativartate

हे शत्रुदमन! तेजस्वी पार्थ ने फिर कृष्ण से कहा — "हृषीकेश! घोड़ों को हाँकिए, यह समय बीता जा रहा है।"

श्लोक 37 (8.90.37)

एवमुक्तस्तदा तेन पाण्डवेन महात्मना । जयेन सम्पूज्य स पाण्डवं तदा । प्रचोदयामास हयान्मनोजवान् ॥

evamuktastadā tena pāṇḍavena mahātmanā | jayena sampūjya sa pāṇḍavaṃ tadā | pracodayāmāsa hayānmanojavān

महात्मा पाण्डव के यह कहने पर उन्होंने "विजय हो" कहकर पाण्डव का सम्मान किया और मन के समान वेगवान् घोड़ों को हाँका।

श्लोक 38 (8.90.38)

स पाण्डुपुत्रस्य रथो मनोजवः । क्षणेन कर्णस्य रथाग्रगोऽभवत् ॥

sa pāṇḍuputrasya ratho manojavaḥ | kṣaṇena karṇasya rathāgrago'bhavat

पाण्डु-पुत्र का मन के समान वेगवान् वह रथ क्षण भर में कर्ण के रथ के आगे जा पहुँचा।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91