कर्ण पर्व · अध्याय 91
कर्ण और अर्जुन का सामना; समस्त लोकों का पक्ष-विभाजन
पुत्र वृषसेन को मारा गया देखकर कर्ण अर्जुन की ओर बढ़ता है, और दोनों समान योद्धाओं के आमने-सामने आने पर सेनाएँ जयघोष करती हैं। सञ्जय उन दोनों का विस्तार से वर्णन करते हैं और बताते हैं कि यह युद्ध दोनों पक्षों के लिए एक दाँव बन गया। सारा जगत दो पक्षों में बँट जाता है — देवता, पशु, सर्प, पर्वत और शकुन किसी एक के पक्ष में हो जाते हैं — और देवता, ऋषि तथा सिद्ध विमानों में आकाश भर देते हैं, यहाँ तक कि ब्रह्मा और प्रजापति भी परिणाम के विषय में संशय में पड़ जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.91.1)
वृषसेनं हतं दृष्ट्वा क्रोधामर्षसमन्वितः । पुत्रशोकोद्भवं वारि नेत्राभ्यां समवासृजत् ॥
vṛṣasenaṃ hataṃ dṛṣṭvā krodhāmarṣasamanvitaḥ | putraśokodbhavaṃ vāri netrābhyāṃ samavāsṛjat
वृषसेन को मारा गया देखकर क्रोध और अमर्ष से भरे कर्ण की आँखों से पुत्र-शोक के आँसू बह चले।
श्लोक 2 (8.91.2)
रथेन कर्णस्तेजस्वी जगामाभिमुखो रिपुम् । युद्धायामर्षताम्राक्षः समाहूय धनञ्जयम् ॥
rathena karṇastejasvī jagāmābhimukho ripum | yuddhāyāmarṣatāmrākṣaḥ samāhūya dhanañjayam
तेजस्वी कर्ण क्रोध से लाल आँखें किए, धनञ्जय को युद्ध के लिए ललकारकर रथ पर शत्रु के सामने जा पहुँचा।
श्लोक 3 (8.91.3)
तौ रथौ सूर्यसङ्काशौ वैयाघ्रपरिवारितौ । समेतौ ददृशुस्तत्र द्वाविवार्कौ समुद्गतौ ॥
tau rathau sūryasaṅkāśau vaiyāghraparivāritau | sametau dadṛśustatra dvāvivārkau samudgatau
वहाँ सूर्य के समान दमकते, बाघ की खालों से घिरे दोनों रथ आमने-सामने आए; लोगों ने उन्हें एक साथ उगे दो सूर्यों के समान देखा।
श्लोक 4 (8.91.4)
श्वेताश्वौ पुरुषादित्यावास्थितावरिमर्दनौ । शुशुभाते महात्मानौ चन्द्रादित्यौ यथा दिवि । रथौ चतुर्भिर्जलदैर्भगमित्राविवाम्बरे ॥
śvetāśvau puruṣādityāvāsthitāvarimardanau | śuśubhāte mahātmānau candrādityau yathā divi | rathau caturbhirjaladairbhagamitrāvivāmbare
श्वेत अश्वों वाले, मनुष्यों में सूर्य-तुल्य, शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों महात्मा रथों पर खड़े होकर आकाश में चन्द्र और सूर्य की भाँति शोभित हुए; चार मेघों से ढोए जाते हुए उनके दोनों रथ आकाश में भग और मित्र के समान लगते थे।
श्लोक 5 (8.91.5)
तौ दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुः सर्वसैन्यानि मारिष । त्रैलोक्यविजये यत्ताविन्द्रवैरोचनाविव ॥
tau dṛṣṭvā vismayaṃ jagmuḥ sarvasainyāni māriṣa | trailokyavijaye yattāvindravairocanāviva
हे मारिष! उन दोनों को देखकर सारी सेनाएँ विस्मय में पड़ गईं, मानो तीनों लोकों को जीतने को उद्यत इन्द्र और विरोचन-पुत्र (बलि) सामने खड़े हों।
श्लोक 6 (8.91.6)
रथज्यातलनिर्हादैर्बाणशङ्खरवैस्तथा । तौ रथावभ्यधावन्त क्षत्रियाः सर्व एव हि ॥
rathajyātalanirhādairbāṇaśaṅkharavaistathā | tau rathāvabhyadhāvanta kṣatriyāḥ sarva eva hi
रथों, धनुष की डोरियों और हथेलियों की थाप के शब्द तथा बाणों और शङ्खों की ध्वनि के बीच सभी क्षत्रिय उन दोनों रथों की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 7 (8.91.7)
ध्वजावालोक्य वीराणां विस्मयः समपद्यत । हस्तिकक्ष्यां च कर्णस्य वानरं च किरीटिनः ॥
dhvajāvālokya vīrāṇāṃ vismayaḥ samapadyata | hastikakṣyāṃ ca karṇasya vānaraṃ ca kirīṭinaḥ
वीर योद्धाओं को दोनों ध्वजाएँ देखकर विस्मय हुआ: कर्ण की हाथी की रस्सी और किरीटी का वानर।
श्लोक 8 (8.91.8)
तौ रथौ सम्प्रसक्तौ तु दृष्ट्वा भारत पार्थिवाः । सिंहनादरवांश्चक्रुः साधुवादांश्च पुष्कलान् ॥
tau rathau samprasaktau tu dṛṣṭvā bhārata pārthivāḥ | siṃhanādaravāṃścakruḥ sādhuvādāṃśca puṣkalān
हे भारत! दोनों रथों को आपस में भिड़ा देखकर राजाओं ने सिंहनाद किया और खूब साधुवाद दिए।
श्लोक 9 (8.91.9)
श्रुत्वा तयोर्द्वैरथं च तत्र योधाः सहस्रशः । चक्रुर्बाहुस्वनांश्चैव तथा बाणरवं महत् ॥
śrutvā tayordvairathaṃ ca tatra yodhāḥ sahasraśaḥ | cakrurbāhusvanāṃścaiva tathā bāṇaravaṃ mahat
उन दोनों के रथ-द्वन्द्व की बात सुनकर वहाँ हज़ारों योद्धाओं ने भुजाएँ ठोंकीं और बाणों का भारी कोलाहल किया।
श्लोक 10 (8.91.10)
आजघ्नुः कुरवस्तत्र वादित्राणि समन्ततः । राधेयमभितो दध्मुः शङ्खाञ्शतसहस्रशः ॥
ājaghnuḥ kuravastatra vāditrāṇi samantataḥ | rādheyamabhito dadhmuḥ śaṅkhāñśatasahasraśaḥ
कौरवों ने चारों ओर बाजे बजाए और राधापुत्र के चारों ओर लाखों शङ्ख फूँके।
श्लोक 11 (8.91.11)
तथैव पाण्डवाः सर्वे हर्षयन्तो धनञ्जयम् । तूर्यशङ्खनिनादेन दिशः सर्वा व्यनादयन् ॥
tathaiva pāṇḍavāḥ sarve harṣayanto dhanañjayam | tūryaśaṅkhaninādena diśaḥ sarvā vyanādayan
इसी प्रकार सभी पाण्डवों ने धनञ्जय का उत्साह बढ़ाते हुए तुरहियों और शङ्खों के नाद से सारी दिशाएँ गुँजा दीं।
श्लोक 12 (8.91.12)
क्ष्वेलितास्फोटितोत्क्रुष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् । बाहुशब्दैश्च शूराणां कर्णार्जुनसमागमे ॥
kṣvelitāsphoṭitotkruṣṭaistumulaṃ sarvato'bhavat | bāhuśabdaiśca śūrāṇāṃ karṇārjunasamāgame
कर्ण और अर्जुन के मिलने पर चारों ओर ललकारों, ताल ठोंकने और जयघोषों तथा शूरवीरों की भुजाओं के शब्द से घोर कोलाहल मच गया।
श्लोक 13 (8.91.13)
तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ रथस्थौ रथिनां वरौ । प्रगृहीतमहाचापौ शरशक्तिध्वजायुतौ ॥
tau dṛṣṭvā puruṣavyāghrau rathasthau rathināṃ varau | pragṛhītamahācāpau śaraśaktidhvajāyutau
उन दोनों पुरुष-व्याघ्रों को, रथियों में श्रेष्ठ उन दोनों को रथों पर खड़े, विशाल धनुष थामे, बाण, शक्ति और ध्वजाओं से सज्जित देखकर —
श्लोक 14 (8.91.14)
वर्मिणौ बद्धनिस्त्रिंशौ श्वेताश्वौ शङ्खशोभितौ । तूणीरवरसम्पन्नौ द्वावप्येतौ सुदर्शनौ ॥
varmiṇau baddhanistriṃśau śvetāśvau śaṅkhaśobhitau | tūṇīravarasampannau dvāvapyetau sudarśanau
कवच पहने, कमर में तलवार बाँधे, श्वेत अश्वों वाले, शङ्खों से शोभित और उत्तम तरकशों से युक्त वे दोनों देखने में अत्यन्त सुन्दर थे।
श्लोक 15 (8.91.15)
रक्तचन्दनदिग्धाङ्गौ समदौ गोवृषाविव । चापविद्युद्ध्वजोपेतौ शस्त्रसम्पत्तियोधिनौ ॥
raktacandanadigdhāṅgau samadau govṛṣāviva | cāpavidyuddhvajopetau śastrasampattiyodhinau
लाल चन्दन से लिपे अंगों वाले, मदमत्त साँड़ों के समान, बिजली-सी चमकती धनुषों और ध्वजाओं से युक्त वे दोनों शस्त्रों की प्रचुर सम्पदा से युद्ध करने वाले थे।
श्लोक 16 (8.91.16)
चामरव्यजनोपेतौ श्वेतच्छत्रोपशोभितौ । कृष्णशल्यरथोपेतौ तुल्यरूपौ महारथौ ॥
cāmaravyajanopetau śvetacchatropaśobhitau | kṛṣṇaśalyarathopetau tulyarūpau mahārathau
चँवर और पंखों से युक्त, श्वेत छत्रों से शोभित, तथा कृष्ण और शल्य द्वारा हाँके जाने वाले रथों से सम्पन्न वे दोनों महारथी रूप में एक-से थे।
श्लोक 17 (8.91.17)
सिंहस्कन्धौ दीर्घभुजौ रक्ताक्षौ हेममालिनौ । सिंहस्कन्धप्रतीकाशौ व्यूढोरस्कौ महाबलौ । अन्योन्यवधमिच्छन्तावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ ॥
siṃhaskandhau dīrghabhujau raktākṣau hemamālinau | siṃhaskandhapratīkāśau vyūḍhoraskau mahābalau | anyonyavadhamicchantāvanyonyajayakāṅkṣiṇau
सिंह के-से कन्धों वाले, लम्बी भुजाओं वाले, लाल नेत्रों वाले, सोने की मालाएँ पहने, सिंह-स्कन्ध की-सी आभा वाले, चौड़ी छाती वाले वे महाबली एक-दूसरे का वध चाहते और एक-दूसरे को जीतने की अभिलाषा रखते थे।
श्लोक 18 (8.91.18)
अन्योन्यमभिधावन्तौ गोष्ठे गोवृषभाविव । प्रभिन्नाविव मातङ्गौ सुसंरब्धाविवाचलौ ॥
anyonyamabhidhāvantau goṣṭhe govṛṣabhāviva | prabhinnāviva mātaṅgau susaṃrabdhāvivācalau
गोशाला में दो साँड़ों की भाँति, मदमस्त दो हाथियों की भाँति, क्रोध से भरे दो पर्वतों की भाँति एक-दूसरे पर टूट पड़ते हुए वे दोनों —
श्लोक 19 (8.91.19)
आशीविषशिशुप्रख्यौ यमकालान्तकोपमौ । इन्द्रवृत्राविव क्रुद्धौ सूर्यचन्द्रसमप्रभौ ॥
āśīviṣaśiśuprakhyau yamakālāntakopamau | indravṛtrāviva kruddhau sūryacandrasamaprabhau
दो विषैले सर्प-शावकों के समान, यम, काल और अन्तक के समान, क्रुद्ध इन्द्र और वृत्र के समान, तथा सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रभा वाले थे।
श्लोक 20 (8.91.20)
महाग्रहाविव क्रुद्धौ युगान्ताय समुत्थितौ । देवगर्भौ देवसमौ देवतुल्यौ च रूपतः ॥
mahāgrahāviva kruddhau yugāntāya samutthitau | devagarbhau devasamau devatulyau ca rūpataḥ
युगान्त के लिए उठे हुए दो क्रुद्ध महाग्रहों के समान वे देवताओं से उत्पन्न, देवों जैसे और रूप में देवताओं के तुल्य थे।
श्लोक 21 (8.91.21)
यदृच्छया समायातौ सूर्याचन्द्रमसौ यथा । बलिनौ समरे दृप्तौ नानाशस्त्रधरौ युधि ॥
yadṛcchayā samāyātau sūryācandramasau yathā | balinau samare dṛptau nānāśastradharau yudhi
मानो संयोग से आ मिले सूर्य और चन्द्रमा के समान, बलवान, युद्ध में गर्वीले, रण में नाना शस्त्र धारण किए हुए —
श्लोक 22 (8.91.22)
तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ शार्दूलाविव धिष्ठितौ । बभूव परमो हर्षस्तावकानां विशाम्पते ॥
tau dṛṣṭvā puruṣavyāghrau śārdūlāviva dhiṣṭhitau | babhūva paramo harṣastāvakānāṃ viśāmpate
उन दोनों नरव्याघ्रों को दो बाघों की भाँति खड़ा देखकर, हे प्रजापालक! आपके पक्ष के लोगों को बड़ा हर्ष हुआ।
श्लोक 23 (8.91.23)
संशयः सर्वभूतानां विजये समपद्यत । समेतौ पुरुषव्याघ्रौ प्रेक्ष्य कर्णधनञ्जयौ ॥
saṃśayaḥ sarvabhūtānāṃ vijaye samapadyata | sametau puruṣavyāghrau prekṣya karṇadhanañjayau
कर्ण और धनञ्जय, उन दोनों पुरुष-सिंहों को आमने-सामने देखकर सब प्राणियों को विजय के विषय में संशय हो गया।
श्लोक 24 (8.91.24)
उभौ वरायुधधरावुभौ रणकृतश्रमौ । उभौ च बाहुशब्देन नादयन्तौ नभस्तलम् ॥
ubhau varāyudhadharāvubhau raṇakṛtaśramau | ubhau ca bāhuśabdena nādayantau nabhastalam
दोनों श्रेष्ठ आयुध धारण किए थे, दोनों युद्ध के श्रम में तपे हुए थे, और दोनों अपनी भुजाओं की ध्वनि से आकाश को गुँजा रहे थे।
श्लोक 25 (8.91.25)
उभौ विश्रुतकर्माणौ पौरुषेण बलेन च । उभौ च सदृशौ युद्धे शम्बरामरराजयोः ॥
ubhau viśrutakarmāṇau pauruṣeṇa balena ca | ubhau ca sadṛśau yuddhe śambarāmararājayoḥ
दोनों अपने कर्म, पौरुष और बल के लिए प्रसिद्ध थे; युद्ध में दोनों शम्बर और देवराज इन्द्र के समान थे।
श्लोक 26 (8.91.26)
कार्तवीर्यसमौ चोभावुभौ दाशरथेः समौ । विष्णुवीर्यसमौ चोभावुभौ भवसमौ युधि ॥
kārtavīryasamau cobhāvubhau dāśaratheḥ samau | viṣṇuvīryasamau cobhāvubhau bhavasamau yudhi
दोनों कार्तवीर्य के समान थे, दोनों दशरथ-पुत्र राम के समान, दोनों पराक्रम में विष्णु के समान और युद्ध में शिव के समान थे।
श्लोक 27 (8.91.27)
उभौ श्वेतहयौ राजन्रथप्रवरवाहिनौ । सारथिप्रवरौ चापि उभौ मद्रजनार्दनौ ॥
ubhau śvetahayau rājanrathapravaravāhinau | sārathipravarau cāpi ubhau madrajanārdanau
हे राजन्! दोनों के घोड़े श्वेत थे, दोनों उत्तम रथों पर आरूढ़ थे और दोनों के सारथि श्रेष्ठ थे — मद्रराज शल्य और जनार्दन।
श्लोक 28 (8.91.28)
ततो दृष्ट्वा महाराज राजमानौ महारथौ । सिद्धचारणसङ्घानां विस्मयः समपद्यत ॥
tato dṛṣṭvā mahārāja rājamānau mahārathau | siddhacāraṇasaṅghānāṃ vismayaḥ samapadyata
हे महाराज! उन दोनों महारथियों को शोभायमान देखकर सिद्धों और चारणों के समूहों को विस्मय हुआ।
श्लोक 29 (8.91.29)
धार्तराष्ट्रास्ततस्तूर्णं सबला भरतर्षभ । परिवव्रुर्महात्मानं कर्णमाहवशोभिनम् ॥
dhārtarāṣṭrāstatastūrṇaṃ sabalā bharatarṣabha | parivavrurmahātmānaṃ karṇamāhavaśobhinam
हे भरतश्रेष्ठ! तब धृतराष्ट्र के पुत्रों ने अपनी सेना के साथ शीघ्र ही युद्ध में शोभा पाने वाले महात्मा कर्ण को घेर लिया।
श्लोक 30 (8.91.30)
तथैव पाण्डवा दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । यमौ च चेकितानश्च प्रहृष्टाश्च प्रभद्रकाः ॥
tathaiva pāṇḍavā dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | yamau ca cekitānaśca prahṛṣṭāśca prabhadrakāḥ
उसी प्रकार धृष्टद्युम्न को आगे करके पाण्डव, दोनों जुड़वाँ भाई, चेकितान और प्रसन्न प्रभद्रक —
श्लोक 31 (8.91.31)
नानादेश्याश्च ये शूराः शिष्टा युद्धाभिनन्दिनः । ते सर्वे सहिता हृष्टाः परिवव्रुर्धनञ्जयम् ॥
nānādeśyāśca ye śūrāḥ śiṣṭā yuddhābhinandinaḥ | te sarve sahitā hṛṣṭāḥ parivavrurdhanañjayam
तथा नाना देशों के जो अन्य शूरवीर युद्ध का अभिनन्दन करने वाले शेष थे — वे सब मिलकर प्रसन्न होकर धनञ्जय को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 32 (8.91.32)
रिरक्षिषन्तः शत्रुघ्नाः पत्त्यश्वरथकुञ्जराः । धनञ्जयस्य विजये धृताः कर्णवधेऽपि च ॥
rirakṣiṣantaḥ śatrughnāḥ pattyaśvarathakuñjarāḥ | dhanañjayasya vijaye dhṛtāḥ karṇavadhe'pi ca
पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथियों की सेना के वे शत्रुहन्ता वीर उसकी रक्षा करना चाहते थे और धनञ्जय की विजय तथा कर्ण के वध पर दृढ़ थे।
श्लोक 33 (8.91.33)
तथैव तावकाः सर्वे यत्ताः सेनाप्रहारिणः । दुर्योधनमुखा राजन्कर्णं जुगुपुराहवे ॥
tathaiva tāvakāḥ sarve yattāḥ senāprahāriṇaḥ | duryodhanamukhā rājankarṇaṃ jugupurāhave
उसी प्रकार, हे राजन्! दुर्योधन को आगे रखकर आपके सभी सैनिक सतर्क और प्रहार करते हुए युद्ध में कर्ण की रक्षा करने लगे।
श्लोक 34 (8.91.34)
तावकानां रणे कर्णो ग्लहो ह्यासीद्विशाम्पते । तथैव पाण्डवेयानां ग्लहः पार्थोऽभवत्तदा ॥
tāvakānāṃ raṇe karṇo glaho hyāsīdviśāmpate | tathaiva pāṇḍaveyānāṃ glahaḥ pārtho'bhavattadā
हे प्रजापालक! उस युद्ध में आपके पक्ष के लिए कर्ण दाँव था और पाण्डवों के लिए उसी प्रकार पार्थ दाँव थे।
श्लोक 35 (8.91.35)
तयोस्तु सभ्यास्तत्रासन्प्रेक्षकाश्चाभवन्युधि । तत्रैषां ग्लहमानानां ध्रुवौ जयपराजयौ ॥
tayostu sabhyāstatrāsanprekṣakāścābhavanyudhi | tatraiṣāṃ glahamānānāṃ dhruvau jayaparājayau
उन दोनों के लिए वहाँ सभासद बैठे थे और युद्ध के दर्शक बन गए थे; दाँव लगाने वाले उन लोगों के लिए जय और पराजय निश्चित थे।
श्लोक 36 (8.91.36)
ताभ्यां द्यूतं समासक्तं विजयायेतराय वा । अस्माकं पाण्डवानां च स्थितानां रणमूर्धनि ॥
tābhyāṃ dyūtaṃ samāsaktaṃ vijayāyetarāya vā | asmākaṃ pāṇḍavānāṃ ca sthitānāṃ raṇamūrdhani
उन दोनों के बीच जय या पराजय के लिए द्यूत छिड़ गया था — हमारे लिए और रणभूमि के अग्रभाग में खड़े पाण्डवों के लिए।
श्लोक 37 (8.91.37)
तौ तु स्थितौ महाराज समरे युद्धशालिनौ । अन्योन्यं प्रतिसंरब्धावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥
tau tu sthitau mahārāja samare yuddhaśālinau | anyonyaṃ pratisaṃrabdhāvanyonyavadhakāṅkṣiṇau
हे महाराज! युद्ध में शोभा पाने वाले वे दोनों रण में डटे हुए थे, एक-दूसरे पर अत्यन्त क्रुद्ध और एक-दूसरे का वध चाहते हुए।
श्लोक 38 (8.91.38)
तावुमौ प्रजिहीर्षन्ताविन्द्रवृत्राविव प्रभो । भीमरूपधरावास्तां महाधूमाविव ग्रहौ ॥
tāvumau prajihīrṣantāvindravṛtrāviva prabho | bhīmarūpadharāvāstāṃ mahādhūmāviva grahau
हे प्रभो! इन्द्र और वृत्र की भाँति एक-दूसरे पर प्रहार करने को उत्सुक वे दोनों दो महान धूमकेतुओं के समान भयंकर रूप धारण किए खड़े थे।
श्लोक 39 (8.91.39)
ततोऽन्तरिक्षे सञ्जज्ञे विवादो भरतर्षभ । मिथो भेदाश्च भूतानामासन्कर्णार्जुनान्तरे ॥
tato'ntarikṣe sañjajñe vivādo bharatarṣabha | mitho bhedāśca bhūtānāmāsankarṇārjunāntare
हे भरतश्रेष्ठ! तब आकाश में विवाद उठ खड़ा हुआ और कर्ण तथा अर्जुन को लेकर प्राणियों में आपस में मतभेद हो गया।
श्लोक 40 (8.91.40)
व्याश्रयन्त द्विधा भिन्नाः सर्वे लोकास्तु मारिष । देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । प्रतिपक्षग्रहं चक्रुः कर्णार्जुनसमागमे ॥
vyāśrayanta dvidhā bhinnāḥ sarve lokāstu māriṣa | devadānavagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | pratipakṣagrahaṃ cakruḥ karṇārjunasamāgame
हे मारिष! सब लोक दो भागों में बँटकर पक्ष लेने लगे: देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, सर्प और राक्षसों ने कर्ण और अर्जुन के मिलन पर परस्पर विरोधी पक्ष ग्रहण किए।
श्लोक 41 (8.91.41)
द्यौरासीत्कर्णपक्षेऽत्र सनक्षत्रा विशाम्पते । भूर्विशाला पार्थमाता पुत्रस्य जयकाङ्क्षिणी ॥
dyaurāsītkarṇapakṣe'tra sanakṣatrā viśāmpate | bhūrviśālā pārthamātā putrasya jayakāṅkṣiṇī
हे प्रजानाथ! नक्षत्रों सहित आकाश कर्ण के पक्ष में था; विशाल पृथ्वी, पार्थ की माता, अपने पुत्र की विजय चाहती थी।
श्लोक 42 (8.91.42)
सागराश्चैव गिरयः सरितश्च नरोत्तम । महीजा जलजाश्चैव व्याश्रयन्त किरीटिनम् ॥
sāgarāścaiva girayaḥ saritaśca narottama | mahījā jalajāścaiva vyāśrayanta kirīṭinam
हे नरश्रेष्ठ! समुद्र, पर्वत और नदियों ने तथा पृथ्वी और जल से उत्पन्न जीवों ने किरीटी का पक्ष लिया।
श्लोक 43 (8.91.43)
असुरा यातुधानाश्च गुह्यकाश्च परन्तप । कर्णः समभवद्यत्र खेचराणि वयांसि च ॥
asurā yātudhānāśca guhyakāśca parantapa | karṇaḥ samabhavadyatra khecarāṇi vayāṃsi ca
हे परन्तप! असुर, यातुधान, गुह्यक और आकाश में विचरने वाले पक्षी कर्ण के पक्ष में हो गए।
श्लोक 44 (8.91.44)
रत्नानि निधयः सर्वे वेदाश्चाख्यानपञ्चमाः । सोपवेदोपनिषदो व्याश्रयन्त किरीटिनम् ॥
ratnāni nidhayaḥ sarve vedāścākhyānapañcamāḥ | sopavedopaniṣado vyāśrayanta kirīṭinam
रत्न, निधियाँ, आख्यान को पाँचवाँ मानकर चारों वेद, उपवेदों और उपनिषदों सहित — सब ने किरीटी का पक्ष लिया।
श्लोक 45 (8.91.45)
वासुकिश्चित्रसेनश्च तक्षकश्चोपतक्षकः । महीवियज्जलचराः काद्रवेयाश्च सान्वयाः । विषवन्तो महानागा वेगिनश्चार्जुनेऽभवन् ॥
vāsukiścitrasenaśca takṣakaścopatakṣakaḥ | mahīviyajjalacarāḥ kādraveyāśca sānvayāḥ | viṣavanto mahānāgā veginaścārjune'bhavan
वासुकि, चित्रसेन, तक्षक और उपतक्षक, पृथ्वी, आकाश और जल में विचरने वाले नाग, वंश-सहित कद्रू के पुत्र, विषैले, वेगवान महानाग — ये सब अर्जुन के पक्ष में हुए।
श्लोक 46 (8.91.46)
ऐरावताः सौरभेया वैशालेयाश्च भोगिनः । एतेऽभवन्नर्जुनस्य पापाः सर्पाश्च कर्णतः ॥
airāvatāḥ saurabheyā vaiśāleyāśca bhoginaḥ | ete'bhavannarjunasya pāpāḥ sarpāśca karṇataḥ
ऐरावत, सौरभेय और वैशालेय फनधारी नाग अर्जुन के पक्ष में थे, और दुष्ट सर्प कर्ण के पक्ष में।
श्लोक 47 (8.91.47)
ईहामृगा व्यालमृगा मङ्गला मृगपक्षिणः । मङ्गलाः पशवश्चैव सिंहव्याघ्रास्तथैव च । पार्थस्य विजये राजन्सर्व एव समाश्रिताः ॥
īhāmṛgā vyālamṛgā maṅgalā mṛgapakṣiṇaḥ | maṅgalāḥ paśavaścaiva siṃhavyāghrāstathaiva ca | pārthasya vijaye rājansarva eva samāśritāḥ
हे राजन्! भेड़िये, हिंस्र पशु, शुभ मृग और पक्षी, शुभ पशु, सिंह और बाघ — ये सभी पार्थ की विजय का आश्रय लिए हुए थे।
श्लोक 48 (8.91.48)
वसवो मरुतः साध्या रुद्रा देवाश्विनावपि । अग्नी रुद्रश्च सोमश्च पन्नगाश्च दिशो दश । कर्णतः समपद्यन्त श्वसृगालवयांसि च ॥
vasavo marutaḥ sādhyā rudrā devāśvināvapi | agnī rudraśca somaśca pannagāśca diśo daśa | karṇataḥ samapadyanta śvasṛgālavayāṃsi ca
वसु, मरुत, साध्य, रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, दोनों अग्नि, रुद्र, सोम, नाग और दसों दिशाएँ अर्जुन के पक्ष में थीं; कर्ण के पक्ष में कुत्ते, सियार और पक्षी आ गए।
श्लोक 49 (8.91.49)
वसवश्च महेन्द्रेण मरुतश्च सहाग्निना । धनञ्जयस्य ते वर्गा आदित्याः कर्णतोऽभवन् ॥
vasavaśca mahendreṇa marutaśca sahāgninā | dhanañjayasya te vargā ādityāḥ karṇato'bhavan
महेन्द्र सहित वसु और अग्नि सहित मरुत — वे गण धनञ्जय के थे; आदित्य कर्ण के पक्ष में हुए।
श्लोक 50 (8.91.50)
देवताः पितृभिः सार्धमृषिभिश्च परन्तप । तुम्बुरुप्रमुखाः सर्वे गन्धर्वा भरतर्षभ । यमो वैश्रवणश्चैव वरुणश्च यतोऽर्जुनः ॥
devatāḥ pitṛbhiḥ sārdhamṛṣibhiśca parantapa | tumburupramukhāḥ sarve gandharvā bharatarṣabha | yamo vaiśravaṇaścaiva varuṇaśca yato'rjunaḥ
हे परन्तप! पितरों और ऋषियों सहित देवता, हे भरतश्रेष्ठ! तुम्बुरु को आगे रखने वाले सब गन्धर्व, तथा यम, वैश्रवण (कुबेर) और वरुण — ये सब वहाँ थे जहाँ अर्जुन था।
श्लोक 51 (8.91.51)
देवर्षिब्रह्मर्षिगणाः सर्वे च खचराश्च ये । प्रालेयाः सहमौनेयाः शुभाश्चाप्सरसां गणाः ॥
devarṣibrahmarṣigaṇāḥ sarve ca khacarāśca ye | prāleyāḥ sahamauneyāḥ śubhāścāpsarasāṃ gaṇāḥ
देवर्षियों और ब्रह्मर्षियों के सब गण, आकाशचारी सब प्राणी, मौनेयों सहित प्रालेय और अप्सराओं के शुभ गण —
श्लोक 52 (8.91.52)
सहाप्सरोभिः शुभ्राभिर्देवदूताश्च गुह्यकाः । किरीटिनं संश्रिताः स्म पुण्यगन्धा मनोरमाः ॥
sahāpsarobhiḥ śubhrābhirdevadūtāśca guhyakāḥ | kirīṭinaṃ saṃśritāḥ sma puṇyagandhā manoramāḥ
उज्ज्वल अप्सराओं सहित देवदूत और गुह्यक, तथा सुन्दर, मनोहर और पवित्र सुगन्धें — सब किरीटी की शरण में आ गए।
श्लोक 53 (8.91.53)
अमनोज्ञाश्च ये गन्धास्ते सर्वे कर्णमाश्रिताः । विपरीतान्यनिष्टानि भवन्ति विनशिष्यताम् ॥
amanojñāśca ye gandhāste sarve karṇamāśritāḥ | viparītānyaniṣṭāni bhavanti vinaśiṣyatām
और जो दुर्गन्धें थीं, वे सब कर्ण के पास गईं; जिनका विनाश होने वाला होता है, उनके लिए उलटी और अशुभ बातें घटती हैं।
श्लोक 54 (8.91.54)
ये त्वन्तकाले पुरुषं विपरीतमुपाश्रितम् । प्रविशन्ति नरं क्षिप्रं मृत्युकालेऽभ्युपागते । ते भावाः सहिताः कर्णं प्रविष्टाः सूतनन्दनम् ॥
ye tvantakāle puruṣaṃ viparītamupāśritam | praviśanti naraṃ kṣipraṃ mṛtyukāle'bhyupāgate | te bhāvāḥ sahitāḥ karṇaṃ praviṣṭāḥ sūtanandanam
अन्तकाल में, मृत्यु का समय आने पर, जो विपरीत भाव मनुष्य में शीघ्र प्रवेश कर जाते हैं, वे सब मिलकर सूतपुत्र कर्ण में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 55 (8.91.55)
ओजस्तेजश्च सिद्धिश्च प्रहर्षः सत्यविक्रमौ । मनस्तुष्टिर्जयश्चापि तथाऽऽनन्दो नृपोत्तम ॥
ojastejaśca siddhiśca praharṣaḥ satyavikramau | manastuṣṭirjayaścāpi tathā''nando nṛpottama
ओज, तेज, सिद्धि, हर्ष, सच्चा पराक्रम, मन की तुष्टि, विजय और आनन्द, हे नृपश्रेष्ठ —
श्लोक 56 (8.91.56)
ईदृशानि नरव्याघ्र तस्मिन्सङ्ग्रामसागरे । निमित्तानि च शुभ्राणि विविशुर्जिष्णुमाहवे ॥
īdṛśāni naravyāghra tasminsaṅgrāmasāgare | nimittāni ca śubhrāṇi viviśurjiṣṇumāhave
और ऐसे ही शुभ शकुन, हे नरव्याघ्र! युद्ध के उस सागर में जिष्णु (अर्जुन) में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 57 (8.91.57)
ऋषयो ब्राह्मणैः सार्धमभजन्त किरीटिनम् ॥
ṛṣayo brāhmaṇaiḥ sārdhamabhajanta kirīṭinam
ऋषि ब्राह्मणों के साथ किरीटी के पक्ष में आ गए।
श्लोक 58 (8.91.58)
ततो देवगणैः सार्धं सिद्धाश्च सह चारणैः । द्विधा भूता महाराज व्याश्रयन्त नरोत्तमौ ॥
tato devagaṇaiḥ sārdhaṃ siddhāśca saha cāraṇaiḥ | dvidhā bhūtā mahārāja vyāśrayanta narottamau
तब, हे महाराज! देवगणों के साथ सिद्ध और चारण दो भागों में बँटकर उन दोनों नरश्रेष्ठों के आश्रित हो गए।
श्लोक 59 (8.91.59)
विमानानि विचित्राणि गुणवन्ति च सर्वशः । समारुह्य समाजग्मुर्द्वैरथं कर्णपार्थयोः । अन्तरिक्षे महाराज देवगन्धर्वराक्षसाः ॥
vimānāni vicitrāṇi guṇavanti ca sarvaśaḥ | samāruhya samājagmurdvairathaṃ karṇapārthayoḥ | antarikṣe mahārāja devagandharvarākṣasāḥ
हे महाराज! नाना प्रकार के विचित्र और गुणवान विमानों पर सब ओर से चढ़कर देवता, गन्धर्व और राक्षस आकाश में कर्ण और पार्थ के रथ-द्वन्द्व को देखने आ पहुँचे।
श्लोक 60 (8.91.60)
एवं सर्वेषु भूतेषु द्विधा भूतेषु भारत । आशंसमानेषु जयं राधेयस्यार्जुनस्य च । विमानायुतसम्बाधमाकाशमभवत्तदा ॥
evaṃ sarveṣu bhūteṣu dvidhā bhūteṣu bhārata | āśaṃsamāneṣu jayaṃ rādheyasyārjunasya ca | vimānāyutasambādhamākāśamabhavattadā
हे भारत! इस प्रकार सब प्राणियों के दो पक्षों में बँट जाने पर, जब वे राधापुत्र या अर्जुन की विजय की आशा कर रहे थे, तब आकाश दस हज़ार विमानों से ठसाठस भर गया।
श्लोक 61 (8.91.61)
ईहामृगव्यालमृगैर्द्विपाश्वरथपङ्क्तिभिः । ऊह्यमानाः परे मेघैर्वायुना च मनीषिणः । दिदृक्षवः समाजग्मुः कर्णार्जुनसमागमम् ॥
īhāmṛgavyālamṛgairdvipāśvarathapaṅktibhiḥ | ūhyamānāḥ pare meghairvāyunā ca manīṣiṇaḥ | didṛkṣavaḥ samājagmuḥ karṇārjunasamāgamam
भेड़ियों और हिंस्र पशुओं पर, हाथियों, घोड़ों और रथों की पंक्तियों पर चढ़कर तथा अन्य मेघों और वायु पर ढोए जाते हुए मनीषी कर्ण और अर्जुन का मिलन देखने की इच्छा से आ पहुँचे।
श्लोक 62 (8.91.62)
देवदानवगन्धर्वा नागयक्षपतत्रिणः । महर्षयो देवगणाः पितरश्च स्वधाभुजः ॥
devadānavagandharvā nāgayakṣapatatriṇaḥ | maharṣayo devagaṇāḥ pitaraśca svadhābhujaḥ
देवता, दानव और गन्धर्व, नाग, यक्ष और पक्षी, महर्षि, देवगण और स्वधा का भोग करने वाले पितर —
श्लोक 63 (8.91.63)
तपोविद्यौषधीसिद्धा नानारूपाम्बरत्विषः । अन्तरिक्षे महाराज विवदन्तोऽवतस्थिरे ॥
tapovidyauṣadhīsiddhā nānārūpāmbaratviṣaḥ | antarikṣe mahārāja vivadanto'vatasthire
तप, विद्या और औषधियों से सिद्ध हुए, नाना रूप और वस्त्रों की कान्ति वाले वे हे महाराज! आकाश में विवाद करते हुए खड़े थे।
श्लोक 64 (8.91.64)
ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च । आस्थितो यानमाकाशे दिव्यं तेजः समागताः ॥
brahmā brahmarṣibhiḥ sārdhaṃ prajāpatibhireva ca | āsthito yānamākāśe divyaṃ tejaḥ samāgatāḥ
ब्रह्मा ब्रह्मर्षियों और प्रजापतियों के साथ आकाश में दिव्य यान पर आरूढ़ थे; वे सब दिव्य तेज के साथ वहाँ एकत्र हुए।
श्लोक 65 (8.91.65)
ततः प्रजापतिस्तूर्णमाजगाम महामते । द्वैरथं युधि तं द्रष्टुं कर्णपाण्डवयोस्तदा ॥
tataḥ prajāpatistūrṇamājagāma mahāmate | dvairathaṃ yudhi taṃ draṣṭuṃ karṇapāṇḍavayostadā
तब, हे महामते! प्रजापति शीघ्र ही कर्ण और पाण्डव का रथ-द्वन्द्व देखने के लिए आ पहुँचे।
श्लोक 66 (8.91.66)
विजित्य कर्णः स्विदिमां वसुन्धराम् । अथार्जुनः स्वित्प्रतिपद्यतेऽखिलाम् । इतीश्वरस्यापि बभूव संशयः । प्रजापतेः प्रेक्ष्य तयोर्महद्बलम् ॥
vijitya karṇaḥ svidimāṃ vasundharām | athārjunaḥ svitpratipadyate'khilām | itīśvarasyāpi babhūva saṃśayaḥ | prajāpateḥ prekṣya tayormahadbalam
"क्या कर्ण इस सारी पृथ्वी को जीतेगा, अथवा अर्जुन इसे सम्पूर्ण रूप से पाएगा?" — उन दोनों का महान बल देखकर स्वयं प्रजापति ईश्वर को भी इस प्रकार संशय हुआ।