कर्ण पर्व · अध्याय 92
ब्रह्मा और ईशान द्वारा अर्जुन की विजय का आश्वासन
कर्ण और अर्जुन के कारण जगत् के नाश की आशंका से प्रजापति ब्रह्मा से विजय को बराबर करने की प्रार्थना करते हैं; ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि यह युद्ध तीनों लोकों के लिए भयंकर होगा। इन्द्र अर्जुन के पक्ष में कहते हैं, जो नर-नारायण की जोड़ी में नर हैं, और कहते हैं कि कर्ण स्वर्ग-लोक पा ले पर विजय कृष्णों की हो। ब्रह्मा और ईशान अर्जुन की विजय निश्चित बताते हैं; इन्द्र यह बात उपस्थित प्राणियों को सुनाते हैं, वे विस्मित होते हैं, और देवता फूल बरसाते तथा दिव्य वाद्य बजाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.92.1)
प्रजापतिस्तु तं दृष्ट्वा देवभागं समागतम् । अब्रवीत्तु ततो राजन्पश्यतो वै स्वयंभुवः ॥
prajāpatistu taṃ dṛṣṭvā devabhāgaṃ samāgatam | abravīttu tato rājanpaśyato vai svayaṃbhuvaḥ
देवताओं के भाग-रूप में आए हुए उसे देखकर प्रजापति ने, हे राजन्! स्वयम्भू के देखते-देखते तब कहा।
प्रजापतिरुवाच
श्लोक 2 (8.92.2)
उभावतिरथौ शूरावुभौ दृढपराक्रमौ । उभौ सदृशकर्माणौ वज्रिचक्रायुधोपमौ ॥
ubhāvatirathau śūrāvubhau dṛḍhaparākramau | ubhau sadṛśakarmāṇau vajricakrāyudhopamau
"दोनों अतिरथी शूर हैं, दोनों दृढ़ पराक्रम वाले हैं, दोनों कर्म में समान हैं और वज्रधारी (इन्द्र) तथा चक्रधारी (विष्णु) के तुल्य हैं।
श्लोक 3 (8.92.3)
अहो बत महद्युद्धं कर्णार्जुनसमागमे । भविष्यति महाघोरं वृत्रवासवयोरिव ॥
aho bata mahadyuddhaṃ karṇārjunasamāgame | bhaviṣyati mahāghoraṃ vṛtravāsavayoriva
अहो! कर्ण और अर्जुन के मिलन पर वृत्र और इन्द्र के समान कैसा महान और घोर युद्ध होगा!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (8.92.4)
प्रजापतिरथोक्त्वैवं स्वयम्भुवमचोदयत् । समोऽस्तु विजयः काममुभयोर्नरसिंहयोः ॥
prajāpatirathoktvaivaṃ svayambhuvamacodayat | samo'stu vijayaḥ kāmamubhayornarasiṃhayoḥ
तब ऐसा कहकर प्रजापति ने स्वयम्भू को प्रेरित किया: "इन दोनों नर-सिंहों की विजय अवश्य बराबर हो।
प्रजापतिरुवाच
श्लोक 5 (8.92.5)
कर्णार्जुनविवादेन मा नश्येदखिलं जगत् । स्वयंभो ब्रूहि तद्वाक्यं समोऽस्तु विजयोऽनयोः ॥
karṇārjunavivādena mā naśyedakhilaṃ jagat | svayaṃbho brūhi tadvākyaṃ samo'stu vijayo'nayoḥ
कर्ण और अर्जुन के विवाद से सारा जगत नष्ट न हो। हे स्वयम्भू! वही वचन कहिए कि इन दोनों की विजय बराबर हो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (8.92.6)
एवमुक्तस्तु भगवाञ्जये ताभ्यामनिश्चिते । इत्यब्रवीन्महाराज महाब्रह्मा प्रजापतिम् ॥
evamuktastu bhagavāñjaye tābhyāmaniścite | ityabravīnmahārāja mahābrahmā prajāpatim
ऐसा कहे जाने पर, दोनों की विजय अनिश्चित होने से, भगवान् महाब्रह्मा ने, हे महाराज! प्रजापति से इस प्रकार कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 7 (8.92.7)
द्वावप्येतौ हि कृतिनौ द्वावप्यतिबलोत्कटौ । भविष्यत्यनयोर्युद्धं त्रैलोक्यस्य भयावहम् ॥
dvāvapyetau hi kṛtinau dvāvapyatibalotkaṭau | bhaviṣyatyanayoryuddhaṃ trailokyasya bhayāvaham
"ये दोनों ही कुशल हैं, दोनों ही अत्यन्त बलवान और उग्र हैं; इनका युद्ध तीनों लोकों के लिए भयंकर होगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (8.92.8)
ततः प्रजापतिं तत्र सहस्राक्षोऽभ्यचोदयत् । विजयो ध्रुव एवास्तु पाण्डवस्य महात्मनः ॥
tataḥ prajāpatiṃ tatra sahasrākṣo'bhyacodayat | vijayo dhruva evāstu pāṇḍavasya mahātmanaḥ
तब सहस्राक्ष (इन्द्र) ने वहाँ प्रजापति को प्रेरित किया: "महात्मा पाण्डव की विजय निश्चित ही हो।
इन्द्र उवाच
श्लोक 9 (8.92.9)
मनस्वी बलवाञ्शूरः कृतविद्यस्तपोधनः । विभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः ॥
manasvī balavāñśūraḥ kṛtavidyastapodhanaḥ | vibharti ca mahātejā dhanurvedamaśeṣataḥ
वह मनस्वी, बलवान, शूर, अस्त्र-विद्या में निपुण और तप का धनी है; वह महातेजस्वी सम्पूर्ण धनुर्वेद को धारण करता है।
श्लोक 10 (8.92.10)
पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः । क्लिश्यन्ते पाण्डवा नित्यं वनवासादिभिर्भृशं ॥
pārthaḥ sarvaguṇopeto devakāryamidaṃ yataḥ | kliśyante pāṇḍavā nityaṃ vanavāsādibhirbhṛśaṃ
पार्थ सब गुणों से युक्त है, क्योंकि यह देवताओं का कार्य है; वनवास आदि से पाण्डव सदा अत्यन्त क्लेश पाते रहे हैं।
श्लोक 11 (8.92.11)
सम्पन्नस्तपसा चैव पर्याप्तः पुरुषर्षभः । अतिक्रामेच्च माहात्म्याद्दिष्टमप्यविचारयन् ॥
sampannastapasā caiva paryāptaḥ puruṣarṣabhaḥ | atikrāmecca māhātmyāddiṣṭamapyavicārayan
वह पुरुषश्रेष्ठ तप से सम्पन्न और सब प्रकार समर्थ है; अपनी महिमा के बल पर वह दैव के विधान की भी परवाह न करके उसका उल्लंघन कर सकता है।
श्लोक 12 (8.92.12)
अतिक्रमे च लोकानामभावो नियतो भवेत् । नावस्थानं च पश्यामि क्रुद्धयोः कृष्णयोः क्वचित् ॥
atikrame ca lokānāmabhāvo niyato bhavet | nāvasthānaṃ ca paśyāmi kruddhayoḥ kṛṣṇayoḥ kvacit
और यदि वह उल्लंघन करेगा तो लोकों का नाश निश्चित है; क्रुद्ध हुए दोनों कृष्णों के सामने कहीं कोई टिक सके, ऐसा मैं नहीं देखता।
श्लोक 13 (8.92.13)
स्रष्टारौ जगतश्चैतौ सतश्च पुरुषर्षभौ । नरनारायणावेतौ पुराणावृषिसत्तमौ ॥
sraṣṭārau jagataścaitau sataśca puruṣarṣabhau | naranārāyaṇāvetau purāṇāvṛṣisattamau
ये दोनों जगत् के और जो कुछ है उसके रचयिता हैं, हे पुरुषश्रेष्ठ! ये पुराने नर और नारायण हैं, ऋषियों में श्रेष्ठ।
श्लोक 14 (8.92.14)
अनियम्यौ नियन्तारौ जगतः पुरुषर्षभौ । नैतयोस्तु समः कश्चिद्दिवि वा मानुषेषु वा ॥
aniyamyau niyantārau jagataḥ puruṣarṣabhau | naitayostu samaḥ kaściddivi vā mānuṣeṣu vā
उन्हें कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता, वे ही जगत् के नियन्ता हैं, पुरुषश्रेष्ठ; स्वर्ग में या मनुष्यों में उनके समान कोई नहीं।
श्लोक 15 (8.92.15)
अनुगम्यास्त्रयो लोकाः सह देवर्षिचारणैः । सर्वदेवगणाश्चापि सर्वभूतानि यानि च । अनयोस्तु प्रभावेन वर्तते निखिलं जगत् ॥
anugamyāstrayo lokāḥ saha devarṣicāraṇaiḥ | sarvadevagaṇāścāpi sarvabhūtāni yāni ca | anayostu prabhāvena vartate nikhilaṃ jagat
देवर्षियों और चारणों सहित तीनों लोक, सब देवगण और जो भी प्राणी हैं — सब उन्हीं के पीछे चलते हैं; उनके प्रभाव से ही समस्त जगत् टिका हुआ है।"
श्लोक 16 (8.92.16)
कामं तु सुकृताँल्लोकानाप्नोतु पुरुषर्षभः । कर्णो वैकर्तनः शूरो विजयस्त्वस्तु कृष्णयोः ॥
kāmaṃ tu sukṛtām̐llokānāpnotu puruṣarṣabhaḥ | karṇo vaikartanaḥ śūro vijayastvastu kṛṣṇayoḥ
पुरुषश्रेष्ठ वीर वैकर्तन कर्ण अपनी इच्छानुसार सुकृत से प्राप्त लोक पा ले, पर विजय दोनों कृष्णों की ही हो।
श्लोक 17 (8.92.17)
वसूनां समलोकत्वं मरुतां वासमाप्नुयात् । सहितो द्रोणभीष्माभ्यां नाकपृष्ठे महीयताम् ॥
vasūnāṃ samalokatvaṃ marutāṃ vāsamāpnuyāt | sahito droṇabhīṣmābhyāṃ nākapṛṣṭhe mahīyatām
वह वसुओं के लोक का सहभागी हो, मरुतों के धाम को पाए और द्रोण तथा भीष्म के साथ स्वर्ग के शिखर पर सम्मान पाए।
श्लोक 18 (8.92.18)
क्लेशितो हि वने पार्थो दीर्घकालं पितामह । तस्मादेष जयेद्युद्धे तपसाऽभ्यधिकोऽर्जुनः ॥
kleśito hi vane pārtho dīrghakālaṃ pitāmaha | tasmādeṣa jayedyuddhe tapasā'bhyadhiko'rjunaḥ
हे पितामह! पार्थ ने वन में बहुत समय तक क्लेश सहा है; इसलिए तप में अधिक अर्जुन युद्ध में जीते।
श्लोक 19 (8.92.19)
पूर्वं भगवता प्रोक्तः कृष्णयोर्विजयो ध्रुवः । तत्तथास्तु नमस्तेऽस्तु प्रभो ब्रूहि पितामह ॥
pūrvaṃ bhagavatā proktaḥ kṛṣṇayorvijayo dhruvaḥ | tattathāstu namaste'stu prabho brūhi pitāmaha
पहले भगवान् ने कहा था कि दोनों कृष्णों की विजय निश्चित है। वही हो; आपको नमस्कार है; हे प्रभो पितामह! कहिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (8.92.20)
तत्सहस्राक्षवचनं निशम्य भगवान्प्रभुः । नोवाच तज्जयं तुल्यं तयोः कर्णकिरीटिनोः ॥
tatsahasrākṣavacanaṃ niśamya bhagavānprabhuḥ | novāca tajjayaṃ tulyaṃ tayoḥ karṇakirīṭinoḥ
सहस्राक्ष के वचन सुनकर प्रभु भगवान् ने कर्ण और किरीटी की विजय को बराबर नहीं कहा।
श्लोक 21 (8.92.21)
तस्मादाशां गतः शक्रस्तूष्णीम्भूते पितामहे । विजयः पाण्डवेयस्य कर्णस्य च वधो भवेत् ॥
tasmādāśāṃ gataḥ śakrastūṣṇīmbhūte pitāmahe | vijayaḥ pāṇḍaveyasya karṇasya ca vadho bhavet
इसलिए पितामह के मौन रहने पर शक्र आशा में रहे कि विजय पाण्डव की हो और कर्ण का वध हो।
श्लोक 22 (8.92.22)
ब्रह्मेशानौ ततो वाक्यमूचतुर्भुवनेश्वरम् । विजयो ध्रुव एवास्तु पाण्डवस्य महात्मनः ॥
brahmeśānau tato vākyamūcaturbhuvaneśvaram | vijayo dhruva evāstu pāṇḍavasya mahātmanaḥ
तब ब्रह्मा और ईशान ने भुवनेश्वर (इन्द्र) से कहा: "महात्मा पाण्डव की विजय निश्चित ही हो।
ब्रह्मेशानावूचतुः
श्लोक 23 (8.92.23)
मनस्वी जयतां शूरः कृतविद्यस्तपोधनः । बिभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः ॥
manasvī jayatāṃ śūraḥ kṛtavidyastapodhanaḥ | bibharti ca mahātejā dhanurvedamaśeṣataḥ
वह मनस्वी, विजयी वीरों में अग्रणी, शूर, अस्त्र-विद्या में निपुण और तप का धनी है; वह महातेजस्वी सम्पूर्ण धनुर्वेद को धारण करता है।
श्लोक 24 (8.92.24)
अतिक्रामेच्च माहात्म्याद्दिष्टमप्यविचारयन् । अतिक्रमे च लोकानामभावो नियतो भवेत् ॥
atikrāmecca māhātmyāddiṣṭamapyavicārayan | atikrame ca lokānāmabhāvo niyato bhavet
वह अपनी महिमा के बल पर दैव की भी परवाह न करके उसका उल्लंघन कर सकता है; और उल्लंघन होने पर लोकों का नाश निश्चित है।
श्लोक 25 (8.92.25)
न च विद्म ह्यवस्थानं क्रुद्धयोः कृष्णयोः क्वचित् । स्रष्टारौ जगतश्चैव सतश्च पुरुषर्षभौ ॥
na ca vidma hyavasthānaṃ kruddhayoḥ kṛṣṇayoḥ kvacit | sraṣṭārau jagataścaiva sataśca puruṣarṣabhau
हम कहीं ऐसा कुछ नहीं जानते जो क्रुद्ध हुए दोनों कृष्णों के सामने टिक सके; वे जगत् के और सत् के रचयिता, पुरुषश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 26 (8.92.26)
कामं तु सुकृताँल्लोकान्प्राप्नोत्वेष परन्तपः । कर्णो वैकर्तनः शूरो विजयस्तु नरे ध्रुवः ॥
kāmaṃ tu sukṛtām̐llokānprāpnotveṣa parantapaḥ | karṇo vaikartanaḥ śūro vijayastu nare dhruvaḥ
यह परन्तप वीर वैकर्तन कर्ण अपनी इच्छानुसार सुकृत से प्राप्त लोक पा ले; पर विजय तो नर (अर्जुन) में ही निश्चित है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 27 (8.92.27)
तथोक्ते देवदेवाभ्यां सहस्राक्षोऽब्रवीद्वचः । आमन्त्र्य सर्वभूतानि ब्रह्मेशानानुशासनात् ॥
tathokte devadevābhyāṃ sahasrākṣo'bravīdvacaḥ | āmantrya sarvabhūtāni brahmeśānānuśāsanāt
दोनों देवाधिदेवों के ऐसा कहने पर ब्रह्मा और ईशान की आज्ञा से सहस्राक्ष ने सब प्राणियों को सम्बोधित करके कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 28 (8.92.28)
श्रुतं भवद्भिर्यत्प्रोक्तं भगवद्भ्यां जगद्धितम् । तत्तथा व्येतु ते रोगः शमाप्नुत विमन्यवः ॥
śrutaṃ bhavadbhiryatproktaṃ bhagavadbhyāṃ jagaddhitam | tattathā vyetu te rogaḥ śamāpnuta vimanyavaḥ
"दोनों भगवानों ने जगत् के हित के लिए जो कहा, वह आपने सुन लिया। वैसा ही हो; आपका रोग दूर हो; शान्त हो जाइए और क्रोध छोड़ दीजिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 29 (8.92.29)
इति श्रुत्वेन्द्रवचनं सर्वभूतानि मारिष । विस्मितान्यभवन्राजन्पूजयाञ्चक्रिरे तदा । नोचुस्तदा जयं तुल्यं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥
iti śrutvendravacanaṃ sarvabhūtāni māriṣa | vismitānyabhavanrājanpūjayāñcakrire tadā | nocustadā jayaṃ tulyaṃ tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ
इन्द्र के वचन सुनकर सब प्राणी, हे मारिष! विस्मित हो गए, हे राजन्! और उन्होंने उनका सम्मान किया; उन्होंने तब उन दोनों पुरुष-सिंहों की विजय को बराबर नहीं कहा।
श्लोक 30 (8.92.30)
व्यसृजंश्च सुगन्धीनि पुष्पवर्षाणि हर्षिताः । नानारूपाणि विबुधा देवतूर्याण्यवादयन् ॥
vyasṛjaṃśca sugandhīni puṣpavarṣāṇi harṣitāḥ | nānārūpāṇi vibudhā devatūryāṇyavādayan
हर्षित देवताओं ने आकाश से नाना प्रकार के सुगन्धित फूल बरसाए और दिव्य वाद्य बजाए।
श्लोक 31 (8.92.31)
दिदृक्षवश्चाप्रतिमं द्वैरथं नरसिंहयोः । विस्मयोत्फुल्लनयना नान्या बुबुधिरे क्रियाः ॥
didṛkṣavaścāpratimaṃ dvairathaṃ narasiṃhayoḥ | vismayotphullanayanā nānyā bubudhire kriyāḥ
दोनों नर-सिंहों का अनुपम रथ-द्वन्द्व देखने के इच्छुक, विस्मय से खिली आँखों वाले वे किसी और बात पर ध्यान नहीं दे रहे थे।