कर्ण पर्व · अध्याय 93
ध्वजाओं का संघर्ष और अर्जुन की प्रतिज्ञा
श्वेत अश्वों वाले दोनों रथ आमने-सामने खड़े होते हैं और चारों वीर शङ्ख बजाते हैं। अर्जुन की ध्वजा का वानर कर्ण की ध्वजा की हाथी की रस्सी पर टूट पड़ता है, और कृष्ण तथा शल्य एक-दूसरे को दृष्टि-बाणों से बींधते हैं। कर्ण शल्य से पूछता है कि अर्जुन के हाथों उसके मारे जाने पर वे क्या करेंगे, और शल्य कृष्ण तथा अर्जुन को मारने की बात कहता है; अर्जुन भी कृष्ण से वही प्रश्न करता है, कृष्ण उत्तर देते हैं, और अर्जुन कहता है कि कर्ण और शल्य उसके बराबर नहीं हैं तथा द्रौपदी के अपमान को स्मरण करते हुए उसी दिन कर्ण को काट डालने की प्रतिज्ञा करता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.93.1)
रथौ तयोः श्वेतहयौ दिव्यौ युक्तौ महास्वनौ । समास्थितौ लोकवीरौ शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् । वासुदेवार्जुनौ वीरौ कर्णशल्यौ च भारत ॥
rathau tayoḥ śvetahayau divyau yuktau mahāsvanau | samāsthitau lokavīrau śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak | vāsudevārjunau vīrau karṇaśalyau ca bhārata
उन दोनों के रथ श्वेत अश्वों से जुते, दिव्य और गम्भीर घोष वाले थे। उन पर आरूढ़ लोकवीरों — हे भारत! वासुदेव और अर्जुन तथा कर्ण और शल्य — ने अलग-अलग अपने शङ्ख बजाए।
श्लोक 2 (8.93.2)
तद्भीरुसन्त्रासकरं युद्धं समभवत्तदा । अन्योन्यस्पर्धिनोरुग्रं शक्रशम्बरयोरिव ॥
tadbhīrusantrāsakaraṃ yuddhaṃ samabhavattadā | anyonyaspardhinorugraṃ śakraśambarayoriva
तब कायरों को भयभीत करने वाला वह युद्ध छिड़ा, एक-दूसरे से स्पर्धा करने वाले दो वीरों का उग्र संग्राम, इन्द्र और शम्बर के युद्ध जैसा।
श्लोक 3 (8.93.3)
तयोर्ध्वजौ हि विमलौ शुशुभाते रथे स्थितौ । राहुकेतू यथाऽऽकाशे उदितौ जगतः क्षये ॥
tayordhvajau hi vimalau śuśubhāte rathe sthitau | rāhuketū yathā''kāśe uditau jagataḥ kṣaye
रथों पर स्थित उनकी निर्मल ध्वजाएँ जगत् के विनाश के समय आकाश में उदित राहु और केतु के समान शोभित हुईं।
श्लोक 4 (8.93.4)
कर्णस्याशीविषनिभा रत्नसारमयी दृढा । पुरन्दरधनुः प्रख्या हस्तिकक्ष्या विराजते ॥
karṇasyāśīviṣanibhā ratnasāramayī dṛḍhā | purandaradhanuḥ prakhyā hastikakṣyā virājate
कर्ण की हाथी की रस्सी विषधर सर्प-सी, उत्तम रत्नों से बनी और दृढ़ थी, और इन्द्रधनुष के समान सुशोभित हो रही थी।
श्लोक 5 (8.93.5)
कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तकः । दंष्ट्राभिर्भीषयन्भाभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा ॥
kapiśreṣṭhastu pārthasya vyāditāsya ivāntakaḥ | daṃṣṭrābhirbhīṣayanbhābhirdurnirīkṣyo raviryathā
पार्थ की ध्वजा का श्रेष्ठ वानर, काल की भाँति मुँह फैलाए, दाँतों से डराता हुआ, किरणों से सूर्य की तरह देखने में कठिन था।
श्लोक 6 (8.93.6)
युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । कर्णध्वजमुपातिष्ठत्स्वस्थानाद्वेगवान्कपिः ॥
yuddhābhilāṣuko bhūtvā dhvajo gāṇḍīvadhanvanaḥ | karṇadhvajamupātiṣṭhatsvasthānādvegavānkapiḥ
युद्ध की इच्छा से गाण्डीवधारी की ध्वजा का वह वेगवान वानर अपने स्थान से उछलकर कर्ण की ध्वजा के पास जा पहुँचा।
श्लोक 7 (8.93.7)
उत्पत्य च महावेगः कक्ष्यामभ्याहनत्तदा । नखैश्च दशनैश्चैव गरुडः पन्नगं यथा ॥
utpatya ca mahāvegaḥ kakṣyāmabhyāhanattadā | nakhaiśca daśanaiścaiva garuḍaḥ pannagaṃ yathā
और बड़े वेग से उछलकर उसने नाखूनों और दाँतों से उस रस्सी पर प्रहार किया, जैसे गरुड़ सर्प पर करता है।
श्लोक 8 (8.93.8)
सा किङ्किणीकाभरणा कालपाशोपमा तदा । अभ्यद्रवत्सुसंरब्धा हस्तिकक्ष्याऽथ तं कपिम् ॥
sā kiṅkiṇīkābharaṇā kālapāśopamā tadā | abhyadravatsusaṃrabdhā hastikakṣyā'tha taṃ kapim
तब छोटी घण्टियों से सजी, काल के पाश-सी वह हाथी की रस्सी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस वानर पर झपटी।
श्लोक 9 (8.93.9)
तयोर्घोरतरे युद्धे द्वैरथे द्यूत आहिते । प्राकुर्वतां ध्वजौ युद्धं पूर्वं पूर्वतरं तदा ॥
tayorghoratare yuddhe dvairathe dyūta āhite | prākurvatāṃ dhvajau yuddhaṃ pūrvaṃ pūrvataraṃ tadā
उस और भी भयंकर युद्ध में, जब रथ-द्वन्द्व का दाँव लग चुका था, दोनों ध्वजाएँ पहले से भी अधिक उग्रता से लड़ने लगीं।
श्लोक 10 (8.93.10)
हया हयानभ्यहेषन्स्पर्धमानाः परस्परम् । अविध्यत्पुण्डरीकाक्षः शल्यं नयनसायकैः । शल्यश्च पुण्डरीकाक्षं तथैवाभिसमैक्षत ॥
hayā hayānabhyaheṣanspardhamānāḥ parasparam | avidhyatpuṇḍarīkākṣaḥ śalyaṃ nayanasāyakaiḥ | śalyaśca puṇḍarīkākṣaṃ tathaivābhisamaikṣata
घोड़े एक-दूसरे से होड़ करते हुए हिनहिनाए; कमलनयन कृष्ण ने अपनी दृष्टि-रूपी बाणों से शल्य को बींधा, और शल्य ने भी कमलनयन को उसी प्रकार देखा।
श्लोक 11 (8.93.11)
तत्राजयद्वासुदेवः शल्यं नयनसायकैः । कर्णं चाप्यजयदृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥
tatrājayadvāsudevaḥ śalyaṃ nayanasāyakaiḥ | karṇaṃ cāpyajayadṛṣṭyā kuntīputro dhanañjayaḥ
वहाँ वासुदेव ने अपनी बाण-सी दृष्टियों से शल्य को जीत लिया, और कुन्तीपुत्र धनञ्जय ने अपनी दृष्टि से कर्ण को जीत लिया।
श्लोक 12 (8.93.12)
अथाब्रवीत्सूतपुत्रः शल्यमाभाष्य सस्मितम् ॥
athābravītsūtaputraḥ śalyamābhāṣya sasmitam
तब सूतपुत्र कर्ण ने मुस्कराते हुए शल्य से कहा —
कर्ण उवाच
श्लोक 13 (8.93.13)
यदि पार्थो रणे हन्यादद्य मामिह कर्हिचित् । किं करिष्यसि सङ्ग्रामे शल्य सत्यमथोच्यताम् ॥
yadi pārtho raṇe hanyādadya māmiha karhicit | kiṃ kariṣyasi saṅgrāme śalya satyamathocyatām
"शल्य! यदि आज रण में कभी पार्थ मुझे मार गिराए, तो तुम संग्राम में क्या करोगे? सच-सच बताओ।"
शल्य उवाच
श्लोक 14 (8.93.14)
यदि कर्ण रणे हन्यादद्य त्वां श्वेतवाहनः । उभावेकरथेनाहं हन्यां माधवपाण्डवौ ॥
yadi karṇa raṇe hanyādadya tvāṃ śvetavāhanaḥ | ubhāvekarathenāhaṃ hanyāṃ mādhavapāṇḍavau
"कर्ण! यदि आज रण में श्वेत अश्वों वाला अर्जुन तुम्हें मार दे, तो मैं एक ही रथ से माधव और पाण्डव दोनों को मार डालूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (8.93.15)
एवमेव तु गोविन्दमर्जुनः प्रत्यभाषत । तं प्रहस्याब्रवीत्कृष्णः पार्थं परमिदं वचः ॥
evameva tu govindamarjunaḥ pratyabhāṣata | taṃ prahasyābravītkṛṣṇaḥ pārthaṃ paramidaṃ vacaḥ
ठीक इसी प्रकार अर्जुन ने भी गोविन्द से कहा; तब कृष्ण ने हँसकर पार्थ से ये गम्भीर वचन कहे —
वासुदेव उवाच
श्लोक 16 (8.93.16)
पतेद्दिवाकरः स्थानाच्छीर्येद्भूमिरनेकधा । शैत्यमग्निरियान्न त्वां हन्यात्कर्णो धनञ्जय ॥
pateddivākaraḥ sthānācchīryedbhūmiranekadhā | śaityamagniriyānna tvāṃ hanyātkarṇo dhanañjaya
"सूर्य अपने स्थान से गिर जाए, पृथ्वी अनेक टुकड़ों में फट जाए, अग्नि शीतल हो जाए — फिर भी कर्ण तुम्हें नहीं मार सकेगा, धनञ्जय।
श्लोक 17 (8.93.17)
यदि चैतत्कथञ्चित्स्याल्लोकपर्यसनं भवेत् । हन्यां कर्णं तथा शल्यं बाहुभ्यामेव संयुगे ॥
yadi caitatkathañcitsyāllokaparyasanaṃ bhavet | hanyāṃ karṇaṃ tathā śalyaṃ bāhubhyāmeva saṃyuge
और यदि किसी प्रकार लोकों का ऐसा विनाश हो भी जाए, तो मैं केवल अपनी भुजाओं से रण में कर्ण और शल्य दोनों को मार डालूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 18 (8.93.18)
इति कृष्णवचः श्रुत्वा प्रहसन्कपिकेतनः । अर्जुनः प्रत्युवाचेदं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥
iti kṛṣṇavacaḥ śrutvā prahasankapiketanaḥ | arjunaḥ pratyuvācedaṃ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam
कृष्ण के वचन सुनकर कपिध्वज अर्जुन ने हँसते हुए सहज ही कर्म करने वाले कृष्ण को उत्तर दिया —
अर्जुन उवाच
श्लोक 19 (8.93.19)
मम तावदपर्याप्तौ कर्णशल्यौ जनार्दन । सपताकध्वजं कर्णं सशल्यरथवाजिनम् ॥
mama tāvadaparyāptau karṇaśalyau janārdana | sapatākadhvajaṃ karṇaṃ saśalyarathavājinam
"जनार्दन! मेरे लिए कर्ण और शल्य पर्याप्त नहीं हैं। आप ध्वजा और पताकाओं सहित कर्ण को, शल्य, रथ और घोड़ों सहित —
श्लोक 20 (8.93.20)
सच्छत्रकवचं चैव सशक्तिशरकार्मुकम् । द्रष्टाऽस्यद्य रणे कृष्ण शरैश्छिन्नमनेकधा ॥
sacchatrakavacaṃ caiva saśaktiśarakārmukam | draṣṭā'syadya raṇe kṛṣṇa śaraiśchinnamanekadhā
छत्र, कवच, शक्ति, बाण और धनुष सहित, हे कृष्ण! आज रण में मेरे बाणों से अनेक टुकड़ों में कटा हुआ देखेंगे।
श्लोक 21 (8.93.21)
अद्यैव सरथं साश्वं सशक्तिकवचायुधम् । सञ्चूर्णितमिवारण्ये वृक्षं पश्याद्य दन्तिना ॥
adyaiva sarathaṃ sāśvaṃ saśaktikavacāyudham | sañcūrṇitamivāraṇye vṛkṣaṃ paśyādya dantinā
आज ही आप उसे रथ, घोड़ों, शक्ति, कवच और आयुधों सहित वन में हाथी द्वारा कुचले गए वृक्ष की तरह चूर्ण हुआ देखेंगे।
श्लोक 22 (8.93.22)
अद्य राधेयभार्याणां वैधव्यं समुपस्थितम् । ध्रुवं स्वप्नेष्वनिष्टानि ताभिर्दृष्टानि माधव ॥
adya rādheyabhāryāṇāṃ vaidhavyaṃ samupasthitam | dhruvaṃ svapneṣvaniṣṭāni tābhirdṛṣṭāni mādhava
आज राधापुत्र की स्त्रियों पर वैधव्य आ पड़ा है। हे माधव! निश्चय ही उन्होंने स्वप्नों में अशुभ बातें देखी हैं।
श्लोक 23 (8.93.23)
द्रष्टासि ध्रुवमद्यैव विधवाः कर्णयोषितः । न हि मे शाम्यते मन्युर्यदनेन पुरा कृतम् ॥
draṣṭāsi dhruvamadyaiva vidhavāḥ karṇayoṣitaḥ | na hi me śāmyate manyuryadanena purā kṛtam
आज ही आप निश्चय कर्ण की स्त्रियों को विधवा देखेंगे। उसने पहले जो किया था, उससे मेरा क्रोध शान्त नहीं होता —
श्लोक 24 (8.93.24)
कृष्णां सभागतां दृष्ट्वा मूढेनादीर्घदर्शिना । अस्मांस्तथाऽवहसता क्षिपता च पुनःपुनः ॥
kṛṣṇāṃ sabhāgatāṃ dṛṣṭvā mūḍhenādīrghadarśinā | asmāṃstathā'vahasatā kṣipatā ca punaḥpunaḥ
जब सभा में आई द्रौपदी को देखकर उस मूढ़, अदूरदर्शी ने हमारी हँसी उड़ाई और बार-बार हमें अपमानित किया।
श्लोक 25 (8.93.25)
अद्य द्रष्टासि गोविन्द कर्णमुन्मथितं मया । वारणेनेव मत्तेन पुष्पितं जगतीरुहम् ॥
adya draṣṭāsi govinda karṇamunmathitaṃ mayā | vāraṇeneva mattena puṣpitaṃ jagatīruham
"आज, गोविन्द! आप कर्ण को मेरे द्वारा उखाड़ा हुआ देखेंगे, जैसे मदमत्त हाथी फूले हुए वृक्ष को उखाड़ देता है।
श्लोक 26 (8.93.26)
अद्य ता मधुरा वाचः श्रोतासि मधुसूदन । दिष्ट्या जयसि वार्ष्णेय इति कर्णे निपातिते ॥
adya tā madhurā vācaḥ śrotāsi madhusūdana | diṣṭyā jayasi vārṣṇeya iti karṇe nipātite
आज, मधुसूदन! कर्ण के मारे जाने पर आप वे मधुर वचन सुनेंगे — "वृष्णिवंशी! सौभाग्य से आपकी विजय हुई।"
श्लोक 27 (8.93.27)
अद्याभिमन्युजननीं प्रहृष्टः सांत्वयिष्यसि । कुन्तीं पितृष्वसारं च प्रहृष्टः सन् जनार्दन ॥
adyābhimanyujananīṃ prahṛṣṭaḥ sāṃtvayiṣyasi | kuntīṃ pitṛṣvasāraṃ ca prahṛṣṭaḥ san janārdana
आज, जनार्दन! आप प्रसन्न होकर अभिमन्यु की माता को, और अपनी बुआ कुन्ती को भी हर्षित होकर सान्त्वना देंगे।
श्लोक 28 (8.93.28)
अद्य बाष्पमुखीं कृष्णां सान्त्वयिष्यसि माधव । वाग्भिश्चामृतकल्पाभिर्धर्मराजं च पाण्डवम् ॥
adya bāṣpamukhīṃ kṛṣṇāṃ sāntvayiṣyasi mādhava | vāgbhiścāmṛtakalpābhirdharmarājaṃ ca pāṇḍavam
आज, माधव! आप अश्रुपूर्ण मुख वाली द्रौपदी को और पाण्डव धर्मराज को अमृत-तुल्य वचनों से सान्त्वना देंगे।"