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कर्ण पर्व · अध्याय 94

द्वन्द्व का आरम्भ; अश्वत्थामा की शान्ति-सलाह

देवता और आकाशचारी प्राणी देखते हैं कि कर्ण और अर्जुन महान् द्वन्द्व में भिड़ते हैं और एक-दूसरे को तथा रणभूमि को बाणों से ढक देते हैं, जबकि दोनों पक्षों के सैनिक पीछे हट जाते हैं। अर्जुन पाँच कौरव महारथियों के धनुष और ध्वज काट देता है और अपने ऊपर भेजे गए सौ रथों और सौ हाथियों का संहार करता है। तब अश्वत्थामा दुर्योधन से पाण्डवों के साथ सन्धि करने का आग्रह करता है और कहता है कि अर्जुन को जीता नहीं जा सकता; दुर्योधन भीम की बड़ी बातों का स्मरण करके और कर्ण पर भरोसा करके मना कर देता है और अपने सैनिकों को आक्रमण की आज्ञा देता है।

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.94.1)

तद्देवनागासुरसिद्धयक्षैः । गन्धर्वरक्षोप्सरसां च सङ्घैः । ब्रह्मर्षिराजर्षिसुपर्णजुष्टं । बभौ वियद्विस्मयनीयरूपम् ॥

taddevanāgāsurasiddhayakṣaiḥ | gandharvarakṣopsarasāṃ ca saṅghaiḥ | brahmarṣirājarṣisuparṇajuṣṭaṃ | babhau viyadvismayanīyarūpam

देवों, नागों, असुरों, सिद्धों और यक्षों के, तथा गन्धर्वों, राक्षसों और अप्सराओं के समूहों से भरा हुआ, और ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों तथा सुपर्णों से सेवित वह आकाश विस्मयकारी रूप से शोभित हो उठा।

श्लोक 2 (8.94.2)

नानद्यमानं निनदैर्मनोज्ञैः । वादित्रगीतस्तुतिनृत्यहासैः । सर्वेऽन्तरिक्षं ददृशुर्मनुष्याः । खस्थाश्च तद्विस्मयनीयरूपम् ॥

nānadyamānaṃ ninadairmanojñaiḥ | vāditragītastutinṛtyahāsaiḥ | sarve'ntarikṣaṃ dadṛśurmanuṣyāḥ | khasthāśca tadvismayanīyarūpam

आकाश वाद्यों, गीतों, स्तुतियों, नृत्य और हास्य की मनोहर ध्वनियों से गूँज रहा था। सभी मनुष्यों ने अन्तरिक्ष की ओर देखा, और आकाश में स्थित जनों ने भी उस विस्मयकारी दृश्य को देखा।

श्लोक 3 (8.94.3)

ततः प्रहृष्टाः कुरुपाण्डुयोधा । वादित्रशङ्खस्वनसिंहनादैः । विनादयन्तो वसुधां दिशश्च । स्वनेन सर्वान्द्विषतो निजघ्नुः ॥

tataḥ prahṛṣṭāḥ kurupāṇḍuyodhā | vāditraśaṅkhasvanasiṃhanādaiḥ | vinādayanto vasudhāṃ diśaśca | svanena sarvāndviṣato nijaghnuḥ

तब हर्षित कौरव और पाण्डव योद्धा वाद्यों, शंखों की ध्वनि और सिंहनादों से पृथ्वी और दिशाओं को गुँजाते हुए उसी गर्जना के साथ अपने सब शत्रुओं पर टूट पड़े।

श्लोक 4 (8.94.4)

नराश्वमातङ्गरथैः समाकुलं । शरासिशक्त्यृष्टिनिपातदुःसहम् । अभीरुजुष्टं हतदेहसङ्कुलं । रणाजिरं लोहितमाबभौ तदा ॥

narāśvamātaṅgarathaiḥ samākulaṃ | śarāsiśaktyṛṣṭinipātaduḥsaham | abhīrujuṣṭaṃ hatadehasaṅkulaṃ | raṇājiraṃ lohitamābabhau tadā

मनुष्यों, घोड़ों, हाथियों और रथों से भरा, बाणों, तलवारों, शक्तियों और ऋष्टियों की वर्षा से असह्य, निर्भय वीरों से सेवित और कटे हुए शरीरों से पटा हुआ वह रणक्षेत्र उस समय रक्त से लाल दिखाई दे रहा था।

श्लोक 5 (8.94.5)

बभूव युद्धं कुरुपाण्डवानां । यथा सुराणामसुरैः सहाभवत् । तथा प्रवृत्तेऽस्त्रभृतां पराभवे । धनञ्जयश्चाधिरथिश्च सायकैः । दिशश्च सैन्यं च शितैरजिह्मगैः । परस्परं प्रावृणुतां सुदंशितौ ॥

babhūva yuddhaṃ kurupāṇḍavānāṃ | yathā surāṇāmasuraiḥ sahābhavat | tathā pravṛtte'strabhṛtāṃ parābhave | dhanañjayaścādhirathiśca sāyakaiḥ | diśaśca sainyaṃ ca śitairajihmagaiḥ | parasparaṃ prāvṛṇutāṃ sudaṃśitau

कौरवों और पाण्डवों का युद्ध वैसा ही हुआ जैसा देवताओं का असुरों के साथ हुआ था। इस प्रकार जब शस्त्रधारियों की पराजय आरम्भ हुई, तब कवच धारण किए हुए अर्जुन और अधिरथपुत्र कर्ण ने तीखे, सीधे जाने वाले बाणों से दिशाओं को, सेना को और एक-दूसरे को ढक दिया।

श्लोक 6 (8.94.6)

ततस्त्वदीयाश्च परे च सायकैः । कृतेऽन्धकारे ददृशुर्न किञ्चन । भयातुरा एकरथौ समाश्रयन् । ततोऽभवत्त्वद्भुतमेव सर्वतः ॥

tatastvadīyāśca pare ca sāyakaiḥ | kṛte'ndhakāre dadṛśurna kiñcana | bhayāturā ekarathau samāśrayan | tato'bhavattvadbhutameva sarvataḥ

बाणों से अँधेरा हो जाने पर आपके और शत्रु-पक्ष के योद्धाओं को कुछ भी दिखाई नहीं दिया। भय से व्याकुल होकर वे उन्हीं दो प्रधान रथियों की शरण में आ गए, और तब चारों ओर अद्भुत ही अद्भुत हो गया।

श्लोक 7 (8.94.7)

ततोऽस्त्रमस्त्रेण परस्परं तौ । विधूय वाताविव पूर्वपश्चिमौ । घनान्धकारे वितते तमोनुदौ । यथोदितौ तद्वदतीव रेजतुः ॥

tato'stramastreṇa parasparaṃ tau | vidhūya vātāviva pūrvapaścimau | ghanāndhakāre vitate tamonudau | yathoditau tadvadatīva rejatuḥ

एक-दूसरे के अस्त्र को अपने अस्त्र से उड़ाकर वे दोनों, पूर्व और पश्चिम की दो हवाओं की भाँति, घने फैले अन्धकार में उदित होकर अन्धकार मिटाने वाले सूर्य और चन्द्रमा के समान अत्यन्त शोभित हुए।

श्लोक 8 (8.94.8)

न चाभिसर्तव्यमिति प्रचोदिताः । परे त्वदीयाश्च तथाऽवतस्थिरे । महारथौ तौ परिवार्य सर्वतः । सुरासुराः शम्बरवासवाविव ॥

na cābhisartavyamiti pracoditāḥ | pare tvadīyāśca tathā'vatasthire | mahārathau tau parivārya sarvataḥ | surāsurāḥ śambaravāsavāviva

'कोई आगे न बढ़े'—ऐसा आदेश पाकर शत्रु-पक्ष और आपके योद्धा उन दोनों महारथियों को चारों ओर से घेरकर स्थिर खड़े हो गए, जैसे देवता और असुर इन्द्र और शम्बर को घेरकर खड़े हों।

श्लोक 9 (8.94.9)

मृदङ्गभेरीपणवानकस्वनैः । निनादिते वाहनशङ्खनिस्वनैः । तौ सिंहनादैर्बभतुर्नरोत्तमौ । पतङ्गचन्द्राविव दुःसहावुभौ ॥

mṛdaṅgabherīpaṇavānakasvanaiḥ | ninādite vāhanaśaṅkhanisvanaiḥ | tau siṃhanādairbabhaturnarottamau | pataṅgacandrāviva duḥsahāvubhau

मृदंग, भेरी, पणव और आनक की ध्वनियों से तथा वाहनों और शंखों के घोष से रणभूमि के गूँज उठने पर वे दोनों नरश्रेष्ठ सिंहनादों के साथ चमक उठे, सूर्य और चन्द्रमा की भाँति दोनों ही असह्य।

श्लोक 10 (8.94.10)

महाधनुर्मण्डलमध्यगावुभौ । सुवर्चसौ बाणसहस्रदीधिती । दिधक्षमाणौ सचराचरं जगत् । युगान्तसूर्याविव दुःसहौ रणे ॥

mahādhanurmaṇḍalamadhyagāvubhau | suvarcasau bāṇasahasradīdhitī | didhakṣamāṇau sacarācaraṃ jagat | yugāntasūryāviva duḥsahau raṇe

अपने विशाल धनुषों के मण्डल के बीच स्थित वे दोनों तेजस्वी, सहस्रों बाणरूपी किरणों वाले, चर-अचर सहित जगत् को भस्म कर देने की इच्छा रखने वाले युगान्त के दो सूर्यों की भाँति रण में असह्य थे।

श्लोक 11 (8.94.11)

उभावजेयावहितान्तकावुभौ । उभौ जिघांसू कृतिनौ परस्परम् । महाहवे वीतभयौ समीयतुः । महेन्द्रजम्भाविव कर्णपाण्डवौ ॥

ubhāvajeyāvahitāntakāvubhau | ubhau jighāṃsū kṛtinau parasparam | mahāhave vītabhayau samīyatuḥ | mahendrajambhāviva karṇapāṇḍavau

दोनों अजेय थे, दोनों शत्रुओं के काल थे, दोनों कुशल थे और एक-दूसरे को मार डालने की इच्छा रखते थे। उस महासमर में निर्भय कर्ण और पाण्डव इन्द्र और जम्भासुर की भाँति आमने-सामने आए।

श्लोक 12 (8.94.12)

ततो महास्त्राणि महाधनुर्धरौ । विमुञ्चमानाविषुभिर्भयानकैः । नराश्वनागानमितान्निजघ्नतुः । परस्परं चापि महारथौ नृप ॥

tato mahāstrāṇi mahādhanurdharau | vimuñcamānāviṣubhirbhayānakaiḥ | narāśvanāgānamitānnijaghnatuḥ | parasparaṃ cāpi mahārathau nṛpa

तब वे दोनों महान् धनुर्धर भयंकर बाणों से महान् अस्त्र छोड़ते हुए अनगिनत मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को मारने लगे; और हे राजन्, वे दोनों महारथी एक-दूसरे को भी बींधते रहे।

श्लोक 13 (8.94.13)

ततो विसस्रुः पुनरर्दिता नरा । नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाश्रयाः । सनागपत्त्यश्वरथा दिशो द्रुताः । तथा यथा सिंहहता वनौकसः ॥

tato visasruḥ punararditā narā | narottamābhyāṃ kurupāṇḍavāśrayāḥ | sanāgapattyaśvarathā diśo drutāḥ | tathā yathā siṃhahatā vanaukasaḥ

तब उन दोनों नरश्रेष्ठों से फिर पीड़ित होकर कौरवों और पाण्डवों के आश्रित सैनिक हाथियों, पैदलों, घोड़ों और रथों सहित, सिंह के आघात से भागते वनचरों की भाँति, सब दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 14 (8.94.14)

ततस्तु दुर्योधनभोजसौबलाः । कृपो गुरोश्चापि सुतो महाहवे । महारथाः पञ्च धनञ्जयाच्युतौ । शरैः शरीरार्तिकरैरताडयन् ॥

tatastu duryodhanabhojasaubalāḥ | kṛpo guroścāpi suto mahāhave | mahārathāḥ pañca dhanañjayācyutau | śaraiḥ śarīrārtikarairatāḍayan

तब दुर्योधन, भोज, सुबलपुत्र शकुनि, कृपाचार्य और गुरुपुत्र अश्वत्थामा—इन पाँच महारथियों ने उस महायुद्ध में शरीर को पीड़ा देने वाले बाणों से अर्जुन और अच्युत को घायल किया।

श्लोक 15 (8.94.15)

धनूंषि तेषामिषुधीन्ध्वजान्हयान् । रथांश्च सूतांश्च धनञ्जयः शरैः । समं प्रमध्याशु परान्समन्ततः । शरोत्तमैर्द्वादशभिश्च सूतजम् ॥

dhanūṃṣi teṣāmiṣudhīndhvajānhayān | rathāṃśca sūtāṃśca dhanañjayaḥ śaraiḥ | samaṃ pramadhyāśu parānsamantataḥ | śarottamairdvādaśabhiśca sūtajam

धनंजय ने अपने बाणों से उनके धनुषों, तरकशों, ध्वजाओं, घोड़ों, रथों और सारथियों को चारों ओर से एक साथ शीघ्र ही चूर कर दिया, और बारह उत्तम बाणों से सूतपुत्र को भी बींध दिया।

श्लोक 16 (8.94.16)

अथाभ्यधावंस्त्वरिताः शतं रथाः । शतं गजाश्चार्जुनमाततायिनः । शकास्तुषारा यवनाश्च सादिनः । सहैव काम्भोजवरैर्जिघांसवः ॥

athābhyadhāvaṃstvaritāḥ śataṃ rathāḥ | śataṃ gajāścārjunamātatāyinaḥ | śakāstuṣārā yavanāśca sādinaḥ | sahaiva kāmbhojavarairjighāṃsavaḥ

तब सौ रथ और सौ हाथी, तथा शक, तुषार, यवन और घुड़सवार, काम्बोजों के श्रेष्ठ वीरों के साथ, शस्त्र उठाए हुए वध की इच्छा से अर्जुन पर वेग से टूट पड़े।

श्लोक 17 (8.94.17)

वरायुधान्पाणिगतैः शरैः सह । क्षुरैर्न्यकृन्तत्प्रपतञ्शिरांसि च । हयांश्च नागांश्च रथांश्च युध्यतो । धनञ्जयः शत्रुगणान्क्षितौ क्षिणोत् ॥

varāyudhānpāṇigataiḥ śaraiḥ saha | kṣurairnyakṛntatprapatañśirāṃsi ca | hayāṃśca nāgāṃśca rathāṃśca yudhyato | dhanañjayaḥ śatrugaṇānkṣitau kṣiṇot

धनंजय ने क्षुर बाणों से उनके श्रेष्ठ आयुधों को हाथ में पकड़े हुए बाणों सहित काट डाला और झपटते हुए योद्धाओं के सिर भी काट दिए; और लड़ते हुए घोड़ों, हाथियों और रथों सहित उन शत्रु-समूहों को धरती पर नष्ट कर दिया।

श्लोक 18 (8.94.18)

ततोऽन्तरिक्षे सुरतूर्यनिःस्वनाः । ससाधुवादा हृषितैः समीरिताः । निपेतुरप्युत्तमपुष्पवृष्टयः । सुरूपगन्धाः पवनेरिताः शुभाः ॥

tato'ntarikṣe suratūryaniḥsvanāḥ | sasādhuvādā hṛṣitaiḥ samīritāḥ | nipeturapyuttamapuṣpavṛṣṭayaḥ | surūpagandhāḥ pavaneritāḥ śubhāḥ

तब आकाश में देवताओं की तुरहियों का घोष होने लगा, हर्षित जनों ने 'साधु-साधु' की पुकार की, और वायु से प्रेरित, सुन्दर रूप और गन्ध वाली उत्तम पुष्पों की मंगलमयी वर्षा होने लगी।

श्लोक 19 (8.94.19)

तदद्भुतं देवमनुष्यसाक्षिकं । समीक्ष्य भूतानि विसिस्मियुस्तदा । तवात्मजः सूतसुतश्च न व्यथां । न विस्मयं जग्मतुरेकनिश्चयौ ॥

tadadbhutaṃ devamanuṣyasākṣikaṃ | samīkṣya bhūtāni visismiyustadā | tavātmajaḥ sūtasutaśca na vyathāṃ | na vismayaṃ jagmaturekaniścayau

देवताओं और मनुष्यों के साक्षी बनने वाले उस अद्भुत दृश्य को देखकर सब प्राणी विस्मित हो गए। किन्तु आपका पुत्र और सूतपुत्र, दोनों एक ही निश्चय पर अडिग, न व्यथित हुए, न चकित।

श्लोक 20 (8.94.20)

अथाब्रवीद्द्रोणसुतस्तवात्मजं । करं करेण प्रतिपीड्य सान्त्वयन् । प्रसीद दुर्योधन शाम्य पाण्डवैः । अलं विरोधेन धिगस्तु विग्रहम् ॥

athābravīddroṇasutastavātmajaṃ | karaṃ kareṇa pratipīḍya sāntvayan | prasīda duryodhana śāmya pāṇḍavaiḥ | alaṃ virodhena dhigastu vigraham

तब द्रोणपुत्र ने आपके पुत्र का हाथ अपने हाथ में दबाकर उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'दुर्योधन, प्रसन्न हो जाओ, पाण्डवों से सन्धि कर लो। विरोध बहुत हुआ; युद्ध को धिक्कार है।'

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 21 (8.94.21)

हतो गुरुर्ब्रह्मसमो महास्त्रवित् । तथैव भीष्मप्रमुखा महारथाः । अहं त्ववध्यो मम चापि मातुलः । प्रशाधि राज्यं सह पाण्डवैश्चिरम् ॥

hato gururbrahmasamo mahāstravit | tathaiva bhīṣmapramukhā mahārathāḥ | ahaṃ tvavadhyo mama cāpi mātulaḥ | praśādhi rājyaṃ saha pāṇḍavaiściram

ब्रह्मा के समान और महान् अस्त्रों के ज्ञाता हमारे गुरु मारे गए, और भीष्म आदि महारथी भी मारे गए। किन्तु मैं अवध्य हूँ और मेरे मामा भी; इसलिए पाण्डवों के साथ चिरकाल तक राज्य का शासन करो।

श्लोक 22 (8.94.22)

धनञ्जयः स्थास्यति वारितो मया । जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति । युधिष्ठिरो भूतहिते रतः सदा । वृकोदरस्तद्वशगस्तथा यमौ ॥

dhanañjayaḥ sthāsyati vārito mayā | janārdano naiva virodhamicchati | yudhiṣṭhiro bhūtahite rataḥ sadā | vṛkodarastadvaśagastathā yamau

मेरे रोकने पर अर्जुन रुक जाएगा; जनार्दन भी विरोध नहीं चाहते; युधिष्ठिर सदा प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, और वृकोदर तथा दोनों जुड़वाँ भाई उन्हीं के वश में हैं।

श्लोक 23 (8.94.23)

त्वया च पार्थैश्च परस्परेण । प्रजाः शिवं प्राप्नुयुरिच्छति त्वयि । व्रजन्तु शेषाः स्वपुराणि पार्थिवा । निवृत्तवैराश्च भवन्तु सैनिकाः । न चेद्वचः श्रोष्यसि मे नराधिप । ध्रुवं हि तप्तोऽसि हतोऽरिभिर्युधि ॥

tvayā ca pārthaiśca paraspareṇa | prajāḥ śivaṃ prāpnuyuricchati tvayi | vrajantu śeṣāḥ svapurāṇi pārthivā | nivṛttavairāśca bhavantu sainikāḥ | na cedvacaḥ śroṣyasi me narādhipa | dhruvaṃ hi tapto'si hato'ribhiryudhi

यदि आप चाहें तो आपके और पाण्डवों के आपस के मेल से प्रजा कल्याण प्राप्त करे; शेष राजा अपने-अपने नगरों को लौट जाएँ और सैनिक वैर त्यागकर शान्त हों। हे नरेश्वर, यदि आप मेरी बात नहीं मानेंगे तो निश्चय ही आप सन्तप्त होंगे और युद्ध में शत्रुओं के हाथों मारे जाएँगे।

श्लोक 24 (8.94.24)

वृद्धं पितरमालोक्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । कृपालुर्धर्मराजो हि याचितः शममेष्यति ॥

vṛddhaṃ pitaramālokya gāndhārīṃ ca yaśasvinīm | kṛpālurdharmarājo hi yācitaḥ śamameṣyati

आपके वृद्ध पिता और यशस्विनी गान्धारी की ओर देखकर दयालु धर्मराज, प्रार्थना करने पर, शान्ति स्वीकार कर लेंगे।

श्लोक 25 (8.94.25)

यथोचितं च वै राज्यमनुज्ञास्यति ते प्रभुः । विपश्चित्सुमतिर्वीरः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥

yathocitaṃ ca vai rājyamanujñāsyati te prabhuḥ | vipaścitsumatirvīraḥ sarvaśāstrārthatattvavit

वे आपके स्वामी आपको यथोचित राज्य की अनुमति दे देंगे; वे विद्वान्, सुबुद्धि, वीर और समस्त शास्त्रों के अर्थ और तत्त्व को जानने वाले हैं।

श्लोक 26 (8.94.26)

वैरं नेष्यति धर्मात्मा स्वजने नास्त्यतिक्रमः । न विग्रहमतिः कृष्णः स्वजने प्रतिनन्दति ॥

vairaṃ neṣyati dharmātmā svajane nāstyatikramaḥ | na vigrahamatiḥ kṛṣṇaḥ svajane pratinandati

धर्मात्मा वैर को आगे नहीं बढ़ाएँगे, अपने स्वजनों के प्रति उनसे कोई अपराध नहीं होता; और कृष्ण भी, जिनकी बुद्धि कलह की ओर नहीं है, अपने स्वजनों में कलह से प्रसन्न नहीं होते।

श्लोक 27 (8.94.27)

भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । वासुदेवमते चैव पाण्डवस्य च धीमतः । स्थास्यन्ति पुरुषव्याघ्रास्तयोर्वचनगौरवात् ॥

bhīmasenārjunau cobhau mādrīputrau ca pāṇḍavau | vāsudevamate caiva pāṇḍavasya ca dhīmataḥ | sthāsyanti puruṣavyāghrāstayorvacanagauravāt

भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दोनों पुत्र, ये पाण्डव पुरुषसिंह, वासुदेव और बुद्धिमान् पाण्डव युधिष्ठिर के मत पर, उन दोनों के वचनों का गौरव मानकर, स्थिर रहेंगे।

श्लोक 28 (8.94.28)

रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् । जीवने यत्नमातिष्ठ जीवन्भद्राणि पश्यति ॥

rakṣa duryodhanātmānamātmā sarvasya bhājanam | jīvane yatnamātiṣṭha jīvanbhadrāṇi paśyati

दुर्योधन, अपनी रक्षा करो; आत्मा ही सबका आधार है। जीवित रहने का यत्न करो; जो जीता है वही कल्याण देखता है।

श्लोक 29 (8.94.29)

राज्यं श्रीश्चैव भद्रं ते जीवमाने च कल्पते । मृतस्य तु खलु कौरव्य नैव राज्यं कुतः सुखम् ॥

rājyaṃ śrīścaiva bhadraṃ te jīvamāne ca kalpate | mṛtasya tu khalu kauravya naiva rājyaṃ kutaḥ sukham

राज्य, श्री और कल्याण तभी तक आपके हैं जब तक आप जीवित हैं। हे कौरव्य, मरे हुए के लिए तो राज्य ही नहीं, फिर सुख कहाँ?

श्लोक 30 (8.94.30)

लोकवृत्तमिदं वृत्तं प्रवृत्तं पश्य भारत । शाम्य त्वं पाण्डवैः सार्धं शेषं रक्ष कुलस्य च ॥

lokavṛttamidaṃ vṛttaṃ pravṛttaṃ paśya bhārata | śāmya tvaṃ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ śeṣaṃ rakṣa kulasya ca

हे भारत, देखो, संसार की यह रीति कैसे चलती आई है। पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो और अपने कुल के शेष भाग की रक्षा करो।

श्लोक 31 (8.94.31)

मा भूत्स कालः कौरव्य यदाऽहमहितं वचः । ब्रूयां कामं महाबाहो माऽवमंस्था वचो मम ॥

mā bhūtsa kālaḥ kauravya yadā'hamahitaṃ vacaḥ | brūyāṃ kāmaṃ mahābāho mā'vamaṃsthā vaco mama

हे कौरव्य, वह समय कभी न आए जब मुझे आपसे आपके अहित की बात कहनी पड़े। मैं अपनी इच्छा से बोलता हूँ; हे महाबाहो, मेरे वचन का अनादर न कीजिए।

श्लोक 32 (8.94.32)

धर्मिष्ठमिदमत्यर्थं राज्ञश्चैव कुलस्य च । एतद्धि परमं श्रेयः कुरुवंशस्य वृद्धये । प्रयाहि तं च गान्धारे कुलस्य च सुखावहम् ॥

dharmiṣṭhamidamatyarthaṃ rājñaścaiva kulasya ca | etaddhi paramaṃ śreyaḥ kuruvaṃśasya vṛddhaye | prayāhi taṃ ca gāndhāre kulasya ca sukhāvaham

यह राजा और कुल दोनों के लिए अत्यन्त धर्मसम्मत है, और कुरुवंश की वृद्धि के लिए यही परम कल्याण है। हे गान्धारीपुत्र, उनके पास जाओ; यह कुल के लिए सुखदायक होगा।

श्लोक 33 (8.94.33)

पथ्यमायतिसंयुक्तं कर्णोऽप्यर्जुनमाहवे । न जेष्यति नरव्याघ्र इति मे निश्चिता मतिः ॥

pathyamāyatisaṃyuktaṃ karṇo'pyarjunamāhave | na jeṣyati naravyāghra iti me niścitā matiḥ

यह हितकर है और भविष्य में कल्याणकारी है: हे नरव्याघ्र, कर्ण भी युद्ध में अर्जुन को नहीं जीत सकेगा—यह मेरा निश्चित मत है।

श्लोक 34 (8.94.34)

रोचतां ते नरश्रेष्ठ ममैतद्वचनं शुभम् । अतोऽन्यथा हि राजेन्द्र विनाशः सुमहान्भवेत् ॥

rocatāṃ te naraśreṣṭha mamaitadvacanaṃ śubham | ato'nyathā hi rājendra vināśaḥ sumahānbhavet

हे नरश्रेष्ठ, मेरा यह शुभ वचन आपको रुचे। हे राजेन्द्र, अन्यथा बहुत बड़ा विनाश होगा।

श्लोक 35 (8.94.35)

इदं च दृष्टं जगता सह त्वया । कृतं यदेकेन किरीटमालिना । यथा न कुर्याद्बलभिन्न चान्तको । न च प्रचेता भगवान्न यक्षराट् ॥

idaṃ ca dṛṣṭaṃ jagatā saha tvayā | kṛtaṃ yadekena kirīṭamālinā | yathā na kuryādbalabhinna cāntako | na ca pracetā bhagavānna yakṣarāṭ

आपने और सारे जगत् ने यह देखा है कि किरीटधारी अर्जुन ने अकेले जो कर दिखाया, वैसा न इन्द्र कर सकता है, न मृत्यु, न भगवान् वरुण, न यक्षराज कुबेर।

श्लोक 36 (8.94.36)

अतोऽपि भूयान्स्वगुणैर्धनञ्जयो । न चातिवर्तिष्यति मे वचोऽखिलम् । तवानुयात्रां च सदा करिष्यति । प्रसीद राजेन्द्र शमं त्वमाप्नुहि ॥

ato'pi bhūyānsvaguṇairdhanañjayo | na cātivartiṣyati me vaco'khilam | tavānuyātrāṃ ca sadā kariṣyati | prasīda rājendra śamaṃ tvamāpnuhi

इतना ही नहीं, अर्जुन अपने गुणों में इससे भी बढ़कर है; वह मेरे किसी भी वचन का उल्लंघन नहीं करेगा, और सदा आपका अनुसरण करेगा। हे राजेन्द्र, प्रसन्न होइए और शान्ति प्राप्त कीजिए।

श्लोक 37 (8.94.37)

ममाभिमानः परमः सदा त्वयि । ब्रवीम्यतस्त्वां परमाच्च सौहृदात् । निवारयिष्यामि च कर्णमाहवे । महान्हि मेऽस्ति प्रणयोऽथ सूतजे ॥

mamābhimānaḥ paramaḥ sadā tvayi | bravīmyatastvāṃ paramācca sauhṛdāt | nivārayiṣyāmi ca karṇamāhave | mahānhi me'sti praṇayo'tha sūtaje

आपके प्रति मेरा सदा परम आदरभाव है, इसीलिए परम सौहार्द से मैं आपसे यह कह रहा हूँ। मैं युद्ध में कर्ण को भी रोकूँगा, क्योंकि सूतपुत्र के प्रति भी मेरा बड़ा प्रेम है।

श्लोक 38 (8.94.38)

वदन्ति मैत्रीं सहजां विचक्षणाः । तथैव साम्ना च धनेन चार्जिताम् । प्रतापतश्चोपनतां चतुर्विधां । तदस्ति सर्वं तव पाण्डवेषु ॥

vadanti maitrīṃ sahajāṃ vicakṣaṇāḥ | tathaiva sāmnā ca dhanena cārjitām | pratāpataścopanatāṃ caturvidhāṃ | tadasti sarvaṃ tava pāṇḍaveṣu

विद्वान् लोग चार प्रकार की मैत्री बताते हैं: स्वाभाविक, साम (मेल) से प्राप्त, धन से प्राप्त और बल-प्रताप से उपलब्ध। वह सब आपके और पाण्डवों के बीच विद्यमान है।

श्लोक 39 (8.94.39)

निसर्गतस्ते तव वीर बान्धवाः । पुनश्च साम्ना हितमाप्नुयुः प्रभो । त्वयि प्रसन्ने यदि मित्रतां गते । हितं कृतं स्याज्जगतस्त्वयाऽतुलम् ॥

nisargataste tava vīra bāndhavāḥ | punaśca sāmnā hitamāpnuyuḥ prabho | tvayi prasanne yadi mitratāṃ gate | hitaṃ kṛtaṃ syājjagatastvayā'tulam

हे वीर, पाण्डव तो स्वभाव से ही आपके बान्धव हैं, और हे प्रभो, मेल-मिलाप से वे फिर अपना हित पा सकते हैं। आपके प्रसन्न होने पर यदि वे आपके मित्र बन जाएँ तो आपके द्वारा जगत् का अनुपम हित हो जाएगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 40 (8.94.40)

इतीदमुक्तः सुहृदा वचो हितं । विचिन्त्य निःश्वस्य च दुर्मनाऽब्रवीत् । यथा भवानाह सखे तथैव तत् । ममापि विज्ञापयतो वचः शृणु ॥

itīdamuktaḥ suhṛdā vaco hitaṃ | vicintya niḥśvasya ca durmanā'bravīt | yathā bhavānāha sakhe tathaiva tat | mamāpi vijñāpayato vacaḥ śṛṇu

मित्र के इस हितकर वचन को सुनकर उसने विचार किया, उसाँस ली और खिन्न मन से कहा—'मित्र, जैसा तुम कहते हो वैसा ही है; पर मैं भी जो कहता हूँ, उसे सुनो।'

दुर्योधन उवाच

श्लोक 41 (8.94.41)

निहत्य दुःशासनमुक्तवान्बहु । प्रहस्य शार्दूलवदेष दुर्मतिः । वृकोदरस्तद्धृदये मम स्थितं । न तत्परोक्षं भवतः कुतः शमः ॥

nihatya duḥśāsanamuktavānbahu | prahasya śārdūlavadeṣa durmatiḥ | vṛkodarastaddhṛdaye mama sthitaṃ | na tatparokṣaṃ bhavataḥ kutaḥ śamaḥ

दुःशासन को मारकर उस दुर्बुद्धि वृकोदर ने बाघ की तरह हँसकर बहुत-सी बातें कही थीं; वह मेरे हृदय में बसी है, और वह आपसे छिपी नहीं है। फिर शान्ति कहाँ?

श्लोक 42 (8.94.42)

न चापि कर्णं प्रसहेद्रणेऽर्जुनो । महागिरिं मेरुमिवोग्रमारुतः । न चाश्वसिष्यन्ति पृथात्मजा मयि । प्रसह्य वैरं बहुशो विचिन्त्य ॥

na cāpi karṇaṃ prasahedraṇe'rjuno | mahāgiriṃ merumivogramārutaḥ | na cāśvasiṣyanti pṛthātmajā mayi | prasahya vairaṃ bahuśo vicintya

अर्जुन युद्ध में कर्ण को नहीं सह सकेगा, जैसे प्रचण्ड वायु महान् पर्वत मेरु को नहीं हिला सकती। और पृथा के पुत्र वैर को बार-बार हठपूर्वक स्मरण करके मुझ पर कभी विश्वास नहीं करेंगे।

श्लोक 43 (8.94.43)

न चापि कर्णं गुरुपुत्र संयुगात् । उपारमेत्यर्हसि वीर भाषितुम् । श्रमेण युक्तो महताद्य फल्गुनः । तमेष कर्णः प्रसभं हनिष्यति ॥

na cāpi karṇaṃ guruputra saṃyugāt | upārametyarhasi vīra bhāṣitum | śrameṇa yukto mahatādya phalgunaḥ | tameṣa karṇaḥ prasabhaṃ haniṣyati

और हे गुरुपुत्र, हे वीर, आपको कर्ण से यह कहना उचित नहीं कि वह युद्ध से हट जाए। आज फल्गुन बहुत थक चुका है; यह कर्ण उसे बलपूर्वक मार डालेगा।

श्लोक 44 (8.94.44)

वसुन्धरायाः परिवर्तनं भवेत् । व्रजेच्च शोषं मकरालयोऽर्णवः । प्लवेयुरप्यद्रिवरा महाम्बुधौ । न चार्जुनो जेष्यति कर्णमाहवे ॥

vasundharāyāḥ parivartanaṃ bhavet | vrajecca śoṣaṃ makarālayo'rṇavaḥ | plaveyurapyadrivarā mahāmbudhau | na cārjuno jeṣyati karṇamāhave

चाहे पृथ्वी उलट जाए, मगरों का निवास समुद्र सूख जाए, और श्रेष्ठ पर्वत महासागर में तैरने लगें—फिर भी अर्जुन युद्ध में कर्ण को नहीं जीतेगा।

श्लोक 45 (8.94.45)

अपां पृथिव्या नभसो नभस्वतः । सुतिग्मदीप्तेश्च हिरण्यरेतसः । अभाव एषामपि सर्वतो भवेत् । न चार्जुनो जेष्यति कर्णमाहवे ॥

apāṃ pṛthivyā nabhaso nabhasvataḥ | sutigmadīpteśca hiraṇyaretasaḥ | abhāva eṣāmapi sarvato bhavet | na cārjuno jeṣyati karṇamāhave

जल, पृथ्वी, आकाश, वायु और अत्यन्त प्रज्वलित अग्नि—इन सबका भी यदि सर्वत्र अभाव हो जाए, तब भी अर्जुन युद्ध में कर्ण को नहीं जीतेगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 46 (8.94.46)

तमेवमुक्त्वाऽप्यनुनीय चासकृत् । तवात्मजः स्वाननुशास्ति सैनिकान् । द्रुतं घ्नताभिद्रवताहितानिमान् । अहीनसत्वाः किमु जोषमासते ॥

tamevamuktvā'pyanunīya cāsakṛt | tavātmajaḥ svānanuśāsti sainikān | drutaṃ ghnatābhidravatāhitānimān | ahīnasatvāḥ kimu joṣamāsate

इस प्रकार उससे कहकर और बार-बार उसे मनाकर आपके पुत्र ने अपने सैनिकों को आज्ञा दी—'शीघ्र मारो, इन शत्रुओं पर टूट पड़ो! हे अक्षीण बलवालो, तुम चुपचाप क्यों बैठे हो?'

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