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कर्ण पर्व · अध्याय 95

कर्ण और अर्जुन का संग्राम; भीम का उलाहना

सञ्जय कर्ण और अर्जुन की भिड़न्त का वर्णन अनेक उपमाओं में करते हैं; सोमक अर्जुन को और कौरव योद्धा कर्ण को उत्साहित करते हैं। दोनों पहले बाणों की बौछार करते हैं, फिर दिव्य अस्त्रों की: अर्जुन के आग्नेयास्त्र को कर्ण का वारुणास्त्र शान्त करता है, फिर मेघ और वायु के अस्त्र चलते हैं, और अर्जुन के वज्रास्त्र के बाणों को कर्ण पकड़कर नष्ट कर देता है। क्रोध से जलते भीमसेन हाथ पर हाथ मारकर अर्जुन को फटकारते हैं कि सूतपुत्र उसे कैसे घायल कर सका, और कहते हैं कि वह कर्ण को मारे, नहीं तो वे उसे गदा से कुचल देंगे।

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.95.1)

तौ शङ्खभेरीनिनदे समृद्धे । समीयतुः श्वेतहयौ नराग्र्यौ । वैकर्तनः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च । दुर्मन्त्रिते ते ससुतस्य राजन् ॥

tau śaṅkhabherīninade samṛddhe | samīyatuḥ śvetahayau narāgryau | vaikartanaḥ sūtaputro'rjunaśca | durmantrite te sasutasya rājan

शंखों और भेरियों का घोष बढ़ता जा रहा था; उसी में श्वेत अश्वों वाले दोनों नरश्रेष्ठ—वैकर्तन सूतपुत्र कर्ण और अर्जुन—आमने-सामने आ गए; हे राजन्, यह आपके और आपके पुत्र के बुरे परामर्श का ही फल था।

श्लोक 2 (8.95.2)

आशीविषावग्निमिवोत्सृजन्तौ । तथा मुखाभ्यामभिनिः श्वसन्तौ । यशस्विनौ जज्वलतुर्मृधे तदा । घृतावसिक्ताविव हव्यवाहौ ॥

āśīviṣāvagnimivotsṛjantau | tathā mukhābhyāmabhiniḥ śvasantau | yaśasvinau jajvalaturmṛdhe tadā | ghṛtāvasiktāviva havyavāhau

जैसे दो विषैले सर्प मुखों से आग उगलते और फुफकारते हों, वैसे ही वे दोनों यशस्वी वीर उस समय युद्ध में घी से सींची हुई दो यज्ञाग्नियों की भाँति दहक उठे।

श्लोक 3 (8.95.3)

यथा गजौ हैमवतौ प्रभिन्नौ । प्रवृद्धदन्ताविव वासितार्थे । तथा समाजग्मतुरुग्रवीर्यौ । धनञ्जयश्चाधिरथिश्च वीरौ ॥

yathā gajau haimavatau prabhinnau | pravṛddhadantāviva vāsitārthe | tathā samājagmaturugravīryau | dhanañjayaścādhirathiśca vīrau

जैसे हिमालय के दो मदमत्त हाथी, बड़े-बड़े दाँतों वाले, किसी हथिनी के लिए भिड़ जाते हैं, वैसे ही उग्र पराक्रम वाले दोनों वीर, धनंजय और अधिरथपुत्र, परस्पर भिड़ गए।

श्लोक 4 (8.95.4)

बलाहकेनेव महाबलाहको । यदृच्छया वा गिरिणा यथा गिरिः । तथा धनुर्ज्यातलनेमिनिःस्वनौ । समीयतुस्ताविषुवर्षवर्षिणौ ॥

balāhakeneva mahābalāhako | yadṛcchayā vā giriṇā yathā giriḥ | tathā dhanurjyātalaneminiḥsvanau | samīyatustāviṣuvarṣavarṣiṇau

जैसे एक विशाल मेघ दूसरे मेघ से मिलता है, या संयोग से एक पर्वत दूसरे पर्वत से टकराता है, वैसे ही वे दोनों भिड़े; प्रत्यंचा, हथेली और रथ के पहियों की नेमियों की ध्वनि गूँज रही थी और दोनों बाणों की वर्षा कर रहे थे।

श्लोक 5 (8.95.5)

शरास्त्रशक्त्यृष्टिगदासिसर्पौ । रोषानिलोद्भूतमहोर्मिमालौ । यथाऽचलौ द्वौ चलतस्तथा तौ । यथाऽर्णवौ चाशु चतुर्युगान्ते ॥

śarāstraśaktyṛṣṭigadāsisarpau | roṣānilodbhūtamahormimālau | yathā'calau dvau calatastathā tau | yathā'rṇavau cāśu caturyugānte

बाण, अस्त्र, शक्ति, ऋष्टि, गदा और खड्ग जिनके सर्प थे और क्रोध की वायु से उठी महातरंगों की माला जिनकी लहरें थीं, वे दोनों वैसे ही चलते थे जैसे दो पर्वत चल रहे हों, अथवा चारों युगों के अन्त में दो समुद्र तेजी से उमड़ पड़े हों।

श्लोक 6 (8.95.6)

प्रवृद्धशृङ्गद्रुमवीरुदोषधी । प्रवृद्धनानाविधनिर्झरौघौ । यथाऽचलौ वा चलितौ महाजलैः । तथा महास्त्रैरितरेतरं हतः ॥

pravṛddhaśṛṅgadrumavīrudoṣadhī | pravṛddhanānāvidhanirjharaughau | yathā'calau vā calitau mahājalaiḥ | tathā mahāstrairitaretaraṃ hataḥ

जैसे ऊँचे शिखरों, वृक्षों, लताओं और औषधियों तथा तरह-तरह के बढ़ते झरनों की धाराओं वाले दो पर्वत महान् जलप्रवाहों से हिल उठें, वैसे ही वे दोनों महान् अस्त्रों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 7 (8.95.7)

स सन्निपातो रथयोर्महानभूत् । सुरेशवैरोचनयोर्यथा पुरा । शरैर्विनुन्नाश्वनियन्तृदेहयोः । सुदुःसहास्त्रैः परिभिन्नदेहयोः ॥

sa sannipāto rathayormahānabhūt | sureśavairocanayoryathā purā | śarairvinunnāśvaniyantṛdehayoḥ | suduḥsahāstraiḥ paribhinnadehayoḥ

उन दोनों रथों की वह टक्कर वैसी ही भीषण हुई जैसी पूर्वकाल में देवराज इन्द्र और विरोचनपुत्र बलि की हुई थी; बाणों से दोनों के घोड़े और सारथी बिंध गए थे और अत्यन्त असह्य अस्त्रों से उनके शरीर कट-फट गए थे।

श्लोक 8 (8.95.8)

प्रभूतपद्मोत्पलमत्स्यकच्छपौ । महाहदौ पक्षिगणानुनादितौ । सुसन्निकृष्टावनिलोद्धतौ यथा । तथा रथौ तौ ध्वजिनौ समीयतुः ॥

prabhūtapadmotpalamatsyakacchapau | mahāhadau pakṣigaṇānunāditau | susannikṛṣṭāvaniloddhatau yathā | tathā rathau tau dhvajinau samīyatuḥ

जैसे कमल, कुमुद, मछलियों और कछुओं से भरे तथा पक्षियों के झुण्डों से गूँजते दो महान् सरोवर पास-पास हों और वायु से उछल रहे हों, वैसे ही ध्वजाओं वाले वे दोनों रथ परस्पर भिड़ गए।

श्लोक 9 (8.95.9)

उभौ महेन्द्रस्य समानविक्रमौ । उभौ महेन्द्रप्रतिमौ महारथौ । महेन्द्रवज्रप्रतिमैश्च सायकैः । महेन्द्रवृत्राविव सम्प्रजघ्नतुः ॥

ubhau mahendrasya samānavikramau | ubhau mahendrapratimau mahārathau | mahendravajrapratimaiśca sāyakaiḥ | mahendravṛtrāviva samprajaghnatuḥ

दोनों पराक्रम में महेन्द्र के समान थे; दोनों महेन्द्र के सदृश महारथी थे। महेन्द्र के वज्र के समान बाणों से उन्होंने एक-दूसरे पर वैसा ही प्रहार किया जैसा महेन्द्र और वृत्र ने किया था।

श्लोक 10 (8.95.10)

सनागपत्त्यश्वरथे उभे बले । विचित्रवर्माभरणाम्बरायुधे । चकम्पतुश्चोन्नदतुश्च विस्मयात् । धरा वियच्चार्जुनकर्णसङ्गमे ॥

sanāgapattyaśvarathe ubhe bale | vicitravarmābharaṇāmbarāyudhe | cakampatuśconnadatuśca vismayāt | dharā viyaccārjunakarṇasaṅgame

अर्जुन और कर्ण के उस संग्राम को देखकर विस्मय से दोनों सेनाएँ, अपने हाथियों, पैदलों, घोड़ों और रथों तथा विचित्र कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुधों सहित, काँप उठीं और चिल्ला उठीं; पृथ्वी और आकाश भी गूँज उठे।

श्लोक 11 (8.95.11)

भुजाः सवस्त्राङ्गुलयः समुच्छ्रिताः । ससिंहनादैर्हृषितैर्दिदृक्षुभिः । यदाऽर्जुनं मत्त इव द्विपो द्विपं । समभ्ययादाधिरथिर्जिघांसया ॥

bhujāḥ savastrāṅgulayaḥ samucchritāḥ | sasiṃhanādairhṛṣitairdidṛkṣubhiḥ | yadā'rjunaṃ matta iva dvipo dvipaṃ | samabhyayādādhirathirjighāṃsayā

जब मदमत्त हाथी की भाँति अधिरथपुत्र कर्ण दूसरे हाथी जैसे अर्जुन पर वध की इच्छा से बढ़ा, तब देखने के इच्छुक हर्षित जनों की भुजाएँ, उँगलियों में वस्त्र लहराती हुई, सिंहनादों के साथ ऊपर उठ गईं।

श्लोक 12 (8.95.12)

उदक्रोशन्सोमकास्तत्र पार्थं । त्वरस्व याह्यर्जुन भिन्धि कर्णम् । छिन्ध्यस्य मूर्धानमलं चिरेण । श्रद्धां च राज्याद्धृतराष्ट्रसूनोः ॥

udakrośansomakāstatra pārthaṃ | tvarasva yāhyarjuna bhindhi karṇam | chindhyasya mūrdhānamalaṃ cireṇa | śraddhāṃ ca rājyāddhṛtarāṣṭrasūnoḥ

वहाँ सोमकों ने पार्थ से पुकारकर कहा—'अर्जुन, शीघ्रता करो, जाओ और कर्ण को बींध डालो! अब देर न करो, उसका सिर काट दो और धृतराष्ट्र के पुत्र की राज्य पाने की आशा भी काट दो।'

श्लोक 13 (8.95.13)

तथाऽस्माकं बहवस्तत्र योधाः । कर्णं तथा याहि याहीत्यवोचन् । जह्यर्जुनं कर्ण ततः सुदीनाः । पुनर्वनं यान्त्वचिराय पार्थाः ॥

tathā'smākaṃ bahavastatra yodhāḥ | karṇaṃ tathā yāhi yāhītyavocan | jahyarjunaṃ karṇa tataḥ sudīnāḥ | punarvanaṃ yāntvacirāya pārthāḥ

और हमारे भी बहुत-से योद्धाओं ने वहाँ कर्ण से इसी प्रकार कहा—'जाओ, जाओ! कर्ण, अर्जुन को मार डालो, जिससे अत्यन्त दीन हुए पार्थ शीघ्र ही फिर वन को चले जाएँ।'

श्लोक 14 (8.95.14)

कर्णोऽथ पूर्वं दशभिः पृषत्कैः । गाण्डीवधन्वानमविध्यदाशु । जघान तं चापि ततः किरीटी । शरैस्तदाष्टादशभिः सुमुक्तैः ॥

karṇo'tha pūrvaṃ daśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | gāṇḍīvadhanvānamavidhyadāśu | jaghāna taṃ cāpi tataḥ kirīṭī | śaraistadāṣṭādaśabhiḥ sumuktaiḥ

पहले कर्ण ने शीघ्र ही दस बाणों से गाण्डीवधारी को बींधा; तब किरीटी अर्जुन ने भी अठारह भली-भाँति छोड़े हुए बाणों से उसे घायल किया।

श्लोक 15 (8.95.15)

पुनश्च कर्णस्त्वरितोऽपि पार्थं । रथेषुभिस्तं दशभिर्जघान । तं चापि पार्थो दशभिः शिताग्रैः । कक्ष्यान्तरे तीक्ष्णमुखैरविध्यत् ॥

punaśca karṇastvarito'pi pārthaṃ | ratheṣubhistaṃ daśabhirjaghāna | taṃ cāpi pārtho daśabhiḥ śitāgraiḥ | kakṣyāntare tīkṣṇamukhairavidhyat

फिर कर्ण ने शीघ्रता से दस रथ-बाणों से पार्थ को मारा; और पार्थ ने भी तीखी धार और तेज नोक वाले दस बाणों से उसकी बगल में बींध दिया।

श्लोक 16 (8.95.16)

कर्णस्ततो भारत साम्पराये । घोरेऽतिवेलं रणसंविमर्दी । जघान पार्थं नवभिः शिताग्रैः । कक्ष्यान्ते नागमिव प्रभिन्नम् ॥

karṇastato bhārata sāmparāye | ghore'tivelaṃ raṇasaṃvimardī | jaghāna pārthaṃ navabhiḥ śitāgraiḥ | kakṣyānte nāgamiva prabhinnam

तब, हे भारत, उस भयंकर संग्राम में अत्यधिक रणमर्दन करने वाले कर्ण ने नौ तीखी नोक वाले बाणों से पार्थ की बगल में प्रहार किया, जैसे मदमत्त हाथी पर प्रहार किया जाता है।

श्लोक 17 (8.95.17)

ततोऽपराभ्यां युधि सूतपुत्रो । द्वाभ्यां क्षुराभ्यां हरिमाशुकारी । समाजघान त्वरया महात्मा । यथा सुरेन्द्रं नमुचिः प्रसह्य ॥

tato'parābhyāṃ yudhi sūtaputro | dvābhyāṃ kṣurābhyāṃ harimāśukārī | samājaghāna tvarayā mahātmā | yathā surendraṃ namuciḥ prasahya

तब शीघ्रकारी महात्मा सूतपुत्र ने दो और क्षुर बाणों से हरि (कृष्ण) को शीघ्रता से बींध दिया, जैसे नमुचि ने बल से देवराज इन्द्र को बींधा था।

श्लोक 18 (8.95.18)

तं पाण्डवः पञ्चभिरायसाग्रैः । आकर्णपूर्णैर्निजघान कर्णम् । ते शोणितं तस्य पपुस्तदानीं । कालस्य दूता इव पार्थबाणाः ॥

taṃ pāṇḍavaḥ pañcabhirāyasāgraiḥ | ākarṇapūrṇairnijaghāna karṇam | te śoṇitaṃ tasya papustadānīṃ | kālasya dūtā iva pārthabāṇāḥ

पाण्डव अर्जुन ने कान तक खींचे हुए लोहे की नोक वाले पाँच बाणों से कर्ण को मारा; पार्थ के वे बाण उस समय काल के दूतों की भाँति उसका रक्त पी गए।

श्लोक 19 (8.95.19)

कर्णोऽपि पार्थं सह वासुदेवं । समाचिनोद्भारत वत्सदन्तैः । परस्परं तौ विशिखैः प्रमुक्तैः । ततक्षतुः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च ॥

karṇo'pi pārthaṃ saha vāsudevaṃ | samācinodbhārata vatsadantaiḥ | parasparaṃ tau viśikhaiḥ pramuktaiḥ | tatakṣatuḥ sūtaputro'rjunaśca

कर्ण ने भी वासुदेव सहित पार्थ को, हे भारत, वत्सदन्त बाणों से ढक दिया; और सूतपुत्र तथा अर्जुन दोनों छोड़े हुए बाणों से एक-दूसरे को छेदने लगे।

श्लोक 20 (8.95.20)

परस्परं छिद्रदिदृक्षया च । सुभीममभ्याययतुः प्ररुष्टौ ॥

parasparaṃ chidradidṛkṣayā ca | subhīmamabhyāyayatuḥ praruṣṭau

एक-दूसरे का छिद्र देखने की इच्छा से क्रोध में भरे हुए वे दोनों अत्यन्त भयंकर रूप से एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 21 (8.95.21)

ततोऽस्त्रमाग्नेयममित्रतापनं । मुमोच कर्णाय सुरेश्वरात्मजः । धनञ्जयात्संयुगमूर्ध्नि निःसृतं । तदा प्रजज्वाल तदस्त्रमुत्तमम् ॥

tato'stramāgneyamamitratāpanaṃ | mumoca karṇāya sureśvarātmajaḥ | dhanañjayātsaṃyugamūrdhni niḥsṛtaṃ | tadā prajajvāla tadastramuttamam

तब देवेश्वर के पुत्र अर्जुन ने शत्रुओं को तपाने वाला आग्नेयास्त्र कर्ण पर छोड़ा; धनंजय के द्वारा युद्ध के अग्रभाग में छोड़ा गया वह उत्तम अस्त्र तब प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 22 (8.95.22)

समीक्ष्य कर्णो ज्वलनास्त्रमुद्यतं । स वारुणं तत्प्रशमार्थमाहवे । समुत्सृजत्सूतपुत्रः प्रतापवान् । स तेन वह्निं शमयाञ्चकार ॥

samīkṣya karṇo jvalanāstramudyataṃ | sa vāruṇaṃ tatpraśamārthamāhave | samutsṛjatsūtaputraḥ pratāpavān | sa tena vahniṃ śamayāñcakāra

अग्नि-अस्त्र को उठा हुआ देखकर प्रतापी सूतपुत्र कर्ण ने उसे शान्त करने के लिए युद्ध में वारुणास्त्र छोड़ा और उससे उस अग्नि को बुझा दिया।

श्लोक 23 (8.95.23)

वलाहकास्त्रेण दिशस्तरस्वी । चकार सर्वास्तिमिरेण संवृताः । अपावहन्मेघगणांस्ततस्तान् । समीरणास्त्रेण समीरितेन ॥

valāhakāstreṇa diśastarasvī | cakāra sarvāstimireṇa saṃvṛtāḥ | apāvahanmeghagaṇāṃstatastān | samīraṇāstreṇa samīritena

वेगवान् कर्ण ने मेघास्त्र से सारी दिशाओं को अन्धकार से ढक दिया; तब अर्जुन ने उत्तर में छोड़े हुए वायव्यास्त्र से उन मेघ-समूहों को उड़ा दिया।

श्लोक 24 (8.95.24)

ततः सोऽस्त्रं दयितं देवराज्ञः । प्रादुश्चक्रे वज्रममित्रतापनः । गाण्डीवज्या विमृशंश्चातिमन्युः । धनञ्जयः शत्रुसङ्घप्रमाथी ॥

tataḥ so'straṃ dayitaṃ devarājñaḥ | prāduścakre vajramamitratāpanaḥ | gāṇḍīvajyā vimṛśaṃścātimanyuḥ | dhanañjayaḥ śatrusaṅghapramāthī

तब शत्रुओं को तपाने वाले और शत्रु-समूहों को कुचलने वाले धनंजय ने अत्यन्त क्रोध में गाण्डीव की प्रत्यंचा को सहलाते हुए देवराज इन्द्र के प्रिय वज्रास्त्र को प्रकट किया।

श्लोक 25 (8.95.25)

नाराचनालीकवराहकर्णा । गाण्डीवतः प्रादुरासन्सुतीक्ष्णाः । सहस्रशो वज्रसमानवेगाः । ते सर्वतः पर्यधावन्त घोराः ॥

nārācanālīkavarāhakarṇā | gāṇḍīvataḥ prādurāsansutīkṣṇāḥ | sahasraśo vajrasamānavegāḥ | te sarvataḥ paryadhāvanta ghorāḥ

नाराच, नालीक और वराहकर्ण नाम के अत्यन्त तीखे बाण गाण्डीव से सहस्रों की संख्या में निकले; वज्र के समान वेग वाले वे भयंकर बाण चारों ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 26 (8.95.26)

पार्थेषवः कर्णरथं विलग्ना । अधोमुखाः पक्षिगणा दिनान्ते । निशानिकेतार्थमिवाशु वृक्षं । जग्राह तान्सूतपुत्रः पृषत्कैः ॥

pārtheṣavaḥ karṇarathaṃ vilagnā | adhomukhāḥ pakṣigaṇā dinānte | niśāniketārthamivāśu vṛkṣaṃ | jagrāha tānsūtaputraḥ pṛṣatkaiḥ

पार्थ के बाण कर्ण के रथ से चिपक गए, जैसे दिन के अन्त में रात के बसेरे के लिए पक्षियों के झुण्ड नीचे को मुँह किए वृक्ष पर जा बैठते हैं; उन्हें सूतपुत्र ने अपने बाणों से पकड़ लिया।

श्लोक 27 (8.95.27)

क्षिप्तांस्तथा पाण्डवबाणसङ्घान् । अमृष्यमाणस्य धनञ्जयस्य । रणाजिरे त्वन्तकतुल्यकर्मा । वैकर्तनो रोषपरीतचेताः ॥

kṣiptāṃstathā pāṇḍavabāṇasaṅghān | amṛṣyamāṇasya dhanañjayasya | raṇājire tvantakatulyakarmā | vaikartano roṣaparītacetāḥ

रणभूमि में यमराज के समान कर्म करने वाला, क्रोध से घिरे चित्त वाला वैकर्तन कर्ण, असहनशील धनंजय के छोड़े हुए पाण्डव के बाणों के उन समूहों के सामने था—

श्लोक 28 (8.95.28)

ज्योतिष्प्रभां यद्वदुपागतः सन् । दिवाकरो नाशयते क्षणेन । पार्थस्य तान्बाणगणान्समग्रान् । व्यनाशयद्युध्यत एव कर्णः ॥

jyotiṣprabhāṃ yadvadupāgataḥ san | divākaro nāśayate kṣaṇena | pārthasya tānbāṇagaṇānsamagrān | vyanāśayadyudhyata eva karṇaḥ

—और जैसे उदित सूर्य क्षण भर में तारों की प्रभा को नष्ट कर देता है, वैसे ही कर्ण ने लड़ते-लड़ते ही पार्थ के उन सब बाण-समूहों को नष्ट कर दिया।

श्लोक 29 (8.95.29)

रोषात्प्रदीप्तः सुमहाविमर्दे । भीमस्ततोऽक्रुध्यददीनसत्वः । पाणिं स्वपाणौ स विनिष्पिष्य रोषात् । अमर्षितो वाक्यमुवाच पार्थम् ॥

roṣātpradīptaḥ sumahāvimarde | bhīmastato'krudhyadadīnasatvaḥ | pāṇiṃ svapāṇau sa viniṣpiṣya roṣāt | amarṣito vākyamuvāca pārtham

उस महासंग्राम में क्रोध से दहकते हुए अदम्य साहस वाले भीमसेन और भी कुपित हुए; क्रोध से हथेली पर हथेली मारकर उन्होंने असहनशील होकर पार्थ से यह वचन कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 30 (8.95.30)

त्वां सूतपुत्रो नु कथं किरीटिन् । रथेषुभिर्हन्ति शिताग्रधारैः । धृत्या हि भूतानि ययाऽजयस्त्वं । ग्रासं ददत्खाण्डवे पावकाय ॥

tvāṃ sūtaputro nu kathaṃ kirīṭin | ratheṣubhirhanti śitāgradhāraiḥ | dhṛtyā hi bhūtāni yayā'jayastvaṃ | grāsaṃ dadatkhāṇḍave pāvakāya

किरीटी, यह सूतपुत्र तुम्हें तीखी नोक और धार वाले बाणों से कैसे मार रहा है? जिस धैर्य से तुमने खाण्डव वन में अग्नि को आहार देते हुए सब प्राणियों को जीत लिया था—

श्लोक 31 (8.95.31)

धृत्या तया सूतपुत्रं जहि त्वम् । अहं वैनं गदया पोथयिष्ये । समेत्य पार्थं सुनृशंसवादी । जीवन्नायं यास्यति कालपक्वः ॥

dhṛtyā tayā sūtaputraṃ jahi tvam | ahaṃ vainaṃ gadayā pothayiṣye | sametya pārthaṃ sunṛśaṃsavādī | jīvannāyaṃ yāsyati kālapakvaḥ

उसी धैर्य से तुम सूतपुत्र को मार डालो, अथवा मैं ही इसे गदा से कुचल दूँगा। पार्थ से भिड़कर यह क्रूर बोलने वाला, काल से पका हुआ, जीवित नहीं लौटेगा।

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