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कर्ण पर्व · अध्याय 96

अर्जुन का ब्रह्मास्त्र; कौरवों का पलायन

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्ण उसके सामने ही उसके अस्त्रों को नष्ट कर रहा है, और उसे वह धैर्य फिर धारण करने को कहते हैं जिससे उसने कभी शिव को प्रसन्न किया था, तथा कर्ण को मार डालने को प्रेरित करते हैं। भीम और कृष्ण से प्रेरित अर्जुन कृष्ण, देवताओं और ऋषियों से अनुमति लेकर ब्रह्मास्त्र प्रकट करता है और बाणों से दिशाओं तथा कर्ण के रथ को ढक देता है। कर्ण भी बाणों की झड़ी से उत्तर देता है, अर्जुन की प्रत्यंचा काट देता है और कृष्ण को घायल करता है; अर्जुन क्षण भर में नई प्रत्यंचा चढ़ा लेता है, शल्य और कर्ण को बींधता है और स्वर्ण-कवचधारी एक राजकुमार तथा बहुत-से सैनिकों को मार गिराता है। दुर्योधन के ललकारने पर भी कौरव योद्धा भाग खड़े होते हैं, और अकेला तथा घायल कर्ण फिर भी सीधे अर्जुन पर टूट पड़ता है।

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.96.1)

अथाब्रवीच्चक्रधरोऽपि पार्थं । दृष्ट्वा रथेषून्प्रतिहन्यमानान् । अमूमुषत्पश्यत एव तेऽद्य । ह्यस्त्राणि कर्णोऽस्त्रगणैः किरीटिन् ॥

athābravīccakradharo'pi pārthaṃ | dṛṣṭvā ratheṣūnpratihanyamānān | amūmuṣatpaśyata eva te'dya | hyastrāṇi karṇo'stragaṇaiḥ kirīṭin

तब चक्रधारी कृष्ण ने भी पार्थ के बाणों को कटते देखकर कहा—'किरीटी, आज तुम्हारे देखते-देखते ही कर्ण अपने अस्त्र-समूहों से तुम्हारे अस्त्र छीन रहा है।'

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (8.96.2)

स पार्थ किं मुह्यसि वेत्सि चैव तान् । दृष्ट्वा समेतान्नदतः कुरूंस्त्वम् । कर्णं पुरस्कृत्य विदुर्हि सर्वे । तवास्त्रमस्त्रैर्विनिहन्यमानम् ॥

sa pārtha kiṃ muhyasi vetsi caiva tān | dṛṣṭvā sametānnadataḥ kurūṃstvam | karṇaṃ puraskṛtya vidurhi sarve | tavāstramastrairvinihanyamānam

पार्थ, तुम मोहित क्यों हो रहे हो? तुम जानते तो हो; इकट्ठे होकर गरज रहे उन कौरवों को देखो। कर्ण को आगे करके वे सब जानते हैं कि तुम्हारा अस्त्र उसके अस्त्रों से नष्ट किया जा रहा है।

श्लोक 3 (8.96.3)

यया धृत्या निहतं तामसास्त्रं । युगे युगे राक्षसाश्चापि घोराः । दम्भोद्भवाश्चासुराश्चाहवेषु । तया धृत्या त्वं जहि सूतपुत्रम् । दर्पोत्सिक्तं वीर्यमन्तं किरीटिन् । पार्थाहवे त्यक्तुमस्त्रं समर्थः ॥

yayā dhṛtyā nihataṃ tāmasāstraṃ | yuge yuge rākṣasāścāpi ghorāḥ | dambhodbhavāścāsurāścāhaveṣu | tayā dhṛtyā tvaṃ jahi sūtaputram | darpotsiktaṃ vīryamantaṃ kirīṭin | pārthāhave tyaktumastraṃ samarthaḥ

जिस धैर्य से युग-युग में तामसास्त्र नष्ट किया गया और भयंकर राक्षस तथा दम्भ से उत्पन्न असुर युद्धों में मारे गए, उसी धैर्य से तुम सूतपुत्र को मार डालो—हे किरीटी, वह अभिमान से भरा और पराक्रमी है; हे पार्थ, युद्ध में वह अस्त्र चलाने में समर्थ है।

श्लोक 4 (8.96.4)

अनेन चाशु क्षुरनेमिनाद्य । मया विसृष्टेन सुदर्शनेन । छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः प्रसह्य । वज्रेण शक्रो नमुचेरिवारेः ॥

anena cāśu kṣuraneminādya | mayā visṛṣṭena sudarśanena | chindhyasya mūrdhānamareḥ prasahya | vajreṇa śakro namucerivāreḥ

अब मेरे छोड़े हुए इस छुरे की धार जैसी नेमि वाले सुदर्शन से शीघ्र ही शत्रु का सिर बलपूर्वक काट डालो, जैसे इन्द्र ने वज्र से शत्रु नमुचि का सिर काटा था।

श्लोक 5 (8.96.5)

किरातरूपी भगवान्यया च । त्वया महात्मा परितोषितोऽभूत् । स तां पुनर्वीर धृतिं गृहीत्वा । सहानुबन्धं जहि सूतपुत्रम् ॥

kirātarūpī bhagavānyayā ca | tvayā mahātmā paritoṣito'bhūt | sa tāṃ punarvīra dhṛtiṃ gṛhītvā | sahānubandhaṃ jahi sūtaputram

जिस धैर्य से तुमने किरात का रूप धारण करने वाले भगवान् महादेव को सन्तुष्ट किया था, हे वीर, उसी धैर्य को फिर धारण करके सूतपुत्र को उसके अनुयायियों सहित मार डालो।

श्लोक 6 (8.96.6)

ततो महीं सागरमेखलां त्वं । सपत्तनां ग्रामवतीं समृद्धाम् । प्रयच्छ राज्ञे निहतारिसङ्घां । यशश्च पार्थातुलमाप्नुहि त्वम् ॥

tato mahīṃ sāgaramekhalāṃ tvaṃ | sapattanāṃ grāmavatīṃ samṛddhām | prayaccha rājñe nihatārisaṅghāṃ | yaśaśca pārthātulamāpnuhi tvam

तब समुद्र की करधनी पहने, नगरों और ग्रामों से भरी, समृद्ध तथा शत्रु-समूहों से रहित पृथ्वी राजा को दे दो, और हे पार्थ, अतुल यश प्राप्त करो।

श्लोक 7 (8.96.7)

कर्णं पुरस्कृत्य नदन्ति सर्वे । तवास्त्रमुर्व्यां प्रतिहत्य वीराः । कुरु प्रयत्नं भरतप्रवीर । द्रवन्त्यमी सृञ्जयसोमकाश्च । दृष्ट्वा च कर्णं समरे प्रहृष्टं । त्वां चापि दृष्ट्वा परिहीयमानम् ॥

karṇaṃ puraskṛtya nadanti sarve | tavāstramurvyāṃ pratihatya vīrāḥ | kuru prayatnaṃ bharatapravīra | dravantyamī sṛñjayasomakāśca | dṛṣṭvā ca karṇaṃ samare prahṛṣṭaṃ | tvāṃ cāpi dṛṣṭvā parihīyamānam

कर्ण को आगे करके वे सब वीर गरज रहे हैं, जिन्होंने तुम्हारे अस्त्र को भूमि पर गिरा दिया है। हे भरतवंश के श्रेष्ठ वीर, प्रयत्न करो! ये सृञ्जय और सोमक भाग रहे हैं, क्योंकि उन्होंने युद्ध में कर्ण को प्रसन्न और तुम्हें भी क्षीण होते देखा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 8 (8.96.8)

सञ्चोदितो भीमजनार्दनाभ्यां । स्मृत्वा तदात्मानमवेत्य सर्वम् । इहात्मनश्चागमने विदित्वा । प्रयोजनं केशवमित्युवाच ॥

sañcodito bhīmajanārdanābhyāṃ | smṛtvā tadātmānamavetya sarvam | ihātmanaścāgamane viditvā | prayojanaṃ keśavamityuvāca

भीम और जनार्दन के प्रेरित करने पर अर्जुन ने अपने स्वरूप का स्मरण किया, सब कुछ समझ लिया और अपने इस संसार में आने का प्रयोजन जानकर केशव से यह कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 9 (8.96.9)

प्रादुष्करोम्येष महास्त्रमुग्रं । शिवाय लोकस्य वधाय सौतेः । तन्मेऽनुजानातु भवान्सुराश्च । ब्रह्मा शिवो ब्रह्मविदश्च सर्वे ॥

prāduṣkaromyeṣa mahāstramugraṃ | śivāya lokasya vadhāya sauteḥ | tanme'nujānātu bhavānsurāśca | brahmā śivo brahmavidaśca sarve

मैं संसार के कल्याण के लिए और सूत के पुत्र के वध के लिए यह महान् उग्र अस्त्र प्रकट कर रहा हूँ। इसके लिए आप, देवता, ब्रह्मा, शिव और सब ब्रह्मवेत्ता मुझे अनुमति दें।

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (8.96.10)

इति स्मोक्त्वा पाण्डवः सव्यसाची । नमस्कृत्वा ब्रह्मणे सोऽमितात्मा । अनुत्तमं ब्राह्ममसह्यमस्त्रं । प्रादुश्चक्रे मनसा यद्विधेयम् ॥

iti smoktvā pāṇḍavaḥ savyasācī | namaskṛtvā brahmaṇe so'mitātmā | anuttamaṃ brāhmamasahyamastraṃ | prāduścakre manasā yadvidheyam

ऐसा कहकर अमित आत्मा वाले पाण्डव सव्यसाची ने ब्रह्मा को प्रणाम किया और उस सर्वोत्तम, असह्य ब्रह्मास्त्र को प्रकट किया जिसे मन से ही चलाया जाता है।

श्लोक 11 (8.96.11)

ततो दिशश्च प्रदिशश्च सर्वाः । समावृणोत्सायकैर्भूरितेजाः । गाण्डीवमुक्तैर्भुजगैरिवोग्रैः । दिवाकरांशुप्रतिमैर्ज्वलद्भिः ॥

tato diśaśca pradiśaśca sarvāḥ | samāvṛṇotsāyakairbhūritejāḥ | gāṇḍīvamuktairbhujagairivograiḥ | divākarāṃśupratimairjvaladbhiḥ

तब महातेजस्वी अर्जुन ने गाण्डीव से छोड़े हुए, उग्र सर्पों जैसे और सूर्य की किरणों के समान जलते हुए बाणों से सारी दिशाओं और उपदिशाओं को ढक दिया।

श्लोक 12 (8.96.12)

सृष्टास्तु बाणा भरतर्षभेण । शतं शतं भीममुखाः सुतीक्ष्णाः । प्राच्छादयन्कर्णरथं क्षणेन । युगान्तकालार्ककरप्रकाशाः ॥

sṛṣṭāstu bāṇā bharatarṣabheṇa | śataṃ śataṃ bhīmamukhāḥ sutīkṣṇāḥ | prācchādayankarṇarathaṃ kṣaṇena | yugāntakālārkakaraprakāśāḥ

भरतवंश के उस श्रेष्ठ वीर के छोड़े हुए, सैकड़ों-सैकड़ों भयंकर और अत्यन्त तीखे बाणों ने, जो युगान्त के सूर्य की किरणों जैसे दीप्तिमान् थे, क्षण भर में कर्ण के रथ को ढक दिया।

श्लोक 13 (8.96.13)

वैकर्तनेनाशु तदाजिमध्ये । सहस्रशो बाणगणा विसृष्टाः । ते चाक्षयाः पाण्डवमभ्युपेयुः । पर्जन्यसृष्टा इव वारिधाराः ॥

vaikartanenāśu tadājimadhye | sahasraśo bāṇagaṇā visṛṣṭāḥ | te cākṣayāḥ pāṇḍavamabhyupeyuḥ | parjanyasṛṣṭā iva vāridhārāḥ

वैकर्तन कर्ण ने भी तब युद्ध के बीच शीघ्र ही सहस्रों बाण-समूह छोड़े, और वे अक्षय बाण, मेघ की छोड़ी हुई जलधाराओं की भाँति, पाण्डव अर्जुन पर जा गिरे।

श्लोक 14 (8.96.14)

ततः स कृष्णं च किरीटिनं च । वृकोदरं चाप्रतिमप्रभावः । त्रिभिस्त्रिभिर्भीमबलो निहत्य । ननाद घोरं महता स्वनेन ॥

tataḥ sa kṛṣṇaṃ ca kirīṭinaṃ ca | vṛkodaraṃ cāpratimaprabhāvaḥ | tribhistribhirbhīmabalo nihatya | nanāda ghoraṃ mahatā svanena

तब अतुल प्रभाव वाले, भयंकर बल वाले कर्ण ने कृष्ण, किरीटी और वृकोदर को तीन-तीन बाणों से मारकर बड़े घोष से भयंकर गर्जना की।

श्लोक 15 (8.96.15)

ततः स बाणाभिहतः किरीटी । भीमं तथा प्रेक्ष्य जनार्दनं च । अमृष्यमाणः पुनरेव पार्थः । शरान्दशाष्टौ सममुद्ववर्ष ॥

tataḥ sa bāṇābhihataḥ kirīṭī | bhīmaṃ tathā prekṣya janārdanaṃ ca | amṛṣyamāṇaḥ punareva pārthaḥ | śarāndaśāṣṭau samamudvavarṣa

तब बाणों से घायल किरीटी अर्जुन ने भीम और जनार्दन को भी घायल देखा और असह्य होकर पार्थ ने फिर एक साथ अठारह बाण बरसाए।

श्लोक 16 (8.96.16)

स केतुमेकेन शरेण विद्ध्वा । शल्यं चतुर्भिस्त्रिभिरेव कर्णम् । ततः सुमुक्तैर्दशभिर्जघान । सेनापतिं काञ्चनवर्मनद्धम् ॥

sa ketumekena śareṇa viddhvā | śalyaṃ caturbhistribhireva karṇam | tataḥ sumuktairdaśabhirjaghāna | senāpatiṃ kāñcanavarmanaddham

उसने एक बाण से ध्वज को, चार से शल्य को और तीन से कर्ण को बींधा; फिर दस भली-भाँति छोड़े हुए बाणों से सुनहरे कवच से सजे सेनापति को मार गिराया।

श्लोक 17 (8.96.17)

स राजपुत्रो विशिरा विबाहुः । विवाजिसूतो विधनुर्विकेतुः । अथो रथाग्रादपतत्प्ररुग्णः । परश्वथैः साल इवावकृत्तः ॥

sa rājaputro viśirā vibāhuḥ | vivājisūto vidhanurviketuḥ | atho rathāgrādapatatprarugṇaḥ | paraśvathaiḥ sāla ivāvakṛttaḥ

वह राजकुमार सिर, भुजाओं, घोड़ों, सारथी, धनुष और ध्वज से रहित होकर टूटा-फूटा रथ के अगले भाग से गिर पड़ा, जैसे कुल्हाड़ियों से काटा हुआ साल का वृक्ष।

श्लोक 18 (8.96.18)

पुनश्च कर्णं त्रिभिरष्टभिश्च । द्वाभ्यां चतुर्भिर्दशभिश्च विद्ध्वा । चतुःशतान्द्विरदान्सायुधीयान् । हत्वा रथानष्टशतं जघान । सहस्रमश्वांश्च पुनश्च सादीन् । अष्टौ सहस्राणि च पत्तिवीरान् ॥

punaśca karṇaṃ tribhiraṣṭabhiśca | dvābhyāṃ caturbhirdaśabhiśca viddhvā | catuḥśatāndviradānsāyudhīyān | hatvā rathānaṣṭaśataṃ jaghāna | sahasramaśvāṃśca punaśca sādīn | aṣṭau sahasrāṇi ca pattivīrān

फिर कर्ण को तीन, आठ, दो, चार और दस बाणों से बींधकर उसने सशस्त्र योद्धाओं सहित चार सौ हाथियों को मार डाला, आठ सौ रथों को गिरा दिया, एक हजार घोड़ों को, फिर घुड़सवारों को और आठ हजार पैदल वीरों को भी मार डाला।

श्लोक 19 (8.96.19)

दृष्ट्वा तु मुख्यावतिविध्यमानौ । वरेषुभिः शूरवरावरिघ्नौ । कर्णं च पार्थं च नियम्य वाहान् । सर्वे वरिष्ठाश्च ततोऽवतस्थुः ॥

dṛṣṭvā tu mukhyāvatividhyamānau | vareṣubhiḥ śūravarāvarighnau | karṇaṃ ca pārthaṃ ca niyamya vāhān | sarve variṣṭhāśca tato'vatasthuḥ

उन दोनों प्रधान वीरों—कर्ण और पार्थ—को, जो शूरों में श्रेष्ठ और शत्रुओं के संहारक थे, उत्तम बाणों से अत्यन्त बिंधते देखकर सभी श्रेष्ठ योद्धा अपने वाहनों को रोककर खड़े हो गए।

श्लोक 20 (8.96.20)

प्रच्छादयामास ततः पृषत्कैः । सघोषमाच्छिद्य च गाण्डिवज्याम् । अस्मिन्क्षणे फल्गुनं सूतपुत्रः । समाचिनोत्क्षुद्रकाणां शतेन ॥

pracchādayāmāsa tataḥ pṛṣatkaiḥ | saghoṣamācchidya ca gāṇḍivajyām | asminkṣaṇe phalgunaṃ sūtaputraḥ | samācinotkṣudrakāṇāṃ śatena

तब गाण्डीव की प्रत्यंचा को घोष के साथ काटकर उसने अर्जुन को बाणों से ढक दिया; और उसी क्षण सूतपुत्र ने फल्गुन पर सौ क्षुद्रक बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 21 (8.96.21)

निर्मुक्तसर्पप्रतिमैश्च तीक्ष्णैः । तैलप्रघौतैः खगपत्रवाजैः । षष्ट्या बिभेदाशु च वासुदेवं । तदन्तरे प्रात्वरन्सोमकाश्च ॥

nirmuktasarpapratimaiśca tīkṣṇaiḥ | tailapraghautaiḥ khagapatravājaiḥ | ṣaṣṭyā bibhedāśu ca vāsudevaṃ | tadantare prātvaransomakāśca

केंचुल छोड़े हुए सर्पों जैसे चमकते, तेल से धुले हुए, पक्षियों के पंखों वाले साठ तीखे बाणों से उसने शीघ्र वासुदेव को बींध दिया; और उसी बीच सोमक आगे दौड़ पड़े।

श्लोक 22 (8.96.22)

ततो नवज्यां सुदृढां किरीटि । स्वबाहुविक्षेपसहां प्रगृह्य । समादधे गाण्डिवे क्षिप्रकारी । निमेषमात्रेण महाधनुष्मान् ॥

tato navajyāṃ sudṛḍhāṃ kirīṭi | svabāhuvikṣepasahāṃ pragṛhya | samādadhe gāṇḍive kṣiprakārī | nimeṣamātreṇa mahādhanuṣmān

तब शीघ्रकारी महाधनुर्धर किरीटी ने अपनी भुजाओं के झटके को सह सकने वाली नई और अत्यन्त दृढ़ प्रत्यंचा लेकर पलक झपकते ही गाण्डीव पर चढ़ा दी।

श्लोक 23 (8.96.23)

ज्याछेदनं ज्याविधानं च तस्य । नैवावबुध्यत्सूतपुत्रो लघुत्वात् । पार्थस्य सङ्ख्ये द्विषतां निहन्तुः । तदद्भुतं तत्र बभूव राजन् ॥

jyāchedanaṃ jyāvidhānaṃ ca tasya | naivāvabudhyatsūtaputro laghutvāt | pārthasya saṅkhye dviṣatāṃ nihantuḥ | tadadbhutaṃ tatra babhūva rājan

युद्ध में शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ की फुर्ती के कारण सूतपुत्र को प्रत्यंचा के कटने और उसके चढ़ाए जाने का पता ही नहीं चला। हे राजन्, वहाँ वह एक अद्भुत बात हुई।

श्लोक 24 (8.96.24)

पार्थोऽपि तां ज्यामवधाय तूर्णं । शरासनज्यामाधिरथेर्विहत्य । सुसंरब्धः कर्णशरैः क्षताङ्गो । रणे योधांस्तावकान्प्रत्यगृह्णात् ॥

pārtho'pi tāṃ jyāmavadhāya tūrṇaṃ | śarāsanajyāmādhirathervihatya | susaṃrabdhaḥ karṇaśaraiḥ kṣatāṅgo | raṇe yodhāṃstāvakānpratyagṛhṇāt

पार्थ ने भी शीघ्र उस प्रत्यंचा को चढ़ाया, अधिरथपुत्र के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, और कर्ण के बाणों से घायल अंगों वाला वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर रण में आपके योद्धाओं का सामना करने लगा।

श्लोक 25 (8.96.25)

नैवापत्पक्षिगणोऽन्तरिक्षे । पार्थेन चास्त्रेण कृतेऽन्धकारे ॥

naivāpatpakṣigaṇo'ntarikṣe | pārthena cāstreṇa kṛte'ndhakāre

पार्थ के अस्त्र से अन्धकार हो जाने पर आकाश में पक्षियों का कोई झुण्ड उड़ नहीं पाया।

श्लोक 26 (8.96.26)

शल्यं तु पार्थो दशभिर्निमेषात् । भृशं तनुत्रे प्रहसन्नविध्यत् । ततः कर्णं द्वादशभिः पृषत्कैः । विद्ध्वा पुनः सप्तभिरप्यविध्यत् ॥

śalyaṃ tu pārtho daśabhirnimeṣāt | bhṛśaṃ tanutre prahasannavidhyat | tataḥ karṇaṃ dvādaśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | viddhvā punaḥ saptabhirapyavidhyat

पार्थ ने हँसते हुए पलक झपकते ही दस बाणों से शल्य के कवच पर कसकर प्रहार किया, फिर बारह भली-भाँति छोड़े हुए बाणों से कर्ण को बींधकर सात और बाणों से फिर बींध दिया।

श्लोक 27 (8.96.27)

स पार्थबाणासनवेगनुन्नैः । दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः । विभिन्नगात्रः क्षतजोक्षिताङ्गः । कर्णो बभौ रुद्र इवान्तकाले ॥

sa pārthabāṇāsanaveganunnaiḥ | dṛḍhāhataḥ patribhirugravegaiḥ | vibhinnagātraḥ kṣatajokṣitāṅgaḥ | karṇo babhau rudra ivāntakāle

पार्थ के धनुष के वेग से चलाए गए उग्र वेग वाले पंखदार बाणों से गहरी चोट खाकर, फटे हुए अंगों और रक्त से भीगे शरीर वाला कर्ण अन्तकाल के रुद्र की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 28 (8.96.28)

ततस्त्रिभिस्तं त्रिदशाधिपोपमं । शरैर्बिभेदाधिरथिर्धनञ्जयम् । शरांश्च पञ्च ज्वलनानिवोरगान् । प्रवेशयामास जिघांसुरच्युते ॥

tatastribhistaṃ tridaśādhipopamaṃ | śarairbibhedādhirathirdhanañjayam | śarāṃśca pañca jvalanānivoragān | praveśayāmāsa jighāṃsuracyute

तब अधिरथपुत्र ने इन्द्र के समान अर्जुन को तीन बाणों से बींधा, और अच्युत को मार डालने की इच्छा से जलते हुए सर्पों जैसे पाँच बाण उनके शरीर में घुसा दिए।

श्लोक 29 (8.96.29)

सुवर्णचित्रं पुरुषोत्तमस्य । वर्माथ भित्त्वाभ्यपतन्सुपुङ्खाः । वेगेन गां ते विविशुश्च राजन् । स्नात्वा कर्णाऽभिमुखाः प्रतीयुः ॥

suvarṇacitraṃ puruṣottamasya | varmātha bhittvābhyapatansupuṅkhāḥ | vegena gāṃ te viviśuśca rājan | snātvā karṇā'bhimukhāḥ pratīyuḥ

सुन्दर पंखों वाले वे बाण पुरुषोत्तम के सुनहरे विचित्र कवच को भेदकर गिरे और, हे राजन्, वेग से पृथ्वी में घुस गए, और वहाँ स्नान करके फिर कर्ण की ओर लौट आए।

श्लोक 30 (8.96.30)

तान्पञ्चभल्लैर्दशभिः सुमुक्तैः । त्रिधात्रिधैकैकमथोच्चकर्त । धनञ्जयस्ते न्यपतन्पृथिव्यां । यथाऽहयस्तार्क्ष्यमुखेन कृत्ताः ॥

tānpañcabhallairdaśabhiḥ sumuktaiḥ | tridhātridhaikaikamathoccakarta | dhanañjayaste nyapatanpṛthivyāṃ | yathā'hayastārkṣyamukhena kṛttāḥ

पाँच भल्लों और दस भली-भाँति छोड़े हुए बाणों से धनंजय ने उनमें से प्रत्येक को तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला, और वे बाण गरुड़ की चोंच से कटे सर्पों की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 31 (8.96.31)

ततः प्रजज्वाल किरीटमाली । क्रोधेन कक्षं प्रदहन्निवाग्निः । स कर्णमाकर्णविकृष्टसृष्टैः । शरैः शरीरान्तकरैर्ज्वलद्भिः । मर्मस्वविध्यत्स चचाल दुःखाद् । धैर्यात्तु तस्थावतिमात्रधैर्यः ॥

tataḥ prajajvāla kirīṭamālī | krodhena kakṣaṃ pradahannivāgniḥ | sa karṇamākarṇavikṛṣṭasṛṣṭaiḥ | śaraiḥ śarīrāntakarairjvaladbhiḥ | marmasvavidhyatsa cacāla duḥkhād | dhairyāttu tasthāvatimātradhairyaḥ

तब किरीटमाली अर्जुन क्रोध से सूखी घास को जलाती अग्नि की भाँति दहक उठा। कान तक खींचकर छोड़े गए, शरीर का अन्त कर देने वाले जलते बाणों से उसने कर्ण के मर्मस्थानों को बींध दिया; कर्ण पीड़ा से डगमगा गया, फिर भी अपने अपार धैर्य के कारण डटा रहा।

श्लोक 32 (8.96.32)

प्रादुश्चकाराथ शरान्महात्मा । देहं विचिन्वन्निव सूतजस्य । शरास्तु ते काञ्चनचित्रपुङ्खाः । सम्पेतुरुर्व्यां शतशो महान्तः ॥

prāduścakārātha śarānmahātmā | dehaṃ vicinvanniva sūtajasya | śarāstu te kāñcanacitrapuṅkhāḥ | sampetururvyāṃ śataśo mahāntaḥ

महात्मा अर्जुन ने मानो सूतपुत्र के शरीर को खोजते हुए और बाण छोड़े; सोने के विचित्र पंखों वाले वे विशाल बाण पृथ्वी पर सैकड़ों की संख्या में आ गिरे।

श्लोक 33 (8.96.33)

ततः शरौघैः प्रदिशो दिशश्च । रविप्रभाः कर्णरथश्च राजन् । अदृश्य आसीत्कुपिते धनञ्जये । तुषारनीहारवृतो गिरिर्यथा ॥

tataḥ śaraughaiḥ pradiśo diśaśca | raviprabhāḥ karṇarathaśca rājan | adṛśya āsītkupite dhanañjaye | tuṣāranīhāravṛto giriryathā

तब धनंजय के कुपित होने पर बाणों की बाढ़ से दिशाएँ, उपदिशाएँ, सूर्य की किरणें और, हे राजन्, कर्ण का रथ भी ऐसे अदृश्य हो गए जैसे हिम और कुहरे से ढका पर्वत।

श्लोक 34 (8.96.34)

सचक्ररक्षा अपि पृष्ठगोपाः । कर्णस्य ये चापि पुरःसराश्च । भीता द्रवन्ति स्म निहन्यमाना । महेषुभिः पार्थकरप्रणुन्नैः ॥

sacakrarakṣā api pṛṣṭhagopāḥ | karṇasya ye cāpi puraḥsarāśca | bhītā dravanti sma nihanyamānā | maheṣubhiḥ pārthakarapraṇunnaiḥ

कर्ण के चक्ररक्षक और पृष्ठरक्षक तथा जो उसके आगे चलने वाले थे, पार्थ के हाथ से चलाए गए महान् बाणों से मारे जाते हुए भयभीत होकर भागने लगे।

श्लोक 35 (8.96.35)

ततोऽर्जुनो वै भरतप्रवीरो । महानुभावः समरे निहन्ता । सुयोधनेनानुमतान्विनिघ्नन् । समुच्छ्रितान्सरथान्सारभूतान् ॥

tato'rjuno vai bharatapravīro | mahānubhāvaḥ samare nihantā | suyodhanenānumatānvinighnan | samucchritānsarathānsārabhūtān

तब भरतवंश के वीर, महानुभाव, समर में संहार करने वाले अर्जुन ने सुयोधन के सम्मत, ऊँचे कद के, चुने हुए, सारभूत योद्धाओं को रथों सहित मारते हुए—

श्लोक 36 (8.96.36)

गाण्डीवधन्वा द्विगुणं सहस्रं । कुरुप्रवीरानृषभः कुरूणाम् । क्षणेन सर्वान्सरथान्ससूतान् । निनाय राजन्क्षयमेकवीरः ॥

gāṇḍīvadhanvā dviguṇaṃ sahasraṃ | kurupravīrānṛṣabhaḥ kurūṇām | kṣaṇena sarvānsarathānsasūtān | nināya rājankṣayamekavīraḥ

—गाण्डीवधारी, कुरुवंश के उस वृषभ ने, हे राजन्, अकेले ही वीर होकर दो हजार प्रमुख कौरव वीरों को उनके रथों, घोड़ों और सारथियों सहित क्षण भर में विनाश तक पहुँचा दिया।

श्लोक 37 (8.96.37)

अथो पलायन्त विहाय कर्णं । तवात्मजा ये कुरवश्च शिष्टाः । एतानवाकीर्य शरक्षतांश्च । विलप्यमानांस्तनयान्विमृद्नन् ॥

atho palāyanta vihāya karṇaṃ | tavātmajā ye kuravaśca śiṣṭāḥ | etānavākīrya śarakṣatāṃśca | vilapyamānāṃstanayānvimṛdnan

तब आपके पुत्र और बचे हुए कौरव कर्ण को छोड़कर भाग खड़े हुए; वे इन सबको छोड़ गए और बाणों से घायल, विलाप करते हुए अपने ही पुत्रों को रौंदते हुए चले गए।

श्लोक 38 (8.96.38)

सर्वे प्रणेशुः कुरवो विभग्नाः । पार्थेषुभिः सम्परितप्यमानाः । सुयोधनेनाथ पुनर्वरिष्ठाः । प्रचोदिताः कर्णरथानुयाने ॥

sarve praṇeśuḥ kuravo vibhagnāḥ | pārtheṣubhiḥ samparitapyamānāḥ | suyodhanenātha punarvariṣṭhāḥ | pracoditāḥ karṇarathānuyāne

पार्थ के बाणों से अत्यन्त सन्तप्त और टूटे हुए सभी कौरव तितर-बितर हो गए। तब सुयोधन ने उनमें से श्रेष्ठ योद्धाओं को फिर कर्ण के रथ के पीछे चलने के लिए प्रेरित किया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 39 (8.96.39)

भोः क्षत्रियाः शूरतमास्तु सर्वे । क्षत्रे च धर्मे निरताः स्थ यूयम् । न युक्तरूपं भवतां समीपात् । पलायनं कर्णमतिप्रहाय ॥

bhoḥ kṣatriyāḥ śūratamāstu sarve | kṣatre ca dharme niratāḥ stha yūyam | na yuktarūpaṃ bhavatāṃ samīpāt | palāyanaṃ karṇamatiprahāya

'हे क्षत्रियो! तुम सब परम शूरवीर हो और क्षत्रिय-धर्म में लगे हुए हो। कर्ण को छोड़कर यहाँ से भाग जाना तुम्हें शोभा नहीं देता।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 40 (8.96.40)

तवात्मजेनापि तथोच्यमाना । नैवावतिष्ठन्त भयाद्विवर्णाः । क्षणेन नष्टाः प्रदिशो दिशश्च । सर्वे ततः प्रेक्ष्य दिशो विशून्याः ॥

tavātmajenāpi tathocyamānā | naivāvatiṣṭhanta bhayādvivarṇāḥ | kṣaṇena naṣṭāḥ pradiśo diśaśca | sarve tataḥ prekṣya diśo viśūnyāḥ

आपके पुत्र के इस प्रकार कहने पर भी वे नहीं रुके, भय से पीले पड़कर क्षण भर में सब दिशाओं में लुप्त हो गए; और तब सबने चारों ओर देखकर दिशाओं को सूनी पाया।

श्लोक 41 (8.96.41)

भयावदीर्णैः कुरुभिर्विहीनः । पार्थेषुभिः सम्परितप्यमानः । न विव्यथे भारत तत्र कर्णः । प्रतीपमेवार्जुनमभ्यधावत् ॥

bhayāvadīrṇaiḥ kurubhirvihīnaḥ | pārtheṣubhiḥ samparitapyamānaḥ | na vivyathe bhārata tatra karṇaḥ | pratīpamevārjunamabhyadhāvat

भय से टूटे हुए कौरवों के छोड़ जाने पर और पार्थ के बाणों से सन्तप्त होने पर भी कर्ण वहाँ विचलित नहीं हुआ, हे भारत; वह सीधे अर्जुन की ओर ही दौड़ा।

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