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महाप्रस्थानिक पर्व · अध्याय 2

मार्ग में द्रौपदी और चार भाइयों का पतन

पाण्डव हिमालय और बालू के समुद्र को पार करके मेरु पर्वत को देखते हैं। योग भ्रष्ट होने पर द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम एक-एक करके भूमि पर गिर पड़ते हैं। हर बार भीम कारण पूछते हैं और युधिष्ठिर दोष बताते हैं: द्रौपदी का अर्जुन के प्रति पक्षपात, सहदेव का अपनी बुद्धि का अभिमान, नकुल का अपने रूप का अभिमान, अर्जुन की डींग और अन्य धनुर्धरों की अवज्ञा, तथा भीम का अधिक भोजन और अपने बल की डींग। युधिष्ठिर बिना मुड़कर देखे आगे बढ़ते हैं और केवल कुत्ता उनके साथ चलता है।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (17.2.1)

ततस्ते नियतात्मान उदीचीं दिशमास्थिताः । ददृशुर्योगयुक्ताश्च हिमवन्तं महागिरिम् ॥

tataste niyatātmāna udīcīṃ diśamāsthitāḥ | dadṛśuryogayuktāśca himavantaṃ mahāgirim

तब संयत मन वाले और योग में लीन वे उत्तर दिशा की ओर बढ़े और उन्होंने महान पर्वत हिमालय को देखा।

श्लोक 2 (17.2.2)

तं चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम् । अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम् ॥

taṃ cāpyatikramantaste dadṛśurvālukārṇavam | avaikṣanta mahāśailaṃ meruṃ śikhariṇāṃ varam

उसे भी पार करते हुए उन्होंने बालू का समुद्र देखा और शिखरों वाले पर्वतों में श्रेष्ठ महान पर्वत मेरु को निहारा।

श्लोक 3 (17.2.3)

तेषां तु गच्छतां शीघ्रं सर्वेषां योगधर्मिणाम् । याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले ॥

teṣāṃ tu gacchatāṃ śīghraṃ sarveṣāṃ yogadharmiṇām | yājñasenī bhraṣṭayogā nipapāta mahītale

योग-धर्म का पालन करते हुए वे सब शीघ्रता से चल रहे थे कि यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी का योग भ्रष्ट हो गया और वह भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 4 (17.2.4)

तां तु प्रपतितां दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः । उवाच धर्मराजानं याज्ञसेनीमवेक्ष्य ह ॥

tāṃ tu prapatitāṃ dṛṣṭvā bhīmaseno mahābalaḥ | uvāca dharmarājānaṃ yājñasenīmavekṣya ha

उसे गिरी हुई देखकर महाबली भीमसेन ने यज्ञसेन की पुत्री की ओर देखकर धर्मराज से कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 5 (17.2.5)

नाधर्मश्चरितः कश्चिद्राजपुत्र्या परंतप । कारणं किंनु तद्ब्रूहि यत्कृष्णा पतिता भुवि ॥

nādharmaścaritaḥ kaścidrājaputryā paraṃtapa | kāraṇaṃ kiṃnu tadbrūhi yatkṛṣṇā patitā bhuvi

"हे परंतप! राजकुमारी ने कभी कोई अधर्म नहीं किया। फिर कृष्णा भूमि पर क्यों गिरी, उसका कारण बताइए।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (17.2.6)

पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये । तस्यैतत्फलमद्यैषा भुङ्क्ते पुरुषसत्तम ॥

pakṣapāto mahānasyā viśeṣeṇa dhanaṃjaye | tasyaitatphalamadyaiṣā bhuṅkte puruṣasattama

"इसका धनंजय के प्रति विशेष रूप से बड़ा पक्षपात था। हे पुरुषश्रेष्ठ! उसी का फल यह आज भोग रही है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (17.2.7)

एवमुक्त्वाऽनवेक्ष्यैनां ययौ भरतसत्तमः । समाधाय मनो धीमान्धर्मात्मा पुरुषर्षभः ॥

evamuktvā'navekṣyaināṃ yayau bharatasattamaḥ | samādhāya mano dhīmāndharmātmā puruṣarṣabhaḥ

यह कहकर भरतश्रेष्ठ, बुद्धिमान और धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर उसकी ओर बिना देखे, मन को स्थिर करके आगे चल दिए।

श्लोक 8 (17.2.8)

सहदेवस्ततो विद्वान्निपपात महीतले । तं चापि पतितं दृष्ट्वा भीमो राजानमब्रवीत् ॥

sahadevastato vidvānnipapāta mahītale | taṃ cāpi patitaṃ dṛṣṭvā bhīmo rājānamabravīt

तब विद्वान सहदेव भूमि पर गिर पड़े; उन्हें भी गिरा हुआ देखकर भीम ने राजा से कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 9 (17.2.9)

योऽयमस्मासु सर्वेषु शुश्रूषुरनहंकृतः । सोयं माद्रवतीपुत्रः कस्मान्निपतितो भुवि ॥

yo'yamasmāsu sarveṣu śuśrūṣuranahaṃkṛtaḥ | soyaṃ mādravatīputraḥ kasmānnipatito bhuvi

"जो माद्री का यह पुत्र हम सबकी सेवा करने वाला और अहंकार से रहित था, वह भूमि पर क्यों गिर गया?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (17.2.10)

आत्मनः सदृशं प्राज्ञं नैषोऽमन्यत कञ्चन । तेन दोषेण पतितो विद्वानेष नृपात्मजः ॥

ātmanaḥ sadṛśaṃ prājñaṃ naiṣo'manyata kañcana | tena doṣeṇa patito vidvāneṣa nṛpātmajaḥ

"वह अपने समान किसी को भी बुद्धिमान नहीं मानता था। इसी दोष से यह विद्वान राजकुमार गिरा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (17.2.11)

इत्युक्त्वा तं समुत्सृज्य सहदेवं ययौ तदा । भ्रातृभिः सह कौन्तेयः शुना चैव युधिष्ठिरः ॥

ityuktvā taṃ samutsṛjya sahadevaṃ yayau tadā | bhrātṛbhiḥ saha kaunteyaḥ śunā caiva yudhiṣṭhiraḥ

यह कहकर और सहदेव को वहीं छोड़कर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तब भाइयों और कुत्ते के साथ आगे बढ़े।

श्लोक 12 (17.2.12)

कृष्णां निपतितां दृष्ट्वा सहदेवं च पाण्डवम् । आर्तो बन्धुप्रियः शूरो नकुलो निपपात ह ॥

kṛṣṇāṃ nipatitāṃ dṛṣṭvā sahadevaṃ ca pāṇḍavam | ārto bandhupriyaḥ śūro nakulo nipapāta ha

कृष्णा और पाण्डव सहदेव को गिरा हुआ देखकर, बन्धुओं के प्रिय, वीर और शोकाकुल नकुल भी गिर पड़े।

श्लोक 13 (17.2.13)

तस्मिन्निपतिते वीरे नकुले चारुदर्शने । पुनरेव तदा भीमो राजानमिदमब्रवीत् ॥

tasminnipatite vīre nakule cārudarśane | punareva tadā bhīmo rājānamidamabravīt

सुन्दर रूप वाले वीर नकुल के गिर जाने पर भीम ने फिर राजा से यह कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 14 (17.2.14)

योऽयमक्षतधर्मात्मा भ्राता वचनकारकः । रूपेणाप्रतिमो लोके नकुलः पतितो भुवि ॥

yo'yamakṣatadharmātmā bhrātā vacanakārakaḥ | rūpeṇāpratimo loke nakulaḥ patito bhuvi

"जिसका धर्म कभी नहीं टूटा, जो हमारी आज्ञा मानने वाला भाई था और रूप में संसार में अनुपम था, वही नकुल भूमि पर गिर गया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (17.2.15)

इत्युक्तो भीमसेनेन प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्वबुद्धिमतांवरः ॥

ityukto bhīmasenena pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ | nakulaṃ prati dharmātmā sarvabuddhimatāṃvaraḥ

भीमसेन के ऐसा कहने पर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, धर्मात्मा युधिष्ठिर ने नकुल के विषय में उत्तर दिया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 16 (17.2.16)

रूपेण मत्समो नास्ति कश्चिदित्यस्य दर्शनम् । अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम् ॥

rūpeṇa matsamo nāsti kaścidityasya darśanam | adhikaścāhamevaika ityasya manasi sthitam

"उसकी यह धारणा थी कि रूप में मेरे समान कोई नहीं है, और उसके मन में यह बात बैठी थी कि मैं अकेला ही सबसे बढ़कर हूँ।"

श्लोक 17 (17.2.17)

नकुलः पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर । यस्य यद्विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते ॥

nakulaḥ patitastasmādāgaccha tvaṃ vṛkodara | yasya yadvihitaṃ vīra so'vaśyaṃ tadupāśnute

"इसीलिए नकुल गिरा है। हे वृकोदर! तुम चलो। हे वीर! जिसके लिए जो विहित है, उसे वह अवश्य भोगना पड़ता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (17.2.18)

तांस्तु प्रपतितान्दृष्ट्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः । पपात शोकसंतप्तस्ततोनु परवीरहा ॥

tāṃstu prapatitāndṛṣṭvā pāṇḍavaḥ śvetavāhanaḥ | papāta śokasaṃtaptastatonu paravīrahā

उन्हें गिरा हुआ देखकर श्वेत घोड़ों वाले, शत्रु-वीरों के संहारक पाण्डव अर्जुन भी शोक से सन्तप्त होकर उनके पीछे गिर पड़े।

श्लोक 19 (17.2.19)

तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे पतिते शक्रतेजसि । म्रियमाणे दुराधर्षे भीमो राजानमब्रवीत् ॥

tasmiṃstu puruṣavyāghre patite śakratejasi | mriyamāṇe durādharṣe bhīmo rājānamabravīt

इन्द्र के समान तेजस्वी और अजेय उस पुरुषसिंह के गिरकर प्राण त्यागने पर भीम ने राजा से कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 20 (17.2.20)

अनृतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मनः । अथ कस्य विकारोऽयं येनायं पतितो भुवि ॥

anṛtaṃ na smarāmyasya svaireṣvapi mahātmanaḥ | atha kasya vikāro'yaṃ yenāyaṃ patito bhuvi

"मुझे स्मरण नहीं कि इस महात्मा ने हँसी-ठिठोली में भी कभी झूठ बोला हो। फिर यह कौन-सा दोष है, जिससे यह भूमि पर गिरा?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (17.2.21)

एकोहं निर्दहेयं वै शत्रूनित्यर्जुनोऽब्रवीत् । न च तत्कृतवानेष शूरमानी ततोपतत् ॥

ekohaṃ nirdaheyaṃ vai śatrūnityarjuno'bravīt | na ca tatkṛtavāneṣa śūramānī tatopatat

"अर्जुन ने कहा था कि मैं अकेला ही शत्रुओं को भस्म कर दूँगा; पर अपने को शूर मानने वाले इसने वैसा किया नहीं। इसीलिए यह गिरा।"

श्लोक 22 (17.2.22)

अवमेने धनुर्ग्राहानेष सर्वांश्च फल्गुनः । तथा चैतन्न तु तथा कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥

avamene dhanurgrāhāneṣa sarvāṃśca phalgunaḥ | tathā caitanna tu tathā kartavyaṃ bhūtimicchatā

"इस फल्गुन ने सब धनुर्धारियों की अवज्ञा की थी; पर जो अपना कल्याण चाहता है, उसे ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (17.2.23)

इत्युक्त्वा प्रस्थितो राजा भीमोथ निपपात ह । पतितश्चाब्रवीद्भीमो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

ityuktvā prasthito rājā bhīmotha nipapāta ha | patitaścābravīdbhīmo dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

यह कहकर राजा आगे चल दिए, और तब भीम गिर पड़े। गिरकर भीम ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 24 (17.2.24)

भोभो राजन्नवेक्षस्व पतितोहं प्रियस्तव । किंनिमित्तं च पतनं ब्रूहि मे यदि वेत्थ ह ॥

bhobho rājannavekṣasva patitohaṃ priyastava | kiṃnimittaṃ ca patanaṃ brūhi me yadi vettha ha

"हे राजन्! मेरी ओर देखिए, मैं आपका प्रिय गिर पड़ा हूँ। यदि आप जानते हों तो बताइए कि मेरे गिरने का कारण क्या है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 25 (17.2.25)

अतिभुक्तं च भवता प्राणेन च विकत्थसे । अनवेक्ष्य परं पार्थ तेनासि पतितः क्षितौ ॥

atibhuktaṃ ca bhavatā prāṇena ca vikatthase | anavekṣya paraṃ pārtha tenāsi patitaḥ kṣitau

"तुमने बहुत अधिक भोजन किया और दूसरों का विचार किए बिना अपने बल की डींग हाँकी, हे पार्थ! इसी से तुम भूमि पर गिरे हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (17.2.26)

इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्जगामानवलोकयन् । श्वाप्येकोनुययौ यस्ते बहुशः कीर्तितो मया ॥

ityuktvā taṃ mahābāhurjagāmānavalokayan | śvāpyekonuyayau yaste bahuśaḥ kīrtito mayā

यह कहकर महाबाहु युधिष्ठिर पीछे देखे बिना आगे चल दिए; केवल वही कुत्ता उनके पीछे चला, जिसकी चर्चा मैंने तुमसे बार-बार की है।

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