मौसल पर्व · अध्याय 1
छत्तीसवें वर्ष के अपशकुन
युद्ध के बाद छत्तीसवें वर्ष में युधिष्ठिर पृथ्वी, आकाश और ग्रह-नक्षत्रों में भयंकर अपशकुन देखते हैं। कुछ समय बाद उन्हें समाचार मिलता है कि ब्राह्मण के शाप से वृष्णिवंशी मूसलों से आपस में लड़कर नष्ट हो गए और कृष्ण तथा बलराम जीवन से मुक्त हो चुके हैं। पाण्डवों को इस पर विश्वास नहीं होता और वे शोक से व्याकुल होकर बैठ जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.1.1)
षट्त्रिंशे त्वथ संप्राप्ते वर्षे कौरवनन्दनः । ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिरः ॥
ṣaṭtriṃśe tvatha saṃprāpte varṣe kauravanandanaḥ | dadarśa viparītāni nimittāni yudhiṣṭhiraḥ
छत्तीसवाँ वर्ष आने पर कुरुवंश को आनन्द देने वाले युधिष्ठिर ने प्रकृति के विपरीत अशुभ लक्षण देखे।
श्लोक 2 (16.1.2)
ववुर्वाताश्च निर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः । अपसव्यानि शकुना मण्डलानि प्रचक्रिरे ॥
vavurvātāśca nirghātā rūkṣāḥ śarkaravarṣiṇaḥ | apasavyāni śakunā maṇḍalāni pracakrire
कठोर हवाएँ चलीं, वज्रपात जैसी गड़गड़ाहट होने लगी और कंकड़ बरसने लगे; पक्षी अशुभ रीति से बाईं ओर घूमते हुए मण्डल बनाने लगे।
श्लोक 3 (16.1.3)
प्रत्यगूहुर्महानद्यो दिशो नीहारसंवृताः । उल्काश्चाङ्गारवर्षिण्यः प्रापतन्गगनाद्भुवि ॥
pratyagūhurmahānadyo diśo nīhārasaṃvṛtāḥ | ulkāścāṅgāravarṣiṇyaḥ prāpatangaganādbhuvi
बड़ी-बड़ी नदियाँ उलटी बहने लगीं, दिशाएँ कुहरे से ढक गईं और अंगारे बरसाती उल्काएँ आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगीं।
श्लोक 4 (16.1.4)
आदित्यो रजसा राजन्समवच्छन्नमण्डलः । विरश्मिरुदये नित्यं कबन्धैः समलङ्कृतः ॥
ādityo rajasā rājansamavacchannamaṇḍalaḥ | viraśmirudaye nityaṃ kabandhaiḥ samalaṅkṛtaḥ
हे राजन्, सूर्य का मण्डल धूल से ढका रहता था; वह प्रतिदिन बिना किरणों के उदय होता और सिरकटे धड़ों से घिरा दिखाई देता था।
श्लोक 5 (16.1.5)
परिवेषाश्च दृश्यन्ते दारुणाश्च चन्द्रसूर्ययोः । त्रिवर्णाः श्यामरुक्षान्तास्तथा भस्मारुणप्रभाः ॥
pariveṣāśca dṛśyante dāruṇāśca candrasūryayoḥ | trivarṇāḥ śyāmarukṣāntāstathā bhasmāruṇaprabhāḥ
चन्द्रमा और सूर्य के चारों ओर भयंकर परिधि-मण्डल दिखाई देते थे—तीन रंग के, किनारों पर काले और रूखे, तथा राख जैसी लाल आभा वाले।
श्लोक 6 (16.1.6)
एते चान्ये च बहव उत्पाता भयशंसिनः । दृश्यन्ते जगतो नाथ दिवमारोढुमिच्छति ॥
ete cānye ca bahava utpātā bhayaśaṃsinaḥ | dṛśyante jagato nātha divamāroḍhumicchati
भय की सूचना देने वाले ये और दूसरे बहुत-से उत्पात तब दिखाई दे रहे थे, जब जगत् के स्वामी स्वर्गलोक को आरोहण करना चाहते थे।
श्लोक 7 (16.1.7)
यस्य प्रसादाद्धर्मोऽयं कृते यद्वत्कलावपि । पाण्डवाश्च महाभाग युक्तास्तु यशसाऽनघ ॥
yasya prasādāddharmo'yaṃ kṛte yadvatkalāvapi | pāṇḍavāśca mahābhāga yuktāstu yaśasā'nagha
जिनकी कृपा से यह धर्म कलियुग में भी वैसा ही स्थिर है जैसा कृतयुग में था; और हे महाभाग, हे निष्पाप, पाण्डव भी यश से युक्त हैं।
श्लोक 8 (16.1.8)
कस्य चित्त्वथ कालस्य कुरुराजो विशङ्कितः । शुश्राव वृष्णिचक्रस्य मुसलोत्सादनं कृतम् ॥
kasya cittvatha kālasya kururājo viśaṅkitaḥ | śuśrāva vṛṣṇicakrasya musalotsādanaṃ kṛtam
कुछ समय बाद शंका से भरे कुरुराज ने सुना कि वृष्णिकुल का मूसल से संहार हो गया है।
श्लोक 9 (16.1.9)
विमुक्तं वासुदेवं च श्रुत्वा रामं च पाण्डवः । समानीयाब्रवीद्भ्रातॄन्किं करिष्याम इत्युत ॥
vimuktaṃ vāsudevaṃ ca śrutvā rāmaṃ ca pāṇḍavaḥ | samānīyābravīdbhrātṝnkiṃ kariṣyāma ityuta
वासुदेव और बलराम के जीवन से मुक्त हो जाने का समाचार सुनकर पाण्डव (युधिष्ठिर) ने भाइयों को बुलाकर कहा, 'अब हम क्या करें?'
श्लोक 10 (16.1.10)
परस्परं समासाद्य ब्रह्मदण्डबलात्कृतान् । वृष्णीन्विनष्टांस्ते श्रुत्वा व्यथिताः पाण्डवा भृशम् ॥
parasparaṃ samāsādya brahmadaṇḍabalātkṛtān | vṛṣṇīnvinaṣṭāṃste śrutvā vyathitāḥ pāṇḍavā bhṛśam
ब्राह्मण के शाप के बल से वृष्णिवंशी आपस में भिड़कर नष्ट हो गए—यह सुनकर पाण्डव अत्यन्त व्यथित हुए।
श्लोक 11 (16.1.11)
निधनं वासुदेवस्य समुद्रस्येव शोषणम् । वीरा न श्रद्दधुस्तस्य विनाशं शार्ङ्गधन्वनः ॥
nidhanaṃ vāsudevasya samudrasyeva śoṣaṇam | vīrā na śraddadhustasya vināśaṃ śārṅgadhanvanaḥ
वासुदेव का निधन समुद्र के सूख जाने जैसा था; वीर पाण्डवों को शार्ङ्गधनुषधारी के विनाश पर विश्वास ही नहीं हुआ।
श्लोक 12 (16.1.12)
मौसलं ते समाश्रित्य दुःखशोकसमन्विताः । विषण्णा हतसंकल्पाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥
mausalaṃ te samāśritya duḥkhaśokasamanvitāḥ | viṣaṇṇā hatasaṃkalpāḥ pāṇḍavāḥ samupāviśan
मूसलों से हुए उस संहार का चिन्तन करते हुए, दुःख और शोक से भरे पाण्डव खिन्न और भग्न-संकल्प होकर बैठ गए।