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मौसल पर्व · अध्याय 2

साम्ब पर मुनियों का शाप और लोहे का मूसल

जनमेजय पूछते हैं कि वृष्णि और अन्धक कैसे नष्ट हुए, और वैशम्पायन कथा आरम्भ करते हैं। सारण आदि यदुकुमार स्त्री के वेश में सजे साम्ब को विश्वामित्र, कण्व और नारद के पास ले जाकर उनका उपहास करते हैं; मुनि शाप देते हैं कि साम्ब लोहे का ऐसा मूसल जन्म देगा जो बलराम और कृष्ण को छोड़कर सारे कुल का नाश करेगा। साम्ब मूसल उत्पन्न करता है; राजा उसे पिसवाकर समुद्र में डलवा देता है और नगर में मद्य-निषेध की कठोर घोषणा कराता है।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (16.2.1)

कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभिः सह । पश्यतो वासुदेवस्य भोजाश्चैव महारथाः ॥

kathaṃ vinaṣṭā bhagavannandhakā vṛṣṇibhiḥ saha | paśyato vāsudevasya bhojāścaiva mahārathāḥ

हे भगवन्, अन्धक वृष्णियों के साथ, और भोज महारथी भी, वासुदेव के देखते-देखते कैसे नष्ट हो गए?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (16.2.2)

षट्त्रिंशेऽथ ततो वर्षे वृष्णीनामनयो महान् । अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नुः कालचोदिताः ॥

ṣaṭtriṃśe'tha tato varṣe vṛṣṇīnāmanayo mahān | anyonyaṃ musalaiste tu nijaghnuḥ kālacoditāḥ

उसके बाद छत्तीसवें वर्ष में वृष्णियों पर बड़ा अनर्थ आ पड़ा; काल से प्रेरित होकर उन्होंने आपस में मूसलों से एक-दूसरे को मार डाला।

जनमेजय उवाच

श्लोक 3 (16.2.3)

केनानुशप्तास्ते वीराः क्षयं वृष्ण्यन्धका गताः । भोजाश्च द्विजवर्य त्वं विस्तरेण वदस्व मे ॥

kenānuśaptāste vīrāḥ kṣayaṃ vṛṣṇyandhakā gatāḥ | bhojāśca dvijavarya tvaṃ vistareṇa vadasva me

वे वीर वृष्णि और अन्धक, और भोज भी, किसके शाप से विनाश को प्राप्त हुए? हे द्विजश्रेष्ठ, आप मुझे यह विस्तार से बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (16.2.4)

विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं च तपोधनम् । सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्वारकां गतान् ॥

viśvāmitraṃ ca kaṇvaṃ ca nāradaṃ ca tapodhanam | sāraṇapramukhā vīrā dadṛśurdvārakāṃ gatān

सारण आदि वीरों ने विश्वामित्र, कण्व और तपोधन नारद को द्वारका आया हुआ देखा।

श्लोक 5 (16.2.5)

ते वै सांबं पुरस्कृत्य भूषयित्वा स्त्रियं यथा । अब्रुवन्नुपसङ्गम्य दैवदण्डनिपीडिताः ॥

te vai sāṃbaṃ puraskṛtya bhūṣayitvā striyaṃ yathā | abruvannupasaṅgamya daivadaṇḍanipīḍitāḥ

दैव के दण्ड से पीड़ित होकर उन्होंने साम्ब को स्त्री की तरह सजाकर आगे किया और ऋषियों के पास जाकर कहा—

सारणप्रमुखा ऊचुः

श्लोक 6 (16.2.6)

इयं स्त्री पुत्रकामस्य बभ्रोरमिततेजसः । ऋषयः साधु जानीत किमियं जनयिष्यति ॥

iyaṃ strī putrakāmasya babhroramitatejasaḥ | ṛṣayaḥ sādhu jānīta kimiyaṃ janayiṣyati

यह स्त्री अपार तेजस्वी बभ्रु की पत्नी है, जो पुत्र की कामना करता है। हे ऋषियो, ठीक-ठीक बताइए, यह क्या जन्म देगी?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (16.2.7)

इत्युक्तास्ते तदा राजन्विप्रलम्भप्रधर्षिताः । प्रत्यब्रुवंस्तान्मुनयो यत्तच्छृणु नराधिप ॥

ityuktāste tadā rājanvipralambhapradharṣitāḥ | pratyabruvaṃstānmunayo yattacchṛṇu narādhipa

हे राजन्, इस प्रकार कहे जाने पर, छल से अपमानित हुए उन मुनियों ने उन्हें जो उत्तर दिया, हे नराधिप, उसे सुनिए।

मुनय ऊचुः

श्लोक 8 (16.2.8)

वृष्ण्यन्धकविनाशाय मुसलं घोरमायसम् । वासुदेवस्य दायादः सांबोऽयं जनयिष्यति ॥

vṛṣṇyandhakavināśāya musalaṃ ghoramāyasam | vāsudevasya dāyādaḥ sāṃbo'yaṃ janayiṣyati

वासुदेव का यह पुत्र साम्ब वृष्णियों और अन्धकों के विनाश के लिए एक भयंकर लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा।

श्लोक 9 (16.2.9)

येन यूयं सुदुर्वृत्ता नृशंसा जातमन्यवः । उच्छेत्तारः कुलं कृत्स्नमृते रामजनार्दनौ ॥

yena yūyaṃ sudurvṛttā nṛśaṃsā jātamanyavaḥ | ucchettāraḥ kulaṃ kṛtsnamṛte rāmajanārdanau

उसी से तुम दुराचारी, क्रूर और क्रोध से भरे लोग बलराम और जनार्दन को छोड़कर अपने सारे कुल का नाश कर डालोगे।

श्लोक 10 (16.2.10)

समुद्रं यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देहं हलायुधः । जरःकृष्णं महात्मानं शयानं भुवि भेत्स्यति ॥

samudraṃ yāsyati śrīmāṃstyaktvā dehaṃ halāyudhaḥ | jaraḥkṛṣṇaṃ mahātmānaṃ śayānaṃ bhuvi bhetsyati

तेजस्वी हलायुध (बलराम) शरीर त्यागकर समुद्र में चले जाएँगे, और जरा (नामक व्याध) पृथ्वी पर लेटे हुए महात्मा कृष्ण को बाण से बेध देगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (16.2.11)

इत्यब्रुवंस्ततो राजन्प्रलब्धास्तैर्दुरात्मभिः । मुनयः क्रोधरक्ताक्षाः समीक्ष्याथ परस्परम् । तथोक्त्वा मुनयस्ते तु यथागतमथो ययुः ॥

ityabruvaṃstato rājanpralabdhāstairdurātmabhiḥ | munayaḥ krodharaktākṣāḥ samīkṣyātha parasparam | tathoktvā munayaste tu yathāgatamatho yayuḥ

हे राजन्, उन दुष्टों द्वारा ठगे गए मुनियों ने यही कहा; क्रोध से लाल आँखों वाले उन मुनियों ने एक-दूसरे की ओर देखा और यह कहकर जैसे आए थे वैसे ही चले गए।

श्लोक 12 (16.2.12)

अथाब्रवीत्तदा वृष्णीञ्श्रुत्वैतन्मधुसूदनः । अन्तज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तान् ॥

athābravīttadā vṛṣṇīñśrutvaitanmadhusūdanaḥ | antajño matimāṃstasya bhavitavyaṃ tatheti tān

यह सुनकर अन्त को जानने वाले बुद्धिमान मधुसूदन ने वृष्णियों से कहा, 'ऐसा ही होना है।'

श्लोक 13 (16.2.13)

एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रविवेश पुरं तदा । कृतान्तमन्यथा नैच्छत्कर्तुं स जगतः प्रभुः ॥

evamuktvā hṛṣīkeśaḥ praviveśa puraṃ tadā | kṛtāntamanyathā naicchatkartuṃ sa jagataḥ prabhuḥ

ऐसा कहकर हृषीकेश उस समय नगर में चले गए। जगत् के प्रभु होकर भी उन्होंने नियति को अन्यथा करना नहीं चाहा।

श्लोक 14 (16.2.14)

श्वोभूतेऽथ ततः सांबो मुसलं तदसूत वै । येन वृष्ण्यन्धककुले पुरुषा भस्मसात्कृताः ॥

śvobhūte'tha tataḥ sāṃbo musalaṃ tadasūta vai | yena vṛṣṇyandhakakule puruṣā bhasmasātkṛtāḥ

अगले दिन साम्ब ने वह मूसल उत्पन्न किया, जिससे वृष्णि और अन्धक कुल के पुरुष भस्म हो गए।

श्लोक 15 (16.2.15)

वृष्ण्यन्धकविनाशाय किंकरप्रतिमं महत् । असूत शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदयन् ॥

vṛṣṇyandhakavināśāya kiṃkarapratimaṃ mahat | asūta śāpajaṃ ghoraṃ tacca rājñe nyavedayan

वृष्णियों और अन्धकों के विनाश के लिए शाप से उत्पन्न वह बड़ा और भयंकर मूसल, मानो यम के किंकर जैसा था; उन्होंने यह बात राजा को बताई।

श्लोक 16 (16.2.16)

विषण्णरूपस्तद्राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारयत् । तच्चूर्णं सागरे चापि प्राक्षिपन्पुरुषा नृप ॥

viṣaṇṇarūpastadrājā sūkṣmaṃ cūrṇamakārayat | taccūrṇaṃ sāgare cāpi prākṣipanpuruṣā nṛpa

राजा ने खिन्न होकर उसका बहुत महीन चूर्ण करवा दिया, और हे नरेश, पुरुषों ने वह चूर्ण समुद्र में फेंक दिया।

श्लोक 17 (16.2.17)

अघोषयंश्च नगरे वचनादाहुकस्य ते । जनार्दनस्य रामस्य बभ्रोश्चैव महात्मनः ॥

aghoṣayaṃśca nagare vacanādāhukasya te | janārdanasya rāmasya babhroścaiva mahātmanaḥ

आहुक के आदेश से, तथा जनार्दन, बलराम और महात्मा बभ्रु की ओर से, उन्होंने नगर में यह घोषणा की—

राजपुरुषा ऊचुः

श्लोक 18 (16.2.18)

अद्यप्रभृति सर्वेषु वृष्ण्यन्धककुलेष्विह । सुरासवो न कर्तव्यः सर्वैर्नगरवासिभिः ॥

adyaprabhṛti sarveṣu vṛṣṇyandhakakuleṣviha | surāsavo na kartavyaḥ sarvairnagaravāsibhiḥ

'आज से वृष्णि और अन्धकों के सब घरों में नगर का कोई भी निवासी सुरा और आसव न बनाए।

श्लोक 19 (16.2.19)

यश्च नोऽविदितं कुर्यात्पेयं कश्चिन्नरः क्वचित् । जीवन्स शूलमारोहेत्स्वयं कृत्वा सबान्धवः ॥

yaśca no'viditaṃ kuryātpeyaṃ kaścinnaraḥ kvacit | jīvansa śūlamārohetsvayaṃ kṛtvā sabāndhavaḥ

और जो कोई कहीं भी हमारी जानकारी के बिना मद्य बनाएगा, वह स्वयं अपने किए से अपने बन्धुओं सहित जीते-जी शूली पर चढ़ाया जाएगा।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (16.2.20)

ततो राजभयात्सर्वे नियमं चक्रिरे तदा । नराः शासनमाज्ञाय तस्य राज्ञो महात्मनः ॥

tato rājabhayātsarve niyamaṃ cakrire tadā | narāḥ śāsanamājñāya tasya rājño mahātmanaḥ

तब राजा के भय से सब लोगों ने उस महात्मा राजा की आज्ञा को समझकर वह नियम अपना लिया।

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