मौसल पर्व · अध्याय 3
द्वारका में अपशकुन; कृष्ण की तीर्थयात्रा की आज्ञा
वृष्णि और अन्धक मद्य-निषेध का पालन करने का यत्न करते हैं, पर काल स्वयं विकराल मुण्डित पुरुष के रूप में उनके घरों में घूमता है, जिसे कोई बाण बेध नहीं पाता; और अनेक अपशकुन प्रकट होते हैं—प्रचण्ड आँधियाँ, चूहों की भरमार, अस्वाभाविक जन्म, निर्लज्ज पापाचार, बाईं ओर घूमती अग्नि, भोजन में कीड़े। कृष्ण देखते हैं कि अमावस्या त्रयोदशी को पड़ी है, जैसे भारत-युद्ध के समय पड़ी थी, और समझ लेते हैं कि छत्तीसवाँ वर्ष आ गया है। गान्धारी के शाप और युधिष्ठिर की चेतावनी को याद कर, उसे सत्य करने की इच्छा से वे समुद्र-तट की तीर्थयात्रा की घोषणा करवाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.3.1)
एवं प्रयतमानानां वृष्णीनामन्धकैः सह । कालो गृहाणि सर्वेषां परिचक्राम नित्यशः ॥
evaṃ prayatamānānāṃ vṛṣṇīnāmandhakaiḥ saha | kālo gṛhāṇi sarveṣāṃ paricakrāma nityaśaḥ
इस प्रकार वृष्णि और अन्धक जब बचाव का प्रयत्न कर रहे थे, तब काल प्रतिदिन उन सबके घरों में घूमता रहा।
श्लोक 2 (16.3.2)
करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः । गृहाण्यावेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत पुनः क्वचित् ॥
karālo vikaṭo muṇḍaḥ puruṣaḥ kṛṣṇapiṅgalaḥ | gṛhāṇyāvekṣya vṛṣṇīnāṃ nādṛśyata punaḥ kvacit
एक भयंकर, विकराल, मुण्डित सिर वाला, काला और पीला-सा पुरुष वृष्णियों के घरों में झाँककर फिर कहीं दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 3 (16.3.3)
तमघ्नन्त महेष्वासाः शरैः शतसहस्रशः । न चाशक्यत वेद्धुं स सर्वभूतात्ययस्तदा ॥
tamaghnanta maheṣvāsāḥ śaraiḥ śatasahasraśaḥ | na cāśakyata veddhuṃ sa sarvabhūtātyayastadā
बड़े-बड़े धनुर्धर उस पर लाखों बाण चलाते थे, पर वह बींधा नहीं जा सकता था; वही उस समय सब प्राणियों का संहार करने वाला था।
श्लोक 4 (16.3.4)
उत्पेदिरे महावाता दारुणाश्च दिनेदिने । वृष्ण्यन्धकविनाशाय बहवो रोमहर्षणाः ॥
utpedire mahāvātā dāruṇāśca dinedine | vṛṣṇyandhakavināśāya bahavo romaharṣaṇāḥ
वृष्णियों और अन्धकों के विनाश के लिए प्रतिदिन बहुत-सी भयंकर और रोमांचकारी प्रचण्ड आँधियाँ उठने लगीं।
श्लोक 5 (16.3.5)
विवृद्धमूषिका रथ्या विभिन्नमणिकास्तथा । केशा नखाश्च सुप्तानामद्यन्ते मूषिकैर्निशि ॥
vivṛddhamūṣikā rathyā vibhinnamaṇikāstathā | keśā nakhāśca suptānāmadyante mūṣikairniśi
गलियों में चूहे बहुत बढ़ गए, मिट्टी के बर्तन टूटे मिलने लगे, और रात को सोए हुए लोगों के बाल और नाखून चूहे कुतर जाते थे।
श्लोक 6 (16.3.6)
चीचीकूचीति वाशन्ति शारिका वृष्णिवेश्मसु । नोपशाम्यति शब्दश्च स दिवारात्रमेव हि ॥
cīcīkūcīti vāśanti śārikā vṛṣṇiveśmasu | nopaśāmyati śabdaśca sa divārātrameva hi
वृष्णियों के घरों में मैनाएँ 'चीं-चीं, कूचीं' करती चहकती थीं, और वह शोर दिन-रात थमता नहीं था।
श्लोक 7 (16.3.7)
अन्वकुर्वन्नुलूकानां सारसा विरुतं तथा । अजाः शिवानां विरुतमन्वकुर्वत भारत ॥
anvakurvannulūkānāṃ sārasā virutaṃ tathā | ajāḥ śivānāṃ virutamanvakurvata bhārata
हे भारत, सारस उल्लुओं की बोली की नकल करने लगे और बकरियाँ सियारिनों की बोली की नकल करने लगीं।
श्लोक 8 (16.3.8)
पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः । वृष्ण्यन्धकानां गेहेषु कपोता व्यचरंस्तदा ॥
pāṇḍurā raktapādāśca vihagāḥ kālacoditāḥ | vṛṣṇyandhakānāṃ geheṣu kapotā vyacaraṃstadā
काल से प्रेरित, पीले-से और लाल पैरों वाले पक्षी उस समय कबूतर बनकर वृष्णियों और अन्धकों के घरों में घूमते थे।
श्लोक 9 (16.3.9)
व्यजायन्त खरा गोषु करभाश्वतरीषु च । शुनीष्वपि बिडालाश्च मूषिका नकुलीषु च ॥
vyajāyanta kharā goṣu karabhāśvatarīṣu ca | śunīṣvapi biḍālāśca mūṣikā nakulīṣu ca
गायों से गधे पैदा होने लगे, तथा ऊँटनियों और खच्चरियों से भी; कुतियों से बिल्लियाँ और नेवलियों से चूहे उत्पन्न हुए।
श्लोक 10 (16.3.10)
नापत्रपन्त पापानि कुर्वन्तो वृष्णयस्तदा । प्रार्दयन्ब्राह्मणांश्चापि पितॄन्देवांस्तथैव च ॥
nāpatrapanta pāpāni kurvanto vṛṣṇayastadā | prārdayanbrāhmaṇāṃścāpi pitṝndevāṃstathaiva ca
तब वृष्णि पाप करते हुए भी लज्जित नहीं होते थे; वे ब्राह्मणों, पितरों और देवताओं को भी सताते थे।
श्लोक 11 (16.3.11)
गुरूंश्चाप्यवमन्यन्ते न तु रामजनार्दनौ । पत्न्यः पतीनुच्चरन्ति पत्नीश्च पतयस्तथा ॥
gurūṃścāpyavamanyante na tu rāmajanārdanau | patnyaḥ patīnuccaranti patnīśca patayastathā
वे बलराम और जनार्दन को छोड़कर अपने गुरुजनों का भी अपमान करते थे; पत्नियाँ पतियों को और पति पत्नियों को धोखा देते थे।
श्लोक 12 (16.3.12)
विभावसुः प्रज्वलितो वामं विपरिवर्तते । नीललोहितमञ्जिष्ठा विसृजन्नर्चिषः पृथक् ॥
vibhāvasuḥ prajvalito vāmaṃ viparivartate | nīlalohitamañjiṣṭhā visṛjannarciṣaḥ pṛthak
प्रज्वलित अग्नि बाईं ओर घूमकर जलती थी और नीली, लाल तथा मंजिष्ठा रंग की लपटें अलग-अलग छोड़ती थी।
श्लोक 13 (16.3.13)
उदयास्तमये नित्यं पुर्यां तस्यां दिवाकरः । व्यदृश्यतासकृत्पुंभिः कबन्धैः परिवारितः ॥
udayāstamaye nityaṃ puryāṃ tasyāṃ divākaraḥ | vyadṛśyatāsakṛtpuṃbhiḥ kabandhaiḥ parivāritaḥ
उस नगरी में सूर्य उदय और अस्त के समय बार-बार सिरकटे पुरुषों के धड़ों से घिरा दिखाई देता था।
श्लोक 14 (16.3.14)
महानसेषु सिद्धेषु संस्कृतेऽतीव भारत । आहार्यमाणे कृमयो व्यदृश्यन्त सहस्रशः ॥
mahānaseṣu siddheṣu saṃskṛte'tīva bhārata | āhāryamāṇe kṛmayo vyadṛśyanta sahasraśaḥ
हे भारत, रसोईघरों में भली-भाँति तैयार किया हुआ भोजन परोसा जाता तो उसमें हज़ारों कीड़े दिखाई देते थे।
श्लोक 15 (16.3.15)
पुण्याहे वाच्यमाने तु जपत्सु च महात्मसु । अभिधावन्तः श्रूयन्ते न चादृश्यत कश्चन ॥
puṇyāhe vācyamāne tu japatsu ca mahātmasu | abhidhāvantaḥ śrūyante na cādṛśyata kaścana
पुण्याह-वाचन होते समय और महात्माओं के जप करते समय चारों ओर दौड़ने की आवाज़ें सुनाई देती थीं, पर कोई दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 16 (16.3.16)
परस्परं च नक्षत्रं हन्यमानं पुनःपुनः । ग्रहैरपश्यन्सर्वे ते नात्मनस्तु कथञ्चन ॥
parasparaṃ ca nakṣatraṃ hanyamānaṃ punaḥpunaḥ | grahairapaśyansarve te nātmanastu kathañcana
सब लोग बार-बार एक-दूसरे के नक्षत्र को ग्रहों से पीड़ित होते देखते थे, पर अपना नक्षत्र किसी तरह नहीं दिखाई देता था।
श्लोक 17 (16.3.17)
नदन्तं पाञ्चजन्यं च वृष्ण्यन्धकनिवेशने । समन्तात्पर्यवाशन्त रासभा दारुणस्वराः ॥
nadantaṃ pāñcajanyaṃ ca vṛṣṇyandhakaniveśane | samantātparyavāśanta rāsabhā dāruṇasvarāḥ
वृष्णियों और अन्धकों के आवासों में पाञ्चजन्य के गर्जन करने पर चारों ओर भयंकर स्वर वाले गधे उत्तर में रेंकते थे।
श्लोक 18 (16.3.18)
एवं पश्यन्हृषिकेशः संप्राप्तं कालपर्ययम् । त्रयोदश्याममावास्यां तान्दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम् ॥
evaṃ paśyanhṛṣikeśaḥ saṃprāptaṃ kālaparyayam | trayodaśyāmamāvāsyāṃ tāndṛṣṭvā prābravīdidam
काल का फेरा आया देखकर हृषीकेश ने, त्रयोदशी के दिन पड़ी अमावस्या को और उन लक्षणों को देखकर, यह कहा—
वासुदेव उवाच
श्लोक 19 (16.3.19)
चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेयं राहुणा पुनः । प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय नः ॥
caturdaśī pañcadaśī kṛteyaṃ rāhuṇā punaḥ | prāpte vai bhārate yuddhe prāptā cādya kṣayāya naḥ
'राहु ने चतुर्दशी और पञ्चदशी को फिर एक कर दिया है। भारत-युद्ध के समय ऐसा ही दिन आया था, और आज वह हमारे विनाश के लिए आया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (16.3.20)
विमृशन्नेव कालं तं परिचिन्त्य जनार्दनः । मेने प्राप्तं स षट्त्रिंशं वर्षं वै केशिसूदनः ॥
vimṛśanneva kālaṃ taṃ paricintya janārdanaḥ | mene prāptaṃ sa ṣaṭtriṃśaṃ varṣaṃ vai keśisūdanaḥ
उस काल पर विचार करते और सोचते हुए केशिसूदन जनार्दन ने जाना कि छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा है।
वासुदेव उवाच
श्लोक 21 (16.3.21)
पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी हतबान्धवा । यदनुव्याजहारार्ता तदिदं समुपागमत् ॥
putraśokābhisaṃtaptā gāndhārī hatabāndhavā | yadanuvyājahārārtā tadidaṃ samupāgamat
पुत्रशोक से जली हुई और बन्धुओं को खो चुकी गान्धारी ने पीड़ा में जो कहा था, वही अब आ पहुँचा है।
श्लोक 22 (16.3.22)
इदं च तदनुप्राप्तमब्रवीद्यद्युधिष्ठिरः । पुरा व्यूढेष्वनीकेषु दृष्ट्वोत्पातान्सुदारुणान् ॥
idaṃ ca tadanuprāptamabravīdyadyudhiṣṭhiraḥ | purā vyūḍheṣvanīkeṣu dṛṣṭvotpātānsudāruṇān
और पहले, सेनाओं के व्यूह बँध जाने पर भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर ने जो कहा था, वह भी अब आ पहुँचा है।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (16.3.23)
इत्युक्त्वा वासुदेवस्तु चिकीर्षुः सत्यमेव तत् । आज्ञापयामास तदा तीर्थयात्रामरिंदमः ॥
ityuktvā vāsudevastu cikīrṣuḥ satyameva tat | ājñāpayāmāsa tadā tīrthayātrāmariṃdamaḥ
ऐसा कहकर शत्रुओं का दमन करने वाले वासुदेव ने उस वचन को सत्य करने की इच्छा से तब तीर्थयात्रा की आज्ञा दी।
श्लोक 24 (16.3.24)
अघोषयन्त पुरुषास्तत्र केशवशासनात् । तीर्थयात्रा समुद्रे वः कार्येति पुरुषर्षभाः ॥
aghoṣayanta puruṣāstatra keśavaśāsanāt | tīrthayātrā samudre vaḥ kāryeti puruṣarṣabhāḥ
वहाँ केशव की आज्ञा से पुरुषों ने घोषणा की, 'हे पुरुषश्रेष्ठो, तुम्हें समुद्र-तट पर तीर्थयात्रा करनी है।'