मौसल पर्व · अध्याय 4
प्रभास में कलह और यादवों का संहार
द्वारका में भयानक स्वप्न और अपशकुन फैल जाते हैं: एक काली स्त्री सोते हुए लोगों को लूटती है, कृष्ण का चक्र और रथ आकाश में उड़ जाते हैं, और देवता तीर्थयात्रा का आग्रह करते हैं। यादव प्रभास पहुँचकर मद्यपान करते हैं; मदोन्मत्त सात्यकि कृतवर्मा को रात के संहार का उलाहना देता है, कृतवर्मा भूरिश्रवा के वध की बात उठाता है, और सात्यकि उसका सिर काट देता है। भोज और अन्धक सात्यकि पर टूट पड़ते हैं; पुत्र प्रद्युम्न और सात्यकि को मरा देख कृष्ण मुट्ठी भर एरका घास उठाते हैं, जो लोहे के मूसल बन जाती है, और पूरा कुल आपस में कट मरता है। बभ्रु और दारुक कृष्ण से बलराम को खोजने का आग्रह करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.4.1)
काली स्त्री पाण्डुरैर्दन्तैः प्रविश्य हसती निशि । स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्ती द्वारकां परिधावति ॥
kālī strī pāṇḍurairdantaiḥ praviśya hasatī niśi | striyaḥ svapneṣu muṣṇantī dvārakāṃ paridhāvati
सफ़ेद दाँतों वाली एक काली स्त्री रात में हँसती हुई घुसती और स्वप्न में स्त्रियों को लूटती हुई द्वारका में दौड़ती फिरती थी।
श्लोक 2 (16.4.2)
अग्निहोत्रनिकेतेषु वास्तुमध्येषु वेश्मसु । वृष्ण्यन्धकानखादन्त स्वप्ने गृध्रा भयानकाः ॥
agnihotraniketeṣu vāstumadhyeṣu veśmasu | vṛṣṇyandhakānakhādanta svapne gṛdhrā bhayānakāḥ
अग्निहोत्र के घरों में, भवन-भूमियों के बीच और निवासों में भयानक गिद्ध स्वप्न में वृष्णियों और अन्धकों को खाते दिखाई देते थे।
श्लोक 3 (16.4.3)
अलङ्काराश्च च्छत्रं च ध्वजाश्च कवचानि च । ह्रियमाणान्यदृश्यन्त रक्षोभिः सुभयानकैः ॥
alaṅkārāśca cchatraṃ ca dhvajāśca kavacāni ca | hriyamāṇānyadṛśyanta rakṣobhiḥ subhayānakaiḥ
आभूषण, छत्र, ध्वज और कवच भयंकर राक्षसों द्वारा उठाकर ले जाए जाते दिखाई देते थे।
श्लोक 4 (16.4.4)
तच्चाग्निदत्तं कृष्णस्य वज्रनाभमयोमयम् । दिवमाचक्रमे चक्रं वृष्णीनां पश्यतां तदा ॥
taccāgnidattaṃ kṛṣṇasya vajranābhamayomayam | divamācakrame cakraṃ vṛṣṇīnāṃ paśyatāṃ tadā
और अग्नि का दिया हुआ कृष्ण का वज्र-नाभि वाला लौहचक्र वृष्णियों के देखते-देखते आकाश में चढ़ गया।
श्लोक 5 (16.4.5)
युक्तं रथं दिव्यमादित्यवर्णं । हयाऽहरन्पश्यतो दारुकस्य । ते सागरस्योपरिष्टादगच्छ- । न्मनोजवाश्चतुरो वाजिमुख्याः ॥
yuktaṃ rathaṃ divyamādityavarṇaṃ | hayā'haranpaśyato dārukasya | te sāgarasyopariṣṭādagaccha- | nmanojavāścaturo vājimukhyāḥ
दारुक के देखते-देखते घोड़े सूर्य के समान दीप्त उस जुते हुए दिव्य रथ को उड़ा ले गए; मन के समान वेग वाले वे चारों श्रेष्ठ घोड़े समुद्र के ऊपर से चले गए।
श्लोक 6 (16.4.6)
तालः सुपर्णश्च महाध्वजौ तौ । सुपूजितौ रामजनार्दनाभ्याम् । उच्चैर्जह्रुरप्सरसश्च दिव्या । देवा ऊचुर्गम्यतां तीर्थयात्राः ॥
tālaḥ suparṇaśca mahādhvajau tau | supūjitau rāmajanārdanābhyām | uccairjahrurapsarasaśca divyā | devā ūcurgamyatāṃ tīrthayātrāḥ
ताल और गरुड़—वे दोनों महाध्वज, जिनकी बलराम और जनार्दन ने भली-भाँति पूजा की थी—दिव्य अप्सराओं द्वारा ऊँचे उठा ले जाए गए; और देवताओं ने कहा, "तीर्थयात्रा की जाए।"
श्लोक 7 (16.4.7)
भगवद्दर्शनस्पर्शस्नेहैर्विततभोगिनः । दिवः प्रवेशनार्थं ते विमानैर्दिवमाययुः ॥
bhagavaddarśanasparśasnehairvitatabhoginaḥ | divaḥ praveśanārthaṃ te vimānairdivamāyayuḥ
भगवान् के दर्शन और स्पर्श से उत्पन्न स्नेह के कारण फैले हुए फनों वाले वे (नाग) स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए विमानों में बैठकर आकाश को आ गए।
श्लोक 8 (16.4.8)
ततो जिगमिषन्तस्ते वृष्ण्यन्धकमहारथाः । सान्तःपुरास्तदा तीर्थयात्रामैच्छन्नरर्षभाः ॥
tato jigamiṣantaste vṛṣṇyandhakamahārathāḥ | sāntaḥpurāstadā tīrthayātrāmaicchannararṣabhāḥ
तब वृष्णि और अन्धकों के वे महारथी पुरुषश्रेष्ठ चल पड़ने की इच्छा से अन्तःपुर की स्त्रियों सहित तीर्थयात्रा करना चाहने लगे।
श्लोक 9 (16.4.9)
ततो मनोहरा हृष्टाः पेयं मांसं मधूनि च । बहु नानाविधं चक्रुस्त्वरिताः कालचोदिताः ॥
tato manoharā hṛṣṭāḥ peyaṃ māṃsaṃ madhūni ca | bahu nānāvidhaṃ cakrustvaritāḥ kālacoditāḥ
तब प्रसन्न और मनोहर वेश वाले, उतावले और काल से प्रेरित होकर, उन्होंने पेय, मांस और मधु-मद्य बहुत मात्रा में और अनेक प्रकार के तैयार किए।
श्लोक 10 (16.4.10)
ततः सीधुषु सक्ताश्च निर्ययुर्नगराद्बहिः । यानैरश्वैर्गजैश्चैव श्रीमन्तस्तिग्मतेजसः ॥
tataḥ sīdhuṣu saktāśca niryayurnagarādbahiḥ | yānairaśvairgajaiścaiva śrīmantastigmatejasaḥ
फिर सीधु-मद्य में आसक्त वे तेजस्वी और प्रखर बल वाले पुरुष रथों, घोड़ों और हाथियों पर सवार होकर नगर से बाहर निकले।
श्लोक 11 (16.4.11)
ततः प्रभासे न्यवसन्यथोद्दिष्टं यथागृहम् । प्रभूतभक्ष्यपेयास्ते सदारा यादवास्तदा ॥
tataḥ prabhāse nyavasanyathoddiṣṭaṃ yathāgṛham | prabhūtabhakṣyapeyāste sadārā yādavāstadā
फिर यादवों ने अपनी पत्नियों और पर्याप्त भोजन-पान के साथ प्रभास में निर्धारित स्थानों पर, घर-घर के अनुसार डेरा डाला।
श्लोक 12 (16.4.12)
निविष्टांस्तान्निशाम्याथ समुद्रान्ते स योगवित् । जगामामन्त्र्य तान्वीरानुद्धवोऽर्थविशारदः ॥
niviṣṭāṃstānniśāmyātha samudrānte sa yogavit | jagāmāmantrya tānvīrānuddhavo'rthaviśāradaḥ
उन्हें समुद्र-तट पर बसा देखकर योग के ज्ञाता, परमार्थ में कुशल उद्धव उन वीरों से विदा लेकर चले गए।
श्लोक 13 (16.4.13)
तं प्रस्थितं महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिम् । जानन्विनाशं वृष्णीनां नैच्छद्वारयितुं हरिः ॥
taṃ prasthitaṃ mahātmānamabhivādya kṛtāñjalim | jānanvināśaṃ vṛṣṇīnāṃ naicchadvārayituṃ hariḥ
महात्मा उद्धव हाथ जोड़कर हरि को प्रणाम करके चल पड़े; वृष्णियों का विनाश निश्चित जानकर हरि ने उन्हें रोकना नहीं चाहा।
श्लोक 14 (16.4.14)
ततः कालपरीतास्ते वृष्ण्यन्धकमहारथाः । अपश्यन्नुद्धवं यान्तं तेजसाऽऽवृत्य रोदसी ॥
tataḥ kālaparītāste vṛṣṇyandhakamahārathāḥ | apaśyannuddhavaṃ yāntaṃ tejasā''vṛtya rodasī
तब काल से घिरे वृष्णि और अन्धकों के महारथियों ने उद्धव को अपने तेज से आकाश और पृथ्वी को भरते हुए जाते देखा।
श्लोक 15 (16.4.15)
ब्राह्मणार्थेषु यत्सिद्धमन्नं तेषां महात्मनाम् । तद्वानरेभ्यः प्रददुः सुरागन्धसमन्वितम् ॥
brāhmaṇārtheṣu yatsiddhamannaṃ teṣāṃ mahātmanām | tadvānarebhyaḥ pradaduḥ surāgandhasamanvitam
उन महात्माओं के लिए ब्राह्मणों के निमित्त जो अन्न तैयार हुआ था, उसे उन्होंने मद्य की गन्ध से मिलाकर बन्दरों को दे दिया।
श्लोक 16 (16.4.16)
ततस्तूर्यशताकीर्णं नटनर्तकसंकुलम् । अवर्तत महापानं प्रभासे तिग्मतेजसाम् ॥
tatastūryaśatākīrṇaṃ naṭanartakasaṃkulam | avartata mahāpānaṃ prabhāse tigmatejasām
तब प्रभास में उन प्रखर तेज वाले पुरुषों का महापान आरम्भ हुआ, जो सैकड़ों वाद्यों से भरा और नट-नर्तकों से खचाखच था।
श्लोक 17 (16.4.17)
कृष्णस्य सन्निधौ रामः सहितः कृतवर्मणा । अपिबद्युयुधानश्च गदो बभ्रुस्तथैव च ॥
kṛṣṇasya sannidhau rāmaḥ sahitaḥ kṛtavarmaṇā | apibadyuyudhānaśca gado babhrustathaiva ca
कृष्ण के सामने बलराम ने कृतवर्मा के साथ मद्य पिया, और युयुधान, गद तथा बभ्रु ने भी।
श्लोक 18 (16.4.18)
ततः परिषदो मध्ये युयुधानो मदोत्कटः । अब्रवीत्कृतवर्माणमवहास्यावमत्य च ॥
tataḥ pariṣado madhye yuyudhāno madotkaṭaḥ | abravītkṛtavarmāṇamavahāsyāvamatya ca
तब सभा के बीच मद से उन्मत्त युयुधान ने कृतवर्मा की हँसी उड़ाकर और उसका अनादर करके कहा—
सात्यकिरुवाच
श्लोक 19 (16.4.19)
कः क्षत्रियो हन्यमानः सुप्तान्हन्यान्मृतानिव । तन्न मृष्यन्ति हार्दिक्य यादवा यत्त्वया कृतम् ॥
kaḥ kṣatriyo hanyamānaḥ suptānhanyānmṛtāniva | tanna mṛṣyanti hārdikya yādavā yattvayā kṛtam
'कौन क्षत्रिय, स्वयं आक्रमण में घिरा होने पर भी, सोए हुए लोगों को मरे हुओं की तरह मारेगा? हे हार्दिक्य, तुमने जो किया उसे यादव सहन नहीं करते।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (16.4.20)
इत्युक्ते युयुधानेन पूजयामास तद्वचः । प्रद्युम्नो रथिनांश्रेष्ठो हार्दिक्यमवमत्य च ॥
ityukte yuyudhānena pūjayāmāsa tadvacaḥ | pradyumno rathināṃśreṣṭho hārdikyamavamatya ca
युयुधान के ऐसा कहने पर रथियों में श्रेष्ठ प्रद्युम्न ने हार्दिक्य का अनादर करते हुए उसके वचन का समर्थन किया।
श्लोक 21 (16.4.21)
ततः परमसंक्रुद्धः कृतवर्मा तमब्रवीत् । निर्दिशन्निव सावज्ञं तदा सव्येन पाणिना ॥
tataḥ paramasaṃkruddhaḥ kṛtavarmā tamabravīt | nirdiśanniva sāvajñaṃ tadā savyena pāṇinā
तब अत्यन्त क्रुद्ध कृतवर्मा ने बाएँ हाथ से तिरस्कारपूर्वक संकेत करते हुए उससे कहा—
कृतवर्मोवाच
श्लोक 22 (16.4.22)
भूरिश्रवाश्छिन्नबाहुर्युद्धे प्रायगतस्त्वया । वधेन सुनृशंसेन कथं वीरेण पातितः ॥
bhūriśravāśchinnabāhuryuddhe prāyagatastvayā | vadhena sunṛśaṃsena kathaṃ vīreṇa pātitaḥ
'भूरिश्रवा की भुजा कट चुकी थी और वह युद्ध में प्रायोपवेशन में बैठा था। तुम जैसे वीर ने ऐसे अत्यन्त क्रूर वध से उसे कैसे गिराया?'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (16.4.23)
इति तस्य वचः श्रुत्वा केशवः परवीरहा । तिर्यक्सरोषया दृष्ट्या वीक्षांचक्रे स मन्युमान् ॥
iti tasya vacaḥ śrutvā keśavaḥ paravīrahā | tiryaksaroṣayā dṛṣṭyā vīkṣāṃcakre sa manyumān
उसकी बात सुनकर शत्रुवीरों का नाश करने वाले केशव ने क्रोध में तिरछी और रोष भरी दृष्टि से देखा।
श्लोक 24 (16.4.24)
मणिः स्यमन्तकश्चैव यः स सत्राजितोऽभवत् । तां कथां श्रावयामास सात्यकिर्मधुसूदनम् ॥
maṇiḥ syamantakaścaiva yaḥ sa satrājito'bhavat | tāṃ kathāṃ śrāvayāmāsa sātyakirmadhusūdanam
तब सात्यकि ने मधुसूदन को वह कथा सुनाई—सत्राजित् के स्यमन्तक मणि की।
श्लोक 25 (16.4.25)
तच्छ्रुत्वा केशवस्याङ्कमगमद्रुदती तदा । सत्यभामा प्रकुपिता कोपयन्ती जनार्दनम् ॥
tacchrutvā keśavasyāṅkamagamadrudatī tadā | satyabhāmā prakupitā kopayantī janārdanam
यह सुनकर क्रोध से भरी सत्यभामा रोती हुई केशव की गोद में चली गई और जनार्दन को भड़काने लगी।
श्लोक 26 (16.4.26)
तत उत्थाय सक्रोधः सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत् ॥
tata utthāya sakrodhaḥ sātyakirvākyamabravīt
तब सात्यकि क्रोध में उठ खड़ा हुआ और उसने ये वचन कहे—
सात्यकिरुवाच
श्लोक 27 (16.4.27)
पञ्चानां द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नशिखण्डिनोः । एष गच्छामि पदवीं सत्येन च तथा शपे ॥
pañcānāṃ draupadeyānāṃ dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinoḥ | eṣa gacchāmi padavīṃ satyena ca tathā śape
'द्रौपदी के पाँचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी के लिए मैं अब उनका मार्ग पकड़ता हूँ; यह मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ।
श्लोक 28 (16.4.28)
सौप्तिके ये च निहताः सुप्ता येन दुरात्मना । द्रोणपुत्रसहायेन पापेन कृतवर्मणा ॥
sauptike ye ca nihatāḥ suptā yena durātmanā | droṇaputrasahāyena pāpena kṛtavarmaṇā
रात्रि-आक्रमण में जो सोए हुए लोग उस दुष्ट, द्रोणपुत्र के सहायक पापी कृतवर्मा के हाथों मारे गए थे—
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (16.4.29)
समाप्तमायुरस्याद्य यशश्चैव सुमध्यमे । इत्येवमुक्त्वा खड्गेन केशवस्य समीपतः । अभिद्रुत्य शिरः क्रुद्धश्चिच्छेद कृतवर्मणः ॥
samāptamāyurasyādya yaśaścaiva sumadhyame | ityevamuktvā khaḍgena keśavasya samīpataḥ | abhidrutya śiraḥ kruddhaściccheda kṛtavarmaṇaḥ
आज उसकी आयु और यश दोनों समाप्त हो गए, हे सुन्दर कमर वाली।' ऐसा कहकर क्रुद्ध सात्यकि ने केशव के सामने ही तलवार लेकर झपटकर कृतवर्मा का सिर काट डाला।
श्लोक 30 (16.4.30)
तथाऽन्यानपि निघ्नन्तं युयुधानं समन्ततः । अभ्यधावद्धृषीकेशो विनिवारयितुं तदा ॥
tathā'nyānapi nighnantaṃ yuyudhānaṃ samantataḥ | abhyadhāvaddhṛṣīkeśo vinivārayituṃ tadā
जब युयुधान चारों ओर दूसरों को भी मारने लगा, तब हृषीकेश उसे रोकने के लिए दौड़े।
श्लोक 31 (16.4.31)
एकीभूतास्ततः सर्वे कालपर्यायचोदिताः । भोजान्धका महाराज शैनेयं पर्यवारयन् ॥
ekībhūtāstataḥ sarve kālaparyāyacoditāḥ | bhojāndhakā mahārāja śaineyaṃ paryavārayan
तब हे महाराज, काल के चक्र से प्रेरित सब भोज और अन्धक एकत्र होकर शैनेय (सात्यकि) को घेरने लगे।
श्लोक 32 (16.4.32)
तान्दृष्ट्वा पततस्तूर्णमभिक्रुद्धाञ्जनार्दनः । न चुक्रोध महातेजा जानन्कालस्य पर्ययम् ॥
tāndṛṣṭvā patatastūrṇamabhikruddhāñjanārdanaḥ | na cukrodha mahātejā jānankālasya paryayam
उन्हें क्रोध में झपटते देखकर महातेजस्वी जनार्दन क्रुद्ध नहीं हुए, क्योंकि वे काल के फेरे को जानते थे।
श्लोक 33 (16.4.33)
ते तु पानमदाविष्टाश्चोदिताः कालधर्मणा । युयुधानमथाभ्यघ्नन्नुच्छिष्टैर्भाजनैस्तदा ॥
te tu pānamadāviṣṭāścoditāḥ kāladharmaṇā | yuyudhānamathābhyaghnannucchiṣṭairbhājanaistadā
पर मद्य के नशे में चूर और काल की प्रेरणा से उन्होंने जूठे बर्तनों से युयुधान को मारना आरम्भ कर दिया।
श्लोक 34 (16.4.34)
हन्यमाने तु शैनेये क्रुद्धो रुक्मिणिनन्दनः । तदनन्तरमागच्छन्मोचयिष्यञ्शिनेः सुतम् ॥
hanyamāne tu śaineye kruddho rukmiṇinandanaḥ | tadanantaramāgacchanmocayiṣyañśineḥ sutam
शैनेय को पिटते देख रुक्मिणी के पुत्र (प्रद्युम्न) क्रुद्ध होकर शिनि-पुत्र को छुड़ाने के लिए बीच में दौड़े।
श्लोक 35 (16.4.35)
स भोजैः सह संयुक्तः सात्यकिश्चान्धकैः सह । व्यायच्छमानौ तौ वीरौ बाहुद्रविणशालिनौ । बहुत्वान्निहतौ तत्र उभौ कृष्णस्य पश्यतः ॥
sa bhojaiḥ saha saṃyuktaḥ sātyakiścāndhakaiḥ saha | vyāyacchamānau tau vīrau bāhudraviṇaśālinau | bahutvānnihatau tatra ubhau kṛṣṇasya paśyataḥ
वह भोजों से और सात्यकि अन्धकों से जूझ पड़ा; भुजबल के धनी वे दोनों वीर लड़ते रहे और अधिक संख्या के कारण कृष्ण के देखते-देखते दोनों मारे गए।
श्लोक 36 (16.4.36)
हतं दृष्ट्वा च शैनेयं पुत्रं च यदुनन्दनः । एरकाणां ततो मुष्टिं कोपाज्जग्राह केशवः ॥
hataṃ dṛṣṭvā ca śaineyaṃ putraṃ ca yadunandanaḥ | erakāṇāṃ tato muṣṭiṃ kopājjagrāha keśavaḥ
शैनेय और अपने पुत्र को मरा देखकर यदुनन्दन केशव ने क्रोध में एरका घास की एक मुट्ठी उठा ली।
श्लोक 37 (16.4.37)
तदभून्मुसलं घोरं वज्रकल्पमयोमयम् । जघान कृष्णस्तांस्तेन ये ये प्रमुखतोऽभवन् ॥
tadabhūnmusalaṃ ghoraṃ vajrakalpamayomayam | jaghāna kṛṣṇastāṃstena ye ye pramukhato'bhavan
वह वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई; उससे कृष्ण ने अपने सामने खड़े सभी लोगों को मार गिराया।
श्लोक 38 (16.4.38)
ततोऽन्धकाश्च भोजाश्च शैनेया वृष्णयस्तथा । जघ्नुरन्योन्यमाक्रन्दे मुसलैः कालचोदिताः ॥
tato'ndhakāśca bhojāśca śaineyā vṛṣṇayastathā | jaghnuranyonyamākrande musalaiḥ kālacoditāḥ
तब अन्धक, भोज, शैनेय और वृष्णि, काल से प्रेरित होकर, उस कोलाहल में एक-दूसरे को मूसलों से मारने लगे।
श्लोक 39 (16.4.39)
यस्तेषामेरकां कश्चिज्जग्राह कुपितो नृपः । वज्रभूतेव सा राजन्नदृश्यत तदा विभो ॥
yasteṣāmerakāṃ kaścijjagrāha kupito nṛpaḥ | vajrabhūteva sā rājannadṛśyata tadā vibho
हे राजन्, उनमें से जिस क्रुद्ध पुरुष ने भी एरका उठाई, हे विभो, वह तब वज्र जैसी दिखाई देने लगी।
श्लोक 40 (16.4.40)
तृणं च मुसलीभूतमपि तत्र व्यदृश्यत । ब्रह्मदण्डकृतं सर्वमिति तद्विद्धि पार्थिव ॥
tṛṇaṃ ca musalībhūtamapi tatra vyadṛśyata | brahmadaṇḍakṛtaṃ sarvamiti tadviddhi pārthiva
वहाँ घास का तिनका भी मूसल बना दिखाई देता था। हे राजन्, जान लो कि यह सब ब्रह्मदण्ड का ही किया हुआ था।
श्लोक 41 (16.4.41)
आविध्याविध्य ते राजन्प्रहरन्ति स्म तैस्तृणैः । तद्वज्रभूतं मुसलं व्यदृश्यत तदा दृढम् ॥
āvidhyāvidhya te rājanpraharanti sma taistṛṇaiḥ | tadvajrabhūtaṃ musalaṃ vyadṛśyata tadā dṛḍham
हे राजन्, वे जो भी तिनके उठाकर घुमा-घुमाकर मारते थे, वह तब वज्र जैसा कठोर मूसल दिखाई देता था।
श्लोक 42 (16.4.42)
अवधीत्पितरं पुत्रः पिता पुत्रं च भारत । मत्ताः परिपतन्ति स्म योधयन्तः परस्परम् ॥
avadhītpitaraṃ putraḥ pitā putraṃ ca bhārata | mattāḥ paripatanti sma yodhayantaḥ parasparam
हे भारत, पुत्र ने पिता को और पिता ने पुत्र को मार डाला; मदोन्मत्त होकर वे एक-दूसरे पर टूट पड़ते और आपस में लड़ते थे।
श्लोक 43 (16.4.43)
पतङ्गा इव चाग्नौ ते निपेतुः कुकुरान्धकाः । नासीत्पलायने बुद्धिर्वध्यमानस्य कस्यचित् ॥
pataṅgā iva cāgnau te nipetuḥ kukurāndhakāḥ | nāsītpalāyane buddhirvadhyamānasya kasyacit
कुकुर और अन्धक आग में पतंगों की तरह गिरते थे; मारे जाते हुए किसी के भी मन में भागने का विचार नहीं आता था।
श्लोक 44 (16.4.44)
तत्रापश्यन्महाबाहुर्जानन्कालस्य पर्ययम् । मुसलं समवष्टभ्य तस्थौ स मधुसूदनः ॥
tatrāpaśyanmahābāhurjānankālasya paryayam | musalaṃ samavaṣṭabhya tasthau sa madhusūdanaḥ
यह देखकर महाबाहु मधुसूदन काल के फेरे को जानते हुए एक मूसल उठाकर खड़े रहे।
श्लोक 45 (16.4.45)
सांबं च निहतं दृष्ट्वा चारुदेष्णं च माधवः । प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च ततश्चुक्रोध भारत ॥
sāṃbaṃ ca nihataṃ dṛṣṭvā cārudeṣṇaṃ ca mādhavaḥ | pradyumnaṃ cāniruddhaṃ ca tataścukrodha bhārata
हे भारत, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को मरा देखकर माधव क्रोध से भर उठे।
श्लोक 46 (16.4.46)
गदं वीक्ष्य शयानं च भृशं कोपसमन्वितः । स निःशेषं तदा चक्रे शार्ङ्गचक्रगदाधरः ॥
gadaṃ vīkṣya śayānaṃ ca bhṛśaṃ kopasamanvitaḥ | sa niḥśeṣaṃ tadā cakre śārṅgacakragadādharaḥ
गद को मरा पड़ा देखकर अत्यन्त क्रोध से भरे हुए शार्ङ्ग, चक्र और गदा धारण करने वाले कृष्ण ने तब सबका अन्त कर दिया।
श्लोक 47 (16.4.47)
तं निघ्नन्तं महातेजा बभ्रुः परपुरंजयः । दारुकश्चैव दाशार्हमूचतुर्यन्निबोध तत् ॥
taṃ nighnantaṃ mahātejā babhruḥ parapuraṃjayaḥ | dārukaścaiva dāśārhamūcaturyannibodha tat
जब वे सबको मार रहे थे, तब शत्रुनगरों को जीतने वाले महातेजस्वी बभ्रु और दारुक ने दाशार्ह (कृष्ण) से जो कहा, उसे सुनो।
बभ्रुदारुकावूचतुः
श्लोक 48 (16.4.48)
भगवन्निहताः सर्वे त्वया भूयिष्ठशो नराः । रामस्य पदमन्विच्छ तत्र गच्छाम यत्र सः ॥
bhagavannihatāḥ sarve tvayā bhūyiṣṭhaśo narāḥ | rāmasya padamanviccha tatra gacchāma yatra saḥ
'हे भगवन्, आपके हाथों बहुत-से लोग मारे जा चुके हैं। बलराम के पदचिह्नों को खोजिए; जहाँ वे हैं, वहीं चलें।'