मौसल पर्व · अध्याय 9
व्यास द्वारा अर्जुन को सान्त्वना
अर्जुन उदास होकर व्यास के आश्रम में पहुँचते हैं और व्यास उनसे उनके दुःख का कारण पूछते हैं। अर्जुन कृष्ण और बलराम के देह-त्याग, ब्राह्मणों के शाप से यादवों के विनाश, आभीरों द्वारा वृष्णि-स्त्रियों के हरण तथा अपने अस्त्रों और बल के नष्ट हो जाने की बात बताते हैं। व्यास समझाते हैं कि यह सब काल और शाप का ही कार्य था, पृथ्वी पर कृष्ण का कार्य पूरा हो चुका है और अब पाण्डवों के भी प्रस्थान का समय आ गया है; इसके बाद अर्जुन हस्तिनापुर जाकर युधिष्ठिर को सारा वृत्तान्त सुनाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.9.1)
प्रविश्य त्वर्जुनो राजन्नाश्रमं सत्यवादिनः । ददर्शासीनमेकान्तो मुनिं सत्यवतीसुतम् ॥
praviśya tvarjuno rājannāśramaṃ satyavādinaḥ | dadarśāsīnamekānto muniṃ satyavatīsutam
हे राजन्! अर्जुन ने सत्यवादी मुनि के आश्रम में प्रवेश किया और एकान्त में बैठे हुए सत्यवतीपुत्र मुनि को देखा।
श्लोक 2 (16.9.2)
स तमासाद्य धर्मज्ञमुपतस्थे महाव्रतम् । अर्जुनोस्मीति नामास्मै निवेद्याभ्यवदत्ततः ॥
sa tamāsādya dharmajñamupatasthe mahāvratam | arjunosmīti nāmāsmai nivedyābhyavadattataḥ
उन धर्मज्ञ, महाव्रती मुनि के पास पहुँचकर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया; ‘मैं अर्जुन हूँ’ — इस प्रकार उन्हें अपना नाम बताकर फिर उनका अभिवादन किया।
श्लोक 3 (16.9.3)
स्वागतं तेऽस्त्विति प्राह मुनिः सत्यवतीसुतः । आस्यतामिति होवाच प्रसन्नात्मा महामुनिः ॥
svāgataṃ te'stviti prāha muniḥ satyavatīsutaḥ | āsyatāmiti hovāca prasannātmā mahāmuniḥ
सत्यवतीपुत्र मुनि ने कहा, ‘तुम्हारा स्वागत है’, और प्रसन्नचित्त उन महामुनि ने कहा, ‘बैठो।’
श्लोक 4 (16.9.4)
तमप्रतीतमनसं निःश्वसन्तं पुनःपुनः । निर्विण्णमनसं दृष्ट्वा पार्थं व्यासोऽब्रवीदिदम् ॥
tamapratītamanasaṃ niḥśvasantaṃ punaḥpunaḥ | nirviṇṇamanasaṃ dṛṣṭvā pārthaṃ vyāso'bravīdidam
पार्थ को उदास, बार-बार लम्बी साँसें भरते और खिन्न मन देखकर व्यास ने उनसे यह कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 5 (16.9.5)
नखकेशदशाकुंभवारिणा किं समुक्षितः । आवीरजानुगमनं ब्राह्मणो वा हतस्त्वया ॥
nakhakeśadaśākuṃbhavāriṇā kiṃ samukṣitaḥ | āvīrajānugamanaṃ brāhmaṇo vā hatastvayā
क्या तुम पर नाखून, केश, वस्त्र के छोर या घड़े के मुख को छुआ हुआ जल छिड़क दिया गया है? क्या तुम रजस्वला स्त्री के पास गये हो, अथवा तुम्हारे हाथ से किसी ब्राह्मण का वध हुआ है?
श्लोक 6 (16.9.6)
युद्धे पराजितो वाऽसि गतश्रीरिव लक्ष्यसे । न त्वां प्रभिन्नं जानामि किमिदं भरतर्षभ । श्रोतव्यं चेन्मया पार्थ क्षिप्रमाख्यातुमर्हसि ॥
yuddhe parājito vā'si gataśrīriva lakṣyase | na tvāṃ prabhinnaṃ jānāmi kimidaṃ bharatarṣabha | śrotavyaṃ cenmayā pārtha kṣipramākhyātumarhasi
अथवा क्या तुम युद्ध में पराजित हो गये हो? तुम तेजहीन-से दिखायी दे रहे हो। हे भरतश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें कभी ऐसा टूटा हुआ नहीं जाना — यह क्या बात है? हे पार्थ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो शीघ्र बताओ।
अर्जुन उवाच
श्लोक 7 (16.9.7)
यः स मेघवपुः श्रीमान्बृहत्पङ्कजलोचनः । स कृष्णः सह रामेण त्यक्त्वा देहं दिवं गतः ॥
yaḥ sa meghavapuḥ śrīmānbṛhatpaṅkajalocanaḥ | sa kṛṣṇaḥ saha rāmeṇa tyaktvā dehaṃ divaṃ gataḥ
जिनका शरीर मेघ के समान श्याम था, जो शोभासम्पन्न और विशाल कमल-नयन थे, वे श्रीकृष्ण बलराम के साथ देह त्यागकर स्वर्ग चले गये।
श्लोक 8 (16.9.8)
तदनुस्मृत्य संमोहं तदा शोकं महामते । प्रयामि सर्वदा मह्यं मुमूर्षा चोपजायते ॥
tadanusmṛtya saṃmohaṃ tadā śokaṃ mahāmate | prayāmi sarvadā mahyaṃ mumūrṣā copajāyate
हे महाबुद्धिमान्! उस मोह और उस शोक का स्मरण करके मैं सदा उसी में डूबा रहता हूँ, और मुझमें मर जाने की इच्छा उठती है।
श्लोक 9 (16.9.9)
तद्वाक्यस्पर्शनालोकसुखं चामृतसन्निभम् । संस्मृत्य देवदेवस्य प्रमुह्याम्यमृतात्मनः ॥
tadvākyasparśanālokasukhaṃ cāmṛtasannibham | saṃsmṛtya devadevasya pramuhyāmyamṛtātmanaḥ
उन अमृतस्वरूप देवाधिदेव के वचनों के स्पर्श और दर्शन के उस अमृत-तुल्य सुख को याद करके मैं पूरी तरह मोहित हो जाता हूँ।
श्लोक 10 (16.9.10)
मौसले वृष्णिवीराणां विनाशो ब्रह्मशापजः । बभूव वीरान्तकरः प्रभासे रोमहर्षणः ॥
mausale vṛṣṇivīrāṇāṃ vināśo brahmaśāpajaḥ | babhūva vīrāntakaraḥ prabhāse romaharṣaṇaḥ
प्रभास में मूसल के कारण ब्राह्मण के शाप से वृष्णि-वीरों का विनाश हुआ — वीरों का अन्त करने वाला वह विनाश रोंगटे खड़े कर देने वाला था।
श्लोक 11 (16.9.11)
एते शूरा महात्मानः सिंहदर्पा महाबलाः । भोजवृष्ण्यन्धका ब्रह्मन्नन्योन्यं तैर्हतं युधि ॥
ete śūrā mahātmānaḥ siṃhadarpā mahābalāḥ | bhojavṛṣṇyandhakā brahmannanyonyaṃ tairhataṃ yudhi
वे जो शूरवीर, महात्मा, सिंह के समान गर्वीले और महाबली भोज, वृष्णि और अन्धक थे, हे ब्रह्मन्! वे युद्ध में आपस में ही एक-दूसरे के हाथों मारे गये।
श्लोक 12 (16.9.12)
गदापरिघशक्तीनां सहाः परिघबाहवः । त एरकाभिर्निहताः पश्य कालस्य पर्ययम् ॥
gadāparighaśaktīnāṃ sahāḥ parighabāhavaḥ | ta erakābhirnihatāḥ paśya kālasya paryayam
जो गदा, परिघ और शक्तियों का प्रहार सह लेते थे और जिनकी भुजाएँ परिघ के समान थीं, वे एरका-घास के डंडों से मारे गये — देखिए, काल का कैसा फेर है!
श्लोक 13 (16.9.13)
हतं पञ्चशतं तेषां सहस्रं बाहुशालिनाम् । निधनं समनुप्राप्तं समासाद्येतरेतरम् ॥
hataṃ pañcaśataṃ teṣāṃ sahasraṃ bāhuśālinām | nidhanaṃ samanuprāptaṃ samāsādyetaretaram
उन बाहुबली वीरों में से पाँच सौ हज़ार (पाँच लाख) मारे गये; वे एक-दूसरे से भिड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 14 (16.9.14)
पुनःपुनर्न मृष्यामि विनाशममितौजसाम् । चिन्तयानो यदूनां च कृष्णस्य च यशस्विनः ॥
punaḥpunarna mṛṣyāmi vināśamamitaujasām | cintayāno yadūnāṃ ca kṛṣṇasya ca yaśasvinaḥ
अपार बलशाली यदुवंशियों और यशस्वी कृष्ण के विनाश का विचार करते हुए मैं बार-बार उसे सह नहीं पाता।
श्लोक 15 (16.9.15)
शोषणं सागरस्येव मन्दरस्येव चालनम् । नभसः पतनं चैव शैत्यमग्नेस्तथैव च ॥
śoṣaṇaṃ sāgarasyeva mandarasyeva cālanam | nabhasaḥ patanaṃ caiva śaityamagnestathaiva ca
यह तो समुद्र के सूख जाने, पर्वत के हिल जाने, आकाश के गिर पड़ने या अग्नि के शीतल हो जाने जैसी बात है।
श्लोक 16 (16.9.16)
अश्रद्धेयमहं मन्ये विनाशं शार्ङ्गधन्वनः । न चेह स्थातुमिच्छामि लोके कृष्णविनाकृतः ॥
aśraddheyamahaṃ manye vināśaṃ śārṅgadhanvanaḥ | na ceha sthātumicchāmi loke kṛṣṇavinākṛtaḥ
शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले कृष्ण का विनाश मुझे विश्वास के योग्य नहीं लगता, और कृष्ण के बिना मैं इस लोक में रहना नहीं चाहता।
श्लोक 17 (16.9.17)
इतः कष्टतरं चान्यच्छृणु तद्वै तपोधन । मनो मे दीर्यते येन चिन्तयानस्य वै मुहुः ॥
itaḥ kaṣṭataraṃ cānyacchṛṇu tadvai tapodhana | mano me dīryate yena cintayānasya vai muhuḥ
हे तपोधन! इससे भी अधिक कष्ट की एक और बात सुनिए, जिसके बार-बार सोचने से मेरा मन फटा जा रहा है।
श्लोक 18 (16.9.18)
पश्यतो वृष्णिदाराश्च मम ब्रह्मन्सहस्रशः । आभीरैरभिभूयाजौ हृताः पञ्चनदालयैः ॥
paśyato vṛṣṇidārāśca mama brahmansahasraśaḥ | ābhīrairabhibhūyājau hṛtāḥ pañcanadālayaiḥ
हे ब्रह्मन्! मेरे देखते-देखते वृष्णि-कुल की हज़ारों स्त्रियों को पंचनद देश में रहने वाले आभीरों ने युद्ध में हराकर हर लिया।
श्लोक 19 (16.9.19)
धनुरादाय तत्राहं नाशकं तस्य पूरणे । यथापुरा च मे वीर्यं भुजयोर्न तथाऽभवत् ॥
dhanurādāya tatrāhaṃ nāśakaṃ tasya pūraṇe | yathāpurā ca me vīryaṃ bhujayorna tathā'bhavat
वहाँ मैंने धनुष उठाया, परन्तु उसे पूरा खींच न सका; और मेरी भुजाओं में पहले जैसा बल नहीं रहा।
श्लोक 20 (16.9.20)
अस्त्राणि मे प्रनष्टानि विविधानि महामुने । शराश्च क्षयमापन्नाः क्षणेनैव समन्ततः ॥
astrāṇi me pranaṣṭāni vividhāni mahāmune | śarāśca kṣayamāpannāḥ kṣaṇenaiva samantataḥ
हे महामुनि! मेरे अनेक अस्त्र नष्ट हो गये और मेरे बाण चारों ओर क्षणभर में ही चुक गये।
श्लोक 21 (16.9.21)
पुरुषश्चाप्रमेयात्मा शङ्खचक्रगदाधरः । चतुर्भुजः पीतवासाः श्यामः पद्मदलेक्षणः ॥
puruṣaścāprameyātmā śaṅkhacakragadādharaḥ | caturbhujaḥ pītavāsāḥ śyāmaḥ padmadalekṣaṇaḥ
जो अपरिमेय आत्मा वाले पुरुष थे — शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, श्यामवर्ण और कमलदल के समान नेत्रों वाले —
श्लोक 22 (16.9.22)
यश्च याति पुरस्तान्मे रथस्य सुमहाद्युतिः । प्रदहन्रिपुसैन्यानि न पश्याम्यहमद्य तम् ॥
yaśca yāti purastānme rathasya sumahādyutiḥ | pradahanripusainyāni na paśyāmyahamadya tam
जो महातेजस्वी मेरे रथ के आगे-आगे चलते हुए शत्रु-सेनाओं को भस्म करते जाते थे, उन्हें आज मैं नहीं देखता।
श्लोक 23 (16.9.23)
येन पूर्वं प्रदग्धानि शत्रुसैन्यानि तेजसा । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैरहं पश्चादशातयम् ॥
yena pūrvaṃ pradagdhāni śatrusainyāni tejasā | śarairgāṇḍīvanirmuktairahaṃ paścādaśātayam
जिनके तेज से शत्रु की सेनाएँ पहले ही जल चुकी होती थीं, उन्हें मैं बाद में गाण्डीव से छूटे बाणों से गिराया करता था।
श्लोक 24 (16.9.24)
तमपश्यन्विषीदामि घूर्णामीव च सत्तम । परिनिर्विण्णचेताश्च शान्तिं नोपलभेऽपि च ॥
tamapaśyanviṣīdāmi ghūrṇāmīva ca sattama | parinirviṇṇacetāśca śāntiṃ nopalabhe'pi ca
हे सत्पुरुष! उन्हें न देखकर मैं विषाद में डूब रहा हूँ और मानो चक्कर खा रहा हूँ; मेरा चित्त पूरी तरह उचट गया है और मुझे शान्ति नहीं मिलती।
श्लोक 25 (16.9.25)
देवकीनन्दनं देवं वासुदेवमजं प्रभुम् । विना जनार्दनं वीरं नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
devakīnandanaṃ devaṃ vāsudevamajaṃ prabhum | vinā janārdanaṃ vīraṃ nāhaṃ jīvitumutsahe
देवकी के पुत्र, अजन्मा प्रभु देव वासुदेव — वीर जनार्दन के बिना मैं जीवित रहना नहीं सह सकता।
श्लोक 26 (16.9.26)
श्रुत्वैव हि गतं विष्णुं ममापि मुमुहुर्दिशः । प्रनष्टज्ञातिवीर्यस्य शून्यस्य परिधावतः ॥
śrutvaiva hi gataṃ viṣṇuṃ mamāpi mumuhurdiśaḥ | pranaṣṭajñātivīryasya śūnyasya paridhāvataḥ
विष्णु के चले जाने की बात सुनते ही मेरे लिए भी दिशाएँ घूमने लगीं; बल और बन्धुजनों को खोकर मैं सूना-सा हुआ इधर-उधर भटक रहा हूँ।
श्लोक 27 (16.9.27)
उपदेष्टुं मम श्रेयो भवानर्हति सत्तम ॥
upadeṣṭuṃ mama śreyo bhavānarhati sattama
हे सत्पुरुष! आप मुझे बताइए कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है।
व्यास उवाच
श्लोक 28 (16.9.28)
देवांशा देवभूतेन सम्भूतास्ते गतास्सह । धर्मव्यवस्थारक्षार्थं देवेन समुपेक्षिताः ॥
devāṃśā devabhūtena sambhūtāste gatāssaha | dharmavyavasthārakṣārthaṃ devena samupekṣitāḥ
जो देवताओं के अंश थे, वे उन देव के साथ ही उत्पन्न हुए थे और उन्हीं के साथ चले गये; धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए देव ने उनकी उपेक्षा की (उन्हें रोका नहीं)।
श्लोक 29 (16.9.29)
ब्रह्मशापविनिर्दग्धा वृष्ण्यन्धकसमहारथाः । विनष्टाः कुरुशार्दूल न ताञ्शोचितुमर्हसि ॥
brahmaśāpavinirdagdhā vṛṣṇyandhakasamahārathāḥ | vinaṣṭāḥ kuruśārdūla na tāñśocitumarhasi
हे कुरुश्रेष्ठ! ब्राह्मण के शाप से भस्म हुए वृष्णि और अन्धक वंश के महारथी नष्ट हो गये; तुम्हें उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 30 (16.9.30)
भवितव्यं तथा तच्च दिष्टमेतन्महात्मनाम् । उपेक्षितं च कृष्णेन शक्तेनापि व्यपोहितुम् ॥
bhavitavyaṃ tathā tacca diṣṭametanmahātmanām | upekṣitaṃ ca kṛṣṇena śaktenāpi vyapohitum
ऐसा ही होना था; उन महात्माओं का यही प्रारब्ध था। कृष्ण समर्थ होते हुए भी इसे टाल सकते थे, पर उन्होंने उसकी उपेक्षा की।
श्लोक 31 (16.9.31)
त्रैलोक्यमपि गोविन्दः कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् । प्रसहेदन्यथा कर्तुं कुतः शापं महात्मनाम् ॥
trailokyamapi govindaḥ kṛtsnaṃ sthāvarajaṅgamam | prasahedanyathā kartuṃ kutaḥ śāpaṃ mahātmanām
गोविन्द तो स्थावर-जंगम सहित सारे तीनों लोकों को भी दूसरी तरह कर सकते हैं, फिर महात्माओं के शाप की तो बात ही क्या!
श्लोक 32 (16.9.32)
स्त्रियश्च ताः पुरा शप्ताः प्रभासे कुपितेन वै । अष्टावक्रेण मुनिना तदर्थं त्वद्बलक्षयम् ॥
striyaśca tāḥ purā śaptāḥ prabhāse kupitena vai | aṣṭāvakreṇa muninā tadarthaṃ tvadbalakṣayam
और उन स्त्रियों को पहले प्रभास में क्रुद्ध अष्टावक्र मुनि ने शाप दिया था; उसी कारण तुम्हारा बल क्षीण हुआ।
श्लोक 33 (16.9.33)
रथस्य पुरतो याति यः स चक्रगदाधरः । तव स्नेहात्पुराणर्षिर्वासुदेवश्चतुर्भुजः ॥
rathasya purato yāti yaḥ sa cakragadādharaḥ | tava snehātpurāṇarṣirvāsudevaścaturbhujaḥ
जो चक्र और गदा धारण किये तुम्हारे रथ के आगे-आगे चलते हैं, वे पुरातन ऋषि चतुर्भुज वासुदेव तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण ही ऐसा करते थे।
श्लोक 34 (16.9.34)
कृत्वा भारावतरणं पृथिव्याः पृथुलोचनः । मोक्षयित्वा तनुं प्राप्तः कृष्णः स्वस्थानमुत्तमम् ॥
kṛtvā bhārāvataraṇaṃ pṛthivyāḥ pṛthulocanaḥ | mokṣayitvā tanuṃ prāptaḥ kṛṣṇaḥ svasthānamuttamam
पृथ्वी का भार उतारने का कार्य पूरा करके विशाल नेत्रों वाले कृष्ण देह का त्याग कर अपने परम धाम को चले गये हैं।
श्लोक 35 (16.9.35)
त्वयाऽपीह महत्कर्म देवानां पुरुषर्षभ । कृतं भीमसहायेन यमाभ्यां च महाभुज ॥
tvayā'pīha mahatkarma devānāṃ puruṣarṣabha | kṛtaṃ bhīmasahāyena yamābhyāṃ ca mahābhuja
हे पुरुषश्रेष्ठ! हे महाबाहो! तुमने भी भीम और दोनों जुड़वाँ भाइयों की सहायता से यहाँ देवताओं का बड़ा कार्य किया है।
श्लोक 36 (16.9.36)
कृतकृत्यांश्च वो मन्ये संसिद्धान्कुरुपुङ्गव । गमनं प्राप्तकालं व इदं श्रेयस्करं विभो ॥
kṛtakṛtyāṃśca vo manye saṃsiddhānkurupuṅgava | gamanaṃ prāptakālaṃ va idaṃ śreyaskaraṃ vibho
हे कुरुश्रेष्ठ! मैं समझता हूँ कि तुम सब कृतकृत्य और सिद्ध हो चुके हो; तुम्हारे प्रस्थान का समय आ गया है, और हे विभो! यही तुम्हारे लिए कल्याणकारी है।
श्लोक 37 (16.9.37)
बलं बुद्धिश्च तेजश्च प्रतिपत्तिश्च भारत । भवन्ति भवकालेषु विपद्यन्ते विपर्यये ॥
balaṃ buddhiśca tejaśca pratipattiśca bhārata | bhavanti bhavakāleṣu vipadyante viparyaye
हे भारत! बल, बुद्धि, तेज और विवेक उन्नति के समय प्राप्त होते हैं और विपरीत समय आने पर नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 38 (16.9.38)
कालमूलमिदं सर्वं जगद्बीजं धनंजय । काल एव समादत्ते पुनरेव यदृच्छया ॥
kālamūlamidaṃ sarvaṃ jagadbījaṃ dhanaṃjaya | kāla eva samādatte punareva yadṛcchayā
हे धनंजय! यह सब काल में ही जड़ जमाये हुए है, काल ही जगत् का बीज है; काल ही फिर अपनी इच्छा से सबको समेट लेता है।
श्लोक 39 (16.9.39)
स एव बलवान्भूत्वा पुनर्भवति दुर्बलः । स एवेशश्च भूत्वेह परैराज्ञाप्यते पुनः ॥
sa eva balavānbhūtvā punarbhavati durbalaḥ | sa eveśaśca bhūtveha parairājñāpyate punaḥ
जो बलवान् हो चुका होता है वही फिर दुर्बल हो जाता है, और जो यहाँ स्वामी बन चुका होता है वही फिर दूसरों के आदेश में चलता है।
श्लोक 40 (16.9.40)
कृतकृत्यानि चास्त्राणि गतान्यद्य यथागतम् । पुनरेष्यन्ति ते हस्तं यदा कालो भविष्यति ॥
kṛtakṛtyāni cāstrāṇi gatānyadya yathāgatam | punareṣyanti te hastaṃ yadā kālo bhaviṣyati
तुम्हारे अस्त्र अपना काम पूरा कर आज जैसे आये थे वैसे ही चले गये; जब समय आयेगा तब वे फिर तुम्हारे हाथ में आ जायेंगे।
श्लोक 41 (16.9.41)
कालो गन्तुं गतिं मुख्यां भवतामपि भारत । एतच्छ्रेयो हि वो मन्ये परमं भरतर्षभ ॥
kālo gantuṃ gatiṃ mukhyāṃ bhavatāmapi bhārata | etacchreyo hi vo manye paramaṃ bharatarṣabha
हे भारत! अब तुम लोगों के भी परम गति की ओर जाने का समय है; हे भरतश्रेष्ठ! मैं इसी को तुम्हारे लिए परम कल्याणकारी मानता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (16.9.42)
एतद्वचनमाज्ञाय व्यासस्यामिततेजसः । अनुज्ञातो ययौ पार्थो नगरं नागसाह्वयम् ॥
etadvacanamājñāya vyāsasyāmitatejasaḥ | anujñāto yayau pārtho nagaraṃ nāgasāhvayam
अमित तेजस्वी व्यास के इन वचनों को समझकर और उनसे आज्ञा पाकर पार्थ नागसाह्वय (हस्तिनापुर) नगर को चले गये।
श्लोक 43 (16.9.43)
प्रविश्य च पुरीं वीरः समासाद्य युधिष्ठिरम् । आचष्ट तद्यथावृत्तं वृष्ण्यन्धककुलं प्रति ॥
praviśya ca purīṃ vīraḥ samāsādya yudhiṣṭhiram | ācaṣṭa tadyathāvṛttaṃ vṛṣṇyandhakakulaṃ prati
उस वीर ने नगर में प्रवेश कर युधिष्ठिर के पास पहुँचकर वृष्णि और अन्धक वंश के विषय में जो कुछ घटित हुआ था, वह ज्यों-का-त्यों उन्हें बता दिया।