मौसल पर्व · अध्याय 8
समुद्र में द्वारका का लय और अर्जुन के अस्त्रों की विफलता
अर्जुन वसुदेव को सान्त्वना देकर द्वारकावासियों से कहते हैं कि सात दिन में वज्र के नेतृत्व में इन्द्रप्रस्थ चलने को तैयार रहें; अगली प्रातः वसुदेव देह त्याग देते हैं, और अर्जुन उनकी चार पत्नियों सहित उनका दाह-संस्कार करते हैं तथा मरे हुए वृष्णियों और राम-कृष्ण के संस्कार भी पूरे करते हैं। जनसमूह के निकलते ही समुद्र द्वारका को डुबो देता है। पंचनद में आभीर लुटेरे आक्रमण करते हैं; गाण्डीव और अर्जुन के अस्त्र उनका साथ छोड़ देते हैं और लुटेरे बहुत-सी स्त्रियाँ उठा ले जाते हैं। बचे हुओं को अर्जुन अनेक नगरों में बसाते हैं, वज्र को इन्द्रप्रस्थ का राज्य देते हैं, कृष्ण की रानियाँ अग्नि में या वन में प्रवेश करती हैं, और शोक से भरे अर्जुन व्यास के आश्रम में पहुँचते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.8.1)
एवमुक्तः स बीभत्सुर्मातुलेन परंतप । दुर्मना दीनवदनो वसुदेवमुवाच ह ॥
evamuktaḥ sa bībhatsurmātulena paraṃtapa | durmanā dīnavadano vasudevamuvāca ha
मामा के इस प्रकार कहने पर शत्रुओं को तपाने वाले बीभत्सु उदास मन और दीन मुख से वसुदेव से बोले।
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (16.8.2)
नाहं वृष्णिप्रवीरेण बन्धुभिश्चैव मातुल । विहीनां पृथिवीं द्रष्टुं शक्तश्चिरमिह प्रभो ॥
nāhaṃ vṛṣṇipravīreṇa bandhubhiścaiva mātula | vihīnāṃ pṛthivīṃ draṣṭuṃ śaktaściramiha prabho
"हे मामा, हे प्रभो, श्रेष्ठ वृष्णि-वीरों से और अपने बन्धुओं से रहित इस पृथ्वी को मैं बहुत समय तक देखने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 3 (16.8.3)
राजा च भीमसेनश्च सहदेवश्च पाण्डवः । नकुलो याज्ञसेनी च षडेकमनसो वयम् ॥
rājā ca bhīmasenaśca sahadevaśca pāṇḍavaḥ | nakulo yājñasenī ca ṣaḍekamanaso vayam
राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, पाण्डव सहदेव, नकुल, द्रौपदी और मैं, हम छहों एक मन के हैं।
श्लोक 4 (16.8.4)
राज्ञः संक्रमणे चापि कामोऽयं नित्यमेव हि । तमिमं विद्धि सम्प्राप्तं कालं कालविदांवर ॥
rājñaḥ saṃkramaṇe cāpi kāmo'yaṃ nityameva hi | tamimaṃ viddhi samprāptaṃ kālaṃ kālavidāṃvara
और राजा के प्रस्थान की यह इच्छा हमारे मन में सदा ही रहती है। जान लीजिए कि वही समय अब आ पहुँचा है, हे कालवेत्ताओं में श्रेष्ठ।
श्लोक 5 (16.8.5)
सर्वथा वृष्णिदारांस्तु बालं वृद्धं तथैव च । नयिष्ये परिगृह्याहमिन्द्रप्रस्थमरिंदम ॥
sarvathā vṛṣṇidārāṃstu bālaṃ vṛddhaṃ tathaiva ca | nayiṣye parigṛhyāhamindraprasthamariṃdama
हर हाल में मैं वृष्णियों की स्त्रियों, बालकों और वृद्धों को साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ ले जाऊँगा, हे शत्रुदमन।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (16.8.6)
इत्युक्त्वा दारुकमिदं वाक्यमाह धनंजयः । अमात्यान्वृष्णिवीराणां द्रष्टुमिच्छामि माचिरम् ॥
ityuktvā dārukamidaṃ vākyamāha dhanaṃjayaḥ | amātyānvṛṣṇivīrāṇāṃ draṣṭumicchāmi māciram
यह कहकर धनंजय ने दारुक से कहा, "मैं वृष्णि-वीरों के मन्त्रियों से बिना देर किए मिलना चाहता हूँ।"
श्लोक 7 (16.8.7)
इत्येवमुक्त्वा वचनं सुधर्मां यादवीं सभाम् । प्रविवेशार्जुनः शूरः शोचमानो महाभुजः ॥
ityevamuktvā vacanaṃ sudharmāṃ yādavīṃ sabhām | praviveśārjunaḥ śūraḥ śocamāno mahābhujaḥ
ऐसा कहकर शोक करते हुए महाबाहु वीर अर्जुन ने यादवों की सुधर्मा सभा में प्रवेश किया।
श्लोक 8 (16.8.8)
तमासनगतं तत्र सर्वाः प्रकृतयस्तथा । ब्राह्मणा नागरास्तत्र परिवार्योपतस्थिरे ॥
tamāsanagataṃ tatra sarvāḥ prakṛtayastathā | brāhmaṇā nāgarāstatra parivāryopatasthire
वहाँ आसन पर बैठे हुए उन्हें सब प्रजाजन, ब्राह्मण और नगरवासी घेरकर उनके पास खड़े हो गए।
श्लोक 9 (16.8.9)
तान्दीनमनसः सर्वान्विमूढान्गतचेतसः । उवाचेदं वचः काले पार्थो दीनतरस्तथा ॥
tāndīnamanasaḥ sarvānvimūḍhāngatacetasaḥ | uvācedaṃ vacaḥ kāle pārtho dīnatarastathā
तब स्वयं उनसे भी अधिक दीन अर्जुन ने उन उदास, मूढ़ और अचेत-से हुए सब लोगों से समयानुकूल यह वचन कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 10 (16.8.10)
शक्रप्रस्थमहं नेष्ये वृष्ण्यन्धकजनं स्वयम् । इदं तु नगरं सर्वं समुद्रः प्लावयिष्यति ॥
śakraprasthamahaṃ neṣye vṛṣṇyandhakajanaṃ svayam | idaṃ tu nagaraṃ sarvaṃ samudraḥ plāvayiṣyati
"मैं स्वयं वृष्णियों और अन्धकों के लोगों को शक्रप्रस्थ ले चलूँगा। समुद्र इस सारी नगरी को डुबो देगा।
श्लोक 11 (16.8.11)
सज्जीकुरुत यानानि रत्नानि विविधानि च । वज्रोऽयं भवतां राजा शक्रप्रस्थे भविष्यति ॥
sajjīkuruta yānāni ratnāni vividhāni ca | vajro'yaṃ bhavatāṃ rājā śakraprasthe bhaviṣyati
अपने वाहन और नाना प्रकार के रत्न तैयार कर लो। यह वज्र शक्रप्रस्थ में तुम्हारा राजा होगा।
श्लोक 12 (16.8.12)
सप्तमे दिवसे चैव रवौ विमल उद्गते । बहिर्वत्स्यामहे सर्वे सज्जीभवत माचिरम् ॥
saptame divase caiva ravau vimala udgate | bahirvatsyāmahe sarve sajjībhavata māciram
सातवें दिन निर्मल सूर्योदय होने पर हम सब बाहर जाकर रहेंगे; तैयार हो जाओ, देर मत करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (16.8.13)
इत्युक्तास्तेन ते सर्वे पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । सज्जमाशु ततश्चक्रुः स्वसिद्ध्यर्थं समुत्सुकाः ॥
ityuktāstena te sarve pārthenākliṣṭakarmaṇā | sajjamāśu tataścakruḥ svasiddhyarthaṃ samutsukāḥ
अक्लिष्टकर्मा पार्थ के ऐसा कहने पर वे सब अपनी सुरक्षा के लिए उत्सुक होकर शीघ्र तैयारी में लग गए।
श्लोक 14 (16.8.14)
तां रात्रिमवसत्पार्थः केशवस्य निवेशने । महता शोकमोहेन सहसाऽभिपरिप्लुतः ॥
tāṃ rātrimavasatpārthaḥ keśavasya niveśane | mahatā śokamohena sahasā'bhipariplutaḥ
उस रात पार्थ केशव के भवन में रहे; वे महान् शोक और मोह में सहसा डूबे हुए थे।
श्लोक 15 (16.8.15)
श्वोभूतेऽथ ततः शौरिर्वसुदेवः प्रतापवान् । युक्त्वाऽऽत्मानं महातेजा जगाम गतिमुत्तमां ॥
śvobhūte'tha tataḥ śaurirvasudevaḥ pratāpavān | yuktvā''tmānaṃ mahātejā jagāma gatimuttamāṃ
अगले प्रातः तेजस्वी और प्रतापी शौरि वसुदेव योग द्वारा आत्मा को समाहित करके परम गति को प्राप्त हो गए।
श्लोक 16 (16.8.16)
ततः शब्दो महानासीद्वसुदेवनिवेशने । दारुणः क्रोशतीनां च रुदतीनां च योषिताम् ॥
tataḥ śabdo mahānāsīdvasudevaniveśane | dāruṇaḥ krośatīnāṃ ca rudatīnāṃ ca yoṣitām
तब वसुदेव के भवन में चिल्लाती और रोती हुई स्त्रियों का बड़ा भयंकर शब्द उठा।
श्लोक 17 (16.8.17)
प्रकीर्णमूर्धजाः सर्वा विमुक्ताभरणस्रजः । उरांसि पाणिभिर्घ्नन्त्यो व्यलपन्करुणं स्त्रियः ॥
prakīrṇamūrdhajāḥ sarvā vimuktābharaṇasrajaḥ | urāṃsi pāṇibhirghnantyo vyalapankaruṇaṃ striyaḥ
बाल बिखेरे, आभूषण और मालाएँ उतारे हुए सब स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटती हुई करुण विलाप करने लगीं।
श्लोक 18 (16.8.18)
तं देवकी च भद्रा च रोहिणी मदिरा तथा । अन्वारोढुं व्यवसिता भर्तारं योषितां वराः ॥
taṃ devakī ca bhadrā ca rohiṇī madirā tathā | anvāroḍhuṃ vyavasitā bhartāraṃ yoṣitāṃ varāḥ
देवकी, भद्रा, रोहिणी और मदिरा, ये श्रेष्ठ स्त्रियाँ अपने पति के पीछे चिता पर चढ़ने का निश्चय कर चुकी थीं।
श्लोक 19 (16.8.19)
ततः शौरिं नृयुक्तेन बहुमूल्येन भारत । यानेन महता पार्थो बहिर्निष्क्रामयत्तदा ॥
tataḥ śauriṃ nṛyuktena bahumūlyena bhārata | yānena mahatā pārtho bahirniṣkrāmayattadā
तब हे भारत, पार्थ ने मनुष्यों द्वारा उठाई जाने वाली एक बड़ी बहुमूल्य शिविका में शौरि को नगर के बाहर निकलवाया।
श्लोक 20 (16.8.20)
तमन्वयुस्तत्रतत्र दुःखशोकसमन्विताः । द्वारकावासिनः सर्वे पौरजानपदा हिताः ॥
tamanvayustatratatra duḥkhaśokasamanvitāḥ | dvārakāvāsinaḥ sarve paurajānapadā hitāḥ
दुःख और शोक से पीड़ित द्वारका के सब निवासी, नगर और देहात के हितैषी लोग, जगह-जगह उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 21 (16.8.21)
तस्याश्वमेधिकं छत्रं दीप्यमानाश्च पावकाः । पुरस्तात्तस्य यानस्य याजकाश्च ततो ययुः ॥
tasyāśvamedhikaṃ chatraṃ dīpyamānāśca pāvakāḥ | purastāttasya yānasya yājakāśca tato yayuḥ
उनके यान के आगे उनका अश्वमेध का छत्र, प्रज्वलित अग्नियाँ और फिर यज्ञ कराने वाले ऋत्विज् चले।
श्लोक 22 (16.8.22)
अनुजग्मुश्च तं वीरं देव्यस्ता वै स्वलङ्कृताः । स्त्रीसहस्रैः परिवृता वधूभिश्च सहस्रशः ॥
anujagmuśca taṃ vīraṃ devyastā vai svalaṅkṛtāḥ | strīsahasraiḥ parivṛtā vadhūbhiśca sahasraśaḥ
उनकी रानियाँ, भली-भाँति अलंकृत होकर, हज़ारों स्त्रियों और हज़ारों वधुओं से घिरी हुई उस वीर के पीछे-पीछे चलीं।
श्लोक 23 (16.8.23)
यस्तु देशः प्रियस्तस्य जीवतोऽभून्महात्मनः । तत्रैनमुपसंकल्प्य पितृमेधं प्रचक्रिरे ॥
yastu deśaḥ priyastasya jīvato'bhūnmahātmanaḥ | tatrainamupasaṃkalpya pitṛmedhaṃ pracakrire
जो स्थान उन महात्मा को जीवन में प्रिय था, वहीं उन्हें रखकर उन्होंने पितृमेध (अन्त्येष्टि) कर्म किया।
श्लोक 24 (16.8.24)
तं चिताग्निगतं वीरं शूरपुत्रं वराङ्गनाः । ततोन्वारुरुहुः पत्न्यश्चतस्रः पतिलोकगाः ॥
taṃ citāgnigataṃ vīraṃ śūraputraṃ varāṅganāḥ | tatonvāruruhuḥ patnyaścatasraḥ patilokagāḥ
चिता पर रखे गए शूरपुत्र उस वीर के पीछे उनकी चार सुन्दरी पत्नियाँ पतिलोक जाने के लिए चिता पर चढ़ गईं।
श्लोक 25 (16.8.25)
तं वै चतसृभिः स्त्रीभिरन्वितं पाण्डुनन्दनः । अदाहयच्चन्दनैश्च गन्धैरुच्चावचैरपि ॥
taṃ vai catasṛbhiḥ strībhiranvitaṃ pāṇḍunandanaḥ | adāhayaccandanaiśca gandhairuccāvacairapi
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने चार पत्नियों सहित उनका दाह चन्दन और नाना प्रकार के सुगन्धित काष्ठों से किया।
श्लोक 26 (16.8.26)
ततः प्रादुरभूच्छब्दः समिद्धस्य विभावसोः । सामगानां च निर्घोषो नराणां रुदतामपि ॥
tataḥ prādurabhūcchabdaḥ samiddhasya vibhāvasoḥ | sāmagānāṃ ca nirghoṣo narāṇāṃ rudatāmapi
तब प्रज्वलित अग्नि का शब्द, सामगान की ध्वनि और रोते हुए मनुष्यों का क्रन्दन एक साथ उठा।
श्लोक 27 (16.8.27)
ततो वज्रप्रधानास्ते वृष्ण्यन्धककुमारकाः । सर्वे चैवोदकं चक्रुः स्त्रियश्चैव महात्मनः ॥
tato vajrapradhānāste vṛṣṇyandhakakumārakāḥ | sarve caivodakaṃ cakruḥ striyaścaiva mahātmanaḥ
तब वज्र को आगे करके वृष्णि और अन्धकों के कुमारों ने तथा स्त्रियों ने भी उन महात्मा के लिए जलांजलि दी।
श्लोक 28 (16.8.28)
अलुप्तधर्मस्तं धर्मं कारयित्वा स फल्गुनः । जगाम वृष्णयो यत्र विनष्टा भरतर्षभ ॥
aluptadharmastaṃ dharmaṃ kārayitvā sa phalgunaḥ | jagāma vṛṣṇayo yatra vinaṣṭā bharatarṣabha
धर्म से कभी न चूकने वाले फल्गुन ने वह कर्म करवाकर, हे भरतश्रेष्ठ, उस स्थान की ओर प्रस्थान किया जहाँ वृष्णि मारे गए थे।
श्लोक 29 (16.8.29)
स तान्दृष्ट्वा निपतितान्कदने भृशदुःखितः । बभूवातीव कौरव्यः प्राप्तकालं चकार ह ॥
sa tāndṛṣṭvā nipatitānkadane bhṛśaduḥkhitaḥ | babhūvātīva kauravyaḥ prāptakālaṃ cakāra ha
उन्हें रणभूमि में पड़ा देखकर वह कुरुवंशी अत्यन्त दुःखी हुआ और उसने समयोचित कर्म किया।
श्लोक 30 (16.8.30)
यथाप्रधानतश्चैव चक्रे सर्वास्तथा क्रियाः । ये हता ब्रह्मशापेन मुसलैरेरकोद्भवैः ॥
yathāpradhānataścaiva cakre sarvāstathā kriyāḥ | ye hatā brahmaśāpena musalairerakodbhavaiḥ
ब्राह्मणों के शाप से एरका-घास से उपजे मूसलों द्वारा जो मारे गए थे, उन सबके सब संस्कार उसने प्रधानता के क्रम से किए।
श्लोक 31 (16.8.31)
ततो भगवतो देहं दृष्ट्वा शिष्यः प्रलप्य च । स्मृत्वा तद्वचनं सर्वं मोहशोकोपबृंहितः ॥
tato bhagavato dehaṃ dṛṣṭvā śiṣyaḥ pralapya ca | smṛtvā tadvacanaṃ sarvaṃ mohaśokopabṛṃhitaḥ
तब भगवान् के शरीर को देखकर शिष्य विलाप करने लगा, और उनके सब वचनों को स्मरण करके मोह और शोक से दब गया।
श्लोक 32 (16.8.32)
ततः शरीरे रामस्य वासुदेवस्य चोभयोः । अन्वीक्ष्य दाहयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥
tataḥ śarīre rāmasya vāsudevasya cobhayoḥ | anvīkṣya dāhayāmāsa puruṣairāptakāribhiḥ
फिर उसने राम और वासुदेव दोनों के शरीरों को ढूँढ़ निकाला और विश्वासपात्र पुरुषों से उनका दाह करवाया।
श्लोक 33 (16.8.33)
स तेषां विधिवत्कृत्वा प्रेतकार्याणि पाण्डवः । सप्तमे दिवसे प्रायाद्रथमारुह्य सत्वरः ॥
sa teṣāṃ vidhivatkṛtvā pretakāryāṇi pāṇḍavaḥ | saptame divase prāyādrathamāruhya satvaraḥ
उनके प्रेत-कर्म विधिपूर्वक करके पाण्डव सातवें दिन रथ पर चढ़कर शीघ्रता से चल पड़े।
श्लोक 34 (16.8.34)
अश्वयुक्तै रथैश्चापि गोखरोष्ट्रयुतैरपि । स्त्रियस्ता वृष्णिवीराणां रुदन्त्यः शोककर्शिताः ॥
aśvayuktai rathaiścāpi gokharoṣṭrayutairapi | striyastā vṛṣṇivīrāṇāṃ rudantyaḥ śokakarśitāḥ
घोड़ों से जुते रथों में तथा बैलों, गधों और ऊँटों से जुते वाहनों में वृष्णि-वीरों की स्त्रियाँ, रोती हुई और शोक से दुर्बल,
श्लोक 35 (16.8.35)
अनुजग्मुर्महात्मानं पाण्डुपुत्रं धनंजयम् । भृत्याश्चान्धकवृष्णीनां सादिनो रथिनश्च ये ॥
anujagmurmahātmānaṃ pāṇḍuputraṃ dhanaṃjayam | bhṛtyāścāndhakavṛṣṇīnāṃ sādino rathinaśca ye
महात्मा पाण्डुपुत्र धनंजय के पीछे चलीं; अन्धकों और वृष्णियों के सेवक, घुड़सवार और रथी भी,
श्लोक 36 (16.8.36)
वीरहीना वृद्धबालाः पौरजानपदास्तथा । ययुस्ते परिवार्याथ कलत्रं पार्थशासनात् ॥
vīrahīnā vṛddhabālāḥ paurajānapadāstathā | yayuste parivāryātha kalatraṃ pārthaśāsanāt
और वीरों से हीन वृद्ध तथा बालक, नगर और जनपद के लोगों के साथ, पार्थ की आज्ञा से स्त्रियों को घेरकर चले।
श्लोक 37 (16.8.37)
कुञ्जरैश्च गजारोहा ययुः शैलनिभैस्तथा । सपादरक्षैः संयुक्ताः सोत्तरायुधिका ययुः ॥
kuñjaraiśca gajārohā yayuḥ śailanibhaistathā | sapādarakṣaiḥ saṃyuktāḥ sottarāyudhikā yayuḥ
पर्वत जैसे विशाल हाथियों पर सवार हाथीवान चले, और पैदल रक्षकों सहित शस्त्र लिए हुए सैनिक भी चले।
श्लोक 38 (16.8.38)
पुत्राश्चान्धकवृष्णीनां सर्वे पार्थमनुव्रताः । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महाधनाः ॥
putrāścāndhakavṛṣṇīnāṃ sarve pārthamanuvratāḥ | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścaiva mahādhanāḥ
अन्धकों और वृष्णियों के सब पुत्र, जो पार्थ के अनुयायी थे, तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और धनी शूद्र भी चले।
श्लोक 39 (16.8.39)
दश षट् च सहस्राणि वासुदेवावरोधनम् । पुरस्कृत्य ययुर्वज्रं पौत्रं कृष्णस्य धीमतः ॥
daśa ṣaṭ ca sahasrāṇi vāsudevāvarodhanam | puraskṛtya yayurvajraṃ pautraṃ kṛṣṇasya dhīmataḥ
वासुदेव के अन्तःपुर की सोलह हज़ार स्त्रियाँ बुद्धिमान कृष्ण के पौत्र वज्र को आगे करके चलीं।
श्लोक 40 (16.8.40)
बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । भोजवृष्ण्यन्धकस्त्रीणां हतनाथानि निर्ययुः ॥
bahūni ca sahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | bhojavṛṣṇyandhakastrīṇāṃ hatanāthāni niryayuḥ
भोजों, वृष्णियों और अन्धकों की स्त्रियाँ, जिनके रक्षक मारे जा चुके थे, अनेक हज़ार, लाख और करोड़ की संख्या में निकलीं।
श्लोक 41 (16.8.41)
तत्सागरसमप्रख्यं वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत् । उवाह रथिनांश्रेष्ठः पार्थः परपुरंजयः ॥
tatsāgarasamaprakhyaṃ vṛṣṇicakraṃ maharddhimat | uvāha rathināṃśreṣṭhaḥ pārthaḥ parapuraṃjayaḥ
समुद्र के समान विशाल उस समृद्ध वृष्णि-समूह का नेतृत्व रथियों में श्रेष्ठ, शत्रुनगरों को जीतने वाले पार्थ ने किया।
श्लोक 42 (16.8.42)
निर्याते तु जने तस्मिन्सागरो मकरालयः । द्वारकां रत्नसंपूर्णां जलेनाप्लावयत्तदा ॥
niryāte tu jane tasminsāgaro makarālayaḥ | dvārakāṃ ratnasaṃpūrṇāṃ jalenāplāvayattadā
जब लोग निकल गए, तब मगरमच्छों के निवास समुद्र ने रत्नों से भरी द्वारका को जल से डुबो दिया।
श्लोक 43 (16.8.43)
यद्यद्धि पुरुषव्याघ्रो भूमेस्तस्या व्यमुञ्चत । तत्तत्संप्लावयामास सलिलेन स सागरः ॥
yadyaddhi puruṣavyāghro bhūmestasyā vyamuñcata | tattatsaṃplāvayāmāsa salilena sa sāgaraḥ
उस भूमि के जिस-जिस भाग को वह पुरुषसिंह छोड़ता गया, उस-उस को वह समुद्र जल से डुबोता गया।
श्लोक 44 (16.8.44)
तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य द्वारकावासिनो जनाः । तूर्णात्तूर्णतरं जग्मुरहो दैवमिति ब्रुवन् ॥
tadadbhutamabhiprekṣya dvārakāvāsino janāḥ | tūrṇāttūrṇataraṃ jagmuraho daivamiti bruvan
उस अद्भुत दृश्य को देखकर द्वारकावासी, "अहो दैव!" कहते हुए और भी तेज़ चलने लगे।
श्लोक 45 (16.8.45)
काननेषु च रम्येषु पर्वतेषु नदीषु च । निवसन्नानयामास वृष्णिदारान्धनंजयः ॥
kānaneṣu ca ramyeṣu parvateṣu nadīṣu ca | nivasannānayāmāsa vṛṣṇidārāndhanaṃjayaḥ
सुन्दर वनों, पर्वतों और नदियों के पास ठहरते हुए धनंजय वृष्णि-स्त्रियों को आगे ले जाते रहे।
श्लोक 46 (16.8.46)
स पञ्चनदमासाद्य धीमानतिसमृद्धिमत् । देशे गोपशुधान्याढ्ये निवासमकरोत्प्रभुः ॥
sa pañcanadamāsādya dhīmānatisamṛddhimat | deśe gopaśudhānyāḍhye nivāsamakarotprabhuḥ
बुद्धिमान प्रभु अर्जुन अत्यन्त समृद्ध पंचनद प्रदेश में पहुँचे, जो गौओं, पशुओं और अन्न से भरा था, और वहीं पड़ाव डाला।
श्लोक 47 (16.8.47)
ततो लोभः समभवद्दस्यूनां निहतेश्वराः । दृष्ट्वा स्त्रियो नीयमानाः पार्थेनैकेन भारत ॥
tato lobhaḥ samabhavaddasyūnāṃ nihateśvarāḥ | dṛṣṭvā striyo nīyamānāḥ pārthenaikena bhārata
तब हे भारत, पार्थ अकेले को स्त्रियों को ले जाते देखकर, स्वामी-रहित उन लुटेरों में लोभ उत्पन्न हुआ।
श्लोक 48 (16.8.48)
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतसः । आभीरा मन्त्रयामासुः समेत्याशुभदर्शनाः ॥
tataste pāpakarmāṇo lobhopahatacetasaḥ | ābhīrā mantrayāmāsuḥ sametyāśubhadarśanāḥ
तब उन पापकर्मी, अशुभ दिखने वाले आभीरों ने, जिनके चित्त लोभ से मारे गए थे, इकट्ठे होकर मन्त्रणा की।
आभीरा ऊचुः
श्लोक 49 (16.8.49)
अयमेकोऽर्जुनो धन्वी वृद्धबालं हतेश्वरम् । नयत्यस्मानतिक्रम्य योधाश्चेमे हतौजसः ॥
ayameko'rjuno dhanvī vṛddhabālaṃ hateśvaram | nayatyasmānatikramya yodhāśceme hataujasaḥ
"यह अर्जुन अकेला धनुर्धर है, स्वामी-रहित वृद्धों और बालकों को हमारे पास से गुज़ारकर ले जा रहा है, और ये योद्धा तेजहीन हो चुके हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 50 (16.8.50)
ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः । अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्त्रहारिणः ॥
tato yaṣṭipraharaṇā dasyavaste sahasraśaḥ | abhyadhāvanta vṛṣṇīnāṃ taṃ janaṃ loptrahāriṇaḥ
तब लाठियों के हथियार लिए हज़ारों लुटेरे लूट के इरादे से उस वृष्णि-जनसमूह पर टूट पड़े।
श्लोक 51 (16.8.51)
महता सिंहनादेन त्रासयन्तः पृथग्जनम् । अभिपेतुर्धनार्थं ते कालपर्यायचोदिताः ॥
mahatā siṃhanādena trāsayantaḥ pṛthagjanam | abhipeturdhanārthaṃ te kālaparyāyacoditāḥ
बड़े सिंहनाद से साधारण लोगों को डराते हुए वे काल के चक्र से प्रेरित होकर धन के लिए टूट पड़े।
श्लोक 52 (16.8.52)
ततो निवृत्तः कौन्तेयः सहसा सपदानुगः । उवाच तान्महाबाहुरर्जुनः प्रहसन्निव ॥
tato nivṛttaḥ kaunteyaḥ sahasā sapadānugaḥ | uvāca tānmahābāhurarjunaḥ prahasanniva
तब महाबाहु कुन्तीपुत्र अर्जुन अपने अनुचरों सहित सहसा लौटे और मानो हँसते हुए उनसे बोले:
अर्जुन उवाच
श्लोक 53 (16.8.53)
निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि जीवितुमिच्छथ । इदानीं शरनिर्भिन्नाः शोचध्वं निहता मया ॥
nivartadhvamadharmajñā yadi jīvitumicchatha | idānīṃ śaranirbhinnāḥ śocadhvaṃ nihatā mayā
"हे अधर्म को न जानने वालो, यदि जीना चाहते हो तो लौट जाओ। अब मेरे बाणों से बिंधकर, मेरे हाथों मारे जाकर तुम शोक करोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (16.8.54)
तथोक्तास्तेन वीरेण कदर्थीकृत्य तद्वचः । अभिपेतुर्जनं मूढा वार्यमाणाः पुनःपुनः ॥
tathoktāstena vīreṇa kadarthīkṛtya tadvacaḥ | abhipeturjanaṃ mūḍhā vāryamāṇāḥ punaḥpunaḥ
वीर अर्जुन के इस प्रकार कहने पर भी उन मूढ़ों ने उनकी बात की अवहेलना की और बार-बार रोके जाने पर भी लोगों पर टूट पड़े।
श्लोक 55 (16.8.55)
ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत् । आरोपयितुमारेभे यत्नादिव कथञ्चन ॥
tato'rjuno dhanurdivyaṃ gāṇḍīvamajaraṃ mahat | āropayitumārebhe yatnādiva kathañcana
तब अर्जुन ने अपने महान्, दिव्य, अजर गाण्डीव धनुष को मानो बड़े यत्न से किसी तरह चढ़ाना आरम्भ किया।
श्लोक 56 (16.8.56)
चकार सज्यं कृच्छ्रेण सम्भ्रमे तुमुले सति । चिन्तयामास शस्त्राणि न च सस्मार तान्यपि ॥
cakāra sajyaṃ kṛcchreṇa sambhrame tumule sati | cintayāmāsa śastrāṇi na ca sasmāra tānyapi
उस घबराहट और कोलाहल के बीच उसने कठिनाई से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई; अपने अस्त्रों का चिन्तन किया, पर वे उसे याद नहीं आए।
श्लोक 57 (16.8.57)
वैकृतं तन्महद्दृष्ट्वा भुजवीर्ये तथा युधि । दिव्यानां च महास्त्राणां विनाशाद्व्रीडितोऽभवत् ॥
vaikṛtaṃ tanmahaddṛṣṭvā bhujavīrye tathā yudhi | divyānāṃ ca mahāstrāṇāṃ vināśādvrīḍito'bhavat
युद्ध में अपनी भुजाओं के बल में यह बड़ा विकार और दिव्य महास्त्रों का नाश देखकर वह लज्जित हो गया।
श्लोक 58 (16.8.58)
वृष्णियोधाश्च ते सर्वे गजाश्वरथयोधिनः । न शेकुरावर्तयितुं ह्रियमाणं स्वकं धनम् ॥
vṛṣṇiyodhāśca te sarve gajāśvarathayodhinaḥ | na śekurāvartayituṃ hriyamāṇaṃ svakaṃ dhanam
और गज, अश्व और रथों पर चलने वाले वे सब वृष्णि-योद्धा भी अपने उस धन को, जो छीना जा रहा था, लौटा न सके।
श्लोक 59 (16.8.59)
कलत्रस्य बहुत्वाद्धि सम्पतत्सु ततस्ततः । प्रयत्नमकरोत्पार्थो जनस्य परिरक्षणे ॥
kalatrasya bahutvāddhi sampatatsu tatastataḥ | prayatnamakarotpārtho janasya parirakṣaṇe
स्त्रियों की संख्या बहुत होने से, जो इधर-उधर बिखर रही थीं, पार्थ ने लोगों की रक्षा के लिए बहुत प्रयत्न किया।
श्लोक 60 (16.8.60)
मिषतां सर्वयोधानां ततस्ताः प्रमदोत्तमाः । समन्ततोवकृष्यन्त कामाच्चान्याः प्रवव्रजुः ॥
miṣatāṃ sarvayodhānāṃ tatastāḥ pramadottamāḥ | samantatovakṛṣyanta kāmāccānyāḥ pravavrajuḥ
सब योद्धाओं के देखते-देखते वे उत्तम स्त्रियाँ चारों ओर से घसीटी जाने लगीं, और कुछ अपनी इच्छा से ही चली गईं।
श्लोक 61 (16.8.61)
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैः पार्थो धनंजयः । जघान दस्यून्सोद्वेगो वृष्णिभृत्यैः सहस्रशः ॥
tato gāṇḍīvanirmuktaiḥ śaraiḥ pārtho dhanaṃjayaḥ | jaghāna dasyūnsodvego vṛṣṇibhṛtyaiḥ sahasraśaḥ
तब गाण्डीव से छूटे बाणों से व्याकुल पार्थ धनंजय ने वृष्णियों के सेवकों के साथ हज़ारों लुटेरों को मारा।
श्लोक 62 (16.8.62)
क्षणेन तस्य ते राजन्क्षयं जग्मुरजिह्मगाः । अक्षया हि पुरा भूत्वा क्षीणाः क्षतजभोजनाः ॥
kṣaṇena tasya te rājankṣayaṃ jagmurajihmagāḥ | akṣayā hi purā bhūtvā kṣīṇāḥ kṣatajabhojanāḥ
हे राजन्, क्षण भर में उसके सीधे उड़ने वाले बाण समाप्त हो गए; जो पहले अक्षय थे, वे रक्त पीने वाले बाण अब चुक गए।
श्लोक 63 (16.8.63)
स शरक्षयमासाद्य दुःखशोकसमाहतः । धनुष्कोट्या तदा दस्यूनवधीत्पाकशासनिः ॥
sa śarakṣayamāsādya duḥkhaśokasamāhataḥ | dhanuṣkoṭyā tadā dasyūnavadhītpākaśāsaniḥ
बाण चुक जाने पर दुःख और शोक से व्याकुल इन्द्रपुत्र ने तब धनुष की नोक से लुटेरों को मारा।
श्लोक 64 (16.8.64)
प्रेक्षतस्त्वेव पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवरस्त्रियः । जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समन्ताज्जनमेजय ॥
prekṣatastveva pārthasya vṛṣṇyandhakavarastriyaḥ | jagmurādāya te mlecchāḥ samantājjanamejaya
परन्तु हे जनमेजय, पार्थ के देखते-देखते वे म्लेच्छ वृष्णियों और अन्धकों की श्रेष्ठ स्त्रियों को चारों ओर ले भागे।
श्लोक 65 (16.8.65)
धनंजयस्तु दैवं तन्मनसाऽचिन्तयत्प्रभुः । दुःखशोकसमाविष्टो निःश्वासपरमोऽभवत् ॥
dhanaṃjayastu daivaṃ tanmanasā'cintayatprabhuḥ | duḥkhaśokasamāviṣṭo niḥśvāsaparamo'bhavat
प्रभु धनंजय ने मन में इसे दैव ही समझा; दुःख और शोक से भरे वे लम्बी साँसें लेने लगे।
श्लोक 66 (16.8.66)
अस्त्राणां च प्रणाशेन बाहुवीर्यस्य च क्षयात् । धनुषश्चाविधेयत्वाच्छराणां संक्षयेण च ॥
astrāṇāṃ ca praṇāśena bāhuvīryasya ca kṣayāt | dhanuṣaścāvidheyatvāccharāṇāṃ saṃkṣayeṇa ca
अस्त्रों के नष्ट होने, भुजाओं के बल के क्षीण होने, धनुष के वश में न रहने और बाणों के चुक जाने से,
श्लोक 67 (16.8.67)
बभूव विमनाः पार्थो दैवमित्यनुचिन्तयन् । न्यवर्तत ततो राजन्नेदमस्तीति चिन्तयन् ॥
babhūva vimanāḥ pārtho daivamityanucintayan | nyavartata tato rājannedamastīti cintayan
"यह दैव है" ऐसा सोचते हुए पार्थ उदास हो गए, और हे राजन्, "ऐसा नहीं होना चाहिए था" यह सोचते हुए लौट पड़े।
श्लोक 68 (16.8.68)
ततः शेषं समादाय कलत्रस्य महामतिः । हृतभूयिष्ठरत्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरत् ॥
tataḥ śeṣaṃ samādāya kalatrasya mahāmatiḥ | hṛtabhūyiṣṭharatnasya kurukṣetramavātarat
तब उस बुद्धिमान ने उन स्त्रियों के बचे हुए समूह को, जिनके अधिकांश रत्न लुट चुके थे, साथ लिया और कुरुक्षेत्र में उतरा।
श्लोक 69 (16.8.69)
युधिष्ठिरस्यानुमते वंशकर्तॄन्कुमारकान् । न्यवेशयत कौरव्यस्तत्रतत्र धनंजयः ॥
yudhiṣṭhirasyānumate vaṃśakartṝnkumārakān | nyaveśayata kauravyastatratatra dhanaṃjayaḥ
युधिष्ठिर की अनुमति से कुरुवंशी धनंजय ने वंश चलाने वाले कुमारों को जहाँ-तहाँ बसाया।
श्लोक 70 (16.8.70)
हार्दिक्यतनयं पार्थो नगरे मृत्तिकावते । अश्वपतिं खाण्डवारण्ये राज्ये तत्र न्यवेशयत् । भोजराजकलत्रं च हृतशेषं नरोत्तमः ॥
hārdikyatanayaṃ pārtho nagare mṛttikāvate | aśvapatiṃ khāṇḍavāraṇye rājye tatra nyaveśayat | bhojarājakalatraṃ ca hṛtaśeṣaṃ narottamaḥ
हार्दिक्य के पुत्र को पार्थ ने मृत्तिकावत नगर में बसाया; अश्वपति को खाण्डव वन के उस राज्य में बसाया; और भोजराज की बची हुई स्त्रियों को उस नरश्रेष्ठ ने भी बसाया।
श्लोक 71 (16.8.71)
तथा वृद्धांश्च बालांश्च स्त्रियश्चादाय पाण्डवः । वीरैर्विहीनान्सर्वांस्ताञ्शक्रप्रस्थे न्यवेशयत् ॥
tathā vṛddhāṃśca bālāṃśca striyaścādāya pāṇḍavaḥ | vīrairvihīnānsarvāṃstāñśakraprasthe nyaveśayat
वीरों से हीन उन सब वृद्धों, बालकों और स्त्रियों को साथ लेकर पाण्डव ने शक्रप्रस्थ में बसाया।
श्लोक 72 (16.8.72)
यौयुधानिं सरस्वत्याः पुत्रं सात्यकिनः प्रियम् । न्यवेशयत धर्मात्मा वृद्धबालपुरस्कृतम् ॥
yauyudhāniṃ sarasvatyāḥ putraṃ sātyakinaḥ priyam | nyaveśayata dharmātmā vṛddhabālapuraskṛtam
सात्यकि के प्रिय पुत्र यौयुधानि को धर्मात्मा अर्जुन ने सरस्वती के प्रदेश में बसाया, वृद्धों और बालकों को उसके आगे रखकर।
श्लोक 73 (16.8.73)
इन्द्रप्रस्थे ददौ राज्यं वज्राय परवीरहा । वज्रेणाक्रूरदारास्तु वार्यमाणाः प्रवव्रजुः ॥
indraprasthe dadau rājyaṃ vajrāya paravīrahā | vajreṇākrūradārāstu vāryamāṇāḥ pravavrajuḥ
शत्रु-वीरों के संहारक अर्जुन ने इन्द्रप्रस्थ का राज्य वज्र को दिया; पर अक्रूर की पत्नियाँ, वज्र के रोकने पर भी, वन को चली गईं।
श्लोक 74 (16.8.74)
रुक्मिणी त्वथ गान्धारी शैब्या हैमवतीत्यपि । देवी जाम्बवती चैव विविशुर्जातवेदसम् ॥
rukmiṇī tvatha gāndhārī śaibyā haimavatītyapi | devī jāmbavatī caiva viviśurjātavedasam
रुक्मिणी, गान्धारी, शैब्या, हैमवती और देवी जाम्बवती ने अग्नि में प्रवेश किया।
श्लोक 75 (16.8.75)
सत्यभामा तथैवान्या देव्यः कृष्णस्य सम्मताः । वनं प्रविविशू राजंस्तापस्ये कृतनिश्चयाः ॥
satyabhāmā tathaivānyā devyaḥ kṛṣṇasya sammatāḥ | vanaṃ praviviśū rājaṃstāpasye kṛtaniścayāḥ
हे राजन्, सत्यभामा तथा कृष्ण की अन्य प्रिय रानियाँ तपस्या का निश्चय करके वन में चली गईं।
श्लोक 76 (16.8.76)
द्वारकावासिनो ये पुरुषाः पार्थमभ्ययुः । यथार्हं संविभज्यैनान्वज्रे पर्यददज्जयः ॥
dvārakāvāsino ye puruṣāḥ pārthamabhyayuḥ | yathārhaṃ saṃvibhajyainānvajre paryadadajjayaḥ
द्वारका के जो पुरुष पार्थ के साथ आए थे, उन्हें यथायोग्य बाँटकर विजयी अर्जुन ने वज्र को सौंप दिया।
श्लोक 77 (16.8.77)
स तत्कृत्वा प्राप्तकालं बाष्पेणापिहितोऽर्जुनः । कृष्णद्वैपायनं व्यासं ददर्शासीनमाश्रमे ॥
sa tatkṛtvā prāptakālaṃ bāṣpeṇāpihito'rjunaḥ | kṛṣṇadvaipāyanaṃ vyāsaṃ dadarśāsīnamāśrame
समयोचित कार्य पूरा करके आँसुओं से ढकी आँखों वाले अर्जुन ने कृष्ण द्वैपायन व्यास को आश्रम में बैठे देखा।