मौसल पर्व · अध्याय 7
वसुदेव का विलाप
अर्जुन वसुदेव से मिलते हैं; वे उन्हें गले लगाकर अपने मारे गए पुत्रों और बन्धुओं के लिए रोते हैं। वसुदेव यादवों के विनाश का कारण शाप तथा प्रद्युम्न और सात्यकि की भूल को बताते हैं, और कहते हैं कि बलराम सहित वन को जाने से पहले कृष्ण ने कहा था कि अर्जुन आएँगे, समुद्र द्वारका को डुबो देगा, और अर्जुन को स्वयं कृष्ण ही मानना। वसुदेव कहते हैं कि वे न खाएँगे, न जिएँगे, और राज्य, स्त्रियाँ तथा रत्न अर्जुन को सौंप देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (16.7.1)
तं प्रविष्टं महात्मानं वीरमानकदुन्दुभिः । पुत्रशोकेन संतप्तो ददर्श कुरुपुङ्गवम् ॥
taṃ praviṣṭaṃ mahātmānaṃ vīramānakadundubhiḥ | putraśokena saṃtapto dadarśa kurupuṅgavam
पुत्र के शोक से सन्तप्त आनकदुन्दुभि (वसुदेव) ने भीतर आए हुए उस महात्मा वीर, कुरुश्रेष्ठ अर्जुन को देखा।
श्लोक 2 (16.7.2)
तस्याश्रुपरिपूर्णाक्षो व्यूढोरस्को महाभुजः । आर्तस्यार्ततरः पार्थः पादौ जग्राह भारत ॥
tasyāśruparipūrṇākṣo vyūḍhorasko mahābhujaḥ | ārtasyārtataraḥ pārthaḥ pādau jagrāha bhārata
हे भारत, आँसुओं से भरी आँखों वाले, चौड़ी छाती और लम्बी भुजाओं वाले पार्थ ने, जो स्वयं दुःखी वसुदेव से भी अधिक दुःखी थे, उनके चरण पकड़ लिए।
श्लोक 3 (16.7.3)
तस्य मूर्धानमाघ्रातुमियेषानकदुन्दुभिः । स्वस्रीयस्य महाबाहुर्न शशाक च शत्रुहन् ॥
tasya mūrdhānamāghrātumiyeṣānakadundubhiḥ | svasrīyasya mahābāhurna śaśāka ca śatruhan
आनकदुन्दुभि अपने भानजे का मस्तक सूँघना (चूमना) चाहते थे, पर वे महाबाहु शत्रुहन्ता वसुदेव वैसा न कर सके।
श्लोक 4 (16.7.4)
समालिङ्ग्यार्जुनं वृद्धः स भुजाभ्यां महाभुजः । रुरोदाथ स्मरञ्शौरिं विललाप सुविह्वलः । भ्रातॄन्पुत्रांश्च पौत्रांश्च दौहित्रान्स सखीनपि ॥
samāliṅgyārjunaṃ vṛddhaḥ sa bhujābhyāṃ mahābhujaḥ | rurodātha smarañśauriṃ vilalāpa suvihvalaḥ | bhrātṝnputrāṃśca pautrāṃśca dauhitrānsa sakhīnapi
उस वृद्ध महाबाहु ने अर्जुन को दोनों भुजाओं में भर लिया और रो पड़े; शौरि का स्मरण करते हुए वे अत्यन्त व्याकुल होकर विलाप करने लगे, और अपने भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, दौहित्रों तथा मित्रों के लिए भी रोते रहे।
वसुदेव उवाच
श्लोक 5 (16.7.5)
यैर्जिता भूमिपालाश्च दैत्याश्च शतशोऽर्जुन । तान्सर्वान्नेह पश्यामि जीवाम्यर्जुन दुर्मरः ॥
yairjitā bhūmipālāśca daityāśca śataśo'rjuna | tānsarvānneha paśyāmi jīvāmyarjuna durmaraḥ
"अर्जुन, जिन्होंने सैकड़ों राजाओं और दैत्यों को जीता था, उन सबको मैं यहाँ अब नहीं देखता, फिर भी मैं जी रहा हूँ, अर्जुन; मरना कितना कठिन है!
श्लोक 6 (16.7.6)
यौ तावर्जुनशिष्यौ ते प्रियौ बहुमतौ सदा । तयोरपनयात्पार्थ वृष्णयो निधनं गताः ॥
yau tāvarjunaśiṣyau te priyau bahumatau sadā | tayorapanayātpārtha vṛṣṇayo nidhanaṃ gatāḥ
वे जो तुम्हारे दो शिष्य थे, तुम्हें सदा प्रिय और तुम्हारे द्वारा बहुत माने हुए, हे पार्थ, उन्हीं दोनों की भूल से वृष्णिवंशी विनाश को प्राप्त हुए।
श्लोक 7 (16.7.7)
यौ तौ वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ मतौ । प्रद्युम्नो युयुधानश्च कथयन्कत्थसे च यौ ॥
yau tau vṛṣṇipravīrāṇāṃ dvāvevātirathau matau | pradyumno yuyudhānaśca kathayankatthase ca yau
वे दोनों जो वृष्णि-वीरों में केवल दो ही अतिरथी माने जाते थे, प्रद्युम्न और युयुधान (सात्यकि), जिनकी तुम बढ़-चढ़कर प्रशंसा किया करते थे,
श्लोक 8 (16.7.8)
तौ सदा कुरुशार्दूल कृष्णस्य प्रियभाजनौ । तावुभौ वृष्णिनाशस्य मुखमास्तां धनंजय ॥
tau sadā kuruśārdūla kṛṣṇasya priyabhājanau | tāvubhau vṛṣṇināśasya mukhamāstāṃ dhanaṃjaya
हे कुरुशार्दूल, कृष्ण के वे दोनों सदा के प्रिय पात्र ही, हे धनंजय, वृष्णियों के विनाश के मुख (आरम्भ) बन गए।
श्लोक 9 (16.7.9)
न तु गर्हामि शैनेयं हार्दिक्यं चाहमर्जुन । अक्रूरं रौक्मिणेयं च शापो ह्येवात्र कारणम् ॥
na tu garhāmi śaineyaṃ hārdikyaṃ cāhamarjuna | akrūraṃ raukmiṇeyaṃ ca śāpo hyevātra kāraṇam
फिर भी, अर्जुन, मैं शैनेय (सात्यकि), हार्दिक्य (कृतवर्मा), अक्रूर और रौक्मिणेय (प्रद्युम्न) को दोष नहीं देता; इसमें शाप ही कारण था।
श्लोक 10 (16.7.10)
केशिनं यस्तु कंसं च विक्रम्य हतवान्प्रभुः । विदेहमकरोत्पार्थ चैद्यं च बलगर्वितम् ॥
keśinaṃ yastu kaṃsaṃ ca vikramya hatavānprabhuḥ | videhamakarotpārtha caidyaṃ ca balagarvitam
जिस प्रभु ने पराक्रम से केशी और कंस को मारा और बल के गर्व से भरे चैद्य (शिशुपाल) को, हे पार्थ, देह-रहित कर दिया;
श्लोक 11 (16.7.11)
नैषादिमेकलव्यं च चक्रे कालिङ्गमागधान् । गान्धारान्काशिराजं च मरुभूमौ च पार्थिवान् ॥
naiṣādimekalavyaṃ ca cakre kāliṅgamāgadhān | gāndhārānkāśirājaṃ ca marubhūmau ca pārthivān
जिसने निषादपुत्र एकलव्य, कलिंगों और मगधों, गान्धारों, काशिराज और मरुभूमि के राजाओं को भी वैसा ही कर दिया,
श्लोक 12 (16.7.12)
प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च पार्वतीयांस्तथा नृपान् । सोभ्युपेक्षितवानेवमनयान्मधुसूदनः ॥
prācyāṃśca dākṣiṇātyāṃśca pārvatīyāṃstathā nṛpān | sobhyupekṣitavānevamanayānmadhusūdanaḥ
पूर्व, दक्षिण और पर्वतीय प्रदेशों के राजाओं को भी; उसी मधुसूदन ने इस अनर्थ की उपेक्षा कर दी।
श्लोक 13 (16.7.13)
त्वं हि तं नारदश्चैव मुनयश्च सनातनम् । गोविन्दमनघं देवमभिजानीध्वमच्युतम् ॥
tvaṃ hi taṃ nāradaścaiva munayaśca sanātanam | govindamanaghaṃ devamabhijānīdhvamacyutam
तुम, नारद और ऋषिगण उसे जानते हो: वह सनातन गोविन्द है, निष्पाप देव, अविनाशी अच्युत।
श्लोक 14 (16.7.14)
प्रत्यपश्यच्च स विभुर्ज्ञातिक्षयमधोक्षजः । समुपेक्षितवान्नित्यं स्वयं स मम पुत्रकः ॥
pratyapaśyacca sa vibhurjñātikṣayamadhokṣajaḥ | samupekṣitavānnityaṃ svayaṃ sa mama putrakaḥ
उस सर्वव्यापी अधोक्षज ने अपने कुटुम्बियों के विनाश को सामने देखा था, और मेरा पुत्र होकर भी उसने स्वयं सदा उसकी उपेक्षा की।
श्लोक 15 (16.7.15)
गान्धार्या वचनं यत्तदृषीणां च परंतप । तन्नूनमन्यथा कर्तुं नैच्छत्स जगतः प्रभुः ॥
gāndhāryā vacanaṃ yattadṛṣīṇāṃ ca paraṃtapa | tannūnamanyathā kartuṃ naicchatsa jagataḥ prabhuḥ
हे परन्तप, गान्धारी ने और ऋषियों ने जो कहा था, उसे जगत्पति ने निश्चय ही अन्यथा करना नहीं चाहा।
श्लोक 16 (16.7.16)
प्रत्यक्षं भवतश्चापि तव पौत्रः परंतप । अश्वत्थाम्ना हतश्चापि जीवितस्तस्य तेजसा । इमांस्तु नैच्छत्स्वान्ज्ञातीन्रक्षितुं च सखा तव ॥
pratyakṣaṃ bhavataścāpi tava pautraḥ paraṃtapa | aśvatthāmnā hataścāpi jīvitastasya tejasā | imāṃstu naicchatsvānjñātīnrakṣituṃ ca sakhā tava
हे परन्तप, तुम्हारी आँखों के सामने ही तुम्हारा पौत्र अश्वत्थामा से मारा जाकर भी उसी के तेज से जी उठा; पर तुम्हारे मित्र ने अपने इन बन्धुओं की रक्षा करना नहीं चाहा।
श्लोक 17 (16.7.17)
ततः पुत्रांश्च पौत्रांश्च भ्रातॄनथ सखींस्तथा । शयानान्निहतान्दृष्ट्वा कृष्णो मामब्रवीदिदम् ॥
tataḥ putrāṃśca pautrāṃśca bhrātṝnatha sakhīṃstathā | śayānānnihatāndṛṣṭvā kṛṣṇo māmabravīdidam
तब अपने पुत्रों, पौत्रों, भाइयों और मित्रों को मरे पड़े देखकर कृष्ण ने मुझसे यह कहा:
वासुदेव उवाच
श्लोक 18 (16.7.18)
सम्प्राप्तोऽद्यायमस्यान्तः कुलस्य भरतर्षभ । आगमिष्यति बीभत्सुरिमां द्वारवतीं पुरीम् । आख्येयं तस्य यद्वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् ॥
samprāpto'dyāyamasyāntaḥ kulasya bharatarṣabha | āgamiṣyati bībhatsurimāṃ dvāravatīṃ purīm | ākhyeyaṃ tasya yadvṛttaṃ vṛṣṇīnāṃ vaiśasaṃ mahat
"हे भरतश्रेष्ठ, इस कुल का अन्त आ पहुँचा है। बीभत्सु इस द्वारवती नगरी में आएँगे। वृष्णियों का जो यह महान् संहार हुआ है, वह उन्हें बताना।
श्लोक 19 (16.7.19)
स तु श्रुत्वा महातेजा यदूनां निधनं प्रभो । आगन्ता क्षिप्रमेवेह न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥
sa tu śrutvā mahātejā yadūnāṃ nidhanaṃ prabho | āgantā kṣiprameveha na me'trāsti vicāraṇā
हे प्रभो, यदुवंशियों के विनाश को सुनकर वे महातेजस्वी तुरन्त यहाँ आएँगे; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 20 (16.7.20)
योऽहं तमर्जुनं विद्धि योऽर्जुनः सोहमेव तु । यद्ब्रूयात्तत्तथा कार्यमिति बुद्ध्यस्व भारत ॥
yo'haṃ tamarjunaṃ viddhi yo'rjunaḥ sohameva tu | yadbrūyāttattathā kāryamiti buddhyasva bhārata
मुझे ही अर्जुन जानो और जो अर्जुन है, वह मैं ही हूँ। वह जो कहे, वैसा ही करना; यह समझ लो, हे भारत।
श्लोक 21 (16.7.21)
स स्त्रीषु प्राप्तकालासु पाण्डवो बालकेषु च । प्रतिपत्स्यति बीभत्सुर्भवतश्चौर्ध्वदेहिकम् ॥
sa strīṣu prāptakālāsu pāṇḍavo bālakeṣu ca | pratipatsyati bībhatsurbhavataścaurdhvadehikam
समय आने पर वह पाण्डव बीभत्सु स्त्रियों और बालकों की व्यवस्था करेगा और तुम्हारी और्ध्वदैहिक क्रिया भी करेगा।
श्लोक 22 (16.7.22)
इमां च नगरीं सद्यः प्रतियाते धनंजये । प्राकाराट्टालकोपेतां समुद्रः प्लावयिष्यति ॥
imāṃ ca nagarīṃ sadyaḥ pratiyāte dhanaṃjaye | prākārāṭṭālakopetāṃ samudraḥ plāvayiṣyati
और धनंजय के लौटते ही समुद्र प्राकारों और अट्टालिकाओं सहित इस नगरी को डुबो देगा।
श्लोक 23 (16.7.23)
अहं देशे तु कस्मिंश्चित्पुण्ये नियममास्थितः । कालं काङ्क्षे सद्य एव रामेण सहितो वने ॥
ahaṃ deśe tu kasmiṃścitpuṇye niyamamāsthitaḥ | kālaṃ kāṅkṣe sadya eva rāmeṇa sahito vane
मैं किसी पवित्र स्थान में नियम धारण करके रहूँगा और शीघ्र ही वन में रामजी के साथ काल की प्रतीक्षा करूँगा।"
वसुदेव उवाच
श्लोक 24 (16.7.24)
एवमुक्त्वा हृषीकेशो मामचिन्त्यपराक्रमः । हित्वा मां बालकैः सार्धं दिशं कामप्यगात्प्रभुः ॥
evamuktvā hṛṣīkeśo māmacintyaparākramaḥ | hitvā māṃ bālakaiḥ sārdhaṃ diśaṃ kāmapyagātprabhuḥ
यह कहकर अचिन्त्य पराक्रमी हृषीकेश, वह प्रभु, मुझे बालकों सहित छोड़कर किसी दिशा में चले गए।
श्लोक 25 (16.7.25)
सोहं तौ च महात्मानौ चिन्तयन्रामकेशवौ । घोरं ज्ञातिवधं चैव न भुञ्जे शोककर्शितः ॥
sohaṃ tau ca mahātmānau cintayanrāmakeśavau | ghoraṃ jñātivadhaṃ caiva na bhuñje śokakarśitaḥ
वही मैं, उन दोनों महात्मा राम और केशव का और अपने बन्धुओं के भयंकर वध का चिन्तन करता हुआ, शोक से सूखकर भोजन नहीं करता।
श्लोक 26 (16.7.26)
न भोक्ष्ये न च जीविष्ये दिष्ट्या प्राप्तोसि पाण्डव । यदुक्तं पार्थ कृष्णेन तत्सर्वमखिलं कुरु ॥
na bhokṣye na ca jīviṣye diṣṭyā prāptosi pāṇḍava | yaduktaṃ pārtha kṛṣṇena tatsarvamakhilaṃ kuru
मैं न खाऊँगा, न जीऊँगा। सौभाग्य से तुम आ गए, हे पाण्डव। हे पार्थ, कृष्ण ने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा-पूरा करो।
श्लोक 27 (16.7.27)
एतत्ते पार्थ राज्यं च स्त्रियो रत्नानि चैव हि । इष्टान्प्राणानहं हीमांस्त्यक्ष्यामि रिपुसूदन ॥
etatte pārtha rājyaṃ ca striyo ratnāni caiva hi | iṣṭānprāṇānahaṃ hīmāṃstyakṣyāmi ripusūdana
हे पार्थ, यह तुम्हारा राज्य है, ये स्त्रियाँ और रत्न भी तुम्हारे हैं। हे शत्रुसूदन, मैं तो ये प्रिय प्राण त्याग दूँगा।"