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सभा पर्व · अध्याय 10

कुबेर की सभा

नारद युधिष्ठिर को तपस्या से प्राप्त वैश्रवण (कुबेर) की सभा का वर्णन करते हैं — सौ योजन लंबी, बादल-सी श्वेत, जिसे गुह्यक आकाश में वहन करते हैं। वे धनपति की उपासना करने वाली अप्सराओं, गन्धर्वों, यक्षों, पर्वतों और पार्षदों के नाम गिनाते हैं, और बताते हैं कि कुबेर के सखा शिव अपने गणों सहित वहाँ विराजते हैं। अंत में वे ब्रह्मा की सभा का वर्णन करने का वचन देते हैं।

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

नारद उवाच

श्लोक 1 (2.10.1)

सभा वैश्रवणी राजञ्शतयोजनमायता । विस्तीर्णा सप्ततिश्चैव योजनानि सितप्रभा ॥

sabhā vaiśravaṇī rājañśatayojanamāyatā | vistīrṇā saptatiścaiva yojanāni sitaprabhā

हे राजन्, वैश्रवण (कुबेर) की सभा सौ योजन लंबी और सत्तर योजन चौड़ी है, और वह श्वेत आभा से दमकती है।

श्लोक 2 (2.10.2)

तपसा निर्जिता राजन्स्वयं वैश्रवणेन सा । शशिप्रभा प्रावरणा कैलासशिखरोपमा ॥

tapasā nirjitā rājansvayaṃ vaiśravaṇena sā | śaśiprabhā prāvaraṇā kailāsaśikharopamā

हे राजन्, वैश्रवण ने स्वयं अपनी तपस्या से इसे प्राप्त किया था। इसका आवरण चन्द्रमा जैसा उज्ज्वल है और यह कैलास के शिखर जैसी दिखती है।

श्लोक 3 (2.10.3)

गुह्यकैरुह्यमाना सा खे विषक्तेव शोभते । दिव्या हेममयैरुच्चैः प्रासादैरुपशोभिता ॥

guhyakairuhyamānā sā khe viṣakteva śobhate | divyā hemamayairuccaiḥ prāsādairupaśobhitā

गुह्यक इसे वहन करते हैं और यह आकाश में टँगी हुई-सी शोभा पाती है। ऊँचे-ऊँचे दिव्य स्वर्ण-प्रासाद इसकी शोभा बढ़ाते हैं।

श्लोक 4 (2.10.4)

महारत्नवती चित्रा दिव्यगन्धा मनोरमा । सिताभ्रशिखराकारा प्लवमानेव दृश्यते ॥

mahāratnavatī citrā divyagandhā manoramā | sitābhraśikharākārā plavamāneva dṛśyate

यह बड़े-बड़े रत्नों से भरी, रंग-बिरंगी, दिव्य सुगन्ध वाली और मनोहर है। श्वेत बादल के शिखर जैसी आकृति वाली यह सभा मानो तैरती हुई दिखाई देती है।

श्लोक 5 (2.10.5)

दिव्या हेममयै रङ्गैर्विद्युद्भिरिव चित्रिता । तस्यां वैश्रवणो राजा विचित्राभरणाम्बरः ॥

divyā hemamayai raṅgairvidyudbhiriva citritā | tasyāṃ vaiśravaṇo rājā vicitrābharaṇāmbaraḥ

यह दिव्य सभा सुनहरे रंगों से ऐसी चित्रित है मानो बिजलियों से। उसमें विचित्र आभूषण और वस्त्र धारण किए राजा वैश्रवण

श्लोक 6 (2.10.6)

स्त्रीसहस्रैर्वृतः श्रीमानास्ते ज्वलितकुण्डलः । सह पत्न्या महाराज ऋद्ध्या सह विराजते ॥

strīsahasrairvṛtaḥ śrīmānāste jvalitakuṇḍalaḥ | saha patnyā mahārāja ṛddhyā saha virājate

हजारों स्त्रियों से घिरे, चमकते कुण्डल पहने, शोभा के साथ विराजते हैं। हे महाराज, धनपति अपनी पत्नी ऋद्धि के साथ सुशोभित होते हैं,

श्लोक 7 (2.10.7)

सर्वाभरणभूषिण्या वपुष्मत्या धनेश्वरः । दिवाकरनिभे पुण्ये दिव्यास्तरणसंवृते । दिव्यपादोपधाने च निषण्णः परमासने ॥

sarvābharaṇabhūṣiṇyā vapuṣmatyā dhaneśvaraḥ | divākaranibhe puṇye divyāstaraṇasaṃvṛte | divyapādopadhāne ca niṣaṇṇaḥ paramāsane

जो सब आभूषणों से सजी और सुन्दर रूप वाली हैं। वे सूर्य के समान दीप्त, पवित्र, दिव्य बिछावन से ढके और दिव्य पाद-पीठ वाले श्रेष्ठ आसन पर बैठे रहते हैं।

श्लोक 8 (2.10.8)

मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन् । सौगन्धिकवनानां च गन्धं गन्धवहो वहन् ॥

mandārāṇāmudārāṇāṃ vanāni pariloḍayan | saugandhikavanānāṃ ca gandhaṃ gandhavaho vahan

उत्तम मन्दार वृक्षों के वनों को हिलाती हुई, सौगन्धिक कमलों के वनों की सुगन्ध लिए हुए,

श्लोक 9 (2.10.9)

नलिन्याश्चालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंह्लादी वायुस्तमुपसेवते ॥

nalinyāścālakākhyāyā nandanasya vanasya ca | śīto hṛdayasaṃhlādī vāyustamupasevate

अलका नाम की कमल-सरोवरी और नन्दन वन की भी गन्ध लेकर, हृदय को आनन्द देने वाली शीतल वायु उनकी सेवा करती है।

श्लोक 10 (2.10.10)

तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः । दिव्यतानैर्महाराज गायन्ति स्म सभागताः ॥

tatra devāḥ sagandharvā gaṇairapsarasāṃ vṛtāḥ | divyatānairmahārāja gāyanti sma sabhāgatāḥ

हे महाराज, वहाँ गन्धर्वों सहित देवता, अप्सराओं के समूहों से घिरे हुए, सभा में एकत्र होकर दिव्य तानों के साथ गाते हैं।

श्लोक 11 (2.10.11)

मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता । चारुनेत्रा घृताची च मेनका पुञ्जिकस्थला ॥

miśrakeśī ca rambhā ca citrasenā śucismitā | cārunetrā ghṛtācī ca menakā puñjikasthalā

मिश्रकेशी और रम्भा, मधुर मुस्कान वाली चित्रसेना, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका, पुञ्जिकस्थला,

श्लोक 12 (2.10.12)

विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा ॥

viśvācī sahajanyā ca pramlocā urvaśī irā

विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा,

श्लोक 13 (2.10.13)

वर्गा च सौरभेयी च समीची बुद्बुदा लता । एताः सहस्रशश्चान्या नृत्तगीतविशारदाः ॥

vargā ca saurabheyī ca samīcī budbudā latā | etāḥ sahasraśaścānyā nṛttagītaviśāradāḥ

वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुद्बुदा और लता — ये तथा नृत्य और गीत में निपुण हजारों अन्य,

श्लोक 14 (2.10.14)

उपतिष्ठन्ति धनदं गन्धर्वाप्सरसां गणाः । अनिशं दिव्यवादित्रैर्नृत्तगीतैश्च सा सभा ॥

upatiṣṭhanti dhanadaṃ gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | aniśaṃ divyavāditrairnṛttagītaiśca sā sabhā

गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह धनदाता कुबेर की सेवा में उपस्थित रहते हैं। दिव्य वाद्यों, नृत्य और गीतों से वह सभा निरन्तर

श्लोक 15 (2.10.15)

अशून्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणैः । किन्नरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथाऽपरे ॥

aśūnyā rucirā bhāti gandharvāpsarasāṃ gaṇaiḥ | kinnarā nāma gandharvā narā nāma tathā'pare

कभी सूनी नहीं रहती और गन्धर्वों तथा अप्सराओं के समूहों से सुन्दर दिखती है। वहाँ किन्नर नाम के गन्धर्व हैं, और नर नाम के दूसरे भी,

श्लोक 16 (2.10.16)

माणिभद्रोऽथ धनदः श्वेतभद्रश्च गुह्यकः । कशेरको गण्डकण्डूः प्रद्योतश्च महाबलः ॥

māṇibhadro'tha dhanadaḥ śvetabhadraśca guhyakaḥ | kaśerako gaṇḍakaṇḍūḥ pradyotaśca mahābalaḥ

माणिभद्र, धनद, गुह्यक श्वेतभद्र, कशेरक, गण्डकण्डू और महाबली प्रद्योत,

श्लोक 17 (2.10.17)

कुस्तम्बरुः पिशाचश्च गजकर्णो विशालकः । वराहकर्णस्ताम्रौष्ठः फलकक्षः फलोदकः ॥

kustambaruḥ piśācaśca gajakarṇo viśālakaḥ | varāhakarṇastāmrauṣṭhaḥ phalakakṣaḥ phalodakaḥ

कुस्तम्बरु, पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताम्रौष्ठ, फलकक्ष, फलोदक,

श्लोक 18 (2.10.18)

हंसचूडः शिखावर्तो हेमनेत्रो विभीषणः । पुष्पाननः पिङ्गलकः शोणितोदः प्रवालकः ॥

haṃsacūḍaḥ śikhāvarto hemanetro vibhīṣaṇaḥ | puṣpānanaḥ piṅgalakaḥ śoṇitodaḥ pravālakaḥ

हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिङ्गलक, शोणितोद, प्रवालक,

श्लोक 19 (2.10.19)

वृक्षवास्यनिकेतश्च चीरवासाश्च भारत । एते चान्ये च बहवो यक्षाः शतसहस्रशः ॥

vṛkṣavāsyaniketaśca cīravāsāśca bhārata | ete cānye ca bahavo yakṣāḥ śatasahasraśaḥ

वृक्षवास्यनिकेत और चीरवासा, हे भारत — ये और दूसरे बहुत-से यक्ष, लाखों की संख्या में।

श्लोक 20 (2.10.20)

सदा भगवती लक्ष्मीस्तत्रैव नलकूबरः । अहं च बहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्विधाः ॥

sadā bhagavatī lakṣmīstatraiva nalakūbaraḥ | ahaṃ ca bahuśastasyāṃ bhavantyanye ca madvidhāḥ

भगवती लक्ष्मी वहाँ सदा रहती हैं, और नलकूबर भी। मैं भी प्रायः वहाँ रहता हूँ, और मेरे जैसे दूसरे भी।

श्लोक 21 (2.10.21)

ब्रह्मर्षयो भवन्त्यत्र तथा देवर्षयोऽपरे । क्रव्यादाश्च तथैवान्ये गन्धर्वाश्च महाबलाः ॥

brahmarṣayo bhavantyatra tathā devarṣayo'pare | kravyādāśca tathaivānye gandharvāśca mahābalāḥ

वहाँ ब्रह्मर्षि रहते हैं और दूसरे देवर्षि भी; इसी प्रकार मांसभक्षी प्राणी और महाबली गन्धर्व भी।

श्लोक 22 (2.10.22)

उपासते महात्मानं तस्यां धनदमीश्वरम् । भगवान्भूतसङ्घैश्च वृतः शतसहस्रशः ॥

upāsate mahātmānaṃ tasyāṃ dhanadamīśvaram | bhagavānbhūtasaṅghaiśca vṛtaḥ śatasahasraśaḥ

उस सभा में वे सब महात्मा स्वामी धनद की उपासना करते हैं। और लाखों भूतगणों से घिरे भगवान् —

श्लोक 23 (2.10.23)

उमापतिः पशुपतिः शूलभृद्भगनेत्रहा । त्र्यम्बको राजशार्दूल देवी च विगतक्लमा ॥

umāpatiḥ paśupatiḥ śūlabhṛdbhaganetrahā | tryambako rājaśārdūla devī ca vigataklamā

उमापति, पशुपति, त्रिशूलधारी, भग के नेत्र नष्ट करने वाले त्र्यम्बक, हे राजसिंह, थकान से रहित देवी के साथ,

श्लोक 24 (2.10.24)

वामनैर्विकटैः कुब्जैः क्षतजाक्षैर्महारवैः । मेदोमांसाशनैरुग्रैरुग्रधन्वा महाबलः ॥

vāmanairvikaṭaiḥ kubjaiḥ kṣatajākṣairmahāravaiḥ | medomāṃsāśanairugrairugradhanvā mahābalaḥ

बौने, विकट, कुबड़े, लाल आँखों वाले, भयंकर गर्जना करने वाले, मेद और मांस खाने वाले उग्र गणों के साथ — वे उग्र धनुषधारी महाबली,

श्लोक 25 (2.10.25)

नानाप्रहरणैरुग्रैर्वातैरिव महाजवैः । वृतः सखायमन्वास्ते सदैव धनदं नृप ॥

nānāpraharaṇairugrairvātairiva mahājavaiḥ | vṛtaḥ sakhāyamanvāste sadaiva dhanadaṃ nṛpa

नाना प्रकार के शस्त्र लिए, वायु के समान वेगवान उन उग्र गणों से घिरे हुए, हे नरेश, अपने सखा धनद के पास सदा बैठे रहते हैं।

श्लोक 26 (2.10.26)

प्रहृष्टाः शतशश्चान्ये बहुशः सपरिच्छदाः । गन्धर्वाणां च पतयो विश्वावसुर्हहा हुहूः ॥

prahṛṣṭāḥ śataśaścānye bahuśaḥ saparicchadāḥ | gandharvāṇāṃ ca patayo viśvāvasurhahā huhūḥ

सैकड़ों अन्य भी, प्रसन्न मन से, बड़ी संख्या में अपने परिजनों के साथ; और गन्धर्वों के अधिपति — विश्वावसु, हाहा और हूहू,

श्लोक 27 (2.10.27)

तुम्बुरुः पर्वतश्चैव शैलूषश्च तथाऽपरः । चित्रसेनश्च गीतज्ञस्तथा चित्ररथोऽपि च ॥

tumburuḥ parvataścaiva śailūṣaśca tathā'paraḥ | citrasenaśca gītajñastathā citraratho'pi ca

तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष और एक अन्य भी, गीत के ज्ञाता चित्रसेन, और चित्ररथ भी —

श्लोक 28 (2.10.28)

एते चान्ये च गन्धर्वा धनेश्वरमुपासते । विद्याधराधिपश्चैव चक्रधर्मा सहानुजैः ॥

ete cānye ca gandharvā dhaneśvaramupāsate | vidyādharādhipaścaiva cakradharmā sahānujaiḥ

ये और दूसरे गन्धर्व धनपति की उपासना करते हैं। और विद्याधरों के अधिपति चक्रधर्मा अपने छोटे भाइयों के साथ

श्लोक 29 (2.10.29)

उपाचरति तत्र स्म धनानामीश्वरं प्रभुम् । किन्नराः शतशस्तत्र धनानामीश्वरं प्रभुम् ॥

upācarati tatra sma dhanānāmīśvaraṃ prabhum | kinnarāḥ śataśastatra dhanānāmīśvaraṃ prabhum

वहाँ धन के स्वामी प्रभु की सेवा करते हैं; सैकड़ों किन्नर भी वहाँ धन के स्वामी प्रभु की सेवा करते हैं।

श्लोक 30 (2.10.30)

आसते चापि राजानो भगदत्तपुरोगमाः । द्रुमः किम्पुरुषेशश्च उपास्ते धनदेश्वरम् ॥

āsate cāpi rājāno bhagadattapurogamāḥ | drumaḥ kimpuruṣeśaśca upāste dhanadeśvaram

भगदत्त आदि राजा भी वहाँ बैठते हैं; और किम्पुरुषों के स्वामी द्रुम धनदेश्वर की उपासना करते हैं।

श्लोक 31 (2.10.31)

राक्षसाधिपतिश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः । सह यक्षैः सगन्धर्वैः सह सर्वैर्निशाचरैः ॥

rākṣasādhipatiścaiva mahendro gandhamādanaḥ | saha yakṣaiḥ sagandharvaiḥ saha sarvairniśācaraiḥ

राक्षसों के अधिपति भी — और महेन्द्र तथा गन्धमादन — यक्षों, गन्धर्वों और सब निशाचरों के साथ,

श्लोक 32 (2.10.32)

विभीषणश्च धर्मिष्ठ उपास्ते भ्रातरं प्रभुम् । हिमवान्पारियात्रश्च विन्ध्यकैलासमन्दराः ॥

vibhīṣaṇaśca dharmiṣṭha upāste bhrātaraṃ prabhum | himavānpāriyātraśca vindhyakailāsamandarāḥ

धर्मनिष्ठ विभीषण, अपने स्वामी भाई की उपासना करते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य, कैलास और मन्दर,

श्लोक 33 (2.10.33)

मलयो दर्दुरश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः । इन्द्रकीलः सुनाभश्च तथा दिव्यौ च पर्वतौ ॥

malayo darduraścaiva mahendro gandhamādanaḥ | indrakīlaḥ sunābhaśca tathā divyau ca parvatau

मलय, दर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन, इन्द्रकील और सुनाभ, तथा दो दिव्य पर्वत —

श्लोक 34 (2.10.34)

एते चान्ये च बहवः सर्वे मेरुपुरोगमाः । उपासते महात्मानं धनानामीश्वरं प्रभुम् ॥

ete cānye ca bahavaḥ sarve merupurogamāḥ | upāsate mahātmānaṃ dhanānāmīśvaraṃ prabhum

ये और बहुत-से दूसरे, सब मेरु को आगे करके, धन के स्वामी महात्मा प्रभु की उपासना करते हैं।

श्लोक 35 (2.10.35)

नन्दीश्वरश्च भगवान्महाकालस्तथैव च । शङ्कुकर्णमुखाः सर्वे दिव्याः पारिषदास्तथा ॥

nandīśvaraśca bhagavānmahākālastathaiva ca | śaṅkukarṇamukhāḥ sarve divyāḥ pāriṣadāstathā

भगवान् नन्दीश्वर, और महाकाल भी, तथा शङ्कुकर्ण आदि सभी दिव्य पार्षद,

श्लोक 36 (2.10.36)

काष्ठः कुटी मुखो दन्ती विजयश्च तपोधिकः । श्वेतश्च वृषभस्तत्र नर्दन्नास्ते महाबलः ॥

kāṣṭhaḥ kuṭī mukho dantī vijayaśca tapodhikaḥ | śvetaśca vṛṣabhastatra nardannāste mahābalaḥ

काष्ठ, कुटी, मुख, दन्ती और तप में बढ़े-चढ़े विजय; और वहाँ महाबली श्वेत वृषभ गर्जना करता हुआ रहता है।

श्लोक 37 (2.10.37)

धनदं राक्षसाश्चान्ये पिशाचाश्च उपासते । पारिषदैः परिवृतमुपायान्तं महेश्वरम् ॥

dhanadaṃ rākṣasāścānye piśācāśca upāsate | pāriṣadaiḥ parivṛtamupāyāntaṃ maheśvaram

अन्य राक्षस और पिशाच भी धनद की उपासना करते हैं। जब पार्षदों से घिरे महेश्वर पधारते हैं,

श्लोक 38 (2.10.38)

सदा हि देवदेवेशं शिवं त्रैलोक्यभावनम् । प्रणम्य मूर्ध्ना पौलस्त्यो बहुरूपमुमापतिम् ॥

sadā hi devadeveśaṃ śivaṃ trailokyabhāvanam | praṇamya mūrdhnā paulastyo bahurūpamumāpatim

तब पौलस्त्य (कुबेर) देवाधिदेव, त्रिलोक के रचयिता, बहुरूप उमापति शिव को सदा सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं,

श्लोक 39 (2.10.39)

ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य महादेवाद्धनेश्वरः । आस्ते कदाचिद्भगवान्भवो धनपतेः सखा ॥

tato'bhyanujñāṃ samprāpya mahādevāddhaneśvaraḥ | āste kadācidbhagavānbhavo dhanapateḥ sakhā

और महादेव से अनुमति पाकर ही धनपति बैठते हैं; क्योंकि धनपति के सखा भगवान् भव कभी-कभी वहाँ विराजते हैं।

श्लोक 40 (2.10.40)

निधिप्रवरमुख्यौ च शङ्खपद्मौ धनेश्वरौ । सर्वान्निधीन्प्रगृह्याथ उपास्तां वै धनेश्वरम् ॥

nidhipravaramukhyau ca śaṅkhapadmau dhaneśvarau | sarvānnidhīnpragṛhyātha upāstāṃ vai dhaneśvaram

निधियों में श्रेष्ठ और प्रमुख, स्वयं धन के स्वामी शङ्ख और पद्म, सारी निधियों को लेकर धनपति की उपासना करते हैं।

श्लोक 41 (2.10.41)

सा सभा तादृशी रम्या मया दृष्टान्तरिक्षगा । पितामहसभां राजन्कीर्तयिष्ये निबोध ताम् ॥

sā sabhā tādṛśī ramyā mayā dṛṣṭāntarikṣagā | pitāmahasabhāṃ rājankīrtayiṣye nibodha tām

ऐसी है वह रमणीय, आकाश में विचरने वाली सभा, जिसे मैंने देखा है। हे राजन्, अब मैं पितामह की सभा का वर्णन करूँगा; उसे सुनो।

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