सभा पर्व · अध्याय 11
ब्रह्मा की सभा
नारद बताते हैं कि मनुष्य-रूप में विचरते सूर्य ने उन्हें ब्रह्मा की सभा के विषय में बताया, और हिमालय पर हजार वर्ष के व्रत के बाद सूर्य उन्हें वहाँ ले गए। उस सभा का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि उसका रूप क्षण-क्षण बदलता है; वह बिना खम्भों के टिकी है और सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि से भी अधिक दमकती है। वहाँ प्रजापति, महर्षि, महाभूत, वेद और शास्त्र, काल के विभाग, देवियाँ, पितरों के सात गण और सभी प्राणी पितामह की उपासना करते हैं, और वे हर अतिथि का यथायोग्य स्वागत करते हैं। अंत में नारद कहते हैं कि मनुष्यों में युधिष्ठिर की सभा सर्वश्रेष्ठ है।
नारद उवाच
श्लोक 1 (2.11.1)
पितामहसभां तात कथ्यमानां निबोध मे । शक्यते या न निर्देष्टुमेवंरूपेति भारत ॥
pitāmahasabhāṃ tāta kathyamānāṃ nibodha me | śakyate yā na nirdeṣṭumevaṃrūpeti bhārata
हे तात, मैं पितामह की उस सभा का वर्णन करता हूँ, सुनो — जिसके विषय में, हे भारत, यह नहीं कहा जा सकता कि वह ऐसे रूप वाली है।
श्लोक 2 (2.11.2)
पुरा देवयुगे राजन्नादित्यो भगवान्दिवः । आगच्छन्मानुषं लोकं दिदृक्षुर्विगतक्लमः ॥
purā devayuge rājannādityo bhagavāndivaḥ | āgacchanmānuṣaṃ lokaṃ didṛkṣurvigataklamaḥ
हे राजन्, प्राचीन काल में देवयुग (कृतयुग) में भगवान् आदित्य थकान से रहित होकर मनुष्य-लोक को देखने की इच्छा से स्वर्ग से यहाँ आए।
श्लोक 3 (2.11.3)
चरन्मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वयम्भुवः । स तामकथयन्मह्यं दृष्ट्वा तत्त्वेन पाण्डव ॥
caranmānuṣarūpeṇa sabhāṃ dṛṣṭvā svayambhuvaḥ | sa tāmakathayanmahyaṃ dṛṣṭvā tattvena pāṇḍava
मनुष्य-रूप में विचरते हुए उन्होंने स्वयम्भू ब्रह्मा की सभा देखी थी, और हे पाण्डुनन्दन, उन्होंने उसका यथार्थ वर्णन मुझसे किया —
श्लोक 4 (2.11.4)
अप्रमेयां सभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ । अनिर्देश्यां प्रभावेण सर्वभूतमनोरमाम् ॥
aprameyāṃ sabhāṃ divyāṃ mānasīṃ bharatarṣabha | anirdeśyāṃ prabhāveṇa sarvabhūtamanoramām
हे भरतश्रेष्ठ, वह सभा अपरिमेय, दिव्य और मन से रची हुई है; अपने प्रभाव में अवर्णनीय और सब प्राणियों के मन को भाने वाली है।
श्लोक 5 (2.11.5)
श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभायाः पाण्डवर्षभ । दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमिदमब्रुवम् ॥
śrutvā guṇānahaṃ tasyāḥ sabhāyāḥ pāṇḍavarṣabha | darśanepsustathā rājannādityamidamabruvam
हे पाण्डवश्रेष्ठ, उस सभा के गुण सुनकर मैं उसे देखने को उत्सुक हुआ, और हे राजन्, मैंने आदित्य से यह कहा —
श्लोक 6 (2.11.6)
भगवन्द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभां शुभाम् । येन वा तपसा शक्या कर्मणा वाऽपि गोपते ॥
bhagavandraṣṭumicchāmi pitāmahasabhāṃ śubhām | yena vā tapasā śakyā karmaṇā vā'pi gopate
"भगवन्, मैं पितामह की कल्याणमयी सभा देखना चाहता हूँ। हे किरणों के स्वामी, वह किस तपस्या से या किस कर्म से देखी जा सकती है,
श्लोक 7 (2.11.7)
औषधैर्या तथा युक्तैरुत्तमा पापनाशिनी । तन्ममाचक्ष्व भगवन्पश्येयं तां सभां यथा ॥
auṣadhairyā tathā yuktairuttamā pāpanāśinī | tanmamācakṣva bhagavanpaśyeyaṃ tāṃ sabhāṃ yathā
अथवा किन विधिपूर्वक प्रयुक्त ओषधियों से — वह उत्तम, पापनाशिनी सभा? भगवन्, मुझे वह उपाय बताइए, जिससे मैं उस सभा को देख सकूँ।"
श्लोक 8 (2.11.8)
स तन्मम वचः श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकरः । प्रोवाच भारतश्रेष्ठ व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥
sa tanmama vacaḥ śrutvā sahasrāṃśurdivākaraḥ | provāca bhārataśreṣṭha vrataṃ varṣasahasrakam
हे भरतश्रेष्ठ, मेरी बात सुनकर सहस्र किरणों वाले सूर्यदेव ने कहा — "एक हजार वर्ष तक चलने वाला व्रत,
श्लोक 9 (2.11.9)
ब्रह्मव्रतमुपास्स्व त्वं प्रयतेनान्तरात्मना । ततोऽहं हिमवत्पृष्ठे समारब्धो महाव्रतम् ॥
brahmavratamupāssva tvaṃ prayatenāntarātmanā | tato'haṃ himavatpṛṣṭhe samārabdho mahāvratam
ब्रह्मव्रत, संयत अन्तःकरण से करो।" तब मैंने हिमालय के शिखर पर वह महाव्रत आरम्भ किया।
श्लोक 10 (2.11.10)
ततः स भगवान्सूर्यो मामुपादाय वीर्यवान् । आगच्छत्तां सभां ब्राह्मीं विपाप्मा विगतक्लमः ॥
tataḥ sa bhagavānsūryo māmupādāya vīryavān | āgacchattāṃ sabhāṃ brāhmīṃ vipāpmā vigataklamaḥ
तब पराक्रमी भगवान् सूर्य, पापरहित और थकान से मुक्त, मुझे साथ लेकर ब्रह्मा की उस सभा में गए।
श्लोक 11 (2.11.11)
एवंरूपेति सा शक्या न निर्देष्टुं नराधिप । क्षणेन हि बिभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा ॥
evaṃrūpeti sā śakyā na nirdeṣṭuṃ narādhipa | kṣaṇena hi bibhartyanyadanirdeśyaṃ vapustathā
हे नरेश, उस सभा के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वह ऐसे रूप की है, क्योंकि वह क्षण-क्षण में दूसरा अवर्णनीय रूप धारण कर लेती है।
श्लोक 12 (2.11.12)
न वेद परिमाणं वा संस्थानं चापि भारत । न च रूपं मया तादृक् दृष्टपूर्वं कदाचन ॥
na veda parimāṇaṃ vā saṃsthānaṃ cāpi bhārata | na ca rūpaṃ mayā tādṛk dṛṣṭapūrvaṃ kadācana
हे भारत, मैं न उसका माप जानता हूँ, न उसका आकार-प्रकार; और ऐसा रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
श्लोक 13 (2.11.13)
सुसुखा सा सदा राजन्न शीता न च घर्मदा । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्त्युत ॥
susukhā sā sadā rājanna śītā na ca gharmadā | na kṣutpipāse na glāniṃ prāpya tāṃ prāpnuvantyuta
हे राजन्, वह सदा अत्यन्त सुखदायिनी है — न ठंडी, न गर्म; उसे पाकर लोग न भूख-प्यास का अनुभव करते हैं, न थकान का।
श्लोक 14 (2.11.14)
नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सुभास्वरैः । स्तम्भैर्न च धृता सा तु शाश्वती न च सा क्षरा ॥
nānārūpairiva kṛtā maṇibhiḥ sā subhāsvaraiḥ | stambhairna ca dhṛtā sā tu śāśvatī na ca sā kṣarā
वह मानो अत्यन्त चमकीली मणियों से अनेक रूपों में रची गई है। वह खम्भों पर टिकी नहीं है; वह शाश्वत है और कभी क्षीण नहीं होती,
श्लोक 15 (2.11.15)
दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभैः ॥
divyairnānāvidhairbhāvairbhāsadbhiramitaprabhaiḥ
अनेक प्रकार के दिव्य, दीप्तिमान और असीम प्रभा वाले पदार्थों से युक्त।
श्लोक 16 (2.11.16)
अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम् ॥
ati candraṃ ca sūryaṃ ca śikhinaṃ ca svayamprabhā | dīpyate nākapṛṣṭhasthā bhartsayantīva bhāskaram
स्वयंप्रकाशित, स्वर्ग के शिखर पर स्थित वह सभा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि से भी बढ़कर दमकती है, मानो सूर्य को भी लज्जित कर रही हो।
श्लोक 17 (2.11.17)
तस्यां स भगवानास्ते विदधद्देवमायया । स्वयमेकोऽनिशं राजन्सर्वलोकपितामहः ॥
tasyāṃ sa bhagavānāste vidadhaddevamāyayā | svayameko'niśaṃ rājansarvalokapitāmahaḥ
हे राजन्, उसमें सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा अकेले, अपनी दिव्य माया से सब कुछ रचते हुए, निरन्तर विराजते हैं।
श्लोक 18 (2.11.18)
उपतिष्ठन्ति चाप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम् । दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः ॥
upatiṣṭhanti cāpyenaṃ prajānāṃ patayaḥ prabhum | dakṣaḥ pracetāḥ pulaho marīciḥ kaśyapaḥ prabhuḥ
प्रजापति उन प्रभु की सेवा में उपस्थित रहते हैं — दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, प्रभु कश्यप,
श्लोक 19 (2.11.19)
भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथाङ्गिराः । पुलस्त्यश्च क्रतुश्चैव प्रह्लादः कर्दमस्तथा ॥
bhṛguratrirvasiṣṭhaśca gautamo'tha tathāṅgirāḥ | pulastyaśca kratuścaiva prahlādaḥ kardamastathā
भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम और अङ्गिरा, पुलस्त्य, क्रतु, प्रह्लाद और कर्दम,
श्लोक 20 (2.11.20)
अथर्वाङ्गिरसश्चैव वालखिल्या मरीचिपाः । मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वायुस्तेजो जलं मही ॥
atharvāṅgirasaścaiva vālakhilyā marīcipāḥ | mano'ntarikṣaṃ vidyāśca vāyustejo jalaṃ mahī
अथर्वाङ्गिरस, वालखिल्य और मरीचिप; मन, अन्तरिक्ष, विद्याएँ, वायु, तेज, जल और पृथ्वी,
श्लोक 21 (2.11.21)
शब्दस्पर्शौ तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत । प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत्कारणं भुवः ॥
śabdasparśau tathā rūpaṃ raso gandhaśca bhārata | prakṛtiśca vikāraśca yaccānyatkāraṇaṃ bhuvaḥ
हे भारत, शब्द और स्पर्श, रूप, रस और गन्ध; प्रकृति और उसके विकार, तथा जगत् का जो कुछ भी अन्य कारण है;
श्लोक 22 (2.11.22)
अगस्त्यश्च महातेजा मार्कण्डेयश्च वीर्यवान् । जमदग्निर्भरद्वाजः संवर्तश्च्यवनस्तथा ॥
agastyaśca mahātejā mārkaṇḍeyaśca vīryavān | jamadagnirbharadvājaḥ saṃvartaścyavanastathā
महातेजस्वी अगस्त्य और पराक्रमी मार्कण्डेय, जमदग्नि, भरद्वाज, संवर्त और च्यवन,
श्लोक 23 (2.11.23)
दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्यशृङ्गश्च धार्मिकः । सनत्कुमारो भगवान्योगाचार्यो महातपाः ॥
durvāsāśca mahābhāga ṛṣyaśṛṅgaśca dhārmikaḥ | sanatkumāro bhagavānyogācāryo mahātapāḥ
महाभाग दुर्वासा और धर्मात्मा ऋष्यशृङ्ग, योग के आचार्य, महातपस्वी भगवान् सनत्कुमार,
श्लोक 24 (2.11.24)
असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्त्ववित् । ऋषभो जितशत्रुश्च महावीर्यस्तथा मणिः ॥
asito devalaścaiva jaigīṣavyaśca tattvavit | ṛṣabho jitaśatruśca mahāvīryastathā maṇiḥ
असित और देवल, तत्त्वज्ञ जैगीषव्य, ऋषभ, जितशत्रु और महापराक्रमी मणि;
श्लोक 25 (2.11.25)
आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत । चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान् ॥
āyurvedastathā'ṣṭāṅgo dehavāṃstatra bhārata | candramāḥ saha nakṣatrairādityaśca gabhastimān
हे भारत, आठ अङ्गों वाला आयुर्वेद वहाँ देहधारी होकर रहता है; नक्षत्रों सहित चन्द्रमा, और किरणों वाले सूर्य;
श्लोक 26 (2.11.26)
वायवः क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च । मूर्तिमन्तो महात्मानो महाव्रतपरायणाः ॥
vāyavaḥ kratavaścaiva saṅkalpaḥ prāṇa eva ca | mūrtimanto mahātmāno mahāvrataparāyaṇāḥ
वायु, यज्ञ, संकल्प और प्राण — ये सब महान् व्रतों में लगे, देहधारी महात्मा।
श्लोक 27 (2.11.27)
एते चान्ये च बहवो ब्रह्माणं समुपस्थिताः । अर्थो धर्मश्च कामश्च हर्षो द्वेषस्तपो दमः ॥
ete cānye ca bahavo brahmāṇaṃ samupasthitāḥ | artho dharmaśca kāmaśca harṣo dveṣastapo damaḥ
ये और बहुत-से दूसरे ब्रह्मा की सेवा में उपस्थित रहते हैं। अर्थ, धर्म और काम, हर्ष, द्वेष, तप और दम;
श्लोक 28 (2.11.28)
आयान्ति तस्यां सहिता गन्धर्वाप्सरसां गणाः । विंशतिः सप्त चैवान्ये लोकपालाश्च सर्वशः ॥
āyānti tasyāṃ sahitā gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | viṃśatiḥ sapta caivānye lokapālāśca sarvaśaḥ
गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह एक साथ वहाँ आते हैं; सत्ताईस अन्य भी, और सब ओर के लोकपाल;
श्लोक 29 (2.11.29)
शुक्रो बृहस्पतिश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च । शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च ॥
śukro bṛhaspatiścaiva budho'ṅgāraka eva ca | śanaiścaraśca rāhuśca grahāḥ sarve tathaiva ca
शुक्र, बृहस्पति, बुध और अङ्गारक (मंगल), शनैश्चर और राहु — इसी प्रकार सभी ग्रह;
श्लोक 30 (2.11.30)
मन्त्रो रथन्तरं चैव हरिमान्वसुमानपि । आदित्याः साधिराजानो नामद्वन्द्वैरुदाहृताः ॥
mantro rathantaraṃ caiva harimānvasumānapi | ādityāḥ sādhirājāno nāmadvandvairudāhṛtāḥ
मन्त्र और रथन्तर, हरिमान् और वसुमान्; अपने अधिपतियों सहित आदित्य, और जोड़ों में पुकारे जाने वाले देवता;
श्लोक 31 (2.11.31)
मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्चैव भारत । तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींष्यथ ॥
maruto viśvakarmā ca vasavaścaiva bhārata | tathā pitṛgaṇāḥ sarve sarvāṇi ca havīṃṣyatha
हे भारत, मरुद्गण, विश्वकर्मा और वसु; सब पितृगण, और सब हवियाँ;
श्लोक 32 (2.11.32)
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदश्च पाण्डव । अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव ह ॥
ṛgvedaḥ sāmavedaśca yajurvedaśca pāṇḍava | atharvavedaśca tathā sarvaśāstrāṇi caiva ha
हे पाण्डव, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद, अथर्ववेद भी, और सभी शास्त्र;
श्लोक 33 (2.11.33)
इतिहासोपवेदाश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः । ग्रहा यज्ञाश्च सोमश्च देवताश्चापि सर्वशः ॥
itihāsopavedāśca vedāṅgāni ca sarvaśaḥ | grahā yajñāśca somaśca devatāścāpi sarvaśaḥ
इतिहास और उपवेद, सब वेदाङ्ग; ग्रह, यज्ञ, सोम और सभी देवता;
श्लोक 34 (2.11.34)
सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा । मेधा धृतिः श्रुतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः क्षमा ॥
sāvitrī durgataraṇī vāṇī saptavidhā tathā | medhā dhṛtiḥ śrutiścaiva prajñā buddhiryaśaḥ kṣamā
कठिनाइयों से पार लगाने वाली सावित्री, और सात प्रकार की वाणी; मेधा, धृति, श्रुति, प्रज्ञा, बुद्धि, यश और क्षमा;
श्लोक 35 (2.11.35)
सामानि स्तुतिशस्त्राणि गाथाश्च विविधास्तथा । भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशाम्पते ॥
sāmāni stutiśastrāṇi gāthāśca vividhāstathā | bhāṣyāṇi tarkayuktāni dehavanti viśāmpate
हे प्रजापालक, साम, स्तुति और शस्त्र (स्तोत्र), अनेक प्रकार की गाथाएँ, और तर्क से युक्त भाष्य — ये सब देह धारण करके;
श्लोक 36 (2.11.36)
नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिककारिकाः । तत्र तिष्ठन्ति ते पुण्या ये चान्ये गुरुपूजकाः ॥
nāṭakā vividhāḥ kāvyāḥ kathākhyāyikakārikāḥ | tatra tiṣṭhanti te puṇyā ye cānye gurupūjakāḥ
अनेक प्रकार के नाटक, काव्य, कथाएँ, आख्यायिकाएँ और कारिकाएँ — ये पवित्र रूप में वहाँ स्थित हैं, और गुरुजनों का आदर करने वाले अन्य भी।
श्लोक 37 (2.11.37)
क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथैव च । अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च भारत ॥
kṣaṇā lavā muhūrtāśca divā rātristathaiva ca | ardhamāsāśca māsāśca ṛtavaḥ ṣaṭ ca bhārata
हे भारत, क्षण, लव, मुहूर्त, दिन और रात, पक्ष और मास, तथा छहों ऋतुएँ;
श्लोक 38 (2.11.38)
संवत्सराः पञ्चयुगमहोरात्रश्चतुर्विधः । कालचक्रं च तद्दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम् ॥
saṃvatsarāḥ pañcayugamahorātraścaturvidhaḥ | kālacakraṃ ca taddivyaṃ nityamakṣayamavyayam
संवत्सर, पाँच वर्षों का युग, चार प्रकार का अहोरात्र, और वह दिव्य कालचक्र जो नित्य, अक्षय और अविनाशी है;
श्लोक 39 (2.11.39)
धर्मचक्रं तथा चापि नित्यमास्ते युधिष्ठिर । अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सुरसा विनता इरा ॥
dharmacakraṃ tathā cāpi nityamāste yudhiṣṭhira | aditirditirdanuścaiva surasā vinatā irā
हे युधिष्ठिर, धर्मचक्र भी वहाँ सदा रहता है। अदिति, दिति और दनु, सुरसा, विनता, इरा,
श्लोक 40 (2.11.40)
कालिका सुरभी देवी सरमा चाथ गौतमी ॥
kālikā surabhī devī saramā cātha gautamī
कालिका, देवी सुरभि, सरमा और गौतमी,
श्लोक 41 (2.11.41)
प्रभा कद्रूश्च वै देव्यौ देवतानां च मातरः । रुद्राणी श्रीश्च लक्ष्मीश्च भद्रा षष्ठी तथाऽपरा ॥
prabhā kadrūśca vai devyau devatānāṃ ca mātaraḥ | rudrāṇī śrīśca lakṣmīśca bhadrā ṣaṣṭhī tathā'parā
और प्रभा तथा कद्रू — ये दो देवियाँ, देवताओं की माताएँ; रुद्राणी, श्री और लक्ष्मी, भद्रा, और षष्ठी भी;
श्लोक 42 (2.11.42)
पृथिवी गां गता देवी ह्रीः स्वाहा कीर्तिरेव च । सुरा देवी शची चैव तथा पुष्टिररुन्धती ॥
pṛthivī gāṃ gatā devī hrīḥ svāhā kīrtireva ca | surā devī śacī caiva tathā puṣṭirarundhatī
गौ का रूप धारण करने वाली देवी पृथ्वी, ह्री, स्वाहा और कीर्ति, देवी सुरा, शची, पुष्टि और अरुन्धती,
श्लोक 43 (2.11.43)
संवृत्तिराशा नियतिः सृष्टिर्देवी रतिस्तथा । एताश्चान्याश्च वै देव्य उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥
saṃvṛttirāśā niyatiḥ sṛṣṭirdevī ratistathā | etāścānyāśca vai devya upatasthuḥ prajāpatim
संवृत्ति, आशा, नियति, देवी सृष्टि और रति — ये तथा अन्य देवियाँ प्रजापति की सेवा में उपस्थित रहीं।
श्लोक 44 (2.11.44)
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनावपि । विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः ॥
ādityā vasavo rudrā marutaścāśvināvapi | viśvedevāśca sādhyāśca pitaraśca manojavāḥ
आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण और दोनों अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्य, और मन के समान वेगवान पितर।
श्लोक 45 (2.11.45)
पितृणां च गणान्विद्धि सप्तैव पुरुषर्षभ । मूर्तिमन्तो वै चत्वारस्त्रयश्चाप्यशरीरिणः ॥
pitṛṇāṃ ca gaṇānviddhi saptaiva puruṣarṣabha | mūrtimanto vai catvārastrayaścāpyaśarīriṇaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, पितरों के गण सात ही जानो — उनमें चार मूर्तिमान् हैं और तीन अशरीरी।
श्लोक 46 (2.11.46)
वैराजश्च महाभागा अग्निष्वात्ताश्च भारत । गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः ॥
vairājaśca mahābhāgā agniṣvāttāśca bhārata | gārhapatyā nākacarāḥ pitaro lokaviśrutāḥ
हे भारत, महाभाग वैराज और अग्निष्वात्त, स्वर्ग में विचरने वाले गार्हपत्य — लोकों में प्रसिद्ध पितर —
श्लोक 47 (2.11.47)
सोमपा एकशृङ्गाश्च चतुर्वेदाः कलास्तथा । एते चतुर्षु वर्णेषु पूज्यन्ते पितरो नृप ॥
somapā ekaśṛṅgāśca caturvedāḥ kalāstathā | ete caturṣu varṇeṣu pūjyante pitaro nṛpa
सोमप, एकशृङ्ग, चतुर्वेद और कल। हे राजन्, ये पितर चारों वर्णों में पूजे जाते हैं।
श्लोक 48 (2.11.48)
एतैराप्यायितैः पूर्वं सोमश्चाप्याय्यते पुनः । त एते पितरः सर्वे प्रजापतिमुपस्थिताः ॥
etairāpyāyitaiḥ pūrvaṃ somaścāpyāyyate punaḥ | ta ete pitaraḥ sarve prajāpatimupasthitāḥ
जब पहले इन्हें तृप्त किया जाता है, तब बदले में सोम भी तृप्त होता है। ये सभी पितर प्रजापति के पास उपस्थित रहे
श्लोक 49 (2.11.49)
उपासते च संहृष्टा ब्रह्माणममितौजसम् । राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा ॥
upāsate ca saṃhṛṣṭā brahmāṇamamitaujasam | rākṣasāśca piśācāśca dānavā guhyakāstathā
और प्रसन्न होकर अमित तेजस्वी ब्रह्मा की उपासना करते हैं। राक्षस और पिशाच, दानव और गुह्यक,
श्लोक 50 (2.11.50)
नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते । स्थावरा जङ्गमाश्चैव महाभूतास्तथाऽपरे ॥
nāgāḥ suparṇāḥ paśavaḥ pitāmahamupāsate | sthāvarā jaṅgamāścaiva mahābhūtāstathā'pare
नाग, सुपर्ण और पशु पितामह की उपासना करते हैं; स्थावर और जङ्गम प्राणी, और महाभूत भी।
श्लोक 51 (2.11.51)
पुरन्दरश्च देवेन्द्रो वरुणो धनदो यमः । महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वशः ॥
purandaraśca devendro varuṇo dhanado yamaḥ | mahādevaḥ sahomo'tra sadā gacchati sarvaśaḥ
देवराज पुरन्दर (इन्द्र), वरुण, धनद (कुबेर) और यम, तथा उमा सहित महादेव — सब ओर से वहाँ सदा आते हैं।
श्लोक 52 (2.11.52)
महासेनश्च राजेन्द्र सदोपास्ते पितामहम् । देवो नारायणस्तस्यां तथा देवर्षयश्च ये ॥
mahāsenaśca rājendra sadopāste pitāmaham | devo nārāyaṇastasyāṃ tathā devarṣayaśca ye
हे राजेन्द्र, महासेन (स्कन्द) भी सदा पितामह की उपासना करते हैं। उस सभा में भगवान् नारायण हैं, और देवर्षि भी,
श्लोक 53 (2.11.53)
ऋषयो वालखिल्याश्च योनिजायोनिजास्तथा । यच्च किञ्चित्त्रिलोकेऽस्मिन्दृश्यते स्थाणु जङ्गमम् । सर्वं तस्यां मया दृष्टमिति विद्धि नराधिप ॥
ṛṣayo vālakhilyāśca yonijāyonijāstathā | yacca kiñcittriloke'smindṛśyate sthāṇu jaṅgamam | sarvaṃ tasyāṃ mayā dṛṣṭamiti viddhi narādhipa
वालखिल्य ऋषि, तथा योनि से जन्मे और बिना योनि के जन्मे सब। इस त्रिलोकी में जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम दिखाई देता है — हे नरेश, जान लो कि वह सब मैंने उस सभा में देखा।
श्लोक 54 (2.11.54)
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् । प्रजावतां च पञ्चाशदृषीणामपि पाण्डव ॥
aṣṭāśītisahasrāṇi ṛṣīṇāmūrdhvaretasām | prajāvatāṃ ca pañcāśadṛṣīṇāmapi pāṇḍava
हे पाण्डुनन्दन, अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) ऋषि और सन्तान वाले पचास ऋषि भी वहाँ हैं।
श्लोक 55 (2.11.55)
ते स्म तत्र यथाकामं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः । प्रणम्य शिरसा तस्मै सर्वे यान्ति यथागमम् ॥
te sma tatra yathākāmaṃ dṛṣṭvā sarve divaukasaḥ | praṇamya śirasā tasmai sarve yānti yathāgamam
सभी स्वर्गवासी वहाँ इच्छानुसार उनका दर्शन करके, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करते हैं और जैसे आए थे वैसे लौट जाते हैं।
श्लोक 56 (2.11.56)
अतिथीनागतान्देवान्दैत्यान्नागांस्तथा द्विजान् । यक्षान्सुपर्णान्कालेयान्गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥
atithīnāgatāndevāndaityānnāgāṃstathā dvijān | yakṣānsuparṇānkāleyāngandharvāpsarasastathā
आने वाले अतिथि — देवता, दैत्य, नाग और द्विज, यक्ष, सुपर्ण, कालेय, गन्धर्व और अप्सराएँ —
श्लोक 57 (2.11.57)
महाभागानमितधीर्ब्रह्मा लोकपितामहः । दयावान्सर्वभूतेषु यथार्हं प्रतिपद्यते ॥
mahābhāgānamitadhīrbrahmā lokapitāmahaḥ | dayāvānsarvabhūteṣu yathārhaṃ pratipadyate
इन महाभाग अतिथियों का लोकपितामह ब्रह्मा, जिनकी बुद्धि अपार है और जो सब प्राणियों पर दया रखते हैं, यथायोग्य स्वागत करते हैं।
श्लोक 58 (2.11.58)
प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयम्भूरमितद्युतिः । सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप ॥
pratigṛhya tu viśvātmā svayambhūramitadyutiḥ | sāntvamānārthasambhogairyunakti manujādhipa
हे मनुजेश्वर, विश्वात्मा, अमित तेजस्वी स्वयम्भू उन्हें ग्रहण करके मधुर वचनों, सम्मान, धन और भोगों से संतुष्ट करते हैं।
श्लोक 59 (2.11.59)
तथा तैरुपयातैश्च प्रतियद्भिश्च भारत । आकुला सा सभा तात भवति स्म सुखप्रदा ॥
tathā tairupayātaiśca pratiyadbhiśca bhārata | ākulā sā sabhā tāta bhavati sma sukhapradā
हे भारत, इस प्रकार आने वालों और जाने वालों से, हे तात, वह सभा सदा भरी-भरी और सुख देने वाली रहती है।
श्लोक 60 (2.11.60)
सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्षिगणसेविता । ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा ॥
sarvatejomayī divyā brahmarṣigaṇasevitā | brāhmyā śriyā dīpyamānā śuśubhe vigataklamā
सर्वतेजोमयी, दिव्य, ब्रह्मर्षियों के समूहों से सेवित, ब्राह्मी श्री से दीप्त वह सभा थकान से रहित होकर शोभा पाती थी।
श्लोक 61 (2.11.61)
सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा । सभेयं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव ॥
sā sabhā tādṛśī dṛṣṭā mayā lokeṣu durlabhā | sabheyaṃ rājaśārdūla manuṣyeṣu yathā tava
हे राजसिंह, ऐसी वह सभा मैंने देखी, जो लोकों में दुर्लभ है — जैसे मनुष्यों में तुम्हारी यह सभा।
श्लोक 62 (2.11.62)
एता मया दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु भारत । सभेयं मानुषे लोके सर्वश्रेष्ठतमा तव ॥
etā mayā dṛṣṭapūrvāḥ sabhā deveṣu bhārata | sabheyaṃ mānuṣe loke sarvaśreṣṭhatamā tava
हे भारत, देवताओं की ये सभाएँ मैंने पहले देखी हैं। मनुष्य-लोक में तुम्हारी यह सभा सबसे श्रेष्ठ है।