सभा पर्व · अध्याय 12
नारद द्वारा हरिश्चन्द्र की महिमा और पाण्डु का सन्देश
युधिष्ठिर नारद से पूछते हैं कि इन्द्र की सभा में केवल राजर्षि हरिश्चन्द्र ही क्यों हैं, और पितृलोक में उनके पिता पाण्डु ने क्या कहा। नारद बताते हैं कि त्रिशंकु के पुत्र हरिश्चन्द्र ने सातों द्वीप जीते, राजसूय यज्ञ किया और अपार दान दिया, इसी से वे सहस्रों राजाओं में अधिक शोभा पाते हैं। वे पाण्डु की यह इच्छा सुनाते हैं कि युधिष्ठिर राजसूय करें, चेतावनी देते हैं कि इस यज्ञ में विघ्न आते हैं और विनाशकारी युद्ध भी हो सकता है, और द्वारका चले जाते हैं। युधिष्ठिर यज्ञ के विषय में विचार करने लगते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (2.12.1)
प्रायशो राजलोकस्ते कथितो वदतां वर । वैवस्वतसभायां तु यथा वदसि मे प्रभो ॥
prāyaśo rājalokaste kathito vadatāṃ vara | vaivasvatasabhāyāṃ tu yathā vadasi me prabho
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ प्रभो, वैवस्वत यम की सभा में रहने वाले राजाओं का वर्णन आपने जैसा बताया, वह प्रायः पूरा कर दिया है।
श्लोक 2 (2.12.2)
वरुणस्य सभायां तु नागास्ते कथिता विभो । दैत्येन्द्राश्चापि भूयिष्ठाः सरितः सागरास्तथा ॥
varuṇasya sabhāyāṃ tu nāgāste kathitā vibho | daityendrāścāpi bhūyiṣṭhāḥ saritaḥ sāgarāstathā
हे विभो, वरुण की सभा में आपने नागों का, बहुत-से दैत्यराजों का, और नदियों तथा समुद्रों का भी वर्णन किया;
श्लोक 3 (2.12.3)
तथा धनपतेर्यक्षा गुह्यका राक्षसास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्चैव भगवांश्च वृषध्वजः ॥
tathā dhanapateryakṣā guhyakā rākṣasāstathā | gandharvāpsarasaścaiva bhagavāṃśca vṛṣadhvajaḥ
इसी प्रकार धनपति कुबेर की सभा में यक्षों, गुह्यकों और राक्षसों का, गन्धर्वों और अप्सराओं का, तथा वृषभध्वज भगवान् शिव का वर्णन किया।
श्लोक 4 (2.12.4)
पितामहसभायां तु कथितास्ते महर्षयः । सर्वे देवनिकायाश्च सर्वशास्त्राणि चैव ह ॥
pitāmahasabhāyāṃ tu kathitāste maharṣayaḥ | sarve devanikāyāśca sarvaśāstrāṇi caiva ha
पितामह ब्रह्मा की सभा में आपने महर्षियों का, समस्त देवगणों का और सम्पूर्ण शास्त्रों का भी वर्णन किया।
श्लोक 5 (2.12.5)
शक्रस्य तु सभायां तु देवाः सङ्कीर्तिता मुने । उद्देशतश्च गन्धर्वा विविधाश्च महर्षयः ॥
śakrasya tu sabhāyāṃ tu devāḥ saṅkīrtitā mune | uddeśataśca gandharvā vividhāśca maharṣayaḥ
हे मुने, इन्द्र की सभा में आपने देवताओं का, और संक्षेप में गन्धर्वों तथा विविध महर्षियों का नाम लेकर वर्णन किया।
श्लोक 6 (2.12.6)
एक एव तु राजर्षिर्हरिश्चन्द्रो महामुने । कथितस्ते सभायां वै देवेन्द्रस्य महात्मनः ॥
eka eva tu rājarṣirhariścandro mahāmune | kathitaste sabhāyāṃ vai devendrasya mahātmanaḥ
किन्तु हे महामुने, महात्मा देवराज की सभा में आपने केवल एक ही राजर्षि, हरिश्चन्द्र, का उल्लेख किया है।
श्लोक 7 (2.12.7)
किं कर्म तेनाचरितं तपो वा नियतव्रत । येनासौ सह शक्रेण स्पर्धते सुमहायशाः ॥
kiṃ karma tenācaritaṃ tapo vā niyatavrata | yenāsau saha śakreṇa spardhate sumahāyaśāḥ
हे नियमव्रती, उन्होंने ऐसा कौन-सा कर्म या तप किया, जिसके बल पर वे महायशस्वी राजा इन्द्र के साथ होड़ करते हैं?
श्लोक 8 (2.12.8)
पितृलोकगतश्चैव त्वया विप्र पिता मम । दृष्टः पाण्डुर्महाभागः कथं वाऽपि समागतः ॥
pitṛlokagataścaiva tvayā vipra pitā mama | dṛṣṭaḥ pāṇḍurmahābhāgaḥ kathaṃ vā'pi samāgataḥ
हे विप्र, आपने पितृलोक में गए मेरे पिता महाभाग पाण्डु को भी देखा। उनसे आपकी भेंट कैसे हुई?
श्लोक 9 (2.12.9)
किमुक्तवांश्च भगवंस्तन्ममाचक्ष्व सुव्रत । त्वत्तः श्रोतुं सर्वमिदं परं कौतूहलं हि मे ॥
kimuktavāṃśca bhagavaṃstanmamācakṣva suvrata | tvattaḥ śrotuṃ sarvamidaṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me
और हे भगवन्, उन्होंने क्या कहा? हे सुव्रत, वह मुझे बताइए। यह सब आपसे सुनने की मेरी बड़ी उत्सुकता है।
नारद उवाच
श्लोक 10 (2.12.10)
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्चन्द्रं प्रति प्रभो । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥
yanmāṃ pṛcchasi rājendra hariścandraṃ prati prabho | tatte'haṃ sampravakṣyāmi māhātmyaṃ tasya dhīmataḥ
हे राजेन्द्र, हे प्रभो, आप मुझसे हरिश्चन्द्र के विषय में पूछते हैं, तो मैं उन बुद्धिमान राजा की महिमा आपको बताता हूँ।
श्लोक 11 (2.12.11)
इक्ष्वाकूणां कुले जातस्त्रिशङ्कुर्नाम पार्थिवः । अयोध्याधिपतिर्वीरो विश्वामित्रेण संस्थितः ॥
ikṣvākūṇāṃ kule jātastriśaṅkurnāma pārthivaḥ | ayodhyādhipatirvīro viśvāmitreṇa saṃsthitaḥ
इक्ष्वाकुओं के कुल में त्रिशंकु नाम के एक राजा उत्पन्न हुए। वे अयोध्या के वीर अधिपति थे और विश्वामित्र ने उन्हें प्रतिष्ठित किया था।
श्लोक 12 (2.12.12)
तस्य सत्यवती नाम पत्नी केकयवंशजा । तस्यां गर्भः समभवद्धर्मेण कुरुनन्दन ॥
tasya satyavatī nāma patnī kekayavaṃśajā | tasyāṃ garbhaḥ samabhavaddharmeṇa kurunandana
उनकी पत्नी का नाम सत्यवती था, जो केकय वंश में जन्मी थीं। हे कुरुनन्दन, धर्मपूर्वक उनके गर्भ ठहरा।
श्लोक 13 (2.12.13)
सा च काले महाभागा राजन्मासं प्रविश्य च । कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् । स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः ॥
sā ca kāle mahābhāgā rājanmāsaṃ praviśya ca | kumāraṃ janayāmāsa hariścandramakalmaṣam | sa vai rājā hariścandrastraiśaṅkava iti smṛtaḥ
हे राजन्, समय आने पर, प्रसव का मास पूरा होने पर, उस महाभागा ने निष्पाप पुत्र हरिश्चन्द्र को जन्म दिया। वही राजा हरिश्चन्द्र त्रैशंकव (त्रिशंकु के पुत्र) कहलाते हैं।
श्लोक 14 (2.12.14)
स राजा बलवानासीत्सम्राट् सर्वमहीक्षिताम् । तस्य सर्वे महीपालाः शासनावनताः स्थिताः ॥
sa rājā balavānāsītsamrāṭ sarvamahīkṣitām | tasya sarve mahīpālāḥ śāsanāvanatāḥ sthitāḥ
वे राजा बलवान थे और पृथ्वी के सब राजाओं के सम्राट् थे। सारे भूपाल उनकी आज्ञा के आगे झुके रहते थे।
श्लोक 15 (2.12.15)
तेनैकं रथमास्थाय जैत्रं हेमविभूषितम् । शस्त्रप्रतापेन जिता द्वीपाः सप्त जनेश्वर ॥
tenaikaṃ rathamāsthāya jaitraṃ hemavibhūṣitam | śastrapratāpena jitā dvīpāḥ sapta janeśvara
हे जनेश्वर, सोने से सजे एक ही विजयी रथ पर आरूढ़ होकर उन्होंने शस्त्रों के प्रताप से सातों द्वीप जीत लिए।
श्लोक 16 (2.12.16)
स निर्जित्य महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् । आजहार महाराज राजसूयं महाक्रतुम् ॥
sa nirjitya mahīṃ kṛtsnāṃ saśailavanakānanām | ājahāra mahārāja rājasūyaṃ mahākratum
पर्वतों, वनों और जंगलों सहित सारी पृथ्वी को जीतकर, हे महाराज, उन्होंने राजसूय नामक महायज्ञ किया।
श्लोक 17 (2.12.17)
तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजह्रुराज्ञया । द्विजानां परिवेष्टारस्तस्मिन्यज्ञे च तेऽभवन् ॥
tasya sarve mahīpālā dhanānyājahrurājñayā | dvijānāṃ pariveṣṭārastasminyajñe ca te'bhavan
उनकी आज्ञा से सभी राजाओं ने धन लाकर दिया, और उस यज्ञ में वे ब्राह्मणों को भोजन परोसने वाले बने।
श्लोक 18 (2.12.18)
समाप्तयज्ञो विधिवद्धरिश्चन्द्रः प्रतापवान् । अभिषिक्तश्च शुशुभे साम्राज्येन नराधिपः ॥
samāptayajño vidhivaddhariścandraḥ pratāpavān | abhiṣiktaśca śuśubhe sāmrājyena narādhipaḥ
विधिपूर्वक यज्ञ पूरा होने पर प्रतापी नरेश हरिश्चन्द्र का अभिषेक हुआ और वे साम्राज्य से सुशोभित हुए —
श्लोक 19 (2.12.19)
राजसूयेऽभिषिक्तश्च समाप्तवरदक्षिणे ॥
rājasūye'bhiṣiktaśca samāptavaradakṣiṇe
राजसूय में, उत्तम दक्षिणाएँ दे चुकने के बाद, उनका अभिषेक हुआ।
श्लोक 20 (2.12.20)
प्रादाच्च द्रविणं प्रीत्या याचकानां नरेश्वरः । यथोक्तवन्तस्ते तस्मिंस्ततः पञ्चगुणाधिकम् ॥
prādācca draviṇaṃ prītyā yācakānāṃ nareśvaraḥ | yathoktavantaste tasmiṃstataḥ pañcaguṇādhikam
और उस नरेश ने याचकों को प्रसन्नता से धन दिया — जितना उन्होंने माँगा था, उससे पाँच गुना अधिक।
श्लोक 21 (2.12.21)
अतर्पयच्च विविधैर्वसुभिर्ब्राह्मणांस्तदा । प्रसर्पकाले सम्प्राप्ते नानादिग्भ्यः समागतान् ॥
atarpayacca vividhairvasubhirbrāhmaṇāṃstadā | prasarpakāle samprāpte nānādigbhyaḥ samāgatān
उस समय उन्होंने यज्ञ देखने आने वालों का समय आने पर, नाना दिशाओं से आए ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के धन से तृप्त किया,
श्लोक 22 (2.12.22)
भक्ष्यभोज्यैश्च विविधैर्यथाकामपुरस्कृतैः । रत्नौघतर्पितैस्तुष्टैर्द्विजैश्च समुदाहृतम् । तेजस्वी च यशस्वी च नृपेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् ॥
bhakṣyabhojyaiśca vividhairyathākāmapuraskṛtaiḥ | ratnaughatarpitaistuṣṭairdvijaiśca samudāhṛtam | tejasvī ca yaśasvī ca nṛpebhyo'bhyadhiko'bhavat
और इच्छानुसार परोसे गए विविध भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से भी। रत्नों के ढेरों से तृप्त और सन्तुष्ट ब्राह्मणों ने घोषणा की कि वे अन्य सब राजाओं से बढ़कर तेजस्वी और यशस्वी हैं।
श्लोक 23 (2.12.23)
एतस्मात्कारणाद्राजन्हरिश्चन्द्रो विराजते । तेभ्यो राजसहस्रेभ्यस्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥
etasmātkāraṇādrājanhariścandro virājate | tebhyo rājasahasrebhyastadviddhi bharatarṣabha
हे राजन्, इसी कारण हरिश्चन्द्र उन सहस्रों राजाओं से अधिक शोभा पाते हैं; हे भरतश्रेष्ठ, यह जान लो।
श्लोक 24 (2.12.24)
समाप्य च हरिश्चन्द्रो महायज्ञं प्रतापवान् । अभिषिक्तश्च शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ॥
samāpya ca hariścandro mahāyajñaṃ pratāpavān | abhiṣiktaśca śuśubhe sāmrājyena narādhipa
हे नराधिप, महायज्ञ पूरा करके प्रतापी हरिश्चन्द्र अभिषिक्त हुए और साम्राज्य से सुशोभित हुए।
श्लोक 25 (2.12.25)
ये चान्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् । यजन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ ॥
ye cānye ca mahīpālā rājasūyaṃ mahākratum | yajante te sahendreṇa modante bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, और भी जो राजा राजसूय महायज्ञ करते हैं, वे इन्द्र के साथ आनन्द करते हैं।
श्लोक 26 (2.12.26)
ये चापि निधनं प्राप्ताः सङ्ग्रामेष्वपलायिनः । ते तत्सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ ॥
ye cāpi nidhanaṃ prāptāḥ saṅgrāmeṣvapalāyinaḥ | te tatsadanamāsādya modante bharatarṣabha
जो युद्ध में पीठ न दिखाते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे भी उस सभा में पहुँचकर आनन्द करते हैं, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 27 (2.12.27)
तपसा ये च तीव्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् । ते तत्स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यशः ॥
tapasā ye ca tīvreṇa tyajantīha kalevaram | te tatsthānaṃ samāsādya śrīmanto bhānti nityaśaḥ
और जो कठोर तपस्या से यहाँ शरीर त्यागते हैं, वे भी उस स्थान को पाकर सदा तेज से शोभित होते हैं।
श्लोक 28 (2.12.28)
पिता च त्वाऽऽह कौन्तेय पाण्डुः कौरवनन्दन । हरिश्चन्द्रे श्रियं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मयः ॥
pitā ca tvā''ha kaunteya pāṇḍuḥ kauravanandana | hariścandre śriyaṃ dṛṣṭvā nṛpatau jātavismayaḥ
हे कुन्तीपुत्र, हे कौरवनन्दन, तुम्हारे पिता पाण्डु ने भी तुम्हारे लिए सन्देश दिया है। राजा हरिश्चन्द्र का वैभव देखकर वे विस्मित हो गए थे,
श्लोक 29 (2.12.29)
विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप । प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम् ॥
vijñāya mānuṣaṃ lokamāyāntaṃ māṃ narādhipa | provāca praṇato bhūtvā vadethāstvaṃ yudhiṣṭhiram
और हे नराधिप, यह जानकर कि मैं मनुष्यलोक जा रहा हूँ, उन्होंने विनम्र होकर मुझसे कहा, "युधिष्ठिर से कहना —"
पाण्डुरुवाच
श्लोक 30 (2.12.30)
समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत ॥
samartho'si mahīṃ jetuṃ bhrātaraste sthitā vaśe | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhamāharasveti bhārata
तुम पृथ्वी को जीतने में समर्थ हो; तुम्हारे भाई तुम्हारे वश में हैं। हे भारत, यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय का अनुष्ठान करो।
श्लोक 31 (2.12.31)
त्वयीष्टवति पुत्रेऽहं हरिश्चन्द्रवदाशु वै । मोदिष्ये बहुलाः शश्वत्समाः शक्रस्य संसदि ॥
tvayīṣṭavati putre'haṃ hariścandravadāśu vai | modiṣye bahulāḥ śaśvatsamāḥ śakrasya saṃsadi
पुत्र, तुम्हारे यह यज्ञ कर लेने पर मैं भी हरिश्चन्द्र की भाँति शीघ्र ही इन्द्र की सभा में अनन्त वर्षों तक आनन्द करूँगा।
नारद उवाच
श्लोक 32 (2.12.32)
एवं भवतु वक्ष्येऽहं तव पुत्रं नराधिपम् । भूलोकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाब्रुवम् ॥
evaṃ bhavatu vakṣye'haṃ tava putraṃ narādhipam | bhūlokaṃ yadi gaccheyamiti pāṇḍumathābruvam
तब मैंने पाण्डु से कहा, "ऐसा ही हो; यदि मैं भूलोक जाऊँगा तो तुम्हारे पुत्र नरेश से यह कह दूँगा।"
श्लोक 33 (2.12.33)
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सङ्कल्पं कुरु पाण्डव । गन्तासित्वं महेन्द्रस्य पूर्वैः सह सलोकताम् ॥
tasya tvaṃ puruṣavyāghra saṅkalpaṃ kuru pāṇḍava | gantāsitvaṃ mahendrasya pūrvaiḥ saha salokatām
हे पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन, उनका संकल्प पूरा करो। तुम अपने पूर्वजों के साथ महेन्द्र के लोक को प्राप्त करोगे।
श्लोक 34 (2.12.34)
बहुविघ्नश्च नृपते क्रतुरेष स्मृतो महान् । छिद्राण्यस्य हि वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्मराक्षसाः ॥
bahuvighnaśca nṛpate kratureṣa smṛto mahān | chidrāṇyasya hi vāñchanti yajñaghnā brahmarākṣasāḥ
किन्तु हे नृपते, यह महान् यज्ञ अनेक विघ्नों वाला माना गया है। यज्ञ का नाश करने वाले ब्रह्मराक्षस इसके छिद्र खोजते रहते हैं।
श्लोक 35 (2.12.35)
युद्धं च क्षत्रशमनं पृथिवीक्षयकारणम् । किञ्चिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षयावहम् ॥
yuddhaṃ ca kṣatraśamanaṃ pṛthivīkṣayakāraṇam | kiñcideva nimittaṃ ca bhavatyatra kṣayāvaham
और क्षत्रियों का संहार करने वाला, पृथ्वी के विनाश का कारण युद्ध भी छिड़ जाता है; इसमें कोई छोटा-सा निमित्त ही विनाशकारी बन जाता है।
श्लोक 36 (2.12.36)
एतत्सञ्चिन्त्य राजेन्द्र यत्क्षमं तत्समाचर । अप्रमत्तोत्थितो नित्यं चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे ॥
etatsañcintya rājendra yatkṣamaṃ tatsamācara | apramattotthito nityaṃ cāturvarṇyasya rakṣaṇe
हे राजेन्द्र, इन सब बातों पर विचार करके जो उचित हो वही करो। चारों वर्णों की रक्षा में सदा सावधान और तत्पर रहो।
श्लोक 37 (2.12.37)
भव एधस्व मोदस्व धनैस्तर्पय च द्विजान् । एतत्ते विस्तरेणोक्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । आपृच्छे त्वां गमिष्यामि दाशार्हनगरीं प्रति ॥
bhava edhasva modasva dhanaistarpaya ca dvijān | etatte vistareṇoktaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi dāśārhanagarīṃ prati
समृद्ध होओ, फलो-फूलो, आनन्दित रहो, और धन से ब्राह्मणों को तृप्त करो। तुमने मुझसे जो पूछा, वह मैंने विस्तार से कह दिया। अब मैं तुमसे विदा लेता हूँ; मैं दाशार्हों की नगरी (द्वारका) जाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (2.12.38)
एवमाख्याय पार्थेभ्यो नारदो जनमेजय । जगाम तैर्वृतो राजन्नृषिभिर्यैः समागतः ॥
evamākhyāya pārthebhyo nārado janamejaya | jagāma tairvṛto rājannṛṣibhiryaiḥ samāgataḥ
हे जनमेजय, कुन्तीपुत्रों से यह कहकर नारद, हे राजन्, उन ऋषियों से घिरे हुए चले गए जिनके साथ वे आए थे।
श्लोक 39 (2.12.39)
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभिः सह कौरवः । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास पार्थिवः ॥
gate tu nārade pārtho bhrātṛbhiḥ saha kauravaḥ | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ cintayāmāsa pārthivaḥ
नारद के चले जाने पर कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय के विषय में विचार करने लगे।