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सभा पर्व · अध्याय 13

युधिष्ठिर का राजसूय-संकल्प और श्रीकृष्ण को बुलावा

नारद के वचनों के बाद युधिष्ठिर राजसूय के विचार में डूबे रहते हैं। वैशम्पायन उनके धर्मपूर्ण शासन का वर्णन करते हैं: भाइयों की सहायता से उनका राज्य समृद्ध और भयमुक्त है, और कोई उनसे द्वेष नहीं करता, इसलिए वे अजातशत्रु कहलाते हैं। मन्त्री, हितैषी, ऋत्विज और मित्र राजा उन्हें यज्ञ करने की सलाह देते हैं, पर निर्णय से पहले वे श्रीकृष्ण से परामर्श करने का निश्चय करते हैं। उनका दूत इन्द्रसेन श्रीकृष्ण को द्वारका से इन्द्रप्रस्थ ले आता है, जहाँ पाण्डव और कुन्ती उनका स्वागत करते हैं, और युधिष्ठिर उनसे बिना चाटुकारिता के सच्ची सलाह माँगते हैं।

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.13.1)

ऋषेस्तद्वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः । चिन्तयन्राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत ॥

ṛṣestadvacanaṃ śrutvā niśaśvāsa yudhiṣṭhiraḥ | cintayanrājasūyeṣṭiṃ na lebhe śarma bhārata

ऋषि के वे वचन सुनकर युधिष्ठिर ने लम्बी साँस ली; हे भारत, राजसूय यज्ञ के विषय में सोचते हुए उन्हें चैन नहीं मिला।

श्लोक 2 (2.13.2)

राजर्षीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् । यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ॥

rājarṣīṇāṃ ca taṃ śrutvā mahimānaṃ mahātmanām | yajvanāṃ karmabhiḥ puṇyairlokaprāptiṃ samīkṣya ca

उन महात्मा राजर्षियों की महिमा सुनकर, और यह देखकर कि यज्ञ करने वाले अपने पुण्यकर्मों से उत्तम लोक पाते हैं,

श्लोक 3 (2.13.3)

हरिश्चन्द्रं च राजर्षिं रोचमानं विशेषतः । यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूयमियेष सः ॥

hariścandraṃ ca rājarṣiṃ rocamānaṃ viśeṣataḥ | yajvānaṃ yajñamāhartuṃ rājasūyamiyeṣa saḥ

और विशेष रूप से यज्ञकर्ता राजर्षि हरिश्चन्द्र को तेज से दीप्त देखकर, उन्होंने राजसूय यज्ञ करने की इच्छा की।

श्लोक 4 (2.13.4)

युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः । प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे ॥

yudhiṣṭhirastataḥ sarvānarcayitvā sabhāsadaḥ | pratyarcitaśca taiḥ sarvairyajñāyaiva mano dadhe

तब युधिष्ठिर ने सभा के सब सदस्यों का सत्कार किया और उनसे प्रतिसत्कार पाकर यज्ञ करने का ही मन बना लिया।

श्लोक 5 (2.13.5)

स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा । आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः सञ्चिन्त्य चासकृत् ॥

sa rājasūyaṃ rājendra kurūṇāmṛṣabhastadā | āhartuṃ pravaṇaṃ cakre manaḥ sañcintya cāsakṛt

हे राजेन्द्र, कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने बार-बार विचार करके राजसूय करने की ओर अपना मन झुकाया।

श्लोक 6 (2.13.6)

भूयश्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन् । किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥

bhūyaścādbhutavīryaujā dharmamevānucintayan | kiṃ hitaṃ sarvalokānāṃ bhavediti mano dadhe

फिर अद्भुत पराक्रम और ओज वाले युधिष्ठिर ने धर्म का ही चिन्तन करते हुए यह विचार किया कि सब लोकों का हित किसमें होगा।

श्लोक 7 (2.13.7)

अनुगृह्णन्प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः । अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥

anugṛhṇanprajāḥ sarvāḥ sarvadharmabhṛtāṃ varaḥ | aviśeṣeṇa sarveṣāṃ hitaṃ cakre yudhiṣṭhiraḥ

सब धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने समस्त प्रजा पर अनुग्रह करते हुए बिना भेदभाव के सबका हित किया।

श्लोक 8 (2.13.8)

सर्वेषां दीयतां देयं मुष्णन्कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ॥

sarveṣāṃ dīyatāṃ deyaṃ muṣṇankopamadāvubhau | sādhu dharmeti dharmeti nānyacchrūyeta bhāṣitam

क्रोध और मद दोनों को त्यागकर वे कहते, "सबको उनका देय दिया जाए"; और "साधु! धर्म! धर्म!" के सिवा कोई दूसरी बात सुनाई नहीं देती थी।

श्लोक 9 (2.13.9)

एवं गते ततस्तस्मिन्पितरीवाश्वसञ्जनाः । न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥

evaṃ gate tatastasminpitarīvāśvasañjanāḥ | na tasya vidyate dveṣṭā tato'syājātaśatrutā

ऐसी स्थिति में लोग उन पर पिता के समान भरोसा करते थे। उनसे द्वेष करने वाला कोई न था; इसी से वे अजातशत्रु कहलाए।

श्लोक 10 (2.13.10)

परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥

parigrahānnarendrasya bhīmasya paripālanāt | śatrūṇāṃ kṣapaṇāccaiva bībhatsoḥ savyasācinaḥ

राजा युधिष्ठिर के प्रजापालन से, भीम की रक्षा से, और सव्यसाची बीभत्सु (अर्जुन) द्वारा शत्रुओं के विनाश से,

श्लोक 11 (2.13.11)

बलीनां सम्यगुत्थानान्नकुलस्य यशस्विनः । धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् ॥

balīnāṃ samyagutthānānnakulasya yaśasvinaḥ | dhīmataḥ sahadevasya dharmāṇāmanuśāsanāt

यशस्वी नकुल द्वारा करों की उचित वसूली से, और बुद्धिमान सहदेव द्वारा धर्म के उपदेश से,

श्लोक 12 (2.13.12)

वैनत्यात्सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः । अविग्रहा वीतभयाः स्वकर्मनिरताः सदा ॥

vainatyātsarvataścaiva nakulasya svabhāvataḥ | avigrahā vītabhayāḥ svakarmaniratāḥ sadā

तथा नकुल की सर्वत्र दिखने वाली स्वाभाविक विनम्रता से, प्रजा कलह और भय से मुक्त होकर सदा अपने-अपने कर्म में लगी रहती थी।

श्लोक 13 (2.13.13)

निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा । वार्धुषी यज्ञसत्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥

nikāmavarṣāḥ sphītāśca āsañjanapadāstathā | vārdhuṣī yajñasatvāni gorakṣaṃ karṣaṇaṃ vaṇik

जनपदों में इच्छानुसार वर्षा होती थी और वे समृद्ध थे। ब्याज पर धन देना, यज्ञों का फल, गोपालन, खेती और व्यापार —

श्लोक 14 (2.13.14)

विशेषात्सर्वमेवैतत्सञ्जज्ञे राजकर्मणा । अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्छनम् ॥

viśeṣātsarvamevaitatsañjajñe rājakarmaṇā | anukarṣaṃ ca niṣkarṣaṃ vyādhipāvakamūrchanam

यह सब विशेष रूप से राजा के सुशासन से फला-फूला। निर्धनों से पिछले बकाये की वसूली, कर के लिए प्रजा का उत्पीड़न, और रोग तथा अग्नि का प्रकोप —

श्लोक 15 (2.13.15)

सर्वमेव न तत्रासीद्धर्मनित्ये युधिष्ठिरे । दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ॥

sarvameva na tatrāsīddharmanitye yudhiṣṭhire | dasyubhyo vañcakebhyaśca rājñaḥ prati parasparam

धर्मपरायण युधिष्ठिर के राज्य में इनमें से कुछ भी नहीं था। लुटेरों से या ठगों से, राजा के प्रति या आपस में,

श्लोक 16 (2.13.16)

राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषाकृतम् । प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् ॥

rājavallabhataścaiva nāśrūyata mṛṣākṛtam | priyaṃ kartumupasthātuṃ balikarma svakarmajam

या राजा के कृपापात्रों से भी किसी छल-कपट की बात सुनाई नहीं देती थी। राजा का प्रिय करने, उनकी सेवा में उपस्थित होने और अपने-अपने कर्म से उत्पन्न कर चुकाने के लिए,

श्लोक 17 (2.13.17)

अभिहर्तुं नृपाः षट्सु पृथक्जात्यैश्च नैगमैः । ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ॥

abhihartuṃ nṛpāḥ ṣaṭsu pṛthakjātyaiśca naigamaiḥ | vavṛdhe viṣayastatra dharmanitye yudhiṣṭhire

छहों ऋतुओं में राजा लोग विभिन्न जातियों के व्यापारियों के साथ अलग-अलग आते थे। धर्मपरायण युधिष्ठिर के शासन में राज्य बढ़ता गया,

श्लोक 18 (2.13.18)

कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभजैर्जनैः । सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट् ॥

kāmato'pyupayuñjānai rājasairlobhajairjanaiḥ | sarvavyāpī sarvaguṇī sarvasāhaḥ sa sarvarāṭ

रजोगुणी और लोभी लोगों के मनमाने उपभोग के बावजूद भी। वे सर्वव्यापी, सर्वगुणसम्पन्न, सब कुछ सहने वाले और सबके राजा थे —

श्लोक 19 (2.13.19)

यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः । यत्र राजन्दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा । अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः ॥

yasminnadhikṛtaḥ samrāḍ bhrājamāno mahāyaśāḥ | yatra rājandaśa diśaḥ pitṛto mātṛtastathā | anuraktāḥ prajā āsannāgopālā dvijātayaḥ

वे तेजस्वी, महायशस्वी सम्राट्, जिनके शासन में, हे राजन्, दसों दिशाओं में ग्वालों से लेकर ब्राह्मणों तक सारी प्रजा उनसे पिता और माता के समान प्रेम करती थी।

श्लोक 20 (2.13.20)

स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातृंश्च वदतां वरः । राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ॥

sa mantriṇaḥ samānāyya bhrātṛṃśca vadatāṃ varaḥ | rājasūyaṃ prati tadā punaḥ punarapṛcchata

वक्ताओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने अपने मन्त्रियों और भाइयों को बुलाकर उनसे राजसूय के विषय में बार-बार पूछा।

श्लोक 21 (2.13.21)

ते पृच्छ्यमानाः सहिता वचोऽर्थ्यं मन्त्रिणस्तदा । युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं यियक्षुमिदमब्रुवन् ॥

te pṛcchyamānāḥ sahitā vaco'rthyaṃ mantriṇastadā | yudhiṣṭhiraṃ mahāprājñaṃ yiyakṣumidamabruvan

पूछे जाने पर मन्त्रियों ने एक साथ, यज्ञ करने के इच्छुक महाबुद्धिमान युधिष्ठिर से यह सार्थक वचन कहा —

मन्त्रिण ऊचुः

श्लोक 22 (2.13.22)

येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति । तेन राजाऽपि तं कृत्स्नं सम्राड्गुणमभीप्सति ॥

yenābhiṣikto nṛpatirvāruṇaṃ guṇamṛcchati | tena rājā'pi taṃ kṛtsnaṃ samrāḍguṇamabhīpsati

जिस यज्ञ से अभिषिक्त होकर राजा वरुण के समान पद पाता है, उसी के द्वारा राजा, राजा होते हुए भी, सम्राट् के सम्पूर्ण पद की कामना करता है।

श्लोक 23 (2.13.23)

तस्य सम्राड्गुणार्हस्य भवतः कुरुनन्दन । राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव ॥

tasya samrāḍguṇārhasya bhavataḥ kurunandana | rājasūyasya samayaṃ manyante suhṛdastava

हे कुरुनन्दन, आप सम्राट् के पद के योग्य हैं; इसलिए आपके हितैषी मानते हैं कि राजसूय का समय आ गया है।

श्लोक 24 (2.13.24)

तस्य यज्ञस्य समयः स्वाधीनः क्षत्रसम्पदा । साम्ना षडग्नयो यस्मिंश्चीयन्ते शंसितव्रतैः ॥

tasya yajñasya samayaḥ svādhīnaḥ kṣatrasampadā | sāmnā ṣaḍagnayo yasmiṃścīyante śaṃsitavrataiḥ

उस यज्ञ का अवसर क्षात्र-बल पर निर्भर है। उसमें प्रशंसित व्रत वाले ब्राह्मण सामगान के साथ छह अग्नियों का चयन करते हैं।

श्लोक 25 (2.13.25)

दर्वीहोमानुपादाय सर्वान्यः प्राप्नुते क्रतून् । अभिषेकं च यज्ञान्ते सर्वजित्तेन चोच्यते ॥

darvīhomānupādāya sarvānyaḥ prāpnute kratūn | abhiṣekaṃ ca yajñānte sarvajittena cocyate

जो दर्वीहोमों से आरम्भ करके सभी यज्ञों को सम्पन्न करता है और यज्ञ के अन्त में अभिषेक पाता है, वह इसी कारण "सर्वजित्" कहलाता है।

श्लोक 26 (2.13.26)

समर्थोऽसि महाबाहो सर्वे ते वशगा वयम् । अचिरात्त्वं महाराज राजसूयमवाप्स्यसि ॥

samartho'si mahābāho sarve te vaśagā vayam | acirāttvaṃ mahārāja rājasūyamavāpsyasi

हे महाबाहो, आप समर्थ हैं; हम सब आपके अधीन हैं। हे महाराज, आप शीघ्र ही राजसूय सम्पन्न कर लेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (2.13.27)

अविचार्य महाराज राजसूये मनः कुरु । इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक्च सह चाब्रुवन् ॥

avicārya mahārāja rājasūye manaḥ kuru | ityevaṃ suhṛdaḥ sarve pṛthakca saha cābruvan

"हे महाराज, बिना किसी संकोच के राजसूय का निश्चय कीजिए।" इस प्रकार सब हितैषियों ने अलग-अलग भी और एक साथ भी कहा।

श्लोक 28 (2.13.28)

स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशाम्पते । धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसाऽरिहा ॥

sa dharmyaṃ pāṇḍavasteṣāṃ vacaḥ śrutvā viśāmpate | dhṛṣṭamiṣṭaṃ variṣṭhaṃ ca jagrāha manasā'rihā

हे प्रजानाथ, उनके धर्मसम्मत वचन सुनकर शत्रुनाशक पाण्डुपुत्र ने उन्हें साहसपूर्ण, प्रिय और श्रेष्ठ मानकर मन में धारण किया।

श्लोक 29 (2.13.29)

श्रुत्वा सुहृद्वचस्तच्च जानंश्चाप्यात्मनः क्षमम् । स प्रशस्तक्रियारम्भः परीक्षामुपचक्रमे ॥

śrutvā suhṛdvacastacca jānaṃścāpyātmanaḥ kṣamam | sa praśastakriyārambhaḥ parīkṣāmupacakrame

हितैषियों का वह वचन सुनकर, और अपनी सामर्थ्य को भी जानते हुए, सोच-समझकर कार्य आरम्भ करने वाले युधिष्ठिर ने उस विषय की परीक्षा आरम्भ की।

श्लोक 30 (2.13.30)

चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभिः सहितो हितम् । एवमुक्तस्तथा पार्थो धर्म एव मनो दधे ॥

caturbhirbhīmasenādyairbhrātṛbhiḥ sahito hitam | evamuktastathā pārtho dharma eva mano dadhe

भीमसेन आदि चारों भाइयों के साथ उन्होंने हित का विचार किया; और इस प्रकार कहे जाने पर पृथापुत्र ने धर्म में ही मन लगाया।

श्लोक 31 (2.13.31)

स राजसूयं राजेन्द्रः कुरूणामृषभः क्रतुम् । जगाम मनसा सद्य आहरिष्यन्युधिष्ठिरः ॥

sa rājasūyaṃ rājendraḥ kurūṇāmṛṣabhaḥ kratum | jagāma manasā sadya āhariṣyanyudhiṣṭhiraḥ

राजाओं के राजा, कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने तुरन्त मन ही मन राजसूय यज्ञ करने की ठान ली।

श्लोक 32 (2.13.32)

भूयस्त्वद्भुतवीर्योऽपि धर्ममेवानुपालयन् । पुनः पुनर्मनो दध्रे राजसूयाय भारत ॥

bhūyastvadbhutavīryo'pi dharmamevānupālayan | punaḥ punarmano dadhre rājasūyāya bhārata

अद्भुत पराक्रमी होते हुए भी धर्म का ही पालन करते हुए, हे भारत, उन्होंने बार-बार राजसूय के लिए मन बनाया।

श्लोक 33 (2.13.33)

स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृत्विग्भिश्च महात्मभिः । मन्त्रिभिश्चापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

sa bhrātṛbhiḥ punardhīmānṛtvigbhiśca mahātmabhiḥ | mantribhiścāpi sahito dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

फिर बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों, महात्मा ऋत्विजों और मन्त्रियों के साथ,

श्लोक 34 (2.13.34)

धौम्यद्वैपायनाद्यैश्च मन्त्रयामास मन्त्रवित् । विराटद्रुपदाभ्यां च सात्यकेन च धीमता ॥

dhaumyadvaipāyanādyaiśca mantrayāmāsa mantravit | virāṭadrupadābhyāṃ ca sātyakena ca dhīmatā

तथा धौम्य, द्वैपायन व्यास आदि के साथ, मन्त्रणा में कुशल उन्होंने विचार-विमर्श किया; और विराट तथा द्रुपद के साथ, बुद्धिमान सात्यकि के साथ,

श्लोक 35 (2.13.35)

युधामन्यूत्तमौजोभ्यां सौभद्रेण च धीमता । द्रौपदेयैः परं शूरैर्मन्त्रयामास संवृतः ॥

yudhāmanyūttamaujobhyāṃ saubhadreṇa ca dhīmatā | draupadeyaiḥ paraṃ śūrairmantrayāmāsa saṃvṛtaḥ

युधामन्यु और उत्तमौजा के साथ, बुद्धिमान सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) के साथ, और परम वीर द्रौपदीपुत्रों के साथ — उनसे घिरकर उन्होंने मन्त्रणा की।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 36 (2.13.36)

भवन्तो राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः । श्रद्दधानस्य वदत ममावाप्तिः कथं भवेत् ॥

bhavanto rājasūyasya samrāḍarhasya sukratoḥ | śraddadhānasya vadata mamāvāptiḥ kathaṃ bhavet

आप लोग बताइए, मुझ श्रद्धालु को सम्राट् के योग्य उस उत्तम यज्ञ राजसूय की प्राप्ति कैसे हो?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (2.13.37)

एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन । इदमूचुर्वचः काले धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

evamuktāstu te tena rājñā rājīvalocana | idamūcurvacaḥ kāle dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram

हे कमलनयन, राजा के ऐसा कहने पर उन्होंने उचित समय पर धर्मराज युधिष्ठिर से यह वचन कहा —

श्लोक 38 (2.13.38)

अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम् । अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिर्ऋषिभिस्तथा ॥

arhastvamasi dharmajña rājasūyaṃ mahākratum | athaivamukte nṛpatāvṛtvigbhirṛṣibhistathā

"हे धर्मज्ञ, आप राजसूय महायज्ञ के योग्य हैं।" जब ऋत्विजों और ऋषियों ने राजा से ऐसा कहा,

श्लोक 39 (2.13.39)

मन्त्रिणो भ्रातरश्चास्य तद्वचः प्रत्यपूजयन् । स तु राजा महाप्राज्ञः पुनरेवात्मनाऽऽत्मवान् ॥

mantriṇo bhrātaraścāsya tadvacaḥ pratyapūjayan | sa tu rājā mahāprājñaḥ punarevātmanā''tmavān

तो उनके मन्त्रियों और भाइयों ने उस वचन का समर्थन किया। परन्तु वे महाबुद्धिमान, आत्मसंयमी राजा फिर से स्वयं ही,

श्लोक 40 (2.13.40)

भूयो विममृशे पार्थो लोकानां हितकाम्यया । सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ ॥

bhūyo vimamṛśe pārtho lokānāṃ hitakāmyayā | sāmarthyayogaṃ samprekṣya deśakālau vyayāgamau

पृथापुत्र ने लोकहित की कामना से फिर विचार किया — अपनी सामर्थ्य और उसके उपयोग, देश और काल, तथा व्यय और आय को परखकर।

श्लोक 41 (2.13.41)

विमृश्य सम्यक् च धिया कुर्वन्प्राज्ञो न सीदति । नहि यज्ञसमारम्भः केवलात्मविनिश्चयात् ॥

vimṛśya samyak ca dhiyā kurvanprājño na sīdati | nahi yajñasamārambhaḥ kevalātmaviniścayāt

जो बुद्धि से भली-भाँति विचार करके कार्य करता है, वह बुद्धिमान दुःख नहीं पाता; क्योंकि यज्ञ का आरम्भ केवल अपने निश्चय से ही सफल नहीं होता —

श्लोक 42 (2.13.42)

भवतीति समाज्ञाय यत्नतः कार्यमुद्वहन् । स निश्चयार्थं कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम् ॥

bhavatīti samājñāya yatnataḥ kāryamudvahan | sa niścayārthaṃ kāryasya kṛṣṇameva janārdanam

यह जानकर, यत्नपूर्वक कार्य का भार उठाते हुए, उन्होंने उसके निश्चय के लिए जनार्दन श्रीकृष्ण का ही ध्यान किया;

श्लोक 43 (2.13.43)

सर्वलोकात्परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् । अप्रमेयं महाबाहुं कामाञ्जातमजं नृषु ॥

sarvalokātparaṃ matvā jagāma manasā harim | aprameyaṃ mahābāhuṃ kāmāñjātamajaṃ nṛṣu

उन्हें सारे लोक से परे मानकर वे मन ही मन श्रीहरि के पास गए। वे अप्रमेय हैं, महाबाहु हैं, अजन्मा होकर भी अपनी इच्छा से मनुष्यों में जन्मे हैं —

श्लोक 44 (2.13.44)

पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिर्देवसंमतैः । नास्य किञ्चिदविज्ञातं नास्य किञ्चिदकर्मजम् ॥

pāṇḍavastarkayāmāsa karmabhirdevasaṃmataiḥ | nāsya kiñcidavijñātaṃ nāsya kiñcidakarmajam

ऐसा पाण्डुपुत्र ने उनके देवताओं द्वारा सराहे गए कर्मों से अनुमान किया। "उनसे कुछ भी अज्ञात नहीं, उनके लिए कुछ भी असाध्य नहीं,

श्लोक 45 (2.13.45)

न स किञ्चिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत । स तु तां नैष्ठिकीं बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः ॥

na sa kiñcinna viṣahediti kṛṣṇamamanyata | sa tu tāṃ naiṣṭhikīṃ buddhiṃ kṛtvā pārtho yudhiṣṭhiraḥ

ऐसा कुछ नहीं जिसे वे सह न सकें" — ऐसा उन्होंने कृष्ण के विषय में माना। यह दृढ़ निश्चय करके पृथापुत्र युधिष्ठिर ने,

श्लोक 46 (2.13.46)

गुरुवद्भूतगुरवे प्राहिणोद्दूतमञ्जसा । शीघ्रगेन रथेनाशु स दूतः प्राप्य यादवान् ॥

guruvadbhūtagurave prāhiṇoddūtamañjasā | śīghragena rathenāśu sa dūtaḥ prāpya yādavān

समस्त प्राणियों के गुरु के पास, गुरु के समान आदर से, तुरन्त एक दूत भेजा। वह दूत तेज़ चलने वाले रथ से शीघ्र यादवों के पास पहुँचा

श्लोक 47 (2.13.47)

द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् । स प्रभुं प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत माधवम् ॥

dvārakāvāsinaṃ kṛṣṇaṃ dvāravatyāṃ samāsadat | sa prabhuṃ prāñjalirbhūtvā vyajñāpayata mādhavam

और द्वारका-निवासी श्रीकृष्ण से द्वारवती नगरी में मिला। उसने हाथ जोड़कर प्रभु माधव से निवेदन किया।

दूत उवाच

श्लोक 48 (2.13.48)

धर्मराजो हृषीकेश धौम्यव्यासादिभिः सह । पाञ्चालमात्स्यसहितैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वशः ॥

dharmarājo hṛṣīkeśa dhaumyavyāsādibhiḥ saha | pāñcālamātsyasahitairbhrātṛbhiścaiva sarvaśaḥ

हे हृषीकेश, धर्मराज, धौम्य और व्यास आदि के साथ, पांचालों और मत्स्यों सहित, तथा अपने सब भाइयों के साथ —

श्लोक 49 (2.13.49)

त्वद्दर्शनं महाबाहो काङ्क्षते स युधिष्ठिरः ॥

tvaddarśanaṃ mahābāho kāṅkṣate sa yudhiṣṭhiraḥ

वे युधिष्ठिर, हे महाबाहो, आपके दर्शन की आकांक्षा करते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (2.13.50)

इन्द्रसेनवचः श्रुत्वा यादवप्रवरो बली । दर्शनाकाङ्क्षिणं पार्थं दर्शनाकाङ्क्षयाच्युतः ॥

indrasenavacaḥ śrutvā yādavapravaro balī | darśanākāṅkṣiṇaṃ pārthaṃ darśanākāṅkṣayācyutaḥ

इन्द्रसेन के वचन सुनकर यादवश्रेष्ठ बलवान अच्युत, जो दर्शन के इच्छुक पार्थ से मिलने को स्वयं भी उत्सुक थे,

श्लोक 51 (2.13.51)

आमन्त्र्य राजन्सुहृदो वसुदेवं च माधवः । इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात्तदा । व्यतीत्य विविधान्देशांस्त्वरावान्क्षिप्रवाहनः ॥

āmantrya rājansuhṛdo vasudevaṃ ca mādhavaḥ | indrasenena sahita indraprasthamagāttadā | vyatītya vividhāndeśāṃstvarāvānkṣipravāhanaḥ

हे राजन्, अपने सुहृदों और वसुदेव से विदा लेकर माधव तब इन्द्रसेन के साथ इन्द्रप्रस्थ गए; तेज़ वाहनों वाले वे शीघ्रता से अनेक देशों को पार करते गए।

श्लोक 52 (2.13.52)

इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दनः । स गृहे पितृवद्भ्रात्रा धर्मराजेन पूजितः ॥

indraprasthagataṃ pārthamabhyagacchajjanārdanaḥ | sa gṛhe pitṛvadbhrātrā dharmarājena pūjitaḥ

जनार्दन इन्द्रप्रस्थ में पार्थ के पास पहुँचे। राजभवन में उनके फुफेरे भाई धर्मराज ने पिता के समान उनका सत्कार किया,

श्लोक 53 (2.13.53)

भीमेन च ततोऽपश्यत्स्वसारं प्रीतिमान्पितुः । प्रीतः प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा ॥

bhīmena ca tato'paśyatsvasāraṃ prītimānpituḥ | prītaḥ prītena suhṛdā reme sa sahitastadā

और भीम ने भी। फिर स्नेह से भरे उन्होंने अपनी बुआ (कुन्ती) के दर्शन किए। प्रसन्न होकर वे अपने प्रेमी सुहृद के साथ आनन्द से रहे।

श्लोक 54 (2.13.54)

अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत्पर्युपासितः । तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम् । धर्मराजः समागम्य ज्ञापयत्स्वप्रयोजनम् ॥

arjunena yamābhyāṃ ca guruvatparyupāsitaḥ | taṃ viśrāntaṃ śubhe deśe kṣaṇinaṃ kalpamacyutam | dharmarājaḥ samāgamya jñāpayatsvaprayojanam

अर्जुन और नकुल-सहदेव ने गुरु के समान उनकी सेवा की। जब अच्युत एक सुन्दर स्थान में विश्राम कर चुके और अवकाश में तथा स्वस्थचित्त थे, तब धर्मराज ने उनके पास आकर अपना प्रयोजन बताया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 55 (2.13.55)

प्रार्थितो राजसूयो मे न चासौ केवलेप्सया । प्राप्यते येन तत्ते हि विदितं कृष्ण सर्वशः ॥

prārthito rājasūyo me na cāsau kevalepsayā | prāpyate yena tatte hi viditaṃ kṛṣṇa sarvaśaḥ

मैंने राजसूय की अभिलाषा की है, परन्तु वह केवल इच्छा से प्राप्त नहीं होता। हे कृष्ण, वह जिस उपाय से प्राप्त होता है, वह सब आपको भली-भाँति ज्ञात है।

श्लोक 56 (2.13.56)

यस्मिन्सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते । यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति ॥

yasminsarvaṃ sambhavati yaśca sarvatra pūjyate | yaśca sarveśvaro rājā rājasūyaṃ sa vindati

जिसमें सब कुछ सम्भव है, जो सर्वत्र पूजित होता है और जो सबका स्वामी है, वही राजा राजसूय को प्राप्त करता है।

श्लोक 57 (2.13.57)

तं राजसूयं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे । तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ॥

taṃ rājasūyaṃ suhṛdaḥ kāryamāhuḥ sametya me | tatra me niścitatamaṃ tava kṛṣṇa girā bhavet

मेरे हितैषियों ने मिलकर मुझसे कहा है कि राजसूय करना चाहिए। परन्तु हे कृष्ण, इस विषय में मेरे लिए आपका वचन ही सबसे निर्णायक होगा।

श्लोक 58 (2.13.58)

केचिद्धि सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थहेतोस्तथैवान्ये प्रियमेव वदन्त्युत ॥

keciddhi sauhṛdādeva na doṣaṃ paricakṣate | svārthahetostathaivānye priyameva vadantyuta

क्योंकि कुछ लोग केवल मित्रता के कारण दोष नहीं बताते; उसी प्रकार दूसरे अपने स्वार्थ के लिए केवल प्रिय बात ही कहते हैं।

श्लोक 59 (2.13.59)

प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम् । एवम्प्रायाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने ॥

priyameva parīpsante kecidātmani yaddhitam | evamprāyāśca dṛśyante janavādāḥ prayojane

कुछ लोग केवल वही चाहते हैं जो प्रिय हो और जो उन्हें अपने लिए हितकर लगे। किसी प्रयोजन के विषय में लोगों की राय प्रायः ऐसी ही देखी जाती है।

श्लोक 60 (2.13.60)

त्वं तु हेतूनतीत्यैतान्कामक्रोधौ व्युदस्य च । परमं यत्क्षमं लोके यथावद्वक्तुमर्हसि ॥

tvaṃ tu hetūnatītyaitānkāmakrodhau vyudasya ca | paramaṃ yatkṣamaṃ loke yathāvadvaktumarhasi

परन्तु आप इन कारणों से ऊपर उठकर, काम और क्रोध को त्यागकर, मुझे ठीक-ठीक बताइए कि संसार में सबसे उत्तम और उचित क्या है।

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