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सभा पर्व · अध्याय 14

श्रीकृष्ण द्वारा जरासन्ध के प्रभुत्व का वर्णन

श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे राजसूय के योग्य हैं, परन्तु मगधराज जरासन्ध क्षत्रियों का अधिपति बन बैठा है — शिशुपाल, भगदत्त, पौण्ड्रक, भीष्मक और अनेक राजा उसकी सेवा करते हैं और कई जातियाँ उसके भय से अपने देश छोड़ चुकी हैं। वे यादवों के संघर्ष का वृत्तान्त सुनाते हैं — कंस का वध, जरासन्ध से अठारह युद्ध, हंस और डिबिक की मृत्यु, और कुशस्थली तथा द्वारवती में जा बसना — तथा यादव वीरों और मन्त्रियों के नाम गिनाते हैं। अन्त में वे कहते हैं कि जरासन्ध के जीवित रहते और गिरिव्रज में राजाओं को बन्दी रखे रहते राजसूय सम्भव नहीं, इसलिए युधिष्ठिर को उन राजाओं की मुक्ति और जरासन्ध के वध का प्रयत्न करना चाहिए।

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

कृष्ण उवाच

श्लोक 1 (2.14.1)

सर्वैर्गुणैर्महाराज राजसूयं त्वमर्हसि । जानतस्त्वेव ते सर्वं किञ्चिद्वक्ष्यामि भारत ॥

sarvairguṇairmahārāja rājasūyaṃ tvamarhasi | jānatastveva te sarvaṃ kiñcidvakṣyāmi bhārata

महाराज, अपने सभी गुणों के कारण आप राजसूय यज्ञ के योग्य हैं। भारत, यद्यपि आप सब कुछ जानते हैं, फिर भी मैं आपसे कुछ कहूँगा।

श्लोक 2 (2.14.2)

जामदग्न्येन रामेण क्षत्रं यदवशेषितम् । तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसंज्ञितम् ॥

jāmadagnyena rāmeṇa kṣatraṃ yadavaśeṣitam | tasmādavarajaṃ loke yadidaṃ kṣatrasaṃjñitam

जमदग्निपुत्र परशुराम ने जिस क्षत्रिय-वर्ग को शेष छोड़ा था, संसार में आज जो क्षत्रिय कहलाते हैं, वे उसी की परवर्ती संतान हैं।

श्लोक 3 (2.14.3)

कृतोऽयं कुलसङ्कल्पः क्षत्रियैर्वसुधाधिप । निदेशवाग्भिस्तत्तेह विदितं भरतर्षभ ॥

kṛto'yaṃ kulasaṅkalpaḥ kṣatriyairvasudhādhipa | nideśavāgbhistatteha viditaṃ bharatarṣabha

हे पृथ्वीपति, क्षत्रियों ने आदेश-वचनों द्वारा आपस में कुल-सम्बन्धी यह नियम ठहराया है; भरतश्रेष्ठ, वह आपको विदित है।

श्लोक 4 (2.14.4)

ऐलस्येक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृतिं परिचक्षते । राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथाऽन्ये क्षत्रिया भुवि ॥

ailasyekṣvākuvaṃśasya prakṛtiṃ paricakṣate | rājānaḥ śreṇibaddhāśca tathā'nye kṣatriyā bhuvi

पृथ्वी पर वंश-परम्परा में बँधे राजा और अन्य क्षत्रिय भी ऐल तथा इक्ष्वाकु वंश की ही संतति कहे जाते हैं।

श्लोक 5 (2.14.5)

ऐलवंश्याश्च ये राजंस्तथैवेक्ष्वाकवो नृपाः । तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ ॥

ailavaṃśyāśca ye rājaṃstathaivekṣvākavo nṛpāḥ | tāni caikaśataṃ viddhi kulāni bharatarṣabha

राजन्, ऐल वंश के और उसी प्रकार इक्ष्वाकु वंश के जो राजा हैं, भरतश्रेष्ठ, उनके कुल एक सौ एक जानिए।

श्लोक 6 (2.14.6)

ययातेस्त्वेव भोजानां विस्तरो गुणतो महान् । भजतेऽद्य महाराज विस्तरं सचतुर्दिशम् ॥

yayātestveva bhojānāṃ vistaro guṇato mahān | bhajate'dya mahārāja vistaraṃ sacaturdiśam

ययाति के वंशजों में भोजों का विस्तार गुणों में महान है; महाराज, आज उनका वंश चारों दिशाओं में फैला हुआ है।

श्लोक 7 (2.14.7)

तेषां तथैव तां लक्ष्मीं सर्वक्षत्रमुपासते । इदानीमेव वै राजञ्जरासन्धो महीपतिः ॥

teṣāṃ tathaiva tāṃ lakṣmīṃ sarvakṣatramupāsate | idānīmeva vai rājañjarāsandho mahīpatiḥ

समस्त क्षत्रिय उसी प्रकार उनकी उस राजलक्ष्मी की उपासना करते हैं। किंतु राजन्, अब पृथ्वीपति जरासन्ध ने

श्लोक 8 (2.14.8)

अभिभूय श्रियं तेषां कुलानामभिषेचितः । स्थितो मूर्ध्नि नरेन्द्राणामोजसाऽऽक्रम्य सर्वशः ॥

abhibhūya śriyaṃ teṣāṃ kulānāmabhiṣecitaḥ | sthito mūrdhni narendrāṇāmojasā''kramya sarvaśaḥ

उन कुलों की श्री को दबाकर अपना अभिषेक करा लिया है, और अपने तेज से सबको आक्रान्त करके वह राजाओं के सिर पर स्थित है।

श्लोक 9 (2.14.9)

सोऽवनीं मध्यमां भुक्त्वा मिथो भेदममन्यत । प्रभुर्यस्तु परो राजा यस्मिन्नेकवशे जगत् ॥

so'vanīṃ madhyamāṃ bhuktvā mitho bhedamamanyata | prabhuryastu paro rājā yasminnekavaśe jagat

मध्य देश का उपभोग करके उसने वहाँ के राजाओं में परस्पर फूट डालने का विचार किया। और जो प्रभु सबसे श्रेष्ठ राजा हो, जिसके एकमात्र अधीन जगत् हो,

श्लोक 10 (2.14.10)

स साम्राज्यं महाराज प्राप्तो भवति योगतः । तं स राजा जरासन्धं संश्रित्य किल सर्वशः ॥

sa sāmrājyaṃ mahārāja prāpto bhavati yogataḥ | taṃ sa rājā jarāsandhaṃ saṃśritya kila sarvaśaḥ

महाराज, वही युक्ति से साम्राज्य प्राप्त करता है। कहते हैं, उसी राजा जरासन्ध का सब ओर से आश्रय लेकर

श्लोक 11 (2.14.11)

राजन्सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान् । तमेव च महाराज शिष्यवत्समुपस्थितः ॥

rājansenāpatirjātaḥ śiśupālaḥ pratāpavān | tameva ca mahārāja śiṣyavatsamupasthitaḥ

प्रतापी शिशुपाल, राजन्, उसका सेनापति बन गया है। और महाराज, उसी के पास शिष्य की भाँति उपस्थित रहता है

श्लोक 12 (2.14.12)

वक्रः करूषाधिपतिर्मायायोधी महाबलः । अपरौ च महावीर्यौ महात्मानौ समाश्रितौ ॥

vakraḥ karūṣādhipatirmāyāyodhī mahābalaḥ | aparau ca mahāvīryau mahātmānau samāśritau

करूषदेश का अधिपति वक्र, जो महाबली है और माया से युद्ध करता है। दो अन्य महापराक्रमी, महामना वीरों ने भी आश्रय लिया है

श्लोक 13 (2.14.13)

जरासन्धं महावीर्यं तौ हंसडिम्बिकावुभौ । वक्रदन्तः करूषस्य करभो मेघवाहनः । मूर्ध्ना दिव्यं मणिं बिभ्रद्यमद्भुतमणिं विदुः ॥

jarāsandhaṃ mahāvīryaṃ tau haṃsaḍimbikāvubhau | vakradantaḥ karūṣasya karabho meghavāhanaḥ | mūrdhnā divyaṃ maṇiṃ bibhradyamadbhutamaṇiṃ viduḥ

महापराक्रमी जरासन्ध का — वे दोनों हंस और डिम्बिक। इसी प्रकार करूष का वक्रदन्त, करभ और मेघवाहन भी, जो अपने सिर पर दिव्य मणि धारण करता है और जिसे लोग अद्भुतमणि के नाम से जानते हैं।

श्लोक 14 (2.14.14)

मरुं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः । अपर्यन्तबलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा ॥

maruṃ ca narakaṃ caiva śāsti yo yavanādhipaḥ | aparyantabalo rājā pratīcyāṃ varuṇo yathā

जो यवनराज मरु और नरक पर शासन करता है, असीम बलशाली वह राजा, जो पश्चिम में वरुण के समान है —

श्लोक 15 (2.14.15)

भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा । स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः ॥

bhagadatto mahārāja vṛddhastava pituḥ sakhā | sa vācā praṇatastasya karmaṇā ca viśeṣataḥ

महाराज, वह भगदत्त, जो आपके पिता का वृद्ध मित्र है, वाणी से और विशेषकर कर्म से जरासन्ध के आगे झुका हुआ है।

श्लोक 16 (2.14.16)

स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद्भक्तिमांस्त्वयि । प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः पाति यो नृपः ॥

snehabaddhaśca manasā pitṛvadbhaktimāṃstvayi | pratīcyāṃ dakṣiṇaṃ cāntaṃ pṛthivyāḥ pāti yo nṛpaḥ

फिर भी मन से वह स्नेह में बँधा है और पिता की भाँति आपके प्रति भक्ति रखता है। और जो राजा पृथ्वी के पश्चिमी और दक्षिणी छोर की रक्षा करता है,

श्लोक 17 (2.14.17)

मातुलो भवतः शूरः पुरुजित्कुन्तिवर्धनः । स ते सन्नतिमानेकः स्नेहतः शत्रुसूदनः ॥

mātulo bhavataḥ śūraḥ purujitkuntivardhanaḥ | sa te sannatimānekaḥ snehataḥ śatrusūdanaḥ

आपका मामा, कुन्तियों का यश बढ़ाने वाला शूरवीर पुरुजित् — वही शत्रुसंहारक अकेला स्नेहवश आपके प्रति विनम्र है।

श्लोक 18 (2.14.18)

जरासन्धं गतस्त्वेव पुरा यो न मया हतः । पुरुषोत्तमविज्ञातो योसौ चेदिषु दुर्मतिः ॥

jarāsandhaṃ gatastveva purā yo na mayā hataḥ | puruṣottamavijñāto yosau cediṣu durmatiḥ

वह भी जरासन्ध के पक्ष में चला गया है जिसे मैंने पहले नहीं मारा — चेदियों में रहने वाला वह दुर्बुद्धि, जो पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है,

श्लोक 19 (2.14.19)

आत्मानं प्रतिजानाति लोकेऽस्मिन्पुरुषोत्तमम् । आदत्ते सततं मोहाद्यः स चिह्नं च मामकम् ॥

ātmānaṃ pratijānāti loke'sminpuruṣottamam | ādatte satataṃ mohādyaḥ sa cihnaṃ ca māmakam

जो इस लोक में स्वयं को पुरुषोत्तम घोषित करता है और मोहवश सदा मेरा चिह्न धारण करता है;

श्लोक 20 (2.14.20)

वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः । पौण्ड्रको वासुदेवेति योसौ लोकेऽभिविश्रुतः ॥

vaṅgapuṇḍrakirāteṣu rājā balasamanvitaḥ | pauṇḍrako vāsudeveti yosau loke'bhiviśrutaḥ

वंग, पुण्ड्र और किरात देशों का वह बलशाली राजा, जो संसार में पौण्ड्रक वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 21 (2.14.21)

चतुर्थभाङ्महाराज भोज इन्द्रसखो बली । विद्याबलाद्यो व्यजयत्स पाण्ड्यक्रथकैशिकान् ॥

caturthabhāṅmahārāja bhoja indrasakho balī | vidyābalādyo vyajayatsa pāṇḍyakrathakaiśikān

महाराज, पृथ्वी के चौथाई भाग का स्वामी, इन्द्र का सखा बलवान भोज, जिसने विद्या के बल से पाण्ड्य, क्रथ और कैशिक देशों को जीत लिया था —

श्लोक 22 (2.14.22)

भ्राता तस्याकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत् । स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा ॥

bhrātā tasyākṛtiḥ śūro jāmadagnyasamo'bhavat | sa bhakto māgadhaṃ rājā bhīṣmakaḥ paravīrahā

जिसका भाई आकृति परशुराम के समान शूरवीर था — शत्रुवीरों का नाश करने वाला वह राजा भीष्मक मगधराज का भक्त है।

श्लोक 23 (2.14.23)

प्रियाण्याचरतः प्रह्वान्सदा सम्बन्धिनस्ततः । भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः ॥

priyāṇyācarataḥ prahvānsadā sambandhinastataḥ | bhajato na bhajatyasmānapriyeṣu vyavasthitaḥ

हम उसके सम्बन्धी हैं, सदा विनयपूर्वक उसका प्रिय करते और उसका आदर करते हैं, फिर भी वह हमें नहीं अपनाता और हमारे अहितैषियों के पक्ष में खड़ा है।

श्लोक 24 (2.14.24)

न कुलं सबलं राजन्नभ्यजानात्तथाऽऽत्मनः । पश्यमानो यशो दीप्तं जरासन्धमुपस्थितः ॥

na kulaṃ sabalaṃ rājannabhyajānāttathā''tmanaḥ | paśyamāno yaśo dīptaṃ jarāsandhamupasthitaḥ

राजन्, अपने कुल के बल को न पहचानकर और जरासन्ध के दीप्त यश को देखकर वह उसकी सेवा में जा पहुँचा है।

श्लोक 25 (2.14.25)

उदीच्याश्च तथा भोजाः कुलान्यष्टादश प्रभो । जरासन्धभयादेव प्रतीचीं दिशमास्थिताः ॥

udīcyāśca tathā bhojāḥ kulānyaṣṭādaśa prabho | jarāsandhabhayādeva pratīcīṃ diśamāsthitāḥ

उसी प्रकार, प्रभो, उत्तर के भोजों के अठारह कुल केवल जरासन्ध के भय से पश्चिम दिशा में जा बसे हैं —

श्लोक 26 (2.14.26)

शूरसेना भद्रकारा बोधाः शाल्वाः पटच्चराः । सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह ॥

śūrasenā bhadrakārā bodhāḥ śālvāḥ paṭaccarāḥ | susthalāśca sukuṭṭāśca kulindāḥ kuntibhiḥ saha

शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व और पटच्चर, सुस्थल और सुकुट्ट, तथा कुन्तियों के साथ कुलिन्द;

श्लोक 27 (2.14.27)

शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह । दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोसलाः ॥

śālvāyanāśca rājānaḥ sodaryānucaraiḥ saha | dakṣiṇā ye ca pañcālāḥ pūrvāḥ kuntiṣu kosalāḥ

अपने सहोदरों और अनुचरों सहित शाल्वायन राजा; दक्षिण के पंचाल, और कुन्ति देश के पूर्वी कोसल।

श्लोक 28 (2.14.28)

तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः । मत्स्याः सन्न्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥

tathottarāṃ diśaṃ cāpi parityajya bhayārditāḥ | matsyāḥ sannyastapādāśca dakṣiṇāṃ diśamāśritāḥ

इसी प्रकार भय से पीड़ित मत्स्य और संन्यस्तपाद भी उत्तर दिशा छोड़कर दक्षिण दिशा की शरण में चले गए हैं।

श्लोक 29 (2.14.29)

तथैव सर्वपञ्चाला जरासन्धभयार्दिताः । स्वराज्यं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतोदिशम् ॥

tathaiva sarvapañcālā jarāsandhabhayārditāḥ | svarājyaṃ samparityajya vidrutāḥ sarvatodiśam

वैसे ही जरासन्ध के भय से पीड़ित सभी पंचाल अपना-अपना राज्य छोड़कर सब दिशाओं में भाग गए हैं।

श्लोक 30 (2.14.30)

अग्रतो ह्यस्य पाञ्चालास्तत्रानीके महात्मनः । अनिर्गते सारबले मागधेभ्यो गिरिव्रजात् ॥

agrato hyasya pāñcālāstatrānīke mahātmanaḥ | anirgate sārabale māgadhebhyo girivrajāt

उस महाबली की सेना के आगे से पंचाल तब भी हट गए, जब मगधों की मुख्य सेना अभी गिरिव्रज से निकली भी नहीं थी।

श्लोक 31 (2.14.31)

उग्रसेनसुतः कंसः पुरा निर्जित्य बान्धवान् । बार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद्वृथामतिः ॥

ugrasenasutaḥ kaṃsaḥ purā nirjitya bāndhavān | bārhadrathasute devyāvupāgacchadvṛthāmatiḥ

बहुत पहले उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपने बन्धु-बान्धवों को पराजित करके, कुबुद्धिवश बृहद्रथपुत्र जरासन्ध की दो पुत्रियों को अपनी रानी बनाया।

श्लोक 32 (2.14.32)

अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽबले । बलेन तेन स्वज्ञातीनभिभूय वृथामतिः ॥

astiḥ prāptiśca nāmnā te sahadevānuje'bale | balena tena svajñātīnabhibhūya vṛthāmatiḥ

उनके नाम अस्ति और प्राप्ति थे, जो सहदेव की छोटी बहनें थीं। उस बल के सहारे उस दुर्बुद्धि ने अपने ही जाति-बन्धुओं को दबाकर

श्लोक 33 (2.14.33)

श्रैष्ठ्यं प्राप्तः स तस्यासीदतीवापनयो महान् । भोजराजन्यवृद्धैश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना ॥

śraiṣṭhyaṃ prāptaḥ sa tasyāsīdatīvāpanayo mahān | bhojarājanyavṛddhaiśca pīḍyamānairdurātmanā

श्रेष्ठ पद पा लिया; उसका अन्याय बहुत बड़ा था। तब उस दुरात्मा से पीड़ित भोजवंशी राजपरिवार के वृद्धों ने

श्लोक 34 (2.14.34)

ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता । दत्त्वाऽऽक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा ॥

jñātitrāṇamabhīpsadbhirasmatsambhāvanā kṛtā | dattvā''krūrāya sutanuṃ tāmāhukasutāṃ tadā

अपने जाति-बन्धुओं की रक्षा चाहकर हमसे सहायता की आशा की। तब आहुक की सुन्दरी पुत्री सुतनु का विवाह अक्रूर से करके,

श्लोक 35 (2.14.35)

सङ्कर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम् । हतौ कंससुनामानौ मया रामेण चाप्युत ॥

saṅkarṣaṇadvitīyena jñātikāryaṃ mayā kṛtam | hatau kaṃsasunāmānau mayā rāmeṇa cāpyuta

मैंने संकर्षण (बलराम) को साथ लेकर जाति-बन्धुओं का कार्य पूरा किया — कंस और सुनामा मेरे और बलराम के हाथों मारे गए।

श्लोक 36 (2.14.36)

हत्वा कंसं तथैवादौ जरासन्धस्य बिभ्यतः । मया रामेण चान्यत्र ज्ञातयः परिपालिताः ॥

hatvā kaṃsaṃ tathaivādau jarāsandhasya bibhyataḥ | mayā rāmeṇa cānyatra jñātayaḥ paripālitāḥ

इस प्रकार पहले कंस को मारकर, मैंने और बलराम ने जरासन्ध से भयभीत अपने जाति-बन्धुओं की अन्यत्र रक्षा की।

श्लोक 37 (2.14.37)

भये तु समतिक्रान्ते जरासन्धे समुद्यते । मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन्कुलैरष्टादशावरैः ॥

bhaye tu samatikrānte jarāsandhe samudyate | mantro'yaṃ mantrito rājankulairaṣṭādaśāvaraiḥ

जब वह भय टल गया और जरासन्ध आक्रमण को उद्यत हुआ, तब राजन्, हमारे अठारह छोटे कुलों ने मिलकर यह मन्त्रणा की —

श्लोक 38 (2.14.38)

अनारमन्तो निघ्नन्तो महास्त्रैः शत्रुघातिभिः । न हन्यामो वयं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्बलम् ॥

anāramanto nighnanto mahāstraiḥ śatrughātibhiḥ | na hanyāmo vayaṃ tasya tribhirvarṣaśatairbalam

"यदि हम शत्रुनाशक महान अस्त्रों से बिना रुके प्रहार करते रहें, तब भी तीन सौ वर्षों में उसकी सेना का नाश नहीं कर पाएँगे।

श्लोक 39 (2.14.39)

तस्य ह्यमरसङ्काशौ बलेन बलिनां वरौ । नामभ्यां हंसडिबिकावशस्त्रनिधनावुभौ ॥

tasya hyamarasaṅkāśau balena balināṃ varau | nāmabhyāṃ haṃsaḍibikāvaśastranidhanāvubhau

क्योंकि उसके पास देवताओं के समान दो वीर हैं, बलवानों में श्रेष्ठ, जिनके नाम हंस और डिबिक हैं; वे दोनों शस्त्रों से नहीं मारे जा सकते।

श्लोक 40 (2.14.40)

तावुभौ सहितौ वीरौ जरासन्धश्च वीर्यवान् । त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥

tāvubhau sahitau vīrau jarāsandhaśca vīryavān | trayastrayāṇāṃ lokānāṃ paryāptā iti me matiḥ

वे दोनों वीर साथ में और पराक्रमी जरासन्ध — ये तीनों तीनों लोकों के लिए पर्याप्त हैं।" ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 41 (2.14.41)

न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः । तथैव तेषामासीच्च बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ॥

na hi kevalamasmākaṃ yāvanto'nye ca pārthivāḥ | tathaiva teṣāmāsīcca buddhirbuddhimatāṃ vara

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, यह केवल हमारा ही विचार नहीं था; जितने अन्य राजा थे, उन सबकी भी यही धारणा थी।

श्लोक 42 (2.14.42)

अष्टादश मया तस्य सङ्ग्रामा रोमहर्षणाः । दत्ता न च हतो राजञ्जरासन्धो महाबलः ॥

aṣṭādaśa mayā tasya saṅgrāmā romaharṣaṇāḥ | dattā na ca hato rājañjarāsandho mahābalaḥ

राजन्, मैंने उसके साथ अठारह रोमांचकारी युद्ध किए, फिर भी महाबली जरासन्ध मारा नहीं गया।

श्लोक 43 (2.14.43)

अथ हंस इति ख्यातः कश्चिदासीन्महान्नृपः । रामेण स हतस्तत्र सङ्ग्रामेऽष्टादशावरे ॥

atha haṃsa iti khyātaḥ kaścidāsīnmahānnṛpaḥ | rāmeṇa sa hatastatra saṅgrāme'ṣṭādaśāvare

हंस नाम से प्रसिद्ध एक महान राजा था; वह वहाँ अठारह कुलों के युद्ध में बलराम के हाथों मारा गया।

श्लोक 44 (2.14.44)

हतो हंस इति प्रोक्तं तस्य केनापि भारत । तच्छ्रुत्वा डिबिको राजन्यमुनाम्भस्यमज्जत ॥

hato haṃsa iti proktaṃ tasya kenāpi bhārata | tacchrutvā ḍibiko rājanyamunāmbhasyamajjata

तब भारत, किसी ने उससे कह दिया — "हंस मारा गया।" राजन्, यह सुनकर डिबिक ने यमुना के जल में डूबकर प्राण दे दिए।

श्लोक 45 (2.14.45)

विना हंसेन लोकेऽस्मिन्नाहं जीवितुमुत्सहे । इत्येतां मतिमास्थाय डिबिको निधनं गतः ॥

vinā haṃsena loke'sminnāhaṃ jīvitumutsahe | ityetāṃ matimāsthāya ḍibiko nidhanaṃ gataḥ

यह कहकर कि "हंस के बिना मैं इस संसार में जीवित नहीं रह सकता।" यही निश्चय करके डिबिक मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 46 (2.14.46)

तथा तु डिबिकं श्रुत्वा हंसः परपुरञ्जयः । प्रपेदे यमुनामेव सोपि तस्यां न्यमज्जत ॥

tathā tu ḍibikaṃ śrutvā haṃsaḥ parapurañjayaḥ | prapede yamunāmeva sopi tasyāṃ nyamajjata

और शत्रुओं के नगर जीतने वाले हंस ने भी डिबिक का समाचार सुनकर यमुना की शरण ली और उसी में डूब गया।

श्लोक 47 (2.14.47)

तौ स राजा जरासन्धः श्रुत्वा च निधनं गतौ । पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ ॥

tau sa rājā jarāsandhaḥ śrutvā ca nidhanaṃ gatau | puraṃ śūnyena manasā prayayau bharatarṣabha

भरतश्रेष्ठ, उन दोनों की मृत्यु का समाचार सुनकर राजा जरासन्ध सूने मन से अपने नगर लौट गया।

श्लोक 48 (2.14.48)

ततो वयममित्रघ्न तस्मिन्प्रतिगते नृपे । पुनरानन्दिनः सर्वे मधुरायां वसामहे ॥

tato vayamamitraghna tasminpratigate nṛpe | punarānandinaḥ sarve madhurāyāṃ vasāmahe

शत्रुनाशक, उस राजा के लौट जाने पर हम सब फिर से आनन्दित होकर मधुरा (मथुरा) में रहने लगे।

श्लोक 49 (2.14.49)

यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना । कंसभार्या जरासन्धं दुहिता मागधं नृपम् । चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता ॥

yadā tvabhyetya pitaraṃ sā vai rājīvalocanā | kaṃsabhāryā jarāsandhaṃ duhitā māgadhaṃ nṛpam | codayatyeva rājendra pativyasanaduḥkhitā

किंतु जब कंस की वह कमलनयनी पत्नी अपने पिता मगधराज जरासन्ध के पास गई और पति के विनाश से दुःखी होकर, हे राजेन्द्र, उसे उकसाने लगी,

श्लोक 50 (2.14.50)

पतिघ्नं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिन्दम । ततो वयं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् ॥

patighnaṃ me jahītyevaṃ punaḥ punararindama | tato vayaṃ mahārāja taṃ mantraṃ pūrvamantritam

बार-बार कहने लगी कि "मेरे पति के हत्यारे को मार डालो", तब महाराज, पहले की गई उस मन्त्रणा को

श्लोक 51 (2.14.51)

संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप । पृथक्त्वेन महाराज सङ्क्षिप्य महतीं श्रियम् ॥

saṃsmaranto vimanaso vyapayātā narādhipa | pṛthaktvena mahārāja saṅkṣipya mahatīṃ śriyam

स्मरण करके, नरेश्वर, हम खिन्न मन से वहाँ से चल पड़े। महाराज, अपनी विशाल सम्पत्ति को समेटकर, अलग-अलग होकर

श्लोक 52 (2.14.52)

पलायामो भयात्तस्य ससुतज्ञातिबान्धवाः । इति सञ्चिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः ॥

palāyāmo bhayāttasya sasutajñātibāndhavāḥ | iti sañcintya sarve sma pratīcīṃ diśamāśritāḥ

पुत्रों, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों सहित हम उसके भय से भाग निकले। ऐसा सोचकर हम सबने पश्चिम दिशा का आश्रय लिया,

श्लोक 53 (2.14.53)

कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् । ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप ॥

kuśasthalīṃ purīṃ ramyāṃ raivatenopaśobhitām | tato niveśaṃ tasyāṃ ca kṛtavanto vayaṃ nṛpa

रैवतक पर्वत से सुशोभित रमणीय नगरी कुशस्थली में। राजन्, वहाँ हमने अपना निवास बसाया,

श्लोक 54 (2.14.54)

तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम् । स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः ॥

tathaiva durgasaṃskāraṃ devairapi durāsadam | striyo'pi yasyāṃ yudhyeyuḥ kimu vṛṣṇimahārathāḥ

और वैसे ही ऐसा दुर्ग बनाया जिसे देवता भी कठिनाई से भेद सकें; जिसमें स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकें, फिर वृष्णियों के महारथियों का तो कहना ही क्या!

श्लोक 55 (2.14.55)

तस्यां वयममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभयाः । आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च ॥

tasyāṃ vayamamitraghna nivasāmo'kutobhayāḥ | ālocya girimukhyaṃ taṃ māgadhaṃ tīrṇameva ca

शत्रुनाशक, वहाँ हम निर्भय होकर रहते हैं। उस श्रेष्ठ पर्वत को देखकर, और यह जानकर कि मगधराज का संकट पार हो गया है,

श्लोक 56 (2.14.56)

माधवाः कुरुशार्दूल परां मुदमवाप्नुवन् । एवं वयं जरासन्धादभितः कृतकिल्बिषाः ॥

mādhavāḥ kuruśārdūla parāṃ mudamavāpnuvan | evaṃ vayaṃ jarāsandhādabhitaḥ kṛtakilbiṣāḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, माधवों को परम आनन्द हुआ। इस प्रकार जरासन्ध के द्वारा सब ओर से सताए जाने पर भी

श्लोक 57 (2.14.57)

सामर्थ्यवन्तः सम्बन्धाद्गोमन्तं समुपाश्रिताः । त्रियोजनायतं सद्म त्रिस्कन्धं योजनावधि ॥

sāmarthyavantaḥ sambandhādgomantaṃ samupāśritāḥ | triyojanāyataṃ sadma triskandhaṃ yojanāvadhi

समर्थ होते हुए भी, सम्बन्ध का विचार करके हमने गोमन्त पर्वत का आश्रय लिया। वहाँ हमारा निवास तीन योजन लंबा है, तीन खण्डों वाला, प्रत्येक एक योजन तक फैला हुआ;

श्लोक 58 (2.14.58)

योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम् । अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः ॥

yojanānte śatadvāraṃ vīravikramatoraṇam | aṣṭādaśāvarairnaddhaṃ kṣatriyairyuddhadurmadaiḥ

हर योजन के छोर पर सौ द्वार हैं, वीरों के पराक्रम के योग्य तोरण हैं, और युद्ध के मद में चूर अठारह छोटे कुलों के क्षत्रिय उसकी रक्षा में डटे हैं।

श्लोक 59 (2.14.59)

अष्टादश सहस्राणि भ्रातृणां सन्ति नः कुले । आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः ॥

aṣṭādaśa sahasrāṇi bhrātṛṇāṃ santi naḥ kule | āhukasya śataṃ putrā ekaikastridaśāvaraḥ

हमारे कुल में अठारह हज़ार भाई हैं। आहुक के सौ पुत्र हैं, जिनमें से प्रत्येक देवताओं से ही कुछ कम है।

श्लोक 60 (2.14.60)

चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः । अहं च रोहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च ॥

cārudeṣṇaḥ saha bhrātrā cakradevo'tha sātyakiḥ | ahaṃ ca rohiṇeyaśca sāmbaḥ pradyumna eva ca

भाई सहित चारुदेष्ण, चक्रदेव, सात्यकि, मैं, रोहिणीनन्दन बलराम, साम्ब और प्रद्युम्न —

श्लोक 61 (2.14.61)

एवमेते रथाः सप्त राजन्नन्यान्निबोध मे । कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समितिञ्जयः ॥

evamete rathāḥ sapta rājannanyānnibodha me | kṛtavarmā hyanādhṛṣṭiḥ samīkaḥ samitiñjayaḥ

राजन्, ये सात रथी हैं। अब दूसरों के विषय में मुझसे सुनिए — कृतवर्मा, अनाधृष्टि, समीक, समितिञ्जय,

श्लोक 62 (2.14.62)

कङ्कः शङ्कुश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः । प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भानुरक्रूरसारणौ ॥

kaṅkaḥ śaṅkuśca kuntiśca saptaite vai mahārathāḥ | pradyumnaścāniruddhaśca bhānurakrūrasāraṇau

कंक, शंकु और कुन्ति — ये सात महारथी हैं। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, भानु, अक्रूर, सारण,

श्लोक 63 (2.14.63)

निशठश्च गदश्चैव सप्त चैते महारथाः । विकमो झिल्लिबभ्रू च उद्धवोऽथ विदूरथः ॥

niśaṭhaśca gadaścaiva sapta caite mahārathāḥ | vikamo jhillibabhrū ca uddhavo'tha vidūrathaḥ

निशठ और गद — ये सात भी महारथी हैं। विकम, झिल्ली, बभ्रु, उद्धव, विदूरथ,

श्लोक 64 (2.14.64)

वसुदेवोग्रसेनौ च सप्तैते मन्त्रिपुङ्गवाः । प्रसेनजिच्च यमलो राजराजगुणान्वितः ॥

vasudevograsenau ca saptaite mantripuṅgavāḥ | prasenajicca yamalo rājarājaguṇānvitaḥ

वसुदेव और उग्रसेन — ये सात श्रेष्ठ मन्त्री हैं। प्रसेनजित् और उसका यमल भाई, जो राजाधिराज के गुणों से सम्पन्न है,

श्लोक 65 (2.14.65)

स्यमन्तको मणिर्यस्य रुक्मं निस्रुवते बहु । पुत्रौ चान्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश ॥

syamantako maṇiryasya rukmaṃ nisruvate bahu | putrau cāndhakabhojasya vṛddho rājā ca te daśa

जिसकी स्यमन्तक मणि बहुत-सा सोना बहाती है; अन्धकभोज के दो पुत्र और वृद्ध राजा — ये दस हैं।

श्लोक 66 (2.14.66)

वज्रसंहनना वीरा वीर्यवन्तो महाबलाः । स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिवीरा गतज्वराः ॥

vajrasaṃhananā vīrā vīryavanto mahābalāḥ | smaranto madhyamaṃ deśaṃ vṛṣṇivīrā gatajvarāḥ

वज्र के समान दृढ़ शरीर वाले, पराक्रमी और महाबली वृष्णि वीर अब निश्चिन्त होकर भी मध्य देश को याद करते हैं।

श्लोक 67 (2.14.67)

पाण्डवैश्चापि सततं नाथवन्तो वयं नृप । सर्वसम्पद्गुणैः सिद्धे तस्मिन्नेवं व्यवस्थिते ॥

pāṇḍavaiścāpi satataṃ nāthavanto vayaṃ nṛpa | sarvasampadguṇaiḥ siddhe tasminnevaṃ vyavasthite

राजन्, पाण्डवों के कारण हम सदा सनाथ हैं। आप सब प्रकार की सम्पदा और गुणों से सिद्ध हैं; ऐसी स्थिति में

श्लोक 68 (2.14.68)

क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत । दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम् ॥

kṣatre samrājamātmānaṃ kartumarhasi bhārata | duryodhanaṃ śāntanavaṃ droṇaṃ drauṇāyaniṃ kṛpam

भारत, आपको क्षत्रियों में स्वयं को सम्राट् बनाना चाहिए। किंतु दुर्योधन, शान्तनुनन्दन भीष्म, द्रोण, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, कृप,

श्लोक 69 (2.14.69)

कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम् । एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च ॥

karṇaṃ ca śiśupālaṃ ca rukmiṇaṃ ca dhanurdharam | ekalavyaṃ drumaṃ śvetaṃ śaibyaṃ śakunimeva ca

कर्ण, शिशुपाल, धनुर्धर रुक्मी, एकलव्य, द्रुम, श्वेत, शैब्य और शकुनि —

श्लोक 70 (2.14.70)

एतानजित्वा सङ्ग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम् । तथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः ॥

etānajitvā saṅgrāme kathaṃ śaknoṣi taṃ kratum | tathaite gauraveṇaiva na yotsyanti narādhipāḥ

इन्हें युद्ध में जीते बिना आप वह यज्ञ कैसे कर सकेंगे? फिर भी ये नरेश आपके प्रति गौरव के कारण आपसे युद्ध नहीं करेंगे।

श्लोक 71 (2.14.71)

एकस्तत्र बलोन्मत्तः कर्णो वैकर्तनो वृषा । योत्स्यते स परामर्षी दिव्यास्त्रबलगर्वितः ॥

ekastatra balonmattaḥ karṇo vaikartano vṛṣā | yotsyate sa parāmarṣī divyāstrabalagarvitaḥ

उनमें केवल एक — बल से उन्मत्त, असहिष्णु और दिव्यास्त्रों के बल पर गर्वित वैकर्तन कर्ण, जिसे वृषा भी कहते हैं — युद्ध करेगा।

श्लोक 72 (2.14.72)

न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबल । राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेषा राजन्मतिर्मम ॥

na tu śakyaṃ jarāsandhe jīvamāne mahābala | rājasūyastvayā'vāptumeṣā rājanmatirmama

किंतु महाबली, जरासन्ध के जीवित रहते आप राजसूय यज्ञ सम्पन्न नहीं कर सकते — राजन्, यह मेरा मत है।

श्लोक 73 (2.14.73)

तेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिव्रजे । कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः ॥

tena ruddhā hi rājānaḥ sarve jitvā girivraje | kandare parvatendrasya siṃheneva mahādvipāḥ

क्योंकि उसने सब राजाओं को जीतकर गिरिव्रज में बन्दी बना रखा है, जैसे सिंह पर्वतराज की कन्दरा में बड़े-बड़े हाथियों को रोक रखता है।

श्लोक 74 (2.14.74)

स हि राजा जरासन्धो यियक्षुर्वसुधाधिपैः । अभिषिक्तः स राजन्यैः सहस्रैरुत चाष्टभिः । महादेवं महात्मानमुमापतिमरिन्दम ॥

sa hi rājā jarāsandho yiyakṣurvasudhādhipaiḥ | abhiṣiktaḥ sa rājanyaiḥ sahasrairuta cāṣṭabhiḥ | mahādevaṃ mahātmānamumāpatimarindama

क्योंकि राजा जरासन्ध, जिसका अभिषेक आठ हज़ार राजकुमारों ने किया था, पृथ्वीपतियों की बलि देकर यज्ञ करना चाहता है। हे शत्रुदमन, उमापति महात्मा महादेव की

श्लोक 75 (2.14.75)

आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवाः । प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम ॥

ārādhya tapasogreṇa nirjitāstena pārthivāḥ | pratijñāyāśca pāraṃ sa gataḥ pārthivasattama

उग्र तपस्या से आराधना करके उसने राजाओं को जीता है, और हे नृपश्रेष्ठ, वह अपनी प्रतिज्ञा के पार पहुँच चुका है।

श्लोक 76 (2.14.76)

स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान्पृतनागतान् । पुरमानीय बद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम् ॥

sa hi nirjitya nirjitya pārthivānpṛtanāgatān | puramānīya baddhvā ca cakāra puruṣavrajam

युद्ध में सामने आए राजाओं को एक-एक कर जीतकर, उन्हें अपने नगर में लाकर और बाँधकर उसने मनुष्यों का बाड़ा बना रखा है।

श्लोक 77 (2.14.77)

वयं चैव महाराज जरासन्धभयात्तदा । मधुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ॥

vayaṃ caiva mahārāja jarāsandhabhayāttadā | madhurāṃ samparityajya gatā dvāravatīṃ purīm

और महाराज, हम भी उस समय जरासन्ध के भय से मधुरा को छोड़कर द्वारवती नगरी चले गए।

श्लोक 78 (2.14.78)

यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि । यतस्व तेषां मोक्षाय जरासन्धवधाय च ॥

yadi tvenaṃ mahārāja yajñaṃ prāptumabhīpsasi | yatasva teṣāṃ mokṣāya jarāsandhavadhāya ca

महाराज, यदि आप इस यज्ञ को सम्पन्न करना चाहते हैं, तो उन राजाओं को छुड़ाने और जरासन्ध के वध का प्रयत्न कीजिए।

श्लोक 79 (2.14.79)

समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन । राजसूयस्य कार्त्स्न्येन कर्तुं मतिमतां वर ॥

samārambho na śakyo'yamanyathā kurunandana | rājasūyasya kārtsnyena kartuṃ matimatāṃ vara

हे कुरुनन्दन, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, अन्यथा राजसूय का यह आयोजन पूर्ण रूप से सम्पन्न नहीं किया जा सकता।

श्लोक 80 (2.14.80)

इत्येषा मे मती राजन्यथा वा मन्यसेऽनघ । एवं गते ममाचक्ष्व स्वयं निश्चित्य हेतुभिः ॥

ityeṣā me matī rājanyathā vā manyase'nagha | evaṃ gate mamācakṣva svayaṃ niścitya hetubhiḥ

राजन्, यह मेरा मत है; अथवा, हे निष्पाप, जैसा आप उचित समझें। ऐसी स्थिति में स्वयं कारणों पर विचार करके निश्चय कीजिए और मुझे बताइए।

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