सभा पर्व · अध्याय 15
जरासन्ध के विरुद्ध भीम और श्रीकृष्ण का उद्यम-परामर्श
युधिष्ठिर श्रीकृष्ण की मन्त्रणा की प्रशंसा करते हैं, किंतु जरासन्ध से आशंकित होकर शान्ति की ओर झुकते हैं और संदेह करते हैं कि उसे कृष्ण, बलराम, भीम या अर्जुन भी मार सकेंगे या नहीं। भीम साहसपूर्ण उद्यम का पक्ष लेते हैं — कृष्ण की नीति, उनका अपना बल और अर्जुन की विजय मिलकर मगधराज को वैसे ही साध लेंगे जैसे तीन अग्नियाँ यज्ञ को। श्रीकृष्ण प्राचीन पाँच सम्राटों का उल्लेख करके जरासन्ध के अत्याचार का वर्णन करते हैं — वह छियासी बन्दी राजाओं को शिव को बलि देने के लिए इकट्ठा कर चुका है, केवल चौदह शेष हैं, और जो उसे जीतेगा वह निश्चय ही सम्राट् होगा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (2.15.1)
उक्तं त्वया बुद्धिमता यन्नान्यो वक्तुमर्हति । संशयानां हि निर्मोक्ता त्वन्नान्यो विद्यते भुवि ॥
uktaṃ tvayā buddhimatā yannānyo vaktumarhati | saṃśayānāṃ hi nirmoktā tvannānyo vidyate bhuvi
आप बुद्धिमान ने वह बात कही है जो कोई दूसरा नहीं कह सकता। संशयों को दूर करने वाला पृथ्वी पर आपके सिवा कोई नहीं है।
श्लोक 2 (2.15.2)
गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियङ्कराः । न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट्शब्दो हि कृच्छ्रभाक् ॥
gṛhe gṛhe hi rājānaḥ svasya svasya priyaṅkarāḥ | na ca sāmrājyamāptāste samrāṭśabdo hi kṛcchrabhāk
घर-घर में राजा हैं, जो अपना-अपना प्रिय करते हैं; परन्तु वे साम्राज्य नहीं पा सके, क्योंकि सम्राट् की उपाधि कठिनाई से मिलती है।
श्लोक 3 (2.15.3)
कथं परानुभावज्ञः स्वं प्रशंसितुमर्हति । परेण समवेतस्तु यः प्रशस्यः स पूज्यते ॥
kathaṃ parānubhāvajñaḥ svaṃ praśaṃsitumarhati | pareṇa samavetastu yaḥ praśasyaḥ sa pūjyate
जो दूसरों के प्रभाव को जानता है, वह अपनी प्रशंसा कैसे कर सकता है? जो दूसरे से भिड़कर भी प्रशंसनीय सिद्ध हो, वही पूजा जाता है।
श्लोक 4 (2.15.4)
विशाला बहुला भूमिर्बहुरत्नसमाचिता । दूरं गत्वा विजानाति श्रेयो वृष्णिकुलोद्वह ॥
viśālā bahulā bhūmirbahuratnasamācitā | dūraṃ gatvā vijānāti śreyo vṛṣṇikulodvaha
हे वृष्णिकुलभूषण, पृथ्वी विशाल और विस्तृत है, अनेक रत्नों से भरी है; दूर तक जाकर ही मनुष्य जान पाता है कि श्रेष्ठ क्या है।
श्लोक 5 (2.15.5)
शममेव परं मन्ये शमात्क्षेमं भवेन्मम । आरम्भे पारमेष्ठ्यं तु न प्राप्यमिति मे मतिः ॥
śamameva paraṃ manye śamātkṣemaṃ bhavenmama | ārambhe pārameṣṭhyaṃ tu na prāpyamiti me matiḥ
मैं शान्ति को ही सर्वोत्तम मानता हूँ; शान्ति से ही मेरा कल्याण होगा। यह उद्यम आरम्भ करके परम पद प्राप्त नहीं होगा, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 6 (2.15.6)
एवमेते हि जानन्ति कुले जाता मनस्विनः । कश्चित्कदाचिदेतेषां भवेच्छ्रेष्ठो जनार्दन ॥
evamete hi jānanti kule jātā manasvinaḥ | kaścitkadācideteṣāṃ bhavecchreṣṭho janārdana
हे जनार्दन, उच्च कुलों में जन्मे मनस्वी पुरुष ऐसा ही समझते हैं — इनमें से कभी कोई एक श्रेष्ठ बन जाता है।
श्लोक 7 (2.15.7)
वयं चैव महाभाग जरासन्धभयात्तदा । शङ्किताः स्म महाभाग दौरात्म्यात्तस्य चानघ ॥
vayaṃ caiva mahābhāga jarāsandhabhayāttadā | śaṅkitāḥ sma mahābhāga daurātmyāttasya cānagha
हे महाभाग, हम भी उस समय जरासन्ध के भय से, हे निष्पाप, उसकी दुष्टता के कारण शंकित थे।
श्लोक 8 (2.15.8)
अहं हि तव दुर्धर्ष भुजवीर्याश्रयः प्रभो । नात्मानं बलिनं मन्ये त्वयि तस्माद्विशङ्किते ॥
ahaṃ hi tava durdharṣa bhujavīryāśrayaḥ prabho | nātmānaṃ balinaṃ manye tvayi tasmādviśaṅkite
हे दुर्धर्ष प्रभु, मैं तो आपकी भुजाओं के बल पर ही आश्रित हूँ। जब आप ही शंकित हैं, तब मैं स्वयं को बलवान नहीं मानता।
श्लोक 9 (2.15.9)
त्वत्सकाशाच्च रामाच्च भीमसेनाच्च माधव । अर्जुनाद्वा महाबाहो हन्तुं शक्यो नवेति वै । एवं जानन्हि वार्ष्णेय विमृशामि पुनः पुनः ॥
tvatsakāśācca rāmācca bhīmasenācca mādhava | arjunādvā mahābāho hantuṃ śakyo naveti vai | evaṃ jānanhi vārṣṇeya vimṛśāmi punaḥ punaḥ
हे माधव, महाबाहु, वह आपसे, बलराम से, भीमसेन से या अर्जुन से मारा जा सकता है या नहीं — यह सब जानते हुए, हे वार्ष्णेय, मैं बार-बार विचार करता हूँ।
श्लोक 10 (2.15.10)
त्वं मे प्रमाणभूतोऽसि सर्वकार्येषु केशव ॥
tvaṃ me pramāṇabhūto'si sarvakāryeṣu keśava
हे केशव, सब कार्यों में आप ही मेरे लिए प्रमाण हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (2.15.11)
तच्छ्रुत्वा चाब्रवीद्भीमो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
tacchrutvā cābravīdbhīmo vākyaṃ vākyaviśāradaḥ
यह सुनकर वाक्पटु भीम ने ये वचन कहे।
भीम उवाच
श्लोक 12 (2.15.12)
अनारम्भपरो राजा वल्मीक इव सीदति । दुर्बलश्चानुपायेन बलिनं योऽधितिष्ठति ॥
anārambhaparo rājā valmīka iva sīdati | durbalaścānupāyena balinaṃ yo'dhitiṣṭhati
जो राजा कोई उद्यम आरम्भ नहीं करता, वह दीमक की बाँबी की तरह ढह जाता है; और वह दुर्बल भी, जो बिना उपाय के बलवान पर चढ़ाई करता है।
श्लोक 13 (2.15.13)
अतन्द्रितश्च प्रायेण दुर्बलो बलिनं रिपुम् । जयेत्सम्यक्प्रयोगेण नीत्याऽर्थानात्मनो हितान् ॥
atandritaśca prāyeṇa durbalo balinaṃ ripum | jayetsamyakprayogeṇa nītyā'rthānātmano hitān
किंतु सदा सजग रहने वाला दुर्बल भी प्रायः उपायों के उचित प्रयोग से बलवान शत्रु को जीत लेता है, और नीति से अपने हितकारी प्रयोजन प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (2.15.14)
कृष्णे नयो मयि बलं जयः पार्थे धनञ्जये । मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नयः ॥
kṛṣṇe nayo mayi balaṃ jayaḥ pārthe dhanañjaye | māgadhaṃ sādhayiṣyāma iṣṭiṃ traya ivāgnayaḥ
कृष्ण में नीति है, मुझमें बल है, और पार्थ धनञ्जय में विजय। जैसे तीन अग्नियाँ यज्ञ को सिद्ध करती हैं, वैसे ही हम मगधराज को साध लेंगे।
श्लोक 15 (2.15.15)
त्वद्बुद्धिबलमाश्रित्य सर्वं प्राप्स्यति धर्मराट् । जयोऽस्माकं हि गोविन्द येषां नाथो भवान्सदा ॥
tvadbuddhibalamāśritya sarvaṃ prāpsyati dharmarāṭ | jayo'smākaṃ hi govinda yeṣāṃ nātho bhavānsadā
आपकी बुद्धि के बल का आश्रय लेकर धर्मराज सब कुछ प्राप्त कर लेंगे। हे गोविन्द, विजय हमारी ही है, क्योंकि आप सदा हमारे रक्षक हैं।
कृष्ण उवाच
श्लोक 16 (2.15.16)
अर्थानारभते बालो नानुबन्धमवेक्षते । तस्मादरिं न मृष्यन्ति बालमर्थपरायणम् ॥
arthānārabhate bālo nānubandhamavekṣate | tasmādariṃ na mṛṣyanti bālamarthaparāyaṇam
मूर्ख अपने प्रयोजन आरम्भ कर देता है पर परिणाम नहीं देखता। इसीलिए स्वार्थ में डूबे मूर्ख शत्रु को लोग सहन नहीं करते।
श्लोक 17 (2.15.17)
जित्वा जय्यान्यौवनाश्विः पालनाच्च भगीरथः । कार्तवीर्यस्तपोवीर्याद्बलात्तु भरतो विभुः ॥
jitvā jayyānyauvanāśviḥ pālanācca bhagīrathaḥ | kārtavīryastapovīryādbalāttu bharato vibhuḥ
जीतने योग्य राजाओं को जीतकर युवनाश्वपुत्र (मान्धाता), प्रजापालन से भगीरथ, तप के बल से कार्तवीर्य और बल से प्रभु भरत,
श्लोक 18 (2.15.18)
ऋद्ध्या मरुत्तस्तान्पञ्च सम्राजस्त्वनुशुश्रुम । सर्वान्वंश्याननुमृशन्नैते सन्ति युगे युगे ॥
ṛddhyā maruttastānpañca samrājastvanuśuśruma | sarvānvaṃśyānanumṛśannaite santi yuge yuge
तथा समृद्धि से मरुत्त — इन पाँचों को हमने सम्राट् सुना है। सभी राजवंशों पर दृष्टि डालें तो ऐसे पुरुष हर युग में नहीं होते।
श्लोक 19 (2.15.19)
साम्राज्यमिच्छतस्ते तु सर्वाकारं युधिष्ठिर । निग्राह्यलक्षणं प्राप्तिर्धर्मार्थनयलक्षणैः ॥
sāmrājyamicchataste tu sarvākāraṃ yudhiṣṭhira | nigrāhyalakṣaṇaṃ prāptirdharmārthanayalakṣaṇaiḥ
किंतु हे युधिष्ठिर, आप सब प्रकार का साम्राज्य चाहते हैं, और धर्म, अर्थ तथा नीति के लक्षणों से युक्त प्राप्ति आपके लिए सुलभ है। जिसमें दण्डनीय होने के लक्षण हैं,
श्लोक 20 (2.15.20)
बार्हद्रथो जरासन्धस्तद्विद्धि भरतर्षभ । न चैनं प्रत्ययुध्यन्त कुलान्येकशतं नृपाः ॥
bārhadratho jarāsandhastadviddhi bharatarṣabha | na cainaṃ pratyayudhyanta kulānyekaśataṃ nṛpāḥ
वह बृहद्रथपुत्र जरासन्ध है — भरतश्रेष्ठ, इसे जान लीजिए। एक सौ एक राजकुलों ने उसका प्रतिरोध नहीं किया।
श्लोक 21 (2.15.21)
तस्मादिह बलादेव साम्राज्यं कुरुते हि सः ॥
tasmādiha balādeva sāmrājyaṃ kurute hi saḥ
इसीलिए वह यहाँ केवल बल के सहारे साम्राज्य चला रहा है।
श्लोक 22 (2.15.22)
रत्नभाजो हि राजानो जरासन्धमुपासते । न च तुष्यति तेनापि बाल्यादनयमास्थितः ॥
ratnabhājo hi rājāno jarāsandhamupāsate | na ca tuṣyati tenāpi bālyādanayamāsthitaḥ
रत्नों के स्वामी राजा जरासन्ध की सेवा करते हैं; फिर भी वह उससे संतुष्ट नहीं होता, क्योंकि उसने मूर्खतावश अनीति अपना रखी है।
श्लोक 23 (2.15.23)
मूर्धाभिषिक्तं नृपतिं प्रधानपुरुषो बलात् । आदत्ते न च नो दृष्टोऽभागः पुरुषतः क्वचित् ॥
mūrdhābhiṣiktaṃ nṛpatiṃ pradhānapuruṣo balāt | ādatte na ca no dṛṣṭo'bhāgaḥ puruṣataḥ kvacit
वह प्रधान पुरुष मूर्धाभिषिक्त राजा को भी बलपूर्वक पकड़ ले जाता है; और मनुष्यों में कोई ऐसा हमने नहीं देखा जिसे उसने छोड़ दिया हो।
श्लोक 24 (2.15.24)
एवं सर्वान्वशे चक्रे जरासन्धः शतावरान् । तं दुर्बलतरो राजा कथं पार्थ उपैष्यति ॥
evaṃ sarvānvaśe cakre jarāsandhaḥ śatāvarān | taṃ durbalataro rājā kathaṃ pārtha upaiṣyati
इस प्रकार जरासन्ध ने कम से कम सौ राजाओं को अपने वश में कर लिया है। तब, हे पार्थ, कोई उससे दुर्बल राजा उसका सामना कैसे करेगा?
श्लोक 25 (2.15.25)
तण्डुलप्रस्थके राजा कपर्दिनमुपासते । प्रोक्षितानां प्रमृष्टानां राज्ञां पशुपतेर्गृहे । पशूनामिव का प्रीतिर्जीविते भरतर्षभ ॥
taṇḍulaprasthake rājā kapardinamupāsate | prokṣitānāṃ pramṛṣṭānāṃ rājñāṃ paśupatergṛhe | paśūnāmiva kā prītirjīvite bharatarṣabha
राजा (जरासन्ध) एक प्रस्थ चावल से कपर्दी शिव की उपासना करता है। हे भरतश्रेष्ठ, पशुपति के मन्दिर में बलि-पशुओं की भाँति जल छिड़ककर और शुद्ध करके रखे गए राजाओं को जीवन में क्या सुख है?
श्लोक 26 (2.15.26)
क्षत्रियः शस्त्रमरणो यदा भवति सत्कृतः । ततः स्म मागधं सङ्ख्ये प्रतिबाधेम यद्वयम् ॥
kṣatriyaḥ śastramaraṇo yadā bhavati satkṛtaḥ | tataḥ sma māgadhaṃ saṅkhye pratibādhema yadvayam
जब शस्त्र से मरने वाला क्षत्रिय सम्मान पाता है, तो हमें भी युद्ध में मगधराज का प्रतिरोध करना चाहिए।
श्लोक 27 (2.15.27)
षडशीतिः समानीताः शेषा राजंश्चतुर्दश । जरासन्धेन राजानस्ततः क्रूरं प्रवर्त्स्यते ॥
ṣaḍaśītiḥ samānītāḥ śeṣā rājaṃścaturdaśa | jarāsandhena rājānastataḥ krūraṃ pravartsyate
राजन्, जरासन्ध छियासी राजाओं को ला चुका है, केवल चौदह शेष हैं। उसके बाद वह क्रूर कर्म आरम्भ होगा।
श्लोक 28 (2.15.28)
प्राप्नुयात्स यशो दीप्तं तत्र यो विघ्नमाचरेत् । जयेद्यश्च जरासन्धं स सम्राण्नियतं भवेत् ॥
prāpnuyātsa yaśo dīptaṃ tatra yo vighnamācaret | jayedyaśca jarāsandhaṃ sa samrāṇniyataṃ bhavet
जो वहाँ उसके कार्य में बाधा डालेगा, वह उज्ज्वल यश पाएगा; और जो जरासन्ध को जीतेगा, वह निश्चय ही सम्राट् होगा।