सभा पर्व · अध्याय 16
पराक्रम के पक्ष में अर्जुन का तर्क
युधिष्ठिर भीम, अर्जुन और श्रीकृष्ण को — जिन्हें वे अपने दो नेत्र और अपना मन मानते हैं — जरासन्ध की शक्ति के सामने भेजने से हिचकते हैं और राजसूय को ही छोड़ देने की ओर झुकते हैं। तब श्रेष्ठ धनुष, अक्षय तरकश, रथ और ध्वजा प्राप्त कर चुके अर्जुन उत्तर देते हैं कि पराक्रम कुल और अन्य सब गुणों से बढ़कर है, दीनता और मोह राजा का नाश करते हैं, और जरासन्ध का वध तथा बन्दी राजाओं की रक्षा सबसे बड़ा कार्य होगा। वे कहते हैं कि संन्यास का गेरुआ वस्त्र बाद में भी मिल सकता है, साम्राज्य अभी जीता जा सकता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (2.16.1)
सम्राड्गुणमभीप्सन्वै युष्मान्स्वार्थपरायणः । कथं प्रहिणुयां कृष्ण सोऽहं केवलसाहसात् ॥
samrāḍguṇamabhīpsanvai yuṣmānsvārthaparāyaṇaḥ | kathaṃ prahiṇuyāṃ kṛṣṇa so'haṃ kevalasāhasāt
हे कृष्ण, सम्राट् पद की चाह में अपने ही स्वार्थ में लगा मैं केवल दुस्साहस के भरोसे आप लोगों को वहाँ कैसे भेज दूँ?
श्लोक 2 (2.16.2)
भीमार्जुनावुभौ नेत्रे मनो मन्ये जनार्दनम् । मनश्चक्षुर्विहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत् ॥
bhīmārjunāvubhau netre mano manye janārdanam | manaścakṣurvihīnasya kīdṛśaṃ jīvitaṃ bhavet
भीम और अर्जुन को मैं अपने दो नेत्र मानता हूँ और जनार्दन को अपना मन। मन और नेत्रों से रहित मनुष्य का जीवन कैसा होगा?
श्लोक 3 (2.16.3)
जरासन्धबलं प्राप्य दुष्पारं भीमविक्रमम् । यमोपि न विजेताऽऽजौ तत्र वः किं विचेष्टितम् ॥
jarāsandhabalaṃ prāpya duṣpāraṃ bhīmavikramam | yamopi na vijetā''jau tatra vaḥ kiṃ viceṣṭitam
जरासन्ध की दुर्जय और भयंकर पराक्रम वाली सेना से भिड़कर यमराज भी युद्ध में विजयी नहीं हो सकते; वहाँ आप लोग क्या कर पाएँगे?
श्लोक 4 (2.16.4)
अस्मिंस्त्वर्थान्तरे युक्तमनर्थः प्रतिपद्यते । तस्मान्न प्रतिपत्तिस्तु कार्या युक्ता मता मम ॥
asmiṃstvarthāntare yuktamanarthaḥ pratipadyate | tasmānna pratipattistu kāryā yuktā matā mama
इस विषय में परिणाम उलटा भी हो सकता है और अनर्थ आ सकता है। इसलिए मेरे मत में इसे हाथ में लेना उचित नहीं।
श्लोक 5 (2.16.5)
यथाऽहं विमृशाम्येकस्तत्तावच्छ्रूयतां मम । संन्यासं रोचये साधु कार्यस्यास्य जनार्दन । प्रतिहन्ति मनो मेऽद्य राजसूयो दुराहरः ॥
yathā'haṃ vimṛśāmyekastattāvacchrūyatāṃ mama | saṃnyāsaṃ rocaye sādhu kāryasyāsya janārdana | pratihanti mano me'dya rājasūyo durāharaḥ
हे जनार्दन, मैं अकेले जो विचार करता हूँ, वह सुनिए — मुझे यही उचित लगता है कि इस कार्य को छोड़ दिया जाए। कठिनाई से सिद्ध होने वाला राजसूय आज मेरे मन को हतोत्साह कर रहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (2.16.6)
पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेषुधी । रथं ध्वजं हयांश्चैव युधिष्ठिरमभाषत ॥
pārthaḥ prāpya dhanuḥ śreṣṭhamakṣayyau ca maheṣudhī | rathaṃ dhvajaṃ hayāṃścaiva yudhiṣṭhiramabhāṣata
श्रेष्ठ धनुष, दो विशाल अक्षय तरकश, रथ, ध्वजा और घोड़े प्राप्त कर चुके पार्थ ने तब युधिष्ठिर से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 7 (2.16.7)
धनुः शस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् । प्राप्तमेतन्मया राजन्दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ॥
dhanuḥ śastraṃ śarā vīryaṃ pakṣo bhūmiryaśo balam | prāptametanmayā rājanduṣprāpaṃ yadabhīpsitam
राजन्, धनुष, शस्त्र, बाण, पराक्रम, सहायक, भूमि, यश और बल — ये दुर्लभ और अभीष्ट वस्तुएँ मैंने प्राप्त कर ली हैं।
श्लोक 8 (2.16.8)
कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिष्ठिताः । बलेन सदृशं नास्ति वीर्यं तु मम रोचते ॥
kule janma praśaṃsanti vaidyāḥ sādhu suniṣṭhitāḥ | balena sadṛśaṃ nāsti vīryaṃ tu mama rocate
भली-भाँति निष्ठावान विद्वान उत्तम कुल में जन्म की प्रशंसा करते हैं; पर बल के समान कुछ नहीं है, और मुझे तो पराक्रम ही प्रिय है।
श्लोक 9 (2.16.9)
कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्यः किं करिष्यति । निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते ॥
kṛtavīryakule jāto nirvīryaḥ kiṃ kariṣyati | nirvīrye tu kule jāto vīryavāṃstu viśiṣyate
पराक्रमी कुल में जन्म लेकर भी पराक्रमहीन मनुष्य क्या कर लेगा? किंतु पराक्रमहीन कुल में जन्मा पराक्रमी व्यक्ति श्रेष्ठ ठहरता है।
श्लोक 10 (2.16.10)
क्षत्रियः सर्वशो राजन्यस्य वृत्तिर्द्विषज्जये । सर्वैर्गुणैर्विहीनोऽपि वीर्यवान्हि तरेद्रिपून् ॥
kṣatriyaḥ sarvaśo rājanyasya vṛttirdviṣajjaye | sarvairguṇairvihīno'pi vīryavānhi taredripūn
राजन्, सब प्रकार से क्षत्रिय वही है जिसकी वृत्ति शत्रुओं पर विजय है। सब गुणों से रहित होकर भी पराक्रमी पुरुष शत्रुओं को पार कर जाता है।
श्लोक 11 (2.16.11)
सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति । जयस्य हेतुः सिद्धिर्हि कर्म दैवं च संश्रितम् ॥
sarvairapi guṇairyukto nirvīryaḥ kiṃ kariṣyati | jayasya hetuḥ siddhirhi karma daivaṃ ca saṃśritam
सब गुणों से युक्त होकर भी पराक्रमहीन क्या कर लेगा? विजय का कारण सिद्धि है, और वह कर्म तथा दैव पर आश्रित है।
श्लोक 12 (2.16.12)
संयुक्तो हि बलैः कश्चित्प्रमादान्नोपयुज्यते । तेन द्वारेण शत्रुभ्यः क्षीयते सबलो रिपुः ॥
saṃyukto hi balaiḥ kaścitpramādānnopayujyate | tena dvāreṇa śatrubhyaḥ kṣīyate sabalo ripuḥ
कोई सेनाओं से युक्त होकर भी असावधानी के कारण उनका उपयोग नहीं करता; उसी द्वार से बलवान शत्रु भी अपने विरोधियों के हाथों क्षीण हो जाता है।
श्लोक 13 (2.16.13)
दैन्यं यथाऽबलवति तथा मोहो बलान्विते । तावुभौ नाशकौ हेतू राज्ञा त्याज्यौ जयार्थिना ॥
dainyaṃ yathā'balavati tathā moho balānvite | tāvubhau nāśakau hetū rājñā tyājyau jayārthinā
जैसे दुर्बल को दीनता नष्ट करती है, वैसे ही बलवान को मोह। ये दोनों विनाश के कारण हैं; विजय चाहने वाले राजा को इन्हें त्याग देना चाहिए।
श्लोक 14 (2.16.14)
जरासन्धविनाशं च राज्ञां च परिरक्षणम् । यदि कुर्याम यज्ञार्थं किं ततः परमं भवेत् ॥
jarāsandhavināśaṃ ca rājñāṃ ca parirakṣaṇam | yadi kuryāma yajñārthaṃ kiṃ tataḥ paramaṃ bhavet
यदि यज्ञ के लिए हम जरासन्ध का विनाश और राजाओं की रक्षा कर सकें, तो उससे बढ़कर क्या होगा?
श्लोक 15 (2.16.15)
अनारम्भे हि नियतो भवेदगुणनिश्चयः । गुणान्निःसंशयाद्राजन्नैर्गुण्यं मन्यसे कथम् ॥
anārambhe hi niyato bhavedaguṇaniścayaḥ | guṇānniḥsaṃśayādrājannairguṇyaṃ manyase katham
यदि हम उद्यम न करें तो हमारे गुणहीन होने का निर्णय निश्चित है। राजन्, जब गुण निःसंदेह हमारे पास हैं, तब आप हमें गुणहीन क्यों मानते हैं?
श्लोक 16 (2.16.16)
काषायं सुलभं पश्चान्मुनीनां शममिच्छताम् । साम्राज्यं तु भवेच्छक्यं वयं योत्स्यामहे परान् ॥
kāṣāyaṃ sulabhaṃ paścānmunīnāṃ śamamicchatām | sāmrājyaṃ tu bhavecchakyaṃ vayaṃ yotsyāmahe parān
शान्ति चाहने वाले मुनियों का गेरुआ वस्त्र तो बाद में भी सुलभ है। किंतु साम्राज्य अभी प्राप्त किया जा सकता है; हम शत्रुओं से युद्ध करेंगे।