सभा पर्व · अध्याय 17
कृष्ण द्वारा जरासन्ध के जन्म का वृत्तान्त
कृष्ण अपनी योजना बताते हैं: उचित नीति और गुप्त उपाय से वे, भीम और अर्जुन जरासन्ध तक पहुँचकर उसका वध करेंगे। युधिष्ठिर के पूछने पर कि जरासन्ध कौन है, कृष्ण मगधराज बृहद्रथ की कथा सुनाते हैं, जिन्हें काशिराज की जुड़वाँ पुत्रियों — अपनी दोनों रानियों — से कोई पुत्र नहीं हुआ और वे निराश होकर वन चले गए। मुनि चण्डकौशिक ने उन्हें अभिमन्त्रित आम दिया; दोनों रानियों ने उसे बाँटकर खाया और प्रत्येक ने आधे-आधे शिशु को जन्म दिया, जिन्हें चौराहे पर फेंक दिया गया। जरा नाम की राक्षसी ने उन दोनों खण्डों को जोड़कर एक बलवान बालक बना दिया और मानव रूप धरकर उसे राजा को लौटा दिया; राजा उससे पूछते हैं कि वह कौन है।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (2.17.1)
जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्याः सुतस्य च । या वै युक्ता मतिः सेयमर्जुनेन प्रदर्शिता ॥
jātasya bhārate vaṃśe tathā kuntyāḥ sutasya ca | yā vai yuktā matiḥ seyamarjunena pradarśitā
"भरतवंश में जन्मे और कुन्ती के पुत्र के योग्य जो निश्चय होना चाहिए, वही अर्जुन ने प्रकट किया है।
श्लोक 2 (2.17.2)
न स्म मृत्युं वयं विद्म रात्रौ वा यदि वा दिवा । न चापि कञ्चिदमरमयुद्धेनानुशुश्रुम ॥
na sma mṛtyuṃ vayaṃ vidma rātrau vā yadi vā divā | na cāpi kañcidamaramayuddhenānuśuśruma
हम नहीं जानते कि मृत्यु रात में आएगी या दिन में; और न ही हमने कभी सुना कि युद्ध न करने से कोई अमर हो गया हो।
श्लोक 3 (2.17.3)
एतावदेव पुरुषैः कार्यं हृदयतोषणम् । नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान् ॥
etāvadeva puruṣaiḥ kāryaṃ hṛdayatoṣaṇam | nayena vidhidṛṣṭena yadupakramate parān
मनुष्यों को अपने हृदय की तुष्टि के लिए बस इतना ही करना चाहिए कि वे शास्त्र-विहित नीति से शत्रुओं पर चढ़ाई करें।
श्लोक 4 (2.17.4)
सुनयस्यानपायस्य संयोगे परमः क्रमः । सङ्गत्या जायतेऽसाम्यं साम्यं च न भवेद्द्वयोः ॥
sunayasyānapāyasya saṃyoge paramaḥ kramaḥ | saṅgatyā jāyate'sāmyaṃ sāmyaṃ ca na bhaveddvayoḥ
जिसकी नीति उत्तम है और जो भूल से रहित है, उसके लिए शत्रु से भिड़ना ही श्रेष्ठ उपाय है; उस भिड़ंत से एक पक्ष भारी पड़ जाता है और दोनों बराबर नहीं रह जाते।
श्लोक 5 (2.17.5)
अनयस्यानुपायस्य संयुगे परमः क्षयः । संशयो जायते साम्याज्जयश्च न भवेद्द्वयोः ॥
anayasyānupāyasya saṃyuge paramaḥ kṣayaḥ | saṃśayo jāyate sāmyājjayaśca na bhaveddvayoḥ
जिसके पास न नीति है न उपाय, उसके लिए युद्ध में घोर विनाश ही है। जहाँ दोनों पक्ष बराबर हों, वहाँ परिणाम संदिग्ध रहता है और विजय किसी को भी नहीं मिलती।
श्लोक 6 (2.17.6)
ते वयं नयमास्थाय शत्रुदेशसमीपगाः । कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्येव नदीरयाः । पररन्ध्रे पराक्रान्ताः स्वरन्ध्रावरणे स्थिताः ॥
te vayaṃ nayamāsthāya śatrudeśasamīpagāḥ | kathamantaṃ na gacchema vṛkṣasyeva nadīrayāḥ | pararandhre parākrāntāḥ svarandhrāvaraṇe sthitāḥ
तो हम नीति का आश्रय लेकर शत्रु के देश के पास पहुँचें, तो उसका अन्त क्यों न कर सकेंगे, जैसे नदी का वेग वृक्ष को गिरा देता है — उसके दुर्बल स्थानों पर आक्रमण करते हुए और अपने दुर्बल स्थानों को ढके रखते हुए?
श्लोक 7 (2.17.7)
व्यूढानीकैरतिबलैर्न युध्येदरिभिः सह । इति बुद्धिमतां नीतिस्तन्ममापीह रोचते ॥
vyūḍhānīkairatibalairna yudhyedaribhiḥ saha | iti buddhimatāṃ nītistanmamāpīha rocate
जिन अत्यन्त बलवान शत्रुओं की सेनाएँ व्यूह में सजी हों, उनसे सीधे युद्ध नहीं करना चाहिए — यही बुद्धिमानों की नीति है, और यही मुझे भी अच्छी लगती है।
श्लोक 8 (2.17.8)
अनवद्या ह्यसम्बुद्धाः प्रविष्टाः शत्रुसद्म तत् । शत्रुदेशमुपाक्रम्य तं कामं प्राप्नुयामहे ॥
anavadyā hyasambuddhāḥ praviṣṭāḥ śatrusadma tat | śatrudeśamupākramya taṃ kāmaṃ prāpnuyāmahe
हम निर्दोष रहकर और पहचाने बिना शत्रु के भवन में प्रवेश करेंगे; उसके देश में पहुँचकर हम अपना मनोरथ पा लेंगे।
श्लोक 9 (2.17.9)
एको ह्येव श्रियं नित्यं बिभर्ति पुरुषर्षभः । अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षयं नैव लक्षये ॥
eko hyeva śriyaṃ nityaṃ bibharti puruṣarṣabhaḥ | antarātmeva bhūtānāṃ tatkṣayaṃ naiva lakṣaye
यह पुरुषश्रेष्ठ अकेला ही राजलक्ष्मी को सदा धारण किए हुए है, जैसे प्राणियों के भीतर अन्तरात्मा रहती है; मुझे उसका अपने आप क्षीण होना कहीं दिखाई नहीं देता।
श्लोक 10 (2.17.10)
अथवैनं निहत्याजौ शेषेणापि समाहताः । प्राप्नुयाम ततः स्वर्गं ज्ञातित्राणपरायणाः ॥
athavainaṃ nihatyājau śeṣeṇāpi samāhatāḥ | prāpnuyāma tataḥ svargaṃ jñātitrāṇaparāyaṇāḥ
अथवा युद्ध में उसे मारकर, चाहे उसकी बची सेना हमें मार भी डाले, हम अपने बन्धुओं की रक्षा में तत्पर रहते हुए स्वर्ग प्राप्त करेंगे।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (2.17.11)
कृष्ण कोऽयं जरासन्धः किंवीर्यः किम्पराक्रमः । यस्त्वां स्पृष्ट्वाऽग्निसदृशं न दग्धः शलभो यथा ॥
kṛṣṇa ko'yaṃ jarāsandhaḥ kiṃvīryaḥ kimparākramaḥ | yastvāṃ spṛṣṭvā'gnisadṛśaṃ na dagdhaḥ śalabho yathā
"कृष्ण, यह जरासन्ध कौन है? उसका पराक्रम और बल कैसा है, कि अग्नि-समान तुम्हें छूकर भी वह पतंगे की भाँति भस्म नहीं हुआ?"
कृष्ण उवाच
श्लोक 12 (2.17.12)
शृणु राजञ्जरासन्धो यद्वीर्यो यत्पराक्रमः । यथा चोपेक्षितोऽस्माभिर्बहुशः कृतविप्रियः ॥
śṛṇu rājañjarāsandho yadvīryo yatparākramaḥ | yathā copekṣito'smābhirbahuśaḥ kṛtavipriyaḥ
हे राजन्, सुनो कि जरासन्ध का बल और पराक्रम कैसा है, और बार-बार हमारा अहित करने पर भी हमने उसकी उपेक्षा क्यों की।
श्लोक 13 (2.17.13)
अक्षौहिणीनां तिसृणां पतिः समरदर्पितः । राजा बृहद्रथो नाम मगधाधिपतिर्बली ॥
akṣauhiṇīnāṃ tisṛṇāṃ patiḥ samaradarpitaḥ | rājā bṛhadratho nāma magadhādhipatirbalī
मगध के अधिपति बृहद्रथ नाम के एक बलवान राजा थे, जो तीन अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी और युद्ध में गर्वीले थे।
श्लोक 14 (2.17.14)
रूपवान्वीर्यसम्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः । नित्यं दीक्षाङ्किततनुः शतक्रतुरिवापरः ॥
rūpavānvīryasampannaḥ śrīmānatulavikramaḥ | nityaṃ dīkṣāṅkitatanuḥ śatakraturivāparaḥ
वे रूपवान, पराक्रमी, श्रीसम्पन्न और अतुलनीय विक्रम वाले थे; उनका शरीर सदा यज्ञ-दीक्षा के चिह्नों से अंकित रहता था, मानो वे दूसरे शतक्रतु इन्द्र हों।
श्लोक 15 (2.17.15)
तेजसा सूर्यसङ्काशः क्षमया पृथिवीसमः । यश्चान्तकसमः क्रोधे श्रिया वैश्रवणोपमः ॥
tejasā sūryasaṅkāśaḥ kṣamayā pṛthivīsamaḥ | yaścāntakasamaḥ krodhe śriyā vaiśravaṇopamaḥ
तेज में वे सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, क्रोध में यमराज के समान और सम्पत्ति में कुबेर के समान थे।
श्लोक 16 (2.17.16)
स्वराज्यं कारयामास मगधेषु गिरिव्रजे । तस्याभिजनसंयुक्तैर्गुणैर्भरतसत्तम । व्याप्तेयं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥
svarājyaṃ kārayāmāsa magadheṣu girivraje | tasyābhijanasaṃyuktairguṇairbharatasattama | vyāpteyaṃ pṛthivī sarvā sūryasyeva gabhastibhiḥ
वे मगध देश में गिरिव्रज से अपना राज्य चलाते थे। हे भरतश्रेष्ठ, उनके कुलीनता से युक्त गुणों से यह सारी पृथ्वी वैसे ही व्याप्त थी जैसे सूर्य की किरणों से।
श्लोक 17 (2.17.17)
स काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ । उपयेमे महावीर्यो रूपद्रविणसंयुते । तयोश्चकार समयं मिथः स पुरुषर्षभः ॥
sa kāśirājasya sute yamaje bharatarṣabha | upayeme mahāvīryo rūpadraviṇasaṃyute | tayoścakāra samayaṃ mithaḥ sa puruṣarṣabhaḥ
हे भरतर्षभ, उन महापराक्रमी राजा ने काशिराज की जुड़वाँ पुत्रियों से विवाह किया, जो रूप और धन से सम्पन्न थीं। उस पुरुषश्रेष्ठ ने उन दोनों से एकान्त में एक प्रतिज्ञा की —
श्लोक 18 (2.17.18)
नातिवर्तिष्य इत्येवं पत्नीभ्यां सन्निधौ तदा । स ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नीभ्यां वसुधाधिपः ॥
nātivartiṣya ityevaṃ patnībhyāṃ sannidhau tadā | sa tābhyāṃ śuśubhe rājā patnībhyāṃ vasudhādhipaḥ
उनके सामने यह वचन दिया कि "मैं तुम दोनों में से किसी के साथ पक्षपात नहीं करूँगा।" उन दोनों पत्नियों के साथ वे पृथ्वीपति राजा वैसे ही शोभित हुए
श्लोक 19 (2.17.19)
प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विपः । तयोर्मध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिपः ॥
priyābhyāmanurūpābhyāṃ kareṇubhyāmiva dvipaḥ | tayormadhyagataścāpi rarāja vasudhādhipaḥ
जैसे दो प्रिय और अनुरूप हथिनियों के साथ गजराज। उन दोनों के बीच खड़े पृथ्वीपति ऐसे सुशोभित होते थे
श्लोक 20 (2.17.20)
गङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः । विषयेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमत्यगात् ॥
gaṅgāyamunayormadhye mūrtimāniva sāgaraḥ | viṣayeṣu nimagnasya tasya yauvanamatyagāt
मानो गंगा और यमुना के बीच साक्षात् समुद्र हो। किन्तु विषय-भोगों में डूबे रहते हुए उनका यौवन बीत गया,
श्लोक 21 (2.17.21)
न च वंशकरः पुत्रस्तस्याजायत कश्चन । मङ्गलैर्बहुभिर्होमैः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः ॥
na ca vaṃśakaraḥ putrastasyājāyata kaścana | maṅgalairbahubhirhomaiḥ putrakāmābhiriṣṭibhiḥ
और उनके वंश को चलाने वाला कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। अनेक मंगल-कर्मों, होमों और पुत्र-कामना से किए गए यज्ञों से भी
श्लोक 22 (2.17.22)
नाससाद नृपश्रेष्ठः पुत्रं कुलविवर्धनम् । स भार्याभ्यां च सहितो निर्वेदमगमद्भृशम् ॥
nāsasāda nṛpaśreṣṭhaḥ putraṃ kulavivardhanam | sa bhāryābhyāṃ ca sahito nirvedamagamadbhṛśam
उन श्रेष्ठ राजा को कुल बढ़ाने वाला पुत्र नहीं मिला। तब वे अपनी दोनों पत्नियों सहित गहरी निराशा में डूब गए।
श्लोक 23 (2.17.23)
राज्यं चापि परित्यज्य तपोवनमथाश्रयत् । वार्यमाणः प्रकृतिभिर्नृपभक्त्या विशाम्पते ॥
rājyaṃ cāpi parityajya tapovanamathāśrayat | vāryamāṇaḥ prakṛtibhirnṛpabhaktyā viśāmpate
हे प्रजानाथ, उन्होंने राज्य भी त्याग दिया और तपोवन का आश्रय लिया, यद्यपि प्रजा ने राजभक्ति के कारण उन्हें रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 24 (2.17.24)
अथ काक्षीवतः पुत्रं गौतमस्य महात्मनः । शुश्राव तपसि श्रेष्ठमुदारं चण्डकौशिकम् ॥
atha kākṣīvataḥ putraṃ gautamasya mahātmanaḥ | śuśrāva tapasi śreṣṭhamudāraṃ caṇḍakauśikam
तब उन्होंने गौतम-कुल के महात्मा काक्षीवान् के पुत्र, तपस्या में श्रेष्ठ और उदार मुनि चण्डकौशिक के विषय में सुना।
श्लोक 25 (2.17.25)
यदृच्छयाऽऽगतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम् । पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वयत्नैरतोषयत् ॥
yadṛcchayā''gataṃ taṃ tu vṛkṣamūlamupāśritam | patnībhyāṃ sahito rājā sarvayatnairatoṣayat
जब वे मुनि संयोग से वहाँ आकर एक वृक्ष के नीचे बैठे थे, तब राजा ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ हर प्रकार से यत्न करके उन्हें प्रसन्न किया।
श्लोक 26 (2.17.26)
बृहद्रथं च स ऋषिर्यथावच्चाभ्यनन्दत । उपविष्टः स तेनाथ अनुज्ञातो महात्मना ॥
bṛhadrathaṃ ca sa ṛṣiryathāvaccābhyanandata | upaviṣṭaḥ sa tenātha anujñāto mahātmanā
ऋषि ने भी बृहद्रथ का यथोचित अभिनन्दन किया, और उन महात्मा की अनुमति पाकर राजा बैठ गए।
श्लोक 27 (2.17.27)
तमपृच्छत्तदा विप्रः किमागमनमित्यथ । विप्रैरनुगतस्यैव पत्नीभ्यां सहितस्य च ॥
tamapṛcchattadā vipraḥ kimāgamanamityatha | viprairanugatasyaiva patnībhyāṃ sahitasya ca
तब उस ब्राह्मण ने उनसे पूछा कि ब्राह्मणों के साथ और दोनों पत्नियों सहित वे किस प्रयोजन से आए हैं।
श्लोक 28 (2.17.28)
स उवाच मुनिं राजा भगवन्नास्ति मे सुतः । अपुत्रस्य तु राज्येन वृद्धत्वे किं प्रयोजनम् ॥
sa uvāca muniṃ rājā bhagavannāsti me sutaḥ | aputrasya tu rājyena vṛddhatve kiṃ prayojanam
राजा ने मुनि से कहा: "भगवन्, मेरा कोई पुत्र नहीं है। बुढ़ापे में पुत्रहीन व्यक्ति को राज्य से क्या प्रयोजन?
श्लोक 29 (2.17.29)
सोऽहं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने । नाप्रजस्य मुने कीर्तिः स्वधा चैवाक्षया भवेत् । एवमुक्तः स राज्ञा तु मुनिः कारुण्यमागतः ॥
so'haṃ tapaścariṣyāmi patnībhyāṃ sahito vane | nāprajasya mune kīrtiḥ svadhā caivākṣayā bhavet | evamuktaḥ sa rājñā tu muniḥ kāruṇyamāgataḥ
इसलिए मैं अपनी पत्नियों सहित वन में तप करूँगा। हे मुनि, सन्तानहीन की न तो स्थायी कीर्ति होती है और न पितरों को मिलने वाली अक्षय स्वधा।" राजा के ऐसा कहने पर मुनि करुणा से भर गए।
श्लोक 30 (2.17.30)
तमब्रवीत्सत्यधृतिः सत्यवागृषिसत्तमः । परितुष्टोऽस्मि राजेन्द्र वरं वरय सुव्रत ॥
tamabravītsatyadhṛtiḥ satyavāgṛṣisattamaḥ | parituṣṭo'smi rājendra varaṃ varaya suvrata
सत्य में दृढ़ और सत्यवादी उन ऋषिश्रेष्ठ ने उनसे कहा: "हे राजेन्द्र, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। हे सुव्रत, वर माँगो।"
श्लोक 31 (2.17.31)
ततः सभार्यः प्रणतस्तमुवाच बृहद्रथः । पुत्रदर्शननैराश्याद्बाष्पसन्दिग्धया गिरा ॥
tataḥ sabhāryaḥ praṇatastamuvāca bṛhadrathaḥ | putradarśananairāśyādbāṣpasandigdhayā girā
तब बृहद्रथ ने पत्नियों सहित प्रणाम करके, पुत्र-दर्शन से निराश होकर, आँसुओं से रुँधी वाणी में उनसे कहा:
राजोवाच
श्लोक 32 (2.17.32)
भगवन् राज्यमुत्सृज्य प्रस्थितस्य तपोवनम् । किं वरेणाल्पभाग्यस्य किं राज्येनाप्रजस्य मे ॥
bhagavan rājyamutsṛjya prasthitasya tapovanam | kiṃ vareṇālpabhāgyasya kiṃ rājyenāprajasya me
"भगवन्, मैं राज्य छोड़कर तपोवन के लिए निकल पड़ा हूँ। मुझ अभागे को वर से क्या लेना, और मुझ सन्तानहीन को राज्य से क्या?"
कृष्ण उवाच
श्लोक 33 (2.17.33)
एतच्छ्रुत्वा मुनिर्ध्यानमगमत्क्षुभितेन्द्रियः । तस्यैव चाम्रवृक्षस्य छायायां समुपाविशत् ॥
etacchrutvā munirdhyānamagamatkṣubhitendriyaḥ | tasyaiva cāmravṛkṣasya chāyāyāṃ samupāviśat
यह सुनकर मुनि का मन विचलित हो उठा और वे उसी आम के वृक्ष की छाया में बैठकर ध्यान में लीन हो गए।
श्लोक 34 (2.17.34)
तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सङ्गे निपपात ह । अवानमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल ॥
tasyopaviṣṭasya munerutsaṅge nipapāta ha | avānamaśukādaṣṭamekamāmraphalaṃ kila
कहते हैं, जब मुनि वहाँ बैठे थे, तब उनकी गोद में एक आम का फल गिरा — रसीला, और जिसे किसी तोते ने चोंच नहीं मारी थी।
श्लोक 35 (2.17.35)
तत्प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाभिमन्त्र्य च । राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसम्प्राप्तिकारणम् ॥
tatpragṛhya muniśreṣṭho hṛdayenābhimantrya ca | rājñe dadāvapratimaṃ putrasamprāptikāraṇam
मुनिश्रेष्ठ ने उसे उठाया, मन ही मन मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और राजा को दे दिया — पुत्र-प्राप्ति का एक अनुपम साधन।
श्लोक 36 (2.17.36)
उवाच च महाप्राज्ञस्तं राजानं महामुनिः । गच्छ राजन्कृतार्थोऽसि निवर्तस्व नराधिप ॥
uvāca ca mahāprājñastaṃ rājānaṃ mahāmuniḥ | gaccha rājankṛtārtho'si nivartasva narādhipa
और उन परम ज्ञानी महामुनि ने राजा से कहा: "राजन्, जाओ; तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हुआ। हे नरेश, लौट जाओ।
चण्डकौशिक उवाच
श्लोक 37 (2.17.37)
एष ते तनयो राजन्मा तपेह तपोवने । प्रजाः पालय धर्मेण एष धर्मो महीक्षिताम् ॥
eṣa te tanayo rājanmā tapeha tapovane | prajāḥ pālaya dharmeṇa eṣa dharmo mahīkṣitām
राजन्, यह रहा तुम्हारा पुत्र। यहाँ तपोवन में तप मत करो। धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो; यही राजाओं का धर्म है।
श्लोक 38 (2.17.38)
यजस्व विविधैर्यज्ञैरिन्द्रं तर्पय चेन्दुना । पुत्रं राज्ये प्रतिष्ठाप्य तत आश्रममाव्रज ॥
yajasva vividhairyajñairindraṃ tarpaya cendunā | putraṃ rājye pratiṣṭhāpya tata āśramamāvraja
नाना प्रकार के यज्ञ करो और सोम से इन्द्र को तृप्त करो। पुत्र को राज्य पर प्रतिष्ठित करके तब आश्रम में आना।
श्लोक 39 (2.17.39)
अष्टौ वरान्प्रयच्छामि तव पुत्रस्य पार्थिव । ब्रह्मण्यत्वमजेयत्वं युद्धेषु च तथा मतिः ॥
aṣṭau varānprayacchāmi tava putrasya pārthiva | brahmaṇyatvamajeyatvaṃ yuddheṣu ca tathā matiḥ
हे पृथ्वीपति, मैं तुम्हारे पुत्र को आठ वर देता हूँ: ब्राह्मणों के प्रति भक्ति, अजेयता, युद्ध में रुचि,
श्लोक 40 (2.17.40)
प्रियातिथेयतां चैव दीनानामन्ववेक्षणम् । तथा बलं च सुमहल्लोके कीर्तिं च शाश्वतीम् ॥
priyātitheyatāṃ caiva dīnānāmanvavekṣaṇam | tathā balaṃ ca sumahalloke kīrtiṃ ca śāśvatīm
अतिथि-सत्कार में प्रीति, दीन-दुखियों की देखभाल, अत्यन्त महान बल, संसार में शाश्वत कीर्ति,
श्लोक 41 (2.17.41)
अनुरागं प्रजानां चेत्येवमष्टौ वरान्नृप । गच्छ त्वं कृतकृत्योऽसि निवर्तस्व जनाधिप ॥
anurāgaṃ prajānāṃ cetyevamaṣṭau varānnṛpa | gaccha tvaṃ kṛtakṛtyo'si nivartasva janādhipa
और प्रजा का अनुराग — ये आठ वर हैं, राजन्। जाओ, तुम कृतार्थ हो गए। हे जननाथ, लौट जाओ।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 42 (2.17.42)
अनुज्ञातः स ऋषिणा पत्नीभ्यां सहितो नृपः । पौरैरनुगतश्चापि विवेश स्वपुरं ततः ॥
anujñātaḥ sa ṛṣiṇā patnībhyāṃ sahito nṛpaḥ | paurairanugataścāpi viveśa svapuraṃ tataḥ
ऋषि की अनुमति पाकर राजा अपनी पत्नियों के साथ, पुरवासियों से घिरे हुए, अपने नगर में लौट आए।
श्लोक 43 (2.17.43)
यथासमयमाज्ञाय तदा स नृपसत्तमः । द्वाभ्यामेकं फलं प्रादात्पत्नीभ्यां भरतर्षभ ॥
yathāsamayamājñāya tadā sa nṛpasattamaḥ | dvābhyāmekaṃ phalaṃ prādātpatnībhyāṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, फिर उचित समय जानकर उन नृपश्रेष्ठ ने वह एक फल अपनी दोनों पत्नियों को दे दिया।
श्लोक 44 (2.17.44)
मुनेश्च बहुमानेन कालस्य च विपर्ययात् । ते तदाम्रं द्विधा कृत्वा भक्षयामासतुः शुभे ॥
muneśca bahumānena kālasya ca viparyayāt | te tadāmraṃ dvidhā kṛtvā bhakṣayāmāsatuḥ śubhe
मुनि के प्रति बड़े आदर के कारण, और काल के फेर से, उन दोनों सुन्दर रानियों ने उस आम के दो भाग करके खा लिए।
श्लोक 45 (2.17.45)
तयोः समभवद्गर्भः फलप्राशनसम्भवः । ते च दृष्ट्वा स नृपतिः परां मुदमवाप ह ॥
tayoḥ samabhavadgarbhaḥ phalaprāśanasambhavaḥ | te ca dṛṣṭvā sa nṛpatiḥ parāṃ mudamavāpa ha
फल खाने से दोनों गर्भवती हुईं, और उन्हें ऐसा देखकर राजा को परम आनन्द हुआ।
श्लोक 46 (2.17.46)
अथ काले महाप्राज्ञ यथासमयमागते । प्रजायेतामुभे राजञ्शरीरशकले तदा ॥
atha kāle mahāprājña yathāsamayamāgate | prajāyetāmubhe rājañśarīraśakale tadā
हे महाप्राज्ञ राजन्, फिर समय पूरा होने पर दोनों रानियों ने शरीर के एक-एक खण्ड को जन्म दिया।
श्लोक 47 (2.17.47)
एकाक्षिबाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिचे । दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपतुरुभे भृशम् ॥
ekākṣibāhucaraṇe ardhodaramukhasphice | dṛṣṭvā śarīraśakale pravepaturubhe bhṛśam
प्रत्येक खण्ड में एक आँख, एक भुजा, एक पैर, आधा पेट, आधा मुख और एक नितम्ब था। शरीर के उन खण्डों को देखकर दोनों रानियाँ बुरी तरह काँप उठीं।
श्लोक 48 (2.17.48)
उद्विग्ने सह संमन्त्र्य ते भगिन्यौ तदाऽबले । सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदुःखिते ॥
udvigne saha saṃmantrya te bhaginyau tadā'bale | sajīve prāṇiśakale tatyajāte suduḥkhite
व्याकुल होकर उन दोनों असहाय बहनों ने आपस में सलाह की, और अत्यन्त दुःखी होकर शिशु के उन दोनों जीवित खण्डों को त्याग दिया।
श्लोक 49 (2.17.49)
तयोर्धात्र्यौ सुसंवीते कृत्वा ते गर्भसम्प्लवे । निर्गम्यान्तःपुरद्वारात्समुत्सृज्याभिजग्मतुः ॥
tayordhātryau susaṃvīte kṛtvā te garbhasamplave | nirgamyāntaḥpuradvārātsamutsṛjyābhijagmatuḥ
उनकी दोनों धायों ने उन दोनों गर्भ-खण्डों को भली-भाँति ढककर अन्तःपुर के द्वार से बाहर निकलकर उन्हें छोड़ दिया और लौट आईं।
श्लोक 50 (2.17.50)
दुकूलाभ्यां सुसञ्छन्ने पाण्डराभ्यामुभे तदा । अज्ञाते कस्यचित्ते तु जहतुस्ते चतुष्पथे ॥
dukūlābhyāṃ susañchanne pāṇḍarābhyāmubhe tadā | ajñāte kasyacitte tu jahatuste catuṣpathe
दोनों खण्डों को दो सफ़ेद रेशमी वस्त्रों में अच्छी तरह लपेटकर, किसी को पता चले बिना, उन्होंने उन्हें एक चौराहे पर छोड़ दिया।
श्लोक 51 (2.17.51)
ततो विविशतुर्धात्र्यौ पुनरन्तःपुरं तदा । कथयामासतुरुभे देवीभ्यां तु पृथक्पृथक् ॥
tato viviśaturdhātryau punarantaḥpuraṃ tadā | kathayāmāsaturubhe devībhyāṃ tu pṛthakpṛthak
फिर दोनों धायें अन्तःपुर में लौट आईं और उन्होंने अलग-अलग अपनी-अपनी रानी को यह बता दिया।
श्लोक 52 (2.17.52)
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी । जग्राह मनुजव्याघ्र मांसशोणितभोजना ॥
te catuṣpathanikṣipte jarā nāmātha rākṣasī | jagrāha manujavyāghra māṃsaśoṇitabhojanā
हे पुरुषसिंह, चौराहे पर पड़े उन दोनों खण्डों को मांस और रक्त खाने वाली जरा नाम की एक राक्षसी ने उठा लिया।
श्लोक 53 (2.17.53)
कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी । संयोजयामास तदा विधानबलचोदिता ॥
kartukāmā sukhavahe śakale sā tu rākṣasī | saṃyojayāmāsa tadā vidhānabalacoditā
उन्हें ले जाने में सुविधा हो, इस इच्छा से उस राक्षसी ने विधाता की शक्ति से प्रेरित होकर उन दोनों खण्डों को जोड़ दिया।
श्लोक 54 (2.17.54)
ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ । एकमूर्तिधरो वीरः कुमारः समपद्यत ॥
te samānītamātre tu śakale puruṣarṣabha | ekamūrtidharo vīraḥ kumāraḥ samapadyata
हे पुरुषश्रेष्ठ, जैसे ही वे दोनों खण्ड मिलाए गए, वे एक ही शरीर वाले वीर बालक बन गए।
श्लोक 55 (2.17.55)
ततः सा राक्षसी राजन्विस्मयोत्फुल्ललोचना । न शशाक समुद्वोढुं वज्रसारमयं शिशुम् ॥
tataḥ sā rākṣasī rājanvismayotphullalocanā | na śaśāka samudvoḍhuṃ vajrasāramayaṃ śiśum
राजन्, तब आश्चर्य से आँखें फाड़े वह राक्षसी उस वज्र के समान कठोर और भारी शिशु को उठा न सकी।
श्लोक 56 (2.17.56)
बालस्ताम्रतलं मुष्टिं कृत्वा चास्ये निधाय सः । प्राक्रोशदतिसंरब्धः सतोय इव तोयदः ॥
bālastāmratalaṃ muṣṭiṃ kṛtvā cāsye nidhāya saḥ | prākrośadatisaṃrabdhaḥ satoya iva toyadaḥ
बालक ने अपनी ताँबे जैसी लाल हथेली की मुट्ठी बनाकर मुँह में डाली और अत्यन्त क्रोध से जल भरे मेघ की भाँति गरजकर रोने लगा।
श्लोक 57 (2.17.57)
तेन शब्देन सम्भ्रान्तः सहसाऽन्तःपुरे जनः । निर्जगाम नरव्याघ्र राज्ञा सह परन्तप ॥
tena śabdena sambhrāntaḥ sahasā'ntaḥpure janaḥ | nirjagāma naravyāghra rājñā saha parantapa
हे पुरुषसिंह, हे परन्तप, उस शब्द से घबराकर अन्तःपुर के लोग राजा के साथ सहसा बाहर निकल आए।
श्लोक 58 (2.17.58)
ते चाबले परिम्लाने पयःपूर्णपयोधरे । निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाभ्यगच्छताम् ॥
te cābale parimlāne payaḥpūrṇapayodhare | nirāśe putralābhāya sahasaivābhyagacchatām
और पुत्र-प्राप्ति से निराश, मुरझाई हुई वे दोनों असहाय रानियाँ भी, जिनके स्तन दूध से भरे थे, तुरन्त वहाँ आ पहुँचीं।
श्लोक 59 (2.17.59)
ते च दृष्ट्वा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम् । तं च बालं सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी ॥
te ca dṛṣṭvā tathābhūte rājānaṃ ceṣṭasaṃtatim | taṃ ca bālaṃ subalinaṃ cintayāmāsa rākṣasī
दोनों रानियों को उस दशा में, सन्तान की कामना करते राजा को, और उस अत्यन्त बलवान बालक को देखकर राक्षसी ने सोचा:
श्लोक 60 (2.17.60)
नार्हामि विषये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिनः । बालं पुत्रमिमं हन्तुं धार्मिकस्य महात्मनः ॥
nārhāmi viṣaye rājño vasantī putragṛddhinaḥ | bālaṃ putramimaṃ hantuṃ dhārmikasya mahātmanaḥ
"पुत्र की लालसा रखने वाले इस धर्मात्मा महात्मा राजा के राज्य में रहते हुए मुझे इस नन्हे बालक को मारना उचित नहीं है।"
श्लोक 61 (2.17.61)
सा तं बालमुपादाय मेघलेखेव भास्करम् । कृत्वा च मानुषं रूपमुवाच वसुधाधिपम् ॥
sā taṃ bālamupādāya meghalekheva bhāskaram | kṛtvā ca mānuṣaṃ rūpamuvāca vasudhādhipam
जैसे मेघ की रेखा सूर्य को धारण करती है, वैसे ही उस बालक को उठाकर उसने मानव रूप धारण किया और पृथ्वीपति से कहा:
राक्षस्युवाच
श्लोक 62 (2.17.62)
बृहद्रथ सुतस्तेऽयं मया दत्तः प्रगृह्यताम् । तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात् । धात्रीजनपरित्यक्तो मयाऽयं परिरक्षितः ॥
bṛhadratha sutaste'yaṃ mayā dattaḥ pragṛhyatām | tava patnīdvaye jāto dvijātivaraśāsanāt | dhātrījanaparityakto mayā'yaṃ parirakṣitaḥ
"बृहद्रथ, यह तुम्हारा पुत्र है। मैं इसे तुम्हें देती हूँ; इसे ग्रहण करो। उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के आदेश से यह तुम्हारी दोनों पत्नियों से उत्पन्न हुआ है। धायों ने इसे त्याग दिया था, मैंने इसकी रक्षा की है।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 63 (2.17.63)
ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे । तं बालमभिपद्याशु प्रस्रवैरभ्यषिञ्चताम् ॥
tataste bharataśreṣṭha kāśirājasute śubhe | taṃ bālamabhipadyāśu prasravairabhyaṣiñcatām
हे भरतश्रेष्ठ, तब काशिराज की वे दोनों सुन्दर पुत्रियाँ तुरन्त उस बालक के पास पहुँचीं और अपने स्तनों से बहते दूध से उसे नहला दिया।
श्लोक 64 (2.17.64)
ततः स राजा संहृष्टः सर्वं तदुपलभ्य च । अपृच्छद्धेमगर्भाभां राक्षसीं तामराक्षसीम् ॥
tataḥ sa rājā saṃhṛṣṭaḥ sarvaṃ tadupalabhya ca | apṛcchaddhemagarbhābhāṃ rākṣasīṃ tāmarākṣasīm
तब सारी बात समझकर अत्यन्त हर्षित राजा ने उस स्वर्ण-गर्भ जैसी कान्ति वाली राक्षसी से, जो वेश से राक्षसी नहीं लगती थी, पूछा —
राजोवाच
श्लोक 65 (2.17.65)
का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी । कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे ॥
kā tvaṃ kamalagarbhābhe mama putrapradāyinī | kāmayā brūhi kalyāṇi devatā pratibhāsi me
"कमल के भीतरी भाग जैसी कान्ति वाली, मुझे पुत्र देने वाली तुम कौन हो? हे कल्याणी, अपनी इच्छा से बताओ — तुम मुझे कोई देवी प्रतीत होती हो।"