सभा पर्व · अध्याय 18
जरा का परिचय और जरासन्ध का नामकरण
राक्षसी बृहद्रथ को बताती है कि वह जरा है — वह गृहदेवी जिसकी घरों की दीवारों पर चित्र बनाकर पूजा होती है — और राजमहल में मिली पूजा के बदले उसने उनके पुत्र के दोनों खण्ड जोड़ दिए। वह भविष्यवाणी करती है कि बालक उसके नाम से विख्यात होगा और अन्तर्धान हो जाती है। राजा उसके सम्मान में महोत्सव कराते हैं, बालक का नाम "जरा द्वारा जोड़ा गया" — जरासन्ध — रखते हैं, और वह बालक बलवान होकर माता-पिता को आनन्द देता हुआ बड़ा होता है।
राक्षस्युवाच
श्लोक 1 (2.18.1)
जरा नामास्मि भद्रं ते राक्षसी कामरूपिणी । तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम् ॥
jarā nāmāsmi bhadraṃ te rākṣasī kāmarūpiṇī | tava veśmani rājendra pūjitā nyavasaṃ sukham
"हे राजेन्द्र, तुम्हारा कल्याण हो — मैं जरा नाम की राक्षसी हूँ, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकती है। मैं तुम्हारे भवन में सम्मान पाती हुई सुख से रहती आई हूँ।
श्लोक 2 (2.18.2)
गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी । गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयम्भुवा ॥
gṛhe gṛhe manuṣyāṇāṃ nityaṃ tiṣṭhāmi rākṣasī | gṛhadevīti nāmnā vai purā sṛṣṭā svayambhuvā
मैं राक्षसी मनुष्यों के घर-घर में सदा निवास करती हूँ। प्राचीन काल में स्वयम्भू ब्रह्मा ने मुझे "गृहदेवी" नाम से रचा था।
श्लोक 3 (2.18.3)
दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी । यो मां भक्त्या लिखेत्कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम् ॥
dānavānāṃ vināśāya sthāpitā divyarūpiṇī | yo māṃ bhaktyā likhetkuḍye saputrāṃ yauvanānvitām
दानवों के विनाश के लिए दिव्य रूप में मेरी स्थापना की गई। जो भक्तिपूर्वक मुझे दीवार पर युवती रूप में पुत्रों सहित चित्रित करता है,
श्लोक 4 (2.18.4)
गृहे तस्य भवेद्वृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात् । त्वद्गृहे तिष्ठमानाऽहं पूजिताऽहं सदा विभो ॥
gṛhe tasya bhavedvṛddhiranyathā kṣayamāpnuyāt | tvadgṛhe tiṣṭhamānā'haṃ pūjitā'haṃ sadā vibho
उसके घर में वृद्धि होती है; अन्यथा वह क्षय को प्राप्त होता है। हे प्रभो, तुम्हारे घर में रहते हुए मेरी सदा पूजा होती रही है —
श्लोक 5 (2.18.5)
लिखिता चैव कुड्येषु पुत्रैर्बहुभिरावृता । गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यभोज्यैः सुपूजिता ॥
likhitā caiva kuḍyeṣu putrairbahubhirāvṛtā | gandhapuṣpaistathā dhūpairbhakṣyabhojyaiḥ supūjitā
दीवारों पर अनेक पुत्रों से घिरी हुई चित्रित, और गन्ध, पुष्प, धूप तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से भली-भाँति पूजित।
श्लोक 6 (2.18.6)
साऽहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तयन्त्यनिशं नृप । तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिका ॥
sā'haṃ pratyupakārārthaṃ cintayantyaniśaṃ nṛpa | taveme putraśakale dṛṣṭavatyasmi dhārmikā
इसलिए, राजन्, उस उपकार का बदला चुकाने का दिन-रात विचार करती हुई मुझ धर्मपरायणा ने तुम्हारे पुत्र के ये दोनों खण्ड देखे।
श्लोक 7 (2.18.7)
संश्लेषिते मया दैवात्कुमारः समपद्यत । तव भाग्यान्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह ॥
saṃśleṣite mayā daivātkumāraḥ samapadyata | tava bhāgyānmahārāja hetumātramahaṃ tviha
जब मैंने उन्हें जोड़ा तो दैवयोग से एक बालक बन गया। महाराज, यह तुम्हारे भाग्य से हुआ; मैं तो इसमें केवल निमित्त मात्र हूँ।
श्लोक 8 (2.18.8)
मेरुं वा खादितुं शक्ता किं पुनस्तव बालकम् । गृहसम्पूजनात्तुष्ट्या मया प्रत्यर्पितस्तव ॥
meruṃ vā khādituṃ śaktā kiṃ punastava bālakam | gṛhasampūjanāttuṣṭyā mayā pratyarpitastava
मैं मेरु पर्वत को भी खा सकती हूँ, फिर तुम्हारे इस बालक की तो बात ही क्या! किन्तु तुम्हारे घर में हुई पूजा से प्रसन्न होकर मैंने इसे तुम्हें लौटा दिया है।
श्लोक 9 (2.18.9)
मम नाम्ना च लोकेऽस्मिन्ख्यात एव भविष्यति ॥
mama nāmnā ca loke'sminkhyāta eva bhaviṣyati
और इस संसार में वह मेरे ही नाम से विख्यात होगा।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 10 (2.18.10)
एवमुक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत । स सङ्गृह्य कुमारं तं प्रविवेश गृहं नृपः ॥
evamuktvā tu sā rājaṃstatraivāntaradhīyata | sa saṅgṛhya kumāraṃ taṃ praviveśa gṛhaṃ nṛpaḥ
राजन्, यह कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गई। और राजा उस बालक को लेकर अपने महल में चले गए।
श्लोक 11 (2.18.11)
तस्य बालस्य यत्कृत्यं तच्चकार नृपस्तदा । आज्ञापयच्च राक्षस्या मगधेषु महोत्सवम् ॥
tasya bālasya yatkṛtyaṃ taccakāra nṛpastadā | ājñāpayacca rākṣasyā magadheṣu mahotsavam
तब राजा ने उस बालक के सभी आवश्यक संस्कार किए, और राक्षसी के सम्मान में पूरे मगध में महोत्सव मनाने की आज्ञा दी।
श्लोक 12 (2.18.12)
तस्य नामाकरोच्चैव पितामहसमः पिता । जरया सन्धितो यस्माज्जरासन्धो भवत्वयम् ॥
tasya nāmākaroccaiva pitāmahasamaḥ pitā | jarayā sandhito yasmājjarāsandho bhavatvayam
और पितामह ब्रह्मा के समान उसके पिता ने उसका नाम रखा: "क्योंकि जरा ने इसे जोड़ा है, इसलिए इसका नाम जरासन्ध हो।"
श्लोक 13 (2.18.13)
सोऽवर्धत महातेजा मागधाधिपतेः सुतः । प्रमाणबलसम्पन्नो हुताहुतिरिवानलः ॥
so'vardhata mahātejā māgadhādhipateḥ sutaḥ | pramāṇabalasampanno hutāhutirivānalaḥ
मगधराज का वह महातेजस्वी पुत्र आहुतियों से बढ़ती अग्नि की भाँति डील-डौल और बल से सम्पन्न होकर बढ़ने लगा।
श्लोक 14 (2.18.14)
एवं स ववृधे राजन्कुमारः पुष्करेक्षणः । बलेन महता चापि यौवनस्थो बभूव ह । मातापित्रोर्नन्दकरः शुक्लपक्षे यथा शशी ॥
evaṃ sa vavṛdhe rājankumāraḥ puṣkarekṣaṇaḥ | balena mahatā cāpi yauvanastho babhūva ha | mātāpitrornandakaraḥ śuklapakṣe yathā śaśī
राजन्, इस प्रकार वह कमलनयन बालक बढ़ता गया और महान बल से युक्त होकर युवावस्था को प्राप्त हुआ; वह शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति माता-पिता को आनन्द देने वाला था।